देवी स्तुति
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आगमनी गान के ऊपर में अपने क्लास की जो सीरीज चल रही थी उसका आज आखिरी दिन और प्रत्येक दिन की तरह आज भी मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करता हूं कि देवी स्तुति से क्लास का प्रारंभ करें। स्तत्रम शिव दुख दुखाितम प्रव श किना माल पर सदैव विश्व माय परमा सदैव संयतमरा फला सा अनुम्य हम कर जाम हित कर पा कृतम कृतम वले फलमयामा स्वतंत्र यस्या सदा भवतु शरणम म्या यस्या सदा भवतु शरणम मम मना दुम याम जगत चिंतम सुरम प्रतिष्ठाम शरणम प्रप सेवा परम शम प्रप या माया विनयाति दुख मार्क ललिता मिला सही या सुविधा सा मम सफल फलवा स्वा शिवा मम सफल फलवा साम शिवा मति सरे फना महाराज वाह खूब भला थैंक यू लाली दी मां पार्वती के विभिन्न रूपों का जिस तरह से आगमनी गीतों के भीतर में चितार दिया गया है। जिस तरह से आगमनी के गीतों में वह भाव प्रस्फुटित हुआ है। उसका एक हमने आउटलाइन अभी तक देखा है। यह जो ट्रांसफॉर्मेशंस है किस तरह से चलते हैं। पहले तो एक सरला नववधु है। भगवान शिव के लिए तपस्या करती है और इसके बाद में भगवान शिव उनसे प्रसन्न होकर के बारात लेकर के उनके घर आते हैं पर्वतराज हिमालय के घर मां पार्वती का मां पार्वती के साथ में विवाह करने के लिए। उस समय शिव जी की जो बारात है वह देखकर के सर्वप्रथम यह जो मां पार्वती की माता जी है मैना उनके हृदय में शक और डर का संचार होता है कि यह किस तरह के जामाई के साथ में मैं अपनी पुत्री का विवाह करवाने को जा रही हूं। इसके बाद में हमने देखा कि किस तरह से मां पार्वती भगवान शिव के घर जाती है। तो यहां पर मां मेना सब समय उनके कल्याण के लिए चिंतित रहती है। इसके बाद में किंतु हमने एक ट्रांसफॉर्मेशन देखा कि एक तो थी कि यह सरला नववधू जो कि एक श्मशान वासी शिव के वहां पर रहती थी। किंतु दूसरी ही क्षण एक तरह का ट्रांसफॉर्मेशन हमको दिखाई दिया कि यह विश्वेश्वरी होकर के विश्वेश्वर के साथ में काशीपुर में निवास कर रही है। एक समय था कि भगवान शिव एक मुष्टि अन्न के लिए भिक्षा मांग रहे थे। आज वही उन्हीं की पत्नी मां पार्वती काशी में अन्न अन्नपूर्णा होकर के विराज विराजमान हो रही है। तो यह एक ट्रांसफॉर्मेशन देखा। इसके बाद में दूसरा एक ट्रांसफॉर्मेशन देखा कि किस तरह से मां पार्वती का देवी के रूप में परिणति होती है। देवी में परिणत होती है। तो इतने जो ट्रांसफॉर्मेशन हमने देखे अभी आज जो है एक आखिरी ट्रांसफॉर्मेशन एक लास्ट इवोल्यूशनरी स्टेप भारत में देवी के बारे में जिस तरह से उनके गुणगान गाए गए हैं। जिस तरह से शक्ति का चरित्र आलेखित किया गया है हमारे ऋषि मुनियों द्वारा हमारे पुराण में उसमें एक फाइनल ट्रांसफॉर्मेशन आज हम देखेंगे और यह जो ट्रांसफॉर्मेशन है वो बड़ा ही एक तरह से कहे तो देखिए कि सरला नववधू से अन्न मां अन्नपूर्णा होना मां अन्नपूर्णा में से जगत धात्री होना आध्या शक्ति होना यह तो फिर भी एक लॉजिकल सीक्वेंस समझ में आता है। किंतु कहां यह सौम्य स्वरूपा देवी कराल वदना भयंकरा मां काली में किस तरह से परिणत हुई यह जो फाइनल ट्रांसफॉर्मेशन है यह हमको अपनी सामान्य बुद्धि से समझ में नहीं आता और इसीलिए यह जो काली की उपासना है जो कि भगवान रामकृष्ण ने की थी स्वामी विवेकानंद ने की थी और जिसका एक अंश हमको मां शारदा के भीतर में देखने को मिलता है। उसको समझना और समझाना कठिन है। कहानियां है जो कहानियां हमको गाइड करती है रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में ही किंतु वो कहानियां हमको अपने हमको कभी भी एक इंटेलेक्चुअल सेटिस्फेक्शन नहीं देगी। यह जो फाइनल ट्रांसफॉर्मेशन है उसको तो हमको अनुभव ही करना होगा। बिना अनुभव के हम उसको समझ नहीं पाएंगे। अब अब जैसे कि कहानियां तो है कुछ कुछ फेमस कहानियां है। सर्वप्रथम कहानी तो हमको पता है कि हृदय जब मां का अपमान कर रहा था। उस समय ठाकुर ने हृदय को कहा था कि देखो तुम मुझे जो तुच्छ तातिल्य करके बात करते हो मेरे साथ में इस तरह से तुम कहीं मां के साथ में करने को मत जाना। वह यदि तुम्हारे से नाराज हो गई तो तीनों लोक में ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएंगे। तो यह पहली बार हमको मां के एक जो रुद्र स्वरूप है उसका एक अंदाज आता है। शोडशी स्वरूप जो है जो कि कल्याणकारी है, स्निग्ध है, जो कि सौम्य है, मातृ स्वरूपा है। वो समझ वो तो हमको सबको सहज रूप से समझ में आता है। किंतु ये रुद्र स्वरूपा मां शारदा उसको समझना कभी-कभी थोड़ा सा कठिन हो जाता है। तो वह कठिन स्वरूप को समझने के लिए सबसे पहला हिंट हमको ठाकुर ने ही इस तरह से दे दिया था और साथ-साथ में दूसरी कहानी जो कि इतनी ही फेमस है। जिन्होंने रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य का इवन ऊपर ऊपर से भी अभ्यास किया होगा। उनको यह फेमस कहानी पता ही होगी कि किस तरह से ठाकुर का एक भक्त हरीश वो वहां पर गया जयराम बाटी में। पता नहीं उसके सर के ऊपर में किस तरह का पागलपन सवार हुआ। वह मां के पीछे में दौड़ रहा है। मां मां ने खुद ने इस घटना का वर्णन किया है। कहती है कि मैं तो एक किसी चीज के आसपास में गोलगोल दौड़ते दौड़ते आखिर में थक गई। तो फिर मां ने क्या कहा? तब मेरा असली स्वरूप आकर के प्रकट हो गया। तो कौन हमार निज स्वरूप ऐसे पढ़ लो। मेरा असली स्वरूप आकर के प्रकट हो गया। गिरीश को धक्का देकर के जमीन पर पटका। उसकी छाती पर अपना पैर रखा। उसकी जीभ एक हाथ से खींची और दूसरे हाथ से उसके मुंह पे चांटे मारना शुरू कर दिया। तब कहीं जाकर के गिरीश ठंडा हुआ। यहां पे देखिए कि मां स्पष्ट रूप से कहती है कि मेरा निज स्वरूप आमार निज स्वरूप मेरा असली स्वरूप आकर के प्रकट हो गया। तो हमको प्रश्न होता है कि फिर मां का असली स्वरूप है क्या? यह जो सौम्या करुणा की मूर्ति सौम्या करुणामई मां है वह असली स्वरूप है ना कि यह रुद्रा यह कराल वदनी भयंकरा वो मां का असली स्वरूप है किंतु मुझे लगता है कि इस बात की मीमांसा इस बात का जो फाइनल उत्तर है वह तो मुझे लगता है कि जब तक हमको ब्रह्म ज्ञान नहीं होगा या मां शारदा स्वयं हम पर कृपा नहीं करेगी तब तक हम इसको नहीं समझ पाएंगे। देखिए जिस तरह से ठाकुर ने हृदय को वार्निंग दी थी यही वार्निंग मां ने स्वयं अपने मुंह से राधु को दी थी। एक बार जब मां के यह सब जितने संबंधी है पागली मामी राधु वगैरह जो सब पागलपन कर रहे थे उससे त्यक्त होकर के उससे नाराज होकर के थक कर के आखिर में मां ने क्या कहा था देखो तोरा आमा के बेशी ज्वालातन कोरिश ने देखो तुम लोग मुझे ज्यादा परेशान मत करना एर भतर जीनी आन यदि एक बार फस करें तो ब्रह्मा विष्णु महेश्वर और कारो साधना जे तो दे रखा को रे इसके भीतर में जो है वह एक बार फस करेंगे अर्थात कि सांप की तरह एक बार आपके पीछे में लगेंगे तो फिर ब्रह्मा विष्णु महेश्वर किसी का भी साहस नहीं है कि तुम्हारी रक्षा करें। देखिए वो बात ठाकुर ने हृदय को कही थी। यहां पर मां स्वयं अपने ही श्री मुंह से यह बात स्वीकार कर रही है कि उनके भीतर में यह भयंकरा स्वरूप वर्तमान है। तो यह बात जो है इसी के ऊपर में यह मां पार्वती के भी जीवन में इसी तरह से ट्रांसफॉर्मेशन हमने देखा है। कल ही हमने देखा था कि किस तरह से दुर्गा सप्तशती में वो वर्णन है कि मां पार्वती गंगा के किनारे गई है। ऋषि मुनि वहां पर स्तव कर रहे हैं। असुरों के त्रास से त्रासित होकर के। तो फिर मां पार्वती पूछती है कि आप किसकी स्तुति कर रहे हैं? तब मां पार्वती के ही देह से प्रथम एक देवी उत्पन्न हुई और उन्होंने कहा कि यह लोग मेरी ही आराधना कर रहे हैं तो वह कौशिकी या तो फिर दुर्गा और फिर का मां पार्वती का जो वदन था वह जिस तरह से सुवर्ण वर्णा थी उसमें से वो जैसे कि श्याम वर्णा हो गई और श्याम वर्णा मां पार्वती आखिर में मां काली में परिणत हुई तो यह दुर्गा सप्तशती में मां पार्वती का ट्रांसफॉर्मेशन दिखता है। यहां पे आगमनी गीत में मां मेना जो है उनको यह ट्रांसफॉर्मेशन दिखता है और वह कितने सुंदर रूप से कितनी सुंदर काव्यमय पंक्तियों में इसका वर्णन करती है। क्या कहती है? कुशपोन देखे छ गिरी उमा अमार श्मशान वासी मां मेना अपने पतिदेव को कह रहे हैं कि हे गिरिराज मैंने कुस्वप्न देखा है। मैंने एक दुस्वप्न देखा है। मैंने देखा है मेरे दुस्वप्न में कि मेरी उमा जो है लाडली बिटिया वो श्मशान वासी हो गई है। मैंने कहा उसको बेचारी को वो हमने कहां वो गिरि भगवान शिव के वहां पे बड़े ही जतन के पूर्वक विवाह करके भेजा था। आज वह श्मशान वासी हो गई है। अितो वर्णा उमा मुखे अट्टो अट्टो हासी असीत वर्णा उमा पूरा श्याम वर्ण उनका देह हो गया है। सुवर्ण वर्णा जो थी वो अभी श्याम वर्णा हो गई है। और मुखे अट्टो अट्टहासी मुख पे अटहास्य है। कहां वह बेचारी सौम्या मां पार्वती और यह कहां वह श्मशान वासी श्याम वर्णा अट्ट हास्यमई यह नई उनकी बेटियां तो यह बड़ा सुंदर गीत तो मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि यह गीत गाए लाली दी गा रही है ओ प्रभु गारा शशान ओ ओ माया शान मा तो करो ना मां मुख आो खा मा दे माया शशान बाकी विना होना ये लोना उम माया शो सुना खा को ओ माया शशान वासी द सिं अनु हो जोगी द सिं हो रयो उठो हे उठो प उठो कोई चलो कोई चलो आ सुधा कैलाशो सुया शशान तो करो ना मां आो शान प्रणाम वाह खूब पालो कितना सुंदर कवित्व मय भाव से देवी का यह ट्रांसफॉर्मेशन हमारे सामने रखा गया है। कुशोपोन देखे छ गिरी हे गिरिराज यह मां पार्वती की माताजी मैना इस गीत को गा रही है। क्या कहती है अपने पति से अर्थात कि मां पार्वती के पिताजी से क्या कहती है कि मैंने एक दुस्वप्न देखा है। उमा आमार श्मशान वासी मेरी लाडली बिटिया उमा श्मशान वासी हो गई है अितो बरणा उमा मुखे अट्टो अट्टो हासी असीत वर्णा श्यामा श्याम वर्ण क मेरी उमा उसके मुंह पे है अट्ट अट्ट हासी अर्थात कि अट्ट हास्य एलोकेश बिबोशना उमा अमार शबाशना एलोकेश अर्थात कि बिख बिखरे हुए बालों वाली बिबोशना अर्थात कि दिगंबरा मेरी उमा है शवासना अर्थात कि शब के ऊपर में विराज कर रही है घोरानना त्रि नयना भाले शोभे बाल शशि घोर आनना अर्थात कि कराल वदनी त्रि नयना दो नयन थे उसमें से तीन नयन हो गए हैं और उनके भाले अर्थात कि उनके छाती के ऊपर में बाल मस्तक के ऊपर में बाल शशि विराजमान है। जोगिनी दलो शंगीनी भ्रमि सिंह वाहिनी योगिनियों के दल के साथ में सिंह वाहिनी होकर के भ्रमण कर रही है। हेरिया रण रंगिनी मने बड़ो भयोबासी। इस रण चंडी को देखकर के रण रंगिणी को देखकर के मेरे मन में बड़ा ही भय उत्पन्न हो रहा है। उठो है उठो अचल पराणो होलो बिकल अचल अर्थात कि गिरिराज उठो है उठो गिरिराज मेरा प्राण आकुल व्याकुल हो रहा है तराय कैलाश चलो आनो उमा सुधाराशी चलो अभी के अभी कैलाश चलते हैं मेरी सुधा राशि अर्थात कि यह अमृत का यह जो पान है अमृत स्वरूपा है अमृत स्वरूपा रूपा उमा को वापस ले आते हैं। देखिए मेरी सौम्य लड़की थी बिटिया थी मेरी उनको वहां पर भगवान शिव के वहां पर भेजा और किस तरह से भयंकरा के रूप में वो ट्रांसफॉर्म हुई है। तो यह ट्रांसफॉर्मेशन है। देखिए जिस तरह से पौराणिक कहानियों में मां उमा का हमको दिख रहा है। वैसे ही हमको अपनी मां शारदा के भीतर में भी यह ट्रांसफॉर्मेशन दिखता है। कहानियां है बड़ी अल्प इस तरह के ट्रांसफॉर्मेशन की किंतु वो है। इससे हमको यह पता चलता है कि यह हजारों हजारों सालों की यह ऋषि मुनियों की तपस्या के माध्यम से यह देवी के स्वरूप की जो वर्णना की गई है, वह कोई हवा-हवा में नहीं की गई है। इसके पीछे में संपूर्ण रूप से तथ्य शामिल है। देखिए मां की है जीवन की एक घटना। मां जब उद्बोधन में रहती थी। हम सबको पता है कि फर्स्ट फ्लोर पर मां रहती है। ग्राउंड फ्लोर पे यह सब साधु सन्यासी शरद महाराज वगैरह रहते हैं मां की सेवा करने के लिए। और जब इस तरह से मां पहले से ही जब जब से वह वहां पर रहती थी नहबत में दक्षिणेश्वर में तब से ही मां अपने को इतना छुपा करके रखती थी। इतना शांति से रहती थी कि बाहर में किसी को पता तक ना चले कि मां यहां पर रह रही है। तो जिस तरह से दक्षिणेश्वर में किसी को नहीं पता चलता था तो वैसे ही उद्बोधन में भी सहज रूप से यह पता करना मुश्किल था कि मां ऊपर में फर्स्ट फ्लोर पर रह रही है। यदि हम ग्राउंड फ्लोर पर जाएंगे तो दुनिया भर का हल्लागुल्ला सुनाई देगा क्योंकि वहां पे यह पब्लिकेशन का भी काम हो रहा है। शरद महाराज वैसे तो है मां के द्वारी किंतु साथ में ही तो रामकृष्ण मिशन के जनरल सेक्रेटरी थे। तो दुनिया भर का जो भी कार्यकलाप है रामकृष्ण संघ का कहां रिलीफ एक्टिविटी हो रही है। कहां पे यह नया सेंटर खुल रहा है। कहां कोई दूसरे सेंटर से साधु लोग आए हैं महाराज जी के साथ में सलाह मशवरा करने के लिए। तो वह सब तो चल ही रहा है। तो उस वही हल्ले गुल्ले में किसी को पता ही नहीं चलेगा कि फर्स्ट फ्लोर पर मां रह रही है और मां खुद अपने को छुपा करके रखती थी। सिर्फ इतना ही नहीं मां की जो संगिनियां थी उनको भी इस तरह से शांति से रहना है। एक बार राधु वो जो अपने पैरों में यह झांझर पहन करके पायल पहन करके वो दरवाजे वो जो सीढ़ी में से ऊपर नीचे कर रही थी। उठ रही थी उतर रही थी। तो यह जो पायल की आवाज थी वो प्रसरित हो रही थी। तो मां ने इमीडिएटली राधु को डांट के कहा कि देखो राधु तुमको शर्म नहीं आती क्या? नीचे में सब साधु लोग रहते हैं। ये तुम्हारे पाय पायल की आवाज से तुम क्या इनके मन को चंचल कर देना चाहती हो? इसी तरह से मां ने डांट के कहा कि अभी के अभी यह पायल खोल दो। तो यह थी मां। अभी इस तरह से अपने को छुपा करके रखने के बावजूद कुछ कुछ प्रसंग ऐसे आन पड़ते थे कि मां का सिर्फ यह देवी मातृ स्वरूप या देवी स्वरूप ही नहीं रुद्र स्वरूप बाहर प्रकट हो जाता था। वैसा ही एक प्रसंग आन पड़ा उद्बोधन के सामने उस समय झोपड़पट्टी वगैरह थी। उस झोपड़पट्टी में वह जो मजदूर लोग वगैरह रहा करते थे। तो एक मजदूर था एक दिन शाम को अपने घर आया। देखा कि उसकी बीवी ने उसकी पत्नी ने उसके लिए खाना अभी तक नहीं बनाया। क्यों? क्योंकि उसकी पत्नी का जो एक शिशु संतान था तो हो सकता है कि शिशु संतान की संभाल रखते रखते उसको खाना बनाने में देरी हो गई हो। अब यह मजदूर लोगों का भी ऐसा है ना। यह मेहनत करने के बाद में शराब पिएंगे ना कि ऐसा कुछ करेंगे। नशा फसा करेंगे। नशा उस समय बड़ा व्यापक था। आज भी बहुत व्यापक है। तो एनीवे इस पुरुष ने आकर के जैसे ही देखा कि उसकी बीवी जो है वह अपने बच्चे की संभाल ले रही है किंतु खाना अभी तक नहीं बनाया तो उसने क्रोधित होकर के उसकी उसकी मारपिटाई प्रारंभ कर दी। इतना जोरों से उसको मारने लगा कि यह जो उसकी पत्नी थी उसकी गोद में जो शिशु बालक था वह भी गोद में से गिर गया। उसको भी चोट लगी और वह भी चिल्ला के रो रहा है। अभी सामने ही है उद्बोधन। संध्या का समय है। ठाकुर की पूजा आरती वगैरह समाप्त हो गई है। मां शांति से बैठ के जप कर रही है। वहां पर मां ने यह जो बेचारी औरत थी और यह शिशु बच्चा था उसके रोने की आवाज मां ने सुनी। और जैसे ही मां ने यह आवाज सुनी और जैसे ही पता चला कि वह जो उसका पति है उसको बेरहम होकर के उसकी पिटाई कर रहा है। वैसे ही मां का रुद्र स्वरूप प्रकट हो गया। वही मां जिसके गले का स्वर्ग ग्राउंड फ्लोर पर कोई नहीं सुन पाता था। वही मां ने वहां पर रेलिंग के पास जाकर के ऐसा त्रा म चिल्ला के कहा कि बोली ओ मीन शेटा के एक बार मेरे फेलवी ना की आहा मलोजा कहती हूं अरे साले तुमने तुम क्या अपनी पत्नी को मार ही डालोगे क्या अरे देखो वो मर ही गई बेचारी ये साला शब्द मेरा है मां का नहीं है मीन से अर्थात पुरुष तो एनीवे तो किंतु देखिए मां ने इस तरह से चिल्ला करके यह बात कही कि जैसे जैसे कि वो पुरुष अभी तो क्रोध में पागल होकर के मत्त होकर के अपनी पत्नी की पिटाई कर रहा था। एकाएक जैसे कि सांप के सर के ऊपर में आप धूल फेंकते हैं तो सांप कैसा शांत हो जाता है। वैसे ही वह डर के मारे घबरा के एकदम शांत हो गया। तब कहीं जाकर के वह उसकी पत्नी ने देखा कि मां की सहानुभूति मुझे मिली है। तो फिर वह रोना शुरू कर दी और फिर उसको रोती हुई देखकर के उसके पति में थोड़ी सी अकल आई और फिर दोनों में अभी वह समझावट का वो थोड़ा सा प्रारंभ हुआ। वह अपनी गलती स्वीकार करता है। वह अपनी गलती स्वीकार करती है। तो व्हाटएवर जब मां ने यह देखा तब शांत होकर के फिर से अपने कमरे में बैठकर के जप कर रही है। तो देखिए कि जब अपने संतानों के कल्याण की बात आ जाती है तो मां उस समय जैसे ठाकुर को भी स्वीकार नहीं करती है। ठाकुर की सत्ता को मां कहती है मेरे बच्चों को जितनी रोटी चाहिए उतनी मैं खिलाऊंगी। उनके आध्यात्मिक कल्याण की चिंता मैं करूंगी। तो जिस तरह से मां अपने बच्चों के लिए अन्नपूर्णा हो सकती है। मां जैसे अपने संतानों के लिए वरदात्री वर अभयदात्री देवी हो सकती है। तो वैसे ही मां अपने संतानों की रक्षा करने के लिए रुद्र स्वरूप भी धारण कर सकती है। अभी देखिए अह इसी तरह से संतानों की रक्षा करने के लिए रुद्र स्वरूप धारण करना और एक घटना है जयराम बाटी की है। उस समय तो हमको पता है कि यह स्वदेशी आंदोलन क्रांतिकारी विचार सब फैल रहे थे बंगाल में तो और यह जो खुफिया पुलिस है सीआईडी वाले उनकी बड़ी तीव्र नजर रहती थी कि यह कौन क्रांतिकारी है क्या गड़बड़ कर रहा है वगैरह-वगैरह तो कहीं से पता चला कि जयराम भाटी के ही पास के गांव से एक क्रांतिकारी है उसकी बीवी और उसकी बहन वह दोनों वहां पे है अभी घर में तो अभी यह क्रांतिकारी जो युवक था उसको तो पुलिस खोज के निकाल नहीं पा रही है। उसका शायद एरेस्ट वारेंट होगा। तो वह तो पकड़ में नहीं आ रहा है। कहां वो छुपते-छुपते घूमता होगा। किंतु अब उसकी बहन और उसकी पत्नी वह जब उस गांव में है यह पता चला तो पुलिस वालों ने क्या सोचा कि चलो उन्हीं दोनों को बंदी बना देते हैं। तो फिर जब वह दोनों बंदी बनेगी तो यह क्रांतिकारी लड़का जो है अपने से आकर के पुलिस स्टेशन में आत्मसमर्पण कर देगा। यह इसको कहते हैं होस्टेज बनाना। ये आजकल की लैंग्वेज में ये ऑफिशियली जो गवर्नमेंट होती है किसी को भी होस्टेज के रूप में लेती नहीं है। आज के भारतवर्ष में या तो जहां पे भी डेमोक्रेसी है जो जितना भी बड़ा गुंडा हो पुलिस वाले जाकर के उनके परिवार जनों को सताते नहीं है। गलती की है वह लड़के ने की है तो उसकी सजा उसकी बहन या उसकी बीवी को क्यों दे रहे हैं? तो यह तो कायदा कानून बड़ा ही स्पष्ट है। तो जिसने आपकी दृष्टि से जो गलत साबित होता है उसी को सजा दो। उसके परिवारजनों को सजा मत दो। यह तो डेमोक्रेसी का नियम है। तो यहां पे यह पुलिस वालों ने अपनी अकल चलाई। इन दोनों को होस्टेज के रूप में ले लिया। अभी यह समाचार मां के पास में जयराम बाटी में आया। और हुआ ऐसा था कि यह क्रांतिकारी युवक था। उसकी पत्नी जो थी सिंधु बाला उसका नाम वह संतान संभवा थी प्रेग्नेंट थी। अभी जनरली होता है कि जो अच्छे घर की स्त्रियों को बाहर जाना है तो वह पालकी में बिठा के या बैलगाड़ी में बिठा के जाते हैं। वो जो पर्दा प्रथा थी उस समय की उसके अनुसार। किंतु पुलिस वालों ने क्या सोचा कि इस युवक को कैसे भी करके पकड़ना है तो इन दोनों स्त्रियों का अपमान करते हैं तो वह फिर से आकर के पुलिस चौकी में आएगा इन दोनों को छुड़ाने के लिए। तो इन दोनों स्त्रियों को वे लोग खुलेआम भरे बाजार में वैसे ही पैदल चला के ले गए। अभी आज ऐसा सोचना कि वह स्त्रियां पैदल जा रही है। बाजार में ऐसे कोई बड़ी बात नहीं लगती। किंतु उस समय का जो युग था उसके अनुसार यह बहुत बड़ा अपमान था और यह बात मां के पास में आई और जैसे ही मां ने यह बात सुनी मां क्रोधित होकर के बोल उठी कि क्या वहां पर कोई मर्द का बच्चा नहीं था कि पुलिस वाले को दो झापट मार कर के इन दोनों स्त्रियों की रक्षा करके उनको बचा के ले आए। ऐसा करके इस तरह से क्रोध में मां ने यह बात की कि मां के जो त्यागी संतान थे उन्होंने जो यह स्मृति कथा लिखी है वो कहते हैं क्षण भर के लिए तो हम लोग भी डर गए मां की यह रुद्रमूर्ति का दर्शन करके वो पूरा दिन मां बड़ी ही एजिटेटेड अवस्था में रही। बार-बार वह खबर ले रही है। फिर वह दोनों स्त्रियों का क्या हुआ वगैरह-वगैरह। आखिर में रात को समाचार आया कि पुलिस वालों ने इन दोनों स्त्रियों को रिहा कर दिया है। छोड़ दिया है। तब कहीं जाकर के मां ने कहा कि देखो अभी मेरा हृदय शांत हुआ है। यदि यह दोनों स्त्रियों को छोड़ा नहीं जाता तो पता नहीं मैं रात को सो भी पाती कि नहीं। तो यहां और फिर मां एक बात कहती है माने भविष्यवाणी की तरह श्राप की तरह श्राप नहीं किंतु श्राप की तरह क्या कहती है कि मां कहती है कि जब तक एक रानी विक्टोरिया थी उसके पुण्य थे वह तब तक यह ब्रिटिश राज चला किंतु अब यह ब्रिटिश राज नहीं चलेगा। अर्थात कि यह जिस तरह का पाप किया है, इस पाप ने विक्टोरिया के पुण्य की वजह से जो भारत में उनको राज्य करने का मौका मिला, इस पाप ने उस पुण्य को काट दिया है। अभी यह भारतवर्ष में ब्रिटिश शासन रहेगा नहीं। और आखिर में हुआ भी वही विदिन 50 इयर्स लेस देन 50 इयर्स भारत में से यह ब्रिटिश राज चला गया। तो देखिए कि मां जब अपने संतानों की रक्षा करने की बात आती है तो रुद्र स्वरूप धारण करने से अचकाती नहीं है। और साथ में ही और एक सुंदर कहानी है कि किस तरह से माने रुद्र स्वरूप तो नहीं रुद्र स्वरूप ही किंतु एग्जैक्टली यह जो गीत में कहा है ना मुखे अट्टो अट्ट हासी अर्थात के मुख मुंह पे यह अट्ट अट्ट हास्य तो एग्जैक्टली यह एक अट्ट हास्य वाली कहानी मां के जीवन में भी है। उस समय कामार पुकुर में शिबुदा अर्थात कि वह ठाकुर के भतीजे उनकी पत्नी उनकी एक बच्ची भी थी और पांची उसका नाम शिबू दादा की जो लड़की थी उसका नाम था पांची। तो अभी यह पांची का विवाह उनकी मां ने एक दिन ठीक करवा दिया। किंतु जिस तरह से ठीक किया था उस समय कामार कुकुर में ना ही रामलाल दादा थे ना ही शिबू दादा थे। अभी यह रामलाल दादा और शिबूदा दोनों की एब्सेंस में शिबूदा की पत्नी ने कामार पुकुर के जो जमींदार थे लाहा बाबू उनके साथ में मिलकर के अपनी बच्ची का विवाह ठीक करवाया। किंतु जब यह दोनों वापस आए रामलाल दादा और शिबूदा तो उनको यह पता चला कि उनकी जो कन्या पांची है उसका विवाह जिस परिवार में हुआ है वह परिवार थोड़ा सा निम्न जाति का है। अभी अगेन आजकल हमको यह सब चीजों में बड़ाेंस नहीं दिखेगा। उस समय यह सब चीजें जीवन मरण का प्रश्न थी कि जब अपने से निम्न जाति के परिवार में कन्या का विवाह करवाएंगे तो कैसा होगा यह वो वगैरह-वगैरह तो उस समय यह रामलाल दादा और शिबू दा थोड़े से परेशानी में आ गए। एक तो है कि शिवू दादा की जो पत्नी थी उसका नेचर शायद थोड़ा सा पागली मामी जैसा था जो कि हमको बाद में पता चलेगा और उस समय फिर यह ला बाबू के साथ में मिलकर के विवाह का आयोजन किया है लाहाबाबू तो बड़े ही उनका नाम है कमार पुकुर में अभी यह विवाह तोड़ दे तो उन लोगों के साथ में फिर यह नाराजगी हो जाएगी संबंध टूट जाएगा तो ये दोनों हो गए बड़े परेशान तो अभी ये मां के तो सब भैरव संतान थे ना वो तो कोई कम नहीं थे तो फिर वहां पे आराम बाग बाग बोलकर के जो जगह है पास में ही वहां पे केदार बाबू प्रबोध बाबू बोलकर के मां के एक थे संतान उन्होंने और फिर और एक मां के भक्त ने दोनों ने मिलकर के क्या किया कि कामार पुकुर जाकर के पाची का अपहरण करके उसको मां के पास में जयराम बाटी ले आए तो अभी ले तो आए तो उनको थोड़ा सा डर था किंतु कि इस तरह से यह जो कार्य किया है तो मां सम्मत तो होगी कि नहीं मां नाराज तो नहीं हो जाएगी तो किंतु मां उस समय मां ने मां ने जैसे ही देखा कि पांच यहां पे जय राम भाटी में है तो मां ने साथ-साथ में ही ये शिवू दादा और रामलाल दादा को बुलाया जय राम भाटी पूछा कि आपका क्या मत है इसके विवाह के बारे में तो दोनों ने कहा कि हमारी दृष्टि से तो उसका जो विवाह है वह थोड़े से निम्नगर में हो रहा है हमको पसंद नहीं है तो मां ने कहा ठीक है फिर मां ने ही यह प्रबोध बाबू को आश्वासन देकर कहा कि तुमने जो किया है ठीक किया है तो ठीक है चलो अभी प्रबोध बाबू को भी थोड़ा सा अच्छा लगा कि मां के परिवार जनों की ठाकुर के परिवार जनों में वो थोड़ा बहुत सहायभूत हुए। अभी वो प्रबोध बाबू मां के साथ में बात कर रहे हैं। वो कहते हैं कि देखिए यह पांची को तो हम ले आए हैं अपहरण करके ना कि उसको किडनैप करके। किंतु अभी डर यह है कि लाहा बाबू यदि हमारे से नाराज हो जाएंगे तो वहां पर ठाकुर की जन्मभूमि में ठाकुर के जन्म स्थान पर जो ठाकुर का मंदिर बनने वाला था उसकी जो बात चल रही है उसमें यह लोग बाधा उत्पन्न करेंगे मंदिर बनने नहीं देंगे तो प्रबोध बाबू यह बात कहते तो हैं किंतु साथ-साथ में ही कहते हैं अरे क्या फर्क पड़ता है वो एक जगह पर मंदिर नहीं हुआ तो ठाकुर के मंदिर तो पूरे विश्व में हो रहे हैं कोलकाता में इतने मंदिर है चेन्नई में है मद्रास एक जगह पे ना हो तो भी क्या फर्क पड़ता है? तो मां साथ-साथ में ही बोलूं उठी अरे प्रबोध ये क्या बात करते हो? यह तो ठाकुर के जन्म स्थान है। ठाकुर के जन्म स्थान तो महापीठ स्थान है। महापुण्य स्थान है। तीर्थ भूमि है। वहां तो ठाकुर का मंदिर होना ही चाहिए। तो ठीक है। अभी प्रबोध बाबू ने सोचा कि लाहा बाबू यदि विपरीत उनकी मति होती है तो मां तो है ही है। अल्टीमेटली मां का देवी स्वरूप तो है ही वो सब ठीक करने के लिए। किंतु इसके बाद में किंतु अ प्रबोध बाबू के मन में दूसरा एक संदेह प्रकट हुआ। वो कहते हैं कि देखिए ये तो शिवदा की जो पत्नी है जिसने ये अपनी ये पांची का विवाह इस तरह से छुपके छुप के ठीक करवाया है पता नहीं उसका स्वभाव किस तरह का है वो यदि नाराज हो जाएगी तो यह जो घर है शिवू दादा रामलाल दादा वो तो वही एक ठाकुर का ही जो वो घर जहां पे आप लोग यदि कमर पुकुर दर्शन करने का मौका मिला होगा तो आपने देखा ही होगा वही पासपास में ही सब घर है वो और वह भी तो सब इसके बने हैं ना वो सब ये जो स्ट्रो के बने हुए सब घर है मिट्टी और स्ट्रो के तो वो यदि नाराज हो जाएगी ये शिबुदा की पत्नी तो घर को आग लगा देगी तो क्या करेंगे तो फिर जैसे ही मां ने कहा प्रबोध बाबू ने यह कहा तो मां का जो स्वर था मां का जो स्वरूप था एकाएक जैसे कि इस तरह का परिवर्तन आया जिस तरह का परिवर्तन इन भक्तों ने पहले कभी नहीं देखा था मां जैसे कि प्रति शब्द एकू टानिया बोली ते लागी लेन प्रत्येक शब्द को थोड़ा सा खींच खींच करके बोलना शुरू किया ता होले बेश होय ता होले बेश होय ऐसा होने से अर्थात कि उसकी पत्नी यदि घर को आग लगा देगी तो अच्छा होगा तो अच्छा होगा ठाकुर जेमटी भालो बाजतेन तेमटी होय ठाकुर को जैसा अच्छा लगता था वैसा ही हो जाएगा तनी शशान भो बा सब श्मशान होए जावे ठाकुर को श्मशान अच्छा लगता था सब श्मशान हो जाएगा बोलिया आई ऐसा बोलकर के ही मां हासी ते आरंभो कर लेन मां ने हंसना प्रारंभ किया क्रमे उहा अट्टो हास्य परिणत होइलो धीरे-धीरे करके मां का हास्य अट्ट हास्य में परिणत हुआ अपरेरा प्रथमेश से हास्य जोग दिया छिलेन किंतु माय हास्यो तीव्र तरो और गंभीर तरोया तहां दे हृदय त्राशेर संचार कर लो जब मां का हास्य धीरे-धीरे अट हास्य में परिणत हो रहा था उस समय वहां पर उपस्थित बाकी भक्तों ने उसमें योगदान तो दिया मां के साथ में ही वे लोग हंसने तो लगे किंतु जब यह हास्य अट्ट हास्य में परिणत हुआ और अटहास्य तीव्रतर और गंभीर धीरतर होने लगा। तब भक्तों के हृदय में त्रास का संचार हुआ। भक्तों के हृदय में भय प्रकट हुआ। इस जैसे ही यह भय प्रकट हुआ उन्होंने हंसना बंद कर दिया। यहां पर मां अटहास्य कर रही है। तीव्र स्वर में गंभीर स्वर में जैसे कि सृष्टि का प्रलय होने वाला हो। इस तरह का अटहास्य किंतु थोड़ी देर के बाद में मां फिर से प्रकृतिस्थ हुई। फिर से सहज भाव में आई और फिर कोमल कंठ से सहज सम्य कंठ से और कोई बात प्रारंभ कर दी। तो देखिए कि मां के भीतर में यह ट्रांसफॉर्मेशन एक भयंकरा अट्ट हास्यमई काली का ट्रांसफॉर्मेशन एक झलक कभी-कभी हमको दिख जाती थी। अर्थात कि देखिए कि फिर से वही बात वहां पर जैसे कि भक्तों की रक्षा करने के लिए मां ने रुद्र स्वरूप धारण किया था। यहां पे ठाकुर के जन्मस्थान की ठाकुर का यह जो पैुक निवास है उसकी रक्षा करने के लिए मां ने एक भयंकरा स्वरूप धारण किया है। तो यह तो एक तरह से हमको दिखता है कि एक भयंकरा काली की मूर्ति जब प्रकट होती है तो उसका आशय यह रहता है कि अपने संतानों की रक्षा तो यह तो एक बात है। किंतु साथ-साथ में ही यह भयंकरा काली मूर्ति जो है, उसका एक दूसरा भी तात्पर्य है। एक दूसरा भी इंटरप्रिटेशन है। यह इंटरप्रिटेशन हमको कथामृत में एक छोटा सा प्रसंग है। उसमें से यह दूसरा इंटरप्रिटेशन जानने को मिलता है। क्या प्रसंग है वह? उस दिन की बात है नरेंद्र दक्षिणेश्वर आया हुआ था और नरेंद्र जब आता है तो वैसे ही तो ठाकुर के आनंद की सीमा नहीं रहती उसमें भी नरेंद्र एक के बाद एक सुमधुर गीत के बाद गीत गा जा रहा है गाए जा रहा है और ठाकुर भी फरमाइश कर रहे हैं इसके बाद में वो गीत इसके बाद में वो गीत ऐसा करके ठाकुर आखिर में इतने आनंदित हो गए और नरेंद्र को आलिंगनबद्ध करके कहते हैं कि आज तुमने ने मुझे जो आनंद दिया है वह वर्णनातीत है। ऐसा कहने के बाद ठाकुर फिर बाहर में आकर के वरांडा में वरांडे में वो पैदल चल रहे हैं। वो थोड़ा सा पाईचारी कर रहे हैं। टहल रहे हैं। टहलते टहलते ही पता नहीं एकाएक उनको किस तरह का दर्शन हुआ। बड़ा ही भयावह दर्शन हुआ। हो सकता है कि शायद यह माया की मूर्ति धर करके यह माया जो है एक टेंपटेशन के रूप में ठाकुर के सामने प्रकट हुई। जैसे कि ठाकुर को किसी काम कांचन में वो काम कांचन रूपी पाश में बद्ध करना चाहती हो। इस तरह की माया की एक ये मोहिनी मूर्ति ठाकुर के सामने प्रकट हुई। अभी यह किस तरह की मोहिनी मूर्ति है? इसके बारे में ठाकुर तो हमको नहीं बताते मास्टर महाशय जिन्होंने इस घटना का वर्णन किया है। सिर्फ वो एक स्पेककुलेशन करते हैं कि ठाकुर ने इसके बाद में जो कहा इसका क्या यह तात्पर्य है ऐसा करके तो यह मूर्ति जब माया की मोहिनी मूर्ति ठाकुर के सामने प्रकट हुई तो एकाएक ठाकुर का भावांतर हुआ और ठाकुर उन्मत्त होकर के क्रोधित होकर के रुद्र स्वरूप धारण करके चिल्ला उठे तो अमार की कोरबी तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी ऐसा करके चिल्ला उठे तो मास्टर महाशय वहां पर थे उन्होंने यह अनुमान किया है कि ठाकुर वैसे तो अभी मां मां काली के साथ में सहज रूप से वार्तालाप कर रहे थे। एकाएक इस तरह से चिल्ला क्यों उठे? एकाएक इस तरह से उन्मत्त होकर के क्यों बोल उठे? क्या यह मां ने एक मोहिनी मूर्ति को ठाकुर के पास में भेजा था। उनको मन लुभाने के लिए, उनकी परीक्षा करने के लिए तो जो भी है यहां पर इससे ज्यादा और कोई आगे में इसका ना ही कोई डिस्कशन है ना ही इसका कोई वर्णन है। किंतु देखिए यह ठाकुर का जो स्वभाव परिवर्तन हुआ एक एकाएक एक क्षण भर के लिए जो रुद्र स्वरूप धारण किया वो किस पर्पस के लिए किया था कि जब माया उनको लुभाने के लिए आती है तो उसके सामने खड़ग लेकर के खड़े रहना है और माया को अपने को अपने को माया के वश नहीं होने देना है। देखिए यह दूसरी तरह का इंटरप्रिटेशन है। प्रथम इंटरप्रिटेशन क्या है कि मां अपने संतानों की रक्षा करने के लिए रुद्र स्वरूप धारण करती है। यहां पे क्या है कि जब वो महामाया एक मोहिनी स्वरूप धारण करके साधक के सामने आती है तो साधक को रुद्र स्वरूप धारण करना है और इस माया से अपना बचाव करना है। देखिए ठाकुर के जीवन में दो तरह से ठाकुर टेंप्टेशन का सामना करते हैं। इसी तरह की एक टेंप्टेशन की कहानी है कि जब पंचवटी के नीचे में ठाकुर को यह विभिन्न दर्शन होते थे। दो सुंदरी स्त्रियां उनके सामने प्रकट हुई थी और फिर यह गोरा खलासी उनके सामने प्रकट हुआ था। एक हाथ में थाल है। इस थाल में यह संदेश है। सोना महूर है, सुंदर वस्त्र है। तो यह सब जब ठाकुर ने देखा तो ठाकुर मां मां मां बोलकर के चिल्लाने लगे। ऐसा बोलकर के कि मां आकर के मेरी रक्षा करो। तो टेंपटेशन से बचने का यह एक मार्ग है शरणागति का। किंतु दूसरा ही मार्ग है वीरत्व का। इस तरह से वीरत्व धारण किया जाए। इस तरह से रुद्र स्वरूप धारण किया जाए कि जब यह हमको लुभाने के लिए हमारे मन में यह टेंप्टेशन आते हैं तो उसका संहार करने के लिए हम हमेशा तैयार हो। यह गिरीश घोष का जो कहना है ना कि माया दो लोगों को कभी अपनी जाल में फंसा नहीं पाई है। एक तो है स्वामी विवेकानंद दूसरा है नाग महाशय। नाग महाशय इतने छोटे हो जाते हैं कि माया रूपी जो जाल है उसके भीतर में जो यह होल होते हैं छेद होते हैं उसमें से निकल जाते हैं। अर्थात कि नाग महाशय की शरणागति की साधना थी। शरणागति करके उन्होंने अपने अहम को इस हद तक मिटा दिया था कि माया उनको पकड़ ही नहीं सकती है। दूसरे है स्वामी विवेकानंद। स्वामी जी ने अपने को इतना बड़ा कर दिया है कि महामाया की जो जाल है स्वामी जी को पकड़ने के लिए छोटी हो जाती है। अर्थात कि स्वामी जी का जो अहम है वो विराट अहम में मर्ज हो गया है। उनका जो छोटा अहम स्मॉल आई इट हैज़ मर्ज्ड इनू दी लार्जर आई विराट अहम। तो इन दोनों को महामाया नहीं पकड़ पाई। तो यह जो टेंप्टेशन देखिए साधक के सामने टेंप्टेशन प्रत्येक क्षण आता रहता है। मुझे रामकृष्ण संघ में 20 साल हुए साधु के रूप में। मैं यह एकदम पक्का बता सकता हूं अपने अनुभव से कि ऐसा एक भी दिन नहीं गया मेरे जीवन में कि कोई न कोई टेंप्टेशन मेरे नजर के सामने ना आया हो। किंतु देखिए हम सभी के साथ में एक प्रॉब्लम क्या होता है? वैसे तो हम लोग यह शरणागति के पाठ पढ़ते तो हैं। वैसे हम यह ज्ञान मार्ग है, कर्म मार्ग है, यह ध्यान मार्ग है। इन सब के बारे में पढ़ते तो है। किंतु जब यह एक्चुअल टेंप्टेशन सामने आ जाए तो उस क्षण यह किस तरह से फाइट करनी उसके साथ में यह यह तो हमको क्या है कि पूरी लाइफ टाइम प्रैक्टिस करके ही हमको यह अपनीपनी टूल्स जो है टूलकिट जो है उसको डेवलप करना है। तो एक टूलकिट है कि शरणागति। नजर के सामने जब इस तरह से टेंप्टेशन आता है तो इमीडिएटली मां को शरणागत होकर के मां को पुकारना है। किंतु यह टूलकिट का दूसरा भी एक हिस्सा है। रुद्र स्वरूप धारण करना है। भयंकर स्वरूप धारण करना है। क्रोध करना है। क्रोध करके उसको कहना है कि तुम अपनी माया जाल में मुझे फंसाने को आओगी तो यह ज्ञान रूपी खड़ग से मैं तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा। इस तरह से एक रुद्र स्वरूप धारण करेंगे तो वह एक दूसरा टूल हमको मिलता है। अपनी इस टूलकिट में रखने के लिए मां दुर्गा के 10 हाथों में ये विभिन्न तरह के आयुध हमको देखने को मिलते हैं। विभिन्न तरह के अस्त्र-शस्त्र देखने को मिलते हैं। तो शरणागति हमारे पास में एक शस्त्र है। इस तरह से मोह को काटने के लिए तो वैसा ही यह रुद्र स्वरूप भी है। अपने पास में यह एक शस्त्र इस मोह को काटने के लिए। तो देखिए स्वामी जी ने जो पोएम की रचना की है काली द मदर इस इस पोएम को अभी हम इस इंटरप्रिटेशन के साथ में पढ़ते हैं। तो देखिए कि हमको एक दूसरा ही दृष्टिकोण देखने को मिलता है। क्या है स्वामी जी की पोएम? द स्टार्स आर ब्लोटेड आउट। द क्लाउड्स आर कवरिंग क्लाउड्स। यह तारे हैं। वह सब ढक गए हैं। यह बादल है। बादलों को घिरे जा रहे हैं। अर्थात कि प्रचंड मेघ जब प्रकट होता है तो कैसे तारे छुप जाते हैं। बादलों के बादलों की गर्जना तर्जना हमको सुनाई देती है। इट इज डार्कनेस वाइब्रेंट सोनंट भयान वह भयावह डार्कनेस अंधेरा पूरे विश्व पे छा गया है। इन द रोिंग वर्लिंग विंड आर द सोल्स ऑफ अ मिलियन ल्यूनेटिक्स। इस तरह से जो भयावह आंधी तूफान उठा है उसमें लाखों लाखों पागलों की आत्माएं मंडरा रही है। जस्ट लूज फ्रॉम द प्रजन हाउस रचिंग ट्रीज बाय द रोड स्वीपिंग ऑल फ्रॉम द पाथ। जैसे कि अभी ही जेल में से निकली हुई लाखों पागलों की आत्माएं मंडरा रही है। यह सामने जो कुछ भी आता है तहसनहस कर देता है। पेड़ों को जड़ मूल से निकाल के रख देता है। सामने में जो आया सबका सफाया कर दिया। द सी हैज़ जॉइ फ्रे एंड स्व्स ऑफ माउंटेन वेव्स। जैसे कि समुंदर ने भी इस महा तूफान में अपना साथ दिया है और पहाड़ों की तरह यह जो तरंगे हैं चारों ओर फेंक रहा है टू रीच द पिच स्काई और यह तरंगे इतनी ऊपर उठ रही है जैसे कि आकाश को छूने वाली हो। यह प्रलय का एक वर्णन द फ्लेश ऑफ लूरिड लाइट रिवील्स ऑन एववरी साइड अ थाउजेंड थाउजेंड शेड्स ऑफ डेथ बिग ड्राइम्ड एंड ब्लैक और यह जो बिजली की चमकार है वो प्रत्येक चमकार के साथ में चारों ओर से हमको क्या दिखाई देता है यह मृत्यु जो है मृत्यु के विभिन्न हजारों हजारों स्वरूप ऑफ डेथ बी क्राइम्ड एंड ब्लैक स्कैटरिंग प्लेग्स एंड सोरोस डांसिंग मेड वि जॉय कम मददर कम और इस भयावह प्रलय के भीतर में प्लेग अर्थात कि महामारी और सोरोज़ अर्थात कि दुख और कष्ट को चारों ओर बिखेरती हुई पागल की तरह नृत्य करती हुई मां पधारो पधारो कमधर कम फॉर टेरर इज थाई नेम डेथ इज इन द ब्रेथ तुम्हारा तुम्हारा नाम है टेरर अर्थात कि खौफ और तुम्हारे प्रत्येक श्वासों से मृत्यु की में जो बौछार है वो हो रही है एंड एव्री शेकिंग स्टेप डिस्ट्रॉय वर्ल्ड फॉर एवर और प्रत्येक जो तुम्हारे चरणों की यह जो धम करके जो चरण रखती है उससे यह जो शोक वेव्स प्रकट होते हैं वो जैसे कि पूरे विश्व को खत्म किए जा रहे हैं। धाऊ टाइम द ओल्ड डिस्ट्रयर हे महाकाल सर्व भक्षण करने वाले कम उमदर कम मां आओ मां आओ हु डेयर्स मिरी लव एंड हग द फॉर्म ऑफ डेथ डांस इन डिस्ट्रक्शन डांस टू हिम द मदर कम्स जो इस कष्ट को जो इस महामारी को जो इस मृत्यु का वरण करेगा जो इसको प्रेम करेगा जो कि मृत्यु को ही आलिंगनबद्ध करेगा जो इस तांडव नृत्य में ताल के साथ ताल मिलाकर के नृत्य करेगा। उसके पास में मां का आगमन होता है। देखिए यह जो स्वामी जी उन्होंने जिस समय यह कविता की रचना की होगी तब वह विराट भाव में मग्न होंगे। उन समय शायद हो सकता है कि उन्होंने यह महामाया जो है मोहिनी रूप धारण करके उनके सामने आई है। ऐसा कुछ देखा होगा और उसका सामना करने के लिए उन्होंने भी यह तांडव नृत्य रूपी अपने को उत्ष्ट किया होगा। जागृत किया होगा और उन्होंने भी चारों ओर अब यह जो प्लेग फैलाना है, चारों ओर महामारी फैलाना है। इसका अर्थ क्या है? किसको टारगेट कर रहे हैं? किसके ऊपर में यह प्रलय आ रहा है? तो यह प्रलय आ रहा है मोहिनी रूप रूपी यह महामाया के ऊपर में किसका संहार करना है तो यह टेंपटेशन है यह काम क्रोध मद लोभ मोह रूपी जो षडरिपु है यह जो कामिनी कांचन रूपी यह जो टेंपटेशन यह जो प्रलोभन है उसके ऊपर में जैसे कि यह प्लेग की बौछार कर रहे हैं। तो यहां पर देखिए कि स्वामी जी का यह जो विराट भाव ठाकुर का यह सडन रुद्र स्वरूप इसका इस तरह से भी हम इंटरप्रिटेशन कर सकते हैं। रुद्र स्वरूप किस लिए? एक तो अपने संतानों की रक्षा करने के लिए। दूसरा कि यह मोहिनी रूप यह जो काम कांचन रूपी प्रलोभन है उसका खात्मा करने के लिए उसका संहार करने के लिए। तो इसके साथ में ही अपना देखिए इसके बारे में और भी बहुत कुछ बोल सकते हैं। किंतु बात यह है कि समय बड़ा लिमिटेड है और अभी कल से ही दुर्गा पूजा के लिए जो सब प्रिपरेशन है आप सबको उसमें लगना है। तो यहां पर हम अपने क्लास समाप्त करते हैं। क्लास की समाप्ति से पहले मैं लाली दी को रिक्वेस्ट करूंगा कि देवी की स्तुति करके अपने यह जो सीरीज ऑफ क्लास थी उसकी समाप्ति करें। लाली देवगन कृत अपराजिता स्तुति नमो महादेव शिवा सतत नम नम भद्रावता प्रणता नम व नमो नमस् सुतम नम कल्याण प्रणताय सिद्ध गुरु नमो नम नैता लक्ष्मी नमो नम दुर्गाव दुर्गा पाराव सारा सर्व कृष्णा नमस नमो नम नमो प्रतिष्ठा नमो नम या देवी सर्वभेशु विष्णु शक्तिता नमस नमस नमो नम या देवी सर्व चेतते नमस्त नमस नमस नमो नम या देवी सर्वेशु बुद्धि रूप संस्थिता नमस नमस नमस नमो नम देवी सर्वेशु निद्रा रूप नमस नमस्तसै नमो नम या देवी सर्वभेशु रूपे संस्थिता नमस नमस नमो नम देवी सर्व छाया रूप नमस्तस नमस नमस नमो नम या देवी सर्व शक्ति रूप नमस्तस नमस नमस नमो नम या देवी सर्वभेशु कृष्ण रूप नमस नमस नमस नमो नम सर्व रूप नमस नमस नमस नमो नम या देवी सर्वभेशु शांति रूप नमस नमस नमस नमो नम या देवी सर्व लक्ष्मी रूप नमस्तिता नमस नमस नमस नमो नम या देवी सर्व नमस नमस नमस नमो नम या देवी सर्वभेशु दया रूप नमस नमस नमस नमो नम या सर्व रूप नमस नमस नमस नमो नम सर्व नमस नमस नमस नमो नम इंद्रिय भूते नमो नम जगत नमस नमस्तस नमो नमः प्रणाम महाराज वाह खूब भो ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: क्या हम कह सकते हैं कि हमारे जीवन में आने वाले दुःख और पीड़ा भी माँ का आशीर्वाद है?
ना दिस इज वेरी गुड गुड क्वेश्चन एक्चुअली मुझे यह थर्ड कैटेगरी के रूप में ऐड करना चाहिए था कि रुद्र स्वरूप प्रकृति है। उसका एक थर्ड यूटिलिटी क्या है? फर्स्ट यूटिलिटी हमने देखा कि दुश्मनों का संहार करने के लिए मां रुद्र स्वरूप धारण करती है। दूसरा एक यूटिलिटी देखा कि जब अह प्रलोभन से बचने के लिए हम खुद रुद्र स्वरूप धारण करते हैं। किंतु यह जो प्रकृति का रुद्र स्वरूप है, महामारी है, फिर यह आतंक है, युद्ध है, रेवोल्यूशन है, यह इकोनॉमिक डिस्ट्रेस है। तो उसका क्या यूटिलिटी है? तो यह वैराग्य उद्दीपक है क्योंकि देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी दोनों के जीवन में छोटी उम्र में पिताजी का मृत देहांत हुआ। अब एक छोटे बच्चे के सामने इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है कि नजर के सामने बाल्यावस्था में ही पिताजी का देहांत हो तो और घर में फिर जिस तरह से कष्ट मिलने लगा। किंतु इन दोनों ने यह जो कष्ट सामने आया यह जो एक भयानक सोरो उनके सामने आया उनको उन्होंने वैराग्य में परिणत किया। उन्होंने अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म कर दिया। कहां वह वैसे तो खैर इन दोनों का जीवन कभी भी भोगवाद की ओर नहीं जाने वाला था। किंतु दिस एडेड एडेड स्टिमुलस कि जो एक्स जो प्रोसेस होने ही वाली थी त्याग वैराग्य की ओर उसको एक्सलरेट कर दिया। सिमिलरली हमारे जीवन में भी देखिए एक तो एक नेगेटिव एटीट्यूड है। वो वो शियाल की कहानी है ना वो पंचतंत्र की कि वो जंप लगाता है वो ग्रेप्स खाने के लिए। तो फिर ग्रेप्स हाथ में नहीं आती है तो कह के चला जाता है दीज़ आर द सावर ग्रेप्स अर्थात कि जो हाथ में नहीं आता है तो उसके प्रति वैराग्य आ जाता है। सो दैट इज अ नेगेटिव टाइप ऑफ वैराग्य। किंतु फिर यही वैराग्य एक पॉजिटिव भी हो सकता है कि जब हाथ में नहीं आता है सांसारिक सुख तब असली वैराग्य का भीतर में से प्राकट्य होता है। नकली वैराग्य असली वैराग्य डिफरेंस हमको पता ही है। वह फेमस कहानी कि वो एक लड़का घर छोड़ के काशी चला गया। कहता है कि मैं साधु हो जाऊंगा। फिर वहां पे जाके जॉब मिल गया तो फिर लेटर लिखता है आप चिंता मत कीजिए मैं मजे से हूं फिर उसी पैसा जो मिलता है वो सोने की अंगूठी भी बना देता है। सो वो हो गया नकली वैराग्य किंतु कष्ट मिलता है तो असली वैराग्य भी तो उसी में से उत्पन्न होता है। सो दैट इज पॉजिटिव यूटिलिटी। किंतु माने प्रॉपर ट्रांसफॉर्मेशन चाहिए। झूठ-मुठ का वैराग्य फिर किसी काम का नहीं है। किंतु जो रियल वैराग्य प्रकट हुआ तो इससे अच्छा और कुछ नहीं है। क्योंकि देखिए अल्टीमेटली तो मुक्ति की ओर जाना है। मुक्ति आज नहीं ना कल तो हमको प्राप्त करनी है। वरना इस जन्म में जो कष्ट मिले उससे अकल नहीं आई तो उसके लिए नेक्स्ट जन्म में और ज्यादा कष्ट मिलेंगे। उससे यदि अकल नहीं खुली तो नेक्स्ट जन्म में और ज्यादा कष्ट मिलेंगे। सो बेटर टू बी अ टू मेक अ स्मार्ट चॉइस। व्हाई नॉट टू टेक द हिंट एंड स्टार्ट गोइंग टुवर्ड्स दिस साधना और कष्ट बढ़ते जाएंगे। एक्सलरेशन प्रोसेस एक्सलरेट होती जाएगी। ये गीता में
प्रश्न: मेना अपनी सौम्य बेटी को ही चाहती है भयंकरा या ऐश्वर्यमयि देवी को नहीं
मतलब महाभारत में दो वर्णन है ना इस तरह के। एक तो मां यशोदा अपने बालक के मुंह में जब पूरे विश्व ब्रह्मांड का दर्शन करती है तो इसको करने के बाद में भी उनको ईश्वर के रूप में तो नहीं ही स्वीकार करती है। क्यों? क्योंकि मातृभाव इतना प्रबल है और यहां पे भी जब अर्जुन जो है जब वह विश्वूप दर्शन करते हैं तो साथ-साथ में ही कहते हैं कि आप जो सौम्य भाव फिर से धारण कर लीजिए। मेरे सखा का जो भाव था उसको फिर से धारण कर लीजिए। यानी सख्य भाव मातृभाव उसका प्राबल्य इतना है कि हम ईश्वर का ऐश्वर्य दर्शन नहीं करना चाहते। ऑब्वियसली और ठाकुर ने तो स्वयं कहा है ना कि आप ऐश्वर्यमय ईश्वर को क्यों देखना चाहते हैं? आप उसको मातृ रूप में उसकी आराधना कीजिए ना। मां खुद अपनी है। मां अपने हाथों से हमको हमको आहार करवाती है। हमारा जतन करती है। यह अपना अपनीपनी भाव मतलब यह परस्पर यह कितना स्नेह भरा भाव है। तो ऐश्वर्य भाव से दूरी आ जाएगी।
प्रश्न: वेदांत और शक्ति साधना में कितना अंतर है? शक्ति साधना जीवन के भयावह पहलू को भी कैसे स्वीकार करती है!
वैसे वेदांत में ईश्वर की कल्पना है और इसी तरह की है कि व्यष्टि अज्ञान से जीव जगत की उत्पत्ति होती है। समष्टि अज्ञान से ईश्वर की उत्पत्ति होती है। तो ऑलरेडी ईश्वर के भीतर में अज्ञान का अंश तो है ही है। माने उसमें सत्वगुण का प्राधान्य है। किंतु अज्ञान तो है ही है। यानी कि जिसको हम विद्या कहते हैं और भ्रम कहते हैं। दोनों उसके भीतर में है ही है। किंतु फिर इस बात को ना यहीं पे अटका दिया गया है। इस कांसेप्ट का फिर फर्दर डेवलपमेंट नहीं हुआ है। उसके बाद का जो डेवलपमेंट है ना वह इसी से है कि किस तरह से इस माया के राज्य से हमको मुक्ति मिले। और वो मुक्ति का मार्ग भी उन्होंने सीधा-सीधी ज्ञान का ही आश्रय लिया है कि किस तरह से माया हमको फंसाती है। भ्रम में फंसाती है। किस तरह से उससे मुक्त हुआ जाए। सो दैट इज द वेदांतिक पाथ। अभी ये शक्ति साधना या तो वैष्णव साधना में क्या किया है? भले चलो ईश्वर अज्ञानमय है मतलब अज्ञान से भले ही उनकी उत्पत्ति हुई हो उनकी अनुमति या उनके आशीर्वाद बिना हम यह मुक्ति का मार्ग हमारा क्लियर नहीं होगा। एक कल ही हमने देखा ना कि मां राजा महाराज को पूछवाती है कि क्यों सभी आ पूजाओं में सबसे पहले मां की आराधना होती है। तो राजा महाराज इमीडिएटली उत्तर देते हैं कि मां के हाथ में शक्ति के हाथ में मुक्ति की चाबी है।
प्रश्न: तोतापुरी को भी शक्ति स्वीकार करनी पड़ी!
देखिए वो उनका था रुद्र भाव। वेदांती थे तो किंतु रुद्रभाव के साथ में उनको फिर यह शरणागति का भाव सीखना था और जो शरणागति का भाव होता है उनको यह रुद्र भाव सीखना पड़ेगा। यह दोनों भाव है पैरेलल चलेंगे तभी आप माया से ठीक-ठीक मुक्ति पाएंगे।
प्रश्न: यदि हमें भक्ति मार्ग पर जगदम्बा के दर्शन हो जाएं, तो क्या हमें ज्ञान मार्ग पर चलकर निर्विकल्प समाधि प्राप्त करने की आवश्यकता है?
यहां पे दो बात है। एक तो है कि एक तो हमारी खुद की साधना की परिपक्वता की बात है। क्योंकि मेरी साधना परिपक्व नहीं है। अभी मैं प्राइमरी स्टेजेस में ही हूं। तो जो अनुभूति होगी वह तो प्राइमरी ही होगी। इसके बाद में मुझे अपनी कैपेसिटी, मेरा त्याग, वैराग्य, साधना की शक्ति बढ़ाते-बढ़ाते अल्टीमेट एम को प्राप्त करना है। किंतु ठाकुर जैसे कहते हैं शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान एक। मैंने अपनी अल्टीमेट यदि शुद्ध भक्ति के अल्टीमेट लेवल तक पहुंच गया तो वह शुद्ध ज्ञान के साथ में सिमिलर है। और इस बात का वर्णन शरद महाराज ही लीला प्रसंग में बड़ा ही पोएटिक रूप से करते हैं। एग्जैक्टली जैसे आपने कहा वही शब्द मैं ले रहा हूं यहां पे कि जब पहली बार ठाकुर ने ठाकुर की साधना के तो दो फेस थे। विवाह के पहले वाला, विवाह के बाद वाला। विवाह के पहले अपने मन की आकांक्षा और मन की ये जो ये था कि डिजायर उसको लेकर के उन्होंने मां को प्रार्थना की थी कि मां तुम मुझे दर्शन दो। राम प्रसाद को दर्शन दिया। मुझे क्यों दर्शन नहीं दोगी? बोल कर के रोते-रोते ठाकुर ने मां का दर्शन मांगा था। आखिर में वो परिस्थिति आ गई कि मां के हाथ में से खड़ग छीन करके अपना गला काटने को गए थे। तो उसके बाद में जो दर्शन होता है ना तो उस दर्शन का वर्णन शरद महाराज इस तरह से करते हैं कि एकाएक जैसे ही खड़ग लिया अपने गले के पास में लाया वैसे ही चारों ओर से यह ज्योति समुद्र है उसकी ये तरंगे ठाकुर के ऊपर में आकर टूट पड़ी और ठाकुर अपने को इस तरंगों में गवा दिए और अपने को इस तरंगों के साथ में एकाकार कर दिया तो फिर शरद महाराज लिखते हैं कि ठाकुर को मां का दर्शन क्या इस ज्योति समुद्र के रूप में हुआ था तो अभी वह तो निराकार वाला भाव आ गया। कहां वो अपने हृदय के आवेग से मां को पुकार रहे हैं। तो मां की साकार मूर्ति का दर्शन होना चाहिए। किंतु सर्वप्रथम दर्शन ही उनको निराकार वाला हुआ था। [हंसी] यानी कि शुद्ध भक्ति शुद्ध ज्ञान एक [हंसी]