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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध ठाकुर के जीवन का अंतिम पर्व प्रारंभ हो गया है बाल्य पर्व साधन पर्व आनंद पर्व यह तीन समाप्त होकर के आत्म प्रकाश पर्व की ओर अभी हम आत्मप्रकाश पर्व में प्रवेश कर चुके हैं ठाकुर के जीवन के वह आखिरी दिन कुछ आखिरी महीने जबकि ठाकुर कहते थे कि वह खुले सरेआम खुले चौक में मैं भांडा पड़ दूंगा अर्थात कि मेरा जो स्वरूप है वह सबके सामने प्रकट कर दूंगा तो ठाकुर का जो सही स्वरूप था श्री राम वही परम पुरुष नारायण के वह अवतार थे यह स्वरूप ठाकुर सबके सामने प्रकट करने वाले थे और वही स्वरूप प्राग उनका प्रारंभ हो चुका था तो इस यदि पर्व में देखे तो दो तीन थीम हमको मेजर दिखती है एक तो है कि लोक बादशाही जैसे कि ठाकुर ने कहा अंतरंग और बहिरंग इस तरह से दो डिवीजन ठाकुर के शिष्यों में हो गए उन शिष्यों ने जिन्होंने सोचा कि अरे ठाकुर खुद के कुछ मदद नहीं कर सकते खुद को उनको इस कैंसर की वजह से सफर करना पड़ता है तो फिर वह हमारे लिए क्या कर पाएंगे तो ऐसा बोलकर के कुछ लोग ठाकुर से दूर हो गए और जो कुछ लोग जिन्होंने सोचा कि नहीं ठाकुर की सेवा करके जीवन धन्य कर ले वे लोग रह गए तो यह एक थीम था कि अंतरंग और बहिरंग में विभक्त हो गए ठाकुर के भक्त दूसरा जो थीम है हमको पता है कि धीरे-धीरे करके ठाकुर ने अपने सही स्वरूप को प्रकट करना शुरू किया नरेंद्र अर्थात कि स्वामी विवेकानंद और गिरीश घोष इन दोनों के सामने ठाकुर ने अपने स्वरूप को जो प्रकट किया उसको भी हमने देखा और वह भी देखा कि इन दोनों की प्रकृति के अनुसार इनके सामने किस तरह से स्वरूप प्रगट हुआ है तो यह एक थीम था तीसरा एक थीम बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है प्रथम बार श्री मां शारदा देवी ने यह जो ठाकुर के अंतरंग भक्त थे उनकी आगे वानी ली उनकी लीडरशिप उन्होंने ग्रहण की यह ठाकुर के जितने भी त्यागी संतान उन्होंने श्री मां के पास में से मां की आज्ञा के अनुसार सब कार्य करना शुरू किया क्योंकि ठाकुर खुद तो सब समय ऐसी अवस्था में थे नहीं अच्छा जब तक यह लोग दक्षिणेश्वर में रहते थे तब तक तो मां सबसे छुप के रहती थी किसी के सामने नहीं आती थी और जो कोई भी डिसीजन मेकिंग था जो कुछ भी निर्णय करना होता था वह तो ठाकुर स्वयं करते थे जो भी डिसीजन मेकिंग है ठाकुर को ही पूछा जाता था ठाकुर ही उसका उत्तर देते थे किंतु एक बार गले में कैंसर का प्रारंभ होने के बाद ठाकुर का स्वास्थ्य जो धीरे-धीरे करके डिटे होना शुरू हुआ उस समय ठाकुर को पूछ कर के सब बातें करना संभव नहीं था तो त्यागी संतानों ने सर्वप्रथम मां के पास जाकर के मां को पूछना शुरू किया कि मां अभी इस बारे में क्या किया जाए और मां भी सोच समझ करके जो उत्तर देती थी उस आज्ञा का पालन इन त्यागी संतानों ने करना शुरू किया तो सर्वप्रथम मां के मातृत्व का जो विकास है वो हमको इस आत्म प्रकाश पर्व में दिखाई देता है अच्छा अब तक तो हमने यह जो डिवीजन किए समय के और प्रसंग के ठाकुर की दृष्टिकोण से की है ठाकुर के पॉइंट ऑफ व्यू से की है कि हां ठाकुर का यह साधना का समय था यह ठाकुर का यह बाल्य पर्व था ठाकुर का यह आत्म प्रकाश पर्व है यदि मां की दृष्टि से हम मां के जीवन को यदि डिवाइड करें उन प्रसंगों को इस तर तरह से क्लासिफाई करें कि जिससे मां के जीवन को हमको समझने में सुविधा हो तो वो क्लासिफिकेशन किस तरह का होगा तो वह भी मैंने एक प्रयास किया है और इस प्रयास करने से मतलब इसके बारे में बात करने से पहले हमेशा ये एक जिसको कहते हैं कि एक डिस्क्लेमर होना चाहिए कि इस तरह के प्रसंगों को किसी भी पीरियड में विभक्त करने का प्रयास वो एक टेंपररी प्रयास है अपनी यह जो सामान्य बुद्धि है उससे हम यह महत जीवन को समझ पाए इसलिए हम यह सब करते हैं तो विथ दिस डिस्क्लेमर मां के जीवन को मैंने किस तरह से डिवाइड किया है या तो फिर मां के जीवन के प्रसंगों को मैं किस तरह से क्लासिफाई करता हूं तो देखिए कि मां के जीवन में भी सर्वप्रथम तो बालिका पर्व आएगा ही जब तक वह जयराम बाटी में थी और 5 साल की उम्र तक उनकी और फिर जहां पर वह बड़ी हुई अपने मां और पिताजी के साथ में उसके बाद में देखिए कि उनका ठाकुर के साथ में विवाह हुआ सेवा करती थी और फिर जब ठाकुर दक्षिणेश्वर चले जाते थे तो मां भी अपने जयराम बाटी गांव में मां पिताजी के साथ में चली जाती थी तो यह जो एक जीवन था मां का ए उनके विवाह से लेकर के चालू करके तो हमने देखा कि हमने इस गंभीरानंद जी के जीवन में ही हमने उसको स्टडी किया और समझा कि धीरे-धीरे करके ये गांव में इस तरह के न्यूज इस तरह के ये जो फेक न्यूज आज की आज की लैंग्वेज में व प्रसारित होना शुरू हुए कि ठाकुर तो पागल हो ही गए हैं पता नहीं वह दक्षिणेश्वर में किस तरह की हरकतें करते रहते हैं और लोग ठाकुर को ठाकुर की पत्नी होने की वजह से मां को पागल की पत्नी ऐसा करके पुकारते थे और इससे मां के हृदय को जो एक कष्ट पहुंचता था और इसकी वजह से मां जैसे जैसे बड़ी होने लगी उनकी उम्र बढ़ने लगी व धीरे-धीरे करके अपने को सभी लोगों से उन्होंने विड्रॉ करना शुरू किया वहीं उनके जो सम हृदय जो कुछ उनकी सखियां थी कुछ बड़े थे उम्र में उनके उनके पास में जाकर के वह सिर्फ रहती थी या काम करती थी तो इस तरह से मां का यह जो पीरियड है और फिर आखिर में मां ने यह डिसाइड किया कि यह जयराम बाटी गांव से कुछ महिलाएं दक्षिण कोलकात्ता जा रही है किसी पर्व के उपलक्ष में गंगा स्नान करने के लिए तो मां ने सोचा कि अभी इतने दिनों तक मैं जो ठाकुर के बारे में सुनती आई हूं पता नहीं अभी जब तो वह कामर पुकुर आते हैं तो मुझे तो इतना सुंदर रूप से मेरे साथ में बात करते हैं मुझे इतना अच्छा ट्रीट करते हैं उसमें तो कोई पागलपन का मुझे कुछ दिख नहीं रहा है तो फिर दक्षिणेश्वर में वो पता नहीं इस तरह सी बातें क्यों आती है वहां से मैं खुद जाती हूं अपनी नजरों से उनको देखूंगी उनकी सेवा करूंगी यह सोच करके मां ने अपने पिताजी को कहा और पिताजी भी अपनी बिटिया को लेकर के दक्षिणेश्वर आने को प्रारंभ की यात्रा की दक्षिणेश्वर आए फिर ठाकुर ने उनकी शोड़ी पूजा की तो देखिए कि यह जो पूरा पीरियड था विवाह से लेकर के दक्षिणेश्वर आकर के शोड़ी पूजा तक का इस पीरियड को मैं कहता हूं विरह पर्व मां बेचारी भीतर भीतर से तो चाहती थी कि ठाकुर के पास में