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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

आविर्भाव : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 12 Dec 2023

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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः तो श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज की किताब में से हम पाठ कर रहे हैं। महाराज जी लिखते हैं। कल हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज हमको एक पूर्व भूमिका बताते हैं। जिस समय मुख वंश मां के पूर्वज जयराम भाटी में आगमन हुआ उनका उस समय की धार्मिक और ऐतिहासिक क्या पटभूमिका थी उसके बारे में महाराज जी ने हमको थोड़ा सा एक ऊपर से हमको एक निर्देश दिया। उन्होंने हमको बताया। अभी महाराज जी आगे लिखते हैं पुरुषानुक्रम राम मंत्र उपासक मुखजे बंशे जात श्रीजुक्त रामचंद्र मुखोपाध्याय इष्ट निष्ठा सदाचार लोक कल्याण साधन इत्यादि सद्गुर जन ग्राम वासी देर विशेष श्रद्धा भजन छिले पुरुषानुक्रम राम मंत्र उपासक अर्थात उनके पूर्वज पुरखे राम मंत्र के उपासक थे। इस तरह राम मंत्र के जप या तो राम मंत्र की जो उपासना करते हैं। इस तरह के परिवार में इनका जन्म हुआ था। रामचंद्र का इष्ट निष्ठा और वो किस चीज के लिए जाने जाते थे? इष्ट निष्ठा सदाचार और लोक कल्याण साधन इत्यादि सद्गुण जन ग्रामवासी देर विशेष श्रद्धा भाजन छिलन इष्ट के ऊपर में निष्ठा सत आचरण और लोक कल्याण साधन यह सद्गुणों की वजह से वो ग्राम वासियों के विशेष श्रद्धा भाजन अर्थात कि उनके ऊपर में ग्राम वासियों की विशेष श्रद्धा थी। यह यदि आप रामचंद्र का जीवन और खुदीराम का जीवन ठाकुर के पिताजी का दोनों साथ-साथ में स्टडी करेंगे तो इतने सारे पैरेलल दिखाई देंगे जो जितने ही वो भी राम मंत्र के उपासक थे ठाकुर के पिताजी और एक इंटरेस्टिंग है यहां पर पॉइंट कि ठाकुर का नाम रामकृष्ण किसने दिया जैसे कि वो स्वामी जी के बारे में कहा जाता है कि विवेकानंद नाम कहां से आया उन्होंने खुद ने तो विजा होम करने के बाद में विविधिशानंद नाम अपना खुद का ग्रहण किया था। सर्वप्रथम वराह नगर मठ में जब विजा होम हुआ था उस समय तो फिर यह विवेकानंद नाम कहां से आया? खेतड़ी के राजा ने दिया ना कि क्या हुआ? उसके बारे में जो स्पेकुलेशन है। वैसे ही ठाकुर के बारे में भी स्पेकुलेशन है कि श्री रामकृष्ण नाम क्या तोतापुरी ने दिया? क्या उनका यह सन्यास नाम है ना कि यह उनका जन्मगत नाम है। हालांकि गदाधर नाम था उनका बचपन का। किंतु जैसे हमारे घरों में हमारे परिवार में बहुत बार ऐसा होता है दो नाम दिए जाते हैं। एक तो आपका ऑफिशियल नाम होता है। एक तो आपका लाडला नाम होता है। मां आपको इस नाम से पुकारती है। तो रामकृष्ण नाम क्या घर का नाम था ना कि वो तोतापुरी ने सन्यास नाम दिया था। इसके बारे में जो स्पेककुलेशन है तो प्रभानंद जी ने मोर अबाउट श्री रामकृष्ण बोल के वो जो किताब लिखी है उसमें उन्होंने नाम को लेकर के