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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 25 Mar 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी की जीवन कथा स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित कल जो चैप्टर हमने समाप्त किया उसका नाम था नीरव साधना अभी इस चैप्टर के आखिर में हमने दो प्रसंग देखे थे। जनरली हम जो

ठाकुर और स्वामीजी को प्रथम ईश्वर-दर्शन प्राप्त करने के लिए साधना करनी पड़ी, बाद में उन्होंने जगत के साथ एकात्मता प्राप्त की. माँ के जीवन का प्रारंभ ही इस एकात्म-अनुभूति से हुआ है.

लोग मां के जीवन के साथ में परिचित हैं उनको पता ही होगा कि मां के जीवन के साथ में हम यूजुअली भाव या समाधि या दर्शन वगैरह को एसोसिएट नहीं करते हैं। मां की पवित्रता मां का जो एक सूच सुदार एक विराट एक हृदय था उनका जो मातृत्व प्रेम था वो इतना गंभीर था कि दर्शन या भाव या तो समाधि वो सब कांसेप्ट जो अपने आध्यात्मिक जीवन में वर्णित किए गए हैं या तो फिर आध्यात्मिक शास्त्रों में जिसको कि मनुष्य का सर्वोच्च उद्देश्य के रूप में जिसको कि लिखित किया गया है वह सब उद्देश्य जैसे कि मां के मातृत्व के सामने छोटे पड़ जाते हैं। मां का जो मातृभाव है, संतानों के प्रति जो करुणा है, उसके सामने यह सब कुछ जैसे कि एक म नगणीय इस तरह से बोध होता है। ऐसा लगता है कि समाधि प्राप्त करने से भी ज्यादा एक उच्च अवस्था है जो कि मां का मातृत्व है। और इसी को देखकर के ठाकुर जब नरेंद्र को कहते हैं नरेंद्र जब काशीपुर में थे ठाकुर को कैंसर हुआ था ट्रीटमेंट के लिए जब लाए गए थे तब नरेंद्र कहता है ठाकुर को भविष्य के स्वामी विवेकानंद कि मैं चाहता हूं कि मैं निर्विकल्प समाधि में पड़ा रहूं। उस समय ठाकुर क्या कहते हैं कि देखो कि यह तो एक छोटा सा चीज है या तो फिर इससे भी परे इससे भी बड़े उच्च मुकाम है उच्च माइलस्टोन है जहां तक तुमको जाना है। ठाकुर ने कहा कि मैंने तो सोचा था कि तुम एक विराट वटवृक्ष की तरह होगे जिसकी कि छांव में कितने लाखों लाखों लोग शांति और आश्रय प्राप्त करेंगे। तो वह जो आदर्श ठाकुर ने नरेंद्र के लिए जो रखा था वह आदर्श देखिए कि वही आदर्श मां के जीवन में कितना संपूर्ण रूप से फलीभूत होता है। जो बात ठाकुर ने नरेंद्र को काशीपुर में कही कि निर्विकल्प समाधि के परे जाओ। अपने हृदय को एक विराट एक महासागर की तरह बना दो जिसमें कि स्नान करके उस पुण्य संगम में स्नान करके लाखों लाखों लोग भवसागर तैर जाए। इस तरह से अपने हृदय को बनाओ। जो साधक सिर्फ अपनी खुद की मुक्ति की आकांक्षा रखता है, जो अपनी खुद की एक तरह से ईश्वर दर्शन की प्राप्ति के लिए मारामारा घूमता है। वह तो एक अपने सेल्फिश आदर्श के लिए स्वार्थ के लिए यह सब कुछ कर रहा है। निस्वार्थता वह उससे भी बड़ा एक गुण है। उससे भी हायर है आध्यात्मिक ऊंचाई में। यदि इसको आप यह कहेंगे कि हां यह अल्टीमेट एम है निर्विकल्प समाधि तो हम कहेंगे कि हृदय को इतना विशाल बना देना कि समाज के मनुष्य सभ्यता के इस विश्व ब्रह्मांड के जितने भी है पशु पक्षी मनुष्य पदार्थ जो कुछ भी है सब कुछ उस विशाल विराट हृदय के अंगभूत हो जाए। उस विशाल विराट हृदय की करुणा, दया और प्रेम के परवश हो जाए। तो वो सर्वोच्च अल्टीमेट एम है स्पिरिचुअल लाइफ का। तो वो अल्टीमेट एम प्राप्त करने के लिए ठाकुर ने इतनी साधनाएं की। साधना करके निर्विकल्प समाधि प्राप्त की। नेति नेति करके जितने भी कामनाएं हैं, वासनाएं हैं उनका त्याग किया। एक के बाद एक ठाकुर के जितने भी शिक्षक गुरु आते गए उन्होंने ठाकुर को विभिन्न साधन पद्धतियों का मार्गदर्शन देकर के उनसे उस साधन पद्धति में सफलता प्राप्त करवाई। आखिर में निर्विकल्प समाधि के बाद में जब मां जगदंबा ने ठाकुर को कहा कि तू भावो मुखे थाक तुम भावो मुख में रहो। यानी कि यह कॉन्शियस सुपर कॉन्शियस की बॉर्डर लाइन के ऊपर में जब रहो तब कहीं जाकर के ठाकुर वापस आए और उन्होंने वह कुठी जो है यदि आप दक्षिणेश्वर गए होंगे तो आपने देखा होगा कि मथुर बाबू जब दक्षिणेश्वर आते थे तो वह कुठी घर में रहते थे तो उसकी छत के ऊपर में जाकर के ठाकुर ने भक्तों को पुकारना शुरू किया कि तुम लोग कहां पर हो आओ यह संसार की बातें सुनकर के मेरे कान झुलस गए तो तब कहीं जाकर के ठाकुर की साधना की परिसमाप्ति हुई थी और यही उपदेश ठाकुर ने नरेंद्र को दिया था कि देखो निर्विकल्प समाधि तो सिर्फ तुम्हारे माने यह ठाकुर के शब्द नहीं यह मेरे शब्द है कि निर्विकल्प समाधि यदि हम प्राप्त करना चाहते हैं तो वह तो सिर्फ मेरे ही जीवन का एक उद्देश्य हुआ या तो फिर मेरे ही जीवन की एक आध्यात्मिक प्राप्ति हुई। जगत को उससे क्या उससे क्या माने बेनिफिट यह शब्द तो यूज़ करना ठीक नहीं है। जगत में इसका से क्या परिणाम आया या क्या उसका असर दिखाई दिया कुछ नहीं। तो ये ठाकुर जी ऐसे कहते हैं कि कोई-कोई जो ऋषि मुनि थे वो ऋषि मुनिरा भय तराश तो अर्थात कि जो ऋषि जो थे उन लोगों को डर लगता था। कैसे भी करके अपने से भवसागर तैर जाए और बस वहीं पर उनके जीवन का अंत आ गया। जबकि यह नारद वगैरह थे बहादुरी काट इतने शक्त मजबूत लकड़ियां कि जिनकी कि आप विराट नौका बना के उस नौका में बिठा के लाखों लाखों लोगों को भवसागर पार करवा दें। तो यह ठाकुर के जीवन की निर्विकल्प समाधि के बाद की जो उपलब्धि थी जो उपलब्धि ठाकुर ने नरेंद्र के भीतर में ट्रांसमिट की थी और उसी उपलब्धि को प्राप्त होकर के नरेंद्र ने पूरे विश्व में भ्रमण किया पूरे भारत में जब भ्रमण किया भारत की दुरावस्था देखी और तब कहीं जाकर के नरेंद्र को लगा कि अरे यदि यह मेरा भारत देश इतनी दुरावस्था में है तो जब वह शिकागो में थे विश्व प्रसिद्ध हो चुके थे उनके एक बड़े धनी उनके भक्त फॉलोअ थे या तो डिवोटी थे। उनके घर में जब स्वामी जी रह रहे थे तब उस समय एक बड़ा सुंदर बिछाना उनको शयन करने के लिए दिया गया। उसके ऊपर नहीं सोकर के जमीन पर स्वामी जी लेटे रहे और यह सोच के रोते रहे कि देखो कि मैं इतना लग्जरी में जी रहा हूं। किंतु मेरे भारतवासी भाई-बहन देखिए कितनी भयानक अवस्था में कितनी भयानक गरीबी और कष्ट में जी रहे हैं। तो देखिए कि ठाकुर और स्वामी जी का पूरा जीवन जिस उदार हृदयता विशाल करुणा भरपूर हृदय को प्राप्त करने के लिए गया वो हृदय वो मातृभाव मां के भीतर में पहले से ही था। यानी कि ठाकुर को साधना करके जो सिद्धि प्राप्त करनी पड़ी, वह सिद्धि को लेकर के ही मां का जैसे जन्म हुआ था। बाद में तो सिर्फ उस सिद्धि को लोगों के भीतर में बांटना ही था। उसके अलावा मां के जीवन में और कोई कार्य रहा ही नहीं कि साधना करनी है, साधना में फिर सफलता प्राप्त करनी है। वह सब तो कुछ था ही नहीं। हां, मां जप किया करती थी। किंतु जब भी तो मां करती थी अपने शिष्यों के लिए उनके जो संतान है उनके लिए तो यह पूरा मां जो ठाकुर और स्वामी जी के जीवन का जहां पे अंत आता है मां के जीवन की वहां से प्रारंभ होता है। मां ने निर्विकल्प समाधि या तो आध्यात्मिक भाव या दर्शन उसको तो मां जैसे खा ही गई है। उसके बाद का जो कार्य है कि पूरे जगत को अपने मातृभाव में जैसे कि आवृत्त कर लेना वहां से तो मां ने प्रारंभ किया है। तो फिर इस मां को भाव

माँ को भाव या ईश्वर-दर्शन की क्या आवश्यकता है?