रहे ठाकुर की सेवा करें किंतु विधाता ने इस सेवा का का इतने समय यह जो पूरा पीरियड है बहुत ज्यादा नहीं दिया था बड़ा अल्प ही मिला था जब भी ठाकुर दक्षिणेश्वर से गांव आते तो वह सेवा का जो मौका मिलता वही मिलता तो इसको मैंने दिया है नाम विरह पर्व इसके बाद में देखिए कि मां जब दक्षिणेश्वर आई सड़सी पूजा ठाकुर ने की वहां से प्रारंभ होकर के ठाकुर के एक के बाद एक सभी भक्त आने लगे और फिर ठाकुर उनको लेकर के जो आनंद की हार्ट बाजार बसाई थी तब से लेकर के ठाकुर को कैंसर होने तक का पीरियड 1885 का ग्रीष्म ऋतु गर्मी का महीना गर्मी की सीजन तो यह जो पीरियड है उसको मैं कहता हूं शक्ति पर्व क्योंकि मां की शक्ति रूप में आराधना करके ही तो ठाकुर ने यह धर्म चक्र प्रवर्तन का प्रारंभ किया था यदि मां का आगमन नहीं होता तो हमको पता नहीं कि ठाकुर इस मामले में कितने सक्सेसफुल हो सकते थे क्योंकि हमको पता है कि ब्रह्म हमेशा अटल अचल निष्क्रिय रहता है कर्म जो करता है कर वो वो तो शक्ति है शक्ति ही कर कार्य करती है शक्ति ही कर्म करती है तो ठाकुर वो जो सब समय भाव में रहते थे उस भाव में से फिर धीरे-धीरे करके हमको तो पता है कि मां उनको खाना खिलाने को जाती इस सब पूरी उनको सामान्य दिन प्रतिदिन की बातें करती और उनके मन को इस ऐहिक लोक में इस संसार में बांध करके रखती जैसे कि ठाकुर थोड़ा सा आहार ग्रहण करें उनका स्वास्थ्य ठीक रहे ठाकुर अपने स्वास्थ्य रक्षा के लिए दिन प्रतिदिन के कार्यकलाप के लिए मां के ऊपर में संपूर्ण रूप से निर्भर हो गए थे यह भी हमने इस किताब में पढ़ा आगे के चैप्टर में मां जब जयराम बाटी जाती थी या फिर और किसी काम से व्यस्त होती थी तो ठाकुर को जैसे कि चारों ओर अंधेरा दिखता था और कैसे भी करके मां को वापस वहीं दक्षिणेश्वर में लाने का प्रयास करते थे वह हमने देखा कि एक बार मां जयराम बाटी गई है तो ठाकुर ने उनको मैसेज पहुंचाया है कि यह रामलाल तो अभी यह रामलाल टाम ल यह सब लोग प ये बामुन जो है उनके दल में अभी मिले हुए हैं अर्थात कि कालीवाड़ा के ब्राह्मण लोग हैं पुजारी वगैरह भंडारी खजांची उनके दल में वह जाकर के मिल गया है क्यों क्योंकि वह सोचता है कि अभी तो मैं मां काली का पुजारी हो गया हूं तो फिर अभी मुझे ठाकुर की सेवा ठाकुर के ही कमरे में रहना रात को प्रतिक्षण उनकी सेवा करना यह सब जरूरत नहीं है मुझे ऐसा बोलकर के अभी रामलाल उनकी सेवा पर ज्यादा ध्यान नहीं देता है तो फिर आप तुम आओ वहां से जयराम बाटी से जो भी तुम यदि पालखी में आना चाहो जद रेलगाड़ी में आना चाहो जितना रुपया लगेगा मैं दूंगा ऐसा करके ठाकुर मां को पुकारते हैं तो यह हो गया शक्ति परवा मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर ने यह जो ठाकुर का खुद का जो यह मैसेज है ठाकुर का मैसेज नहीं करके वही सनातन मैसेज है अपने योग और वेदांत का किंतु आज की भाषा में उन्होंने प्रचारित करना शुरू किया तो यह शक्ति पर्व उसके बाद में यह जो क सर के दिन है कलकत्ता ठाकुर की ट्रीटमेंट के लिए जो कलकाता रहे ठाकुर यह जो समय है इस समय का ठाकुर का यदि पर्व का मैंने नाम दिया है आत्म प्रकाश पर्व तो मां के जीवन में यदि यही समय को देखा जाए मां ने क्या किया उस समय मां का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान इस कैंसर के समय का क्या था तो धीरे-धीरे करके सभी त्यागी संतान मां की आगे वानी को स्वीकार करना शुरू किए मां जिस तरह से उनको डायरेक्ट करती थी जिस तरह से उनको बताती थी वैसे ही उन्होंने ठाकुर की सेवा करना प्रारंभ किया तो इस पर्व को यदि नाम देना है तो वह मैं कहूंगा मातृ पर्व क्योंकि मां संघ जननी के रूप में सर्वप्रथम उन्होंने यह कार्यभार अपने संघ का ग्रहण किया था ठाकुर ने भले ही चाहे सन अपने त्यागी संतानों को गेरुआ प्रदान करके उनको शिक्षा दीक्षा दे कर के उनको मन से त्यागी सन्यासी बनाया था किंतु संघ की रचना है उसके पीछे में सबसे बड़ा अवदान तो मां शारदा देवी का ही था और जिस तरह से ठाकुर की सेवा मां करती थी किसी को पता नहीं चलता था श्याम पुकुर में हमने देखा कल कि सुबह को 2 बजे अर्ली मने सुबह कहां आधी रात 2 बजे उठकर के वह तो अपने वहां पर छत पर चली जाती थी जहां पर ठाकुर के लिए पथ्य या आहार प्रस्तुत करना है और वहां पर रह कर के वहीं पर दोपहर को थोड़ा सा विश्राम करके रात को 11 बजे जहां पर उनको रहने की छोटी सी जगह थी वहां पर वोह आती थी वापस यानी कि उस घर में उस मकान में जो लोग दिन के दौरान आएंगे जाएंगे किसी को पता तक नहीं चलेगा कि यहां पर मां रह रही है और ठाकुर की सेवा कर रही है सबसे प्रधान सेवा कार्य मां का था और मां के बारे में ही किसी को पता नहीं तो जैसे यह ठाकुर की सेवा मां ने बिल्कुल अदृश्य रह कर के की वैसे ही संघ की स्थापना भी या तो फिर कहेंगे कि संघ का गठन यह संघ का गठन भी माने बिल्कुल अदृश्य रह कर के किया यह किसी प्री प्लान नहीं था कि ठाकुर ने कहा है कि चलो अभी तुम सभी लोग मां के पास जाकर के उनकी आज्ञा का पालन करो या तो फिर मां ने डिक्लेयर किया कि आज से मैं जैसा कहूंगी वैसा तुम लोग करो यह सब कुछ एक सहज रूप से हो होता आ रहा है ठाकुर की जैसे ही वाणी धीरे-धीरे करके रुद्ध होना शुरू हुई ठाकुर का स्वास्थ्य जैसे धीरे-धीरे करके डिटेरिटोरियलाइजेशन ना ये गिरीश घोष ना किय सुरेश मित्र जो लोग उस समय के आगेवा थे उस समय की ठाकुर की जो भी सेवा है व लोग सब कुछ डॉक्टर को बुलाना पैसे देना भाड़ा देना वगैरह यह जो सब करते थे इन लोगों की बात थोड़ी ना त्यागी संतान सुनने वाले थे यह तो जो पावर वैक्यूम हुआ ठाकुर की बीमारी से उस वैक्यूम को फुलफिल कौन करेगा किसकी यह आध्यात्मिक सत्ता है यह त्यागी संतानों को गाइड करने की व सत्ता तो सिर्फ मां के पास में ही है तो यह नेचुरल रूप से होना शुरू हुआ कि सभी त्यागी संतान धीरे-धीरे करके मां की आज्ञा का पालन करना शुरू किए तो यह था मां का संघ जननी पर्व या तो फिर कहेंगे मात्री पर्व और इसके बाद में इसके बाद के जो पीरियड है ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां के जीवन में प्रचंड तपस्या के दिन प्रारंभ हुए ठाकुर ने कहा था कि तुम यदि अ भले ही चाहे कलकत्ता तुम भक्तों के घर आक के रहो बीच-बीच में किंतु कामर पुकुर का अपना घर छोड़ना नहीं कभी पर भाता हुआ भालो परम किंतु पर घरो हुआ भालो नहीं ठाकुर जैसे कहते हैं किसी के घर खाना खाना वो ठीक है किंतु किसी के घर रहना बिल्कुल ठीक नहीं है तो माने ठाकुर की आज्ञा का पालन करके कमार पुकुर में रहना शुरू किया वो भी बड़े कष्ट के दिन आखिर में वो श्यामा सुंदरी देवी आकर के मां को जयराम बाटी लेकर आई यह पूरे कष्ट के दिन मां के चल रहे थे और यहां पर त्यागी संतान भी कौन कहां पे है कि कुछ ठिकाना नहीं है स्वामी जी वो पर प्रव्रज्या कर रहे हैं स्वामी जी अमेरिका चले गए हैं शुरू में तो किसी के साथ में कांटेक्ट ही नहीं रखते थे यहां भी भी जितने त्यागी संतान थे वराह नगर मठ में सब इधर-उधर हो गए हैं उसके बाद में आलम बाजार मठ की स्थापना हुई वहां पर भी कोई स्थाई रूप से नहीं रह रहा है ऐसा लगा कुछ समय के लिए कि रामकृष्ण संघ जैसे कि पूरे विश्व में बिखर गया है यहां पर यह अखंडानंद जी है वह कहां तिबेट वगैरह घूमते फिर रहे हैं तो ऐसा लगा कुछ समय के लिए कि क्या एक सेंट्रल अथॉरिटी है एक सेंट्रल पावर है जो कि सबको इकट्ठा फिर से बांध के रखे जिस तरह से दक्षिणेश्वर में होता था वह डाउट था किंतु जैसे ही स्वामी जी अमेरिका से वापस आए फिर से यह सेंटर ऑफ ग्रेविटी सभी त्यागी संतानों को एक साथ में खींच करके एक जगह पर इकट्ठा करने के लिए समर्थ हुई स्वामी जी ने बेलूरमठ की स्थापना की वहां पर सभी त्यागी संतानों को बुलाया और स्वामी जी ने ही मां की सेवा धीरे-धीरे करके उन्होंने अपना यह जिम्मा मठ के साधुओं को दिया फिर यह मां की सेवा उस समय से नियमित रूप से से मठ के द्वारा होने लगी और यह जो मां के जो बड़े कष्ट के दिन थे जहां पर खाने को भी कुछ ठीक नहीं था पहनने के कपड़ों का भी कुछ ठीक नहीं था वो दिन मां की तपस्या के जैसे कि समाप्त हुए और मां बीच-बीच में फिर कलकत्ता आती और इन लोगों के साथ में रहती कलकत्ता में भाड़े के मकान में ही रहती किंतु यही त्यागी संतान उनकी सेवा नियमित रूप से करते और योगेंद्र महाराज ने ने यह मां की सेवा का कलकत्ता का भार उस समय ग्रहण किया था तो यह जो पीरियड था ठाकुर की महासमाधि से लेकर के स्वामी जी के भारत में पुनः आगमन का इसको मैं कहता हूं तपस पर्व अर्थात कि सही में मां को बड़ी तपस्या करनी पड़ी है किंतु देखिए कि स्वामी जी के आगमन के बाद में दो घटनाएं हुई कि तपस पर्व समाप्त होकर के एक नया पर्व प्रारंभ हो रहा है दो घटनाएं कौन सी सर्वप्रथम तो स्वामी जी का अमेरिका से भारत में आगमन और दूसरी घटना है माया स्वीकार वही जो राधू जो रोती रोती इधर से उधर घूम रही थी उसकी पागली मां पागली मां आगे जा रही है किसी एक गुड़िया को लेकर के पीछे पीछे में राधू रोती रोती जा रही है तो वैसे ही जैसे मां के हृदय को एक ऐसा एक झटका लगा अरे मैं जद इसकी नहीं करूंगी संभाल तो और कौन करेगा बोलकर के माने जैसे ही रा को अपने गोद में उठा लिया वैसे ही ठाकुर ने प्रकट होकर के कहा यही है योग माया इसी का आश्रय लेकर के तुम संसार में रहो तो ठाकुर की इस आज्ञा का पालन करके माया स्वीकार करके मां फिर रहने लगी और फिर वहां से बिल्कुल ही नया पर्व मां के जीवन में प्रारंभ होता है कहां कहां से यह भक्त वो सभी मां के पास में आकर के सब आत्म समर्पण करते हैं मां से दीक्षा लेते हैं कलकाता जब मां आती है तब तो भक्तों की भीड़ लगती ही है किंतु साथ-साथ में अभी कुछ भक्तों को यह पता चला कि कलकाता में तो बड़े रिस्ट्रिक्शन है प्रणाम करने में मां के साथ में बात करने में किंतु यदि थोड़ा कष्ट करके जयराम बाटी जाया जाए तो मां बिल्कुल अपनी मां की तरह ही बिठाए गी खिलाएगी बातें करेगी दीक्षा देगी और हमको उनकी सेवा का मौका भी मिलेगा तो फिर भक्तगण का एक पूरा प्रवाह जयराम बाटी गांव की ओर जाना शुरू हुआ तो ये जो ये वो ठाकुर का आत्म प्रकाश पर्वत था यहां पे मां का ये आत्म प्रकाश पर्व है तो इसको मैंने नाम दिया है जगदंबा पर्व मां जैसे कि अभी मानवी नहीं रही सिर्फ मां नहीं रही किंतु अभी मां से उन्होंने गुरु की पदवी गुरु की यह जो कार्य है वो माने प्रारंभ किया है जगत के लिए जैसे कि मां जगदंबा ही बनी हुई है तो तो यह हो गया जगदंबा पर्व माया स्वीकार करने के बाद में दो घटनाएं है जो कि जगदंबा पर्व प्रारंभ होता है स्वामी जी के अमेरिका से भारत आगमन और यह माया स्वीकार राधु का यह दो घटनाओं से मां का यह जो पर्व प्रारंभ होता है तो फिर मां की महासमाधि तक यही पर्व चलता है तो मां के जीवन में यदि मां के प्रसंग को हम डिवाइड करें तो हमको कितने पर्व दिखते हैं कितने ये चैप्टर्स दिखते हैं सर्वप्रथम तो बालिका पर्व जबकि वह जयराम बाटी में थी ठाकुर के विवाह से पहले ठाकुर के साथ में विवाह से पहले दूसरा है विरह पर्व ठाकुर से विवाह तो किया किंतु वही जयराम बाटी में ही रह रही है और फिर तीसरा पर्व है शक्ति पर्व कि जब कि वह कोलकात्ता आई और ठाकुर ने सड़सी पूजा की तब से लेकर के कैंसर होने तक का यह पीरियड शक्ति पर्व चतुर्थ है संघ जननी पर्व यानी कि मां को आसपास में मां को केंद्रित करके सन्यासी संतानों का संग जैसे कि धीरे-धीरे करके एक भालो भाषा एक प्रेम के बंधन में बंधने लगा फिर एक पर्व है कि यह तपस पर्व ठाकुर की महासमाधि के बाद का और जो आखिरी पर्व है जगदंबा पर्व तो इस तरह से मां के जीवन को हम क्लासिफाई कर सकते हैं तो अभी का जो पर्व चल रहा है ठाकुर को कैंसर हो हुआ है यह पीरियड को हम कहेंगे ठाकुर की दृष्टि से आत्मप्रकाश पर्व और मां की दृष्टि से संघ जननी पर्व अच्छा यह श्यामपुकुर में ठाकुर थे ठाकुर की सेहत वहां पर इंप्रूव नहीं हो रही थी तो डॉक्टरों ने कहा कि ठाकुर को कहीं शहर से बाहर खुली हवा में ले ले जाया जाए जिसकी वजह से शायद हो सके कि यह अच्छे शुद्ध हवा पानी से ठाकुर की सेहत थोड़ी इंप्रूव हो तो इस डॉक्टरों की बात को मान्य करके फिर यहां पर गंभीरानंद जी महाराज आगे लिखते हैं कि किस तरह से ठाकुर को काशीपुर लाया गया गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं श्याम पुकुरे आड़ाई मास अस्थान प सु चिकित्सा सते ठाकुरे रोग ना कमिया बरम बाड़ी ते छे देखिया डॉक्टर स्थिर करने ज नगरे बाहर मुक्त वायु पूर्ण कोनो उद्यान बाटी ते ताहा के लया जावा आवश्य श्याम पुकुर में ढाई महीने रहने के बाद में भी और बड़ी अच्छे से चिकित्सा करने के बाद में भी ठाकुर का रोग कम नहीं हुआ किंतु बढ़ता ही चला जा रहा यह देख कर के डॉक्टर ने यह सब ठीक किया कि ठाकुर को नगर के बाहर कुछ मुक्त वायु पूर्ण जहां पर अच्छा सा उजास हो उजाला हो खुली हवा हो सुंदर ये एटमॉस्फियर हो वहां पे किसी उद्यान वाटी में उनको ले आया जाए तो ऐसा सोचा करके ऐसा ठीक किया गया तदनुसार भक्तगण काशीपुर बड़ो रास्ता ऊपरे गोपाल चंद्र घु शेर बाटी वर्तमान 90 काशीपुर रोड भाड़ा लेले एवं सताश अग्र हाय शुक्रवार अंग्रेजी 11 दिसंबर श्री श्री माता ठाकुरानी और सेवक भक्तो देर शहीद ठाकुर शेखाने पदार्पण करीले तो इस लाह के अनुसार भक्तों ने उस समय काशीपुर रोड के ऊपर में काशीपुर के बड़े रोड के ऊपर में गोपाल चंद्र घोष का घर जिसको आज 90 काशीपुर रोड करके पुकारा जाता है जो कि उसका एड्रेस है उसको भाड़े पर लिया और फिर 27 अग्र हाय शुक्रवार अंग्रेजी महीना 11 दिसंबर मां ठाकुरानी अर्थात कि अपनी मां और भक्त संतान गण के सहित ठक ने वहां पर पदार्पण किया अभी इसके बाद में यह पूरा एक विवरण है कि काशीपुर का घर कैसा था उसमें कौन से कमरे कहां पर थे वगैरह तो ये विवरण को मैं स्किप ही कर देता हूं इसको जद आप वहीं पर जाकर के देखेंगे तो बड़ा अच्छे से आपको समझ में आएगा और विवरण पढ़ने से कुछ समझ में नहीं आएगा मैं वहां पर तीन चार बार जा चुका हूं किंतु विवरण यह जो है कि कहां पर कौन सा घर था कहां पर क्या था वो बिल्कुल मेरे सर के ऊपर से चला गया इसलिए मैं इसको स्किप कर देता हूं सीधा चलते हैं कि इसके बाद में क्या होता है ए बाटी ते श्रीमा पुर्बे रही न्याय सेवा करी ते पारी बेन अथ ततो संकुचित था कीते होई बे ना भाभिया तहर अपिश आनंद होया छलो तहा बुलाई पाहुल इस घर में मां पहले की ही तरह सेवा कर पाएगी किंतु यह घर श्याम पुकुर की तरह इतना छोटा नहीं है कि मां को सबसे छुप कर के रहने के लिए सब समय छत के ऊपर जाकर रहना पड़े बड़ी ही अर्ली मॉर्निंग उनको शौच वगैरह कर समाप्त करके बिल्कुल रात को उनको अपने कमरे में वापस आना पड़े दिन में मुश्किल से तीन घंटों की नींद यह सब तपस्या थोड़ी सी कम हुई बोलकर के मां को आनंद ही हुआ होगा यह बात कहने की आवश्यकता नहीं है युवक भक्त गणों एखाने पुर्बे न्याय सेवा बृति निर तो रही लेन युवक भक्त गण पहले की तरह ही यहां पर भी सेवा में निरत हुए एवम तहा दे दृष्टांत व आकर्षण आरो त्यागी दे तथा समावेश होलो और उनको देख कर के उनके दृष्टांत को देख कर के वे लोग जिस तरह से ठाकुर की सेवा करते हैं और साथ में ही साधन भजन करते हैं यह देख कर के ठाकुर के बाकी भी अन्य जो त्यागी संतान थे उन्होंने आकर के वहां पर रहना शुरू किया रूपे श्री रामकृष्ण कंठ रोग के अवलंबन करिया भाभी श्री राम कृष्ण संघ गठित होते लागलो इस तरह से श्री राम कृष्ण देव के कंठ रोग को अवलंबन करके भविष्य का राम कृष्ण संघ गठित होने लगा एवं ताहर केंद्र स्थले अधिष्ठात्री रूपे प्रतिष्ठित रोहिले श्री श्री माता ठाकुरानी और उसके केंद्र स्थल में उसके केंद्र में अधिष्ठात्री रूप से प्रतिष्ठित होली हुई श्री श्री मां ठाकुरानी अर्थात की मां शारदा ए नमग है व श्री मायर जीवनधारा अनेकता पुर्बे न्याय लो इस नए घर में भी मां की जीवनधारा ऑलमोस्ट पहले की ही तरह थी जहा किछु व्यतिक्रम होया लो त श्री श्री ठाकुर सेवा प्रयोजन है जो कुछ भी परिवर्तन हुआ था व इसीलिए हुआ था इसी वजह से हुआ था कि ठाकुर की सेवा के लिए वह आवश्यक था श्री मां एखाने हो साधारण खाद्यान करीत मां यहां पर भी सामान्य खाना बनाती विशेष पथ्य प्रस्तुत करते होले गोपाल दादा प्रवृति च दुई चारी जने शही तीनी निशंक च कथा बोली तेन तरा चिकित्सक निकट प्रस्तुत करार प्रणाली शिख लया जथा समय श्री मा के शश दिखाई दते अभी मां ठाकुर के लिए आहार तो प्रस्तुत कर रही है किंतु चिकित्सक यानी कि डॉक्टर यदि ऐसा कहेगा कि ठाकुर को यह खाना खिलाओ तो फिर जो जिन त्यागी संतानों के साथ में मां निसंकोच बात करती थी उसमें से यह बूढ़ो गोपाल दादा या तो फिर यह लाटू वगैरह वे लोग क्या करेंगे कि चिकित्सक के पास में से किस तरह से ये आहार प्रस्तुत किया जाए बनाया जाए वो सीख लेंगे फिर आकर के मां को बताएंगे मध्या नेर किछु पूर्वे एवं संध्या किछु परे श्री मां ठाकुरे भोज्य बा पानीयो लिया ताहा शयन गृहे उपस्थित हुई तेन सुबह मध्यान अर्थात की दोपहर के कुछ समय पहले और संध्या के कुछ समय बाद मां ठाकुर के लिए जो आहार प्रस्तुत किया गया है और जो जलपान उनको करवाना है वो लेकर के ठाकुर के शयन गृह में उपस्थित होती एवं भोजन कराया निज प्रकोष्ट फिरते और ठाकुर को आहार करवा करके भोजन करवा करके फिर से अपने कमरे में वापस आती ही शकल कार्य तहा के शहा करि बार जन्नो एवं संगनीर अभाव मिटाई बार निमित्त ई समय श्रीमती लक्खी देवी के ताहर निकट आनिया राखा होया चलो यह सब कार्य में सहाय करने के लिए और मां अकेली एक स्त्री है उस पुरुष लोग जहां पर ज्यादा सब सभी तो बाकी तो सब पुरुष ही है मां अकेली स्त्री है तो अकेली बिल्कुल ना पड़ जाए साथ में कोई संगी नहीं हो इस अभाव को मिटाने के लिए लक्ष्मी दीदी को वहां पर लाकर के रखा गया यह लक्ष्मी दीदी अर्थात की ठाकुर के भाई की पुत्री और य यह नबत में भी मां के साथ में रहती थी तो यहां पे भी वह मां के साथ में रहेगी जिससे कि मां को थोड़ा बहुत सहाय भी कर सके और मां को बिल्कुल अकेला न भी महसूस ना हो थोड़ा सा उनको भी एक उनका संगी जैसा मिल जाए तद व्यतीत स्त्री भक्त गण ठाकुर के देखीते आशिया श्री मायर सहीद कखन दुई चारी घंटा कखन बा दई एक दिन काटा या चैत इसके अलावा जो स्त्री भक्त ठाकुर को देखने के लिए ठाकुर के दर्शन के लिए आती वे लोग फिर आखिर में बाद में मां के साथ में दो चार घंटा बिता करके जाती या तो फिर वहां पर दो-तीन दिन रह भी जाती देखिए यह श्यामपुर में यह सब संभव नहीं था और स्त्री भक्त आए रहे मां के साथ में बात करें तो वह तो बड़ा ही कष्ट का समय अकेले रहना है सब काम करना है यहां पर एटलीस्ट जगह इतनी बड़ी थी कि एक एक संगिनी अर्थात लक्ष्मी दीदी को साथ में रह सकती थी और बाकी जो स्त्री भक्त आएगी वह भी रहेगी और मां को कार्य में सहाय भी करेगी लक्ष्मी देवी ठीक कोबे आश छिले तहा अज्ञात लक्ष्मी देवी अर्थात की लक्ष्मी दीदी ठीक कब समय कौन समय वहां पर आई थी वह हमको पता नहीं है स्त्री भक्त वृंद सर्वदा आशीते पारित किना विशेष संदे हो और जो स्त्री भक्त वृंद है वह क्या हमेशा ठाकुर के ठाकुर के दर्शन करने के लिए आप पाती थी मां के साथ में बात करने के लिए सहाय करने के लिए आप पाती थी नहीं इसके बारे में भी संदेह है कारण परवर्ती कटी घटना होई ते इ हाई अनुमान होय जे श्री मां के अनेक समय संगिनी हीन जीवन जपित करते होई तो क्योंकि यह संदेह इसलिए है क्योंकि जो कुछ घटनाएं उस समय की हमारे पास में आई है आ रही है उससे तो ऐसा ही लगता है कि मां को बहुत सारा समय संगिनी हीन ही बिताना पड़ता था उनके साथ में बात करने वाला रहने वाला कार्य में सहाय करने वाला कोई नहीं रहता था काशीपुर बाटी ते जे काठे सड़ छलो उहर धाप बली उच्चता य तो अधिक छलो ज साधारण लोके पखे उठा नामा कष्ट शबद छलो दुर्बल व्यक्ति देर तो कथा ही नहीं अभी काशीपुर में जद आप ठाकुर के कमरे में गए होंगे तो ग्राउंड फ्लोर से हमको पता है कि ठाकुर को फर्स्ट फ्लोर के कमरे में रखा गया था और जो मां का कमरा था वो ग्राउंड फ्लोर पे था तो अभी बीच में एक सीढ़ी आती थी मां को आहार प्रस्तुत करके यह सीढ़ी चढ़ कर के ठाकुर के कमरे में जाना होता था अभी जिन लोगों ने यह सीढ़ी चढ़ी है उनको पता है कि उसके ये जो स्टेप्स से बड़े ही ऊंचे थे अर्थात कि जनरली क्या होता है स्टेप्स की हाइट थोड़ी छोटी रखी जाती है जिससे कि सीढ़ी चढ़ने में सुविधा हो किंतु यह कम जिन्होंने यह घर बनाया होगा सीढ़ी बनाया हो गई तो पता नहीं उन्होंने सीढ़ी के जो स्टेप्स थे उसकी हाइट इतनी ऊंची रख दी थी कि यदि सामान्य व्यक्ति को भी चढ़ना मुश्किल हो जाता था और यदि यह व्यक्ति दुर्बल होगा तो तो और भी मुश्किल होगा तो यह ठाकुर को ऊपर में यदि ले ग ले जाया गया वह तो चलो किसी उठा कर के ले गए होंगे किंतु नियमित रूप से नीचे आना संभव नहीं था और मां के लिए भी सीढ़ी चढ़ना कठिन था एक दिन आड़ शेर दूध समेत एकटी बाटी लोया ई सीढ़ी ते उठी बार काले श्रीमा घरिया पड़िया जा एक दिन ढाई शेर दूध के साथ में एक बाटी लेकर के एक कटोरी लेकर के मां उस सीढ़ी को चढ़ रही थी एका एक पता नहीं चक्कर जैसा आया कि क्या हुआ मां बेचारी सीढ़ी पर से गिर पड़ी य हाते दूध तो नष्ट होई लोई इससे दूध तो बिगड़ मतलब दूध तो मतलब चला ही गया हाथ से वो तो नष्ट हो ही गया जमीन पर गिर कर के अधिक अतु गोडा लीर हाड़ स्थान चु तो होई ले श्रीमा चलत शक्तिहीन होई ले किंतु साथ-साथ में ही मां का पेर में फेक्चर हो जाने से मां मां को चलना भी मुश्किल हो गया मां मां को चलना उस दिन से बंद हो गया श्री जुग तो बाबूराम आश श्री मां के धरिया तुली लेन परे ओई संधि स्थल फुलिया उठी लो उस समय बाबूराम महाराज भविष्य के स्वामी प्रेमानंद महाराज आ कर के मां को सहाय करके उनको उनके कमरे में कैसे भी ले गए बाद में जहां पर फैक्चर हुआ था वह जगह भी फूट गई श्री श्री ठाकुर इ हाते अत्यंत व्यथित हुया छले यह घटना से ठाकुर बड़े ही व्यथित हुए थे उनको बड़ा ही दुख हुआ था विशेष तो ही समय श्री मायर से बार ऊपर विशेष भावे निर्भर करई तिनी आपना के सहसा कतो कोटा निशा बहुत करिया था की बहन और खास करके उस समय में मां की सेवा पर ही ठाकुर निर्भर थे तो अभी मां के साथ में इस तरह से एक्सीडेंट हुआ पैर में फैक्चर हो गया या तो फिर डिसलोकेशन हो गया यह जो जहां पर जॉइंट होता है और मां चल नहीं पा रही है सीढ़ी उठना तो बिल्कुल दूर की बात है तो ठाकुर जैसे कि अपने को असहाय महसूस करने लगे किंतु सदानंद मय महामानव भाषाए ही सम वेदना निर्भरता अदभुत भावे आत्म प्रकाश करिया से दुखेर मध्य सकले हृदय आनंद हिलो तुली लो किंतु ठाकुर तो थे सदानंद मय महापुरुष इस तरह की गंभीर घटना से भी ठाकुर इस गंभीर घटना को भी ठाकुर एक तरह से किस तरह से उसमें हास्य और एक आनंद का संचार करते हैं वह देख कर के बाकी के हृदय में भी जिस तरह से एक आनंद और हिलोल का प्रवाह उठा देखिए घटना गंभीर है किंतु इस गंभीर घटना के सामने बिल्कुल अभी अरे मेरे साथ में इस तरह का डिजास्टर हुआ मैं क्या करूंगा मैं असहाय हूं अभी ठाकुर को जो कष्ट हुआ होगा यही कष्ट तो उनके त्यागी संतानों को भी तो हुआ है कि मां के साथ में इस तरह से एक्सीडेंट हुआ और मां को इस तरह से इंजरी हुई तो सभी त्यागी संतान भी बड़े ही उस समय दुखित हो गए होंगे तो यह दुख का निवारण करने के लिए ही जैसे कि ठाकुर एक तरह से रंग रस करते हैं तीनी बाबूराम के बोली लेन उन्होंने बाबूराम महाराज को कहा ताई तो बाबू राम एकन की होवे अरे व तभी तो बाबू राम अभी क्या होगा खाबर उपाय की होवे खाने का उपाय क्या होगा केमा खाबा ब कौन मुझे खिलाएगा ठाकुर तखन मंडोत श्री मा वहा पर लया गया खाते ठाकुर उस समय मंड नाम का कुछ ते होंगे पता नहीं क्या और श्री मां उसको बना करके ऊपर में ले जा करके ठाकुर को खिलाती श्री मां तखन नथ परिते मां उस समय नाक में नथ पहनती वो जो नाक में पहनने वाली नथ आती है वो ठाकुर ताई ना के हाथ दिया एवम नथे आका अंगुली खराया इंगी बाबूराम के बुझाया बोली लेन ओ बाबूराम ई ज ओके त ड़ी करे माथा तुले एखाने निते पारी अर्थात की अभी नाक में नथ पहनती थी तो ठाकुर ने अभी इस तरह से उंगली से इस तरह से इशारा करके अपनी उंगली घुमा करके इस तरह से इशारा किया मां का नाम नहीं लेकर के य इशारा करके वो समझा रहे हैं कि अरे बाबूराम तुम एक काम करोगे तुम क्या उसको सर के ऊपर में एक बास्केट में बिठा कर के ले आ पाओगे क्या सुनिया श्री जुक्तो नरेण और बाबूराम हसिया खून यह जैसे ही सुना ठाकुर के मुंह से और ठाकुर का यह जो मैंने एक इशारा करना ठाकुर तो रंग रसिक थे ना व हमको पता है कि किस सब लोगों की नकल करते थे कितने अपने वो शिष्य को हंसाते थे तो यहां पर भी ठाकुर ने जिस तरह से कहा उससे यह दोनों बाबूराम और नरेद हंस हस करके उनका पेट दर्द होने लगा यह हाशिया खून बहुत ही हसे तीन दिन परे श्री मायर पायर बथा उपस होले बालक भक्तगण ताहा के धरिया पपरे लया जाते तीन दिन दिन के बाद में मां के पैरों की व्यथा थोड़ी कम हुई उसके बाद में यह बालक भक्त मां को सहाय करके उनको सीढ़ी ऊपर सीढ़ी चढ़ा कर के ऊपर में ठाकुर के कमरा में ले जाते एक कोई दिन गोलाप मा मंड प्रस्तुत करिया ठाकुर के खाबाई बार भार लिया चले यह कुछ दिन गोलाप माने यह आहार प्रस्तुत करके ठाकुर को खिलाने का भार लिया था जवाबदारी उन्होंने ली थी अच्छा अभी इसके बाद का अभी हम कन देखें ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा देखिए इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ना अपना भारत का उत्थान अभी जो कि फ्रीडम मूवमेंट की जो फर्स्ट जनरेशन थी सभी लोग स्वामी जी का अवदान एकदम स्वीकार करते थे वो नेताजी सुभाष चंद्र बोस हो न कि वन गांधी जी हो जवाहरलाल नेहरू हो सरदार पटेल हो जो फर्स्ट जनरेशन ऑफ फ्रीडम फाइटर्स थी उन्होंने सभी ने स्वामी जी का अवदान स्वीकृत किया किंतु बाद बाद में यह पता नहीं यह सेक्युलरिज्म के चक्कर में हम ऐसे फंस गए कि यह जो ये जो क्या वो थियोसोफिकल सोसाइटी वाली एनी बेसेंट उसका अवदान जैसे कि स्वामी जी के अवदान से बड़ा है क्यों बिकॉज शी इज अ सेकुलर एंड स्वामी जी वाज अ साधू हिंदू साधु थे तो ये आजकल की जनरेशन य स्वामी जी का जो अवदान था म सिर्फ स्वामी जी का नहीं ठाकुर ने ब्रह्म कुंडली नहीं जागृत की जो ठाकुर का मां का स्वामी जी का भारत के उत्थान में जो अवदान है आज किसी को पता नहीं है हम लोग जो भीतर वाले हैं उनको छोड़ कर के कोई स्वीकार भी नहीं करेगा और हम यदि कहेंगे कि इनका ये अवदान है तो बोलेंगे अरे आपके गुरु है तो आप तो बोलेंगे ही ना उसमें कौन सी बड़ी बात है ट्रेस अस उनका इन्फ्लुएंस ट्रेस करके बताओ फ्रीडम मूवमेंट तो पूरा कांग्रेस ने किया है बाद में डेमोक्रेसी हुई है तो डेमोक्रेसी हमने चलाई है बात वो नहीं है कि आपको ऊपर ऊपर से क्या दिखता है ये जो ग्राउंड लेवल पे लोगों के हृदय में सहृदयता है बड़ा ही गरीब होने के बावजूद हमने यह सोशल कोहेजिया आधे लोगों को मार करके वह खत्म नहीं कर दिया जैसे कि चाइना रशिया में हुआ है यह कैसे हुआ यह भूदान मूवमेंट यह अपना वो विनोबा भावे का वो जहां पे वो गांव-गांव जाते हैं जमींदार को कहते हैं आपकी जमीन किसानों को दे दो कौन से देश के किसान जमींदारों ने अपनी जमीन किसानों को दी है बिना ब्लड के क्या यह लैंड रिफॉर्म हुआ है किसी देश में यह सब भारत में हुआ है और इसके पीछे में जो स्पिरिचुअल उनका यह जो था भूमि को सिंचन किया स्पिरिचुअलिटी से दैट इज द रीजन किंतु अभी इसको ट्रेस करना बड़ा मुश्किल है आपको एक बड़ा एक अपना जब तक अपने भक्तों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं बढ़ जाएगी फिर यह भक्त उसको ओपनली स्वीकार नहीं करेंगे तब तक ये उनका तीनों का अवदान जैसे कि अदृश्य हो जाएगा अपने देश के उत्थान के पीछे में क्योंकि ठाकुर ने ही कहा है कि साधना करनी है मन में वन में और कोने में तो अभी इतना बो लेने के बाद जो दिखावा करेगा य अरे म माला जो पहनते हैं ना गले में वो भी वो सब आपस आपस में बोलते देखा वो माला पहन रहा है कुछ कुछ साधु लोग माला पहनते हैं रुद्राक्ष का तो वो भी एक दिखावे की तरह पसंद नहीं किया जाता भले पहनते हो आपने तो देखा ही होगा भले पहनते हो किंतु इस तरह से वो ये माला पहन रहा है अरे उ साधु हो कर के माला पहनना ये भी अपने यहां पे देखिए मेरे साथ में भी सिमिलर स्टोरी अभी देखिए मैं आई बिलोंग मैंने ये जैन ट्रेडिशनल साधु कैसे होते हैं मने ये दोनों एक्सट्रीम आप जद ये भक्ति भाव इकोन की तरह नहीं दिखाएंगे तो फिर ये तपस्या का भी भाव भी आप ज्यादा यहां पर नहीं दिखता है तो अभी क्या है कि दिगंबर साधुओं को देखना माने कि वस्त्र तक नहीं पहनते खड़े-खड़े खाना खाएंगे इतना दो हाथ में जितना भी आया खाना खाना है और यदि ट्रेवल करना है तो पैदल चरना है एक्सट्रीम ऑस्टेरिटी यह एक एक्सट्रीम है दिखावा का तो एक्स्ट्रीम ऑस्टेरिटी एक दूसरा एक्सट्रीम है तो मैं इस सब ट्रेडिशनल मड़ता अपने आश्रम में उससे पहले व वो अर्थक्वेक रिलीफ के लिए हमारे शहर में वो प्राइवेट सेंटर था तो वहां पर मैं कुछ समय से जाया करता था मैंने उनको बोला कि मुझे रिलीव करना है नहीं साधुओं को नहीं पहचानता कुछ पढ़ा भी नहीं कुछ कुछ भी नहीं देयर इज नो बैकग्राउंड जस्ट रिलीफ करना है बोल कर के गया था तो जैसे ही मैं लिमडी आश्रम में एंटर हुआ सामने देखा एक बड़ी सी कॉलिस कार पड़ी हुई है तो मैंने सोचा कि पहले तो मैंने सोचा कोई डिवटी आया होगा इस इतनी बड़ी लग्जरियस कार में माने वो कार होगी आश्रम की दैट इज ओके जीप बीप होती है वो मने खटारा जीप पुराने डंक की तो एकदम नई ली हुई कोली इस मने तो लक्जरियस कार है पहले तो मैंने सोचा कि किसी डिवोटा की होगी किंतु पता है कि अपनी कार पर नाम लिखा है राम कृष्ण मि लिमडी ऐसा करके बड़े अक्षर से लिखा था मैंने सोचा यह कैसा आश्रम है कैसे साधु इतनी लग्जरियस गाड़ी में घूमते हैं उसके बाद में भीतर गया तो कमरा बमरारा सब ठीक ठाक है खाना चल रहा था तो मुझे कहा कि आओ बैठ के खाना भी सब ठीक ठाक टेबल पर बैठ के खाना खा रहे मैंने कहा ये किस तरह के करप्ट साधु है प ये राजा महाराज के साथ में दो तीन बार हुआ है एक कॉलेज का प्रोफेसर राजा महाराज को दर्शन करने के लिए आया राजा महाराज का भी जद उसका पता नहीं इ महापुरुषों को भीतर से पता चल जाता है उसका क्या एटीट्यूड है तो देखा वो दर्शन करने को आ रहा है राजा महाराज वहां पे वो तालाब के किनारे बैठ कर के वो मछली पकड़ रहे हैं वो वो जो मछली पकड़ने का वो आता है उससे तो वो देख रहा है कि ये किस तरह के साधु है वो बैठे-बैठे मछली पकड़ रहे हैं और वो फिर वेट कर रहा है उनके आने के लिए राजा महाराज गए ही नहीं फिर वो निराश हो कर के चले गए फिर उनको दो तीन दिन के बाद लगा कि अरे नहीं ये जो मेरे मन में उनके प्रति नेगेटिव भाव आया ना बिल्कुल गलत है मैं बाहर से कैसे सोच करके देख लिया कि ये कैसे ऐसे साधु है फिर से गए यह सोच कर के कि इस तरह से नेगेटिव मुझे पहले असेसमेंट नहीं करना है उस दिन गए तो राजा महाराज जाकर उनको मिले अभी देखिए राजा महाराज को जैसे भीतर की बात उनकी पता चल गई कि पहली बार वो एक तो प्रेजुड हो गए थे तो नहीं मिलना है अभी प्रेजुड पथर से ऑटोमेटिक चला गया अभी जाकर के मैं मिलूंगा दोनों तरीके से एक ओवर्ट डिस्प्ले ऑफ रिलीजियोसिटी वो भी नहीं और फिर ये एक ओवर्ट डिस्प्ले ऑफ रिटी वो भी नहीं देखिए यह जो कर्मयोग जो है अपना अब जैसे कि मैं लीमड़ी का ही उदाहरण दूं तो वहां पर मुझे कहा गया कि रिलीफ चल रहा है थोड़ा सा कंप्यूटर पर काम करना है तो उस समय मुझे प्रतिदिन हर घटना में ऐसा ल अरे इनके पास में गाड़ी है अरे इतना अच्छा कमरे में रहते इतना अच्छा खाना खाते अरे कंप्यूटर पर काम करते हैं किंतु हम लोग तो वर्किंग साधु है तो यहां पर जो अपने सीनियर साधुओं से जो बात होती है ना लोग कहते हैं देखो तुम्हारी ऑफिस में सब तरह की तुमको फैसिलिटी अवेलेबल रहेगी एसी भी होगा कंप्यूटर भी होंगे तुम्हारी ये वर्कर्स भी होंगे स्टाफ होगा सब कुछ होगा क्योंकि इसके बिना तो काम होने नहीं वाला है तो अपने कमरा बिल्कुल सीधा-साधा होना चाहिए प्लेन होना चाहिए उसमें किसी भी तरह का ये जो फैसिलिटी तुम उसमें बिठा होगे तो फिर हम लोग गुलाम हो जाएंगे फैसिलिटी के तो इस तरह से हमको समझ कर के यह स्प्लिट करना है अपना यह वर्किंग लाइफ है अपना यह पर्सनल लाइफ है और गंभीरानंद जी महाराज वगैरह का जो पोस्ट यर उनका खुद का लाइफ स्टाइल देखेंगे और मैं तो बेलोर मठ में जवाइन किया है उस समय रिविर स् मरन जी महाराज जनरल सेक्रेटरी थे तो अभी उनके ऑफिस में जाएंगे तो एक तरह का आपको दिखेगा फिर हमारा नाइट क्लास वी आर फॉर्चूनेटली लेते थे तो उनके कमरे में होता था तो वो कमरे में जो ऑस्टेरिटी दिखता था वो एकदम ये यर दिखता था कि वो जो ऑफिस में जनरल सेक्रेटरी है कमरे में साधु है अभी अभी जैसे देखिए राजकोट के पब्लिकेशन का ही वहां पर सब फैसिलिटी थी किंतु वहां से जब मैं आया तो अपने कपड़े और अपनी किताबों को लेकर के आ गया बाकी सब वहीं पर तो यह हमको सब समय याद रखना है ट्रांसफर होगी तो कपड़े हैं किताबें हैं कुछ एसेंशियल चीजें है इसी को लेकर चलना है इसके बाद में सब कुछ रह जाएगा वहां पर जिसके साथ में आपने रिलेशनशिप बनाया जिसके साथ में फ्रेंडशिप किया जो भी आपके टी थे व सब वहां पर रह जाएंगे आप फोन पर बात करेंगे य ऑनलाइन क्लास लेंगे किंतु फिर वह मिलना गप लगाना वो सब नहीं होने वाला है देखिए मॉडर्निटी भी ऐसा है ना कि जैसे ये पहले ऐसा होता था आपने एक जगह छोड़ी तो मतलब सब कुछ छूट गया किंतु अभी य मॉडर्निटी की वजह से बहुत सारी चीजें अपने कमरे में भी आ जाती है सो अपना ऑर्डर देखिए यह भी एक डिबेट बीच में चला था जब बिल्कुल पहली बार मोबाइल फोन आना शुरू हुए थे तब यह डिबेट चला था कि साधुओं को मोबाइल फोन रखने देना चाहिए कि नहीं एक नियम बना देना चाहिए किन तो देखिए कि अपने ऑर्डर का जिस तरह से कांस्टिट्यूशन बना है स्वामी जी बिल्कुल मिनिमम रूल्स रेगुलेशन चाहते थे कहते थे कि अपना ये जो डिस्क्रिमिनेशन है ना विवेक उसी पर चलो नियम बना कर के तुम फिर नियम का भंग जब होगा फिर वो एक पूरा नाटक चलेगा कि अरे इसको पनिश करो ये वो सब अपने विवेक पे चलो सो दैट इज वन थिंग के एक है अपने ऑर्डर में कि मॉडर्निटी आ रही है तो ऐसा कोई नियम नहीं बना देते हैं कि तुम इसका यूज करो इसका यूज मत करो जस्ट यूज योर विवेक अभी देखिए ठाकुर ने जैसे कहा कि सन्यासियों को स्त्री के सामने भी नहीं देखना है यहां तक कि जा रहे हैं जमीन पे वो स्त्री रूपी एक जद एक गुड़िया जैसा पड़ा है स्त्री के आकार की मिट्टी की प्रतिमा पड़ी है तो उसके सामने भी नहीं देखा है ऐसा ठाकुर ने कहा है कथामृत में लिपिबद्ध है किंतु फिर भी अपने संघ में इस तरह से इसका शब्द सह पालन नहीं होता विवेक प छोड़ा गया है आपको कार्य तो करना ही पड़ेगा स्वामी जी का खुद का देखिए अमेरिका गए थे तो सब स्त्री भक्त ही थे कि जिन्होंने स्वामी जी की संभाल रखी थी उनको वहां पर वो वेलकम किया था वगैरह सो हियर वी हैव टू यूज अवर विवेक इवन जो मैंने ठाकुर ने लिटरली जो कहा है मने एकदम स्ट्रिक्ट जो बात कही है उसका भी जैसे कि हमने उल्लंघन किया है कुछ-कुछ बातों में पैसा स्पर्श ही नहीं करना है अगेन यह बात अपने यहां पर ये कैशियर महाराज पैसा लेकर के दिन रात बैठे रहते हैं किंतु कैशियर महाराज की जो कैश है वो वही ऑफिस में ही रहती है उनके कमरे में नहीं जाएगी सो दिस इज लेफ्ट टू अवर विवेक कि आप ये जो रूल्स है या तो फिर यम नियम है उसका पालन कैसे करेंगे अपने जीवन में ऐसा नहीं है कि प्रॉब्लम नहीं होते हैं कोई भी इंस्टिट्यूशन होगा प्रॉब्लम्स होने ही वाले हैं नो वन इज 100% परफेक्ट माया के जगत में कोई भी व्यक्ति 100% परफेक्ट नहीं नहीं हो सकता कोई भी इंस्टिट्यूशन 100% परफेक्ट नहीं हो सकता किंतु आप रिलीजियस इंस्टीट्यूशंस का हिस्ट्री देखिए बुद्धिज्म का बुद्धिस्ट संघ का हिस्ट्री देखिए या तो फिर यह क्रिश्चियन चर्च का हिस्ट्री देखिए तो कोई भी इवन व वो भी तो अवतार के द्वारा ही प्रारंभ किए गए थे तो ऐसा तो नहीं है कि उन्होंने अपने हज 2000 3000 साल के इतिहास में कभी कोई गलत कार्य नहीं किया है ऐसा नहीं है बहुत सारे घटनाएं हुई है जो कि इंस्टिट्यूशन के ऊपर में लांछन स्वरूप है बट अल्टीमेटली दे हैव डन मोर गुड देन दे हैव डन बैड कोई भी इंस्टिट्यूशन उसका क्या है या उसका मतलब किस तरह से आकलन करेंगे इतने सारे लोगों को उन्होंने बेनिफिट पहुंचाया यदि कुछ इधर-उधर हो भी गया तो वो क्षमा के पात्र है या तो फिर कहेंगे विद इन द लार्जर स्कील इतना तो होगा ही होगा नो वन कैन मेक इट 100% परफेक्ट माने इन लोगों ने इतनी तपस्या करके रख दी है कि इधर उधर थोड़ा होगा भी इंटरेस्ट रेट बो बैक के कैपिटल रिजर्व होते इना कैपिटल रिजर्व रखो य शड बी एबल ट ल ये अपना कैपिटल रिजर्व ठाकुर म स्वामी जी रख के गए हैं अब जितनी गड़बड़ करना चाहो कर लो यहां प है ना जो ये मां का जो प्रकाश पर्व स्वामी जी के आगमन के साथ में मैंने क्यों रखा है मैं भी समझता हूं जो आपने कहा कि माया स्वीकार जब से की है वो माया स्कार और स्वामी जी का देहांत ये महासमाधि यह आसपास में हुआ है तो वहां से प्रारंभ नहीं करके स्वामी जी के भारत आगमन से मैंने इसलिए किया है कि सबसे पहले तो मां को ये जो अंतरंग भक्त थे उन्हीं को मां को स्वीकार करना था जैसे यह वो बड़ी फेमस घटना है विज्ञान महाराज की कि स्वामी जी ने विज्ञान महाराज को कहा पेशन जाकर के मां को प्रणाम करके आओ तो विज्ञान महाराज प्रणाम करने को जा रहे हैं स्वामी जी पीछे पीछे जाए विज्ञान महाराज को पता नहीं है वो वो जो खड़े खड़े या जो वो जो प्रणाम होता है वो कर दि है मने वो फिर वो वापस जा रहे देखा पीछे में स्वामी जी खड़े स्वामी जी ने कहा अरे पेशन साष्टांग प्रणाम करो त कहीं जाके साष्टांग प्रणाम किया तो ये जो अंतरंग भक्तों के भीतर में भी किसी किसी को मां की महिमा का पता नहीं था तो मां की महिमा को जो प्रकाश किया जिसने वो स्वामी जी ने और वो भी इस वापस आने के बाद में सो वहां से जो मां का आत्म प्रकाश पर्व प्रारंभ होता है कितनी घटनाए स्वामी जी वो गंगाजल पीते थे और करते थे को प्रणाम करने के लिए बार-बार गंगाजल अपने सर पर डाल रहा है तो वो जो साथ में थे उन्होंने कहा स्वामी जी आप बीमार हो जाएंगे इतना गंगाजल डालेंगे तो स्वामी जी कहते विदेश से आ रहा हूं तो पता नहीं उन लोगों के कर्म लेकर के मां को प्रणाम करने को जा रहा हूं यदि शुद्धता नहीं होगी तो कैसे चलेगा और फिर राजा महाराज मां को प्रणाम करने को जा रहे हैं तो वर्णन है क्योंकि पैर धुज रहे है पूरा वो ऊपर में जाकर के मां के साथ बात करने का वो साहस नहीं हो रहा है तो राधु के साथ बातें करना शुरू कर देते हैं इतना उनको पता था मां की महिमा का अच्छा बाकी किसी को पता नहीं था इस सब आराम से जा पता था किंतु फिर रेवरेंस का भी एक तारतम्य होता है अब जैसे योगेन महाराज तो मां की सेवा करते थे योगन महाराज ने शरत महाराज को कहा नर इतना बड़ा करके बोल रहा है सब कुछ जो भी हाथ में लेता है सब बड़ा कर देता है शरत महाराज कंप्लेन करते हैं तो अभी क्या किया जाए तो योग महाराज ने कहा तुम मां के पास जाओ सोट रेवरेंस बट इवन विदन दिस उसम भी डिग्री ऑफ ये था सो हाईएस्ट यद कहा जाए तो राजा महाराज और स्वामी जी यह बिल्कुल सही है कुछ कुछ इंसिडेंट है जैसे कि पगली मामी ने उनको वो मारने को आई थी वो जला हुआ लकड़ी लेकर के तो इमीडिएट माने श्राप दे दिया कि तुम्हारा हाथ जो है वो गल के गिर जाएगा तो बाद में वह पागली मामी को कुष्ठ रोग हो गया तो माने रेर इंसिडेंट है स नहीं है ऐसा नहीं है रेर इंसिडेंट कि माने भी दे दिया है और मां नाराज भी हो गई है वो जो जयराम बाटी गांव में वो एक क्रांतिकारी की गर्भवती पत्नी को पुलिस वाले लेकर जा रहे थे तो उस समय मां ने एकदम नाराज होकर कहा कि क्या वोह कोई जवान लड़का नहीं था कि पुलिस वाले को दो चाटा मार के वो स्त्री का उद्धार करते उने मां का वो रुद्र स्वरूप देकर के बाकी लोग भी डर गए थे कि पता नहीं मां भी क्या कर बैठेगी तो है ऐसे इंसिडेंट किंतु जैसे आपने कहा बड़े ही रेर है तो किंतु देखिए कि अब जैसे कि सृष्टि स्थिति प्रलय तीन को मिलकर के ही तो ईश्वर है भले ही चाहे हम तीनों वर्क जो है तीनों फंक्शन है उसके तीन देवता बना दिए हैं कि वह सृष्टि के देवता ब्रह्मा फिर वह जो पालन के देवता है विष्णु और संहार के देवता है शिव किंतु जगदंबा के भीतर में तीनों गुण होने चाहिए यह थिरी तो स्वामी जी को पता थी अभी दर्शन भी हुए होंगे और थिरी भी पता थी सो ही मस्ट हैव कि एकदम एक्यूरेट एनालिसिस किया होगा किंतु देखिए मठ में जो ऐश्वर्य बाद में हुआ स्वामी जी के रहते रहते ही मां के रहते रहते ही मठ में जो ऐश्वर्य प्रारंभ हुआ वह भी तो मां की कृपा से आज आज देखिए अभी आज जो संघ का ऐश्वर्य है अभी वो कुछ दिनों पहले ही बात हो रही थी कि इस साल का बजट ना कि वो जो टर्नओवर ना कि जो भी कहते हैं ना कि 2000 करोड़ का है तो सुहितानंद जी आए हुए थे तो व बोल रहे थे कि अरे हमारे टाइम में व तो जनरल सेक्रेटरी थे और उससे पहले भी तो एडमिनिस्ट्रेशन में काफी समय से थे तो एक करोड़ का डोनेशन मिल जाने से तो हम लोग सर पर हाथ रख करके बैठ जाते थे कि इसको कहां पर खर्च करेंगे कैसे करेंगे क्योंकि प्रॉब्लम य है कि 100% नियम के अनुसार होना चाहिए उड़ाना है तो आप उड़ा देंगे वो कोई प्रश्न नहीं है किंतु विदन द रूल्स एंड रेगुलेशन आपको खर्च करना है वो प्रॉब्लम है तो अभी वो 2000 करोड़ का अपना बट है तो किस तरह से देखिए कि संघ का विस्तृत करण हो रहा है तो ऐश्वर्य तो मां का ही दान है बाकी ठाकुर के भरोसे रहते तो पता नहीं क्या होता आज हम लोग सब पेड़ के नीचे रहते माने तो प्रार्थना की थी ना व वहां पर बध गया जाकर के वह बौद्ध साधुओं का मठ देख कर के कि ठाकुर उनके लिए कुछ कर दो व्यवस्था माने प्रार्थना नहीं की होती तो पता नहीं क्या होता ये सेकुलरिज्म ने ये साधु संत हुए जिन्होंने गांव-गांव शहर शहर जाकर के ये आध्यात्मिकता का प्रचार किया और जिसके बेस के ऊपर में आज का मॉडर्न भारत खड़ा है तो उसका अवदान जैसे हम लोग भूल ही गए हैं एक्चुअली धर्म के साथ में सबसे बड़ा प्रॉब्लम बताऊं मैं मैं खुद यह बात को फेस किया हूं मैं एक्सट्रीमली एंबिशियस था कि बहुत कुछ करना है लाइफ में बहुत बड़ा एक एम होना चाहिए किंतु धर्म क्या है धर्म जैसे कि हमको एक जगह पर बिठा कर के रखता है बोलता है कुछ मत करो अपने को डिफेंड मत करो एकदम कायर की तरह रहो यह जो धर्म का एक बाहरी स्वरूप पॉपुलर स्वरूप है ना वो मने है नहीं किंतु एक यंगर जनरेशन को ऐसा लगता है कि धर्म कौन करेगा वो बुढ़ा हो गया है फिर वो एंबिशन चली गई है कार्यक्षमता शून्य हो गई है तो अभी जाकर के धर्म करो आखिरी कुछ दिन जितने पाप किए होंगे वो ल जाएंगे स्वर्ग में जाएंगे स्वर्ग कामना के लिए यह सब करो यह सब से मैं कभी रिलेट नहीं कर पाया किंतु बात ऐसी हुई कि मेरी एंबिशन जिस डायरेक्शन में जा रही थी उसी डायरेक्शन में मैंने देखा स्वामी जी की भी एंबिशन जा रही है जगत कल्याण करना है फिर जगत कल्याण के लिए अपने को जो मॉडिफाई करना है वह तो बाद में आएगा किंतु एक जो एक्सट्रीम मेरी एंबिशन थी पूरे जगत को मैं परिवर्तन करके जाऊंगा एंड सो दैट स्वामी जी है सेड द सेम थिंग अभी देखिए कि यह जो आज की जनरेशन है उन लोगों में एक्सट्रीम एंबिशन है कि वर्ल्ड लेवल पर कुछ करना है उससे कम में तो चलेगा ही नहीं उससे मतलब मनुष्य जीवन को सार्थक कर देना है आइर अर्न अ लॉट ऑफ मनी गैदर लॉट ऑफ पावर चेंज रेवोल्यूशन इज द वर्ल्ड ऐसा कुछ करके जाना है तो स्वामी जी की एंबिशन गोज द सेम वे जस्ट कि आपको धीरे-धीरे करके वो फिर अपने को मॉडिफाई करना है कि इफ यू वांट टू बी सक्सेसफुल रियली सक्सेसफुल देन यू नीड योगा एंड वेदांत इन योर लाइफ बट दैट विल कम लेटर ऑन फर्स्ट टू रिकॉग्नाइज कि व्हाट मेक्स यू वीक इज अधर्म व्हाट मेक्स यू स्ट्रांग इज धर्म ये तो धर्म इज फॉर स्ट्रेंथ फॉर एंबिशन फॉर म जो आपके प्राण मतलब जीवन होना चाहिए लाइवलीनेस होनी चाहिए यह जॉय यह ठाकुर के जीवन में जो आनंद है आखिरी समय चल रहा है मां गिर गई है सभी के मन में विषाद है उसमें भी ठाकुर हसी मजाक करवा लेते हैं सो दिस जॉय दिस एंबिशन दिस स्ट्रेंथ दिस पावर वी हैव टू अंडरस्टैंड दिस इज एन एसेंशियल पार्ट ऑफ धर्म फर्स्ट वी रिकॉग्नाइज दिस देन स्लोली एंड ग्रेज वी विल स्टार्ट टू मॉडिफाई अवर लाइफ दैट इज अ मेन थिंग वो कर ही नहीं पाएंगे क्योंकि उन्होंने देखिए उन्होंने तो सक्सेस देखी है तो अभी बहुत बार ऐसा होता है छोटे गांव से आ रहे छोटे शहर से आ रहे सक्सेस ही नहीं देखी अभी जिन लोगों ने सक्सेस देख ली है दे विल नॉट बी एबल टू कंटेन देर एंबिशन उनको कहो त्याग करो एंबिशन को छोड़ दो दे विल नेवर बी एबल टू रिलेट विथ अस उनको कहो कि बी मोर सक्सेसफुल देन यू आर बट इन ऑर्डर टू बी इवन मोर सक्सेसफुल यू विल हैव टू मोडिफ मॉडिफाई योर लाइफ इन सर्टेन वेज