प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ पाठ कर रहे थे और उसमें भी हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज हमको बताते हैं कि जो देवी है उसका जननी स्वरूप इसकी आराधना करने की मनुष्य की इच्छा या तो फिर साधक की इच्छा क्यों रही? क्योंकि वह इस जननी के भीतर में अपनी मां का एक प्रति छवि देख सकता है। अपनी मां को देख सकता है। बचपन से ही हम देखते आ रहे हैं कि हमारे प्रति मां का अखंड प्रेम रहता है। हम कि हम कुछ भी करें उससे मां के प्रेम का कोई रिलेशन नहीं है। इस अर्थ में कि यदि मैं अच्छा कार्य करूं तो फिर मां मुझे स्नेह करेगी। यदि मैं कोई कुछ मैं मिसिफ करूं या मैं कुछ भी गड़बड़ करूं तो फिर मां मुझे प्रेम नहीं करेगी। ऐसा कभी नहीं होगा। मां मुझे प्रेम करती रहेगी। चाहे मैं अच्छा कार्य करूं ना कि ना करूं। तो यह जो अनकंडीशनल लव जो हम अपनी मां से पाते हैं वही हम ईश्वर में देखना चाहते हैं और इसीलिए ईश्वर का जननी स्वरूप आराधना करने के लिए उपासना करने के लिए सबसे ज्यादा सहज है। यदि हमारी गलती हो भी जाए उपासना में यदि हमारे कर्म अच्छे हो ना कि बुरे गलती से बुरा कुछ कर दिया तो भी मां उसको माइंड नहीं करेगी हमको स्नेह और प्रेम करती रहेगी तो इसको प्राप्त करने के लिए हम ईश्वरी में भगवती में जननी स्वरूप देखना चाहते हैं और यह जननी स्वरूप है वह उसकी आराधना करने की यह साधक की जो मनोवांछा थी उसी को पूर्ण करने के लिए जैसे कि जगदंबा ने इस बार मां शारदा का स्वरूप धारण किया और हमारे बीच में वह अवतरित हुई है। तो गंभीरानंद जी का यह जो पैसेज है वन ऑफ द मोस्ट ब्यूटीफुल इन आवर लिटरेचर वो हम पाठ कर रहे थे। थोड़ा सा आगे देखते हैं। पिछली बार हमने देखा था कि ठाकुर ने कहा है कि मातृभाव है साधना की अंतिम बात। जब मनुष्य एक के बाद एक सभी साधनाओं के भावों में वह सिद्धि प्राप्त कर लेता है तब वह आखिर में मातृ भाव में स्थित होता है और इसका उदाहरण ठाकुर स्वयं है। ठाकुर ने जितने भी भावों की साधना कही गई है वह सभी भावों की साधना की है। शांत दास्य सक्य और फिर मधुर भाव यहां तक कि वीर भाव भी इन सब की साधना में ठाकुर सिद्ध हो चुके थे। अद्वैत निराकार की साधना में भी ठाकुर सिद्ध हो चुके थे। जब वह नेति नेति करके इंद्रिय संयम करके अपने मन को इस संसार से अलग करके जब ईश्वर में अपने मन को वो एकाग्र कर रहे थे या तो फिर आत्म भाव में स्थित हो रहे थे। उस समय यह सब साधनाओं का उन्होंने अनुष्ठान कर लिया था। हमको पता है कि किस तरह से जटाधारी के पास में से यह वात्सल्य भाव की साधना सीखी। फिर यह तोतापुरी से अद्वैत भाव या तो फिर यह जो भैरवी ब्राह्मणी के पास में से वीर भाव और फिर यह सखी भाव या तो फिर मधुर भाव उसकी साधना भी ठाकुर ने जो की थी उसके भी बहुत सारे विवरण हमारे पास में उपलब्ध है। हृदय का एक विवरण है। हृदय अर्थात कि ठाकुर का भांजा और ठाकुर का सेवक। उसका एक विवरण हमारे पास में है कि वह एक बार मथुर बाबू के जान बाजार के जो स्थित जो उनका घर था वहां पर गया था। मथुर बाबू यानी कि कालीवाड़ी के जो मालिक थी कालीवाड़ी की जो जिसने स्थापना की रानी रासमणि उनके जामाई तो मथुर बाबू का ठाकुर के ऊपर में बड़ा ही प्रेम था। बड़ा ही श्रद्धा थी। तो ठाकुर को वह दुर्गा पूजा के समय में या तो कोई भी उत्सव वगैरह होता है तो फिर मथुर मथुर बाबू ठाकुर को अपने घर ले जाते थे और उस समय की जो पर्दा प्रथा थी कि स्त्रियों को पर पुरुष के सामने नहीं आना है। चेहरा हमेशा छुपा करके रखना है। या तो फिर यह घूंघट में या तो फिर यह अंदर महल कहा जाता था। उस समय अंदर महल अर्थात कि एक ऐसी जगह घर के भीतर में जहां पर बाहर के पुरुषों का प्रवेश अधिकार नहीं है। उस घर में रहने वाले जो पुरुष हैं वही सिर्फ वहां पर जाएंगे। और यह प्रथाएं उस समय कैसी निष्ठुर भी थी। आपको उसका भी एक उदाहरण है। कामार पुकुर में जब ठाकुर छोटे थे तो उनके एक जो पड़ोसी थे वह बड़ा ही इस तरह से घमंड किया करते थे। बड़ा ही लोगों के सामने वह दिखावा किया करते थे कि मेरे अंतःपुर में या तो मेरे अंतः महल में जो स्त्रियां है इसका चेहरा किसी ने नहीं देखा है और जो बाकी घरों की स्त्रियां जो कि घर के बाहर जाकर के कोई कार्य करती है जैसे कि कुएं पर जाकर पानी भरना जलाशय में जाकर के कपड़े धोना वगैरह-वगैरह तो उसके ऊपर में उनका कटाक्ष भाव उनके प्रति उनका तुच्छ का भाव रहता था। तो वो कहते थे कि मेरी स्त्रियां इतनी प्योर है यानी कि मेरे घर में इतना यह स्ट्रिक्ट है ऑर्थोडॉक्सी कि यह स्त्रियां बाहर जाएगी नहीं कहीं पे और कोई पुरुष उनका चेहरा नहीं देख पाएगा। तो ठाकुर यह बात वहां पर खड़े रहकर सुनते थे। तो उनको लगा इसका यह जो ठाकुर तो उस समय बालक थे गदाधर। तो इवन गदाधर में भी इतनी यह बुद्धि थी कि इस तरह से स्त्रियों यदि आपको स्त्रियों के चरित्र के बारे में ही इतनी चिंता है तो इस तरह से लोगों से छुपा करके पिंजरे में बद्ध एक पंखी की तरह रख के आप स्त्रियों का चरित्र ठीक नहीं करने रखने वाले हैं। उसके लिए तो उनको शिक्षा विद्या और आध्यात्मिक ज्ञान देना होगा। आध्यात्मिकता ही स्त्रियों के चरित्र की नीव है। फाउंडेशन है। तो वह गदाधर बालक गदाधर सुन रहा था। उसने सोचा इनका अभिमान भंग किया जाए। तो फिर उसने क्या किया? वो लड़की का स्वरूप सज करके वो वहां पर उसके घर में गया। और फिर उस जो वो जो घर के मालिक थे उसने देखा कि अरे तो एक लड़की है वो ठाकुर देखिए ठाकुर की यह जो अभिनय करने की जो स्त्री पात्र का अभिनय करने की जो एक कला थी कौशल था उसी समय से था। ठाकुर कहते भी है कि मैं कामरार पुकुर में सबको ऑब्जर्व करता था। जैसे कि यह स्त्रियां है तो स्त्रियां किस तरह से चलती है, किस तरह से बात करती है, किस तरह से उनका बिहेवियर होता है, सब कुछ ठाकुर जैसे कि ऑब्जर्व करते थे और यह ऑब्जर्व करके इसको इंबाइब करने की अपने भीतर में प्रवेश करवाने की क्षमता थी ठाकुर में। अपने जो उनका जो बिहेवियर है उसमें ढाल देने की। इसीलिए तो वह आम्रकानन में वह जो माणिक राजा का आम्रकानन है आम्रकानन अर्थात कि आम का बागान तो वहां पर जाकर के वह जो अभिनय किया करते थे पौराणिक पात्रों का उसमें ठाकुर अभिनय करने में इतने निपुण थे वो जो फेमस घटना कि शिवरात्रि की रात को शिव का पात्र जो सजने वाला था उसको बुखार हो गया ना कि बीमार हो गया तो सब लोग सोच रहे किसको शिव का पात्र सजा सजा करके वो रंगमंच पर लाया जाए। उस समय सब ने कहा कि यह गदाधर है बड़ा अच्छा अभिनय करता है। तो वह गदाधर को शिव सजा करके उनको उस स्टेज पर लाया गया था। हालांकि हुआ ऐसा कि पात्र का अभिनय सिर्फ अभिनय ही नहीं है। ठाकुर उसको जैसे कि आत्मसात कर लेते हैं और ये आत्मसात करके ठाकुर जैसे शिव का पात्र सजे शिव का चरित्र है। शिव की जो शिव की महिमा है, भगवान शिव का त्याग है, ध्यान परायणता है, ध्यान प्रीति है। वो उनके हृदय में ऐसी चली गई कि वो खुद समाधिस्थ हो गए। ठाकुर एक उदाहरण भी देते हैं। कहते हैं कि एक जगह पर नाटक चल रहा था। तो वो जो बाबू लोग जो नाटक देख रहे थे तो नाटक देखतेदेखते बड़े खुश हो गए। और जो साधु का पात्र कर रहा था वह अभिनेता उसको वह रुपया देने के लिए गए। तो यह अभिनेता ने मुंह चढ़ा करके मुंह घुमा करके रुपया लेने से इंकार कर दिया। तो यह बाबू लोग तो बड़े थोड़े से नाराज हो गए कि अरे वह गरीब अभिनेता है इसलिए वह नाटक करता है। भले ही साधु सजा हो है तो वह एक अभिनेता ही तो उसको पैसा दिया लिया नहीं। ठीक है चलो अभी उसका अभिमान इतना है क्या करेंगे। अभी कुछ देर के बाद में वो वापस आया अभिनेता जब पहली बार जो पैसा दे रहे थे वो साधु का वो जो उसने जो ये किया था श्रृंगार किया था या तो फिर साधु का जो मेकअप किया था वो वैसे का वैसा ही था। किंतु अभी वह मेकअप फेकअप हटा करके वह जो वह सब कपड़े वपड़े हटा करके साधु के अपने सामान्य स्वरूप में आकर के खड़ा रहा। वह बाबू के सामने वह कहता है कि आप जो मुझे रुपया देने वाले थे दीजिए। बखशीश देने वाले थे दीजिए। तो बाबू थोड़े नाराज होकर के पूछता है कि अरे पहले तो तुमको दिया तो तुमने लिया नहीं। अभी तुम सामने से मांग रहे हो। तो यह अभिनेता क्या कहता है कि उस समय मैंने साधु का स्वांग रचा था। साधु का मेकअप किया था। इसलिए साधु तो किसी से रुपया लेगा नहीं। इसलिए मैंने आपसे रुपया लिया नहीं। अभी मैं फिर से अभिनेता हो गया हूं। तो अभी आप मुझे रुपया दीजिए। तो यह कहानी ठाकुर हमको कहते हैं। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि जो पात्र का अभिनय करना है वह पात्र आपके हृदय में ऐसा बैठ जाना चाहिए। उस पात्र के गुण जो है आपके भीतर में ऐसे चले जाने चाहिए कि जैसे कि क्या होगा कि आप उस पात्र के साथ में एकाकार हो जाए। एकीभूत हो जाए। तो यहां पर भी ठाकुर ने वह जो बालक गदाधर उसी समय से उसको यह अभिनय करने की कला जो थी उसकी आत्मसात हो गई थी। उसमें उसका एक्सपर्टाइज आ गया था। तो वह बालक गदाधर वो वहां पर उसके घर जाकर कहता है कि अच्छा मैं एक यहां पर वो रास्ते से जा रही थी। अभी मैं थक गई हूं। थोड़ा सा मुझे विश्राम करना है। तो वह घर के मालिक ने सोचा अच्छा यह तो एक लड़की ही तो है। ठीक है जाओ तुम भीतर में जाओ। सब स्त्रियां है वह तुम्हारी संभाल लेगी। ऐसा बोलकर के गदाधर को जाने दिया। गदाधर भीतर में चला गया और फिर भीतर में स्त्रियां भी जैसे कि गदाधर को पहचान नहीं पाई। तो गदाधर ने भीतर में रह के सब कुछ देख लिया। कौन क्या कर रहा है, कैसे है वगैरह-वगैरह सब कुछ और फिर उसने बाहर आकर के वह जो घर का मालिक था उसको सब बता दिया। तब कहीं जाकर के उस मालिक का घमंड जो है वह चकनाचूर हो गया। वो कहता रहता था ना कि अभी तक मेरे घर की स्त्रियों को किसी पुरुष ने देखा नहीं है। तो वह घमंड उसका चकनाचूर हो गया। हालांकि गदाधर तो बालक ही था और उसका मन में तो पवित्र भाव ही था। किंतु देखिए कि यह जो कहानी का आशय है कि यदि जो पात्र का अभिनय करते हैं उस पात्र में संपूर्ण रूप से गदाधर अपने को ढाल देता था। तो यह जो मधुर भाव की जब ठाकुर साधना करते थे उस समय यह मथुर बाबू ने ठाकुर को अपने जान बाजार के घर पर लाकर रखा था और मथुर बाबू को पता था कि ठाकुर इतने पवित्र हृदय है कि उनको अपने घर की स्त्रियों के साथ में भी बिना किसी झिझक के वह जाकर के उनके साथ में रह सकते हैं। वार्तालाप कर सकते हैं। तो वहां पर एक दिन ऐसा हुआ यह हृदय हृदय के द्वारा कही हुई कहानी है। हृदय क्या कहता है कि एक समय था कि मैं जब देवी के दर्शन के लिए गया यह दुर्गा पूजा ना कि ऐसा ही कोई उत्सव मथुर बाबू के घर में हो रहा था। उसका आयोजन देवी के आसपास में मथुर बाबू के घर की स्त्रियां खड़ी रहकर के देवी को चामर व्यंजन कर रही थी। उस समय मथुर बाबू ने मुझे कहा कि अच्छा देखो तो यह जो सब स्त्रियां खड़ी है उसमें तुम्हारे मामा कौन से हैं? ठाकुर तो हृदय का हृदय तो ठाकुर का भांजा था। ठाकुर उसके मामा थे। तो इसलिए मथुर बाबू हृदय को ऐसा पूछते हैं कि देखो तो इसमें कौन है तुम्हारे मामा? तो हृदय कहता है कि मैं सही-सही में पहचान नहीं पाया। इतना वो ठाकुर ने अपने को स्त्री वेश में स्त्रियों के गहने पहन के स्त्रियों के वस्त्र पहनकर के स्त्रियों के साथ में खड़े रह के इतना वो मधुर भाव से मां को चामर ढाल रहे थे कि उनको स्त्रियों से अलग करके पहचानना मुश्किल था। तो यह देखिए कि मधु मधुर भाव की साधना भी ठाकुर ने कर ली थी। किंतु और फिर अल्टीमेटली अद्वैत साधना करके फिर निर्विकल्प समाधि ठाकुर ने प्राप्त की। किंतु जब निर्विकल्प समाधि प्राप्त की तो जगन माता का उनको जगन माता की वाणी सुनाई दी। जगन माता जगदंबा क्या कहती है कि तू भाव मुखे था। तुम भाव मुख में रहो। ऐसा जैसे ही जगन माता ने कहा ठाकुर उस निर्विकल्प समाधि से उनका मन जो कि सागर में मिल गया था अद्वैत सागर में वहां से उनका मन उनके संस्कार संस्कार तो नहीं किंतु एटलीस्ट उनकी जो मेमोरीज है वो वापस आई और फिर वो पृथ्वी पर वापस लौटे और फिर वह भाव मुख में रह रहे हैं। किंतु जब भावमुख में रह रहे हैं तब वह कौन से भाव में रह रहे हैं? जितने भाव की उन्होंने साधना की है, वह सब भाव तो अभी भी उनके भीतर में है ही है। मधुर भाव की साधना, दास्य भाव की साधना, सख्य भाव की साधना, अद्वैत वेदांत में निर्विकल्प समाधि में चले जाना बार-बार यह सब तो हमने कथामृत में पढ़ा भी है और लीला प्रसंग में भी पढ़ा है। भक्तों के मुंह से भी हमने सुना है। किंतु जो एक भाव जो कि थ्रूउ ठाकुर ने मेंटेन किया है बाद के जीवन में वो है संतान भाव। ठाकुर कहते हैं मेरा संतान भाव है। मां ने मुझे संतान भाव में रखा है और यह भाव है बड़ा शुद्ध भाव। तो इसीलिए ठाकुर कहते हैं यहां पे कि मातृभाव है। साधना की आखिरी बात मातृभाव है साधना की अल्टीमेट जो कहेंगे डेस्टिनेशन। और फिर साथ में स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि जगत में मां का स्थान सबसे ऊपर में है। और फिर आगे क्या कहते हैं गंभीरानंद जी आमी
अहंकार का विनाश
आार बुद्धि के इष्ट विलय पूर्वक एकांत विश्वास और तदाश्रयता शोहाजे माधुर्यमय चिद्रश आस्वादन कोरा जदी साधके कामो होय तबे ईश्वरीय मातृत्व से अभष्ट प्रदान अमोग शक्ति निहित रहया छे आमी और आार मैं और मेरा इस बुद्धि को इष्ट में यदि विलय करके इष्ट में यदि उसको समर्पण करके एकांत विश्वास अर्थात कि संपूर्ण विश्वास और ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण आश्रय करके ईश्वर को संपूर्ण रूप से आश्रय करकेमयित रस का आस्वादन करने की यदि साधक की इच्छा हो तो ईश्वर का ईश्वर के मातृत्व में इस इच्छा को पूर्ण करने की अभीष्ट प्रदान की यह सब शास्त्रीय शब्द है। अभीष्ट प्रदान अर्थात कि इच्छा पूर्ण करने की अमोग शक्ति रही हुई है। यदि मैं चाहता हूं कि मेरा जो अहंकार है, मेरी जो कामना वासनाएं हैं, मेरा मेरी जो अस्मिता है, योग शास्त्र में देखेंगे कि अविद्या के बाद में सर्वप्रथम आता है अस्मिता। अस्मिता अर्थात कि यह मेरा नाम है, यह मेरा शरीर है, यह मेरी मेमोरीज है। यह मेरे संस्कार है, यह मेरे कर्म है, यह मेरी जाति कुल शील है। यह सब कुछ जिसको कि मैं मेरा कह रहा हूं। इस मेरेपन से छुटकारा पाने के लिए यदि मैं जैसे कि संपूर्ण रूप से ईश्वर में विलीन हो जाना चाहता हूं। मेरे संस्कारों को मेरे कर्म को संपूर्ण रूप से इष्ट को अर्पण कर देना चाहता हूं। और जोधुर्यमय यह जो भावस है उसका मैं यदि पान करना चाहता हूं तो इस आशा को पूर्ण करने की इस अभीष्ट प्रदान करने की अमोग शक्ति यह जननी भाव है। मातृत्व भाव है ईश्वर का। उसमें रही हुई है। देखिए यह सेंटेंस है थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड। इसके भीतर में थोड़ा सा देखना होगा। सबसे पहले तो है कि आमी और आर मैं और मेरा इस बुद्धि को हमको विलय क्यों करना है ईश्वर के भीतर में क्योंकि देखिए अभी जैसे मैं आज सुबह का ही मैं मेरा उदाहरण बताता हूं कि मैं मंगल आरती से आकर के मेरे कमरे में बैठकर के आंख बंद करके थोड़ा सा जप करने का प्रयास कर रहा था। तो उस समय अब जैसे जप करना प्रारंभ करता हूं वैसे ही आपको तो पता ही है कि दुनिया भर के जितने भी विचार हैं सब अपने मन में आकर के इकट्ठा हो जाते हैं और जैसे कि एक ऐसा तूफान मचाते हैं कि जप करना तो कहां रह गया और यह सब विचारों की वजह से हमारा ए्जायटी लेवल हमारा ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। ऐसा होता है। तो उस समय मुझे ऐसा लगा कि मैं यदि मैं ना रहता यह जो मेरी मेमोरीज है, मेरी यह जो याददाश्त है, यह जो सब मेरे जो रिस्पांसिबिलिटीज है, मेरा यह जो कर्तव्य का भाव है, यह सब यदि कुछ क्षण के लिए यदि चला जाता, मैं अपने ब्रेन का जो स्विच ऑफ थोड़े क्षण के लिए यदि कर पाता, तो कितना अच्छा रहता। मेरा ब्रेन स्विच ऑफ हो गया है किंतु मेरा हृदय चल रहा है और हृदय में मैं अपने इष्ट देवता के दर्शन कर सकता हूं। यदि यह अपने ब्रेन की स्विच ऑन और ऑफ हमारे हाथ में रहती तो हमारी कितनी सारी समस्याओं का वह निराकरण हो जाता। हमको ना ही ब्लड प्रेशर बढ़ता। हमारी ना ही एंग्जायटी बढ़ती। हमको ना ही किसी एडिक्शन में जाना पड़ता। क्योंकि यह मन के भीतर में जो कचरा पड़ा हुआ है, वह आकर के हमारे सामने वह इस तरह का एक तुम युद्ध खड़ा करते हैं। एक ऐसा तांडव नृत्य खड़ा करते हैं कि उससे बचने के लिए ही तो फिर मन को मारने के लिए तो हम यह सब एडिक्शन वगैरह का सहारा लेते हैं। किंतु वो तो हो गया एक ऐसा एडिक्शन कि जिसको सेवन करने से हमारे मन में तमस ही बढ़ेगा। एक सात्विक एडिक्शन है। वह हो गया तामसिक एडिक्शन। वह शराब पीना या तो फिर ऐसे जो कुसंग है ऐसे लोगों का संग करना जिसका चरित्र अच्छा नहीं है। धूम्रपान करना वगैरह-वगैरह या तो फिर आजकल लोग घंटोंघंटों भर तक यह सोशल मीडिया देखते रहते हैं। ये शॉर्ट वीडियोस देखते रहते हैं। YouTube पे जाकर के कुछ ना कुछ देखते रहेंगे। तो यह सोशल मीडिया आज का एक बहुत बड़ा एडिक्शन है। किंतु यह सब एडिक्शन ऐसे हैं जो कि हमारे मन को तमस की ओर ले जाते हैं। उसके अलावा होते हैं सात्विक एडिक्शन। यह सात्विक एडिक्शन क्या है? तो वह है यह भाव। यदि कोई एक भाव का आश्रय लेकर के ईश्वर के साथ में यदि हम वार्तालाप करें, इस तरह से हम इमेजिनेशन करें कि हां मैं फिर से वही दक्षिणेश्वर में चला गया हूं। वही ठाकुर का चीर परिचित कमरा गंगा के किनारे भागीरथी के किनारे एक ओर है काली मंदिर दूसरी ओर है यह पंचवटी पंचवटी में ठाकुर ने साधना की है काली मंदिर में साक्षात जाग्रता जगदंबा जगत जननी आध्या शक्ति विराजमान है और इन दोनों के बीच में ठाकुर का कमरा है। ठाकुर और मां स्वयं वहां पे उनकी जो खाट है उसके ऊपर में विराजमान है और उनके सामने में यह सब नरेंद्र है, राखाल है, यह तारक है, यह बाबूराम है, योगेन है, लाटू है। यह लोग सब बैठे हुए हैं। सब यंग लड़के और मैं भी उनके साथ में बैठा हुआ हूं। मैं जब यह सब इमेजिनेशन करता हूं तो मेरी एक फेवरेट पोजीशन भी है। वो मैं सब समय वहीं पर बैठूंगा। वो कौन सी है? तो यदि आपने ठाकुर का कमरा देखा होगा तो गंगा की ओर एक दरवाजा खुलता है। बाहर में एक छोटा सा एक वरांडा जैसा भी है। सर्कुलर वरांडा है बाहर में। तो मैं बैठता हूं एग्जैक्टली वो दरवाजे के पास में जिससे कि मैं सामने देखूं तो मुझे मां और ठाकुर दिखाई दे। मैं अपने लेफ्ट साइड में देखूं तो यह नरन है, राखाल है। वे लोग सब लड़ के ध्यान कर रहे हैं। और मैं राइट साइड में यदि देखूं तो यह भागीरथी कल कल करती बह रही है। अर्ली मॉर्निंग का समय है। मध्य रात्रि का समय है। वो घर में एक टीम टिम करके प्रदीप प्रज्वलित हो रहा है। और फिर ठाकुर और मां के साथ में मेरा संतान भाव है। वह पिताजी है। यह मां है। और उनका पवित्र स्नेह मेरे हृदय में प्रसारित हो रहा है। तो ऐसा जब मैं इमेजिनेशन करता हूं तो मेरे मन में ऐसी शांति फैल जाएगी कि यह जो संस्कारों का यह तांडव नृत्य है वह एटलीस्ट कुछ समय के लिए बंद हो जाएगा और मेरा मन शांत हो जाएगा। तो यह मन को शांत करने के लिए मुझे एक एडिक्शन चाहिए। देखिए एडिक्शन और बाकी सब कार्य में फर्क क्या है वह समझना है। एडिक्शन इतना स्ट्रांग अट्रैक्शन होता है। अब जैसे कि मैं अपनी ऑफिस में जाकर के काम करता हूं। मुझे जो ड्यूटी दी गई है। मैं यदि पुजारी हूं तो मैं मंदिर में जाकर पूजा करता हूं। मुझे यदि अकाउंट का रिस्पांसिबिलिटी दिया गया है तो मैं ऑफिस में बैठ के अकाउंट देखता हूं। मुझे यदि बुक स्टोल का रिस्पांसिबिलिटी मिला है तो मैं बुक स्टोल में जाकर के वह करता हूं। मैं यदि गृहस्थ हूं तो फिर मुझे जो भी इस कार्य करना है जगत के सब करता हूं। किंतु हम सबको पता है कि हमारा यह जो कितना ही अच्छा कार्य हम बाहर में कर ले। मैं यदि किसी एनजीओ के माध्यम से कोई अच्छा सेवा कार्य भी करता हूं। मंदिर में भी जाता हूं। साधु संग भी करता हूं। उत्सव में पार्टिसिपेट करता हूं। रिट्रीट में जाता हूं। तीर्थ यात्रा में जाता हूं। कितने ही शुभ कार्य हम कर क्यों ना लें? जब यह संस्कारों का तुम नृत्य यह तांडव नृत्य जब प्रारंभ होता है तो वह सब मेमोरीज किसी काम की नहीं है। कभी-कभी काम करती है किंतु ज्यादातर समय काम नहीं करती है। तो फिर उस समय एक ऐसा कोई एक स्ट्रांग हैबिट चाहिए क्योंकि संस्कारों के सामने वह युद्ध कर सके। संस्कारों में इतना प्रबल उसमें स्ट्रेंथ होती है तो उसको प्रबल उसकी जो प्रचंड शक्ति है उसको काटने के लिए जो मैं साधना का अवलंबन लेता हूं उसमें भी वह प्रचंड शक्ति होनी चाहिए तो प्रचंड पावर पावरफुल संस्कार उसके सामने पावरफुल साधना तो यह पावरफुल साधना जो है भाव साधना ही एक ऐसी साधना है जिसमें वह पावर है यह जो इमोशन जिसको कहते हैं विचार और ये भाव आवर थॉट्स एंड आवर इमोशन विचारों की शक्ति ज्यादा नहीं होती है।
विचार, संस्कार, और भाव
विचार संस्कार और इमोशंस यानी कि ये फीलिंग्स। तो ये थॉट्स आवर इंपेशंस एंड आवर इमोशंस। विचार, संस्कार और भाव। यह तीन चीजें हैं। विचार है या तो थॉट्स है उसका स्ट्रेंथ इतना नहीं है जितना कि यह संस्कार और इमोशन का है। यानी कि यदि आपको संस्कार को काटना है तो इमोशन के माध्यम से ही भाव के माध्यम से ही काट पाएंगे। आप यदि अपने मन से यह वेदांत विचार कितना भी करते रहे कि अहम ब्रह्मास्मि यह देह में नहीं देह की यह जो मेमोरीज है वह मैं नहीं संस्कार में नहीं यह मेरे यह जो जगत संसार है उसमें मेरा कोई अपना नहीं है। ईश्वर ही अपने है या तो फिर मेरा जो सही स्वरूप है आत्म स्वरूप यही मेरा सही स्वरूप है। ऐसा हम मुंह से कितना बोलते रहे मन से चाहे कितना विचार करते रहे संस्कार की जो शक्ति है संस्कार का जो स्ट्रेंथ और पावर है उसके सामने यह वेदांत विचार टिकेगा नहीं उसके लिए संस्कार को काटने के लिए आपको यह इमोशन या भाव ही चाहिए। देखिए विचारों में शक्ति कब आएगी? जब हम विषयों का त्याग करेंगे। जब इंद्रियों के विषय का जैसे-जैसे त्याग करते जाएंगे ब्रह्मचर्य या और फिर जितनी भी जो त्याग की साधना है उसका हम जितना पालन करते जाएंगे वैसे-वैसे विचारों में शक्ति आएगी। इससे पहले विचारों में बिल्कुल शक्ति नहीं आएगी। इससे पहले जिसको हम विल पावर कहते हैं। विल पावर इतना यही है जो कि अपने विचारों को स्ट्रेंथ देता है। यदि मैं यहां पर बैठकर कहता हूं। एक आम आदमी यहां पर बैठ के कहता है कि यह जो मेरे विचार है, यह मेरे संस्कार है, यह जो मेरा यह नाम रूप है, पंचमहाभूत का यह पंचप्राण का बना हुआ देह है, इससे परे मेरा जो स्वरूप है, वही है आत्मन अहम ब्रह्मास्म। ऐसा मैं यदि बोलूंगा तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि यह विचारों में कोई शक्ति ही नहीं है। किंतु यदि मैं 12 बरस यदि ब्रह्मचर्य का दृढ़ रूप से पालन करूं और फिर मैं यदि यह कहूं कि अहम ब्रह्मास्म तो साथ-साथ में ही मेरे भीतर में वह ब्रह्म भाव जागृत हो जाएगा। यानी कि विचार को शक्ति देने के लिए विचारों को पावर देने के लिए त्याग होना चाहिए। बिना त्याग के विचारों के भीतर में थॉट्स के भीतर में किसी भी तरह की शक्ति नहीं होती। तो फिर हम जब साधना का प्रारंभ करते हैं, त्याग करने की हमारी क्षमता लिमिटेड है या तो फिर जन्म जन्मांतर का इतना भोग किया हुआ है कि धीरे-धीरे करके त्याग करते-करते वह कितने और जन्म लग जाएंगे तो उस समय जब संस्कारों का तांडव नृत्य प्रारंभ होता है। उस समय उसके सामने कैसे लड़ा जाए? तो वह है भाव। भाव में संस्कार से भी ज्यादा शक्ति है। यदि हम इस तरह से अपने हृदय में कोई एक भाव उत्पन्न कर पाए तो वह संस्कारों को संपूर्ण रूप से दमन कर सकता है। यह जो देवी का आगमन पुरातन काल में हुआ था असुर दमन के लिए तो वही कार्य देवी अपने हृदय में बैठकर के संस्कार रूपी असुरों का दमन कर सकती है। तो यह हो गया कि यह संस्कार के सामने लड़ने के लिए एक हमारे सामने एक सहज शस्त्र और इसीलिए यहां पे महाराज जी लिखते हैं कि आमी आमार मैं और मेरा यह जो बुद्धि है इसको यदि हमको विलीन कर देना है और फिरुर्यमय चित्त रस का यदि हमको आस्वादन करना है तो ईश्वर के मातृत्व स्वरूप में वह अमोग शक्ति है जो कि हमारा अभष्ट प्रदान करेगी। हमारे मन की वासना को पूर्ण करेगी। शांतो दास बाशलादते यथा क्रमे अधिकिकाधिक आत्मीयता बोधे विकास हो शतो शांत दास्य और फील वात्सल्य यह जो सब भाव है उसमें एक के बाद एक भाव का आश्रय लेते जाएंगे तो स्टेप बाय स्टेप यह जो भाव की शक्ति है वह बढ़ती जाएगी या तो फिर आत्मीयता बोध है ईश्वर के साथ में मेरी आत्मीयता ता है वह बढ़ती जाएगी। यह बात तो सही है किंतु मातु बखाितो एकांत निर्भर शिशुर तन्मयत्व बोध ए समस्त के अतिक्रम करिया जाए किंतु मातुब बख आश्रितो मां की गोद में जो आश्रय जिस शिशु ने एकांत निर्भर संपूर्ण निर्भरता पूर्वक जिस शिशु ने आश्रय लिया है उसका जो तन्मयत्व है तन्मयता मां के साथ में यह तन्मयत्व बोध यानी कि मां के साथ में तन्मयता की यह उसकी जो फीलिंग है, इमोशन है, उसकी जो सेंसेशन है, यह सबको अतिक्रम कर सकती है। देखिए, इसके भीतर में भी यह महाराज जी हमको एक बड़ा एक कांसेप्ट इंपॉर्टेंट समझाते हैं। अ यदि भाव साधना का चरम लक्ष्य या तो भाव साधना का कोर कांसेप्ट है ईश्वर के साथ में तन्मयत्व स्थापित करना ईश्वर के साथ में आत्मीयता का स्थापन करना तो ये आत्मीयता का स्थापन जो है आत्मीयता है वो कैसे होगी किसके साथ में जो रिलेशन होता है वह सबसे ज्यादा हमको आत्मीय बोध होता है तो यदि मैं किसी का मित्र हूं तो फिर मुझे वह मेरा मित्र अपने अपना जैसे लग्न अपनापन जो है वह मित्र में मुझे लगने लगेगा। शांत भाव यदि मेरा है। यानी कि यह दो नेबर्स है, पड़ोसी है। वह दोनों बड़े सात्विक है। तो वह जैसे वह घर से बाहर निकलता है एक पड़ोसी तो दूसरा पड़ोसी उसको ग्रीट करता है। भाई कैसे हो? अच्छे हो कि नहीं? ऐसा। तो यह हो गया शांत भाव। दोनों बड़े शांति से साथ-साथ में रह रहे हैं। यहां पर जो अपनापन होगा इस पड़ोसी के साथ में। इससे ज्यादा अपनापन होगा यह जो मेरा मित्र है उसके साथ में। क्यों? क्योंकि मित्र के साथ में आत्मीयता ज्यादा होती है। अभी मैं यदि किसी का दास हूं यदि मैं किसी का सेवक हूं तो उसमें हो सकता है कि उस यह जो आत्मीयता है, उसका बोध उससे भी ज्यादा होगा। वात्सल्य भाव है। जैसे कि मां का अपने बच्चे के प्रति जो भाव है, वह उससे भी ज्यादा आत्मीयता ले आएगा। क्योंकि मां का संतान के साथ में एकात्मता है। संतान के साथ में जो प्रेम और स्नेह है वह रिश्ता इतना गहरा है कि दो पड़ोसी के बीच में या तो दो मित्र के बीच में या तो फिर दास और जो मालिक है इन बीच में जो आत्मीयता है इनके बीच में जो स्नेह प्रेम है इससे कहीं ज्यादा संतान का अपने मां का अपने संतान के प्रति है। किंतु यहां पे महाराज जी लिखते हैं कि एक संतान जो है अपनी मां की गोद में संपूर्ण रूप से आश्रय ग्रहण करके एकदम शांति से आनंद से बैठा हुआ है। उसका जो मां के साथ में तन्मयत्व होगा। एकात्मता होगी वो दैट विल बी ग्रेटर देन एनी अदर भाव। बाकी जितने भी भाव है, बाकी जितने भी नाते हैं, बाकी जितने भी रिश्ते हैं, इसमें से यह शिशु का मां के साथ में जो प्रेम, स्नेह और नाता जो है, वह सबसे ज्यादा गहरा होगा। मां के साथ में उसकी आत्मीयता सबसे ज्यादा होगी। मां के साथ में तन्मयता सबसे ज्यादा होगी। यानी कि देखिए यहां पे और एक कांसेप्ट जो महाराज देते हैं। मां का बच्चे के ऊपर में जो प्रेम है उससे जो बच्चे के साथ में आइडेंटिफिकेशन होता है, उससे ज्यादा ग्रेटर आइडेंटिफिकेशन या तो तन्मयत्व या तो ये जो आत्मीयता बच्चे का मां के साथ में होता है। क्यों? मां अपने बच्चे पर संपूर्ण रूप से भरोसा करके संपूर्ण रूप से निर्भयशील नहीं है। मां को तो और भी बहुत कुछ करना है। बच्चे को जन्म तो दिया है। गर्भ में उसका लालनपालन तो किया है। किंतु जैसे ही बच्चे का प्रसव होता है तो फिर बीच-बीच में मां को बच्चे को एक जगह पर सुला करके या तो फिर अपनी जो और कोई है घर में पिताजी है या भाई बहन है जो जो भी है उनके हाथ में देकर के उसको खाना भी बनाना है। घर का काम भी करना है और बहुत कुछ उसको करना है। मां के पास में सिर्फ बच्चे को लेकर के रहना यह कोई संभव नहीं होता है। यह तो हम सब ने देखा है। जबकि बच्चा जो है उसका जो पूरा जीवन है, उसका पूरा जगत है वो मां ही है। मां छोड़कर के बच्चे को कुछ समझ में भी नहीं आता। मां के 10 संतान हो सकते हैं। किंतु संतान की जननी या तो फिर मां तो एक ही हो सकती है। यानी कि मां के यदि एक से ज्यादा संतान है सबके ऊपर में ध्यान देना है। किंतु प्रत्येक संतान उसके तो एक ही मां है। एक ही मां के भीतर में उसका पूरा जगत है। यानी कि जननी का अपने संतान के ऊपर में स्नेह है। जननी का अपने संतान के साथ में जो आइडेंटिफिकेशन है, तन्मयता है, ये इससे भी ज्यादा तन्मयता, इससे भी ज्यादा अपनापन, इससे भी ज्यादा एकांत निर्भयशील निर्भरशीलता, आश्रयशीलता, यह बच्चे की अपने मां के ऊपर में होती है। यानी कि संतान भाव जननी भाव से भी ज्यादा पावरफुल है। इसलिए यहां पर कहते हैं कि मातु बखा श्रितो मां की बखो अर्थात कि गोद मां की गोद में जो आश्रित है या तो फिर मां के जो मां के साथ में जो बच्चा रह रहा है उसकी जो एकांत निर्भरशीलता है उससे तन्मयत्व ये सबको अतिक्रम कर जाता है। यह पहले जितने भी भाव वर्णित किए हैं, उससे भी ज्यादा स्ट्रांग भाव इससे भी ज्यादा गहन भाव इस बच्चे के भीतर में होता है। आभार साधक चाय ताहार इष्टो कृपा परबोष होया एवं ताहार समस्त दुर्बलता सर्व प्रकार अमता भूलिया परिपूर्ण स्नेह ताहा के कोले टानिया लेबेन और फिर साधक चाहता है कि उसके इष्ट कृपा परवश होकर के कृपा से विगलित होकर के साधक की समस्त दुर्बलता है। सर्व प्रकार की अक्षमता है। उसको भूल करके स्नेह से परिपूर्ण होकर के उसको अपनी गोद में उठा लें। साधक यदि आप विधिवादीय भक्ति करेंगे या तो फिर वेदांत साधना करेंगे उसमें साधक को क्या करना है उसके लंबेल लंबे उपदेश दिए गए हैं। आपको काम कांचन यह पंचलेश डरिपु अष्टपाश जो कुछ भी है सबका त्याग करके अपने मन को शुद्ध करके ईश्वर पे मन को एकाग्र करना है। आत्म तत्व का चिंतन स्मरण मनन निधि्यासन करना है। किंतु यह करने की क्षमता तो मेरी बड़ी लिमिटेड है। ना ही मैं अपने मन की वासनाओं से मुक्त हो सकता हूं। ना ही मैं ईश्वर के ऊपर में संपूर्ण निर्भरशील संपूर्ण रूप से आश्रय आश्रित हो सकता हूं। तो फिर मुझे ऐसा तो क्या है मेरे जीवन में जो कि मुझे साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ा पाए। जैसे कि वह ठाकुर कहते हैं ना कि जब तक बच्चा अपने पिताजी का हाथ पकड़ कर के चलता है तब तक संभावना है कि उसकी बच्चे की जो ग्रिप है वह कमजोर है। वह छूट जाएगा पिताजी का हाथ वह गिर भी जाएगा। किंतु जब पिताजी बच्चे का हाथ पकड़ करके चलते हैं तो पिताजी की ग्रिप तो बच्चे की ग्रिप से ज्यादा पावरफुल होती है। वह बच्चे का हाथ किसी भी कीमत पर छोड़ने वाले नहीं है। बच्चा कभी गिरेगा नहीं। यानी कि हमारी यह जो मानसिक कमजोरी की अवस्था है। उस समय हम चाहते हैं कि ईश्वर स्वयं मुझे सहाय करें। जैसे कि कल हमने राम प्रसाद के वह पदावली में देखा था। रामप्रसाद कहता है कि मैं सोचता तो हूं कि मैं तुम्हारा नाम लेता रहूंगा। किंतु बीच-बीच में सब भूल जाता हूं। किंतु अब मुझे समझ में आ गया है कि यह मेरी कमजोरी की वजह से नहीं हो रहा। यह तुम्हारी चतुराई की वजह से हो रहा है। वो ठाकुर कहते हैं ना वह खेल है बूढ़ी छुआ यानी कि एक जो बूढ़ी है यानी कोई एक पोस्ट होगी उसको स्पर्श कर लेना है तो आप खेल में से आप मुक्त हो जाएंगे। किंतु वो बूढ़ी चाहती है कि वह कोई खेल में से मुक्त ना हो और खेल चलता ही रहे। तभी तो उसको आनंद आएगा। तो यानी कि यह महामाया है। वह नहीं चाहती शायद कि सबको मुक्ति मिल जाए। सबको मुक्ति मिल जाएगी तो संसार कैसे चलेगा? यानी कि मुक्ति मिलती है एक दो को बाकी सबको महामाया जैसे कि मोह और भ्रम में डूबा करके उनके पास में उनको इस संसार रूपी चक्की में पीसती ही रहती है। किंतु यदि मैं साधना की इस अवस्था में यही महामाया यदि मेरा हाथ पकड़ करके मेरी कमजोरियों से मेरी रक्षा करती हुई मेरी साधना में यदि मुझे आगे बढ़े बढ़ाए तो फिर मैं साधना या तो फिर यह प्रैक्टिस स्पिरिचुअल प्रैक्टिस जो है वो मैं सहज रूप से कर पाऊं और इसीलिए यहां पे महाराज कहते हैं कि इष्ट कृपा परवश होकर के ई साधक की सब दुर्बलता और सब तरह की अक्षमता भूल करके परिपूर्ण स्नेह से उसको अपनी गोद में उठा ले तो फिर साधक कहेगा कि हां अभी मेरी साधना का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह मां
माँ के भाईयों की कहानी
के जीवन में एक घटना है। एक बार ऐसा हुआ कि मां कोलपाड़ा से जयराम भाटी जाना था। मां कोलकाता से कोवालपाड़ा आई थी और फिर वहां से जय राम बाटी जाना है। तो बीच में फिर यह एक नदी है तो नदी क्रॉस करनी है। तो फिर मां ने अपने जो भाई थे वहां पे जय राम बाटी में उनको मैसेज किया कि मैं आ रही हूं। तुम लोग पालखी वगैरह है नौका वगैरह जो कुछ भी है वो लेकर के वहां पर नदी के किनारे कहीं पर उपस्थित रहना। तो फिर मुझे वह आने में सुविधा होगी। अब वहां पर जाकर के देखा तो एक भी भाई उपस्थित नहीं है। तो फिर मां थोड़ी नाराज हो गई। कैसे भी करके वह जयराम बाटी आई तो सही। फिर अपने भाइयों को कह रही है यही प्रसन्न मामा और फिर यह यही काली मामा कि तुम लोग जो है कि मुझे आई थिंक प्रसन्न मामा को ही कहा कि अरे मैंने तुमको मैसेज किया और तुम मुझे लेने के लिए नहीं आए। ऐसा तो क्या तुम्हारा ऐसा काम आ गया था। तो मामा क्या कहते हैं कि मैं काली के भय से आया नहीं। काली मामा मां के दूसरे भाई हैं और उनका नेचर थोड़ा सा यह रुक्ष था। क्रोध क्रोधान हो जाते थे। बीच-बीच में बड़े गुस्सा हो जाते थे। तो उसके भय से मैं आया नहीं। और फिर यह मामा क्या कह रहे हैं कि देखो हम तो चाहते हैं कि तुम्हारी कितनी सेवा करें किंतु हमारे में वह सेवा करने की क्षमता नहीं है। किंतु तुम ऐसा आशीर्वाद करना कि मैं हमेशा जितने भी जन्म है तुम्हारे साथ में ही जन्म लेता रहूं। तुम हमारे घर में ही हमारी लाडली बहना होकर के जन्म लेती रहो। तो ऐसा आशीर्वाद मांग रहे हैं। तो मां कहते हैं कि बस हो गया बहुत हो गया तुम लोगों के संसार में मेरा जन्म लेना। किंतु देखिए जो मामा ने जो कहा प्रसन्न मामा मोस्ट प्रोबेबबली उन्होंने जो कहा वो कितनी सही बात है कि आप तुम्हारी सेवा करने की हमारे में क्षमता नहीं है। यह जो छोटा सा जो तुमने काम दिया कि यह पालकी या नौका करके तुमको लेने के लिए आए वह भी मैं नहीं कर पाया। किंतु तुम मुझे यह आशीर्वाद देना कि मेरे संसार में मेरी बहना होकर के तुम बार-बार जन्म लो। तो उस समय तो मां ने मुंह पर जो कुछ भी कहा हो किंतु देखिए कि साधक के हृदय की यही बात है कि मां की सेवा करने की क्षमता हम लोगों में कितनी है त्याग करने की तपस्या करने की श्रद्धा भक्ति यह करने की या तो निष्काम कर्म करने की यह ध्यान करने की यह सब क्षमताएं हम में कितनी है बड़ी अल्प है। इसके बावजूद हम अपने हृदय से मां को प्रार्थना करते हैं कि तुम मुझे अपना अबोध संतान समझ के मूर्ख संतान समझ करके अपनी गोद में उठा लेना धेयो इष्ट पूर्ति मुखेश ए विचार शून्य स्नेह पूर्ण हस्य देख्या निजे भविष्यत संबंधे निश्चित होते जान वो धेय और इष्ट इष्ट मूर्ति जो इष्ट मूर्ति है जो मेरा मेरा इष्ट है जो मेरी जननी है जगदंबा है उसके मुंह पे यह विचार शून्य स्नेह पूर्ण हास्य यह हास्य देखकर के मुझे मैं अपने भविष्य के बारे में निश्चिंत होना चाहता हूं। मेरे जो इष्ट है उनके चेहरे पर हास्य देखकर के मैं अपने भविष्य के बारे में निश्चिंत होना चाहता हूं। किंतु किस तरह का हास्य यहां पर महाराज जी लिखते हैं विचार शून्य और स्नेह पूर्णम विचार का अर्थ क्या है? जजमेंट कि यदि मैं अच्छा काम करूंगा तो आप मेरे से खुश होंगे। यदि मैं बुरा काम करूंगा या तो फिर अच्छा काम करने की मेरे में क्षमता नहीं है तो आप मेरे पर नाराज हो जाएंगे। इसको कहते हैं विचार या तो कहते हैं जजमेंट देना, जजमेंटल नेचर होना। मैं चाहता हूं कि मेरे जो इष्ट है उनके चेहरे पर मैं विचार शून्य हास्य देखना चाहता हूं। मेरे कार्यकलाप, मेरे कर्म, मेरी साधना, मेरा व्यवहार, मेरी क्षमता चाहे अच्छी हो ना कि बुरी, ज्यादा हो ना कि कम। मैं चाहता हूं कि ईश्वर मुझे जज ना करें। ईश्वर यह ना सोचे कि अच्छा इसने ज्यादा काम किया है तो मैं इसको ज्यादा स्नेह करता हूं। यह कम साधना करता है तो कम स्नेह करूंगा। ऐसा नहीं जो कोई भी संतान है सबको एक समान ट्रीट करें। इस तरह का विचार शून्य स्नेह पूर्ण हास्य मैं अपने इष्ट के चेहरे पर देखना चाहता हूं। और इस तरह का हास्य देखूंगा। तभी तो जैसे कि मेरे मन में मेरे भविष्य के प्रति संपूर्ण रूप से निश्चिंतता प्रवेश करेगी। यह ऐसा हो गया कि एक मां और पिताजी के दो लड़के हैं। उसमें से एक लड़का जो है पढ़ाई लिखाई में ज्यादा माहिर है और एक लड़का जो है पढ़ाई लिखाई में बड़ा ही पीछे है। तो पिताजी शायद देखेंगे कि जो अच्छा पढ़ाई लिखाई करता है तो उसको बीच-बीच में अच्छी गिफ्ट ला के दें और जो पढ़ाई लिखाई नहीं कर सकता है जिसके कि ग्रेड्स है अच्छे नहीं आ रहे हैं तो उसको बीच-बीच में धमकाए कि तुम अच्छे से स्टडी करो वरना तो तुमको कुछ भी मैं ला के नहीं दूंगा ना ही नई बाइसल ला के दूंगा ना ही नए कपड़े तो यह दूसरा बच्चा जो है जो अबोध है अनपढ़ जैसा है मूर्ख है वह उसको पता है कि पिताजी तभी भी प्रेम करेंगे जबकि मेरा स्टडी अच्छा होगा। किंतु मां जो है मां के लिए दोनों संतान समान है। जो पढ़ाई लिखाई अच्छे से करता है जो कंसिस्टेंटली ए ग्रेड लाता है और दूसरा लड़का है कंसिस्टेंटली फेल होता है। दोनों को मां समान स्नेह करेगी। मां यह विचार नहीं करेगी कि यह लड़का ज्यादा बुद्धिशाली है। यह मूर्ख है। लड़का है तो प्रेम करना है। जो उसका क्या बिहेवियर है? क्या परफॉर्मेंस है? क्या क्षमता है? क्या कैपेसिटी है? भविष्य में उसको मां की सेवा करने की क्या क्षमता होगी? इस सब चीजों की ओर मां देखती नहीं है। तो यह हो गया मातृत्व का आइडियल। अभी यह जो यहां पे समर कैंप चल रहा था तो मैंने उसमें देखा कि दो बहनें आती है। तो एक तो एक जो बहन है छोटी बच्चियां ही थी दोनों। तो वह तो नॉर्मल है किंतु जो दूसरी जो थी बहन उसकी उसका वह प्रीमेच्योर बर्थ हुआ था और कुछ माने डिफेक्ट रह गई है उसके बिहेवियर में तो वह एक जगह पर बैठ नहीं पाएगी इधर-उधर दौड़ के चालू क्लास में चली जाएगी वो हम कहेंगे तो वह सुनेगी नहीं या तो सुनने के समझने की क्षमता नहीं है। सम हाउ कुछ इंटेलेक्चुअल डेफिशिएंसी रह गई है। वह जो कल वह राम प्रसाद कहता था ना कि आमी आमी की आटा से छले भोए कोरी ना चोख रंगाले मैं क्या वह प्रीमेच्योर बच्चा हूं इंटेलेक्चुअल फिजिकली कमजोर हूं कि तुम आंख निकालोगी आंख लाल करोगी तो मैं डर जाऊंगा तो वैसे ही यहां पर यह थोड़ी इस दूसरी बहन का बिहेवियर थोड़ा सा उस प्रकार का था किंतु उसके जो पिताजी दोनों बहनों के वो दोनों को रखने के लिए आते थे उसका मैंने बिहेवियर देखा वो दोनों के प्रति समान स्नेह करते हैं। ऐसा नहीं कि वह जो एक नॉर्मल है और एक थोड़ी सी एबनॉर्मल है तो दोनों के प्रति उनका बिहेवियर डिफरेंट हो। ऐसा मैंने नहीं देखा। अभी घर में क्या होता है आई डू नॉट नो। किंतु यह जो सुपरफिशियल ऑब्जरवेशन करके मुझे यह दिखा तो ऐसा होना चाहिए। दिस इज दी आइडियल। यदि आपका संतान है, आपके एक से ज्यादा संतान है, तो सबके प्रति समान स्नेह होना चाहिए। मेरे पास में कभी-कभी इस तरह की एक एक डिवोटी ने मुझे कहा था वो कहती है कि मैं और मेरा भाई वो एक वो लड़की और उसका भाई तो दोनों को उसकी मां फिर क्या करती है भाई के ऊपर में ज्यादा ध्यान देगी अच्छा खाना बना करके देगी और वो वो खुद बेचारी लड़की है तो उसका इतना ध्यान नहीं रखेगी तो वह बोलती है मुझे इस बात का इतना दुख होता है तो मैंने देखो कि यह सब चीजें हम वैसे पढ़ते तो कि लड़कों के ऊपर में ज्यादा प्रेम रहता है। लड़की के ऊपर में कम प्रेम रहता है। यह जो होता है कभी-कभी तो सुना था देखा कभी नहीं। एटलीस्ट हमारा जो फैमिली है उस फैमिली में मैंने ऐसा कभी नहीं देखा। तो किंतु सुना ही है सब यह सब चीजें। किंतु इसने जब मुझे कहा तो पहली बार मुझे यह एक लाइव एग्जांपल देखने को मिला। यह वो कहती थी वो डिवोटी कि एक बार मैं स्कूटी लेकर के जा रही थी। वो गिर गई तो फिर थोड़ी सी इंजरी भी हुई। सो घर आई तो उसकी मां कहती है कि अरे तुमने स्कूटी को क्यों डैमेज कर दिया? अभी इसको रिपेयर करने का कौन पैसा देगा? तो वो डिवोटी कहती है कि मुझे तो पूछा ही नहीं कि तुम गिरी हो तो तुमको लगा है तुमको इंजरी हुई है। ट्रीटमेंट चाहिए। क्या हुआ? थोड़े से स्नेह के दो वचन। ऐसा नहीं। स्कूटी को क्या वो यह हो गया डैमेज। अभी पैसा खर्च करना पड़ेगा। अभी ऐसा ही उसके भाई के साथ में कुछ होता तो स्कूटी फूटी को भूल करके सबसे पहले उसके भाई की चिंता करती। तो ऐसे मां-बाप भी होते हैं कि लड़का लड़की है तो लड़कों के प्रति ज्यादा स्नेह है। लड़की के प्रति कम स्नेह है। तो ऐसा होना यह कंप्लीटली एबनॉर्मल है। मनुष्य के भीतर में यह भाव रहते हैं। जगत जननी के भीतर में आध्या शक्ति के भीतर में इस तरह का यह जो फेवरेटिज्म है या प्रजुडाइस है किसी के प्रति वह कभी नहीं रहेगा। यह है आदर्श। और इसीलिए यहां पर महाराज जी इतना सुंदर शब्द यूज करते हैं। विचार शून्य स्नेह पूर्ण हास्य मैं कुछ भी करूं मैं लड़का हूं ना कि लड़की इंटेलेक्चुअली शार्प हूं ना कि इंटेलेक्चुअली डेफिशिएंट। मेरी मां का मेरे प्रति एक समान व्यवहार होना चाहिए। वह मुझे जज नहीं करनी चाहिए। तभी तो मैं अपने भविष्य के बारे में आश्वस्त होऊंगा। और इसीलिए शशव होते मायर मुखे से उच्च भाव देखते अभ्यस्तो साधनार खेत्रे से केनो उहाते बंचितो थाकबे शैशव हो म शिशु अवस्था से ही जब एक साधक अपनी मां के चेहरे पे यह विचार शून्य स्नेह पूर्ण हास्य देखने को वह हैबिटचुएटेड हो गया है तो साधना के क्षेत्र में वह इस भाव से क्यों वंचित रह जाए? बचपन में मां उसको स्नेह करती है। वह चाहे लड़का हो ना कि लड़की। चाहे वह अच्छे मार्क्स लाता हो कि ना लाता हो। वो जो अनकंडीशनल विचार शून्य स्नेह उसको मिल रहा है और जजमेंट लेस स्नेह उसको जो मिल रहा है वही स्नेह वो क्यों ईश्वर के पास में से प्राप्त करना नहीं चाहेगा? इसीलिए ईश्वर का जननी रूप में आगमन अहेतु करुणामय गुरु शिष्य के उच्च तत्व परिचय और उपदेश दिया ताहार मने जागतिक भोग सुखेर प्रति वैराग्य संचार कोरेन अच्छा टाइम हो गया मैंने देखा ही नहीं टाइम की ओर अच्छा यह अभी इसके बाद में थोड़ा डिफरेंट टॉपिक चालू होता है इसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: कल्पना और भाव में क्या अंतर है?
डिफरेंट है और लिंक भी है। देखिए भाव यदि मुझे किसी के साथ में स्थापित करना है तो उसका सानिध्य चाहिए। अब जैसे मैं अपने घर में मां-पिताजी के साथ में रह रहा हूं। बहन के साथ में रह रहा हूं। स्कूल में यदि जाता हूं तो मेरे मित्र हैं मेरे साथ में। यदि मैं जॉब करता हूं तो मेरे बॉस है। तो जो एक शारीरिक या तो फिर कहेंगे कि फिजिकल जो नियरनेस है उसके माध्यम से यह भाव प्रकट होता है। राइट? अभी साधना के क्षेत्र में तो यह संभव नहीं है। मैं वैुंठ में ना कि कैलाश में जाकर के भगवान शिव के साथ में तो मैं बैठने वाला नहीं। वह शारीरिक या तो फिर यह जो फिजिकल नियरनेस है वह तो होने वाली नहीं। तो फिर मुझे तो इमेजिनेशन ही करना है कि मैं दक्षिणेश्वर में गया हूं या कैलाश पे गया हूं या वैुंठ में हूं या व्हिच एवर हु एवर इज माय इष्ट अद्वैत वेदांत की साधना कर रहा हूं। तो मैं अपने हृदय में आत्मन का दर्शन करता हूं। बट एवरीथिंग हैपेंस ऑन द फील्ड ऑफ इमेजिनेशन। वहां पर फिजिकल इंटिमसी या फिजिकल नियरनेस नहीं है। यानी ईश्वरीय भाव यदि मुझे प्रकट करना है तो मुझे इमेजिनेशन का ही सहारा लेना पड़ेगा।
प्रश्न: कल्पना को बनाए रखना बहुत थकावट दायक होगा?
देखिए थकाने वाली चीज कब होगी कि जब कि भाव प्रकट नहीं होता है। इट इज लाइक के आइंस्टाइन का फेमस उदाहरण है रिलेटिविटी। किसी जर्नलिस्ट ने जाकर के न्यूज़पेपर रिपोर्टर ने जाकर के आइंस्टाइन को पूछा कि हमको तो मैथमेटिक्स आता नहीं है। आप हमको रिलेटिविटी समझा दीजिए एकदम सहज भाषा में। अभी रिलेटिविटी क्या है कि आपके वो स्टेट जो होता है फिजिकल सिस्टम का वो डिपेंड करता है किसी एक दूसरे स्टेट के ऊपर। इसको रिलेटिविटी कह बेसिकली वो मैथमेटिक्स का बड़ा कॉम्प्लेक्स क्वेश्चन सिस्टम है। अब सामान्य भाषा में सामान्य आदमी को रिलेटिविटी कैसे समझाए? तो आइंस्टाइन बड़ा सुंदर उदाहरण देता है। बोलता है कि आप गर्म तवे पर आप बैठ गए होंगे तो एक पल भी एक सेकंड भी आपको एक घंटे जैसा लगेगा। क्योंकि वो सफरिंग जो है वो इतना इंटेंस होगा। और यदि आप स्नेह के पात्र के साथ में बैठकर के गप लगा रहे हैं तो एक घंटा भी एक सेकंड जैसा लगेगा। क्यों? क्योंकि टाइम ऐसे बीत जाएगा कि आपको पता भी नहीं चलेगा। अभी देखिए कि दोनों के बीच में डिफरेंस क्या है? वहां पर सफरिंग है। यहां पर लव है। लव जो है वो आपको समय एक घंटा चला ऐसा लगेगा आप किसी के साथ में बात कर रहे हैं। मित्र के साथ में ना कि जिसके साथ में आपका प्रेम है उसके साथ में बात कर रहे हैं। कहां टाइम चला गया? कोई कहेगा हेलो जाने का समय हो गया। हम आश्चर्यचकित हो जाएंगे। अरे ये कहां चला गया समय। क्यों? क्योंकि वहां पर प्रेम, स्नेह, भाव वो उपस्थित है। तो वैसे ही इमेजिनेशन हम यदि स्टार्ट करेंगे और स्नेह जब प्रकट जब तक नहीं होता है तब तक ये हमको हार्ड वर्क लगेगा। यह मेंटेन करना। मैं दक्षिणेश्वर में हूं। ठाकुर के सामने बैठा हूं। अब यह पूरी इमेजिनेशन मेंटेन करना मुश्किल है। किंतु एक बार यह भाव धारा बहने लगती है। फिर वो सहज हो जाएगा। फिर कहां टाइम चला जाएगा आपको पता ही नहीं चलेगा। मैंने इस तरह की बहुत सारी ये कंस्ट्रक्ट हम जो बात कर रहे थे ना दिस आर कंस्ट्रक्ट और उसमें ही मैंने कहा था कि कंस्ट्रक्ट को मेंटेन करने के लिए कंस्ट्रक्ट को फाउंडेशन है वो है भाव। यदि भाव नहीं रहेगा तो एक कंस्ट्रक्ट टिकेगा नहीं। वो फिर एक बर्डन हो जाएगा। आप जैसे कि वो आप बिजनेस में आपको कोई बिजनेस प्लान बनाना है तो कितना डिफिकल्ट होता है। वो आप घर आएंगे तो पूरा थक जाएंगे कि मुझे नेक्स्ट 5 साल में कहां पे इन्वेस्ट करना है। किस तरह से मैन्युफैक्चरिंग वो ये सब करना है। इट्स अ वेरी एग्जॉस्टिंग वर्क। तो जब तक भाव नहीं रहेगा तो वो एग्जॉस्टिंग हो जाएगा। किंतु एक बार कंस्ट्रक्ट खड़ा किया उसमें भाव यदि बहने लगा तो फिर कहां टाइम चला जाएगा पता ही नहीं चलेगा। मेरा खुद का एग्जांपल है। मैं जब रांची में ट्राइबल एरिया में जाता था। मुझे इतना अच्छा लगता था और दूसरे कुछ-कुछ लोग थे। मैं उनको फोर्स करता था। अरे चलो ना मजा आएगा। वहां पे गांव है, जंगल है, पहाड़ है, नदी है। वो बोलेगा, अरे भाई रास्ते इतने डेंजरस है और जिप में तो तुम्हारे जंपर नहीं है। वो वो सीधा वो वो ऐसा लगता है कि वह फुल बॉडी मसाज कर रहे हैं वहां जाने के समय। मुझे बैक पेन हो जाता है। मुझे यह हो जाता है। मैंने सोचा अरे भाई यह सब चीजें मुझे फर्क भी नहीं पड़ता। क्यों? क्योंकि वो उनके प्रति मेरी सहानुभूति थी। सो आई हैव रियली फेल्ड इट। वो फिजिकल हार्डशिप वो लगती नहीं है उस समय।
प्रश्न: एक ओर स्वामीजी कहते हैं कि हमें सभी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर लेनी होंगी और वेदांत केसरी की तरह इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी, वहीं दूसरी ओर ठाकुर जी संतान भाव में पूर्ण समर्पण की शिक्षा देते हैं। ये दोनों बातें विरोधाभासी लगती हैं।
देखिए ठाकुर के जीवन में इसको हमको स्पष्ट यह प्रोग्रेशन दिखता है कि वो पहले भाव साधना की। उसके बाद में तोतापुरी के पास में यह जब वेदांत साधना कर रहे थे। ठाकुर क्या कहते हैं? बार-बार मां का वो जो मूर्ति है नजर के सामने आ जाता है। तो फिर मैंने क्या किया? ज्ञान अस से मूर्ति को काट दिया। और जैसे ही मूर्ति को काटा सीधा मेरा मन हू हू करके वह ब्रह्म भाव में विलीन हो गया। किंतु जब वह निर्विकल्प समाधि में स्थित हुए और उनको यह आदेश मिला कि तू भावमुख्य था तो फिर से वह संतान भाव लेकर के वापस आए। यानी कि यह तो पूरा एक चक्र है। यहां पे बिगिनिंग और एंड पैरेलल यह सब नहीं। हमारा जो डेवलपमेंट है कि भाव साधना करके आपने संस्कारों से मुक्ति प्राप्त की। उसका अर्थ है कि आपने विषय वासनाओं से मुक्ति प्राप्त की। जैसे विषय वासनाओं से मुक्ति मिलेगी आपका विल पावर बढ़ेगा। फिर इस विल पावर से ज्ञान रूपी असी से मैं माया को काटूंगा और आत्म साक्षात्कार प्राप्त करूंगा। और फिर हो सकता है कि नेति नेति करके यदि निर्विकल्प समाधि में चला जाऊं। ज्यादातर हम लोगों के साथ में क्या होगा कि भाव साधना करके विल पावर बढ़ाना है। विल पावर बढ़ा करके मन को वासना मुक्त करके मन को आत्म साक्षात्कार आत्म तत्व में एकाग्र करना है। तो हमारे लिए यह दोनों पैरेलल चलेगा। हमको इस जीवन में एटलीस्ट मुझे तो ऐसी कोई आशा नहीं है कि मुझे निर्विकल्प समाधि मिलेगी। किंतु इस आशा की एक जन्म में मिलेगी। उस आशा को रख के हम दोनों पैरेलल करते जाए कि यहां पर भाव साधना करके विल पावर को बढ़ाते रहे और विल बढ़े हुए विल पावर से विषय वासनाओं से मुक्त होकर के आत्म तत्व में एकाग्र करते रहे। यह भाव और यह विचार मार्ग दोनों साथ-साथ में चले जहां तक हम चलाते रहे और एक जन्म ऐसा आएगा कि ठाकुर की तरह निर्विकल्प समाधि में चले जाएंगे। तो जब निर्विकल्प समाधि में जो वो जो थ्रेशहोल्ड है वो थ्रेशहोल्ड पे जाने के समय हमको भाव से मुक्ति पानी होगी। उस समय यह ज्ञान अस से भाव को काट देंगे और निर्विकल्प समाधि में जाएंगे और फिर यदि यह नसीब हुआ कि मां कहेगी कि जाओ वापस तो फिर से उसी भाव का आशरा लेकर के वापस आएंगे। राइट? सो किंतु जब तक वो नहीं होता है तब तक हमको दोनों को पैरेलल चलाना है।
प्रश्न: जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारी इच्छा शक्ति कम होती जाती है। इसे कैसे बनाए रखें?
इसमें होता क्या है पता है? देखिए, उम्र अपना काम करती है। इसीलिए एक बार साधना का जोर लगा करके एक स्टेबल सिचुएशन में पहुंच जाना है। अह अभी फिजिकल हेल्थ तो अपनी जगह पर है। किंतु यदि जहां तक यह विषय वासनाओं के मुक्त होने की यह बात है। एक बार जोर लगा करके हमको एक स्टेबल सिचुएशन में पहुंच जाना है। जैसे वह ठाकुर उदाहरण देते हैं ना कि वह खलासी है। नौका चला रहा है। जब वह तूफान आता है, तो सब वह छोड़ करके वह जो पाल है उसका जो सेल उसको पकड़ कर के तूफान पार कर जाता है। स्टोम वह क्रॉस कर जाता है। फिर आराम से बैठकर के वह हुक्का पीता है। वह धूम्रपान करता है। तो वैसे ही यह साधना के क्षेत्र में एक बार जब तक शरीर और मन स्ट्रांग है। एक बार साधना करके कुछ ना कुछ एक प्राप्त कर लेना है। उसके बाद में नेचुरली जैसे उम्र बढ़ेगी शरीर और मन दोनों शिथिल होता जाएगा। तो उस समय फिर शरणागति का आश्रय ले रहना है। यानी कि हमारे जीवन में भी एक छोटा सा यह सर्कल है कि एक बार शुरू शुरू में जैसे मैं अपनी खुद की बात करूं जैसा आपने कहा ना कि आपके साथ में यह कि मैं भी जब बेलूर मठ में था उस समय मेरा जो रूटीन था दोनों टाइम में मतलब मैं ट्रेनिंग सेंटर में था उस समय भी और यह कंप्लीट वर्क्स में था उस समय भी। दोनों समय मेरा एक एग्ेंपलरी रूटीन फॉलो करने का प्रयास किया है। किंतु बाद में जब मैं राजकोट आया तब मैंने देखा कि अभी क्या है कि एक पूरा मानसिक शिथिलता आ गई है। वो बेल मठ की तरह अभी मैं नहीं रह पाऊंगा कि सुबह को 4:00 बजे मंगल आरती है। फिर नाश्ते का टाइम है 6:00 बजे का 6:30 का। यानी कि मेरे पास में ढाई घंटा है तपस्या करने का। तो सॉलिड बैठकर के जग ध्यान कर लिया। फिर वहां पे साइड टेंपल जितने भी है तीनचार चक्कर लगा लिए फटाफट चलते-चलते और और सामने सूर्योदय हो रहा है वह देखतेदेखते संध्या का समय है तो संध्या आरती 7:00 बजे के आसपास की समाप्त होगी और 6:30 के आसपास 7:00 बजे के आसपास समाप्त होगी और फिर 9:00 बजे खाने का टाइम है तो आराम से मुझे 3 घंटा मिल जाता है। मैं पूरा 3 घंटा गंगा के किनारे बिताता था। एकदम दो चार साल जो मैं रहा पक्का मैंने नियम किया था कि संध्या आरती के बाद का समय तो गंगा किनारे ही बिताना है। किंतु जैसे मैं राजकोट गया ना मेरा पूरा ये सब जैसे कि ये लूज हो गया। मतलब वो कैपेसिटी नहीं रही। अभी आज मुझे यदि बेलूर मठ पोस्टिंग होगा तो मैं यह नहीं कर पाऊंगा। वो फिर मैं कमरे में चला जाऊंगा। लेटे कुछ पढ़ता रहूंगा या तो कुछ ऐसा कुछ करूंगा। वो तपस्या करने की क्षमता अभी नहीं। तो क्या होता है? हम सभी के जीवन में जब क्षमता होती है तो एक बार जोर लगा के एक स्टेटस प्राप्त कर लेना है। उसके बाद में फिर वह शरणागति को लेकर रहना है। अभी मैं यहां पे आया हूं। फिर से मैं थोड़ा ट्राई कर रहा हूं। वो सी शोर है यहां पे सुबह को जाने का। वो कभी जाता हूं कभी नहीं जाता हूं।
प्रश्न: माँ के भाई - प्रसन्न मामा - ने माँ की मदद नहीं की, हालाँकि उनके लिए मदद करना संभव था। यदि हम उस शक्ति का उपयोग नहीं करते जो भगवान ने हमें दी है, तो भगवान हमें और अधिक शक्ति कैसे देंगे?
किंतु देखिए वो हो गया विधिवादी कर्म मार्ग कि आपको जितनी दोरी दी है जितनी रस्सी है उतना आप म कर लो आप घूम लो। और यह हो गया आपका कि यह गैरकानूनी मार्ग कि वह भी नहीं कर पाऊंगा। अभी बताओ क्या करना है? तो गिरीश का जो क्षमता दी है आपने उसका भी मैं इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा। अभी बताइए आप क्या करना है?
प्रश्न: गिरीश ने काफी सोच-विचार के बाद ठाकुर को पावर ऑफ अटॉर्नी दी। प्रसन्न मामा के मामले में ऐसा नहीं है।
एग्री विद यू। किंतु सामने यदि आर्गुममेंट ही करनी है तो यह कह सकते हैं कि यह तो मां के भाई थे। उनका दावा बनता है। ये शरणागति भी नहीं करूंगा। अभी बताओ क्या करना है? बोले गिरीश को भी छोड़ के ऊपर चले गए। मां ने कहा मां ने कहा कि मेरे भाइयों ने माथा काटा तपस्या की होगी। माने सर काट के तपस्या की होगी। तभी मैं उनके घर में उनकी बहन हो के आई हूं। मां ने खुद ने कहा है। वो जो हाजरा वहां पर बैठा रहता था। तो हाजरा क्यों बैठा रहता है? वो ठाकुर उसकी देखिए वो बड़ा सुंदर डायलॉग है ठाकुर और नरेंद्र के बीच में और ठाकुर कहते हैं कि वो वहां मैंने सुना ऐसा ठाकुर कहते हैं कि मैंने ऐसा सुना लोग कहते हैं कि वो उसके घर गया था किसी ब्राह्मण के घर पे और उसको कहा कि तुम मैं शौच करने के लिए जा रहा हूं मेरे साथ में लोटा लेकर चलो वो हाथ धोने के लिए तो ब्राह्मण लोग बड़े नाराज हो गए ब्राह्मण का तो वह जाति कुल शील वो सब अभिमान होता है ना वो हमको लोटा लेकर जाने को कहा तो शौचका यह क्या बात हो गई तो ठाकुर ऐसा नरेंद्र को कहते हैं कि मैंने ऐसा सुना है तो नरेंद्र कहता है कि नहीं नहीं मैंने वो पूछ करके कंफर्म किया है कि वो ब्राह्मण लोग जो है उन्होंने सामने से ऑफर किया कि मैं लोटा ले जाऊं कि आपके साथ में तो देखिए कि यहां पे ये जब डायलॉग पढ़ते हैं ना तो हमको लगता है कि ठाकुर जैसे कहीं सुई कहीं सुनी बातों पर विश्वास करते हैं और उन्हें आश्चर्य लगा था मुझे शुरू में और नरेंद्र जो है वो पक्का इन्वेस्टिगेटर है। तो सब कुछ वो कंफर्म करके बात करता है। किंतु देखिए कि ये जो पहली नजर से ऐसा लगता है। दूसरी नजर से देखें ना थोड़ा सा जो मेरी खुद की बुद्धि लगा करके मैं कह रहा हूं। मुझे ऐसा लग रहा है कि ठाकुर जैसे कि हाजरा को एज एक काउंटर पॉइंट के रूप में खड़ा कर रहा है। जिसके साथ में इंटरेक्ट करके नरेंद्र खुद कुछ सीखे। उसका खुद का चरित्र डीप हो। यहां पर ठाकुर जैसे कि माने एक नाटक करके एक पूरी बात कर रहे हैं। वो पूरा एक नाटक खड़ा कर रहे हैं। जैसे कि अभिनय कर रहे हैं कि मैंने ऐसा सुना हाजरा के बारे में वो ऐसा है। तो सामने नरेंद्र को किंतु तो पूरे क्या है कि जगत में वेदांत को फैलाना था। उसकी तो वो एक क्या कह प्रैक्टिकल बुद्धि चाहिए। वो यदि ऐसी कही सुनी बातों पर विश्वास करेगा तो कैसे चलेगा? तो उसको ठाकुर को सिखाना है तो इनडायरेक्टली इस तरह से हाजरा का वह माध्यम लेकर सिखा रहा है।
प्रश्न: पिता स्कूल में बच्चों के प्रदर्शन को देखते हैं लेकिन माँ बिना किसी शर्त के प्यार करती हैं। यह बात ठाकुर और माँ के मामले में बिल्कुल सच है।
मां ने खुद ने कहा था किसी ने आकर मां को पूछा कि मां देखिए ना ठाकुर के संतान तो कितने बड़े त्यागी तपस्वी साधु निकले और तुम्हारे संतान को देखता हूं कि वह क्या कुछ गड़बड़ कर रहे हैं क्या कर रहे हैं तो मां सामने फटाक करके उत्तर देती है। ठाकुर कितना वो सोच समझ कर के शिष्य बनाते थे और जितने असार है जितने निकम्मे हैं सब मेरे पास में भेज दिए हैं। मां ने खुद ये बात कही तो जय राम बाटी से एक डिवोटी आया और यह सब महा राजा महाराज है बाबूराम महाराज है बेलूर मठ में वो जो गंगा की ओर का किनारा का वो जो यह है वरांडा वहां पर बैठे हुए थे और यह भक्त कह रहा है कि मां ने ऐसी बात कही है तो बाबूराम महाराज कहते हैं कृपा ही केवलम कृपा ही केवलम यानी कि मां माही है जो कि यह जहर पचा सकती है। वह जो मैंने बताया था ना एक बार कि स्मरणानंद जी ने मोस्ट प्रोबेबबली यह बात कही है। ठाकुर मां स्वामी जी का फोटो देखेंगे ना वो जो वरशिप पोज है तो स्वामी जी की आंख ऑलमोस्ट बंद है। ठाकुर की आधी खुली है। मां की पूरी खुली है। तो माने स्वामी जी एकदम चेकिंग करके डिसाइपल बनाएंगे। ठाकुर है कि ज्यादातर लोगों को एक्सेप्ट करते हैं। जबकि मां है वह सबको एक्सेप्ट कर लेती है। वह आंख कितनी खुली है उसके बेस पर वो कितने को एक्सेप्ट करते हैं। स्वामी जी के डिसाइपल देखेंगे कि वो बहुत कम है।
प्रश्न: स्वामीजी के बहुत कम औपचारिक शिष्य थे।
इसके बारे में मैरी लुईस न्यू डिस्कवरी में डिस्कस करती है। वो स्वामी जी कहते हैं एक बार कि मैंने विदेश में हजारों हजारों शिष्यों को बनाया है। प्रणव मंत्र में मैंने इनको दीक्षा दी है। तो वह कैसे कि स्टेज ऊपर से वह कहते हैं कि यह प्रणव मंत्र है। उसकी उपासना करनी चाहिए। तो इस तरह से यदि कहेंगे तो उनके काफी शिष्य थे। बट दिस जैसे आपने कहा दिस इज नॉन ट्रेडिशनल वे। अपना जो ट्रेडिशनल वे है वो उस ट्रेडिशनल वे में उन्होंने बहुत कम लोगों को दीक्षा दी है। वो जो हरिपदो मित्र जो था उसकी जो पत्नी थी इंदुमती देवी मोस्ट प्रोबेबबली यही नाम है उसका। तो उसको एक दीक्षा दी थी। फिर उसको लेटर भी लिखते हैं। तो इस तरह के डिसाइपल जो ट्रेडिशनल जो है वो स्वामी जी के आपको ज्यादा नहीं मिलेंगे। और इसके बारे में मेरा जो अभी तक का जो थिंकिंग था कुछ समय पहले तक का कि स्वामी जी ने खुद ने बाबूराम महाराज को कहा था कि तुम दीक्षा मत देना। राजा को दीक्षा देने देना। वरना तो तोर शिष्य देव लेठाठी होवे। अर्थात लेठाठी अर्थात कि लाठी लेके लोग आपस में लड़ाई झगड़ा करेंगे। वो जो गुरुवाद होता है ना कि मेरे गुरु बाबूराम महाराज है मेरे गुरु है ब्रह्मानंद जी है तो शिष्यों में झगड़ा होगा तो यह सब बिना मतलब का भविष्य के संघ में यह सब ना हो बोलकर के संघ गुरु है वही दीक्षा दे और कोई दीक्षा ना दे तो अच्छा है तो यह ट्रेडिशन जो है अपने ऑर्डर में उसी समय से चली आ रही है तो मैं भी वही सोचता था कि स्वामी जी का भी शायद यही होगा कि राजा ही ट्रेडिशनल वे में दीक्षा दें क्योंकि राजा महाराज को ही उन्होंने प्रेसिडेंट बनाया था। किंतु अभी जो मेरा जो लेटेस्ट थिंकिंग है जैसे हमने यह फेजेस और पीरियड्स डिस्कस किए कि स्वामी जी का फेज 19 और 2 में समाप्त हो जाता है। उसके बाद में 20 साल मां का यह जो मिनिस्ट्री चला है। यानी कि यह जो ट्रेडिशनल वे में दीक्षा देना स्वामी जी ने राजा महाराज को दिया है। मोर देन दैट स्वामी जी को पता है कि जगत जननी स्वयं यहां पर उपस्थित है। तो यह कार्य उसी के द्वारा हो रेदर देन कि मेरे द्वारा तो मां के लिए स्वामी जी ने स्टेज तैयार कर दिया है किंतु फिर स्टेज तैयार होने के बाद में वहां से निकल लिए हैं।
प्रश्न: माँ के पास राजा महाराज से अधिक शिष्य होंगे।
मुझे ऐसा लग रहा है क्योंकि राजा महाराज के पास में दीक्षा जिन्होंने ली है वह बहुत सारी ये सब कहते हैं कि आज नहीं कल आओ। ये वो सब राजा महाराज का काफी नाटक चलता है। किंतु मां के पास में ऐसा कुछ नहीं है। एग्जैक्ट नंबर मुझे नहीं पता किंतु अनुमान करके कह रहा हूं कि मां के दीक्षित ज्यादा होंगे शायद। और वो क्या रूढ़िच चुस्त समय था। यानी स्त्री गुरु हो ऐसा नहीं कि वो पुरुष गुरु होना चाहिए। तो अब जैसे कि मैंने बताया था शायद एक बार कि नागपुर की ही बात तो मैं नागपुर में मेरा पोस्टिंग था तो जो मठ की जो जमीन है वो जिसने दी है वो ऐसा कोई ब्राह्मण ही शायद होगा और काफी ऑर्थोडॉक्स था तो फिर उसका क्या कहना है पता है कि पहले तो राजा महाराज थे तो राजा महाराज तो ब्राह्मण नहीं है कायस्थ है तो उनसे दीक्षा नहीं लूंगा फिर थे यह महापुरुष महाराज तो महापुरुष महाराज भी आई थिंक हां वो शायद ब्राह ब्राह्मण होंगे डोंट रिमेंबर हां वो नहीं वो ब्राह्मण नहीं थे तो उनसे भी दीक्षा नहीं ली फिर अखंड नहीं थे ना ब्राह्मण थे अच्छा अच्छा तो फिर शायद वो हां तो फिर वो महापुरुष महाराज के पास में दीक्षा लेने को गए होंगे तो महापुरुष महाराज ने दीक्षा देने से इंकार कर दिया कि मां के रहते राजा महाराज के रहते दीक्षा नहीं ली और मेरे पास आओगे दीक्षा लेने के लिए तो मैं दीक्षा नहीं दूंगा तो वो स्त्री है उससे दीक्षा नहीं लेनी यह ब्राह्मण नहीं है इसलिए दीक्षा नहीं लेनी तो उस समय था यह सब तो उस समय में मां ने इतने लोगों को दीक्षा दी वि इज समथिंग रियली ग्रेट