एक ऐसा एक डिस्कवरी किया है कि तोतापुरी का आगमन तो 18632 इस तरह से हुआ है और यहां पे अह एक अह सैलरी रजिस्टर काली मंदिर का वो तकरीबन अह 181858 ना सेवन में एग्जैक्ट डेट भूल गया। उस साल के सैलरी रजिस्टर में ठाकुर ने श्री रामकृष्ण करके अपना साइन किया है। तो यह एक प्रभानंद जी का डिस्कवरी है और उनका कहना है कि जैसे खुदीराम के घर में उनके जितने भी भाई सबका नाम राम के ऊपर से ही राम प्रसन्न ऐसा करके सबका नाम था उनका। तो ठाकुर का नाम भी उनका नाम में राम क्यों नहीं है? राम तो होना चाहिए। उनके सभी के घर में राम था नाम के भीतर में तो इनका नाम भी राम होगा। उनके नाम के भीतर में बोलकर के महाराज कहते हैं कि रामकृष्ण नाम उनके पिताजी ने ही दिया होगा। गदाधर लाडला नाम होगा। इस तरह से उनका एक स्पेककुलेशन है। तो यहां पर भी देखिए कि यह रामचंद्र है। वह भी राम मंत्र के उपासक हैं। और वह भी उनकी सत्य निष्ठा सदाचार और लोक कल्याण जैसी प्रवृत्तियों के लिए वो भी जान ग्राम वासियों में बड़े ही श्रद्धा के पात्र थे। लोक कल्याण की बात आएगी तो हमको वो मां का वो फेमस वो जो वो मैं जब वो गदाधर अभ्युदय प्रकल्प लिमड़ी में चलता था। वहां पे मैं स्कूल में जाता था। मैं सोचता था कि बच्चों को ठाकुर मां स्वामी जी की किताबें वो बतानी है, स्टोरीज बतानी है। फिर तंतु कहां से बताएं? कभी-कभी लगता है कि इनकी स्टोरीज और इनके किस्से थोड़े कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं। क्योंकि बच्चे तो बिल्कुल प्राइमरी के थे। तो वो जो बालकों के श्री रामकृष्ण, बालकों के श्री मां शारदा देवी ऐसी जो पिक्टोरियल बुक्स है वो ले जाता था। उसमें यह किस्सा है बड़ा ही ये छोटे बच्चे जो किताबें पढ़ते हैं इस तरह से पिक्टोरियल बुक्स ठाकुर मां स्वामी जी के जीवन में उनको पता है कि वो जब अकाल हुआ तो मां शारदा छोटी बच्ची थी और सबको वो खिचड़ी उनके पिताजी सबको बुला के खिचड़ी खिलाते थे और मां शारदा अपने हाथों से वो खिचड़ी को ठंडा करती थी वैसे हवा डाल के तो वो एक फेमस किस्सा है तो ये जो लोगों के प्रति करुणा एमथी जो अकाल पड़ा है तो उन लोगों को खाना नहीं मिल रहा है और मेरे पास में भगवान ने दिया है तो मैं क्यों नहीं अपनी अपना यह जो गुड फॉर्च्यून है उसको लोगों के साथ शेयर ना करूं ऐसा एक उनका मन में जो भाव था वो भाव वही लोक कल्याण बहुत सारे जमींदार ऐसे होते हैं उनको देखेंगे कि है हिंदू ही किंतु पता है ना कि ब्रिटिश लोगों ने किस तरह का एक डेंजरस सिस्टम बना करके रखा था कि जमींदारी किसको देंगे तो वो सबसे ज्यादा वो वहां से टैक्स जो निकाल पाएगा उनको तो टैक्स किसी भी फॉर्म में हो सकता है। वहां जो उपज होती है उसमें उसका भी मैक्सिमम हिस्सा वो यदि टैक्स के रूप में ले सके तो ऐसे लोगों को जमींदार बनाएंगे। तो ये जो एकदम डेंजरस एक्सप्लइटेशन सिस्टम जो ब्रिटिश लोगों ने भारत में बनाया था। इसकी वजह से बहुत सारे जमींदार एक तरह से पशुवत हो गए थे। उनको अपने ये उनके जो जमींदारी में खेत मजदूर है खेत मालिक ना कि खेत खेत मजदूर वे लोग किस तरह से काम करते हैं कैसी परिस्थिति में रहते हैं इसके बारे में किसी भी तरह की उनको अनुकंपा या तो करुणा नहीं थी बस इनके पास में से मैक्सिमम वो निकाल दिया जाए उनका धान उनकी उपज या तो फिर उनका लाइव स्टॉक उनकी धन संपत्ति जितना लूट सकना है लूटो तो एक बड़ा ही क्रूल सिस्टम उस समय भारत में जमींदारी का था और अभी मैं थोड़ा सा कंपेरेटिव हिस्ट्री पढ़ता हूं तो मुझे यह पता चला एक डाटा पॉइंट एक मुझे ऐसा मिला कि ये पाकिस्तान बनाने में सबसे ज्यादा बड़ा हाथ किन लोगों का था। तो ये जो बड़े-बड़े जमींदार थे उनका था। उनका मानना था कि ये जैसे नेहरू है, ये गांधी जी है उनका एक सोशलिस्ट टाइप का थिंकिंग है कि ये जमींदारी प्रथा को अबोलिश कर दिया जाए। जमींदारी प्रथा को बंद कर दिया जाए। खेड़े तेनी जमीन जो जो खेती करता है उसकी जमीन होनी चाहिए नहीं कि जमींदार की जमीन ये तो लैंड लिबरलाइजेशन जो है वो भारत में होने वाला है तो इसकी वजह से बेटर है कि एक दूसरा देश अपना बनाया जाए वहां पे अपनी जमींदारी वो बनी रहे तो ऐसा करके इन्होंने पाकिस्तान बनाया और पाकिस्तान में अभी भी लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ है। भारत में जो लैंड रिफॉर्म हुआ इसकी वजह से भारत आज एक मॉडर्न डेमोक्रेसी में वो परिणत हुआ है। मॉडर्न डेमोक्रेसी के रूप में विकसित हो पाया है। पाकिस्तान में ये लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ। दिस ये जो उसकी आज की जितनी भी समस्याएं हैं एक्सट्रीमिज्म है या तो फिर इकोनॉमिकल या डिसइीग्रेशन है जो भी उसकी समस्याएं हैं उसके रूट में यह बहुत बड़ा एक इशू है कि वहां पे लैंड रिफॉर्म कभी हो ही नहीं सकता। ज्यादातर जमीन बड़े-बड़े लोगों के हाथ में है जो कि मैक्सिमम जमीन अपने हाथ में रखें और फिर यह जो उपज के जो साधन है आय के साधन आय के साधन हमारे पास में नहीं रहेंगे तो हम लोग तो वैसे ही भिखारी की तरह ही तो रहेंगे ना तो इस तरह से देखिए कि ये लैंड रिफॉर्म लाने के लिए सोवियत यूनियन में रेवोल्यूशन लाना पड़ा। कितना ही ब्लड शेड हुआ। चाइना में रेवोल्यूशन आया। कितना ब्लड शेड हुआ। पाकिस्तान में लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ। तो आज पूरा डिसइीग्रेट होने को बैठा है। भारत में ग्राउंड अप ये ग्रास रूट लेवल से डेमोक्रेटिकली ये लैंड रिफॉर्म हुआ है। तो इसका रीजन यह रामचंद्र दत्त जैसे कितने हजारों हजारों किसान है, ब्राह्मण है, सदाचारी लोग हैं। उनके हृदय में करुणा थी। देखते थे कि यदि ईश्वर ने हमको कुछ दिया है तो उसका एक हिस्सा क्यों नहीं हम गरीब लोगों को बांटे तो इससे भी हमको भी तो उनका आशीर्वाद मिलेगा और इनको एक सहायता मिल जाएगी। तो यह आशीर्वाद एक तरह की प्रोस्पेरिटी है। यह ज्ञान होना यह भारत की एक यूनिकनेस है। वह जो जीडीपी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट जो मेजर करते हैं तो उसमें अभी आजकल वो ग्रॉस हैप्पीनेस इंडेक्स एक निकला है। उसमें भूटान बहुत आगे रहता है। पता नहीं वो किस तरह से कैलकुलेट करते हैं। इंडिया बहुत पीछे रहता है। बहुत सारे लोग अनहै है इंडिया में। ऐसा यह लोग कहते हैं। किंतु यदि यह एक आशीर्वाद का यदि एक इंडेक्स यदि मेजर बनाया जाए कि आशीर्वाद या तो फिर ईश्वर के आपके ऊपर में ब्लेसिंग्स यह एक आपकी संपत्ति है। ऐसा मानने वाले सबसे ज्यादा इंडिया में होंगे। हम लोग सिर्फ इस तरह से नहीं देखते कि हां मुझे मेरा इतना बैंक बैलेंस है। हम लोग यह भी देखते हैं कि ईश्वर के साथ में मेरा रिलेशन किस तरह का है। ईश्वर के ऊपर श्रद्धा भक्ति है कि नहीं। ईश्वर का मेरे ऊपर में आशीर्वाद है। यह मैं महसूस कर रहा हूं कि नहीं? दैट इटसेल्फ इज अ सॉर्ट ऑफ प्रोस्पेरिटी। ये एक एक वेल्थ का एक पार्ट है। ये जानना समझना भारत के लिए यूनिक है। और इसीलिए ये रामचंद्र जैसे कितने ही किसान अपने खुद से गरीब है। उनके खुद के पास ऐसा नहीं है कि बहुत सारा धन वगैरह है। उनकी बहुत बड़ी जमींदारी है। बहुत सारी उनकी उपज है। ऐसा कुछ नहीं है। वैसे ही एकदम सामान्य छोटा सा वो जमीन का टुकड़ा है। उसमें जो भी ईश्वर की कृपा से उग जाता है। वो है किंतु उसमें से भी ये लोग शेयर करते हैं। सो ये ऐसे लोगों की वजह से रामचंद्र दत्त रामचंद्र जैसे रामचंद्र मुखर्जी जैसे वो ब्राह्मण सदाचारी ब्राह्मण की वजह से भारत में एक तो जमींदारी भी गई और एक कम्युनिस्ट रिवोल्यूशन आने की भी जरूरत नहीं पड़ी। यथाक काले तनी शिहोड़ निवासी श्रीजुक्तो हर प्रसाद मजूमदार कन्ना श्रीमती श्यामा सुंदरी देवीर पानी ग्रहण करेंन जब समय आया तब शिहोड़ के निवासी जय राम भाटी के पास में ही शिहोड़ ग्राम है शहोड़ ग्राम फेमस है क्योंकि हृदय वहां से आता था तो शिहोड़ के निवासी श्रीयुक्त हरि प्रसाद मजूमदार इनकी कन्या श्रीमती श्यामा सुंदरी देवी का पानी ग्रहण किया उनके साथ में विवाह किया जब समय आया तब श्यामा सुंदरी देवी ओ पतिर अनुरूप धर्म प्राणा छिलेन श्यामा सुंदरी देवी भी अपने पति की तरह ही धर्म प्राण थी तहार शोलता पवित्रता और दृढ़ता काहिनी एकोनो लोक मुखे प्रचलितो आ उनकी सरलता पवित्रता और दृढ़ चित्तता की कहानियां अभी भी लोगों को लोगों के मुंह में माने लोग इसके बारे में अभी भी बात कर रहे हैं। ये दृढ़चित्तता किस तरह से वो एक हमको प्रश्न होता है। पवित्रता और सरलता तो हम समझ सकते हैं। दृढ़चितता ये वाली म ये तो विल पावर जो स्वामी जी जो बोलते हैं बार-बार ये श्यामा सुंदरी देवी में विल पावर ये ये कैसी बात हो गई महाराज जी क्यों ऐसा लिखते हैं? तो किंतु फिर वो एक दूसरा एक फेमस किस्सा है कि श्यामा सुंदरी देवी के वहां पर जगत धात्री पूजा हो रही थी तो उसके दुर्गा पूजा हो रही थी तो उसके लिए वो धान सब घर से वो ये लोग इकट्ठा करते थे तो पता नहीं उन लोगों के साथ में क्या झगड़ा हो गया तो दुर्गा पूजा के लिए धान श्यामा सुंदरी देवी का नहीं लिया तो इनकी वजह से उनके बड़ा ही दुख हुआ और फिर जब वो रात को सोई थी तो एक देवी आकर के उनको दर्शन दिया तो वो सुबह को उठकर के शारदा को पूछती ती है अरे सारू वो जो सिंह के ऊपर में बैठी हुई है वह देवी कौन है? तो वही अपनी जगत धात्री मां ने उत्तर दिया तो श्यामा सुंदरी देवी ने कहा कि मैं उनकी पूजा करूंगी। तो वही वो पूजा उन्होंने स्टार्ट की। फिर ये स्टार्ट तो की एक बार तो की किंतु फिर देखिए कि ये जो एक कंटीन्यूअस रखना और फिर ऐसा नहीं है कि मां के इतने सारे डिवोटी उस समय थे और बहुत सारा उनके पास में डोनेशन वगैरह आता था तो इतनी बड़ी पूजा वो अपने अकेले कर पाएंगे। यह तो सिर्फ एक शियर विल पावर है कि उन्होंने उस समय पूजा की थी। वरना तो इतनी बड़ी-बड़ी पूजा हम लोग तो बेलूर मठ में देखते हैं। यहां मिशन में देखते हैं। यदि आपको संपूर्ण विधिवत इस तरह की बड़ी पूजा करनी है तो आपको कितना आपको परिश्रम लगता है। आपका कितना धन व्यय होता है। तो यह एक उनका एक विल पावर था कि जगत धात्री पूजा वो अपने वहां पर स्टार्ट कर पाए। माने वो सरलता पवित्रता तो थी ही थी। विल पावर भी था और यही श्यामा सुंदरी देवी में और यही सब गुण मां शारदा में भी वह प्रवेश हुए थे ए भक्त दंपत्ति रे गहू आलोकितो करिया श्री श्री माता ठाकुरानी शारदा मणि देवी आविर्भाव होइया छिलो यही भक्त दंपत्ति का गह आलोकित घर प्रकाशित करके मां शारदामणि देवी का आविर्भाव हुआ था पिता और माता विषय श्री माय मुख होते मध्यम मध्य जे सामान्य दुटी कथा बािर हो तो तात ते एक दिके जैमन ता दे अमोल चरित्र सुंदर परिचय पावा जाए अपर दिके तेमनी जनक जननी प्रति मा अगाात बालोभाषा आभासो पावा जाए पिता और माता के विषय में मां बीचबीच में कुछ कुछ बातें करती थी और ये बातों को सुनकर करके हमको पिता और माता के चरित्र का एक सुंदर परिचय मिलता है और परिचय में हमको उनके चरित्र की पवित्रता माने एक शुभ्र चरित्र का जो हमको एक परिचय तो मिलता ही है। वैसे ही और एक हमको बात समझ में आती है कि अपने माता और पिता जनक और जननी इनके प्रति मां की कितनी अटूट कितना अगाध प्रेम था। कितनी अटूट श्रद्धा थी। मां बीच-बीच में ऐसा बोलती थी कि मेरे पिताजी, मेरी मां ऐसा करके जो मां अपने माता और पिता के बारे में बोलती थी वो सुनकर के ही लगेगा कि हां मां उनको कितना प्रीति की सहित उनको याद कर रही है। मां उनके प्रति कितनी श्रद्धावान है। मां बोली देन मां क्या कहती थी? अमार बाप मां बोलो छिलेन मेरे माताजी और पिताजी बड़े अच्छे थे। बाबा बो राम भक्त छिलेन बाबा बड़े ही राम भक्त थे नैषिक अन्य वर्ण दान नितना बड़े ही नैष्ठिक थे दूसरे वर्ण का दान स्वीकार नहीं करते थे और यह बारे में हमने कल भी एक बार डिस्कस किया था कि सिर्फ ब्राह्मण का ही दान लेना दूसरे लोगों का अन्य जाति का अन्य वर्ण का दान नहीं लेना इसका मतलब यह नहीं है कि यह लोग बड़े ही एक्सक्लूसिव या तो एलिट है। यह इंद्रियों के ऊपर में निग्रह करने के लिए एक डिसिप्लिन अपने समाज में बनाया गया है। अपने समाज के डीएनए में यह डिसिप्लिन डाला गया है। आज मैं यदि सुबह को उठकर के ऐसा सोचूं कि आज बड़ा ही ठंडी है। आज आज की ही बात कर रहा हूं। बड़ी ठंडी है। मैं अपने रूम में ही रहता हूं। 10 11:00 बजे जाएंगे ऑफिस में जाकर के चाय-बाय पिएंगे। क्लास वगैरह आज कुछ नहीं करना। या तो नहीं मंदिर में जाना रूम में ही बैठे रहो बड़ा मजा आएगा। तो यह अपना जो मन है इस तरह का सुख भोग करने के लिए हमेशा लालायित रहता है। उस समय यह एक प्रोग्रामिंग होना माने हार्डवेयर लेवल पे कि नहीं मंगल आरती में तो जाना ही है। भले ही चाहे जो कुछ भी हो जाए या तो फिर जैसे मेरे केस में क्लास करना ही है। वरना तो फिर यह कंटिन्यूटी टूट जाएगा। तो फिर इससे मेरा भी एक आनंद जो मुझे प्राप्त होता है वो चला जाएगा। तो ऐसा जो एक डिसिप्लिन हम ठीक करते हैं वो हमारे डीएनए में बैठ जाना चाहिए। तभी तो यह एक अपनी सुख और उपभोग की लालसा है उससे हम मुक्ति पाएंगे। वरना सिर्फ यह जो लॉजिक लगा करके हम लोग अपने कंफर्ट ज़ोन जो है उससे बाहर कभी नहीं निकल पाएंगे। यह इंस्टिंक्टिव है। कंफर्ट या तो सुख प्राप्ति इंस्टिंक्टिव लेवल पर है। तो वैसे ही यह डिसिप्लिन भी इंस्टिटक्टिव लेवल पर आना चाहिए। वो आप लॉजिकल लेवल पर लाएंगे तो उससे काम कभी नहीं होने वाला। इंस्टिंक्ट को इंस्टिंक्ट से ही फाइट करना है। ठाकुर जैसे कहते हैं कि एक कांटा लगा है तो एक दूसरे कांटे से वो वाला कांटा निकाल दो। फिर दोनों कांटे को फेंक दो। तो वैसे ही इंस्टिटक्टिव लेवल पे सुख प्राप्ति की इच्छा है। इंस्टिंक्टिव लेवल पर डिसिप्लिन को लेके आइए। तब वह उसको काट पाएंगे। इससे पहले यह नहीं जाने वाला। तो यह जो उनका है नैष्ठिक अन्य वर्ण दान नितना ये ये बात यह नहीं है कि ये लोग एक्सक्लूसिव है। ये डिसिप्लिन जो है तो उनका वो जो दान लेने का किससे दान लेते हैं वो लिमिट कर देते हैं। जिससे कि क्या होगा कि उपभोग जो है वह वैसे ही कम हो जाएगा। आप सभी के पास से दान लेने को जाएंगे तो हो सकता है कोई आपको ज्यादा रुपया दे दे कहीं से ज्यादा भिक्षा मिल जाए कहीं से बहुत कुछ मिल जाए किंतु आपने ठीक कर दिया कि सिर्फ ब्राह्मण से ही दान लेना है जो निष्ठावान होते हैं उनके पास से माने ब्राह्मण नहीं बेटर कहेंगे कि निष्ठावान जैसे कि ठाकुर ने खुद ने वो एक कामारिणी अर्थात कि वह कामार अर्थात वो जो कुंभ जो होता है उसके पास से भिक्षा ग्रहण की थी अपनी अह अह उप उपनयन के बाद में तो नॉट नेसेसरी कि ब्राह्मी किंतु निष्ठावन होना चाहिए। ये यदि आपके डीएनए में बैठ जाता है तो आपके पास में जो दान आता है वो पहले से ही लिमिटेड होगा और सुख उपभोग करने के लिए आपका स्कोप है पहले से ही लिमिटेड हो जाएगा। अन्य वर्ण दान नितना माय कतो दया छिलो मां की कितनी अच्छा और यदि अन्य वर्ण का दान नहीं लेते थे किंतु अन्य वर्णों को खिचड़ी खिलाते थे देखिए ये डिफरेंस समझना है जब वो अकाल पड़ा तो ऐसा नहीं है कि खिचड़ी सिर्फ वो ब्राह्मण लोगों को खिलाई है। खिचड़ी सबको खिलाई है। तो माने ये साइन है कि दान लेना है यानी कि अपने सुख को लिमिट करना है। नहीं की अपनी करुणा को यह दोनों में डिफरेंस है मायर कतो दया छिलो मां की कितनी दया थी लोक देर कतो खावातेन जतनो कोतेन कतो शरल लोगों को कितना खिलाती थी कितना उनका यत्न करती थी कितना उनका केयर लेती थी कितनी सरल थी वो आर बोली देन माने लोकोदे कतो खावातेन लोगों को कि ये जो मां के जितने भी ये आते थे संतान उनके के बच्चे बच्चियां वो सब जय राम भाटी दीक्षा लेने के लिए मां के पास में तो जय वो इनकी बात है ना कि एक बार श्यामा सुंदरी देवी बोल रही है कि अरे मेरी लड़की उसने मां शब्द की पुकार भी नहीं सुनी तो ठाकुर क्या कहते हैं कि उसके इतने सारे कच्चे बच्चे होंगे कि मां की पुकार सुन के बेचारी परेशान हो जाएगी तो मां शायद परेशान हुई होंगी श्यामा सुंदरी देवी कभी परेशान नहीं हुई हम नाती नाती नातनी एसएस है अर्थात कि मेरे पौत्र पौत्रियां आए हैं। ऐसा बोल के जो भी जय राम बाटी में आता था सबको खिलाती थी पिलाती थी जतन करती थी। तो ये श्यामा सुंदरी देवी आर बोली तेन माने मां आर कहती थी बाबा तांबा खेते खूब भो बा यह उनके ठाकुर का भी है स्वामी जी का भी है कि तंबाकू खाना अर्थात कि हुक्का पीना वगैरह उनको बड़ा ही पसंद था ता एमोन शोल ओमाइक छिलेन जे क्यों बाच दिए जे तो डेके बोसते वो इतने सरल और अमाइक थे कि घर के सामने से जो जाते थे उनको पुकार करके बिठाते थे और कहते थे बसो भाई तांबाक खाओ बैठो भाई मेरे साथ में बैठकर के तमाक खाओ अर्थात कि हुक्का पियो ए बोले निजे छिलीम छिलीम तांबाक शेजे खावात देन ऐसा कह के अपने से ही वो सजा सजा करके वह तंबाक उनको खिलाते थे बाप माय तपस्या ना थाकले की जन्मों ने और यहां पर ब्रैकेट में लिखा है भगवान बाप और मां की तपस्या ना रहने से क्या भगवान जन्म लेते हैं मां ने जो बहुत रेयरली अपने स्वरूप के बारे में बताया है उसमें यह एक बात है वो एक बात थी कि जब वो साउथ इंडिया से मां वापस आई थी तो वो केदार बाबू और वर्दा महाराज सामने बैठे थे उनको मां बता रही थी जम रेखे ऐसे छिलाम तेमनी नहीं देखला जिस तरह से वो मैंने शिवलिंग में रख के आई थी सीता के रूप में उन्होंने शिवलिंग बनाया था वहां पे वो जिस तरह से मैं रख के आई थी ऐसा ही मैं देख के आई हूं ऐसा मां ने बोल दिया गलती से तो गुलाब मां वहां से जा रही थी तो एकदम उन्होंने पकड़ लिया वापस आई बोला मां क्या बोल रही हो ये केदार बाबू तो वैसे वो उनको समझ में आया नहीं उनको ऊपर से चला गया तो गुलाब मां जा रही थी तो एकदम वापस आई बोला मां क्या बोल रही है तो मां ने कहा क्या कुछ नहीं कुछ नहीं तो नहीं नहीं नहीं अपने मुंह से निकल गया अभी वापस नहीं ले सकती। तो यहां पर भी मां कहती है कि यदि बाप और मां की तपस्या ना हो तो क्या उनके घर जन्म लेते हैं? उन्होंने इतना ही कहा है। जन्म लेते हैं किंतु कौन? यहां पर महाराज जी हमको ब्रैकेट में लिख के बताते हैं कि भगवान यह हमारा इंटरप्रिटेशन है। मां एक लिमिट के बाहर नहीं जाएगी। जैसे कि वो वाली कहानी में शिवलिंग वाली। उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि सीता के रूप में जो रख के आई थी वैसा ही मैंने देखा। जैसा रख के आई थी वैसा देखा। ऐसा कहा सीता का नाम नहीं लिया। माने कुछ तो छुपा के रखेंगे। सब कुछ दे देंगे तो फिर अपने को क्या करना है? हम यदि एक स्टेप चलेंगे तब तो वो 99 स्टेप चल के आगे आएंगे। हमको पूरा स्पून फीडिंग ही करवाना है बैठकर के। ऐसे तो चलने वाला नहीं है। यानी ब्रैकेट में भगवान हमको डाल देना है। वो वहां पर मां सीता हमको डाल देना है। निज जननी संबंध श्री मां बोली तेन अपनी मां के बारे में श्री मां कहती थी आर मां छिलेन जेनो लोखी मेरी मां थी जैसे कि लक्ष्मी समस्त बोछोर शो जिनष्टी पोत्रो गुछिए टूछिए ठीकठाक कोरे रात पूरा साल जो भी चीज वस्तु है सबको बड़े से बड़े ही अच्छे से सजा धजा करके वो अपने घर में रखती थी बोलतेन और कहती तिथि अमार भक्तो भगवान संसार मेरा है भक्त और भगवान का संसार ए संसार टी छिलो जेनो तार गाय रक्त यह संसार था जैसे कि श्यामा सुंदरी देवी के देह का रक्त कतो करे एटी ठीक-ठाक रखते कितना यत्न करके कितनी मेहनत करके इसको ठीक-ठाक सजा करके रखती थी देखिए अमार भक्त भग संसार ऐसा श्यामा सुंदरी देवी कहती है तो हम यहां पर भी वो अपना 1% वो डाल के कह सकते हैं कि वह जगधात्री देवी या तो भगवान राम जिनके ये लोग उपासक थे वो तो उनके घर में उपस्थित थे ही थे किंतु साथ में मां शारदा स्वयं ईश्वर के रूप में उपस्थित थी और मां के ये जो जितने संतान आते थे वहां पे दीक्षा लेने के लिए उपदेश प्राप्त करने के लिए वो थे भगवान भक्त तो इस तरह से हो गया भक्त और भगवान का संसार वर्दा महाराज गौरी गौरीशानंद जी की गौरी गौरीशानंद जी की एक सुंदर कहानी राममई महाराज राम महाराज एक सुंदर एक उनका ये है उनका एक रेमिनेशंस है बहुत सारे लोग कोलकाता से बड़े ही विद्वान विद्वान लोग मां के पास आते थे और उपदेश मांगते थे और कैसे पढ़े लिखे लोग कोई जज है ना कि कोई क्या है ऐसे बड़ी-बड़ी पोस्ट वाले लोग आकर के मां के पास सामने बैठकर के बड़े-बड़े प्रश्न करते थे। इतने कॉम्प्लिकेटेड फिलॉसोफिकल क्वेश्चन तो महाराज जी लिखते हैं कि अरे ये लोग जाकर के बेलूर मठ है। वहां पे जाकर के महापुरुष महाराज है। उद्बोधन है। वहां पे जाकर के शरद महाराज है। उनको ये सब प्रश्न करो। मां के पास में आकर के प्रश्न करते हैं। मां बेचारी कैसे उत्तर देगी? वो बेचारे थोड़े भयभीत हो जाते थे। किंतु मां इस तरह से ठीक एक दो वाक्य में ऐसा उत्तर दे देती थी कि वे लोग बड़े ही सेटिस्फाई होकर के बड़े ही संतोष पूर्वक वहां से जाते थे। तो ये मां का ये जो भक्त और भगवान ये एक रिलेशन है। हमको लगेगा कि अरे ये बाहर से क्या दिख रहा है। किंतु जब भक्त भगवान के सामने हाजिर होता है तब वो एक इस तरह का एक रिलेशन बन जाता है जो कि हम बाहर से नहीं देख पाते। श्यामा सुंदरी देवी देखती थी इसलिए शायद उन्होंने कहा होगा ए हमार भक्त भगवान संसार। ये है हमारा भक्त और भगवान का संस्कार संसार। अच्छा इसके बाद हम कल पढ़ते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणस्तु