दर्शन वगैरह की क्या आवश्यकता है? तो एक तरह से देखा जाए तो स्ट्रिक्टली स्पीकिंग, टेक्निकली स्पीकिंग आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। किंतु ठाकुर को यह भी पता था कि लोगों को एक बाह्य प्रदर्शन चाहिए शक्ति का। यदि शक्ति का प्रदर्शन नहीं करेंगे तो लोग क्या है? उस आपसे प्रभावित नहीं होंगे। आपकी बातों को सुनेंगे नहीं। आपको अपने गुरु के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। मां की करुणा से प्रेरित होकर के मां को अपने गुरु के रूप में स्वीकार करने वाले वैसे तो बहुत थे। किंतु ऐसे भी कोई लोग थे जिन्होंने यह सोचना शुरू कर दिया था कि मां तो ठाकुर की धर्मपत्नी है, अर्धांगिनी है। बोलकर के ही मां को लोग इतना रिस्पेक्ट देते हैं। त्यागी संतान मां को इसीलिए रिस्पेक्ट देते हैं। वरना तो आप देखिए कि रामचंद्र दत्त ने मां का ठाकुर का जीवन लिखा है। मां के बारे में उसमें इतना ज्यादा कुछ नहीं है। शशि महाराज की उन्होंने प्रशंसा की है। कहा है कि शशि तुमने ठाकुर की सेवा करके अपने जीवन को धन्य कर दिया। यहां पे बाकी लोग जो सबको देखिए कि ऐसा नहीं है कि अभी जैसे कि मास्टर महाशय मास्टर जब ठाकुर रामलाल दादा को कहते थे अच्छा वह पिंजरे में तोता मैना रहती है। उनके लिए खाना देकर के आओ। तो मास्टर महाशय भी इसको सीरियसली ले लिए थे। सोचते थे कि हां यह तोता और मैना ही है। एक्चुअली ठाकुर कह रहे थे कि नहबत में मां शारदा देवी और लक्ष्मी दीदी रहती है तो उनके लिए जो काली मंदिर का प्रसाद वगैरह आता है तो उनके लिए वहां पर पहुंचा देना। यह अक्षय कुमार सेन जिसने कि ठाकुर की पुंथी लिखी। इतनी सुंदर आज भक्तों में खास करके बेंगली भक्तों में इसका इतना प्रचार है। उस पंथी के प्रारंभ में भी उन्होंने सशक्तिक अवतार की जो एक आराधना करनी चाहिए। यह तो आराध्य मंत्र का जो लेखन होना चाहिए वह नहीं था। स्वामी जी ने लेटर लिखकर के उनको बताया था कि देखिए प्रारंभ में ही सशक्तिक श्री रामकृष्ण देव की आराधना कीजिए क्योंकि सशक्तिक आराधना ही अवतार की आराधना ही हमारी भारतीय आध्यात्मिकता का परिचय है। तो इवन इनको भी स्वामी जी को बताना पड़ा था। तो मां यदि इतना छुप करके यदि रहती रहने ही वाली थी वैसे किंतु यदि इसी तरह से वह पूरा जीवन बिताती तो जो लाखों लाखों लोगों को उनका जो मातृत्व के जो उनका जो प्रवाह था उसका एक उसमें स्नान करके उस अमृत कुंड में एक तरह से डुबकी लगा करके भवसागर जो पार होना था वो शायद ना हो पाते इसीलिए कुछ तरह से कुछ ना कुछ तो लोगों को दिखना चाहिए भीतर की परिस्थिति क्या है? तो उसको दिखाने के लिए हो सकता है कि ठाकुर ने इस तरह से प्रयास किया या तो फिर इस तरह से व्यवस्था की कि मां के जीवन में भी कभी ना कभी एक दो जगह पर भाव प्रस्फुटित हो। लोगों को एटलीस्ट दिखे कि देखिए मां भाव से भरपूर है। आनंद से भरपूर है। तो यह हो गया आज इसके बाद का जो चैप्टर है उसकी पूर्व भूमिका। इसके जो बाद का चैप्टर है बड़ा ही

ठाकुर माँ को भक्तों की आध्यात्मिकता का भार स्वीकार करने के लिए तैयार करते है

इंपॉर्टेंट चैप्टर है। उसका टाइटल है भार स्वीकार। या तो फिर कहेंगे भार समर्पण। यह भार समर्पण किस चीज का कि ठाकुर की लीला का अंतिम समय तो आ चुका था। अंतिम पर्व तो आ चुका था। तो अभी जितने भी भक्त हैं ठाकुर के सिर्फ त्यागी और गृहस्थ भक्त ही नहीं। ठाकुर तो आए थे पूरे संसार के लिए पूरे संसार का कल्याण करने के लिए तो पृथ्वी की जो समस्त मानव प्रजा है उसका भार तो किसी को ठाकुर को देना होगा अपना जो आध्यात्मिक वारसा है किसी को तो ठाकुर को देना होगा तो वह वारसा स्वीकार करके वो गुरु के पद पर अधिष्ठित होने वाली थी श्री मां शारदा देवी बहुत बार मैं भी जब शुरू शुरू में यहां पर आया था और शुरू शुरू में जब सिर्फ ठाकुर और स्वामी जी को ही पढ़ता था तो मुझे भी ऐसा लग रहा था कि अच्छा यह तो ठाकुर गुरु थे और उनके प्रधान शिष्य थे स्वामी विवेकानंद तो ठाकुर वो जो फेमस घटना है कि ठाकुर ने नरेंद्र के भीतर में पूरा शक्ति संचार कर दिया। यानी कि ठाकुर का जो आध्यात्मिक वारसा है, ठाकुर का जो गुरु पद है, वह उन्होंने नरेंद्र को ट्रांसमिट किया है और इसीलिए ठाकुर के बाद में नरेंद्र ही जैसे कि संघ का सही-सही मार्गदर्शक और गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। किंतु आप देखिए इसके बारे में दो माने इसको काउंटर करने के लिए हमारे पास में दो आर्गुमेंट है। सर्वप्रथम तो स्वामी जी ने इस तरह से कोई शिष्यों को दीक्षा वगैरह नहीं दी है। हां, जैसे कि हमने डिस्कस किया जैसे कि मेरी लुईस न्यू डिस्कवरी में डिस्कस करती है। वो कहती है कि प्लेटफार्म के ऊपर में से प्रवचन देते-देते स्वामी जी ने हजारों-हजारों लोगों को ओम मंत्र से दीक्षित किया था। प्रणव मंत्र से दीक्षित किया था। इवन स्वामी जी भी उनको अपने डिसाइपल समझते थे। किंतु जो एक ट्रेडिशनल गुरु शिष्य का एक जो होना चाहिए संबंध जिस तरह से गुरु का होना चाहिए रोल इस तरह से स्वामी जी ने बड़े कम ही शिष्यों को मंत्र दीक्षा दी है। तो यह एक बात है। दूसरा है कि बड़ा ही युवा अवस्था में स्वामी जी ने देह त्याग कर दिया है। स्वामी जी ने महासमाधि ग्रहण कर दी है। और इसके बारे में एक कथा प्रचलित है। स्वामी जी कहते हैं कि यदि बड़े वट वृक्ष के नीचे में छोटे-छोटे पौधे जन्म लेते हैं तो उनका अच्छे से जल्दी से विकास नहीं होता है या तो फिर उनका विकास कुंठित हो जाता है। इसीलिए क्योंकि क्या है कि जितना जो जमीन में से पोषक तत्व खींचने हैं या तो फिर आकाश में से सूर्य जो प्रकाश जो ग्रहण करना है वह तो यह विराट वट वृक्ष ही कर लेगा। तो फिर यह उसकी छांव में जो छोटे-छोटे पौधे उगे हैं ना ही वह उनको जमीन में से इतने पोषक तत्व मिलेंगे ना ही उनको सूर्य का इतना प्रकाश मिलेगा कि जो फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया से अपने को अपना विकास कर पाए। तो जब तक बड़ा वटवृक्ष रहेगा तब तक छोटे पौधों का विकास नहीं होगा। तो मतलब स्वामी जी कहना चाहते थे कि उनके गुरु भाइयों को यदि सही-सही जिम्मा उनको स्वीकार करना है तो स्वामी जी को वहां से जाना पड़ेगा। जब तक स्वामी जी वहां पर रहेंगे तब तक यह लोग अपना यह जिम्मा रामकृष्ण संघ का जिम्मा अपने सर पर नहीं लेंगे। तो वो एक हमको लगता है कि यह एक बात है। किंतु साथ में ही देखिए कि इसके पीछे का एक दूसरा रीजन यह हो सकता है कि मां का जो गुरु पद पर जो आसीन होना था वह ऑलरेडी हमने देखा कि काशीपुर में ही हो चुका था। जब ठाकुर को कैंसर की वजह से बोलना या तो फिर ये सब जो दैनिक कार्य है ऑलमोस्ट उनके स्टॉप हो गए थे। वह असहाय होकर के पड़े थे और बस आध्यात्मिक अंतिम यात्रा का वह जो प्रारंभ कर रहे थे उस समय मां ने ही जैसे कि बच्चों का नेतृत्व स्वीकृत कर लिया। भक्तगण है उनका नेतृत्व स्वीकृत करके यह त्यागी संतान सिर्फ मां को ही कंसल्ट करते थे। अभी भविष्य में या तो फिर दैनंदिन ठाकुर की सेवा कार्य है। वह किस तरह से करना है। तो उसी समय मां ने नेतृत्व ग्रहण कर लिया था। किंतु मां का भी इस तरह से था कि मां को भी एक तरह से तपस्या से गुजरना पड़ा था। वो यह खास करके यह जो समय है ठाकुर की महासमाधि से लेकर के स्वामी जी का भारत में वापस आना। यह 10 साल जो है 1886 में ठाकुर की महासमाधि हुई। 1897 के जनवरी महीने में भारत में स्वामी जी का आगमन हुआ। तो यह द साल का जो पीरियड है मां के लिए भी एक बड़ा तपस्यामय पीरियड था। मां अपने को प्रायः छुपा करके ही रखती थी। मां के त्यागी संतानों को छोड़कर के और कुछ-कछ घनिष्ठ स्त्री भक्तों को छोड़कर के मां के बारे में बहुत कम लोगों को पता था। तो यह पीरियड एक मां के जीवन में क्यों आया? उसका भी एक एनालिसिस हमको करना पड़ेगा। किंतु देखिए कि जैसे ही स्वामी जी खुद अपनी महासमाधि की ओर आगे बढ़ना शुरू हुए वैसे ही मां का जो मातृत्व या गुरुत्व पद जो था जिस पर आसीन ठाकुर ने उनको ऑलरेडी कर दिए थे उसका अभी सही-सही बह प्रकाश होने लगा। चारों ओर से देश दे देशांतर से भक्तगण मां की कृपा प्राप्त करने के लिए पहले तो जयराम बाटी में और उसके बाद में कोलकाता में उद्बोधन भवन में इकट्ठा होने लगे और मां भी धीरे-धीरे करके सबको निसंकोच मंत्र प्रदान करना शुरू कर दिया। वरना तो जब पहला मंत्र जब मां ने दिया था योगिन महाराज को तो उस समय मां वृंदावन में थी। ठाकुर की महासमाधि के कुछ ही दिनों के बाद की घटना है। तो उस समय ठाकुर ने मां को स्वप्न में आकर के कहा कि योगिन की दीक्षा नहीं हुई है। तुम उसको दीक्षा दो। तो मां सोच में पड़ गई कि अभी तो ठाकुर को गए हुए अभी तो गए हैं और अभी से मैं दीक्षा देनी शुरू कर दूंगी। तो लोग कहेंगे कि ठाकुर अभी गए और अभी से मां ने शिष्य बनाना शुरू कर दिया। तो ऐसा कैसे होगा? किंतु जब ठाकुर ने दो-तीन बार आकर के कहा तब मां सहमत हुई। तो यह जो पहली दीक्षा का जो रिलक्टेंस था कि मां सोच इतना सोच रही थी कि ठाकुर तो अभी गए हैं। अभी से क्या मैं दीक्षा दूं कि नहीं? तब से लेकर के आखिरी आखिरी समय की बातें देखिए कि जब मां मृत्युशैया पर थी उद्बोधन में उस समय एक युवक आकर के वह कहता है कि मां का दर्शन करना है दीक्षा प्राप्त करनी है। तो फिर उस समय वो त्यागी संतानों ने शरद महाराज वगैरह जो उद्बोधन के अन्य साधु थे। उन्होंने इस लड़के को मां के पास में जाने से रोक दिया। कहा कि मां बड़ी बीमार है। बहुत ही असुस्थ है। मां के पास में नहीं जा पाओगे। तो यह लड़का झगड़ा करने लगा कि क्या मां के ऊपर में आप लोगों की मोनोपोली है? वगैरह-वगैरह बोल के यहां पे मां बिस्तर में सोई हुई है। बेचारी इतनी बीमार है। फिर भी जब यह हल्लागुल्ला सुना तो मां ने पूछा कि क्या हो रहा है? तो किसी ने आकर के कहा कि यह सन्यासी लोग यह एक लड़के को ऊपर में आपके पास में नहीं आने देना चाहते। तो मां नाराज होकर के अपने बिस्तर पर बैठ गई। वह सोई लेटी हुई थी तो बैठकर के फिर मां ने कहा कि अरे उसको बुला के ले आओ यहां पे। हम हम लोगों का तो इसीलिए आगमन हुआ है। तो फिर उस लड़के को मां के पास में आने दिया गया। फिर मां ने उसको दीक्षा भी दी। उसके साथ में बात भी की। तो यह पूरा मां का जो ट्रेजजेक्टरी है कि बिल्कुल रिलक्टेंट थी और यह तो ठाकुर के जाने के बाद की बात है। इवन जब ठाकुर थे उस समय भी देखिए कि कालीपदो घोष की पत्नी को ठाकुर को बार-बार मां के पास में भेजना पड़ा है। तब कहीं जाकर के मां ने उसको बिल्व पत्र पर कुछ लिख दिया। उसको कुछ आशीर्वाद दिया। तो यह मां का एक तरह का जो रिलक्टेंस था कि जिसकी वजह से वह भक्तों का भार लेने में असमर्थ तो नहीं कहेंगे। कहेंगे कि मां की लज्जाशीलता जो थी मां का एक जो स्वाभाविक एक अंतर्मुखी मन था उसकी वजह से यह सब हो

माँ युग-धर्म-प्रवर्तन का कार्य करने के लिए तत्पर थीं, इसीलिए ठाकुर उन्हें गुरु पद पर प्रतिष्ठित करने में सफल हुए

रहा था। किंतु साथ में ही यहां पर हमको गंभीरानंद जी महाराज हमको रिमाइंड करवाते हैं। भार समर्पण चैप्टर में आएगा कि यदि ठाकुर ठाकुर ने मां को यह भार स्वीकार करने के लिए यह जिम्मा स्वीकार करने के लिए जब प्रेरित कर रहे थे मां को ट्रेन कर रहे थे उस समय हमको यह भी यह मन में रखना होगा कि यदि विद्यार्थी की खुद की जो क्षमता ना हो तो कितना ही अच्छा अध्यापक या आचार्य क्यों ना मिल जाए उस विद्यार्थी को वह एक लेवल से आगे नहीं ले जा पाएगा। किंतु यदि विद्यार्थी में खुद में प्रचंड टैलेंट हो तब गुरु को भी उनको सिखाने में आनंद भी आता है और गुरु उस विद्यार्थी के पोटेंशियल को संपूर्ण रूप से मैनिफेस्ट भी कर पाते हैं। तो जब यहां पर हम यह सब पढ़ते रहेंगे कि ठाकुर मां को कहते हैं कि हां तुमको इनका जिम्मा लेना होगा। तुमको इनकी जवाबदारी आध्यात्मिक जवाबदारी लेनी होगी। उस समय यदि मां की खुद की यदि इच्छा नहीं होती भीतर में से मां का जो मातृत्व जो था जो सतह के नीचे ही छुपा हुआ था वो धीरे-धीरे करके मैनिफेस्ट होना शुरू नहीं होता तो ठाकुर के कहने पर भी मां इस तरह से जिम्मा स्वीकार करने के लिए आगे नहीं आती। यानी कि मां का जो यह आध्यात्मिक इष्ट के रूप में प्रतिष्ठित होने का जो जितने भी प्रसंग है, जो ट्रेजेक्टरी है, जो स्टोरी लाइन है, उसमें ठाकुर के रोल के बारे में बहुत सारा वर्णन आएगा। किंतु यह बात हमेशा याद रखनी है कि यह सिर्फ ठाकुर की यह इच्छा या ठाकुर के आशीर्वाद या ठाकुर की प्रेरणा या तो फिर ठाकुर के यह जो सब जो भी एक पूरा एक उन्होंने एटमॉस्फियर खड़ा किया है वो सिर्फ रिस्पांसिबल नहीं है। वह 50% हो सकता है। 50% हो मां की खुद की जो मातृत्व भावना थी जगत धात्री स्वरूप जो मां के भीतर में जो छुपा हुआ था उसी का मैनिफेस्टेशन हो रहा था योग सूत्र में जैसे कि कहते हैं कि एक नाल है नाल में से जो पानी बह रहा है तो पानी बहने में बीच में एक अंतराय आ जाता है तो अंतराय को जैसे खोल दो वैसे ही यह पानी फिर से बहना शुरू कर देगा यह क्या कहना चाहते हैं इस सूत्र के माध्यम से कि हमारे भीतर में योग सिद्धियां, योग शक्तियां, आध्यात्मिक अनुभूति के जितने भी जो बीज है वह पोटेंशियल रूप में है ही है। उनको सिर्फ मैनिफेस्ट करना है। ऐसा नहीं है कि कहीं से पानी लाना है। पानी ऑलरेडी बह रहा है। बीच के अंतराय को दूर कर देना है। हमारे भीतर में जो कामिनी कांचन के प्रति जो स्प्रूहा है उसको जैसे ही दूर कर देंगे वैसे ही भीतर की दिव्यता मैनिफेस्ट होनी शुरू हो जाएंगी। तो यह जो योग सूत्र में कहा गया है यहां पर ठाकुर और मां ठाकुर यदि गुरु है और मां को यदि यह सिखा रहे हैं कि किस तरह से जगत का भार मां को ग्रहण करना है तो ठाकुर की भूमिका सिर्फ इतनी ही है कि मां के भीतर में जो जगन मातृत्व ऑलरेडी विद्यमान था उसी के सामने जो अंतराय थे या तो फिर जो कुछ-कुछ बाधाएं थी उसमें से एक तो थी कि मां की सहज लज्जा जो थी मां का सहज लज्जाशील स्वभाव वह एक था। दूसरा कि वहां जो कंजर्वेटिव सोसाइटी थी उसके भीतर में एक स्त्री को गुरु के रूप में कैसे स्वीकार करना वो भी तो शायद एक हो सकता है। एक एक इंसिडेंट है कि कनखल में कनखल नहीं कि कहीं पे वो मोस्ट प्रोबेबबली कनखल में ही महापुरुष महाराज ने वह मां का चित्र जो था मां का चित्रपट वो ठाकुर के चित्रपट के साथ में लगाया था। वो शराइन ग्रह ग्रह में फिर वहां पुरुष महाराज तो चले गए। फिर कुछ समय के बाद में आकर देखा अभी वो महापुरुष महाराज ने देखा कि किसने देखा एग्जैक्ट मुझे मैं भूल गया। जाकर के देखा कि वो मां का वहां से फोटो हटा दिया गया है। तो वहां पे पूछा गया कि क्यों मां का फोटो हटा दिया? तो कहा कि देखिए यहां का जो साधु समाज है वह स्त्री गुरु को स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए ठाकुर का फोटो रखे रहे हैं। मां का फोटो हटा दिया है। तो ये माने फिर तो ठीक है। वो तो मां का फोटो फिर से लगा दिया गया। रामकृष्ण संघ की जो ट्रेडिशन है किंतु उस समय ऐसा था कि स्त्री को गुरु के रूप में स्वीकार करना वो इतनी सहज बात नहीं थी। यह जो ठाकुर ने भैरवी ब्राह्मणी को गुरु के रूप में स्वीकार किया वह कोई एक आम घटना नहीं है। ठाकुर का भी यह एक रेडिकल थिंकिंग प्रदर्शित करता है। दूसरा यह भी है कि शक्ति साधना में स्त्री गुरु तो ठीक है। स्त्री साधिकाएं भी थी, स्त्री गुरु भी थे। किंतु जनरली जो वेदांत साधना या वगैरह कहते हैं उसमें इतने सारे स्त्री गुरु आपको देखने को नहीं मिलेंगे। तो वह एक जो सामाजिक रूढ़िच चुस्तता है उसमें से भी रास्ता करके मां को ठाकुर को प्रोजेक्ट करवाना था। तो इसीलिए जब यह एक के बाद एक घटनाएं होती गई आपात देखेंगे कि ठाकुर मां से नाराज है किंतु भीतर में तो ठाकुर मां से मां की यह जो मातृत्व का प्रकाश था उससे आनंदित ही हो रहे थे। कौन सी घटना? तो सब फेमस घटनाएं हैं। ठाकुर ने जाकर के मां को कहा कि यह जो त्यागी संतान है दक्षिणेश्वर में रात को रुकते हैं तो उनको दो रोटी ना एक रोटी ना इतना ही देना है। इससे ज्यादा रोटी इनको रात को ना खिलाओ। खिलाया मत करो क्योंकि सुबह को उठकर के या तो फिर पूरी रात भर इनको जप ध्यान करना है। तब मां ने नाराज होकर के क्या कह दिया कि मेरे बच्चों को कितनी रोटी खिलानी है। यह तुम आकर के मुझे क्यों कहते हो? मैं मैं देखूंगी कि उनकी रोटी उनको कितनी रोटी खानी है। मैं उनको खिलाऊंगी और इनका जिम्मा भी मैं लूंगी। तो जो मां के मुंह से वह आ गया एक बार तो ठाकुर वैसे तो बाहर से शायद मां से नाराज होंगे किंतु भीतर से तो बड़े आनंदित हुए कि चलो मां ने अपना आध्यात्मिक जो जिम्मा है रिस्पांसिबिलिटी है उसको स्वीकारना शुरू किया है। वैसे ही वह फेमस घटना कि एक स्त्री जिसका चरित्र अच्छा नहीं था। मां के हाथ में से खाने का थाली लेकर के ठाकुर के पास में गई। तो ठाकुर नाराज होकर के मां को बुलाकर के कहते हैं कि अरे उस औरत को तुमने क्यों खाने की थाली दे दी? तब मां ने क्या कहा कि मां बोले ऐसे दाढ़ा ले अमी थकते पारबो ना। कोई आकर के मां बोलकर के मुझे पुकारता है तो मैं रह नहीं पाऊंगी। उसको जो आशीर्वाद चाहिए मैं दे दूंगी। तो यह

माँ पहले से ही सिद्ध थीं, लेकिन उन्होंने तपस्या बाद में की

धीरे-धीरे करके मां ने ठाकुर के रहते-रहते ही यह आध्यात्मिक रिस्पांसिबिलिटी स्वीकार करने का प्रारंभ कर दिया था। किंतु उसके बाद में जब ठाकुर की महासमाधि हुई तो मां को भी तो एक तरह से तपस्या का आदर्श प्रतिष्ठित करना था। यह जो ठाकुर कहते हैं ना कि वह दो तरह के पेड़ होते हैं। एक तरह के पेड़ होते हैं जिसमें पहले फूल आते हैं बाद में फल आते हैं। फिर दूसरे कुछ-कुछ होते हैं जिसमें पहले फल आते हैं बाद में फूल आते हैं। अर्थात कि कोई-कोई साधक होते हैं पहले तपस्या करते हैं बाद में सिद्धि प्राप्त करते हैं और फिर कोई-कोई साधक होते हैं या तो फिर सिद्ध होते हैं जो पहले से ही सिद्ध हो जाते हैं। बाद में की शास्त्र मर्यादा को मेंटेन करने के लिए वे लोग साधना करते हैं। तो मां के जीवन में भी देखिए कि फल पहले आ गया है। फूल बाद में प्रस्फुटित होता है। ठाकुर के रहते-रहते ही मां समग्र सिद्धि की अधिकारिणी हो ही चुकी थी। मां के भीतर में जो जगन मातृत्व था, वह ऑलरेडी प्रस्फुटित हो ही चुका था। और हमको यह भी पता है कि उदार हृदयता विशाल हृदयता जगत के सभी के प्रति करुणा यह तो आध्यात्मिक जीवन का अंतिम पड़ाव है। अंतिम यह जो गोल है लक्ष्य है। यह ठाकुर और स्वामी जी साधना करते-करते आखिर में अपने हृदय को उतना उदार किए थे कि पूरे विश्व को जैसे कि उसमें समाहृत कर पाए थे। किंतु मां के जीवन का तो प्रारंभ ही हुआ था अपने उदार हृदय में मातृत्व से सिंचित उनका जो हृदय था उसमें यह पूरे जगत को स्थान देने में तो फिर ऐसा हो सकता है अभी यह मेरा पर्सनल स्पेककुलेशन है कि शास्त्र मर्यादा रक्षा करने के लिए जो एक तपस्या होनी चाहिए जीवन में हालांकि ठाकुर के रहते-रहते मां की तपस्या कम नहीं थी उसके तो बहुत सारे प्रमाण हमको मिल ही चुके हैं किंतु फिर भी एक तपस्या की है। मां ने बड़े माने बड़ी कठोर तपस्या करनी पड़ी है। वह यदि ऐसा हमको कहना होगा तो यह ठाकुर की महासमाधि से लेकर के स्वामी विवेकानंद के भारत आने तक के जो 10 साल है उसमें मां को सही-सही में तपस्या करनी पड़ी थी। कामार पुकुर में जब रहती थी तो खाने-पीने का अभाव था। वहां के गांव वालों का चरित्र भी कोई इतना अच्छा नहीं था। और फिर यहां पर रामलाल दादा, लक्ष्मी दीदी उन्होंने भी जैसे कि मां का जिम्मा पूरा उन्होंने छोड़ दिया था तो वहीं अकेले रहती थी मां अपने हाथों से बागान में सब्जी उगाती थी। उसी को खाती थी। और इसको इस तरह से भी देख सकते हैं कि ठाकुर को कि कभी पूछा गया कि अच्छा एक आदर्श जीवन कैसा हो सकता है। आपको किस तरह का जन्म चाहिए? तो ठाकुर ने क्या कहा था कि मैं एक लंबे बालों वाली बाल विधवा होंगी। मेरे पास में एक गाय रहेगी। एक छोटा सा जमीन रहेगा। जमीन के ऊपर में एक छोटी सी झोपड़ी रहेगी। और एक एक स्त्री वृद्धा स्त्री रहेगी जो कि बाकी का सब कार्य करें। मां वह कहते हैं कि मैं वह गाय का दूध दोह करके उसमें से खीर पकाऊंगी और फिर यह खीर भगवान कृष्ण को अर्पित करके अपनी कुटिया का दरवाजा बंद करके भगवान कृष्ण के लिए मैं रोती रहूंगी। यह ठाकुर की दृष्टि से एक आदर्श साधक का जीवन ऐसा होना चाहिए। तो देखिए कि मां के इस जो कामार पुकुर का तपस्या का जो पीरियड है तो जैसे कि मां के माध्यम से ठाकुर ने एक आदर्श साधक जो होना चाहिए वो आदर्श साधक की आदर्श साधना का उन्होंने एक तरह से एक लीला अभिनय किया है। तो यह सब है बहुत कुछ कि धीरे-धीरे करके मां के जीवन में मातृत्व तो था ही था। किंतु उसका बहि प्रकाश कैसे होने लगा वह पूरी जर्नी। तो उस लंबी जर्नी में जो एक महत्वपूर्ण चैप्टर है गंभीरानंद जी की इस का किताब में उसका टाइटल है भार समर्पण। यह जो आध्यात्मिक जिम्मा अपने शिष्यों का ठाकुर ने मां के हाथों में अर्पण किया। तो यहां

शिक्षा-दीक्षा-उद्दीपना के माध्यम से ठाकुर माँ को जगत-मातृत्व पद के लिए तैयार कर रहे है

पर गंभीरानंद जी महाराज इस चैप्टर के प्रारंभ में क्या लिखते हैं? महाराज जी कहते हैं दक्षिणेश्वरे श्री माय आगमनेर पर होइते एकटी विषय क्रम स्फूटतर होइया उठते छिलो दक्षिणेश्वर में श्री मां के आगमन के बाद में एक विषय धीरे-धीरे क्रमशः प्रस्फुटित हो रहा था। प्रकाशित प्रगटित हो रहा था। शिक्षा दिखा उद्दीपना इत्यादि अवलंबने श्री रामकृष्ण ताहा के क्रमे शय भावध परिपुष्टि जन उपजुक्त आधार करिया तुलिते छिलेन शिक्षा दीक्षा और उद्दीपना वगरा साधनों के माध्यम से अवलंबन से श्री रामकृष्ण मां को क्रमशः धीरे-धीरे अपनी भावधारा की परिपुष्टि के लिए उपयुक्त आधार के रूप में तैयार कर रहे थे। देखिए कितना सुंदर शिक्षा दीक्षा उद्दीपना ठाकुर ने मां को दीक्षा दी। यह बात तो हमको पता है कि ठाकुर ने मां की ना जीभ के ऊपर में जीहवा के ऊपर में मंत्र लिख दिया था। फिर मां ने आकर के लक्ष्मी दीदी को कहा कि उन्होंने मेरी जिह्वा के ऊपर में मंत्र लिखा है। तुम भी जाओ। तुम भी जाकर के मंत्र लेकर के आओ। तो यह मां के खुद के मुंह से बात हमने सुनी है। तो ठाकुर मां के दीक्षा गुरु भी थे। उसके बाद में मां ने ही जैसे कहा है कि ठाकुर ने किस तरह से मां को धीरे-धीरे करके शिक्षा देने की शुरुआत की। क्योंकि मां ने तो इस तरह से कोई पाठशाला में जाकर के यह जो थ्री आर कहते हैं रीडिंग राइटिंग एंड एरथमैटिक उसको तो पढ़ा नहीं था। किंतु किस तरह से ठाकुर ने मां को वह शिक्षा देने की प्रारंभ की जो शिक्षा उनको एज ए गुरु के रूप में सब आवश्यक थी। तो किस तरह से भक्तों के साथ में व्यवहार किया जाए। किस तरह से स शो श जो जे शोए से रोए जे नाशोए शे ना रोए। माने जो सहन शक्ति भीतर में से प्रकट करनी है जो सहन कर सकता है वह रह सकता है इस समाज में जो सहन नहीं कर सकता वो नहीं रह पाएगा तो वह किस तरह से एक इंस्टिट्यूशनल सेटअप के भीतर में मां को रहना है इसके लिए ठाकुर ने मां को तैयार

ठाकुर ने -- माँ और स्वामीजी -- दोनों को अपने अपने कार्य के लिए विभिन्न रूप से तैयार किया

किया था देखिए कि स्वामी जी और मां के यह जो शिक्षा जो ठाकुर ने इन दोनों को दी वो किस किस तरह का एक कंट्रास्ट हमको दिखाई देता है। मां को एक इंस्टीट्यूशनल सेटअप के भीतर में रहना था। 10 लोगों के साथ में हमेशा रह के उनके माध्यम से मां को कार्य करवाना था। तो जैसे कि यहां पे रामकृष्ण संघ है, भक्त परिवार है वो है और यहां पे मां का फैमिली है खुद का। तो यह फैमिली के भीतर में किस तरह से रहा जाए? एक संघ है। एक संघ यह जो रामकृष्ण परिवार है बहद परिवार उसके भीतर में रहकर के किस तरह से जो क्लैशिंग होता है ना ईगो क्लेश होता है। देखिए कि ठाकुर के पास में तो वही लोग आने वाले हैं स्वामी जी के पास में जो लोग कि हाईली टैलेंटेड है। आज देखिए हम रामकृष्ण संघ में कोई पीएचडी है तो कोई फॉरेन रिटर्न इंजीनियर है तो कोई हाईली इंटेलेक्चुअल है तो कोई बड़ा बहुत अच्छा कर्मी है। वह सभी अपने-अपने क्षेत्र में उनकी महारथ है। तो, यहां पर एक साथ में रहना, अपने ईगो को सब्स्यूम करके अपने ईगो को संघ के भीतर में एक तरह से समाहित कर देना। उस तरह से रहना वो कितना मुश्किल कार्य है। तो, यह जो इंस्टिट्यूशनल सेटअप को किस तरह से मेंटेन किया जाए? एक परिवार के भीतर में रहकर के अपने ईगो को जैसे कि सरेंडर करके हम अपना-अपना कार्य करें वो किस तरह से होगा किस तरह से हो सकता है वह ठाकुर ने जैसे कि मां को सिखाया और यहां पर देखिए कि स्वामी जी को शेर की तरह युद्ध के मैदान में जाकर के युद्ध करना था। यह फिलॉसोफिकल डिस्कशन करके योग वेदांत और भारतीय संस्कृति और श्री रामकृष्ण देव का संदेश यह चार विजय पताका स्वामी जी को पूरे विश्व में फैलानी थी। तो स्वामी जी को आर्गुमेंटेशन करके एक तरह से अपने आर्गुमेंट में विजय प्राप्त हो। वो एक तरह से ठाकुर को उनको तैयार करना था। लोगों को स्पर्श मात्र करके अपनी फेवर में उनको कन्वर्ट कर देना था। तो यह जो ठाकुर बार-बार नरेंद्र और मास्टर महाशय को कहते हैं, नरेंद्र और गिरीश घोष को कहते हैं कि तुम दोनों लोग तर्क करो। मैं देखता हूं कि कौन जीतता है, कौन क्या कहता है। वो इस तरह से उन्होंने नरेंद्र का एक तरह से उनको शिक्षा देने की शुरुआत की थी। तो यहां पर है मां जिसको कि एक फैमिली इंस्टीट्यूशनल सेटअप में रहना है। यहां पर है स्वामी जी जिनको कि एक होस्टाइल लैंड में जाकर के जहां पर विरोधियों का उपस्थिति हो वहां जाकर के अपने सनातन आदर्श की पुनः स्थापना करनी है। तो उन दोनों को ठाकुर ने इस तरह से तैयार किया। तो शिक्षा दीक्षा और उद्दीपना उद्दीपना का अर्थ क्या है? वहां पर ठाकुर के कमरे में सतत नृत्य, कीर्तन, भजन, गान चलते रहते थे। तो ठाकुर यह रामलाल दादा को कहते थे कि अरे नबत की ओर का दरवाजा है उसको खोल दो। यदि वे लोग देखेंगी नहीं, यदि वे लोग सुनेंगी नहीं। वे लोग यानी कि मां और लक्ष्मी दीदी तो फिर वह कैसे सीखेगी? ऐसा करके वह दरवाजा खोल देने को कहते थे। जब भी यह भजन कीर्तन वगैरह होता था और मां को भी देखिए कि वह नहबत का जो वरांडा था उसमें वह जो एक पर्दा टंगा हुआ था उसमें से छोटा सा छिद्र था। उस छिद्र में से मां खड़ी-खड़ी यह सब नृत्य कीर्तन देखा करती थी सुना करती थी। तो ठाकुर मजाक करके रामलाल दादा को कहते भी है कि वह जो तुम्हारी जो चाची जहां पर रहती है वहां जो यह पर्दा टंगा है, उसका जो छिद्र दिन प्रतिदिन बड़ा होता जा रहा है। क्यों? क्योंकि छिद्र छोटा है तो फिर देखने में असुविधा होगी। बोल के मां उसको काट करके हो सकता है बड़ा कर देती होगी। तो यह देखिए कि उद्दीपना कि जो चारों ओर वहां पर आध्यात्मिकता का प्रवाह बहता है वो मां तक भी पहुंचे। भले ही चाहे मां लज्जाशीला हो। भले ही चाहे मां पुरुष भक्तों के सामने ना आती हो। भले ही चाहे मां इतना अपने को छुपा करके रहती हो। फिर भी उस उद्दीपना का ईश्वर उद्दीपना का प्रवाह नब तक बहे उसके बारे में ठाकुर की नजर रहती थी। तो यहां पर महाराज कहते हैं शिक्षा, दीक्षा और उद्दीपना इन तीनों के माध्यम से ठाकुर ने मां को अपनी भावधारा की परिपुष्टि के लिए अपनी भावधारा की परिपुष्टि अर्थात कि ठाकुर ने वह भावधारा ऑलरेडी बहा दी है। बस उस भावधारा को किस तरह से परिपुष्ट करना है। किस तरह से उसको स्ट्रेंथन करना है। किस तरह से एक वैल्यू ऐड करनी है। उसके लिए मां को उपयुक्त आधार के रूप में ठाकुर तैयार कर रहे थे। शोडशी पूजा उपलक्ष आमरा देवीर आवाहन होते देखिया छी। शोडशी पूजा के उपलक्ष में हमने देखा कि ठाकुर देवी को आवाहन करते हैं। मां के भीतर में जगदंबा को इनवोक करते हैं। या तो फिर मां के भीतर में जो सूक्त रूप में जो जगदंबा थी उसको जैसे कि ठाकुर जागृत करते हैं। श्री मां से दिन आराधितो ओ स्वरूप संबंध सचेतन होलेले ओ आपनार शक्ति के जुगोपयोगी सक्रिय करबार संकल्प ग्रहण करे नाई श्री मां उस दिन आराधित हुई थी और अपने स्वरूप के संबंध में सचेतन भी हुई थी किंतु अपनी शक्ति को युगोपयोगी सक्रिय करने के लिए संकल्प मां ने ग्रहण नहीं किया था। मां को यह तो अंदाज आ गया था कि उनके भीतर में जो दिव्य आध्यात्मिकता है जगन्माता स्वयं विराज करती है। उनके भीतर में जो विराट शक्ति है पूरे विश्व को अपने मातृत्व के प्रवाह में बहा दे जा सकती है। यह मां को अंदाज तो आ गया था किंतु मां ने यह संकल्प धारण नहीं किया था कि वह इस शक्ति के बांध खोल करके पूरे जगत में इसको प्रसारित करें। तो यह जो मां की लज्जाशील शीलता थी उसकी वजह से मां ने ऐसा किया था। इसके बाद में महाराज लिखते हैं आरश पूजा होते छिलो निभते निशथे लोके उहा शनिया थाकिले ओ उहार मर्म सभी विशेष उपलब्धि कोते पारे नाई पहले तो था कि ठाकुर ने जो वो पूजा की उसके बाद में मां अपनी जो शक्ति थी अपनी यह जो अपना मातृत्व था जगन मातृत्व उसके बारे में सचेतन तो हो चुकी थी किंतु उसको सक्रिय रूप से कार्यरत करना इसके बारे में मां ने कोई संकल्प नहीं किया था। एक बात दूसरी कि वह पूजा हुई थी एकांत में निब्रुते निशते एकांत में और मध्य रात्रि को लोके उहा शून्य थाकिले ओ उहार मर्मो शशेष उपलब्धि करते पारे नाई लोगों ने उसके बारे में सुना तो था किंतु इसका जो गहन अर्थ है वह यह लोग समझ नहीं पाए थे कि शोडशी पूजा करके ठाकुर ने जैसे कि वह ब्रह्म ब्रह्म कुंडलिनी को जागृत कर दिया है। जैसे कि स्वामी जी का कहना था फेमस स्टेटमेंट ब्रह्म कुंडलिनी को जागृत करना। वह कैसे हो पाया? तो मेरा पर्सनल ओपिनियन है कि यह शोडशी पूजा ही थी जिसने कि ब्रह्म कुंडलिनी को जागृत किया है। अर्थात कि पूरे संसार जो कि आध्यात्मिक पर आध्यात्मिकता में दिन प्रतिदिन वो जैसे कि निम्न से निम्न स्तर की ओर जा रहा था। पूरे संसार की आध्यात्मिकता को उठा के जैसे कि ठाकुर ने फिर से उसको जागृत कर दिया हो। तो यह था कि शोडशी पूजा के माध्यम से ब्रह्म कुंडलिनी तो जैसे कि जागृत हो गई किंतु यह हुआ था संपूर्ण रूप से सीक्रेटली और वह भी मध्य रात्रि को और वैसे ठाकुर के भक्तों ने यह सब कहानियां वैसे सुनी तो थी किंतु कहानी के भीतर में क्या एक स्पिरिचुअल डेप्थ है? उसके भीतर में क्या एक पावर छुपा है? इसके बारे में लोगों को अभी तक इतना ठीक से पता नहीं चला था। तो यहां पर देखिए कि धीरे-धीरे करके गंभीरानंद जी इस चैप्टर में वह पूर्व भूमिका बांधते हैं। जिसके बाद में एक के बाद एक प्रसंग आएंगे। महाराज का विश्लेषण रहेगा कि ठाकुर किस तरह से मां को आध्यात्मिक भार सम स्वीकार करने के लिए तैयार करते हैं। तो आज यहीं तक अभी आगे कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

प्रश्न: पहले क्या आया - षोडशी पूजा या ठाकुर द्वारा मां को मंत्र देना। यदि षोडशी पूजा के दौरान ठाकुर ने मां को अपनी सभी आध्यात्मिक उपलब्धियां अर्पित कर दी थीं, तो दीक्षा की क्या आवश्यकता थी?

जैसे अभी एग्जैक्ट क्रोनोलॉजी हमको नहीं पता है कि गंभीरानंद जी ने डेट नहीं लिखी है। किंतु गंभीरानंद जी ने जिस सीक्वेंस में वर्णन किया है उससे तो ऐसा ही लगता है कि पहले शोडशी पूजा हुई है। बाद में ठाकुर ने उनको मंत्र दिया है। तो यह हो गया सीक्वेंस का। फिर जैसे आपने कहा कि यह इसको डाइजेस्ट कैसे करें? जगन मात्र तो ऑलरेडी ठाकुर ने आवाहित कर ही दिया है। इनवोक कर दिया है मां के जीवन में। तो फिर ये शिक्षा दीक्षा उद्दीपना क्यों? तो जैसे हमने देखा कि पहले फल बाद में फूल कि वह एक शास्त्र सम्मान रखने के लिए ठाकुर के खुद के जीवन में देखिए कि पहले तो अपने खुद के आग्रह से उन्होंने ईश्वर प्राप्ति ऑलरेडी कर दी थी। मां को पुकार पुकार करके ब्लैकमेल करके मैं अपना गला काट दूंगा बोल के मां का दर्शन उन्होंने वैसे ही छीन लिया था। किंतु फिर शास्त्र मर्यादा रक्षा करने के लिए एक के बाद एक गुरु से उन्होंने शिक्षा ली। क्योंकि इसका आवश्यकता क्यों है? कि जैसे ठाकुर ने कहा ना कि खुद को मारने के लिए सोई भी काफी है। किंतु यदि आप को शत्रुओं का वध करना होगा तो तलवार चाहिए। तो खुद की आध्यात्मिकता जो थी वो तो निश्चित हो गई मां काली के दर्शन से या तो फिर ये शोडशी पूजा से किंतु फिर जगत में इसका जो प्रसार करना है आपको शास्त्रीय तरीके से चलना होगा। अभी स्वामी जी को खुद को देखिए कि ठाकुर के पास में तो उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर ही लिया था। किंतु फिर भी वह जब वह राजस्थान वगैरह जाते हैं तो केवल सबके पास में से वह व्याकरण की शिक्षा लेते हैं। उनके पास में वह फिर मैं एग्जैक्ट भूल गया कौन था उनका टीचर और कहां पे था। किंतु वो टीचर ने उनको कहा दो कुछ दिनों तक सिखाने के बाद में कि वो स्वामी जी उनके पास में पाणिनि का ग्रामर सीख रहे थे। तो उन्होंने स्वामी जी को कहा कि स्वामी जी मैं आपको इतने दिनों से सिखा रहा हूं। किंतु फिर भी आपको समझ में नहीं आ रहा है। मुझे समझ में नहीं आता कि मैं आपके साथ में क्या करूं। तो जब स्वामी जी ने यह बात सुनी तो स्वामी जी कहते हैं मुझ पर अपने पर बड़ा गुस्सा आया। बोला कि ऐसा कैसे होगा? मैं सीखने को बैठा हूं और ना समझ पाऊं और स्वामी जी कहते हैं फिर मैंने जो एक जीिद ली और फिर धीरे एक के बाद एक पाणिनि के जितने सूत्र है वो सबको मैं मुखस्थ करता गया। मेरे टीचर खुद अवाक हो गए कि अभी कितना सुंदर पाणिनि व्याकरण सीख रहे हैं। तो अभी जिन्होंने ठाकुर के पास में से निर्विकल्प समाधि स्वयं प्राप्त कर ली हो उनको पाणिनि ग्रामर सीखने की क्या जरूरत है? किंतु है क्योंकि वह शास्त्रीय तरीके से जगत को जय करना

प्रश्न: माँ गृहस्थों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देती थीं। उनके कारण ही इतने सारे भक्त एकत्रित हुए।

है। यह जो ठाकुर मां स्वामी जी इन तीनों को जैसे मेरा एक एनालिसिस है। ऑल थ्री रिप्रेजेंट वन एस्पेक्ट ऑफ ह्यूमैनिटी और ह्यूमन स्पीशीज। यदि हमारी टोटल ह्यूमन स्पीशीज को हम तीन एस्पेक्ट में बांट दें तो एक एस्पेक्ट है हमारा इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी। दूसरा एस्पेक्ट है फैमिली लाइफ और तीसरा एस्पेक्ट है यह सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग कि हाउ द सिविलाइजेशन राइजेस एंड फॉल्स और सिविलाइजेशन के साथ में जो भी साथ में एसोसिएटेड है पॉलिटिक्स हो ना कि वॉरफेयर हो इकोनॉमिक्स हो साइंस एंड टेक्नोलॉजी हो व्हाटएवर ए कॉर्पोरेट एस्पेक्ट ऑफ सिविलाइजेशन तो स्वामी जी एग्जिंपलीफाई दी सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट मदर एग्ेंंपलीफाई दी फैमिली एस्पेक्ट एंड ठाकुर एग्ेंंपलीफाई दैट इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी एस्पेक्ट। तो वो जो पूरे ह्यूमैनिटी को यह लोग एक तरह से पूरे को कन्वर्ट कर दे रहे हैं। मतलब उसको आवरत कर दे रहे हैं। हमारी जो वो जो डिस्कशन हुआ जैसे आपने कल कहा कि वो हिंदूइज़्म एक समय था कि वो सिर्फ एक स्पिरिचुअल प्योर स्पिरिचुअलिटी को ही ऑफर करता था। जबकि बाकी जो रिलीजन है स्पिरिचुअलिटी प्लस पैकेज ऑफर करते हैं। एक्चुअली हमने देखा कि दैट वाज़ ये स्प्लिट जो हो गया बिटवीन स्पिरिचुअलिटी एंड सिविलाइजेशन एंड फैमिली दैट स्प्लिट वाज़ ड्यू टू बुद्धिज्म नॉट ड्यू टू आवर हिंदूइज़्म। ये जो आपने कहा ना कि ये स्मॉल मोनेस्टिक सेक्ट होकर के रह जाता। दिस इज़ एक्चुअली व्हाट हैपन विथ बुद्धिज्म। क्योंकि भगवान बुद्ध के साथ में देखिए कि एग्जैक्टली वही हुआ जो कि आप कहते हैं। बुद्धिज्म फैला तो सही किंतु सबको ना कि एक तरह से जैसे कि मोनेस्टिक आईडियोलॉजी में कन्वर्ट करना शुरू किया व्हिच इज नॉट पॉसिबल। सिर्फ 1% लोग होते हैं जो कि एलिजिबल होते हैं मोनेस्टिक लाइफ के लिए। बाकी 99% को आपको गृहस्थ ही रहना पड़ेगा। गृहस्थ आश्रम ही बिताना पड़ेगा। तो गृहस्थ के लिए तो ऐसा कोई आदर्श बुद्धिज्म में नहीं है। तो फिर क्या हुआ कि बुद्धिज्म को स्प्रेड होने के लिए अपने कोर आइडियल के साथ में कंप्रोमाइज करना शुरू करना पड़ा और उसी में से फिर यह सब गड़बड़ हुआ जो कि हमने वो माय प्लान ऑफ कैंपेन में देखा। जबकि जो क्लासिकल या जो वैदिक हिंदूइज़्म था और फिर उसका जो कंटिन्यूटी है जो श्री रामकृष्ण वेदांत में देखिए कि तीनों एस्पेक्ट आर देयर रिप्रेजेंटेड माने कि ऐसा नहीं है कि यहां पे ऐसा कहा जाता है कि आपकी ईश्वर के साथ में जो रिलेशनशिप है वही एक इंपॉर्टेंट है। बाकी सबको भूल जाओ। ऐसा नहीं है। स्वामी जी को पढ़िए एंटायर सिविलाइजेशनल स्टडी इज़ रिप्रेजेंटेड देयर। मां को देखिए कि पूरा फैमिली लाइफ इज़ रिप्रेजेंटेड देयर। यानी कि जो जो ह्यूमन एक जो परिपुष्ट ह्यूमन लाइफ जो होना चाहिए वह तीनों एस्पेक्ट आर देयर

प्रश्न: स्वामीजी से पहले हिंदू धर्म में मनुष्य-सभ्यता civilization का ठीक से अध्ययन नहीं किया गया था। क्या यह सही है?

रिप्रेजेंटेड। ऑन दी अदर हैंड आप देखिए कि गीता क्या है? गीता इज परफेक्ट स्टडी ऑफ़ सिविलाइजेशन। रामायण और महाभारत देखिए कि दोनों के जो सेंटर है सेंटर इज़ ए बैटल फील्ड। माने रामायण में भी देखिए राम भगवान राम को रावण पे हमला करना पड़ा। गीता पूरा वो बैटल फील्ड पर लिखा गया है। कैन देयर बी एनीथिंग मोर सिविलाइजेशनल रिप्रेजेंटेटिव ऑफ अ सिविलाइजेशन देन अ बैटल फील्ड देन एक्चुअली ए वॉर तो दैट वाज़ पार्ट ऑफ आवर वैदिक हेरिटेज। किंतु हुआ क्या कि वैदिक युग के बाद में देखिए कि भारत में तीन मूवमेंट स्टार्ट हुई। एक तो है कि बुद्धिज्म, दूसरा है शंकराचार्य का वेदांत, तीसरा है भक्ति स्कूल। और तीनों ने जैसे कि यह सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट को छोड़ दिया। तो दैट इज व्हाई टुडे वी आर अंडर दैट इंप्रेशन कि वो क्लासिकल हिंदूइज़्म में वो सिविलाइजेशनल स्टडी नहीं था। बट दिस इज अ डेवलपमेंट आफ्टर द वैदिक एज नॉट ड्यूरिंग द वैदिक एज। यह भक्ति स्कूल देखिए कि बहुत सारे लोग कहेंगे कि अच्छा चलो कि आप कहते हैं कि मोनेस्टिसिज्म यदि बुद्धिज्म और शंकराचार्य ने डेवलप किया तो फैमिली के लिए गृहस्थ के लिए कुछ नहीं था। तो गृहस्थ के लिए भक्ति स्कूल थी। एग्रीड कि आपने ठाकुर और मां यह जो एस्पेक्ट है वह आप लेकर के आए। बट सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट वास स्टिल एब्सेंट। और दिस इज द रीजन कि जब विदेशी आक्रमण जब स्टार्ट हुए अपना ये सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग ही नहीं था। हम लोग सोच रहे हैं कि ये जिस तरह से हम जीव पे दया करते हैं ये आक्रमणकारियों पे भी दया करें। व्हिच इज़ कंप्लीटली रॉन्ग थिंकिंग जो अपने पे आक्रमण कर रहा है उसका हाथ काट देना चाहिए। सिंपल सी बात है। यह यदि नहीं समझ पाएंगे तो किस की बात रहेगी स्पिरिचुअलिटी? राइट? सो वो जो एक ब्लाइंड स्पॉट हमने डेवलप कर दिया दैट वास ड्यू टू द तीनों मूवमेंट वेदांत मूवमेंट, भक्ति मूवमेंट एंड बुद्धिस्ट मूवमेंट के उन्होंने सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग को छोड़ दिया, गवा दिया। दैट वाज़ द रीज़न। किंतु दैट वाज़ प्रॉपर्ली रिप्रेजेंटेड, प्रॉपर्ली डेवलप विद इन द वैदिक एज। अभी देखिए कि यदि हमको सही में कोई शिक्षा लेनी है ना सही में हमको किसी चीज का डर रहना चाहिए वो यह नहीं है कि उस समय नहीं था बीच में और अभी यह डेवलप किया है। मुझे मुझे जिस चीज का सही में डर लगता है भविष्य को देखता हूं कि वैदिक युग में अपने पास में तीनों स्टडी थी। तीनों एस्पेक्ट हमने डेवलप किए थे। इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी, यह फैमिली लाइफ और इन्होंने गृहस्थ जीवन और यह सिविलाइजेशनल स्टडीज तीनों डेवलप किए थे। इसके बावजूद वैदिक युग का अंत आया। सो व्हाट वास दैट रीजन कि जिसने कि वैदिक युग को ले डूब गया जो कि हमारे साथ में फिर से यह ना हो। क्योंकि अगेन सेम थिंग हमने तीनों एस्पेक्ट को प्रॉपर्ली डेवलप किया है। किंतु तीनों एस्पेक्ट डेवलप हो। दिस इज़ नॉट ए गारंटी कि आपका फिर से पतन ना हो। सो दिस इज़ समथिंग टू बी वेरी केयरफुल अबाउट इन द फ्यूचर। बाकी अदरवाइज जो मिडीवल एजेस में कि हमने कहा कि सिर्फ इंडिविजुअल स्पिरिचुअल एस्पेक्ट था या तो फिर भक्ति स्कूल में देखें कि चलो गृहस्थ जीवन को एंपल रिप्रेजेंटेशन मिला है। गौरांग महाप्रभु ने देखिए कि नित्यानंद को कहा कि तुम संसार में वापस फिर जाओ तुम शादी करो। तो नित्यान जो ये जो थे उनके वो जो नित्यानंद उन्होंने संसार में वापस आकर के दो बहनों के साथ में शादी की। क्यों? क्योंकि गृहस्थ में भी तो यह आदर्श फैलाना है। गौरांग महाप्रभु स्वयं सन्यासी थे। किंतु उनके जो क्लोजेस्ट डिसाइपल थे उनको उन्होंने गृहस्थ बनने को कहा। सो दैट वास फैमिली लाइफ एंड इंडिविजुअल स्पिरिचुअलिटी बोथ वेर रिप्रेजेंटेड। सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट नहीं था। तो चलिए कि हमारे जो भारत का जो मिडीवल एज है उसमें भारत का पतन हुआ कि एक के बाद एक आक्रमणकारी आते गए। हम अपने को डिफेंड नहीं कर पाए। तो दैट वाज़ वन रीजन हम दे सकते हैं। किंतु व्हाट अबाउट वैदिक युग? उस समय तो क्षत्रिय तो थे तो इतने सारे तो फिर हम भारत को डिफेंड क्यों नहीं कर पाए? दैट वी हैव टू बी वेरी केयरफुल एंड बड़ा अच्छे से एनालिसिस करना होगा कि वो गलती अभी हम फिर से ना दोहरा

प्रश्न: मध्यकालीन युग में, शंकराचार्य ने ज्ञान योग का समर्थन किया, गौरांग महाप्रभु ने भक्ति योग का समर्थन किया। लेकिन किसी ने भी कर्म योग को बढ़ावा नहीं दिया।

दें। ना दैट आई एग्री विद यू परफेक्टली पोस्ट वैदिक एज देखिए कि सिविलाइजेशनल एस्पेक्ट तो हमने डेवलप किया ही नहीं है और उसका फल भी हमने भुगता ना हजार साल की गुलामी क्यों आई? अदरवाइज ऐसा कौन सा एंशिएंट सिविलाइजेशन है जिसको कि इतना लंबा गुलामी का सामना करना पड़ा। देखिए दोनों तरीके से जैसे हमने डिस्कस किया कि चार एंशिएंट सिविलाइजेशन थी। हवांगहो रिवर वैली सिविलाइजेशन, चाइना की, ये सिंधु रिवर वैली सिविलाइजेशन, भारत की, मेसोपोटेमियन सिविलाइजेशन, ये मिडिल ईस्ट की और नाइल रिवर वैली सिविलाइजेशन। उसमें से तीन को तो मिशनरी रिलिजन खा ही गए। भारत को क्या है कि वह पता है ना वह ठाकुर ने कहा है कि एक ढेरों शाप अर्थात कि वह जो वाटर स्नेक होता है ना वह जहरीला नहीं होता। वो एक मेंढक को जब उगलता है तो मेंढक ना ही मरता है ना ही जीता है। बेचारे की यातना खत्म ही नहीं होती है। भारत का ऐसा हो गया कि ना ही हमारी सिविलाइजेशन का अंत आया ना ही हमारी सिविलाइजेशन का रिजरेक्शन हुआ। 1000 साल तक वो सांप ने मेंढक को जो गिला था और मेंढक को जो यातना भुगतनी पड़ी थी। इस तरह की परिस्थिति में हमको रहना पड़ा। दैट इज हमारी से हमारी जो स्पिरिचुअलिटी थी हमको मरने नहीं देगी। और जो लेक ऑफ सिविलाइजेशनल स्टडी था वो हमको उसमें से बचने नहीं देगा। जात सांप ये ठाकुर कहते इसको इस बार जात सांप ने पकड़ा है। अभी तीन डाक में ही उसका मृत्यु हो जाएगा। तीन बार चिल्लाएगा उसी में खत्म।

प्रश्न: जैन धर्म बौद्ध धर्म से पहले आया या बाद में?

जैन जो थे महावीर जैन भगवान बुद्ध के समकक्ष थे और बुद्ध जब जन्म लिए थे उस समय जैन उनको जो महावीर जैन थे उनसे उम्र में सीनियर थे और माने दोनों कंटेंपररी थे किंतु जैन जो थे महावीर जैन उनसे उम्र में बड़े थे तो वो ऐसा नहीं है कि बुद्धिज्म के जो डिटेरेशन हुआ उसके बाद में जैनिज्म आया। एक्चुअली क्या है? भारत में देखिए कि दो स्कूल है श्रमण और ब्राह्मण। तो यह जो श्रमण ब्राह्मण स्कूल में से जो वेद वेदांत उपनिषद यह भक्ति स्कूल वगैरह स्टार्ट हुआ और यह जो श्रमण स्कूल है यह श्रमण स्कूल के यह जैनिज्म और बुद्धिज्म है। यानी कि दोनों एक दूसरे के कंप्लीमेंट्री भी है और यह कंपैरेटिव ये भी है। कंटेंपररी भी है। और एक्चुअली देखिए कि यह जो सन्यास जो है ना सन्यास प्रथा यह श्रवण स्कूल का एक बड़ा अवदान है। यह जो मुझे ऐसा लग रहा है अगेन यह मेरा पर्सनल स्पेकुलेशन है कि क्षत्रिय लोगों ने जो ब्राह्मण लोगों के साथ में जो ब्राह्मण लोगों के कर्मकांड उन मतलब कर्मकांड इस अर्थ में नहीं मॉडर्न जो अपना स्वामी जी का कर्म है इस अर्थ में नहीं किंतु ये विधि विधान वगैरह के विरोध में जो एक रेबेलियन स्टार्ट किया था और यह जो प्योर एक ब्राह्मण और आत्म तत्व उन्होंने जो प्रतिपादित किया उसके पीछे में ना शायद श्रमण स्कूल का कुछ ना कुछ एक तरह से इंस्पिरेशन हो सकता है क्योंकि श्रमण स्कूल किसी भी तरह के यह विधि विधान या तो फिर यह उसके ऊपर में इतना विश्वास नहीं करता। कहते हैं कि जो इस जीवन के परे जो है उसके लिए जाओ। जबकि वेद में आप देखेंगे कि बहुत सारे यज्ञ बहुत सारी विधियां जैसे कि पु यह जो पुत्र प्राप्ति के लिए जो यज्ञ है या तो फिर यह जो अश्वमेध यज्ञ है राजस्वय यज्ञ है यानी कि जगत में सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत सारी विधियां थी। जबकि श्रमण स्कूल है इज़ अ वेरी क्लियर कि जगत को छोड़कर के जगत के जो परे हैं उसको प्राप्त करना है। तो पर्सनली मेरा ऐसा और दूसरा देखिए कि श्रवण स्कूल के ये जितने भी थे खास करके महावीर जैन और ये गौतम बुद्ध ये दोनों क्षत्रिय परिवार से आते थे। तो क्षत्रिय और ये श्रमण स्कूल इन दोनों में एक एक तरह का वो जो कहेंगे कि एक मैचिंग पहले से ही चल रहा था। तो भगवान राम भगवान कृष्ण अभी चलो राम और कृष्ण को छोड़ दें और इन जनरल जैसे कि स्वामी जी ने कहा कि क्षत्रियों ने ब्राह्मण लोगों की ये जो कर्मकांड विधियों के ऊपर में थोड़ा सा उनका नाराजगी व्यक्त किया तो माय पर्सनल स्पेककुलेशन इज कि उन्होंने श्रमण स्कूल में से कुछ ना कुछ प्रेरणा प्राप्त की होगी।

प्रश्न: ठाकुर ने माँ को कैसे समझाया कि किस भक्त को कौन सा मंत्र देना है?

देखिए कि मां को इतना सब डिटेल में भी समझाने की जरूरत नहीं थी क्योंकि पहली बात तो है कि मां की खुद की आध्यात्मिक उपलब्धि इतनी गहन थी कि मां को बहुत कुछ अपने अंतर में से ही समझ में आ जाता था। ठाकुर यदि मां को यह सिर्फ बता देते कि यह इस देवता का यह मंत्र है। इस देवता का यह मंत्र है। तो फिर मां को फिर इतना समझ करके ही सामने वाले का चरित्र देखकर के मां मंत्र दे देती थी। कभी-कभी मां पूछती भी थी। जैसे कि गौरदासी है वो गौ गौरी मां तो हमको पता है कि उनकी खुद की स्कूल चल रही थी तो वो स्कूल की बच्चियों को लेकर के मां के पास में आती थी तो एक बार गौरी मां एक लड़की को लेकर के आई तो मां इस लड़की को लेकर के अपने जहां पर पूजा करती थी वहां पर ले गई और लड़की को बिठाया पूजा करने की शुरुआत की फिर वहीं से मां ने वो पूछा गौर दासी को कि अच्छा गौरदासी एक कौन सा कौन ठाकुर देवो अरे गौरदासी मैं इनको किस देवता का मंत्र दूं तो गौरदासी ने बता बता दिया गौरी मां ने बता दिया तो मां ने इस तरह से उनको मंत्र भी दे दिया और यह जो स्मृति कथा है वह उन्होंने ही लिपिबद्ध की है जिसको कि यह मंत्र मिला था यानी कि पहले यदि इतना पता चल गया कि कौन से देवता का क्या मंत्र है फिर किसके कौन से इष्ट देवता है यह मां शायद उनके हृदय में ही जाग करके समझ लेती फिर इतना डिटेल में इंस्ट्रक्शन देने की जरूरत नहीं

प्रश्न: भाव-समाधि कैसे प्राप्त करें?

पड़ती देखिए रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य जिन्होंने भी पढ़ा है सबको पता है कि ब्रह्मचर्य है आध्यात्मिक जीवन का फाउंडेशन। जब तक ब्रह्मचर्य का पालन ना हो तब तक हमको पता है कि भाव यदि आ भी जाए तो भी वह टिकेगा नहीं। वह जो आपने यह जो मटके की जो आपने उदाहरण दिया ठाकुर ने भी यही उदाहरण दिया है कि मटके के भीतर में आप जितना ही पानी डालते रहे भीतर में यदि छेद है तो सब पानी निकल जाएगा। तो वह छेद के माध्यम से ठाकुर क्या कहना चाहते हैं? यदि वासनाएं जागृत है तो वह हम जितना भी भाव भरे वह निकल जाएगा। वह जो ठाकुर वह गिलहरी का उदाहरण देते हैं उसकी पीच के उसकी जो पूंछ है उसके ऊपर में किसी ने पत्थर बांध दिया। अभी यह गिलहरी जितनी ही दीवाल के ऊपर में चढ़ने का प्रयास करें। थोड़ा सा भी उठेगी तो पत्थर का जो वेट होगा उसको फिर से जमीन पर लाकर पटक देगा। वो जो नृत्य गोपाल का जो ठाकुर का जो फेमस डिसाइपल जिसको कि कीर्तन करते-करते भाव होता था उसको ठाकुर ने कह दिया कि साधु सावधान क्यों क्योंकि वह एक स्त्री भक्त थी उसके घर पर वह आना जाना करता था तो ठाकुर वो जो उसका कहना था कि उसका मातृभाव है वात्सल्य भाव है तो ठाकुर कहते हैं कि इसी वात्सल्य भाव में से ही बाद में त्सल्य भाव हो जाएगा यानी कि और स्वामी जी का भी यह स्टडी था कि समा कीर्तन के दरमियान जिनको जिनको कि भाव होता था या तो जिनको भी जैसे कि आपने यह सविकल्प समाधि शब्द यूज़ किया है तो मैं कहूंगा कि भाव समाधि अपने ऑर्डर में यह शब्द ज्यादा प्रचलित है। तो जिनको भी यह भाव समाधि होती थी सभी का स्वामी जी ने स्टडी करके देखा कि देखिए कि यदि उन लोगों के जीवन में कठोर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं हो रहा है तो यह सभी लोग भाव में से बाहर आकर के और गहरी विकृतता में चले जाते थे। पहले जिस लेवल पर थे उससे भी बड़े गड्ढे में यह लोग गिरते थे। यानी कि यदि भाव या समाधि या तो फिर आध्यात्मिकता के उच्च आयाम की ओर जाना है तो उसके लिए फाउंडेशन है। हमारे संघ में कहे गए हैं। दो फाउंडेशन है। एक है सत्य दूसरा है ब्रह्मचर्य। किसी भी कीमत पे इन दोनों का भंग नहीं होना चाहिए। जो कि सत्य और ब्रह्मचर्य इन दोनों का भंग हुआ तो हो सकता है कि सामयिक रूप से हमको भाव समाधि वगैरह हो जाए किंतु यह टिकेंगे

प्रश्न: मन को शांत कैसे करें? चंचलता से कैसे छुटकारा पाएं?

नहीं। देखिए चंचलता का एक उपाय है लंबे समय तक जप करना। और कल रात को यदि आप थी तो उसमें मैंने कहा था कि जिसकी वाणी है उन्हीं का नाम है। यदि आप 2 घंटा मैं कहूं कि बैठकर के जप कीजिए जो कि बड़ा मुश्किल है। एक हाथ में जप माला रखिए दूसरे हाथ में कथामृत रखिए। जिनके नाम का जप कर रहे हैं उन्हीं के नाम की वाणी है। उन्हीं की वाणी है। जप करते-करते मन यदि चंचल हो उठे इमीडिएटली कथामृत पढ़ने का प्रारंभ कर दीजिए। और कथामृत पढ़ते-पढ़ते जब मन एकाग्र हो जाए, स्थिर हो जाए, फिर से जप प्रारंभ कर दीजिए। एक समय ऐसा आएगा कि कथामृत का पाठ भी चल रहा है। साथ-साथ में जप भी चल रहा है और उसके बाद में एक ऐसा समय आएगा कि दोनों स्थिर हो जाएंगे। दोनों रुक जाएंगे। आपका मन भी स्थिर हो जाएगा। यह बड़ा ही टेस्टेड फार्मूला है। मैं सबको रिकमेंड करता हूं कि यदि लंबे समय तक यदि अपने को जप के लिए बैठना है, मन को शांत स्थिर करना है, चंचलता से मुक्ति पानी है तो एक हाथ में कथामृत, एक हाथ में जप माला। एक नियम करके दो घंटे के लिए बैठ जाइए। देखिए कि जीवन सफल हो

प्रश्न: जब भी मुझे मौका मिलता है मैं जप करता रहता हूँ। लेकिन अब मैं इससे आगे नहीं बढ़ सकता। आध्यात्मिक जीवन में और आगे कैसे बढ़ा जाए?

जाएगा। इसके बाद में एक बात बताऊं। जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद है। वैसे ही मन में जो एक ईश्वर का जप चल रहा है ना इसके बाद का जो एक स्टेप है ना उसको माइंडफुलनेस कहते हैं आजकल की लैंग्वेज में या तो फिर कहते हैं अवेयरनेस। यह जगत में जैसे कि ठाकुर के पास में एक स्त्री भक्त का आगमन हुआ। तो ठाकुर ने कहा कि देखो तुम उनका भी यही प्रश्न था कि एक लेवल पर जाकर रुक गई है। उसके आगे कैसे जाना है? तो ठाकुर ने कहा कि सबसे ज्यादा प्रिय कौन है तुम्हारे लिए? किसके पीछे में तुम्हारा मन इतना दौड़ता है? तो यह स्त्री भक्त कहती है वो ऐसे ही वह कहती है मैं अनमैरिड हूं। किंतु मेरा एक भतीजा है छोटा सा। इसको मैं अपने बच्चे के रूप में उसका लालनपालन कर रही हूं। तो ठाकुर क्या कहते हैं? देखो उस बच्चे के भीतर में भगवान कृष्ण का दर्शन करो। और इस तरह से उसको जो खिलाओ, नहलाओ, उसको सजाओ जैसे कि तुम भगवान कृष्ण को कर रहे हो। यानी कि भगवान कृष्ण का जब जो भीतर में चल रहा है उसको बाहर के जीवन में भी भगवान कृष्ण को देखना शुरू करो। इसी प्रैक्टिस को ना आजकल माइंडफुलनेस कहते हैं। आप खाना भी बनाते हैं तो खाना बनाने में ऐसा मत सोचिए कि मैं जप करूंगा और खाना बनाऊंगा। यह थोड़ा मुश्किल हो जाता है क्योंकि दो तरह की एक्टिविटी होती है। एक तरह की एक पैसिव एक्टिविटी या रूटीन एक्टिविटी होती है जिसमें क्या है कि आप जैसे ड्राइविंग कर रहे हैं या बस में बैठे हैं वैसे एक्टिविटी है किंतु आपका माइंड फ्री है। तो आप जप कर सकते हैं। अपने मन को भीतर में एकाग्र कर सकते हैं। किंतु जैसे कि आप लिख रहे हैं, खाना पका रहे हैं या ऐसा कुछ कर रहे हैं जो कि आपके मन को एक्टिवली उसमें एंगेज रहना होगा। इस समय क्या करना है? डू इट विद माइंडफुलनेस। उसके ऊपर में ही इतना संपूर्ण ध्यान बिठा दो। ऐसा करो कि मैं यह जो कर्म कर रहा हूं वो ईश्वर की पूजा है। तो ऐसा करके करके डे टू डे एक्टिविटी भी यदि होगी ना इट विल कन्वर्टेड इनू डिविनिटी। पूजा में वह परिणत हो जाएगी। यानी कि जब आप फ्री है तो भीतर में जप चल रहा है। जब आप कर्म करते हैं तो कर्म को इतना सिंसियरिटी एक निष्ठा और माइंडफुलनेस और अवेयरनेस के साथ में करो कि वह पूजा में परिणत हो जाए। दैट मींस कि 24 घंटा आप ईश्वर से आप ईश्वर के संपर्क में रहेंगे।