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ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः आज महालया है और मां दुर्गा के आगमन का प्रारंभ जैसे की आज से हो गया है तो मां के बारे में यदि हम देखें तो हमारे पास में कुछ कुछ बड़ी ही सुंदर कहानियां है उसमें भी लाटू महाराज के बारे में हम सबको पता है ठाकुर के सन्यासी शिष्य और ठाकुर ही स्वयं लाटू महाराज को मां के पास में लेकर के गए थे मां जब उस समय नबत में रहती थी ठाकुर ने कहा था कि यह लड़का है यह इसको वोह आटा जद बनाना है रोटी बनाने के लिए आटा ठेस है तो यह लड़के को देकर के करवाना तो यह सब काम फिर लाटू महाराज मां का करते थे और फिर मां की उन्होंने बहुत सेवा की फिर ठाकुर की महासमाधि के बाद में किंतु हमने देखा कि लाटू महाराज बिल्कुल एक विरागी भाव में रहते थे व जिस तरह से शशि महाराज थे जिस तरह से शरद महाराज थे उन्होंने रामकृष्ण संघ की संघ की स्थापना में इतना उन्होंने जो कार्य किया कर्म किया लाटू महाराज बिल्कुल तपस्वी का जीवन जिए थे बाद में तो यह तपस्वी का जीवन और इस तरह से जीते थे कि जैसे कि लोगों को लगता है कि यह सही में उनका सर में कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गया है कभी-कभी इस तरह की विचित्र हरकतें भी किया करते थे किंतु हमको पता है कि जो ब्रह्मज्ञानी होता है जो परमहंस होता है उनकी ऐसी बालक वत अवस्था होती है कभी कभी जड़ वत अवस्था भी होती है तो कभी पिशाच वत अवस्था भी होती है तो यह सब अवस्थाओं में परमहंस अवस्थाओं में यह अपने लाटू महाराज रहते थे तो इस अवस्था में भी मां के साथ में उनका रिलेशन कैसा था उसके बारे में कुछ कुछ बड़ी सुंदर घटनाए एक बार किसी ने मां को पूछा मां उस समय वहां पर उद्बोधन में रह रही थी और लाटू महाराज रह रहे थे वहां पर बलराम भवन में तो किसी ने मान मां को पूछा कि मां लाटू महाराज तो यहीं पर रहते हैं पास में ही उद्बोधन से बलराम भवन की दूरी कितनी है जो लोग उद्बोधन बलराम भवन देखे होंगे उनको पता होगा बिल्कुल ही कम दूरी या आराम से पैदल जा सकते हैं आप तो लाटू महाराज इतना पास में ही रहते हैं फिर भी क्यों आपको मिलने के लिए नहीं आते तो जैसे ही जिस जिसने प्रश्न किया मां ने इसका कोई उत्तर दिया नहीं सिर्फ हंस कर के शांत हो गई क्यों क्योंकि लाटू महाराज और मां का संबंध ऐसा था क्योंकि सेम प्रश्न किसी ने लाटू महाराज को किया था कि मां तो यहीं पर रहती है पास में ही आप उनको मिलने के लिए क्यों नहीं जाते तब लाटू महाराज ने उत्तर दिया था मां तो चिन्मय है मां का दर्शन क्या सिर्फ इस देह से होगा क्या नहीं मां का दर्शन तो चिन्मय दृष्टि से भी मैं कर सकता हूं मैं मां का दर्शन तो अपने दिव्य दृष्टि से भी दिव्य नेत्रों से भी कर सकता हूं ऐसा बोलक के लाटू महाराज ने उत्तर दिया था न अदर हैंड ऐसा भी हुआ है कि लाटू महाराज मां को मिलने के लिए भी जाते हैं वहां पर एक बार लाटू महाराज रह रहे थे काशी में और काशी में यदि आपने देखा होगा किरण दत्त महाशय का घर है जहां पर भी मां जब काशी में जाती थी तो वहां पर रुकती थी तो लाटू महाराज रह रहे हैं आश्रम में और यह मां रह रही है आश्रम के सामने ही किरण दत्त महाशय के घर में किरण दत्त अपने बहुत बड़े डिवोटा थे खास करके मां के बड़े भक्त थे तो जभी एक दिन लाटू महाराज ने व सोचा कि चलो मंदिर का दर्शन करने के लिए जाते हैं वीरेश्वर शिव वगैरह काशीद में तो इतने