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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन उसका हम पाठ कर रहे थे आज कुछ नैरेटिव पैसेज है पैराग्राफ तो इसको मैं हिंदी में ही पढ़ लेता हूं दो पैराग्राफ है जिसका नरेशन है तो हिंदी में पढ़ता हूं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं आविर्भाव चैप्टर का नाम है आविर्भाव जैसे हमने अवतरण का देखा और शक्तिपीठ देखा इसके बाद का चैप्टर है आविर्भाव अर्थात कि मां का पृथ्वी पर आगमन तो गंभीर गंभीरानंद जी लिखते हैं प्रथम पत्नी रामप्रिया के देह त्याग के पश्चात प्रसन्न मामा ने श्रीमती सुवासिनी देवी से विवाह किया अ मां के जो परिवार का जितना भी विवरण था कि उनके पिताजी रामचंद्र तो उनके भाई कौन-कौन थे फिर मां के भाई और फिर उनका किस तरह से यह सब जो महाराज जी विवरण कर रहे हैं तो इसी में यह आगे आता है प्रसन्न मामा अर्थात की मां के भाई प्रसन्न मामा ने श्रीमती सुवासिनी देवी से विवाह किया उनकी प्रथम पत्नी से दो कन्याएं नलिनी और सुशीला अर्थात की माकू हुई और द्वितीय पत्नी के गर्भ से कमला और विमला नामक दो कन्याएं श्री मां के रहते ही उत्पन्न हुई तथा गणपति नामक पुत्र श्री मां के देहांत के पश्चात हुआ काली मामा के दो पुत्र अभी देखिए मां तो मां का तो अभी जन्म का ही विवरण महाराज जी ने बताया है किंतु साथ-साथ में ही ये पूरा भविष्य में मां के जीवन के साथ-साथ में किसका किसका अच्छे से बहुत ही क्लोज इनका जीवन हमको देखने को मिलेगा तो इसका विवरण भी यहां पर कर दिया है जिन्होंने मां के जीवन के बारे में पढ़ा है मां की स्मृति कथाएं पढ़ी है सबको यह सब नाम पता है नलिनी माकू पागली मामी राधू यह प्रसन्न मामा काली मामा वर्धा मामा यह सब नाम हमको बहुत अच्छे से पता है तो इनका भी विवरण यहां पर दे दिया कि उनका एक संक्षिप्त परिचय मां के पृथ्वी पर आविर्भाव के साथ-साथ में ही इनका भी आविर्भाव का विवरण दे देने से हम लोग फिर क्या है कि अपने माइंड में सब रख सकते हैं कि किस तरह से किसका जीवन मां के जीवन के साथ में ओतप्रोत होता है तो इसलिए काली मामा के दो पुत्र भूदेव और राधा रमण हुए वरदा मामा के भी दो पुत्र हुए थे खुदीराम और विजय कृष्णा ख श्री मां के जीवन के साथ इन सभी का जीवन अनेक प्रकार से संबध था मामयो का भी जीवन वैसा ही था बड़ी मामी का नाम सुवासिनी था जो कि ऊपर बताया जा चुका है मंजुली मामी सुबोध बाला और संजली मामी इंदुमती थी छोटी मामी सूर बाला ही राधा रानी की जननी थी मस्तिष्क की विकृति के कारण यह पागली मामी नाम से परिचित थी प्रसन्न कुमार प्रायः कलकत्ता रहा करते और यजमान वृत्ति से खासी कमाई भी करते थे संभवतः बाल्यावस्था की गरीबी के कारण वे बहुत कृपण थे उन्होंने संचित धन से धान की अच्छी जमीन खरीदी और खेती के लिए बेल भी खरीदे और अपनी आर्थिक अवस्था की उन्नति कर ली थी काली कुमार क्रोधी स्वभाव के थे सुना जाता है कि उनके जन्म के पूर्व श्यामा सुंदरी की कई संतानों का देहांत बचपन में ही हो जाने से वे शोक से विक्षिप्त हो गई थी उसी समय किसी देवी भक्त उसी समय किसी देवी भक्त स्त्री के आशीर्वाद एवं औषधि से काली मामा का जन्म हुआ था इसी से उनका स्वभाव वैसा हुआ माने अभी जैसे स्वामी जी के बारे में है ना कि माने स्वामी जी की माने भुवनेश्वरी देवी ने उनकी माता जी को कहा था आप काशी में जा रहे हैं तो वीरेश्वर शिव को आप पूज उनको प्रार्थना कीजिएगा कि मुझे एक पुत्र संतान प्राप्त हो तो वीरेश्वर शिव की प्रार्थना से जो पुत्र संतान प्राप्त हुआ पूरे भूत जैसे उनके गुण थे हर जगह पर जाकर के वो तूफान मस्ती मचाया करते थे अपनी मां अपनी बड़ी बहनों के लिए सब समय कोई ना कोई ट्रबल खड़ी किया करते थे तो वैसे ही ये काली मामा का है वो काली मां की कोई स्त्री भक्त होगी तो उन्होंने कुछ इस तरह से कोई विधि दिखाई उन्होंने आशीर्वाद दिया और कोई औषधि दी उसकी परिणाम से काली मामा का जन्म हुआ तो मां काली के आशीर्वाद से या तो फिर मां काली के किसी भक्त के आशीर्वाद से जन्म हुआ बोलकर के काली के गुण थे क्रोधी थे काली मामा के क्रोध के बहुत सारे किस्से प्रसिद्ध है एक किस्सा है छोटा सा उस समय कोआलपाड़ा में मां की माने मां शायद कोलकाता जाने वाली थी तो ठीक किया था कि मां कोवाल पाड़ा जाएगी वहां से वो कोलकाता जाएगी तो ठीक करके रखा था सब कुछ पहले से ही क्वाल पाड़ के जो लड़के थे ये जो वर्धा मामा वगैरा वरदा महाराज वगैरा वो वहां पर जाकर के वो मां के साथ में बात करके ठीक कर लिए थे कि मां इस इस समय को इस दिन को को क्वाल पाड़ा आएगी पालखी में बैठ कर के तो पालखी में बैठने के लिए जो पालखी चाहिए तो वो पालखी ये वो क्वाल पाड़ा से जयराम बाटी ले जाएंगे सब लड़कों ने ठीक किया था दिन और समय दोनों ठीक हो चुका था कि वो पालकी लेकल के क्वाल पाड़ा से जयराम बाटी जाएंगे मां को लेकर के क्वाल पाड़ा वापस आएंगे उसी समय ऐसा हुआ कि जिस दिन जिस घड़ी को जाना था उस दिन इतना प्रचंड वो बारिश और तूफान और ये जो बीच में नदी थी उसमें पूर ये जो फ्लड आने लगा ये क्वाल पाड़ा के लड़के बेचारे थोड़े से असमंजस में पड़ गए कि इस तरह के तूफान में मां को लेकर आना पालकी में बिटा कर के यह तो कोई युक्ति संगत नहीं है यह तो बड़ा ही डेंजरस है रास्ते में कोई दुर्घटना हो गई तो यह एक भय है दूसरी ओर कि मां को वचन दे दिया है कि हां मां हम इस दिन इस समय को आएंगे तो अभी क्या किया जाए एक और है प्रश्न वचन पालन का मां को ही वचन दिया है मां के सामने ही हमने अपनी जुबान दी है कि हां मां हम आएंगे इस दिन इस समय और दूसरी ओर है कि मां का ही जीवन खतरे में पड़ जाएगा यदि इस तरह के तूफान में मां को वहां से लेकर आएंगे तो तो उन्होंने ठीक किया कि केदार बाबू जो बाद में केशवानंद जी वहां के जो मास्टर महाशय जिन्होंने ये ग्वालपाड़ा आश्रम की प्रतिष्ठा की थी तो केदार बाबू ने कहा कि तुम लोग एक काम करो एक बार जाकर के पालकी लेकर के चले जाओ जयराम बाटी बाद में जो होना है सो होगा फिर मां जैसा कहेगी वैसा करना तो ये लड़के इतना तूफान बारी पूर नदी में है फ्लड है यह सबको उसको सबको पार करके कितनी कठिनाई से पालकी लेकर के वहां पर पहुंचे जाकर के देखा तो मां और काली मामा दोनों अपने रांदे में ही खड़े थे और देख रहे थे कि जो बारिश हो रही है अब जैसे ही यह लड़कों को कोवाल पाड़ा से आते हुए देखा काली मामा बड़े ही क्रोधित हो गए और चिल्ला कर के बोल उठे अरे मूर्ख लोगों तुमको अकल नहीं है क्या कि इस तरह के बारिश और तूफान में तुम दीदी को ले जाओगे काली मामा की तो बड़ी बहन है मां तो दीदी करके पुकारते थे तुम लोगों में अकल नहीं है कि दीदी को इस तरह के बारिश और तूफान में ले जाओगे जिस तरह का वो केदार की भी मोटी बुद्धि मूर्ख जैसा वैसे ही तुम लोगों की भी मोटी बुद्धि ते तेतो बुद्धि वो तेतो जात माने जो सूत जो काटते हैं वो उनको तेतो कहते हैं तेत कहते हैं मैं एजेक्ट वर्ड में भूल गया ऐसा ही कोई शब्द है तो वो केदार की जिस तरह की इस तरह की बुद्धि ताती ताती हां तो केदार की इस तरह की जो बुद्धि है तुम लोगों की भी इस तरह की बुद्धि हो गई अभी ये आजकल इस तरह के से हम बात नहीं करते किसी का किसी की नात या किसी की जात को उल्लेख कर के किंतु उस समय इस तरह था थोड़ा सा कॉमन था तो उनकी उसकी ऐसी बुद्धि है तुम लोगों की भी ऐसी बुद्धि अकल नहीं है तुम लोगों में ऐसा काली मामा इतना क्रोध से बोल रहे हैं अभी यह लड़के लोग तो बेचारे क्या करेंगे उन्होंने कहा बड़े ही विनय पूर्वक मां के श्री चरणों में जाकर के प्रणा काम किया और कहा कि मां आपको वचन दिया था इसलिए हम आए हैं अभी आप जो कहेंगी वैसा हम करेंगे वचन का तो पालन करना है वचन में तो बारिश हुई तूफान हुआ तो क्या हुआ मां को वचन दिया है थोड़ी ना हम लोग इसको भूल जाएंगे तो इसलिए हम यहां पर आए हैं अभी आप जो कहेंगी वो हम करेंगे तो यह देख कर के मां हंसने लगी और मां ने कहा कि अरे अच्छा ठीक है तुम लोग जद वचन का पालन कर सकते हो तो क्या मैं नहीं कर सकती ठीक है चल चलो चलते हैं मैं आज तुम लोगों के साथ में आती हूं और बाकी जो सब लोग आने वाले थे मां के साथ में य नलिनी माकू राधू यह सब लोग तो मां के साथ में हमेशा यात्रा करते थे कलकत्ता जाने के लिए तो मां ने कहा कि जब बारिश थम जाएगी तब बेलगाड़ी में ये लोग बाद में चले आएंगे आज मैं आप लोगों के साथ में चलती हूं जैसा ही मां ने ऐसा कहा कि क्वाल पाड़ा के लड़के वो बेचारे हार मान लिए और उन्होंने फिर से प्रणाम करके कहा कि मां इस तरह के तूफान बारिश में आपको हम कहां ले जाएंगे ऐसा अच्छा रहेगा कि आप यहीं पे रुकिए आज और जब बारिश रुक जाएगी तब आप आइएगा तो यह देख कर के मां भी हंस रही है और काली मामा भी हंस रहा है तो देखिए कि काली मामा का एक छोटी घटना में किस तरह का एक हमको परिचय मिलता है कि ऐसा तो गुस्सा भी बहुत करते थे किंतु मां खुद बाद में मां ने कहा है कि जब कोई भी जरूरत पड़ जाएगी ना तो काली मामा ही आकर के खड़े रहेंगे मने बाकी के मां के जो प्रसन्न मामा वरदा मामा जो दूसरे जो भाई थे किंतु जब मां को जब जरूरत पड़ेगी मां की जो केयर करनी है वो तो उनकी बड़ी बहन है दीदी करके पुकारते थे तो वो जब समय के वो कष्ट के समय पे जरूरत के समय पर काली ही आ कर के खड़ा रहता है ऐसा मां ने कहा था तो वैसे क्रोधित स्वभाव भी है और मां के प्रति भक्ति भी है और वैसा कभी-कभी मुंह पर दिखाते भी है गुस्सा किंतु हृदय में उनका क्या है वोह तो अभी मां काली के आशीर्वाद से जब जन्म हुआ है तो वैसा तो नहीं होगा कि सिर्फ गुस्सा होगा प्रेम भी होगा किंतु क्या कि वो स्वभाव इस तरह का है कि प्रेम नहीं दिखता गुस्सा ही दिखता है काली मामा जयराम बाटी में ही रहा करते और नित्य प्रति निष्ठा पूर्वक ब्राह्मण उचित संध्या वंदना और पूजा अर्चना किया करते उनके छोटे से देवालय में शाल ग्राम और अन्य मूर्तियां स्थापित थी यजमान क्रिया में उनकी बहुत प्रसिद्धि हुई थी वरदा मामा ग्राम में रहकर परिवार का पालन पोषण करते थे कभी-कभी वे कलकाता भी जाया करते थे काली मामा के बहुत सारे प्रसंग है खास करके ये जो कोआलपाड़ा के जो लड़को थे लड़के थे तो उनके साथ में जो काली मामा का जो इंटरेक्शन था तो उन्होंने बहुत कुछ लिखा है वर्धा मा वरदा महाराज ने कि अच्छा ये जो मां का मां के भाई का नाम था वरदा और ये क्वाल पाड़ा के जो वरदा महाराज थे तो नाम दोनों के सेम है तो ये जो नलिनी माकू वो तो पता है ना कि अपने बड़ों को आप नाम देकर के उनका नाम देकर के पुकारना तो ठीक नहीं वही नाम से और किसी को भी पुकारना ठीक नहीं तो वो वरदा महाराज को गोपाल दा करके बुलाया करती थी गोपाल दादा इसलिए कभी-कभी हम वरदा नाम सुनते हैं तो मामा ना महाराज ऐसा कभी मिक्स हो जाता है तो वो वरदा मामा भी थे वरदा महाराज भी थे नलिनी और माकू वे जो लड़कियां थी मां के परिवार में वो उनको गोपाल दा करके पुकारती थी जैसे नाम में कंफ्लेक्स से बोल करके पुकार रहा वो समय की जो प्रथा थी की कि जो भी आपके वडील है जो कि आपके सीनियर है उनको इस तरह से नाम देकर नहीं पुकारते तो इसलिए वरदा मामा ग्राम में ही रहकर परिवार का पालन पोषण करते थे कभी-कभी वे कलकाता भी जाया करते थे एक बार वरदा महाराज ने कि किसी ने लिखा है मैं एगजैक्टली भूल गया राममय महाराज की वरदा महाराज ने कि वो कहीं प जा रहे थे तो काली मामा उनके साथ में वो बेलगाड़ी में जा रहे थे तो काली मामा भी साथ में थे तो काली मामा बोल रहे हैं कि कि वो बोल रहे हैं कि अरे देखो तुम लोग तो अभी इतने बच्चे हो तो इस इतनी छोटी उम्र में तुम लोग मां की सेवा कर रहे हो ये आपका कितना बड़ा सभागार नहीं हो वैसे मां जगदंबा है किंतु मां का यह स्वरूप पहचानना और उसके लिए और तुम लोगों के तो पिताजी को मैं पहचानता हूं देखता हूं कि उनके पास में खेत भी है धन भी है आप तो निर्धन नहीं है ऐसा नहीं है कि घर में कुछ खाने को नहीं है और मां के पास में आकर के खड़े रहते हैं तो एक संपन्न परिवार से आ हैं पढ़े लिखे हैं आपके पिता माता समाज में प्रतिष्ठित है उसके बाद में भी आप आकर के त्याग करके मां का मां की जो सेवा करते हैं दीदी की जो सेवा करते हैं तो उसके लिए आपको बड़ा ही आप धन्यता के पत्र है आप श्रद्धा और वंदन के पात्र है ऐसा करके काली महाराज बोल रहे है तो ये जो महाराजय स्मृति कथा लिख रहे हैं व वो वो साथ-साथ में लिख रहा है कि पता नहीं काली महाराज के मन में उस दिन किस तरह का एक ये एक विचार आ गया वरना जब भी काली महाराज को देखेंगे काली मामा को देखेंगे वो काली मामा सब समय कुछ ना कुछ कहीं ना कहीं से वो कोई ना छोटी ना छोटी बात प वो झगड़ा करेंगे ना कि गुस्सा करेंगे ना कि अभी जैसे एक बार हुआ था कि काली मामा ने ठीक किया कि कोई प्रसंग था अभी एकट कौन सा प्रसंग था भूल गया काली मामा ने ठीक किया कि वो प्रसंग करेंगे और प्रसंग के लिए जो कोई जगत धत्री पूजाई थी जगत धत्री पूजा तो काली मामा ने ठीक किया कि जगत धात्री पूजा के लिए जो जो कोई भी खरीदी करनी है वह मैं करूंगा तो अभी मां को थोड़ा सा टेंशन हो गया मां थोड़ी चिंता में पड़ गए तो वो ये लड़कों को बुला कर के बोलती है यह वर्धा महाराज वगैरह को कि देखो काली ठीक काली ने ठीक किया है कि मैं यह सब खरीदी करूंगा अभी जद मैं उसको मना कर दूंगी तो वह बड़ा ही नाराज हो जाएगा और यह सब प्रसंग वगैरह होता है तो वो तो उसमें इतनी मेहनत करता है किंतु साथ-साथ में ही जद वो उसके सर पर यह खरीदी का भार रहेगा बा बाजार करने का वो जिस तरह से बांगला में कहते हैं तो पता नहीं वह कितना खर्च कर बैठेगा तो इसके लिए तुम लोग ऐसा करो कि कोलकाता से जाकर के या तो फिर और कहीं जाकर के यह जो विष्णुपुर अगल बगल के जो गांव है वहां से जाकर के पहले से ही कुछ खरीद करके रख लो इसलिए मैं कह सकती हूं कि इतना तो ऑलरेडी खरीदी हो चुकी है वो बाजार हो चुका है शॉपिंग और बाकी का जितना बाकी है इतना तुम करो ऐसा करके तो काली मामा के बहुत सारे एस्पेक्ट है बहुत सारे उनके ये है अभी जितने तीन जो मां के भाई थे उसमें से मां के जीवन में सबसे ज्यादा जो हम विवरण पढ़ते हैं यह काली मामा का है और फिर जैसे ये तीनों मामा हों के जो संतान है उन सभी संतान का नाम यहां पर लिखा है हम लोग जो कि मां की जीवनी पढ़ते हैं मां की स्मृति कथाएं पढ़ते हैं हम लोग सबसे ज्यादा परिचित है ये नलिनी माकू फिर ये राधू से और मामी जितनी भी है अर्थात कि मामाउं की धर्मपत्नी उसमें सबसे ज्यादा परिचित है ये पागली मामी से तो यह मां का परिवार था इस परिवार में मां का जन्म हुआ था और इसी अभी जैसे देखिए कि मां ने ही कहा है ना कि यदि कुछ होता नहीं तो किसी माने ऐसा नहीं कहा कि भगवान का जन्म होगा भगवान शब्द गंभीरानंद जी ने ब्रैकेट में लिखा है किंतु मां कहती है कि तपस्या नहीं होने से क्या जन्म होता है जन्म अर्थात की भगवान का यदि माता और पिता की तपस्या ना हो तो उनके घर में भगवान का जन्म क्या होगा तो एक तर से जद हम देखें कि मां के जीवन के पिछले अध्याय जद हम पढ़ेंगे जब मां कलकत्ता आती थी भक्तों के साथ भक्त लोग मां को दर्शन करने के लिए आया करते थे जयराम बाटी वह सब अध्याय का जब विवरण हम पढ़ेंगे हमको लगेगा कि अरे मां के जीवन में मां इतनी देवी की तरह है इतनी पवित्र है इतनी व साधन भजन तपस्या मय जीवन है मां तो देवी का अंश स्वयं है देवी स्वयं है तो देवी के परिवार में इस तरह के विचित्र लोगों का विचित्र शब्द मैं यूज कर रहा हूं यहां पर क्योंकि उनका उनका देखेंगे सब प्रसंग एक के बाद एक तो ऐसे भाई ऐसी उनकी मामी इस तरह से मामा और उनके लड़के लड़कियां तो इस तरह से क्यों ऐसा हमको प्रश्न हो सकता है तो जैसे वह जैसे क्या होता है कि लीला पुष्टा जन् तो ना कि जटिला कुटिला केनो तो लीला पुष्टा जनो व बांगला में ठाकुर कहते हैं कि किसी भी जीवन में जटिला और कुटिला अर्थात कि जिनका नेचर जो थोड़ा सा हानि पहुंचाने वाला है तो इस तरह का जो जीवन चरित्र है तो वह क्यों अवतार की लीला में इनका विवरण क्यों है तो लीला पुष्टा यर जन इंग्लिश में कहते हैं टू थिकन द प्लॉट माने वो स्टोरी को और ज्यादा अच्छे से वो बनाने के लिए थोड़ा इंटरेस्ट आए स्टोरी पढ़ने में इसके लिए यह लोग साथ-साथ में आते हैं तो इनका भी जो जीवन आप देखेंगे मां के भाइयों का ये उनके लड़कियों का और फिर ये उनकी पत्नियों का ये तो यह सब होते हैं तो हम जब स्मृति कथा पढ़ते हैं तो हमको थोड़ा इंटरेस्ट आता है थोड़ा सा एक ह्यूमरस एस्पेक्ट उसमें ऐड होता है और मां के जितने भी ये एस्पेक्ट है वो एक के बाद एक जैसे देख लीजिए कि कोई भक्त जाकर के मां को प्रणाम करेगा कोई प्रार्थना करेगा उपदेश देने के लिए तभी तो मां उपदेश देगी जभी कोई भक्त नहीं है तो यदि भक्त के एक्सेंस में मां का उपदेश तो हमको सुनने को ही नहीं मिलेगा तो वैसे ही इस तरह के कोई मां को कष्ट देने वाला यदि सामने नहीं रहता तो मां के जो क्षमा धैर्य यह दिव्यता यह जो गुण है वह हमको देखने को नहीं मिलते इसलिए सभी तरह के लोगों से घिर कर के मां रहती है कोई मां को कष्ट देता है कोई मां की सेवा करता है कोई मां को श्रद्धा भक्ति करता है कोई मां को गुरु के समान पूछता है तो यह काली मामा मां को अपनी बड़ी बहन के रूप में देखते हैं और मां खुद कहती थी इन लोगों का स्वभाव कैसा है मेरे पास में से जो कुछ निकाल पाए जितना भी पैसा जितना भी कुछ बेनिफिट वो निकाल पाए मेरे से वो निकालने का इनका एक नेचर है ऐसा मां ने खुद कहा है तो एक तरह से एक स्वार्थ वृत्ति भी होती है कि हां मां के पास में बहुत सारे भक्त आते हैं और इन भक्तों के पास में धन और ऐश्वर्य विपुल मात्रा में है तो इन लोगों के पास में से हमको कुछ मिल जाए ऐसी एक वृति होती है जैसे कि हृदय ी हृदय की थी ठाकुर के पास में जो भक्त आते थे तो उसकी एक ऐसा था कि जैसे केशव चंद्र सेन है या तो फिर यह मथुर बाबू है मथुर बाबू के साथ में बैठ करर के हृदय एक बार प्लान करता था कि ठाकुर के नाम से कोई जमींदारी लिख दे तो अभी ठाकुर को तो जमींदारी से कोई लेना देना नहीं है तो जमींदारी का उपभोग तो वह हृदय ही करेगा वोह मैनेजमेंट वहां जाकर के वो एक लब्ध प्रति ष्ठ हो कर के रहना लोगों के ऊपर में अपना हुकम चलाना इससे गर्व वर्धन होता है ना घमंड बढ़ता है अहंकार बढ़ता है अहंकार की पुष्टि होती है तो यह सब तो हृदय ही करने वाला है ठाकुर तो वैसे ही वहां काली मंदिर में बैठे रहने वाले हैं तो हृदय व मथुर बाबू के साथ में ये सब प्लान कर रहा था मथुर बाबू कह रहे हैं हृदय को कि ठाकुर के नाम से इस तरह से जमींदारी लिख देंगे तो ठाकुर सुन मंदिर में से आ रहे थे वो उन्होंने सुना तो सुनक के इतने नाराज हो गए मथुर बाबू को मारने को दौड़े कि साला त यामा के संसारी को दते चा अर्थात की साले तुम मुझे क्या संसारी बना देना चाहते हो ठाकुर गाली भी देते थे मैंने अपने एंप्लॉयर है वो उन्होंने उनको नौकरी पर रखा है मथुर बाबू ने फिर भी मथुर बाबू को गाली देते हैं तो मतलब वो उतने हायर लेवल प उनकी कॉन्शसनेस थी कि जब आध्यात्मिक जीवन में अंतराय करने के लिए कोई सामने आ जाए तो फिर वह कोई देखेंगे नहीं कि इसके साथ में अच्छे से बात करो ना करो फिर एकदम रुद्र स्वरूप धारण करके खड़ गले करके उ उसका संहार ही करना है क्योंकि जद रुद्र स्वरूप धारण ना कर पाए ऐसा एक बार कथामृत में ना कहीं पर विवरण है ठाकुर वो टहल रहे हैं अपने कमरे ठाकुर का कमरा आपने दक्षिणेश्वर में देखा होगा तो जहां पर कुठी वाड़ी जो है नबत जो है उस साइड का जो वरांडा है बाहर की साइड का उस रांडे में ठाकुर टहल रहे थे और बीच-बीच में थोड़ा सा क्रोध करके बोल रहे थे तू या मर की कोरेने भी तू मेरा क्या बिगाड़ लेगी तुम मेरा क्या कर लोगी ऐसा करके तो मा महाशय सुनते हैं तो वो अपने अनुमान करके लिखते हैं कि क्या माया ठाकुर को प्रलोभन दिखा रही है और यह प्रलोभन को देख करर के ठाकुर क्रोधित होकर के माया का संहार करने के लिए उधत हो रहे हैं संहार करने के लिए तैयार हो रहे हैं क्या इस तरह से प्रश्न ये मास्टर महाशय करते हैं तो यह जो क्रोध है ये अवतार के जीवन में कभी हमको क्रोध दिखेगा तो हमको आश्चर्य लगेगा कि अरे ये तो सौम्य स्वभाव होकर के रहने वाले भगवान बुद्ध का जीवन देखो ना कि भगवान महावीर का य जैन महावीर है उनको देखो यह तो कैसे सौम्य होकर के ध्यान मग्न होकर के बैठते हैं तो यह अवतार किस तरह के कि बीच-बीच में क्रोध करते हैं बीच-बीच में गुस्सा करते हैं किंतु क्या है कि जब माया धर्म के पथ में अंतराय देखिए सांसारिक भोग सुख के पथ में अंतराय होने से हमको कोई सामान्य आदमी है जिनकी सांसारिक प्रव होती है उनको गुस्सा आता है यदि मुझे पैसा यहां पर मिलने वाला था मेरा प्रमोशन होने वाला था अब मैं जहां पर जॉब करता हूं मेरे कलीग ने आकर के मेरा प्रमोशन छीन लिया और उसने अपना खुद का प्रमोशन करवा लिया अभी मेरा प्रमोशन हुआ नहीं मुझे इतना पैसा जो मेरा सैलरी बढ़ने वाला था मुझे जो एक्स्ट्रा बेनिफिट मिलने वाले थे वो मुझे मिले नहीं तो मुझे बड़ा ही गुस्सा आ गया कि अरे मेरे जो मेरा जो ये है प्रमोशन अपने कंपनी में उसमें ये वो अंतराय हुआ है अर्थात कि मेरे भोग सुख में उसने बाधा डाली है तो मुझे गुस्सा आ गया तो वो हम जो सांसारिक लोग हैं या तो जो जिनकी एक इंद्रिय परस्त वृत्ति है वे लोग इस तरह से सोचते हैं और जो साधक है जो संत है जो महापुरुष है उनको क्रोध कब आता है जब साधना के रास्ते में कोई अंतराय डाले साधना के रास्ते में आकर के कोई प्रलोभन उनको दे तब इस तरह से क्रोध होगा अभी ये विश्वामित्र के सामने वोह अप्सरा ने आकर के प्रलोभन देना शुरू किया तब यदि उन्होंने क्रोध किया होता तो वह अपना जो पतन है उससे शायद बच जाते किंतु उस समय यदि सौम्य दृष्टि रख कर के कि हां चलो सभी तो ईश्वर के संतान है इसके भीतर में भी वही आत्मन है जो कि मेरे भीतर में है इस तरह से यदि हम करने को जाएंगे तो फिर हम लोग बड़ी ही आसानी से प्रलोभन हमारे सर पर सवार हो जाएगा हमको वो हमारी दिशा जो है पूरी वो बदल देगा तो कहीं कहीं पर क्रोध करना पड़ेगा किंतु कहां पर जो साधक है वह वहां पर क्रोध करता है जो माया के रूप में साधना के मार्ग में वह प्रलोभन खड़ा करता है उसके सामने नहीं कि जो इंद्रियों के भोग या तो फिर इंद्रियों की संतुष्टि के मार्ग में जो विघ्न खड़ा करता है वहां पर यदि विघ्न खड़ा हुआ जैसे कि ठाकुर को त्रैलोक्य नाथ उस समय कालीवाड़ा बू का तो देहांत हो चुका था तो हृदय ने जाकर के त्रैलोक्य नाथ बाबू अर्थात कि मथुर बाबू के पुत्र तो त्रैलोक्य बाबू की पुत्र पुत्री कन्या तो हृदय ने जाकर के उनकी कुमारी पूजा की कुमारी पूजा जिस तरह से होती है त्रैलोक्य बाबू की कन्या की कुमारी पूजा की हृदय ने यह बात जब त्रैलोक्य बाबू के कान में आई उनको जब पता चला तो बड़े ही क्रोधित हो गए उन्होंने सोचा अरे यह तो ब्राह्मण है और हम लोग तो कायस्थ जाति के है तो नीची जाति की होने की वजह से मेरी कन्या की मेरी पुत्री की जो पूजा की है एक ब्राह्मण ने उससे मेरी पुत्री का अहित होगा कि नहीं होगा ऐसा सोच कर के बड़े ही वो नाराज हो गए और हृदय को बोल दिया कि जाओ तुम कालीवाली छोड़ कर के चले जाओ चले जाओ तो हृदय तो हृदय को तो बेचारे को तो जाना पड़ा वो काली मंदिर छोड़ कर के उसी समय जो गड़बड़ चल रहा था किसी ने आकर के ठाकुर को बोला कि बाबू ने कहा है कि आप भी चले जाइए तो ठाकुर ने कहा ठीक है वो अपने कंधे पर गमछा डाला और सीधा निकल रहा है तो जा रहे है वो गेट के पास पहुंचे वो त्रैलोक्य बाबू दौड़ते दौड़ते आए कि अरे महाशय आपको तो हमने जाने के लिए नहीं कहा आप रुक जाइए आपको तो मैं नहीं जाने को बोला मैंने तो सिर्फ हृदय को बोला है तो ठाकुर ने कहा ठीक है तो वही स वापस आ गए अपने कमरे में तो उस समय उसके ऊपर क्रोध नहीं किया उस समय ऐसा नहीं कहा कि अरे इस काली मंदिर में बैठ कर के मैंने इतने सालों तक तपस्या की है तुम्हारे पिताजी जो मुझे इतनी श्रद्धा भक्ति किया करते थे वो रानी रामनी स्वयं जो मेरे पर इतनी श्रद्धावन थी और उनके संतान होकर के तुम मुझे काली मंदिर में से निकाल रहे हो तुम्हारी जुर्रत कैसे हुई तुम्हारा साहस कैसे हुआ ऐसा सब ठाकुर ने नहीं कहा उस समय कंधे पर गमछा डाल कर के सीधा वो निकल गए ऐसा कुछ ये लेना है वो लेना है ये बैक पैक करना है कुछ नहीं वो गमछा लिया बस निकल गए जहां भा मां ले जाए जहां मां काली ले जाए फिर और कुछ देखना नहीं है सुनना नहीं तो उस समय क्रोध नहीं किया किंतु वो जब टहल रहे थे और कोई आकर के माया आ कर के प्रलोभन दिखा रही है तब ठाकुर क्रोध करता है तो यह जो जनरली जो एक इंद्रिय परस्त जो इंद्रियों का गुलाम व्यक्ति है वह कब क्रोध करता है जबकि वह इंद्रियों के सुख भोग के रास्ते में कोई रुकावट डाले और साधक क को कब गुस्सा आता है जबकि वह साधना के मार्ग में कोई रुकावट या अंतराय स्वरूप हो तब तो ये एक है काली मामा का है कि काली मामा को बीच-बीच में गुस्सा आता था और उनका इस तरह का भी एक नेचर था कि हां मां के पास में से जितना भी कुछ रुपया मिल जाए मेरे संसार चलाने के लिए वगैरह तो बहुत अच्छा रहेगा और किंतु मां के प्रति श्रद्धा भक्ति भी काली मामा की इतनी ही थी तो काली मामा किस बात से क्रोधित होते थे वो सब मिक्स है कभी पैसों को लेकर के तो कभी मां के लिए मां की सेवा करने के लिए जैसे ये क्वाल पाड़ा के लड़के आ गए इतनी बारिश में मां को लेने के लिए कि चलो आपको वचन दिया है तो मैं आपको हम आपको ले जाते हैं तो उस समय काली मामा को गुस्सा आ गया कि अरे मां को इतना बारिश में तूफान में ले जाएंगे वो जीव का संशय भी हो सकता है जीवन के ऊपर में कोई दुर्घटना भी हो सकती है क्या होगा इतना रास्ते में तो माने कभी-कभी उस तरह से भी गुस्सा करते हैं तो कभी-कभी वो जो सांसारिक चीज उसको लेकर के भी माने यह जो मां के साथ में जितने भी आए थे मां ठाकुर के साथ में उन लोगों का ऐसा स्वभाव था कि अवतार के पार्षद है किंतु साथ-साथ में ही एक एक एक सांसारिक दृष्टि भी है दोनों लेकर के यह लोग आए हैं और यह दोनों इनके जीवन में देखते हैं फिर हम जब ठाकुर और मां को देखते हैं तो उनकी शुभ्र उनकी पवित्रता उनकी दिव्यता किस हद तक वो अधर वली है हम सामान्य लोगों से कितने ऊपर है वो कंट्रास्ट तब हमको दिखता है वरना यह लोग सभी साधु संतों से गिर कर के आए आए होते तो हमको लगता कि अरे वो भी जब ध्यान कर रहे हैं ये भी जब ध्यान कर रहे हैं मा भी पंच तपा कर रही है वो गुलाब मां भी कर रही है और गौरी मां भी कर रहे है तो क्या मां की ऐसी क्या विशिष्टता है मां की विशिष्टता वैसे हमको पता है किंतु वो जो एक लिटरेचर की दृष्टि से एक स्टोरी टेलिंग की दृष्टि से हमारे मन को एक सुकून देने की दृष्टि से एक जो मां का एक विशिष्ट व्यक्तित्व वो पूरा निखर के आता है कब जब हम ऐसे सब पात्रों से मां घिरी होती है और इनकी जितने भी वो जाकर के मां को बीच-बीच में परेशान करती है तो जब मां किस तरह से रिएक्ट करती है वह देख कर के पढ़ कर के सुन कर के हमको भी बड़ा आनंद आता है कभी-कभी और हमको लगता है कि चलो हम खुद इतने बुरे नहीं है हमारे जीवन में इतनी सारी वीकनेस है इतने सारे शॉर्टकमिंग्स है इतने सारे मैं खुद दूसरों को तो क्या बोलू मेरे खुद के जीवन में मैं देखता हूं कि मुझे जो करना चाहिए साधु के रूप में उसमें से मुश्किल से कुछ चीजें मैं कर पाता हूं तो मेरी ये जो शॉर्ट कमिंग्स है तो जब मैं यह देखता हूं कि यह लोग तो मां के साथ में रहे थे मां के संबंधित थे मां के रिलेटिव्स थे फिर भी उनके जीवन में इतने शॉर्ट कमिंग्स है तो फिर मैं मैं कोई इतना बुरा भी नहीं हूं धीरे-धीरे साधन भजन करते करते हम मां का दर्शन मां का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होंगे समय ऐसा अवश्य आएगा जैसे वो काली मामा को मां के आशीर्वाद मने मां बाद में हम पढ़ेंगे कि कैसे मां अपने भाइयों की केयर करती थी छोटे भाई की तो वो तो मतलब कितने धन्य हो गए कि मां खुद जगत जननी मां जगदंबा स्वयं बड़ी बहन होकर के उनकी दीदी होकर के वो बच्चे थे तब वो उनकी की केयर किया करती थी उनकी संभाल लिया करती थी तो मने कितने भाग्यवान होंगे हम हम लोग कोटि कोटि जन्म भी ले ले तो पता नहीं ऐसा कभी सौभाग्य आएगा कि नहीं कि जगत जननी मां शारदा स्वयं हमारी बड़ी बहन होकर के हमारी केयर करें हमको खाना खिलाए हमारे हाथ पैर धो दे हमको उठा कर के अपनी गोद में लेकर के जाए कहीं खेत में घूमने के लिए काम करने के लिए हमारा ऐसा सौभाग्य होगा कि नहीं किसको पता तो जब हम यह देखते हैं इतना सौभाग्यवाटी जो कमिया है वह इतनी खराब भी नहीं है धीरे-धीरे साधन भजन करते करते मां के आशीर्वाद हम अवश्य एक ना एक दिन प्राप्त होंगे ही होंगे तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु