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ओम स्थापक य ज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन हम पाठ कर रहे थे लेखक है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज और चैप्टर का नाम है आलो छाया देखा कि हमने कि किस तरह से अभी मां और ठाकुर का जीवन यदि हम लोग कुछ फेज में बांट दे तो उसमें प्रथम फेज क्या होगा कि मतलब उसमें जो ऐसी कुछ इवेंट्स है जो इवेंट्स बहुत ही सिग्निफिकेंट है ठाकुर और मां के जीवन में तो उसमें से एक बड़ी ही सिकट इवेंट थी यह शोशी पूजा तो शोशी पूजा के पहले का जो समय काल था वह एक फेज हो गया और शोड़ी पूजा के बाद का जो फेज है वह दूसरा जो दूसरा समय काल हो गया दूसरा फेज हो गया और इसी तरह से जिस तरह से शोड़ी पूजा एक माइलस्टोन है एक मेजर इवेंट है ठाकुर और मां के जीवन में तो वैसे ही इस तरह की एक दूसरी मेजर इवेंट इवेंट है ठाकुर के केशव सेन के साथ में मुलाकात के बाद में जब कलकाता में ठाकुर के बारे में प्रचार चालू हो गया और ठाकुर के अंतरंग शिष्य ठाकुर के पास आना शुरू कर दिए यह 188 के बाद की सब घटनाएं रामचंद्र दत्त फिर यह राजा महाराज स्वामी जी उसके बाद में मास्टर महाशय इन लोगों के बाद में सभी ठाकुर के जितने भी अंतरंग डिव थे उन्होंने आना शुरू किया तो एक दूसरा एक मेजर इवेंट हो गया और थर्ड मेजर इवेंट क्या है थर्ड वेरी सिग्निफिकेंट घटना कौन सी है तो ठाकुर को कैंसर होना और कैंसर की वजह से उनको कलकाता में ट्रीटमेंट के लिए ले जाना तो अभी देखिए कि फर्स्ट पीरियड हो गया ठाकुर और मां के विवाह से प्रारंभ करके शशी पूजा तक का सेकंड मेजर फेज हो गया शोड़ी पूजा से लेकर के ठाकुर के अंतरंग शिष्यों का ठाकुर के पास में आगमन और थर्ड फेज हो गया कि ठाकुर के अंतरंग शिष्यों के साथ में जो आनंद अहला ईश्वरीय वार्तालाप जो भजन कीर्तन का जो एक अद्भुत प्रवाह बहा था दक्षिणेश्वर में वह थर्ड फेज हो गया और फोर्थ फेज कौन सा होगा कि जबकि ठाकुर कलकाता में थे पहले तो ये श्याम पुकुर में बाद में काशीपुर में तो ये फोर फेज है मां और ठाकुर के जीवन में जिसके अभी देखिए जीवन में तो इस तरह से कोई फेज वगैरह तो पीरियड वगैरह तो होते नहीं है जीवन तो एक प्रवाह में जो चलता जाता है वह चलता जाता है परिवर्तन तो प्रत्येक दिन होता है प्रत्येक क्षण होता है ठाकुर के जीवन में तो इतनी मेजर घटनाएं हैं प्रतिदिन एक-एक इस तरह के उनको दर्शन होते थे प्रत्येक दर्शन के ऊपर में हम लोग अपना जीवन बिता सकते हैं उका उसका तात्पर्य समझने के लिए उसका क्या इंपैक्ट है मैंने इस तरह के ठाकुर के सब दर्शन है ठाकुर ने कहा था ना मां को कि मैं मैं मुझे एक ऐसा दर्शन हुआ कि मैं गोरे लोगों के देश में चला गया हूं वहां पर सब लोग एकदम सफेद सफेद है और वे लोग भी यहां की अर्थात कि मेरी पूजा करने वाले हैं मुझे स्वीकार करने वाले हैं तो मां सोचती है कि ऐसा तो कैसा देश है कि गोरे लोग वहां पर रहते हैं हालांकि भारत के ऊपर में ब्रिटेन का राज था किंतु लगता है कि मां का जियोलॉजी का उतना नॉलेज शायद नहीं होगा तो जो भी है जब यह सारा ओली बूल और यह निवेदिता और जोसेफाइन मैक्लाउड मां के पास में आए मां के दर्शन करने के लिए तब मां ने समझा कि हां यही यह तो घोरे लोग जहां से आए हैं वही घोरे लोगों का देश होगा तो यह ठाकुर के एक एक दर्शन युग युगांतर परिवर्तनकारी दर्शन थे तो इसमें फेज या मेजर इवेंट या पीरियड यह सब खोजना एक वृत चेष्टा मात्र है किंतु हम लोग शुद्र बुद्धि से ठाकुर को समझने का प्रयास करते हैं तो इसी शुद्र बुद्धि से मुझे जो लगा है यह मेरा एक पर्सनल एनालिसिस है कि यह तीन मेजर इवेंट कहा जाएगा और यह चार मेजर फेजेस कहे जाएंगे तो अभी यहां पर जो हम डिस्कशन कर रहे हैं वह सेकंड फेज का डिस्कशन है ठाकुर और मानी ठाकुर ने मां की शोड़ी के रूप में पूजा कर दी है और अभी तक ठाकुर के डायरेक्ट डिसाइल का अंतरंग शिष्यों का आना प्रारंभ नहीं हुआ है हालांकि गंभीरानंद जी महाराज जिस तरह से ठाकुर और मां के जीवन का वर्णन करते हैं उसमें थीम लेकर के वर्णन करते हैं तो कभी कोई थीम चलती है तो उस थीम के साथ में वह थीम समाप्त करने के लिए उस पार्टिकुलर थ्रेड उस पार्टिकुलर सूत्र को समाप्त करने के लिए जद काशीपुर ना कि फिर यह श्यामपुकुर वहां पर भी यदि जाना पड़े तो महाराज चले जाते हैं तो महाराज का जो ऑर्गेनाइजेशनल सेटअप है इस किताब में वो टॉपिक को लेकर के हैं रदर देन पीरियड को लेकर के तो यह हम थोड़ा सा ख्याल में रखें टॉपिक वाइज पढ़ने में आनंद इसलिए आता है कि कोई भी टॉपिक प्रारंभ किया तो उस टॉपिक का वहां पर अंत आ गया तो उसके बाद में हमको फिर सेकंड पीरियड में उसका क्या अंत हुआ इसके बाद में क्या हुआ उस पीरियड में वह सब पन्ने उलटा की जरूरत नहीं पड़ती तो यहां पर डिस्कशन मेनली चल रहा है वैसे अ सेकंड पीरियड का सड़सी पूजा के बाद का समय किंतु डायरेक्ट डिसाइल के आने के पहले का समय तो अभी महाराज जी लिखते हैं कि मा मां जब वहां से आ रही थी दक्षिणेश्वर में जयराम बाटी से तो ठाकुर के जो उस समय के जो रसदार थे शंभू मल्लिक उसको समझ में आ गया कि जिस तरह से मां सुख स्वच्छंद से गांव में रहती है उन्मुक्त पंखी की तरह जब चाहे घर से बाहर निकल करके जलाशय जा सकती है कुए तक जा सकती है खेत तक जा सकती है तो एक मुक्त जीवन में मां पली बड़ी हुई है तो यहां पर दक्षिणेश्वर में रहना एक पिंजरे में बद्ध रहना मां को मानसिक शारीरिक दोनों तरह से कष्ट करर होगा बोलकर के मां के लिए एक घर बनाने की व्यवस्था उन्होंने की किंतु बात हुई ऐसी कि इस घर में मां का ज्यादा रहना हुआ नहीं और क्यों नहीं हु हुआ उसका पाठ अभी हम करते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं अच्छा उसमें यह भी एक देखा कि किस तरह से ठाकुर वहां पर बीच-बीच में आते थे मां के साथ में वार्तालाप करने के लिए और एक दिन आए और ऐसी बारिश हुई कि ठाकुर को रुक जाना पड़ा इसके बाद में क्या होता है महाराज जी लिखते हैं ई चाला दे श्री मां दीर्घ काल बास कोरीते पारे नाई इस घर में मां ज्यादा समय रुक नहीं पाई थी रह नहीं पाई थी श्री श्री ठाकुरे आमाशय होई तहर शे बार जन्नो श्री मां के पुनर्बलन हबते आशीते होए ठाकुर को आमाशय अर्थात की डा जेंटर हो गया था बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता था इसके लिए ठाकुर की सेवा करने के लिए मां को काली मंदिर में वापस आना पड़ा श्री श्री ठाकुर पखे तखन घनो घनो झावतला सचे जावा असंभव होया पड़ाए नबत दिके लंबा बरार धारे एकटा काठे बाख गोर तो कोरिया नीचे शोरा पाति देवा होया छलो बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता था और अभी देखिए कि आप दक्षिणेश्वर काली मंदिर में गए होंगे तो देखा होगा कि ठाकुर के घर से झाऊ तला वैसे तो थोड़ा सा दूर था तो अभी एकाएक आपको यदि जाना पड़े तो क्या करेंगे दौड़ते दौड़ते बार-बार वहां पर जाना तो मुश्किल है इसलिए क्या किया गया नबत की साइड में जो लंबा वरांडा है वहां पर उसके एक कॉर्नर पे लकड़ी का एक शौचालय बनाया गया काष्ठ का एक शौचालय बनाया गया और फिर उसके नीचे में रेती या मिट्टी वगैरह बिछा करके उसको शौचालय के रूप में ठाकुर उसका व्यवहार करने लगे तीनी शेखाने शौच जाई तेन ठाकुर उस लकड़ी के शौचालय में शौच के लिए जाते थे प्रथम प्रथम श्रीमा सकाले चाला होते आशिया उहा परिष्कार करतन बि काले अपरे परिष्कार करतो पहले पहले तो ऐसा हुआ कि मां अपने घर से दक्षिणेश्वर गांव में मां का घर था वहां से मां प्रतिदिन सुबह-सुबह को वहां पर आती थी काली मंदिर में और यह शौचालय क्लीन कर देती थी और शाम को और कोई क्लीन कर देता था उसको परिष्कार कर देता था अच्छा यह शौचालय क्लीन करने की बाद से वराह नगर की एक बड़ी ही सुंदर घटना है शायद पहले भी मैंने डिस्कस किया होगा अभी उस समय तो इंडोर प्लंबिंग जैसा था नहीं कि फ्लश कर दिया तो सब वह निकल गया वहां से वह आपकी जो ड्रेनेज सिस्टम है उसके भीतर चला गया शौच जाने के बाद में मेन्यू ली अपने हाथों से उस जगह को साफ करके आपको साफ करना पड़ता था तो अभी जिस तरह से अभी वो अपने भारत में हो गया था कि इस तरह से जो शौचालय क्लीन करेंगे उनको मेथर या इस तरह से कोई निम्न दर्जे का व्यक्ति मान कर के वे लोग वही काम करने के लिए उनका जन्म हुआ है वगैरा वगैरह प्रथा चल रही थी किंतु वराह नगर में तो सभी लोग साधु थे और ठाकुर की वह जो प्रसिद्ध घटना कि अपना जाति अभिमान ब्राह्मण हूं वे अभिमान त्याग करने के लिए रसिक मेथर जो था दक्षिणेश्वर में उसका शौचालय ठाकुर ने अपने बालों से परिष्कार किया था क्लीन किया था तो यह घटना सबको पता है तो यह वराह नगर में सब गुरु भाई थोड़ी ना कोई मैतर को रखने वाले हैं शौचालय क्लीन करने को रखने वाले हैं उन्होंने ठीक किया कि शौचालय हम ही लोग साफ करेंगे फर्स्ट फ्लोर पे था तो अभी उसमें भी एक कंपटीशन लग गया कंपटीशन ऐसा कि कौन सबसे पहले शौचालय साफ करता है यह तो एक मेरिट है ना इस सेवा कर रहे हैं आप अपने गुरु भाइयों की तो सेवा करने में भी कंपटीशन आज एक गुरु भाई ने अर्ली मॉर्निंग शौचालय साफ कर दिया सबसे पहले और फिर वहां कुएं में से एक बाल्टी पानी लाकर के रख दी तो दूसरे गुरु भाई ने क्या किया आधी रात को उठ कर के शौचालय साफ करके एक बाल्टी पानी लाकर के रख दी तो इस तरह से शौचालय क्लीन करने की कंपटीशन वरा नगर मठ में होती थी वरा नगर मठ के बहुत ही सुंदर-सुंदर इंसिडेंट है अ जो कि अपनी वराह नगर वराह नगर मठ के बारे में सबसे ज्यादा प्रामाणिक इंफॉर्मेशन अपने संघ में दो-तीन किताबों में से मिलती है एक तो मास्टर महाशय स्वयं वहां पर बीच-बीच में जाया करते थे और कथामृत के आखिरी चैप्टर में उन दिनों का कुछ वर्णन है उसके बाद में गुरु भाइयों की जो बायोग्राफीज है खास कर के युग नायक वगैरह उसमें भी उन दिनों का वर्णन है और बस इस तरह से कुछ-कुछ वर्णन है किंतु यह सब वर्णन जो है ना संपूर्ण नहीं है बहुत ज्यादा डिटेल में वर्णन स्वामी जी के छोटे भाई जो थे महेंद्रनाथ दत्त उन्होंने अपनी किताब में किया है स्वामी विवेकानंद और जिबोनेरो घटना वली स्वामी विवेकानंद के जीवन की घटना वली तीन भाग में बंगाली किताब है बहुत ही डिटेल में वराह नगर मठ के दिनों का वर्णन है किंतु अनफॉर्चूनेटली अपने ऑर्डर में इस किताब को इतना स्टैंडर्ड नहीं समझा जाता इसके लिए इतना इसका प्रचार ज्यादा नहीं है या तो फिर इसको ट्रांसलेट नहीं किया गया है मैंने उसमें से कुछ-कुछ इंसीडेंट्स ट्रांसलेट करके ज्योत में देने का प्रारंभ किया था क्योंकि इस किताब के बारे में सबसे पहला ऑब्जेक्शन यही है कि जो स्वामी जी के जो भाई है उनकी जो जो स्मृति है यह तो उन्होंने बहुत बाद में लिखी थी जब वो वृद्ध हो गए थे उस समय और उनकी स्मृति में कुछ-कुछ गलतियां होने की संभावना है किंतु मैंने पढ़ कर के देखा है और मैंने देखा है कि जो गलतियां है वह सालों की गलतियां है यह साल में यह घटना हुई यह साल में यह घटना हुई तो साल थोड़ी कहीं पर गलत दे दी है तो अभी आप कौन से साल में कौन सी घटना हुई यह यदि गलत दिया है तो किंतु डजन मैटर घटना का अपने आप में कितना इंपोर्ट यह इस साल में हुई कि उस साल में हुई उससे क्या फर्क पड़ता है तो मेरे मत अनुसार तो उस किताब को हिंदी में इंग्लिश में ट्रांसलेशन करना चाहिए किंतु खैर अभी तो यह इस तरह से ठाकुर के लिए काष्ट का शौचालय बनाया गया मां सुबह आती थी साफ करने के लिए शाम को और कोई क्लीन कर देता था श्री रामकृष्ण तखन दीर्घ काल जाब तुई छिले ज श्री मायर भाषा बाचे गए गए मलद्वार हेजे गछ ठाकुर इतने लंबे समय तक डायेंट से भुगे हैं इतनी पीड़ा हुई है उनको कि मां ने कहा था कि बार-बार शौच जाने से ठाकुर का मलद्वार इन्फ्लेमेशन हो गया था जाने से ही वह पीड़ा होती थी इतना ठाकुर को कष्ट सहन करना पड़ा था एमन सोमोई दई बकरो में काश शर एक प्राचीन मेय तथा आशिया पड़े एवं ठाकुरर सेवा बहर स्व हस्ते ग्रहण करेन इसी समय काशी की एक वृद्ध महिला वहां पर आई और उसने ठाकुर की सेवा का भार ग्रहण किया अभी देखिए ठाकुर के बारे में हमको पता है कि ठाकुर को जब जिस चीज की आवश्यकता होती थी उसका जुगाड़ मां काली स्वयं कर देती थी तंत्र साधना का समय आया तो भैरवी ब्राह्मणी को भेज दिया भाव साधना का समय आया जटाधारी का आगमन हुआ वेदांत साधना की बारी हुई तो तोतापुरी आ गए दक्षिणेश्वर में तो इसी तरह से सब जब सेवा की जरूरत पड़ी तो उस पार्टिकुलर टाइप की सेवा की तो उस समय काशी से यह एक वृद्ध महिला वहां पर आकर उपस्थित हुई ताहर अति तेर और भविष्य तेर इति वृत्तो संपूर्ण अज्ञात यह जो महिला काशी से आई ठाकुर की सेवा का भार ग्रहण किया उसके बारे में हमको कुछ भी पता नहीं है वह कहां से आई थी सेवा करके कहां पर चली गई हम लोग इस बात के बारे में संपूर्ण रूप से अभिज्ञ है अनभिज्ञ है हमको इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है तीनी जेनो दैव निर्देश अंधकारे विद्युत लो केर मतो जुगा ब तारे प्रयोजन काशीधाम होई ते अकस्मात तथा आर् भूतो होन और शबाब शने चिरो कालेर मतो विलुप्त होईया जान जैसे कि आकाश के अंधेरे में रात्रि के घनघोर अंधेरे में एकाएक विद्युत चमकती है और क्षण भर के लिए चारों दिशाएं प्रकाशित कर देती है तो वैसे ही ठाकुर के यह बड़े कष्ट के दिनों में विद्युत के चमकने की तरह इस महिला का आगमन हुआ और विद्युत जैसे क्षण भर ही चमकती है तो वैसे ही सेवा करके यह महिला अंतर्भरती विलुप्त होईया जान हमेशा के लिए वह वहां से अदृश्य हो गई हमेशा के लिए वह अदृश्य हो गई श्री मां परे जोखन काशी ते गिया छले तो खन बहु चेष्टा करिया तहर कोनो संधान पान नाई बाद में जब मां गई थी और इस महिला के बारे में उन्होंने बहुत जांच पड़ताल की थी खोज करने का प्रयास किया था किंतु इसके बारे में कभी कुछ जानकारी नहीं मिली शेबा भार लोया आगंतुक महिला देखि लेन ताहर द्वारा सर्व प्रकार शुश्रूषा होआ संभव न है सेवा का भार ग्रहण करने के बाद में ही इस महिला ने समझा कि सब तरह की सेवा तो वह शायद नहीं कर पाएगी एवं श्री मायर ई समय दूरे था का अनुचित और मां इस समय गांव में रह रही है ठाकुर से इतना दूर ये उचित नहीं है सुतं तीनी तहा के बोली लेन मां तार एमन ुक आर तुम खाने थाक बे तो इस महिला ने वृद्ध महिला ने मां को कहा मां ठाकुर को इतना इस तरह का असु है और आप इस तरह से इतना दूर रहती है मां उत्तर दिलन की करबो भागने बहुटी एका थाक बे भागने हृदय शेखाने ठाकुरर काछ रोए छ माने कहा कि मैं क्या करूं यह जो हृदय है उसकी बीवी उसकी पत्नी वहां पर है और जद मां चली आएगी तो उसकी बीवी अकेली पड़ जाएगी और ठाकुर की सेवा करने के लिए तो हृदय है ही है दक्षिणेश्वर में मेटी बोली लेन ता होक रा लोक टोक रेखे देबे एकन तोमार की ताके छेड़े दूरे था चले इस महिला ने मां को कहा मां भले ही हृदय की पत्नी वहां पर अकेली रहे यह लोग किसी की वो उसकी सेवा करने के लिए उसके साथ में रहने के लिए किसी की नियुक्ति कर देंगे अभी ठाकुर की जो अवस्था है इस अवस्था में तुम्हारा ठाकुर से दूर रहना क्या अच्छा लगेगा क्या अच्छा रहेगा श्री मां शी कथ थार्स उपलब्धि कोरिया नबत चोलिया अलेन एवं शरबतो भावे ठाकुरे शे बाय रोतो होई लेन माने इस कथा का सत्यात्मवानी मंदिर में वापस चली आई ई पजन तो श्रीमा संकोच बसो तो ठाकुरे सम्मुख घोटा खुली तेना अभी इतने दिनों तक मां संकोच वश ठाकुर के सामने अपना घूटा घूंघट नहीं खोलती थी काशीर ए महिला एक रात्रे श्री मां के ठाकुरर घोरे लोया गया तहर घटा खुलिया दले यह काशी की इस महिला ने ही मां को मां को लेकर के एक रात ठाकुर के कमरे में गई और अपने हाथों से मां का घुंघट खोल दिया भगवत भाबे बिभोर ठाकुर तखन तहा दिग के बहु ईश्वर कथा सुनाई ते लागी लेन और साथ साथ में ही ठाकुर भगवत भाव में विभोर हो गए और कितनी ही ईश्वरीय कथा कितनी ही ईश्वरीय बातें ठाकुर उनको सुनाने लगे श उपदेश आकर्षण श्री मां और महिला से रात्रे ही तन्मय होया रोलेन जद के सूर्योदय होले तरा बुझीते पारी लेना उस दिन रात को ठाकुर की बातों से मंत्र मु होकर के मां और वह वृद्ध महिला इतनी तन्मयता से ठाकुर की बातें ईश्वरीय बातें सुनने लगी कि यहां पर सूर्योदय हो गया उनको पता नहीं था अभी देखिए कि ठाकुर के सामने मां ने घुंघट खोला यह प्रथम घटना नहीं थी मां ने अपने शब्दों से शशी पूजा का जो वर्णन किया था बाद में उस समय मोस्ट प्रोबेबली मां नबत में थी और लक्ष्मी दीदी भी वहां पर थी नबत में उद्बोधन में थी और लक्ष्मी दीदी भी वहां पर थी तो मां भी बीच-बीच में पुराने दिनों की बातें किया करती थी और उद्बोधन में मां कब थी तो पता है सबको कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में स्वामी जी अमेरिका गए थे अमेरिका से भी जब स्वामी जी लौट के आए थे और स्वामी जी की महासमाधि हुई थी 1902 में उसके बाद में 1905 ना कि 1909 एग्जैक्ट डेट मुझे कंफर्म करना पड़ेगा उस समय शरत महाराज ने उद्बोधन मायरवार्ड्स से उस छोड़ी पूजा का वर्णन कर रही है मां ने कहा कि ठाकुर ने अपने हाथों से मुझे नए वस्त्र पहनाए तो जैसे ही मां ने यह वर्णन समाप्त किया तो लक्ष्मी दीदी हंसते-हंसते कहने लगी कि मां तुम तो इतनी लज्जा शीला हो ठाकुर के सामने अपना घुमता भी नहीं खोलती हो तो ठाकुर ने वस्त्र तुमको किस तरह से पहना है तो मां ने बड़े ही सरल शब्दों में उत्तर दिया था कि उस समय में अपने आपे में नहीं थी अर्थात कि मेरे ऊपर में एक इस तरह का भगवत भाव का आवेश हुआ था कि मुझे यह ंश ही नहीं थी ठाकुर के सामने यह लज्जा ही नहीं थी कि ठाकुर मुझे नए वस्त्र पहना रहे हैं तो ये उस समय यह हुआ था और यह फिर से कि इस महिला ने ठाकुर मां का घुमता खोल कर के ठाकुर के सामने उनको ले आई और फिर ठाकुर जैसे ही मां का चेहरा देखा इस तरह से भगवत भाव में वह विभोर हो गए थे कि पूरी रात वो यही सब ईश्वरीय बातें करने लगे यह जो मुंह ढक कर के रखने की बात है इसके बारे में मैंने रामायण की एक कहानी सुनी है अभी यह कहानी मुझे अभी मैंने बहुत पहले सुनी थी थोड़ा सा इसको रेफर करना पड़ेगा इसमें कितना कहां पर क्या है तो कहानी इस तरह से थी कि मां सीता का जब अपहरण होता है तो मां जब वह आकाश मार्ग से रावण मां सीता को लेकर जाता है उस समय मां सीता ने क्या किया था अपने अंग से एक के बाद एक भूषण जमीन पर फेंकना शुरू किया था जिससे कि भगवान राम जब मां को खोजते खोजते मां सीता को खोजते खोजते इस आभूषणों का जो ट्रेल है इसकी यह जो पूरी रेखा है इसके माध्यम से भगवान राम को पता चले कि रावण मां को लेकर के मां सीता को लेकर के श्री लंका गया है तो जब मां के आभूषण इस तरह से जमीन पर पड़े हुए मिले तो लक्ष्मण को एक प्रश्न किया गया कि यह जो मां सीता ने ने गले में हार पहना था तो यह हार मिला है तो यह हार क्या मां सीता का ही है कि नहीं तो लक्ष्मण ने कहा कि यह तो मैं नहीं बता पाऊंगा क्योंकि मां सीता का चेहरा मैंने अपनी आंख उठा कर के कभी दर्शन नहीं किया मैंने हमेशा अपनी नजर मां के पांव पर ही रखी है और पांव में यह जो घुंघरू जो पहनती है यह घुंघरू में पहचानता हूं क्योंकि इसके मां के पैरों के ऊपर में ही तो हमेशा मेरी नजर रहती थी तो ये घुंघरू मां पहनती थी यह मुझे पक्का पता है गले में हार जो पहना है मां ने इस हार को मैं नहीं पहचान पाऊंगा क्योंकि गले से ऊपर में मां का चेहरा मैंने कभी देखा ही नहीं है तो यह अपनी यह जो भारतीय संस्कृति है कभी-कभी आजकल हम लोग क्या करते हैं इस संस्कृति के बारे में जितना भी उटपटांग गाली गलोज देना हो आंख बंद करके देते रहते हैं किंतु देखिए कि महिलाओं की यह इज्जत महिलाओं की यह रिस्पेक्ट यह अपनी भारतीय संस्कृति में जितनी है उतनी शायद ही और किसी संस्कृति में आपको देखने को मिलेगी इ हार परे श्री मां जयराम बाटी जान इसके बाद में मां जयराम बाटी चली गई थी परवर्ती चतुर्थ बारे चतुर्थ बारर गमना गमन संबंध है विशेष किछु जाना नाई इसके बाद में चौथी बार जब मां आई और फिर वापस गई जयराम बाटी इसके बारे में इस पार्टिकुलर विजिट के बारे में हमको ज्यादा कुछ पता नहीं है तबे चतुर्थ बारे दक्षिणेश्वर आगमन संबंध तीनी स्वयं बलिया लेन तार परेर बार तो आमी मां लखी आरो के के दक्षिणेश्वर आशी किंतु चतुर्थ बार के दक्षिणेश्वर आगमन संबंध माने स्वयं जो कहा है वो मां के ही शब्दों में गंभीरानंद जी कोट कर रहे हैं इसके बाद मैं मेरी मां अर्थात की श्यामा सुंदरी देवी और लक्ष्मी अर्थात की ठाकुर की भतीजी और भी कोई कोई लोग दक्षिणेश्वर में आए थे तारकेश्वर गोतो शुखेर मानसिक नोख चुल दिए एलम यह जो तारकेश्वर में जब पिछली बार मां को बीमारी हुई थी उस समय जो मां मानसिक लिया था जो एक व्रत लिया था तो तारकेश्वर में जाकर के बाल और अपने नाखून यह अर्पित करके आए थे अभी इसकी डिटेल देखनी पड़ेगी कि तारकेश्वर के किस मंदिर में गए थे किस तरह का व्रत लिया था मुझे अभी याद नहीं है और मुझे पता भी नहीं अपने लिटरेचर में इसके बारे में डिटेल होगी कि नहीं किंतु माने इस तरह से कहा है व्रत लिया जाता है तो मेडिकल फैसिलिटी तो इतनी थी नहीं कि चलो कुछ भी हो जाए तो स्पेशलिस्ट एमडी ना कि जो भी स्पेशलिस्ट होते हैं उसके पास में चले जाए और फटाफट यह औषध लेकर के वैक्सीनेशन लेकर के हम लोग ठीक हो जाए आज के युग में हम लोग बीमारी को ज्यादा इतना गिनते नहीं है ज्यादातर बीमारियां सहज से ही कंट्रोल में आ जाती है सिवाय के जो कि बहुत बड़ी बीमारी होती है जैसे कि एड्स है ना कि कैंसर है ना कि प्लेग है वगैरह वगैरह ज्यादातर बीमारियों का सज इलाज उपलब्ध है और इलाज नहीं होगा तो पेन किलर तो आसानी से मिल जाते हैं और यही पेन किलर की वजह से ही हम लोगों के मन में ना एक तरह से एक क्या कहेंगे घमंड तो मैं नहीं कहूंगा किंतु एक तरह से ईश्वर के ऊपर में अश्र देखा आ गई है पहले जब छोटी बीमारी भी होती थी इतना पेन सहन करना पड़ता था और इतनी छोटी उम्र में मृत्यु भी हो जाती थी अपने प्रियजनों की कि वैराग्य अपने सामने सहज उपस्थित होता था कि क्या है यह संसार छोड़ो इसको चलो मैं ईश्वर के ऊपर में ध्यान केंद्रित करता हूं अभी ईश्वर के आशीर्वाद से बीमारी और बीमारी के साथ में जो संलग्न सफरिंग जो है वो काफी कम हुए हैं तो इसका मने आइर निक कहा जाएगा कि इसका जो उल्टा परिणाम एक आया है कि जिस ईश्वर के आशीर्वाद से आज का मेडिकल साइंस डेवलप हुआ है इसी मेडिकल साइंस ने हमको ईश्वर से दूर लेकर के गए ज्यादातर लोग बहुत कम लोग ही डेली कुछ ना कुछ उनको पेन के भीतर में रहना पड़ता होगा मेजर सर्जरी भी हुई है तो पेन किलर की मदद से आप अपने अ पेन मैनेजमेंट जो होता है ना वो उसकी मदद से आप उसको कंट्रोल कर सकते हैं तो उस समय तो इतना कुछ था नहीं व्रत लेना पड़ता था फिर व्रत में आपको नियम करने पड़ते थे कि हां मैं इस तरह का अच्छा खाना नहीं खाऊंगा कुछ दिनों के लिए या तो फिर मैं इस तरह से प्रत्येक दिन सुबह को उठक के भगवान का नाम जप करूंगा प्रतिदिन इतना जप करूंगा कुछ ना कुछ व्रत लेना पड़ता था अभी यह व्रत से आपकी बीमारी ठीक हुई कि नहीं इसके बारे में तो पता नहीं कोई कुछ कह नहीं सकता कि होगा कि नहीं होगा किंतु एक मानसिक सध्या तो रहता था कि चलो बीमारी के बारे में मेरे से जो कुछ भी करना होता था मैंने किया अ स्वामी जी के बारे में इस तरह की एक घटना है कि स्वामी जी जब बचपन में छोटे थे उस समय एक ऐसी भयानक बीमारी उनको लग गई थी कि जैसे कि उनका प्राण जाए ऐसा हो गया था उस समय मां उनकी मां भुवनेश्वरी देवी ने एक व्रत लिया था कि यदि नरेण ठीक हो जाए उनका बच्चा नरेण यानी भविष्य के स्वामी विवेकानंद तो नरेण जद ठीक हो जाता है बीमारी से बाहर आ जाता है तो काली घाट में ले जाकर के स्नान करवा करके मां काली के दर् करवाएगी इस तरह से भुवनेश्वरी देवी ने व्रत लिया था अभी हुआ ऐसा घटना परंपरा ने घटना परंपरा में हुआ ऐसा कि स्वामी जी ठीक तो हो गए बाल नरेण ठीक तो हो गया किंतु फिर उनकी माता भुवनेश्वरी देवी कालीघाट जाकर के इस व्रत का समाप्ति नहीं कर पाई थी इसके बहुत बाद जब स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका से लौटे थे यह 1901 ना 1902 के आसपास की घटना स्वामी जी अपनी मां को लेकर के कालीघाट गए और जो व्रत मां ने लिया था तो स्वामी जी ने वहां पे स्नान करके कालीघाट तो गंगा के किनारे पर ही है गंगा में स्नान करके कालीघाट में माहाकाली का जो प्रसिद्ध मंदिर जिसके नाम पर कोलकाता नाम उस शहर को दिया गया है तो वही काली मंदिर में प्रणाम करके उस व्रत की समाप्ति की थी तो इस तरह से कोई ना कोई व्रत लेकर के लोग अपना पे पेन मैनेजमेंट करना चाहते थे यह एंसेट आइडिया मने अपना प्राचीन पेन मैनेजमेंट का आईडिया तो इस तरह से माने भी इस तरह कोई व्रत लिया होगा और व्रत के अनुसार यह बाल और नाखून तारकेश्वर में अर्पित करने होते थे तो वह अर्पित करने के लिए गई थी और उसके बाद में दक्षिणेश्वर आई थी भाई अर्थात प्रसन्न संगे थाका प्रथमे कोलकाताय तार बासा अर्थात गिरीश विद्या रत्नेर भाषाए उठी मां का भाई प्रसन्न उनके साथ में था तो प्रसन्न का घर भी तो उस समय यह लोग कलकाता में आकर के यजमान वो यजमान के घर जाकर के जो कोई भी विधि वगैरह करनी होती थी ब्राह्मण लोग जो करते हैं उपनयन संस्कार विवाह संस्कार वगैरह तो यह अन्न प्राशन संस्कार तो यह सब यह लोग किया करते थे और उसमें से कु कुछ ना कुछ आय उनकी हो जाती थी तो प्रसन्न मामा भी उस समय वहां पर रह रहे थे कलकाता में तो प्रसन्न मामा के घर अर्थात कि गिरीश विद्यारत्न का घर अभी गिरीश विद्यारत्न कौन है मुझे नहीं पता किंतु यहां पर लिखा है तो उनके घर पर सर्वप्रथम मां गई फाल्गुन चैत्र मास होबे फाल्गुन या चैत्र का महीना था पोर दिन सोकोले दक्षिणेश्वर जाई दूसरे दिन सुबह सबने मिलकर के दक्षिणेश्वर आए जैते ही हृदय की भवे बोलते थाके केनो ऐसे छो की जोनो ऐसे छो खाने की ई सब बोले ता देर अ श्रद्धा कर ले जैसे ही घर गए ठाकुर के तो हृदय का पागलपन वहां पर एकाएक बढ़ गया और हृदय ने बोलना शुरू कर दिया मां की अपमान अवगणना करके कि क्यों यहां पर आए हो किस लिए यहां पर आए हो क्या करोगे यहां पर आकर के ऐसा सब उल्टा पुल्टा बोलना शुरू कर दिया य सब बोले ता देर अ श्रद्धा कर ले यह सब बोलक के मां के परिवार जनों की अ श्रद्धा की अर मां श कथाई कोनो जवाब देनी हृदय शि हड़ लोग हमार माओ सियोर में काज हृदय मां के आद मानो कर लेना मेरी मां ने अर्थात मां ये घटना का वर्णन कर रही है तो मां ने कहा मेरी मां अर्थात श्यामा सुंदरी देवी ने हृदय की यह कटुक की का कोई भी उत्तर नहीं दिया श्यामा सुंदरी देवी भी शि होड़ की है शि होड़ में उनका जन्म हुआ था और हृदय भी शि होड़ का है तो अभी एक ही गांव में जब जन्म हुआ है बड़े हुए हैं तो बचपन से किसी को पहचानते हैं तो उनके प्रति शायद इतनी श्रद्धा इतना रिस्पेक्ट नहीं होता हमने तो देखा है बचपन में यह सब किया करता था ऐसा होता है ना बचपन से ही जो हमारे साथ में बड़े होते हैं उनकी सब तर की गलतियां भी हमने देखी है उनके साथ में जो कुछ हुआ है सब देखा है तो अपनी श्यामा सुंदरी देवी को रिस्पेक्ट देने की वजह हृदय ने श्यामा सुंदरी देवी की संपूर्ण रूप से अवज्ञा की अपमान किया और श्यामा सुंदरी देवी भी इस बात का कोई उत्तर नहीं दे पाई मां बोलले चलो फिरे देश जाई खाने कार काछ में रेखे जाबो श्यामा सुंदरी देवी ने कहा कि चलो अपने घर जयराम बाटी वापस चले जाते हैं यहां पर मैं किसके पास में अपनी बिटिया मां शारदा को रख के जाऊंगी यहां पर रख के जाऊंगी तो अभी हमारे सामने हृदय जदी मां का इतना अपमान कर रहा है तो हमारे जाने के बाद में शारदा का कितना अपमान करेगा किसको पता चलो मैं अपनी बिटिया को लेकर के जयराम बाटी वापस चली जाती हूं ठाकुर हृदय भोए आगा गड़ा किछुई बोले नहीं और ठाकुर हृदय के भय से हृदय के डर से कुछ भी बोल नहीं पाए आमरा सोकोले शहीदन चोले गेलम रामलाल पारे नौ का इने दिलन हम लोग उसी दिन वापस चले गए रामलाल वहां पे था उसने गंगा पार करने के लिए नौका मंगवा दी देखिए यह घटना पढ़ कर के हमको इतना दुख होता है इतना कष्ट होता है ठाकुर के सामने हमारी यही सबसे बड़ी कंप्लेन है तीनों लोक के स्वामी नारायण स्वयं पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करके आए हैं और हृदय को कुछ नहीं बोल पा रहे हैं खास करके चलो ठाकुर ने स्वयं जिस तरह से बाद में कहा था कि मेरा अपमान करोगे तो चलेगा मां का अपमान करोगे तो तुमको तीन लों में कोई रक्षा करने वाला नहीं मिलेगा यही ठाकुर य इस मां का इस तरह का अपमान अपनी नजरों के सामने होता हुआ देख कर के भी चुप रहे यह बात सही में मेरी समझ में नहीं आ किसी भी तरह के लॉजिक को देख कर के इसको आप इसका एनालिसिस नहीं कर सकते एक लॉजिक जो है कि ठाकुर की ऐसी अवस्था होती थी कि ठाकुर के पास में जो लोग रहते थे उनकी बातों को ठाकुर बड़ा ही चुपचाप ध्यान देकर के सुना करते थे उनकी बात उनको मान लेनी पड़ती थी और इस तरह की कुछ-कुछ घटनाएं बाद में कथामृत में भी पाई जाती है कि ठाकुर कहीं पर जा रहे हैं व पालकी घोड़े में बैठ कर के घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के और साथ में रामलाल दादा नकी फिर ये कोई लाटू वगैरह कोई है और एका एक कुछ ऐसा कारण हुआ कि इन जो ठाकुर के साथ में जो लोग थे उनको ठाकुर को छोड़ कर के किसी कार्य के लिए जाना पड़ा वापस आकर देखा तो ठाकुर घोड़ा गाड़ी में बैठे ही नहीं है अदृश्य हो गए तो सब लोग बड़े ही चिंतित हो गए अरे ठाकुर गए कहां बालक स्वभाव है बिल्कुल नादान है अकेले-अकेले कहां पर जाएगा तो उनको तो बड़ी तकलीफ होगी चारों ओर खोज ना शुरू कर दिया देखा कि ठाकुर एक रास्ते से जा रहे हैं जैसे कि उनको कुछ पता नहीं है जैसे कि बिल्कुल अन्य जगत में रह रहे हो इस तरह से चारों ओर लोग अनजाने जगह अनजानी ठाकुर को कुछ समझ में नहीं आ रहा है इस अवस्था में ठाकुर जा रहे हैं तो सबने जाकर के ठाकुर को कहा अरे आप कहां पर जा रहे हैं क्या कर रहे हैं तब जैसे ही अपने पहचान वालों को ठाकुर ने देखा तो वैसे ही जैसे कि एक हिप्नोटिज्म में चले गए थे और वैसे ही चमक करके वो वापिस आ गए हो उनको भान होश हुआ हो वैसे ठाकुर को होश हुआ और फिर बाद में ठाकुर ने कहा कि देखो तुम लोग मुझे अकेला छोड़ कर के कभी मत जाना मैं अकेले रहता हूं तो पता नहीं किस तरह का एक आवेश होता है पता नहीं मैं क्या करने लगता हूं केशव सेन के वहां पर एक बार गए थे कुछ थिएटर में नाटक जैसा कुछ होने वाला था केशव खुद उसमें अभिनय कर रहा था तो उस समय ठाकुर के बगल में राजा महाराज बैठे थे राजा महाराज अर्थात बाद में स्वामी ब्रह्मानंद उस समय के राखल तो राखल तो उस समय लड़के थे और ठाकुर के पास में आते थे तो राखल यानी कि राजा महाराज बगल में बैठे थे एकाएक किसी काम से राजा महाराज को जाना पड़ा और ठाकुर अकेले बैठे हैं उस समय एक दूसरा आदमी आकर के राजा महाराज की जगह पर बैठने लगा तो ठाकुर ने इमीडिएट उसको कहा देखो भाई तुम यहां प मत बैठना यहां पे और एक आदमी आ रहा है उसके लिए जगह रिजर्व है और फिर ठाकुर ने दूस बाद में ने कहा था कि मेरी ऐसी परिस्थिति है कि पास में जो बैठता है वो जो कहता है वो मुझे करना ही पड़ता है तो इसलिए मैं अपने पास में और किसी अनजाने व्यक्ति को नहीं बैठने देता तो ये एक एक्सक्यूज हो सकता है किंतु देखिए कि दूसरी दृष्टि से देखें तो यदि कोई भी अनजाना आदमी कहो ना कि इवन मां चंद्रा मणि देवी ने स्वयं ठाकुर की मां चंद्रा मणि देवी स्वयं ने ठाकुर को विवाह करने के लिए कहा था संसार करने के लिए कहा था यह क्या ईश्वर ईश्वर करके पागलपन कर रहे हो यह सब छोड़ो यह सब कहा था कितने ही लोगों ने कहा था तो ठाकुर ने उस समय तो उन लोगों की बात सुनी नहीं तो फिर यानी कि व्यवहार और परमार्थ व्यवहार में अर्थात कि दिन प्रतिदिन की घटनाओं में यदि कोई आपको कुछ कहता है वैसा आप करेंगे किंतु परमार्थ अर्थात की ईश्वर प्राप्ति ईश्वर के संबंधित जो कार्य कलाप है उसके बारे में यदि आपको कुछ कहा जाए तो आप किसी के किसी की बात नहीं सुने सिर्फ अपने हृदय की बात सुनेंगे सिर्फ अपने मन की बात सुनेंगे यदि ऐसा है तो इस दृष्टि से भी मां के साथ में जो हृदय ने कहा उसका मेल नहीं बठता है क्योंकि मां तो साक्षात भगवती साक्षात जगदंबा स्वयं तो साक्षात भगवती का अपमान होता हो तो यह परमार्थ में नहीं आएगा तो क्या परमार्थ में आएगा यह थोड़ी ना व्यवहार में आएगा तो यह परमार्थ और व्यवहार वाला जो यह मॉडल है यह भी यहां पर अप्लाई नहीं होता तो अभी इसके बारे में तो हमको सिर्फ स्पेक्युलेटिंग दिया आपने कुछ बोले नहीं पहले उसका उत्तर दो बाकी सब बातें बाद में क्योंकि हम लोग ठाकुर के पुत्र होने से पहले मां के संतान प्रथम है खास करके मेरा ऐसा है यहां पर बहुत सारे साधुओं के पास में सुना है कि स्वामी जी को पढ़ कर के हम लोग यहां पे आते हैं खास करके जो यंग लोग होते हैं यंग लड़के स्वामी की उत्साह भरी अग्नि वीर्यम वाणी से प्रभावित होकर के संघ के साथ में युक्त होते हैं वह कहीं वॉलंटिली वोटी के रूप में हो ना कि सन्यासी के रूप में फिर धीरे-धीरे करके आध्यात्मिकता का प्रवाह जैसे बढ़ने लगता है हृदय में तो ठाकुर के पास में चले जाते हैं किंतु धीरे-धीरे करके आखिर में मां के शरणागत तो होना ही होगा मां के शरणा होना यह अपनी आध्यात्मिकता की परि समाप्ति है आध्यात्मिक यात्रा की परि समाप्ति है हम लोग कभी-कभी कहते हैं कि अद्वैत ज्ञान आध्यात्मिक जीवन की सर्वोच्च अनुभूति है किंतु मां क्या मां को शरणागत होना यह भी तो एक इतना ही सिग्निफिकेंट घटना है हम लोगों को कभी इस तरह से डाइको खड़ी नहीं करनी चाहिए विरोधाभास नहीं खड़ा करना चाहिए कि यह द्वैत की दृष्टि से यह अद्वैत की दृष्टि से भगवान न या तो अल्टीमेट फिलोसोफी होगी वह तो मल्टीपल फिलोसोफी तो नहीं होगी फिलोसोफी एक ही है विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न तरह का ज्ञान होता है तो मां के पास में शरणागति और सर्वोच्च अद्वैत निर्विकल्प समाधि मुझे नहीं लगता कि इन दोनों में कोई फर्क होगा अभी मैं जद अपने मन में हां किंतु यह घटना को हमको लाइसेंस के रूप में नहीं ले लेना है मैं मां को शरणागत हो गया हूं अभी मैं जो चाहे करूं जितने ही भोग विलास में डूबना चाहूं डूबू यह भी तो नहीं त्याग वैराग्य जीवन का फाउंडेशन है आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन किंतु साथ-साथ में ही यह मां के प्रति शरणागति भी इतनी ही इंपॉर्टेंट है महाराज जी आगे लिखते हैं मरमाला लैया श्री मां विदाय ले लेन अपने हृदय में आघात लेकर के एक प्रचंड वेदना लेकर के मां ने उस दिन दक्षिणेश्वर से विदाय ली दक्षिणेश्वर श बारे एक दिनो थाका होलो ना उस समय दक्षिणेश्वर में एक दिन भी रुकना नहीं हुआ किंतु से वेदना जनन स्वामी रूपर सती लखीर कोन अभिमान होई नहीं किंतु इस वेदना के लिए सती लक्ष्मी का स्वामी के ऊपर में अर्थात अपने ठाकुर के ऊपर में कोई अभिमान ठाकुर के ऊपर में क्रोध ऐसा कुछ भी हुआ नहीं अभिमान बा दुख निवेदन छलो सर्बो का जेर विधाता देवता निकट अभिमान या तो फिर जो भी अदार है वह था सर्व कार्य के देवता ईश्वर के ऊपर में ठाकुर के ऊपर में नहीं कि ठाकुर आपने क्यों मेरी रक्षा नहीं की मां सीता को रक्षा मां सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने के लिए भगवान राम ने युद्ध कर दिया रावण की हत्या की लंका को जला डाला आपने हृदय से मेरा अपमान रोक दे रोकने के लिए कुछ नहीं कर पाए तो ऐसा मां ने कुछ कहा नहीं सती लक्ष्मी देखिए मां के बारे में कितना सुंदर शब्द प्रयोग किया है महाराज जी ने सती लक्ष्मी ने ठाकुर को तो कुछ कहा ही नहीं ठाकुर को तो कंप्लेन की ही नहीं यदि कंप्लेन की तो वो की ईश्वर को अपने भाग्य विधाता जो है उनको और यह आइरोव मां स्वयं ही भगवती मां स्वयं अपने को कंप्लेन कर रही है तो ताई विदाई काले तीनी मने मने मां काली के बोली लेन इसीलिए विदाई के समय माने मन में ही मन में मां काली को कहा मां जद कोन दिन आना हो तो आशो मां तुम जद किसी दिन फिर से मुझे यहां पर लेकर आओगी तो मैं आऊंगी देखिए इस घटना के साथ में उस घटना जब मां प्रथम बार दक्षिणेश्वर आ रही थी रास्ते में इतनी बीमार हो गई कि बिल्कुल मैंने बेहोश होकर के प्राय बेहोश होकर के पड़ी हुई है उस समय एक बड़ी ही सुंदर स्त्री वहां पर उपस्थित हुई शरीर का रंग बिल्कुल कृष्ण वर्ण बिल्कुल काले कलर का वर्ण शरीर का तो इस स्त्री को देख कर के मां बड़ी ही आश्चर्य चकित हो गई मां ने कहा कि मां तुम कौन हो इस समय इस अंधेरे में इस जंगल में तुम क्या कर रही हो तब वह उस स्त्री ने जवाब दिया कि मां तुम जल्दी-जल्दी ठीक हो जाओ तुम उनको तो दक्षिणेश्वर जाना है तुम्हारे लिए ही तो मैंने उनको वहां पर अटका करके रखा है उनको अर्थात कि ठाकुर को तो मां ने कहा अच्छा तो मां अर्थात की मां शारदा ने कहा अच्छा तो अभी जब मां उसके बाद में सो गई फिर जब सुबह को जगी तो उनकी जितनी बीमारी थी बुखार था ऑलमोस्ट ठीक हो गया था और तब उनको पता चला जो कृष्ण वर्ण स्त्री वहां पर उपस्थित हुई थी वो तो मां काली स्वयं तो देखिए कि ये मां काली ही मां को मां शारदा को दक्षिणेश्वर लेकर आई थी और यहां पर मां शारदा मां काली को कहती है कि मां तुम फिर जबी मुझे यहां पर लेकर आओगी तब मैं आऊंगी अभी इसके अलावा मैं नहीं आऊंगी और हुआ भी ऐसा ठाकुर को नाक रगड़ करके मां को बुलाना पड़ा था व बड़ी सुंदर घटना है वह बाद में आएगी तो यह देखिए कि मां काली ही मां शारदा को यहां पर दक्षिणेश्वर में लेकर आई है और मां शारदा इस बात को यह एक्नॉलेज करती है यहां पर शरणा गता के देवता जद शराया देन तबे तीनी देवता भिन्नो आर कहार चरण आवेदन जाना बेन जो शरणागत है उस शरणागत को ही देवता यदि दूर कर दे तो शरणागत किसके पास में जाकर के यह कंप्लेन करेगा किसके पास जाकर के मन की वेदना को व्यक्त करेगा चतुर्था बारे निष्फल जात्रा एखानी समाप्त होई लो चौथी बार की निष्फल यात्रा यहीं पर समाप्त हुई यह जो भगवान राम की एक कहानी ठाकुर सुनाया करते थे कि राम के तीर से एक कौवे की मृत्यु हुई तो उसको देख कर के उसके आखिरी समय में यह तो मने एक्सीडेंटली ही हो गया था भगवान राम की इच्छा नहीं थी कि कौवे को मारे किंतु हो गया अभी ऐसा तो क्या करें तो भगवान राम गए तो देखा कि कौवा राम का ही ना नाम ले रहा है तो भगवान ने पूछा मेरे तीर से तुम्हारी मृत्यु हो रही तुम मेरा नाम ले रहे हो तो अभी वो कवा कहता है जिस देवता ने मारा उसी देवता का ही तो मैं नाम लूंगा और किसका मैं नाम लेने वाला हूं तो यहां पे भी शरणागत यदि देवता शरणागत को यदि वहां से अपनी नजरों के सामने से चले जाने को कहेगा तो फिर शरणागत भक्त जो होगा देवता को ही तो फिर मन का आवेदन मन की वेदना उनके सामने व्यक्त करेगा और किसी के सामने जाकर के बोलने का क्या बात क्या प्रयोजन है इसीलिए मां शारदा ने मां काली को ही अपने मन की बात कही नहीं की ठाकुर को तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु हां ठाकुर जब काशी में गए थे भैरवी ब्राह्मणी जब भैरवी ब्राह्मणी का ठाकुर के पास में से जाना कैसे हुआ वह तो पता है ना कामर पुकुर गए थे भैरवी ब्राह्मणी बहुत ज्यादा ठाकुर को अपने ठाकुर को अपना कंट्रोल में करना चाहती थी किंतु फिर हृदय के साथ में झगड़ा हुआ और तब उसको पता चला कि यह तो अहंकार बढ़ जा रहा है मेरा तो फिर वह काशी चली गई थी काशी ना की वृंदावन 64 ब्राह्मण 64 भैरवी जहां पर बोलकर के एक जगह थी तो वहां पर वह ब्राह्मणी रह रही थी तो ठाकुर जब नॉर्थ इंडिया की यात्रा के लिए गए थे मथुर बाबू के साथ में तो वहां पर उनकी मुलाकात हुई थी अभी काशी के वृंदावन एजेक्ट देखना पड़ेगा मुझे याद नहीं है किंतु वहीं पर वो भैरवी चली जी वो काशी में गई काशी ना काशी में एक जी काशी काशी में एक घट है 64 64 भैरवी जोगिनी 64 हां अच्छा अच्छा अच्छा अच्छ बक उसी केही वो रहती थी हा ठाकुर के साथ में वही आखिरी मुलाकात हुई थी जी ठीक ठीक देखिए इसका उत्तर स्वामी जी ने दिया है स्वामी जी ने कहा कि एक अवतार को जन्म देने के लिए भारत में करोड़ों करोड़ों लोगों को पशु अवस्था में डाल दिया है हमने यानी कि ये जो सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य यह सब आइडियल लगते तो बहुत अच्छे हैं किंतु वो तो कुछ ही मने अल्प लोगों के लिए है बुद्धिज्म ने जो सबको पकड़ पकड़ करके क्षत्रियों को भी पकड़ करके साधु करना शुरू किया भिक्खू बनाना शुरू किया ये शुद्र है यह वैश्य है सबको पकड़ पकड़ करके ये जो साधु बनाना शुरू किया उसी में तो भारत की दुरावस्था हो गई थी कि विदेशी आक्रमण जब प्रारंभ हुए तो क्षत्रिय लोग थे ही नहीं भारत की रक्षा करने के लिए तो क्षत्रिय का क्षत्रिय धर्म है वैश्य का वैश्य धर्म है ब्राह्मण का ब्राह्मण धर्म है जो मुट्ठी भर अल्प लोग सन्यास का रास्ता पसंद करते हैं उनके लिए ही तो या संन्यास का रास्ता में शब्द यूज नहीं करके साधना का पथ जो अवलंबन करते हैं उनके लिए ही यह उच्च आइडियल है वरना तो आप जिस भारत में देखिए कि इवन क्षत्रिय आपको शत्रु की ह करनी है उसके लिए भी क्षत्रिय धर्म है ऐसा कहीं नहीं कहा कि शत्रु आक्रमण करेंगे और आपको अपने को बचाना नहीं है पूरी गीता ही युद्ध क्षेत्र में लिखी गई है भगवान कृष्ण अर्जुन को बार-बार कहते हैं कि भाई तुम युद्ध करो युद्ध नहीं करोगे तो फिर तुम अधर्म में गिरोगे तो अपना धर्मशास्त्र हिंदू धर्म का धर्मशास्त्र ही फंडामेंटल धर्मशास्त्र कहता है कि युद्ध करो और इसी बात को भूल कर के विस्मृत होकर के हम यह बुद्धिज्म का ये जो अहिंसा वाला जो कांसेप्ट है ना झूठ मुठ का अपने जीवन में लेकर के बैठे हैं जब तक युद्ध नहीं करेंगे शत्रुओं का सामना नहीं करेंगे तब तक आप में अहिंसा की शक्ति कहां से आएगी अहिंसा कौन करेगा अ महात्मा गांधी का एक बड़ा ही एक सुंदर घटना है कि एक बार गांधी जी को कुछ एक जगह पर जा रहे थे कुछ लोगों ने मिलकर के गांधी जी को थोड़ा सा शारीरिक ईजा उनको पहुंचाई उनको धक्के मारे होंगे कि उनकी मारपीट की होगी ऐसा कुछ हुआ था तो गांधी जी का पुत्र उस समय वहां पर उपस्थित नहीं था तो इस पुत्र ने बाद में गांधी जी को पूछा कि पिताजी मैं तो उस समय आपके साथ में उपस्थित नहीं था किंतु यदि मैं रहता तो मेरा धर्म क्या होता मेरा कर्तव्य क्या होता क्या मैं आपके कहे अनुसार मैं अहिंसा का पालन करता कि अपने पिता की रक्षा करने के लिए मैं उस लोगों के साथ में जो लोग आपको इस तरह से मार रहे थे शारीरिक हानि पहुंचा रहे थे उनका मैं प्रतिकार करता मेरा क्या धर्म होता तो गांधी जी ने कहा कि अपने पिताजी की रक्षा करना तुम्हारा धर्म होता उस समय अहिंसा को बीच में मत नहीं ले आना है तो यह जो भ्रम है कि एक हम सभी को सब समय आध्यात्मिक उच्च आदर्श को नजर के सामने चलना है रख कर के यह बिल्कुल गलत है पहले तो अपने को स्ट्रांग बनाए फिर तो कहीं जाकर के आप अहिंसा का पालन करेंगे कमजोर आदमी का अहिंसा का पालन करना वो तो कोई बात ही नहीं हुई जिसमें दम है साहस वीर्य सामर्थ्य है वही तो अहिंसा का पालन करेगा तो मां के लिए यह ठीक है कि मां अपने बाहर से कोई प्रतिकार नहीं करेगी वह चुपचाप सब सहन कर लेगी किंतु सभी के लिए यह बात नहीं है बाकी सबको तो प्रतिकार करना ही पड़े आज देखिए ना अपने कितनी ही भारतीय स्त्रियों को ससुराल में जाकर के कितनी ही पीड़ा सहन करनी पड़ती है अभी यह लोग जद प्रतिकार नहीं करेगी तो यह अन्याय की परंपरा चलती ही जाएगी प्रतिकार तो करना ही पड़ेगा प्रतिकार करके जब आप सक्षम होते हैं धर्म के आधार पर किंतु प्रतिकार यदि करते हैं तो धर्म के आधार पर माने झूठ का सहारा लेकर के फिर अन्याय के सामने अन्याय से लड़ने का यह सब नहीं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने को कहा किंतु धर्म युद्ध करने को कहा वह जिहाद करने को नहीं कहा तो यह जो प्रतिकार भी करना है तो वह धर्म के आधार पर करना है मैंने आप स्वामी जी की खुद की बहन को देखिए उनकी बहन को आत्महत्या करनी पड़े थी और यह घटना से ही तो स्वामी जी फिर हिमालय छोड़ कर के नीचे आए थे भारत में भ्रमण किया था तो जब तक तमस और रजस में है तब तो प्रतिकार करना ही पड़ेगा फिर जब सत्व में आ जाते हैं तब यह अहिंसा का नियम चालू होता है यह एक अच्छा प्रश्न है कि आप जिसकी सेवा करते हैं उनके ऊपर अधिकार आ जाता है तो आप इस तरह से अपने कुछ तो मने उल्टा पुल्टा उनके साथ में कर सकते हैं ये एक अधिकार आता है किंतु देखिए कि जैसे ठाकुर ने खुद कहा था तुम मेरा अपमान करो कोई बात नहीं है मां का अपमान जो करोगे तब वहां से प्रश्न चालू होता है तो जब तक ठाकुर हृदय ठाकुर के साथ में जिस तरह का भी दुर्व्यवहार किया करता था कोई फर्क नहीं पड़ता था जैसे ही मां का अपमान किया तभी तो जाकर के उसको वहां से निकलना पड़ा तो आप यदि किसका अपमान करते हैं तो उसके पीछे का क्या भाव है वह भी तो देखना है यदि ठाकुर ने खुद ने मां काली के सामने दर्शन नहीं मिल रहे बोल कर के खड़ग मां के हाथ में से छीन लिया कहा मां गला काट दूंगा यदि दर्शन नहीं दोगी तो तो इस तरह से जो अदार है जो अधिकार त्व आप जता सकते हैं उसके पीछे भाव क्या है वह भी तो देखना है यदि कोई भक्त मां के सामने अभी जैसे वो बागदी का लड़का ही बागदी का लड़का आया जयराम बाटी में कहां मां दीक्षा देनी होगी तो मां ने थोड़ा सा भयभीत हो कर के कहा कि देखो अभी यहां पर तो सब लोग रूढ़ी चुस्त लोग रहते हैं ऑर्थोडॉक्स लोग लोग यहां पर मैं बागदी को दीक्षा दोगी तो लोग क्या कहेंगे तुम एक काम करो तुम वहां पर उद्बोधन में जाना तो यह बागदी का लड़का सीधा सीधी बोल उठा कि जब आपको जरूरत पड़ी थी बागदी को पिताजी बना दिया अभी जरूरत नहीं है तो बागदी को अपना अड़का नहीं बना सकती तो किंतु यहां पर देखिए पीछे का भाव देखिए कि मां के प्रति श्रद्धालु होकर के यह बात कही है और हृदय जो बोल रहा था मां के प्रति अश्राथा वो मन के भाव में बहुत बड़ा तफावत है देखो किंतु मां सब समय करुणामय भी नहीं थी पागली मामी ने मां के ऊपर में जो आक्रमण करने का प्रयास किया तो मां ने कह दिया किंतु बोल दिया तो एक बार एक बार तो बोल दिया और वो बात सफल भी हुई माने वो बात फलीभूत भी हुई वो कुष्ठ रोग हो गया था पागली मामी का यानी वो करुणा दया की भी तो एक हद है वो जो हरीश मां के पीछे दौड़ रहा था माने उसको धक्का मार के गिरा दिया जीप पकड़ करके चाटा मारना शुरू किया यानी लक्ष्मण रेखा आप ईश्वर के साथ में भी क्रॉस नहीं कर सकते डॉक्टर सरकार थे ना वो जो ठाकुर की आखिर आखिर में सेवा चिकित्सा किया करते थे ठाकुर जब काशीपुर में थे उस समय तो डॉक्टर सरकार भी ऐसी सब हवाहवा में बातें करते थे ना वो तो थे बड़े नास्तिक और ठाकुर उनको कन्वर्ट करने का बड़ा प्रयास करते हैं तो एक बार क्या हुआ कि डॉक्टर सरकार वहां पर आए हैं और डॉक्टर सरकार के बारे में एक भक्त ऐसा कह रहा है कि ये जो डॉक्टर इस तरह की जो बातें करते हैं ना अभी उनका जो अगला जन्म जो होगा ना वह पशु पक्षी भी नहीं होंगे वो पत्थर बनेंगे पत्थर से फिर से उनको शुरुआत करनी पड़ेगी तो यह बात ठाकुर ने डॉक्टर सरकार को कही देखो ये भक्त लोग ऐसा कर रहे हैं कि पाप किया तो पशु योनि में जन्म होगा ना आपने इतना सारा पाप किया आपको पत्थर से शुरू करना पड़ेगा तो ये डॉक्टर हंसते हंसते क्या उत्तर देता है पता है कि पत्थर से शुरू करूंगा पशु योनि में जाऊंगा फिर मनुष्य योनि में आऊंगा फिर इतना पाप करूंगा फिर से पत्थर से चालू करना पड़ेगा डॉक्टर सरकार अपने से अपने बारे में कहते तो अभी हृदय का अगला जनम पत्थर से चालू हुआ है कि कहां से पता नहीं फिर देखि फिर से ऐसा नसीब आ जाएगा फिर से ठाकुर के पास आ जाएगा फिर से पता नहीं मां का अपमान करेगा फिर से पत्थर से चालू करना पड़ेगा किसको पता रने बो ट पाटल ार शुरू करते हुए देखिए यहां पर एक चीज सबसे पहले कि हृदय ने क्या किया जो हमको नहीं करना है इससे पहले जो हमको एक देखना है कि हृदय को कौन से गुणों की आवश्यकता थी ठाकुर की सेवा करने के लिए उस समय क्या चाहिए था तो एक सर्टेन टाइप ऑफ सेल्फ एश्योरेंस चाहिए था उस समय देखिए कि ठाकुर की सेवा बाद में किसने की तो लाटू महाराज ने की शशि महाराज ने की येन दोनों का नाम आज कहे कहेंगे कि अपने संघ में ठाकुर की साक्षात सेवा करने में इन दोनों का नाम सबसे बड़ा है ठाकुर लाटू महाराज ने ठाकुर के देह की सेवा की थी और शशि महाराज ने ठाकुर के मंदिर में सेवा की एक मने अमर उदाहरण है अपने संघ में तो इन दोनों के लाइफ से जो जानना है तो बड़ा ही स्वयं स्पष्ट है प्रश्न है कि हृदय की लाइफ में से क्या जानेंगे और जो कि और ओबवियसली परप ऊपर से देखा जाए तो कहां लाटू महाराज और शशि महाराज की संपूर्ण रूप से ठाकुर को समर्पित और कहां पर यह हृदय जिसमें कि एक अपना एक इंडिपेंडेंस था इंडिपेंडेंस ऑफ थिंकिंग इंडिपेंडेंस था तो अभी यहां पर देखिए कि उस समय उसकी जरूरत भी थी बाद बाद के जीवन में ठाकुर का यह जो पब्लिक फेस एक एस्टेब्लिश हो गया था उस समय ठाकुर को मिलने के लिए ठाकुर की श्रद्धा करने के लिए बहुत सारे लोग आते थे तो उस समय ठाकुर को इस तरह के सेवक की जरूरत थी जो कि उनको पर्सनली संपूर्ण रूप से समर्पित हो किंतु शुरू शुरू में ठाकुर एक ऐसी जगह पर रहते थे जहां पर उनके बारे में लोग अवज्ञा अपमान की दृष्टि से ही देखते थे यह जो कालीवाड़ा की के पुजारी थे आसपास के लोग भी इवन कार कामर पुकुर में भी यह सब बातें जाती थी क्या अरे वो तो पागल हो गए हैं पता नहीं क्या उल्टा-पुल्टा करते हैं तो ठाकुर के ऊपर में चार वर्ष एक तरह का आक्रमण हो रहा था तो मथुर बाबू तो थे किंतु मथुर बाबू स्वयं तो सब समय उपस्थित नहीं रहेंगे तो ठाकुर को आक्रमण से रक्षा करने के लिए सेनापति की जरूरत थी एक क्षत्रिय की जरूरत थी तो क्षत्रिय का कार्य इस हृदय ने किया है तो यह सबसे पहले याद में रखना है कि लाटू महाराज और शशि महाराज एक ब्राह्मण कहे जाएंगे कि ब्राह्मण के गुणधर्म थे उनके भीतर में शुद्धता थी पवित्रता था पवित्रता थी संस्कार थे और हृदय का था कि संस्कार संस्कार बाद में पहले ठाकुर की रक्षा करनी है क्षात्र वीर्य चाहिए तो क्षात्र वीर्य हृदय में था तो इस उ अभी यह गुणधर्म के ऊपर में अभी हमको देखना है कि क्षात्र वीर्य कहीं आपके वो ऐसा ना हो जाए कि क्षात्र वीर्य आकर के अपने को ही हानि पहुंचाने लगे यह भारत में जो क्षत्रियों की जो दुरावस्था हुई है ना यह इसके साथ में हृदय का उदाहरण बड़ा आसानी से मैच हो जाता है क्षत्रिय लोग या तो प्रजा का शोषण करेंगे या तो फिर साधु होकर के जंगल में चले जाएंगे बौद्ध भिक्खू होकर के और आक्रमण जब होते हैं बाहर से उसमें फिर अपने देशवासियों की रक्षा नहीं कर पाएंगे तो यह जो दो एक्सट्रीम है कि जिसकी सेवा आप कर रहे हैं उन्हीं का आप शोषण कर रहे हैं यह तो एक है दूसरा है कि जिनके सामने बाहर के आक्रमण से रक्षा करनी है वो नहीं कर पा रहा है तो क्या है कि क्षत्रिय लोगों के साथ में यह सब गड़बड़ भारत में हो चुकी है और यही गड़बड़ गोल घुमा करके यह हृदय के साथ में हुई है हृदय का क्षत्रिय के रूप में क्या कार्य था कि ठाकुर की रक्षा करना तो उसने किया किंतु साथ में ही जैसे यह प्रजा का शोषण करते हैं क्षत्रिय लोग इस तरह से ठाकुर का अपमान यह सब भी हृदय ने किया है तो यह पूरा क्षत्रिय गुणधर्म हृदय के भीतर है और क्षत्रिय अच्छा कैसे होना चाहिए यहां पर ब्राह्मण के गुणधर्म ब्राह्मण के लेसन यहां पे अप्लाई नहीं होंगे तो यहां पे क्षत्रिय के लेसन अप्लाई होंगे जो कि भारत में इस बात की जो आज भी देखें कि आजकल के नेता भी देखें कि वैसे भारत की शत्रुओं के सामने रक्षा करते हैं किंतु भारतीय प्रजा का ही शोषण करते हैं तो शासन करता कैसा होना चाहिए रक्षा करने के लिए तत्पर हो और शोषण ना करें यह दोनों गुणधर्म शासक में होने चाहिए क्षत्रिय में होने चाहिए तो दैट इज वन लेसन फ्रॉम हृदय लाइफ या किंतु क्षत्रियों को यह सब जरूरत भी नहीं है क्षत्रिय जद मॉडल हम हृदय को अप्लाई करें तो यह सब चीजों की क्षत्रिय को जरूरत भी नहीं है इन लोगों को क्या है ना कि सनातन धर्म का कौन सा मॉडल अप्लाई होता है जैसे कि गिरीश के बारे में ठाकुर ने खुद कहा था यह भैरव है तो यहां पर हृदय जो है वह क्षत्रीय है तो उनको उस तरह के ट्रीटमेंट और उस तरह के मॉडल से देखना चाहिए यदि अभी जैसे कि राजा के पास में आप यह अपेक्षा रखेंगे कि प्रजा का पालन करो दुश्मनों से रक्षा करो यह सब करो किंतु फिर साथ में ही बैठ के के जब ध्यान करो तो वो क्या है ना कि वो अतिशयोक्ति हो जाएगी माने एक ओवर एक्सपेक्टेशन हो जाएगी यह क्षत्रिय है यह क्षत्रिय का ही कार्य करेगा मनुष्य की क्या कुछ कुछ लिमिटेशंस होती है ना यस अभी भगवान बुद्ध को ही देखिए जब राजकुमार थे तो ऐसा नहीं कि कोई बहुत बड़ा युद्ध करके युद्ध में विजय प्राप्त कर लिए है उनका पीसफुल राज्य था एटलीस्ट उस समय के लिए तभी तो कहीं जाकर के हायर थिंकिंग कर पाए कि हां अभी आत्मन क्या है मृत्यु के परे क्या है