सुंदर-सुंदर मंदिर है प्रख्यात सब मंदिर है तो मंदिर दर्शन के लिए बाहर तो निकले किंतु जैसे ही किरण दत्त महाशय की घर के ऊपर में उनकी दृष्टि आई उन्होंने कहा कि चलो पहले मां का दर्शन कर लेते हैं मां यहां पे सदे है रह रही है चिन्मई दुर्गा स्वयं तो मां का दर्शन करके जाते हैं तो लाटू महाराज गए मां के कमरे में वहां पर मां बैठी थी मां को प्रणाम किया फिर मां को कहा मां तुम यहां पर ही कुछ दिन रहो यहां पर ही रहो ऐसा तीन बार कहा यहां पर ही रहो यहां पर ही रहो यहां पर ही रहो ऐसा बोल कर के फिर लाटू महाराज वहां से निकल गए तो लाटू महाराज मां का दर्शन करते थे मने सदे है और न भी करते थे मां के प्रति उनकी श्रद्धा बड़ी ही प्रचंड थी और यदि कोई मां की अवहेलना करता मां को इग्नोर करता तो उनको बिल्कुल पसंद नहीं आता था एक बार ऐसा हुआ कि काशी में किसी भक्त ने सोचा कि मैं दुर्गा पूजा का आयोजन करता हूं और दुर्गा पूजा के आयोजन के लिए सब तैयारी कर दी और फिर निमंत्रण दिया राजा महाराज को तो अभी जैसे ही लाटू महाराज ने यह बात सुनी बड़े ही नाराज हो गए बोलने लगे अरे कि जीवंत दुर्गा मां स्वयं जद उपस्थित है पृथ्वी के ऊपर में तो मां को आमंत्रण नहीं करके राजा महाराज को क्यों आमंत्रण किया है अच्छा राजा महाराज को आमंत्रण करना है तो करो किंतु मां को तो अवश्य आमंत्रित करना चाहिए ऐसा उनको बड़ा ही दुख लगा बड़ा ही वह नाराज हो गए अभी हुआ ऐसा कालक्रम से कि राजा महाराज अर्थात कि स्वामी ब्रह्मानंद उस समय हमारे सर्वप्रथम प्रेसिडेंट रामकृष्ण संघ के और ठाकुर के मानस पुत्र तो राजा महाराज उस समय बीमार हो गए किसी कारण से और वो वहां दुर्गा पूजा में काशी में नहीं आ पाए तो जैसे ही लाटू महाराज ने सुना यह बात तो उन्होंने कहा देखो कि यही है कर्म का विभाग यह जो मैंने विधि का विधान कि मां को नहीं बुला कर के बाकी सबको आमंत्रण कर रहे हो इसलिए राजा महाराज का यहां पर आगमन नहीं हो पाया अभी कुछ दिनों के बाद में ऐसा हुआ कि वह जो महिला थी यह लेडी डिवोटा जिन्होंने यह सब आयोजन किया था वह आई लाटू महाराज का दर्शन करने के लिए साथ में थे खोका महाराज अभी लाटू महाराज को जैसे ही पता चला कि यह डिवटी आ रही है और इसने तो मां को आमंत्रण दिया नहीं था तो फिर उन्होंने क्या किया कि वो भी उनके साथ में बात नहीं करेंगे वो वो चादर अपने पूरे शरीर पर लगा कर के सो गए और अपना चेहरा भी ढक लिया अभी ये डिवटी आकर के बैठी है उनके सामने लाटू मारा सोए है पूरा शरीर चादर से वो ढक करके अपना चेहरा भी चादर से ढक करके तो इन्होंने सोचा कि शायद ये सोते-सोते जब कर रहे हैं या तो फिर यह सो ही गए हैं अभी क्या करेंगे तो काफी देर दो घंटे तक उनकी अपेक्षा की लाटू महाराज किंतु वो अपनी चादर में से बाहर नहीं आए ना ही वो उठकर बैठ कर के खड़े हुए तो फिर यह लोग फिर यह डिवोटा थी निराश होकर के वहां से चली गई तो फिर फिर लाटू महाराज ने कहा कि देखो इन लोगों को पैसों का बड़ा अहंकार हो गया है इसलिए यह लोग मां की अवगणना करना शुरू कर दिए हैं तो मां के प्रति लाटू महाराज का जो जो अद्भुत एक एक श्रद्धा थी मां के प्रति मां के प्रति लाटू महाराज की यह जो शरणागति का भाव था यह कुछ घटनाओं से हमको पता चलता है और फिर आज से हम अभी क्योंकि दुर्गा पूजा भी तो प्रारंभ हो रही है तो मां की यह जीवनी है जिसका हम पाठ करते थे इसका पाठ हम फिर से प्रारंभ करते हैं जब तक दुर्गा पूजा के दिन तक हम यह पाठ करते रहेंगे यानी कि यह जैसे कि यही घटना जैसे कि लाटू महाराज ने कहा ना कि यह लेडी डिवोटा जो थी उन्होंने मां को आमंत्रण नहीं दिया यही बात स्वामी जी ने स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका से लिखे हुए अपने एक पत्र में कही थी उस समय आठ पुर में बाबूराम महाराज की मां वो दुर्गा पूजा का आयोजन कर रही थी तो स्वामी जी ने अपने पत्र में क्या लिखा था कि जीवंत दुर्गा जंत दुर्गा बांगला में स्वामी जी लिखते हैं कि जंत दुर्गा के छेड़े माटर दुर्गा और प्रति पूजो करछ बूढ़ो बय बुद्धिर हानी यछ अर्थात कि बाबूराम महाराज की मां को वृद्धावस्था में उनकी बुद्धि जो है वो बुद्धि में कुछ गड़बड़ हो गई है क्योंकि जीवंत दुर्गा मां शारदा स्वयं विराजित है उनकी पूजा को छोड़ कर के मिट्टी की प्रतिमा बना कर के उसकी पूजा कर रही है तो यह जो जीवंत दुर्गा मां शारदा है उनके बारे में हम दुर्गा पूजा तक पाठ करेंगे तो हमने देखा अभी तक की घटना वली क्या हुई है किताब का नाम है श्री मां शारदा देवी उसके लेखक है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज और यह जो चैप्टर है आलो छाया है अर्थात कि प्रकाश और अंधेरे के बीच में और यह चैप्टर का नाम इस तरह से क्यों रखा है प्रकाश और अंधेरे के बीच में क्योंकि मां के जीवन में एक तरह जिस तरह से एक निर्मल शांति बहा करती थी श्री रामकृष्ण देव के सानिध्य में रह कर के और उनकी खुद की जो एक तप थी जब ध्यान साधन भजन का प्रवाह था एक बड़ा ही डिसिप्लिन लाइफ था उनका तो यह इस डिसिप्लिन साधक साधनाम जीवन और श्री रामकृष्ण देव का सानिध्य इन दोनों ने मिलाकर के मां शारदा ने स्वयं कहा था कि उन दिनों ऐसा लगता था कि हृदय में जैसे कि आनंद का पूर्ण घट किसी ने स्थापित कर दिया हो और यह एक तरह का अनंत आनंद जो कि कभी भी जिसमें विक्षेप नहीं होने वाला है यह आनंद जैसे कि मेरे हृदय में हमेशा बह रहा है तो यह अनुभूति मां शारदा को होती थी तो यह हो गया प्रकाश और अंधेरा क्या है एक तो है कि मां बार-बार बीमार हो जाती थी फिर जब कलकाता में बीमार होती तो फिर वह जयराम बाटी जाती जयराम बाटी में दरिद्र का दुख क्योंकि उनके पिताजी का देहांत के बाद में श्री मां शारदा देवी की माताजी जो थी थी श्यामा सुंदरी देवी उनको घर चलाने के लिए शारीरिक परिश्रम करना पड़ता था और श्यामा सुंदरी देवी ने अपने लड़कों को अपने सब जो संबंधी थे रिलेटिव्स थे उनके वहां पर भेज दिया था जिससे कि लड़कों को पौष्टिक खाना मिले और वह विद्या अभ्यास कर पाए क्योंकि वह खुद तो श्यामा सुंदरी देवी ना ही अपने लड़कों को ठीक से खिला पाएगी ना ही उनके विद्याभ्यासम तो यह श्यामा सुंदरी देवी का संसार था यहां पर आकर के मां शारदा को लगता था कि अरे मैं क्या अपनी मां के ऊपर में एक भार स्वरूप यहां पर बन रही हूं क्या और एक मुझे खिलाने के लिए मेरी मां को और ज्यादा कष्ट करना पड़ेगा तो फिर मां वहां से दक्षिणेश्वर आती तो दक्षिणेश्वर में वैसे तो दक्षिणेश्वर की हवा जो ये जो जिसको डैंप एयर कहते हैं ना ह्यूमिड एयर क्योंकि दक्षिणेश्वर काली मंदिर बिल्कुल गंगा के ऊपर में ही था गंगा के किनारे पर ही था और वह जो ह्यूमिड जगह की वजह से मां के मां को बार-बार बीमारी हो जाती थी डाइजन हो जाती थी तो वह तो एक तकलीफ दूसरा कि ठाकुर का पागलपन कभी-कभी एक बार जब मां आई तो हृदय ने अभी हृदय तो घमंड में आ गया था हृदय ने मां को बोलना शुरू कर दिया हृदय अर्थात कि ठाकुर का सेवक ठाकुर का भांजा ठाकुर उनके मामा होते थे तो हृदय ने अपने घमंड में आकर के मां को यह कहना शुरू कर दिया कि यहां पर क्यों आई हो किस लिए आई हो क्या करोगी यहां पे ऐसा सब कहा तो श्यामा सुंदरी देवी भी थी उस समय साथ में उन्होंने कहा कि मैं अपनी बेटी को कहां इनके पास में छोड़ के जाऊंगी मेरी बेटी की तो कोई रिस्पेक्ट भी यहां पे नहीं करता बोलकर के उनको लेकर के जयराम बाटी चली गई थी इसके बाद में फिर एक बार मां आई तो ऐसा हुआ था कि ठाकुर गिर गए थे और उनके हाथ में फ्रैक्चर हो गया था तो जैसे ही अभी देखिए कि हमको पता है कि वह जर्नी कितनी कठिन जर्नी थी जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर आने की पैदल बहुत चलना पड़ता था फिर बीच में व जो विशाल एक मैदान आता था जिसमें डाकू लोगों का डर रहता था और फिर चलते-चलते हमने हमको पता है कि मां को पहली बार जब मां आई थी मां को बुखार हो गया था और बुखार होने की वजह से वहीं रास्ते में ही कितना कष्ट सहन करना पड़ा था तो ये दो-तीन दिन की जर्नी इतना लंबा कष्ट करके चलके आना तो मां इस तरह से आई है और आकर के ही ठाकुर क्या पूछते हैं सबसे पहले कि तुम कौन से समय वहां से रवाना हुई हो जैसे ही ठाकुर को पता चला कि मां बृहस्पतिवार की बार बेला को रवाना हुई है एक अशुभ मुहूर्त को वैसे ही ठाकुर ने कहा कि देखो तुम उस अशुभ मुहूर्त में जयराम बाटी से यात्रा की थी इसीलिए मैं गिर गया और मेरे हाथ में फ्रैक्चर हो गया जाओ तुम जयराम बाटी वापस चली जाओ और यात्रा बदल करके आना कामर पुकुर से यात्रा बदल करके के आना तो जैसे ही ठाकुर ने कहा तो मां बेचारी क्या करेगी तो वह मां ने कहा ठीक है मैं अभी जाती हूं तो ठाकुर ने कहा कि नहीं कल जाना तो दूसरे दिन मां को यात्रा बदलने के लिए फिर से वापस जाना पड़ा था तो देखिए कि एक और है यह शारीरिक कष्ट दूसरा है कि अभी हम चाहे मां का पक्ष लेकर के ठाकुर को कितनी भी कंप्लेन करें ठाकुर के सामने हमारा कितना भी नाराजगी हम व्यक्त करें किंतु एक बात देखनी है कि ठाकुर और मा का जन्म ही हुआ है आदर्श के स्थापन के लिए यहां पर अपने व्यक्तिगत सुख भोग यह सब की कोई बात संपूर्ण रूप से हमको विस्मृत हो जानी है हमको सिर्फ एक बात याद रखनी है कि पूरा जीवन प्रत्येक क्षण प्रत्येक मुहूर्त हमने ईश्वर साधना को दिया है प्रत्येक मुहूर्त हमने आदर्श के स्थापन के लिए दिया है यहां पे एक क्षण भर के लिए भी अपने खुद के आनंद अपने खुद के विलास अपने खुद के सुख के लिए सोचना भर नहीं है अपने सुख को अपने आनंद को संपूर्ण रूप से ईश्वर के श्री चरणों में बलिदान स्वरूप दे देना है अपने अहंकार को बिल्कुल आपको विसर्जित कर देना है गंगा में यह जो दशेरा के दिन मां दुर्गा का विसर्जन हम करते हैं वैसे ही अपने अहंकार को मां गंगा के भीतर में हमेशा के लिए जलांस दे देनी है मां उसको विसर्जित कर देना है तो यह उनका जीवन था तो एक और आध्यात्मिक साधना और आध्यात्मिक आनंद का सतत प्रवाह मां के हृदय में बह रहा है दूसरी ओर आदर्श की स्थापना करने के लिए जितना भी कष्ट करना पड़े वह सब इनके लिए स्वीकार्य था इसलिए महाराज जी ने इस चैप्टर का नाम दिया है आलो छायाय प्रकाश और अंधेरे के बीच में मां का यह जीवन चल रहा है कभी प्रकाश कभी अंधेरा कभी यह हृदय का आध्यात्मिक आनंद जैसे कि पूरा जो आनंद रूपी घट है आनंद से छल भल हो रहा है तो कभी इस तरह से शारीरिक व्याधि तो कभी ठाकुर का इस तरह से वरता जो कि आदर्श स्थापना के लिए करना पड़ता है तो अभी मैं थोड़ा सा आगे पढ़ता हूं अभी मां का बीच में दक्षिणेश्वर आगमन और विदाय यह सब प्रसंग चल रहा है तो इसी प्रसंग में गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि पूर्वे उल्लेख तो को एक बार छड़ा अन्न समयो श्री मायल दक्षिणेश्वर जाता जात थया चलो बोलिया मोने होय केनो ना साधन कालेर अबोसान होई ते 1287 साल पर जंतो प्राय प्रति बक्षर श्री श्री ठाकुर चातुर्मास समय जखन देश जायते तखन श्री माओ संभव तो संगे थाकी देन अभी यह जो कुछ-कुछ घटनाओं का उल्लेख किया गंभीरानंद जी महाराज ने कि मां ने इस समय दक्षिणेश्वर में आगमन किया था और इस समय दक्षिणेश्वर से प्रस्थान किया था और उस समय की घटनाओं के बारे में भी हमको बताया अभी गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं कि इन घटनाओं को छोड़ कर के भी और कई बार मां का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ है ऐसा हम अनुमान कर सकते हैं क्योंकि ठाकुर का शरीर अब जैसे मां का शरीर बार-बार बिगड़ रहा था वह ह्यूमिड एटमॉस्फियर में तो ठाकुर को भी वही बीमारी थी और वैधराज कविराज अर्थात कि उस समय के डॉक्टर इन्होंने ठाकुर को सलाह दी थी कि आप जब यह चतुर्मास अर्थात कि बारिश का समय है बारिश के समय में अपने देश चले जाइए कामर पुकुर चले जाइए तो ठाकुर जितनी भी बार कामर पुकुर जा आते थे और कामर पुकुर से आते भी थे तो मां उनके साथ में रहती थी तो इसलिए महाराज कहते हैं गंभीरानंद जी कि हां वह मां भी कई बार इस तरह से दक्षिणेश्वर आई होगी अभी यहां पर 1287 साल तक की बात लिखी है अर्थात कि इंग्लिश अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार ऑलमोस्ट 18818 1 का यह समय होगा जब तक कि ठाकुर प्रति वसर प्रत्येक साल कामर पुकुर गमन करते थे किंतु 18818 5 के अंत में ठाकुर को कैंसर होता है और फिर 18864 वसत ठाकुरे स्वास्थ भंग होए सतन पल्ली ग्रामर मुक्त बाता और स्वच्छंद आहार बिहार देहर उन्नति होई बे बोलिया चिकित्सक गण तहा के ओई समय देश जाते परामर्श दतन साधन काल के समय में ठाकुर का रहना खाना सोना सब कुछ अनियमित हो गया था तो इस अनियमितता की वजह ठाकुर का स्वास्थ्य बड़ा ही भग्न अवस्था में था बड़ी ही दुरा अवस्था में था और और इसीलिए डॉक्टर लोगों ने चिकित्सक लोगों ने ठाकुर को कहा था कि बारिश के समय अपने गांव में जाकर के रहिएगा घटाल पर्जन तो स्टीमर चला चल आरंभ होले तीनी श्री मां और हृदय के लैया एक बार ई पथे देश गिया छिले बोलिया जाना जाए घटाल बोलकर के एक जगह है वहां तक स्टीमर आती जाती थी दक्षिणेश्वर से तो ठाकुर भी मां और हृदय को लेकर के स्टीमर में घटाल तक गए थे और घटाल से कामर कुकुर गए थे ऐसा हमको जानने को मिलता है घाटा लेर स्टी मरे जाया तहरा संभव तो बंदर नामक स्थाने अवतरण अंते नौका जोगे कामर पुकुरे प्राय चारी क्रोस दक्षिणे अस्थि तो बाली देवान गंजे उपस्थित होय घटाल तक ठाकुर गए स्टीमर में फिर वहां से बंदर नाम की एक जगह पर उन्होंने वहां पर उतरे और नौका के माध्यम से कामर पुकुर के ऑलमोस्ट चार क्रोष दूर आए हुए बाली दीवानगंज में उपस्थित हुए थे शेखा ने अनेक गोस्वामी र बाश छलो यह बाली दीवानगंज जगह थी वहां पर बहुत सारे गोस्वामी रहा करते थे गोस्वामी अर्थात की वैष्णव साधक जो कि चैतन्य देव की बताई हुई निदर्शना पद्धति के अनुसार साधना करते हैं तो यह बहुत सारे गोस्वामी थे भगवान महा गौरांग महाप्रभु के भी भक्त थे ग्रामर जनक मोदक इच्छा छलो ज तहर नव निर्मित गृहे कोनो साधु के त्रि रात्र राखी बेन ठाकुर और श्री मायर तथा आगमन पर एमन अभिराम वृष्टि पा तो आरंभ होलो ज ताहा दिग के बाध होया मोदक भवन तीन रात्रि काटा ईते होई लो वहां पर उस बाली दीवानगंज में एक मोदक अर्थात कि लड्डू बनाने वाला मिठाई बनाने वाला रहा करता था तो उसने सोचा कि मेरा एक नया घर बना है ठाकुर इस घर में तीन दिन रुकते हैं तो मेरा घर पवित्र हो जाएगा तो ठाकुर उसके घ घर में रहने को तो आए किंतु उसके हो सकता है कि ठाकुर शायद तीन दिन ना रुके किंतु जैसे ही ठाकुर उस घर में पद अर्पण किए उसके बाद से ही ऐसी बारिश प्रारंभ हुई ऐसा ऐसे कि जैसे कि ठाकुर को घर से बाहर निकलना ही मुश्किल हो गया और उनको उस घर में तीन रात निवास करना पड़ा तो ऐसा करके देखिए कि वह व्यक्ति होगा ये मोदक जिसका यह घर जिसमें ठाकुर खुद स्वयं तीन दिन रुके थे वह कितना भाग्यशाली होगा कि इस तरह के घर में हम लोग कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे घर में भगवान राम कृष्ण आए देखिए कलकाता में देखिए कलकाता में इतने सब ठाकुर के इतने भक्त थे बलराम बसु थे सब कितने भक्त के घर गिरीश घोष है फिर यह अधर सेन है यह ब्राह्मण समाज का यह केशव सेन है कितने लोगों के घर ठाकुर जाया करते थे किंतु ऐसी बात कहीं पर नहीं है कि ठाकुर तीन दिन कहीं पर रुके हो एक शायद बलराम भवन में ठाकुर रथ यात्रा के दिन रात को रुके होंगे ऐसा मुझे लग रहा है कंफर्म नहीं बता पाऊंगा थोड़ा सा रेफर करना पड़ेगा किंतु ऐसी एक दो घटना एकाद रात की छोड़ दे तो कहीं पर भी ठाकुर तीन दिन रुके हो इस तरह से हमको पता नहीं चल रहा है वह सीधा वो फिर काशीपुर गए थे ट्रीटमेंट के लिए वहां पर उनका रुकना हुआ वही हुआ अदर वाइज देखिए मां के घर के भी ठाकुर इसी तरह से हमने पहले देखा था कि दक्षिणेश्वर गांव में मां के लिए शंभू मल्लिक ने घर बनाया था इस इसलिए कि वह गंगा किनारे इस तरह की आबोहवा है तो वहां रहकर मां को तकलीफ होगी थोड़ा सा गंगा से दूर वो गांव में यदि रहे तो अच्छा है ऐसा बोल कर के दूसरा कि काली मंदिर में क्या है मां अपने नबत के बाहर नहीं निकल पाती थी सब समय नबत में रहना पड़ता था संकुचित होकर के तो गांव में जद रहेगी तो गांव में घर के बाहर निकल कर के पड़ोसियों के वहां वह जा भी पाएगी मन भी थोड़ा सा प्रसन्न होगा बोलकर के मां का घर वहां पर बनाया था ठाकुर इसी तरह एक दिन मां के के घर में आए थे वार्तालाप करने के लिए और ऐसा बारिश प्रारंभ हुआ ऐसी वृष्टि प्रारंभ हुई कि ठाकुर को कंपलसरी उस दिन रात को मां के घर में रुकना पड़ा और ठाकुर मजाक करके कहते भी है कि जिस तरह से कालीवाड़ा मण है अपने घर जाते हैं रात को वैसे मैं भी अपने घर अपनी बीवी के घर पत्नी के घर रात को आया हूं रुकने के लिए तो ठाकुर ऐसा मजाक भी किए थे किंतु वो सिर्फ एक रात के लिए तीन रात कहीं पे रुके हो ठाकुर इस तरह का बहुत ज्यादा जानने को नहीं आ रहा है तो यह मोदक भवन वो कितना पवित्र हो गया होगा ठाकुर को वहां पर तीन रात्रि वास करना पड़ा था चतुर्थ दिने तरा कामर पुकुर ना जाया सिहोड़े गलन चौथे दिन जब बारिश थम गई तब इन लोग ने ठाकुर ने कामर पुकुर नहीं जाकर के ठाकुर गए थे शि होड़ ई बारे ठाकुर सिहोड़े व श्याम बाजारे अपूर्व शक ने जोग दिया शकोल के हरिना में माता या लेन इसी समय ठाकुर शि होड़ और श्याम बाजार में अपूर्व संकीर्तन में उन्होंने योग दिया था और सबको आध्यात्मिक आनंद में परिपूर्ण कर दिया था ठाकुर जयराम बाटी ते बहु बार गया लेन ठाकुर जयराम बाटी भी बहुत बार गए थे कामर पुपर जाते ही तहा के सिहोड़े लेवा लिया जावा जातो जब भी ठाकुर कामर पुकुर जाते तो कामर पुकुर से ही उनको शि होड़ में ले जाते उनके जो रिलेटिव्स होते थे वो वही समय पथे जयराम बाटी ते कोनो कोनो बारे तिनी आठ 10 दिनो थाकि जाते उस समय जयराम बाटी में वह जाते और कभी कभी 810 दिन भी रुक जाते देखिए जयराम बाटी भी ठाकुर 81 दिन लगातार रुके हैं वो भी मतलब मां के आगमन से तो पवित्र हो ही गया है ठाकुर का भी आगमन वहां पर इतनी बार हुआ है एक बार ससुराल अवस्न काले रात्रे जखन सकले आहारा अंते शयन कररिया छन तखन ठाकुर अकस्मात बोलिया उठी लेन उठिया बोली लेन बड़ो खुदा पे छ एक दिन जयराम बाटी में थे अच्छा जयराम बाटी अर्थात की मां का घर और कामर पुकुर अर्थात की ठाकुर का घर और जयराम बाटी ठाकुर के लिए हुआ स्वसरा य अपने ससुर का घर तो जयराम बाटी में जैसे जब जमाई आएंगे जा माता जाएंगे तो उनकी तो कितनी मलब ये श्यामा सुंदरी देवी उनको तो कितना यत्न पूर्वक वहां पर रखेगी तो एक दिन अभी जयराम बाटी में ठाकुर रात को सोए हुए थे एकाएक रात को उठ गए बोले कि मुझे भूख लगी है मुझे खाना चाहिए तो अभी बाड़ी स्त्री लोकेरा भाभिया आकुल की खाते दबन कारण से दिन वासरी को श्रद्ध बा रूप कोनो क्रियाकलाप उपलक्ष गृहे बहु लोक समागम होवा खाद्य द नि शेषी तो होईया छीलो अभी जैसे ही आधी रात को उठकर के ठाकुर ने कहा मुझे भूख लगी है खाना चाहिए तो घर में जो स्त्रियां थी वह तो बेचारी परेशान हो गई यह सोच कर के कि आधी रात को ठाकुर के लिए का खाने का बंदोबस्त करेंगे क्योंकि उस दिन घर में कुछ प्रसंग था वात्सल श्रद्ध या ऐसा कुछ और उसकी वजह से बहुत सारे रिलेटिव्स वहां पर इकट्ठा हुए थे और छोटा सा घर है श्यामा सुंदरी दे का हमको तो पता है शारीरिक कष्ट करके वह घर चलाती थी दूसरों के घर से यह धान बानने धान को बनाने के लिए वह लेकर आती थी इस तरह से वह घर चलाती थी तो फिर वह किस तरह से आधी रात को खाना देंगे ठाकुर को और ठाकुर तो है जमाई तो जमाई की तो सविशेषठकल को क्या खाने को देंगे केवल हांडी त किछु पां आता भात छीलो एक हांडी में सिर्फ थोड़ा सा पां आता भात था पां आता भात अर्थात कि भात के भीतर में पानी डाल कर के थोड़ा सा रखा जाता है आई थिंक वही प्रोसेस है तो वो इस तरह से रखा हुआ भात जो कि एका दो दिन तक बिगड़ेगा नहीं आप खा सकते हैं उसको तो इस तरह से हांडी में भात बचने से इस तरह से पाता भात बना कर के रख देते हैं तो थोड़ा सा लंबा समय तक टिकेगा वरना वैसे ही भात रखे रहेंगे तो बिगड़ जाएगा दूसरे दिन उस समय तो यह रेफ्रिजरेटर वगैरह थे नहीं कि चलो फ्रिज में रख दो तो दो-तीन दिन तक खाना ठीक-ठाक रहेगा तो भात के भीतर में इस तरह से पानी ऐसा डाल कर के रख देंगे तो वह एक वो भात रह जाएगा अभी यह पां भात के बारे में कहा जाता है कि दूसरे दिन जब खाएंगे तो उसका वह नींद बहुत आती है फिर उसका नशा भी चढ़ने लगता है यह सब कहा जाता है तो मैं तो कोई बेंगोल में रहा नहीं मैंने तो इसको ज्यादा खाया नहीं इसलिए मैं कंफर्म नहीं कह पाऊंगा किंतु मैं ने ये सब सुना है तो इस तरह से हांडी के भीतर में थोड़ा सा भात बच गया था रेफ्रिजरेटर नहीं होने की वजह से पां भात बना कर के रखा था और जब ऐसा पां भात था तो क्या हुआ श्री मां ठाकुर के शोभ उहा जाना ले तिनी बोली लेन ताई नहीं है शो मां ने बड़े ही डरते डरते ठाकुर को कहा कि हांडी है उसके भीतर में पां भात है अभी पां भात खाने से किसके ऊपर में क्या असर होगी बोलना मुश्किल है इसलिए मां ने ठाकुर को डरते डरते कहा कि पाता बात है क्या करूं तो ठाकुर ने कहा जद है तो वही लेकर आओ ताई नहीं शो उसी को ले आओ श्री मां बोली लेन किंतु तरकारी तो नहीं मां ने कहा मां शारदा ने कहा तरकारी तो नहीं है ठाकुर कोहिल देखो ना खुजे पते तुमरा माच चाट कोरे छले तो देखो ना तार एकट आछ की ना ठाकुर ने कहा जैसे ही मां ने कहा तरकारी तो नहीं है पाता बात है ठाकुर ने कहा वही लेकर आओ मां ने कहा तरकारी नहीं है तो ठाकुर ने क्या कहा थोड़ा सा खोज करके देखो तुम लोग तो मछली की चटनी वगैरह कुछ बनाए थे माच चाट इसका अर्थ क्या होगा मछली की कोई तरकारी होगी ना चटनी होगा जो भी है वो बनाया था तो जो देखो तो उस वो थोड़ा सा बचा है कि नहीं बचा है श्री मां अनुसंधान देखि लेन ई पात्रे एकटी खुद्रो मोरला माछ और एकट घनो रोस आचे मां ने देखा कि जिस पात्र में मांच चाट ई अर्थात कि ये मछली की तरकारी बना के रखी थी उसके भीतर में एक छोटी सी मौला बोलकर के मछली होती है वह मछली है और थोड़ा सा ग्रेवी उसके भीतर में है अगत ता हाई आनि लेन तो आखिर में मां वही लेकर के आई देखिया ठाकुर की आनंद यह देख कर के ठाकुर का क्या आनंद श रात्रे पाता भात खाते बलेन एवं ओई खुद्रो मच्छर साहज एक रेक चाले भाग खाया शांतो होई लेन वही रात को व एक वो छोटी सी मोरला माछ बची थी उसी के सहारे एक रेख भात खा कर के वह शांत हुए अभी यहां पर लिखा है कि रेख अर्थात कि क्या एक रेख भात खाया तो पूछेंगे कि एक रेख अर्थात क्या तो गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं चावल मापी बार बेर तैयारी पात्र यह भात का परिमाण क्या है हम लोगों के घर में मेजरमेंट के वो सब रहते है ना पात्र ये एक लीटर का है यह आधे लीटर का है यह 10 ग्राम है यह 20 ग्राम का वो पात्र रहता है मेजरमेंट का तो वैसे ही बांस का बनाया हुआ एक पात्र जिसके माध्यम से आप भत की गणना कर सकते हैं तो अभी एक रेख अर्थात कितना होगा किंतु ज्यादा ही होगा तो यह भात खा कर के ठाकुर ने उस समय तृप्ति का अनुभव किया कामर पुकुर बा जयराम बाटी होते श्रीमा साधारण तो पदो ब्रज दखिनेश्वर जाय तेन कामर पुकुर और जयराम बाटी से मां साधारण तः जनरली पैदल चकल के ही दक्षिणेश्वर जाति एक बार कोनो पर्व उपलक्ष को एक जन पल्ली रमणी गंगा स्नाना अथ कोलकाता जाते उद तो होले श्री माओ कामर पुकुर होते लक्षी दीदी शि बुता प्रवृति के लैया तहादेर संगे चोली लेन एक बार ऐसा हुआ गंगा स्नान के लिए कुछ िया वहां पर दक्षिण श्वर जाने के लिए तैयार हुई तो मां भी शिबू दादा और लक्ष्मी दीदी को साथ में उनके साथ में चली यह अभी वही तेलो भेलो माठ की घटना कि यहां पर रास्ते में मां को वो डाकत मिलता है और डाकत की वजह से उनके भय से मां कहती है कि आमी तो अपनार मे तो यह जो पूरी घटना है एक काम करते हैं इसका पाठ हम कल ही करते हैं क्योंकि अभी आज आधा करेंगे कल आधा करेंगे तो मजा नहीं आएगा कल ही पूरा इसका पाठ करते हैं आज यहीं तक हम रखते हैं और आज महालया भी है तो आशा रखता हूं कि जो लोग पूजा पाठ वगैरह करते हैं मंदिर में अपने आश्रम जद है पास में तो आप लोग दर्शन के लिए भी जाएंगे शांति शांति शांति हरि तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु