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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 27 Oct 2023

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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः आदर स्पेशल इशू मैगजीन प्रतिब एकटा करे प्रिंट होए दीपोत्सवी इशू तो ए बार आदर इस समय का इस महीने का इस साल का प्रिंट हो गया है और ध्यान विशेषांक स्वामी इसमें मेडिटेशन के ऊपर में जितने अच्छे-अच्छे आर्टिकल है अपने साधुओं के द्वारा ही लिखे हुए भूतेश आनंद जी महाराज है रंगनाथ आनंद जी महाराज है गंभीरानंद जी महाराज है अपने बड़े महाराज है निखिलेश्वर आनंद जी तो बड़ा ही सुंदर कलेक्शन है तो ये एक हमारा मेजर एक्सरसाइज होता है साल में तो वो एक हो गया कंप्लीट सो दिस इज म वन ऑफ द ग्रेट क्या कहेंगे कि साल में एक ऐसा होता है कि दीपोत्सवी अंक निकल गया। अभी हां बहुत अच्छा हुआ। यानी एक एक खत्म हुआ एक बड़ा काम। अभी मां शारदा देवी श्री मां शारदा देवी अवतरणी का पृष्ठ पांच बंगाली किताब पृष्ठ पांच। कल हमने देखा कि पहले तो कहते हैं कि अवतार जब पृथ्वी पर आते हैं तो उनके तीन जो कार्य हमको दिखते हैं वो सिर्फ तीन ही नहीं भाव गंभीर्य संपादन नवीन आदर्श संस्थापन या तो फिर मानव के चित्त का आकर्षण ये सिर्फ ये तीन से ही समाप्त नहीं होता और भी बहुत सारा कार्य होता है जो कि हम अपनी सीमित बुद्धि से नहीं समझ पाते हैं किंतु फिर गंभीर महाराज फिर आगे क्या लिखते हैं गंभीरानंद जी तथापि वर्तमान चरित्र आलोचनार पखे सहायक होबे बोलिया सिर्फ यह तीनों से संपादित नहीं होता किंतु फिर भी वर्तमान आलोचना यानी कि अभी जो हमारा डिस्कशन चल रहा है अभी हम जो मां का जीवन उपस्थापित करने वाले हैं उसमें सहाय हो इसके लिए ए तिई ग्रहण करिलाम यह तीन जो कार्य अवतार के होते हैं जो हमारी दृष्टि से दिखते हैं। हमारे मन से हम जिसका विश्लेषण कर सकते हैं। इन तीनों के ऊपर में ही हम फोकस करेंगे। श्री मां शारदा देवी जीवन ने आमरा मातृतवादी देव भावे पराकाष्ठा देखते पाइबो श्री मां शारदा देवी के जीवन में हम मातृत्व जिस जैसे देव भाव की पराकाष्ठा देख पाएंगे। मां के जीवन में बहुत सारे भाव है। मातृत्व भाव जिसका यहां पर उल्लेख किया है। उसकी पराकाष्ठा हम देख पाएंगे। इसके आगे अवतरणिका में ही गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है कि किस तरह से कि अवतार जब आते हैं देखिए कि सभी के भीतर में किसी ना किसी अच्छे भाव का तो रहते ही है। जैसे कि हम सभी लोग थोड़ा बहुत मंदिर में जाएंगे। हम सभी में ठाकुर मां स्वामी जी या तो कोई भी देवता है उसके प्रति श्रद्धा भक्ति होगी। हम सभी लोग थोड़ा बहुत यथाशक्ति साधन भजन करते ही होंगे। दीक्षा बहुत सारे लोगों ने ली है। सुबह शाम जिस तरह से अपने गुरु हैं जिस जिनके पास से दीक्षा ग्रहण की है तो पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज वाइस प्रेसिडेंट महाराज तो उनके बताए हुए मेथड के अनुसार रीत के अनुसार थोड़ा बहुत हम जब भी किया करते होंगे। किंतु हम सब में और अवतार में जो डिफरेंस है कि वे लोग उस भाव की पराकाष्ठा हमको दिखा के जाते हैं। जैसे कि फॉर एग्जांपल एक ही भाव है कि क्षमा का भाव। हम सभी लोगों के जीवन में ऐसा हुआ होगा। हमारे जो सीनियर हैं अपने माताजी, पिताजी या तो फिर नाना नानी, दादा-दादी इन सबके जीवन में हमने क्षमा के गुण को लक्ष्य किया होगा कि किस तरह किसी ने उनका कुछ हानि पहुंचाने का या तो फिर उनके विरुद्ध में कुछ कार्य करने का प्रयत्न किया होगा या तो किया होगा फिर भी उन्होंने अपने हृदय से उसको क्षमा कर दिया होगा अरे भैया जाने दो क्या है ये सब छोटी-मोटी चीजों को लेकर के लड़ना झगड़ना वो कल सीख लेगा तो किंतु हमारे में जो क्षमा का भाव है और जो महापुरुषों में जो क्षमा का भाव होता है वो क्षमा के भाव की पराकाष्ठा दिखा करके जाते हैं ठाकुर के जीवन की वह बड़ी ही फेमस घटना ना कि ठाकुर वो भाव में वो जमीन पे लेटे हुए थे। उस समय वो उस चौकीदार था वहां पे हवलदार तो उसने आकर के ठाकुर को जूतों से मारा लात मारी। यह सोच के कि ये ठाकुर ये ढोंग कर रहे हैं भाव का ये जिससे कि मथुर बाबू के मथुर बाबू को लुभा करके उनसे पास से कुछ पैसा वगैरह ले सके। तो ऐसा सोच करके उसने ठाकुर के ठाकुर को आघात किया अपने पैरों से। जब ठाकुर को भाव का उपशम हुआ होश हुआ नहीं हमारे से कहीं ज्यादा होश ठाकुर को है जब वो भाव में आते हैं हम लोग क्या करते हैं कि प्रतिदिन की ये जो लैंग्वेज यूज करते हैं तो कभी-कभी हम लोग ऐसा बोल देते हैं भाव में बेहोश हो गए थे फिर भाव में से आकर के होश में आए एक्चुअली यह तो बिल्कुल गलत हो गया कि शिवनाथ शास्त्री जो कि जिसके बारे में कल हमने कहा था वो ठाकुर के पास आना उसने बंद कर दिया था क्योंकि क्योंकि उसने देखा कि केशव चंद्र सेन ठाकुर के पास आ रहा है तो फिर ठाकुर के पास आकर के ब्रह्म समाज के जितने भी फाउंडेशनल नीति नियम है वो सब भूल के वो मां का नाम लेकर के कीर्तन कर रहा है। क्या ब्राह्म समाज की रचना ही तो निराकार के प्रिंसिपल पे हुई है। और ये मां का नाम लेकर के कीर्तन करना ये क्या पागलापन केशव सेन ने मचा करके रखा है। और वहां से लेकर के फिर धीरे-धीरे करके केशव ने नियमों का भंग करने की शुरुआत की। उसी के ब्राह्मण समाज का तो आखिर में उसकी लड़की की शादी वो कुछ बिहार के राजकुमार के साथ में करवा दी। तो केशवसन ने शिवनाथ शास्त्री ने पहले से ही ठीक करके रखा था कि ठाकुर से दूर रहना है। तो ठाकुर वो कहीं पे वो किसी को बोल दिया कि वो बेहेड हो गए। बेहेड अर्थात कि हेड अर्थात कि अब सिर और बे हेड यानी कि बेर के या तो फिर नॉनसेंस कहो ना कि उनके भीतर में वो कॉमन सेंस नहीं है ना कि वो भाव में आ करके क्या पागलापन करते हैं? तो ठाकुर ने कहा कि अरे तुम लोग दिन-रात विषय में डूबे रहते हो और तुम्हारे माथा तुम्हारा माथा ठिकाने पे है और मैं ईश्वर भाव में मत रहता हूं तो मैं बेहेड हो गया। ये किस तरह का तुम्हारा डेफिनेशन है? तो इसको इसको लेकर के एक बार मां को किसी ने पूछा था कि मां ठाकुर कहां है? दक्षिणेश्वर की बात है तो मां ने बोला देखो वो भाव टाऊ में आकर के भाबे टाबे हो तो गंगा ही बसे आज वो भाव टाटाओ में वो मत्त होकर के कहीं गंगा के किनारे बैठे होंगे जाओ खोजो उनको मां को भी ऐसा कभी-कभी परेशानी हो जाती थी। इतना भाव में मत हो जाते थे। किंतु हमको देखना है कि वह पागलपन या तो बेहोश होना यह शब्द जो हम मत होना यह जो हम डे टू डे यूज़ करते हैं वो भाव के लिए वो सही शब्द नहीं अपनी भाषा की सीमितता है। लिमिटेशन है बोल करके हम ये करते हैं। तो यहां पर जब उसने ठाकुर के शरीर पर आघात किया फिर ठाकुर होश में आए ऐसा नहीं कह के यदि हम थोड़ा सा अपनी लैंग्वेज को परिष्कृत करें तो कहेंगे कि भाव का उपशम हुआ तब कहीं जाकर के उनको पता चला कि भाव में पता नहीं चला था भाव का उपशम होने के बाद में पता चला कि उनके देखो कि पूरे शरीर पर घाव हो गया तो किसी ने बोला ठाकुर को जाकर के उनको कंप्लेन करते हैं मथुर बाबू को मथुर बाबू के पास मामला जाता तो एकदम वो क्या से क्या नहीं कर देते तो ठाकुर ने कहा नहीं उसको छोड़ दो उसको क्षमा कर दो। तो देखिए किसी ने सिर्फ उनकी निंदा नहीं की। किसी ने सिर्फ उनको पैसा उनका उठा लिया ना कि ऐसा जिसको कि हम फिर भी थोड़ा बहुत हम ऑब्जेक्टिवली सोच सकते हैं। ऐसा नहीं सीधा उनके शरीर पर आघात किया। इतना कष्ट हुआ। उसके बाद में भी ठाकुर ने उसको क्षमा कर दिया। जीसस का जीसस को क्रस क्रॉस पे वो क्रूस युद्ध किया गया था। उस समय उन्होंने क्या कहा? फॉरगिव देम फादर बिकॉज़ फॉर दे नो नॉट व्हाट दे आर डूइंग। ए ईश्वरीय पिता इनको क्षमा कर दो क्योंकि इनको पता नहीं है कि ये लोग क्या कर रहे हैं। तो शूली पे चढ़े हैं। क्या भयानक कष्ट होता होगा। हम लोग इमेजिन करके सोच सकते हैं। इंग्लिश में एक सरस बहुत अच्छा किताब है। अंकल टॉम्स केबिन। ये अंकल टॉम्स केबिन। ये अंकल टॉम ये अमेरिका में तो पता है ना स्लेवरी यानी कि ये अफ्रीकन लोगों को अमेरिका बंदी बना के ले आते थे। फिर वहां के बड़े-बड़े शुगरकेन ये कोन ये बड़े-बड़े खेत होते थे। उसमें इन लोगों के पास में गुलाम बना करके काम करवाते थे। ये तो पूरे काले अफ्रीका के। फिर वहां पे वो सिविल वॉर वगैरह हुआ और इन लोगों को फ्रीडम मिला। तो किंतु जस जिस समय ये अफ्रीकन लोग अमेरिका में गुलाम बन करके रहते थे। उस समय की ये कहानी है। साउथ में खास करके ये बहुत होता था। नॉर्थ में इतना गुलामी की प्रथा नहीं थी नॉर्थ अमेरिका में क्योंकि नॉर्थ अमेरिका इंडस्ट्रियलाइज था। खास करके ये न्यूयॉर्क न्यू जर्सी ये न्यू इंग्लैंड कॉलोनीज़ कहते हैं वो वाला एरिया। किंतु ये वर्जनिया है वगैरह कैरोलाइन है के तो ये जो साउथ अमेरिका वाला जो हिस्सा था वहां पे खास करके बड़े-बड़े खेत होते थे और अफ्रीकन लोगों को गुलाम बना के खेत में उनके पास से काम करवाया जाता था। उस समय की ये कहानी है। किताब का नाम है अंकल टॉम्स केबिन। अंकल टॉम बोल करके एक अफ्रीकन था और अभी उस समय क्या था कि जो खेत का मालिक है इन गुलामों का मालिक वो किसी गुलाम पे यदि ये अफ्रीकन गुलाम पे यदि नाराज हो जाता तो उसको इस इस हद तक टॉर्चर करता उसको इस हद तक उसकी मारपीट करता जैसे पशु के साथ में करते हैं इस तरह से इस तरह का डर नहीं बताएंगे तो ये गुलाम लोग रिवोल्ट करेंगे वो इस तरह से विद्रोह करेंगे और अपने गोरे मालिकों को मार देंगे इसलिए सब समय गुलामों को कंट्रोल में रखना है और जो भी थोड़ा बहुत भी विद्रोह करता है तो उसको एग्ेंपलरी पनिशमेंट जिसको कहते हैं इंग्लिश में उसको इस तरह की पनिशमेंट देनी है कि उसको देखकर के बाकी लोग विद्रोह का नाम ना ले तो ये अंकल टॉम पे उस उसके जो मालिक है किसी बात पर नाराज हो गए तो एक पूरी रात उसको टॉर्चर किया किंतु जब सुबह हुई तो उसको जो टॉर्चर करने वाले थे वो भी अफ्रीकन थे दो वे लोग उसके पैर में गिर गया। बोला कि हमने इस तरह के कितने गुलामों को हमने मारपीट की पूरी रात भर और वो जिस तरह से बिहेव करते हैं और आप जो है आपकी जो डिग्निटी है आपके भीतर में जो हमने दिव्यता का प्रकाश दिखा है तो यह तो जीसस क्राइस्ट स्वयं यदि पृथ्वी पर आ जाएंगे तो हमको इस तरह का कुछ देखने को मिलता। आपने एक अक्षर हमको यू डिडंट कर्स अस। आपने हमको श्राप नहीं दिया। आपने हमको गाली नहीं दी। इस भयानक टॉर्चर को आपने सहन कर लिया। यू आर गॉड। इस तरह से उनके पैर में गिर गए। तो देखिए इस तरह के एक्सट्रीम एग्जांपल जब होते हैं तब हम उस गुण को हम अपने जीवन में आदर्शनीय वो आदर्श है या तो अपने जीवन में करणीय है। यह बात हम तब स्वीकार करेंगे। वैसे ही हम किसी को देखेंगे। अपने पिताजी को देखा या अपने किसी रिलेटिव को देखा। देखा कि चलो कोई उनकी निंदा कर रहा है तो उन्होंने कहा कि अरे छोड़ो उसको क्या है? हमने खुद ने अपने जीवन में कई लोगों को क्षमा कर दी होगी। हम हमारी खुद की गलतियां हुई होगी और हमारे टीचर है या हमारे मित्र हैं उनको उन्होंने हमको क्षमा कर दिया होगा। ऐसा भी हमने देखा है। किंतु ये सब क्या है ना कि इसकी क्षमा करने से जो प्राइस जो कीमत पे करनी पड़ती है जो जैसे कि सबसे बड़ा एग्जांपल भारत की स्वतंत्र फ्रीडम मूवमेंट। बाकी सब जगह पर देखिए कि अमेरिकन फ्रीडम वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस। ब्रिटिश लोग अमेरिका पे भी राज करते थे। किंतु उन लोगों ने युद्ध के माध्यम से ब्रिटिश लोगों को वहां से हटाया। जैसे कि रशिया या चाइना में वहां पे ये जो धनपति लोग थे कैपिटलिस्ट थे वे लोग वहां के लोअर क्लास या तो फिर यह वर्किंग क्लास के ऊपर में अत्याचार करते थे। तो उनका मर्डर करके उनकी हिंसा करके उनका जो पावर है समाज के ऊपर में वो कम किया या तो उसको खत्म किया। जर्मनी का एग्जांपल पता है। फ्रांस का एग्जांपल पता है। जहां-जहां पे भी यह जो लोअर क्लास है या तो गुलाम प्रजा है या तो कॉलोनाइज स्टेट है उनको बिना युद्ध के बिना हिंसा के फ्रीडम नहीं मिलता। भारत में ही एक ऐसा हुआ है। हमने अपने ऊपर अत्याचार करने वालों को आशीर्वाद देकर के भारत में से भगाया है। और इसकी सिद्धि सिर्फ महात्मा गांधी को नहीं जाती। दिस क्रेडिट गोस टू ठाकुर मां एंड स्वामी जी। मां के जीवन में ठाकुर के ठाकुर के तो नहीं किंतु कहेंगे कि मां के और स्वामी जी के जीवन में हमने बहुत देखा है कि किस तरह से वे लोग मां ने कहा था ना कि वो बड़ा ही सुंदर उदाहरण मैंने कई बार उसको डिस्कस किया है क्योंकि वो मेरा बड़ा फेवरेट है कि वो राधु और मां को साड़ी चाहिए तो मां ने वो वर्दा महाराज ना कि कोई उनका वो शिष्य था वहां पे जय राम भाटी में बोला कि जाकर के साड़ी लेकर के आओ वस्त्र लेकर के आओ तो वे लोग खादी का वस्त्र लेकर के आए तो खादी का वस्त्र क्या है वो थोड़ा सा रफ रहता है तो वो राधु और माकू बड़े नाराज हो गए। हमको इस तरह का नहीं चाहिए वस्त्र। हमको तो वो फाइन वो मील में जो बनता है इस तरह का वस्त्र चाहिए। तो वो महाराज जी जो वस्त्र लेकर के आए थे वो सन्यासी महाराज वो बड़े ही नाराज हो गए। अरे तो विदेशी वस्तु चीजों को हमने व्यवहार करने से तो वो तो उन लोगों को मतलब क्या है? बल मिलता है। शक्ति मिलती है। हमको तो स्वदेशी चीजें व्यवहार करनी चाहिए। क्या ये सब पागलपन लगा रखा है? मिल की मिल के कपड़े पहनोगे। यह तो गलत हो गया। तो मां ने हंसते-हंसते कहा कि अरे ओराव तो अमार छेल है। वे लोग भी तो मेरे ही संतान है। ब्रिटिश लोग जो लोग कि मिल में वस्त्र बनाते हैं और मिल के वस्त्र भारत में बेचने के लिए भारत में जो बड़े ही फाइन वस्त्र जो लोग बनाते थे उनके अंगूठे काट दिए थे। वही लोग भी तो मेरे ही संतान है। मां मां ने ऐसा कहा था। तब कहीं जाकर के ब्रिटिश लोगों से हमको जो आजादी मिली है वो दैट वाज नॉन वायलेंट। ये सत्याग्रह के बल पर हमने आजादी प्राप्त की है और वे लोग गए हैं तो उनके प्रति हमारे मन में कोई द्वेष भाव भी नहीं रहा। क्योंकि ये द्वेष भाव की साइकिल जो है ना वो हमेशा चलती रहती है। ये साइकिल ऑफ वायलेंस जितने लोगों ने यह युद्ध करके हिंसा करके स्वतंत्रता प्राप्त की है। सबके जीवन में देखिए कि ये साइकिल ऑफ वायलेंस चलती ही रहेगी। चलती ही रहेंगी। ये चाइना है, रशिया है। रशिया ने कितने सारे युद्ध में भाग लिया। चाइना ने कहीं जाकर के चाइना के भीतर में जो कल्चरल रेवोल्यूशन वगैरह जो आया है उसमें वहीं के ये माओजेदों या तो फिर उनकी कम्युनिस्ट पार्टी करोड़ों-करोड़ों अपने ही देशवासियों को मृत्यु के मुख में डाल दिया। कल्चरल रेवोल्यूशन के नाम पे ना कि ग्रेट लिप फॉरवर्ड के नाम पे ना क्या-क्या उन्होंने कहा किया है। ये स्टालिन ने अपने ही कितने देश बांधवों को गुलाब यानी कि वहां के साइबेरिया के प्रजन में फेंक दिया। तो एक बार आप वायलेंस स्टार्ट करते हैं। इसका अंत नहीं आता। आपको हिंसा का एक हैबिट लग जाता है। एक एडिक्शन लग जाता है। अमेरिका का वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस के बाद में देखेंगे कि एव्री ईयर अमेरिका किसी ना किसी वॉर में वो पार्टिसिपेट होता रहा है। भले उसको डायरेक्टली अफेक्ट ना भी करे। कहीं दुनिया के दूसरे छोर पे भी हो रही है। कोरिया में हो रही है ना वियतनाम में हो रही है ना कहां पे वॉर हो रही है। अमेरिका सब समय वहां पे जाकर के अपने सोल्जर्स को भेजेगा। क्या से क्या नहीं करेगा। साइकिल ऑफ वायलेंस विल नेवर स्टॉप। इसके लिए क्षमा का जो गुण है उसको हमको अपनाना है। किंतु यह क्षमा लोगों को करनी है। मुझे खुद को नुकसान हो रहा है। मैं कब लोगों को क्षमा करूंगा? मुझे तो एक ज्वलंत आदर्श चाहिए। आदर्श की पराकाष्ठा चाहिए। मेरे टीचर ने मैंने आज होमवर्क नहीं किया। गलत कह दिया। टीचर ने पिताजी को फोन किया ना कुछ भी किया। पता चल गया सच कि वो वो घर से निकल कर के कहीं खेलने को चला गया था। इसलिए इसने होमवर्क नहीं किया। तो मुझे डांटने की बजाय बुला के बड़े प्रेम से बोला कि अरे भाई तुम ऐसा मत करो। तुम्हारा भविष्य का सोचो। माता-पिताजी वृद्ध हो जाएंगे। उनका मेडिकल ट्रीटमेंट का खर्चा तुमको निकालना पड़ेगा। तुम्हारे भाई बहन है छोटे उनकी मैरिज वगैरह की व्यवस्था कहां से तुम पैसे लाओगे? यदि तुम पढ़ाई लिखाई नहीं करो। इतना अच्छे से मुझे समझाया। तुम्हें बड़ा ही उनके ऊपर में बड़ा श्रद्धा भक्ति का भाव आ गया। अरे वाह ऐसे टीचर होने चाहिए। वरना होमवर्क नहीं किया। डांटेंगे, चिल्लाएंगे, मारेंगे। ऐसे टीचर का क्या लाभ है? मैं कभी सीखूंगा नहीं। किंतु मेरे खुद के जीवन में जब ऐसा कुछ होगा कि किसी ने मेरे साथ में बड़ा ही अपराध किया हो और मेरे मन में इससे बड़ा ही क्रोध उत्पन्न हुआ हो या तो फिर उससे मुझे बड़ा ही कष्ट हुआ हो। तो जब ये इमोशन नेगेटिव इमोशन बहुत बढ़ जाती है क्रोध है या तो फिर कष्ट है या तो भय है उसको ओवरकम करने के लिए सामने वाले को क्षमा देने के लिए मुझे जो क्षमा का आदर्श चाहिए वो इस तरह के दिन प्रतिदिन के क्षमा के आदर्श में से वह मुझे उस समय हेल्प नहीं करेगा जो एक्सट्रीम इमोशन में जब हम आते हैं उस समय एक्सट्रीम आदर्श जो लोग दिखा करके गए हैं। वही आदर्श मुझे एक अंधे कुएं में मैं जाकर के गिर रहा था। तो उस समय वही एक्सट्रीम आदर्श मेरा हाथ पकड़ कर के मुझे निकालेगा। इसीलिए देखिए कि यह जो बाइबल है या तो कथामृत है या तो गीता है या तो उपनिषद है या तो फिर यह ठाकुर मां स्वामी जी की जीवनी है इसका एंड्यूरिंग अपील है। यानी कि हमेशा के लिए वह हमारे हृदय को सांत्वना देती रहती है। हमेशा के लिए जब भी हम कोई बहुत बड़े कष्ट में हो या तो फिर हमारे जीवन में एक सतत एक स्ट्रेसफुल एटमॉस्फियर बना हो उस समय यही सब किताबें यही सब धार्मिक जीवन यही सब प्रेरणादायी प्रसंग हमारे हृदय को सांत्वना देते रहते हैं। हमारे मन को सध्यारा देते रहते हैं। तो इसी के लिए एक एक्सट्रीम आदर्श की पराकाष्ठा हमको यदि कोई प्रदर्शित करके जाता है तो वह अवतार होते हैं। इसीलिए यहां पे महाराज ने कहा है कि मातृत्व जैसे देव भावों की पराकाष्ठा मां ने दिखाई है। वो पराकाष्ठा यदि दिखाई है। ठाकुर ने एक बार कहा था कि यदि थोड़ा व्गर है। आमी यदि दाढ़ी मूत तोरा घुरिया घुरिया मुतवी नहीं इसका मुझे पता नहीं किस तरह से ट्रांसलेट करेंगे किंतु जो भी है यदि यह लोग आदर्श की पराकाष्ठा दिखाएंगे तो हम उसका थोड़ा बहुत आदर्श का पालन करेंगे उसमें से यदि 100% आदर्श दिखाएंगे तो हम लोग 10% या 1% पालन करेंगे एवं धर्म मार्ग परिपुष्टि जन उहारा केमन कोरिया नवो भावे रूपाित होया छे ता परिचय पबो धर्म मार्ग की परिपुष्टि के लिए वे लोग किस तरह से नव भाव में रूपाित हुए हैं। इसका भी हम परिचय प्राप्त करेंगे। धर्म भाव की पुष्टि जैसे कि ब्रिटिश राज्य में ये 1880, 180, 1817, 1880, 1890 ये जो पूरा समय था। हमारे युवाओं के मन में एक प्रकार की ग्लानि एक प्रकार की हताशा प्रकट हो गई थी कि ये यदि ब्रिटिश लोग हमको इस तुच्छ बना के हमको रखते हैं। ये मुट्ठी भर गोरे लोग इतने बड़े भारत देश के ऊपर में शासन करते हैं। इसका अर्थ यही है कि भारत की संस्कृति है। भारत का साहित्य है। भारत की आध्यात्मिकता है। भारत का यह जो देश है धर्मभूमि है। इसके भीतर में कुछ भी सार नहीं है। ये असार है। बोलकर के ही तो गुलाम की तरह ब्रिटिश लोगों के सामने हम लोग गिरे हैं। तो ये भाव जो है हमारा पुरखों का भाव हमारी संस्कृति यह संपूर्ण रूप से नष्ट होने को बैठी थी। यदि किसी को आप गुलाम बनाते हैं तो उनकी संस्कृति पे सबसे ज्यादा पहले आप आघात कीजिए। वरना तो क्या होगा कि देखिए यही ब्रिटिश लोगों ने अमेरिका पे शासन किया। यही ब्रिटिश लोगों ने आयरलैंड और स्कॉटलैंड के ऊपर में शासन किया। किंतु वहां के लोगों को एकदम क्लियर था कि हमारा वे लोग तो वैसे गोरे लोग ही थे। तो उन लोगों का नेचुरल एक कॉन्फिडेंस लेवल बड़ा हाई था। किंतु फिर भी खास करके ये वेल्स स्कॉटलैंड आयरलैंड इन लोगों की जो कल्चर जो है वो सेल्टिक कल्चर वो थोड़ा सा इन लोगों से मेन मेनलैंड ब्रिटेन जो है उससे थोड़ा सा डिफर करता है वहां पे वो वो जो क्रिश्चियनिटी वहां पे थोड़ा सा देरी से आया था कंपेयर टू मेनलैंड ब्रिटेन तो क्या है कि वो डरविश जिसको कहते हैं वो डरविश वो पूरा वहां का एक लोकल रिलीजन है उसका इन्फ्लुएंस बहुत लंबे समय तक रहा था। तो उन लोगों ने कभी कल्चरली अपने को हीन नहीं समझा कि हां हम लोग ब्रिटिश लोगों से कल्चरली हीन है। तो बोलकर के वो जो कॉन्फिडेंस था तो उन लोगों ने ब्रिटिश साम्राज्य के सामने या तो ब्रिटिश किंगडम के सामने बार-बार युद्ध किया और युद्ध में विजेता भी हुए। हम लोगों के साथ में जो प्रॉब्लम है कि हम लोग कल्चरली एक हताश हो गए। हम लोगों ने अपनी संस्कृति को इस तरह से मान लिया कि हमारी संस्कृति ब्रिटिश लोगों की संस्कृति से हीन है। तो ये कल्चरल इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स जिस समय हमारे मन में प्रवेश हो गया तभी से हमारी रियल डिफीट स्टार्ट हुई। यदि बाल गंगाधर तिलक ने एक बहुत सुंदर बात कही थी। यदि सभी भारतीय एक साथ में मिलकर के थूकेंगे भी तो इतना बड़ा सैलाब आएगा कि सभी ब्रिटिशर वो अरेबियन सी में बह जाएंगे। किंतु एक साथ में मिलकर के वो कार्य करने की हमारी क्षमता संपूर्ण रूप से ह्रास हो गई थी। जैसे ही जैसे कि इंडियन वॉर ऑफ फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस जिसको कि म्यूटिनी कहते हैं। क्या हुआ कि एक बार पता चला कि ब्रिटिश लोगों ने इस तरह की वो बुलेट तैयार की है जिसमें कि गो मांस और शुकर मांस ये दोनों का प्रयोग किया है। उसकी बुलेट की ऊपर में जो केप होती है उसके भीतर में और वो केप आपको दांत से निकाल करके फेंकनी होती है। यानी कि हिंदू होगा तो उसके मुंह में गौ मांस जाएगा। अह गाय माता का मांस और जो मुसलमान होगा उसके मुंह में शुक्र का मांस जाएगा। तो यह तो बड़ा ही हिंदू मुसलमान इकट्ठा हो गए और उन्होंने पहला ही जो विद्रोह कर दिया उसमें वो ब्रिटिश लोग इतने डर गए कि हमेशा के लिए उन्होंने ठीक किया कि ये दोनों लोग और साथ में यह ब्राह्मी और ये नीच जिनको जाति कहते हैं। इन तीनों को कभी इकट्ठा नहीं होने देना है। यदि इकट्ठा हो गए हमारा यहां पर रहना मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद में इन लोगों ने जो डिवाइड एंड रूल की जो नीति जो स्टार्ट की हम लोग आपस में ही लड़ के मर गए और ब्रिटिश लोगों को हम जैसे एक बंदर और तीन बिल्लियां म आपस में जाकर के लड़ते हैं और बंदर के पास जाकर के बोलते हैं अभी न्याय कीजिए हम में रोटी बांटिए तो वो थोड़ी ना पूरी रोटी हमको देने वाले हैं। आधे से ज्यादा रोटी अपने से खा गए और बाकी का जो बचा वो वो बांट दिया। तो यह हमको ककर कोई भी हमको डिवाइड कब कर पाएगा? हमको डिवाइड तभी कर पाएगा जबकि हम कल्चरली अपने को इनफीरियर महसूस करते हैं। दिस कल्चरल इनफीरियरिटी को हमको सबसे ज्यादा फाइट करना है। ये ये पॉइंट जो है ना गंभीरानंद जी ने मां के जीवन में इतना नहीं डिस्कस किया है जितना कि उन्होंने युगनायक स्वामी विवेकानंद जो स्वामी जी की बायोग्राफी है उसमें उन्होंने ये डिस्कस किया है कि किस तरह से कल्चरल इनफिरियरिटी का भाव हमारे युवानों में प्रवेश कर गया था कि हमने ब्रिटिश लोगों के पास से उनके जितने भी कुर रिवाज है उनके जितने भी वो बदतर आचार है व्यवहार वो सब अपनाना शुरू कर दिया था। मांस खाएंगे, मदिरा पिएंगे, स्त्रियों के साथ में दुर्व्यवहार करेंगे। अपनी संस्कृति को दिन रात गाली देते रहेंगे। यहां तक कि स्वामी जी ने एक बार गीता की प्रशंसा कर दी। तो ठाकुर ने कहा किसी यूरोपियन पंडित ने गीता की प्रशंसा की है इसलिए नरन आज ऐसा बोल रहा है। तो म नरन जैसा नरन भी ठाकुर को पता था कि क्या इनकी नस क्या है? इनकी नाड़ी कहां पे है। ठाकुर को पता था। तो ये लड़के लोग किस तरह से विदेशी संस्कृति के प्रभाव में आ करके हमारी संस्कृति को हमारे पुरखों को हीन समझना शुरू कर दिया था। इसके सामने लड़ना है। यह मेंटल वॉर है। दिस इज अ कल्चरल वॉर। यह किसी को मारपीट करके भगा देना वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। एक बहुत सुंदर उदाहरण है। यदि वीरता का ही उदाहरण देखना है तो ब्रिटिश लोगों ने अफगानिस्तान पे अटैक किया। अभी ऐसा था कि अफगानिस्तान के लोग एक किले में उन्होंने अपने को सेफ करके रख लिया। यह किला कहां पर था कि एक सीधा एक पहाड़ है। सीधा पहाड़। एक ओर से सीधा पहाड़ है और दूसरी ओर से इस तरह से ढाल है। दूसरी ओर से रिक्लिनेशन है। तो किला जो था वह सीधा जो वहां पर खत्म होता है वहां पे खड़ा था और पीछे से तो सीधा कितने हजारों फुट नीचे वो जाएगा और सामने से जो है वो ढाल है। किसी भी सेना को इस किले पे आक्रमण करना होगा तो सामने से आना पड़ेगा। क्योंकि आने का रास्ता तो वही है। तो ये अफगानिस्तान के लोग जो किले में अपने को सेफ करके बंद करके रखे हैं। उन्होंने अपना पूरा डिफेंस जो है सामने की ओर रखा है। और किला इतना मजबूत था कि सामने से जो भी अटैक होगा कितने सैकड़ों सोल्जर भी अटैक करेंगे ना तो किले में बंद कुछ 10-15 लोग अपने को डिफेंड कर पाएंगे। जिसको कि मिलिट्री की लैंग्वेज में कुल्डी साक कहते हैं। अर्थात कि एक छोटी सी जगह जहां पे आपका नंबर का स्ट्रेंथ कोई काम नहीं करता। छोटी सी जगह में कम ही सोल्जर आएंगे। तो आपके 10 है सामने वाले के 10 हैं। तो सामने वाले के हजार भी क्यों ना हो। आपके पास में सिर्फ 10 सोल्जर भी क्यों ना हो। इतनी छोटी सी जगह में 10-10 लोग ही फाइट कर पाएंगे। तो इस छोटी सी जगह का इस तरह की नैरो जगह का बड़ा फायदा रहता है। मिलिटरीली इसको प्राइम स्पॉट कहते हैं। तो इस तरह से उन्होंने बड़ा ही अच्छे से अपने को सेफ करके रखा था। ब्रिटिश लोग सामने से आएंगे। छोटी जगह है, ढाल है। यानी कि हम ऊपर से उनके ऊपर पत्थर फेंकेंगे, तीर फेंकेंगे। वो उनको नहीं जीतने देंगे। एकदम पक्का था कि इस तरह के किले को जीतना असंभव है। कोई जीत नहीं पाया है। ब्रिटिश लोग भी नहीं जीत पाएंगे। तो अभी वे लोग सब किले में सामने देख रहे हैं कि कब आ रहे हैं, कब आ रहे हैं। देखा कि सामने ब्रिटिश आर्मी तैयारी कर रहे हैं। सब कुछ कर रही है फाइट करने के लिए। एकदम रेडी है। कभी-कभी वो फायरिंग करते हैं। कभी-कभी मार्चिंग करते हैं, कभी ये करते हैं। कभी उनका सेनापति चिल्ला करके ऑर्डर देता है। किंतु अटैक नहीं हो रहा है। तो इन लोगों ने अफगानिस्तान वालों ने सोच लिया कि हां बस अभी हम लोग ये लोग इतना डर गए हैं कि पता है कि दिस इज़ अ कुलिसा। यहां पे वो नहीं आ जीत नहीं पाएंगे। वो हार करके पहले से ही चले जाएंगे। युद्ध करने की नौबत ही नहीं आएगी। बोल बड़ा मजे से बैठे हैं। उस समय क्या हुआ? जो ब्रिटिश जो कमांडर था उसने 101 सोल्जर्स को बोला कि पीछे से जाओ। पीछे से जाकर के सीधी जो चढ़ाई है वहां पर चढ़ो और पीछे में जो वीक स्पॉट है भीतर में घुसो और भीतर में से दरवाजा खोल दो। जैसे ही दरवाजा खुलेगा किले का हम लोग घुस जाएंगे भीतर में। तो जो किसी ने अफगानी लोगों ने कल्पना नहीं की होगी सीधी चढ़ाई है तो कुछ सोल्जर्स गए वो खाई जिसको वैली कहते हैं वैली में गए और चढ़ना शुरू किया और उसका वर्णन मैंने पढ़ा है भयानक माने पैर फिसला तो सीधे हजार फीट नीचे खत्म और नीचे देखा तो चक्कर आने लगेंगे इस तरह की चढ़ाई उन्होंने की किले तक पहुंचे पीछे में कोई पहरेदार नहीं था उन्होंने सोचा भी नहीं था अफगानी लोगों ने कि पीछे से कोई आ सकता है घुस गए किले और चोरी छुपी से दरवाजा खोल दिया। बस जैसे ही दरवाजा खोला ब्यूल लगाया और ब्रिटिश आर्मी घुस गई किले के भीतर में। देखिए कि ये बैटल फील्ड ब्रेवरी जिसको कहते हैं इसके उदाहरण विश्व के इतिहास में कम नहीं है। एक के बाद एक स्वामी जी का खुद का एक ऑब्जरवेशन है। स्वामी जी कहते हैं कि ब्रिटिश लोगों का कहना है कि जब युद्ध चालू होता है तब गोरे सैनिक ही लड़ते हैं। हम लोगों ने वैसे बहुत सारे हिंदुस्तानी सिपाही को रखा है। किंतु युद्ध का जो माहौल जब बनता है, चिल्लाचिल्ली होती है, मारकाट होती है, खूनामर की होती है। तब यह ब्रिटिश सोल्जर ही वहां पर टिक सकता है और यह हिंदुस्तानी सिपाही सब आंख बंद करके भागना शुरू कर देते हैं। तो स्वामी जी ने कहा जब वो जहाज में जा रहे थे तो देखा कि जब भी तूफान वगैरह कुछ आता है तो ये गोरे खलासी जो थे वे लोग शराब पी के मत्त हो जाते हैं क्योंकि डर लगता है। तो डर का उपाय क्या है? तो शराब पीना। वह बोलते स्वामी जी ने कहा है कि हमारे हिंदुस्तान के जो खलासी है वही बिना शराब पिए अपने को मन को सिर्फ विल पावर की मदद से स्ट्रांग करके तूफान का सामना करते हैं। तो ये ब्रेवरी जो है बैटल फील्ड ब्रेवरी वो सभी प्रजा में होती है। वो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। झांसी की रानी को देखिए महाराणा प्रताप को देखिए। भारत में इस तरह के उदाहरण की कोई कमी नहीं है। अर्जुन, भीम, भगवान कृष्ण स्वयं भगवान राम, महावीर स्वयं युद्ध के देवता भगवान शिव स्वयं अपने यहां पर विराजमान है। तो कोई बैटल फील्ड ब्रेवरी कौन सी बड़ी बात है? दुश्मन को मार देना। किंतु जब कल्चरल अटैक होता है, धर्म के ऊपर में आघात होता है, जब मन को कोई वश में कर लेता है, मोहित कर लेता है, हिप्नोटाइज कर लेता है, तब मन को छुड़ाना, यह हिप्नोटिज्म से अपने मन को छुड़ाना, यह इनफोरिटी कॉम्प्लेक्स में से देश को जगाना यह रियल वॉर है। और इस रियल वॉर में सही-सही जो मेंटल वॉर है उसमें विजयता हुए थे ठाकुर महा स्वामी जी। इसलिए यहां पर लिखते हैं धर्म मार्ग की परिपुष्टि के लिए उन लोगों ने नव भाव में रूपाित हुए थे। अब ये नव भाव में रूपाित होने का क्या अर्थ है वो हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु