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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

देवीत्‍व का जागरण : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 7 May 2024

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ओ स्प काय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मा शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी लिखित शोड़ी पूजा के बारे में हम लोग चर्चा कर रहे थे और पाठ कर रहे थे अभी तक गंभीरानंद जी महाराज ने इसकी भूमिका बनाते हुए हमको यहां तक ले आए कि किस तरह से शोड़ी पूजा के पीछे में ठाकुर और मां के दिव्य संबंध की पृष्ठभूमि थी और आने वाले भविष्य के लिए शोड़े स पूजा का क्या महात्म है अभी पूजा का वर्णन गंभीरानंद जी महाराज प्रारंभ कर रहे हैं और वर्णन प्रारंभ करने से पहले ही हमको बता दिया है कि ठाकुर की दृष्टि से अभी इस पूजा का वर्णन करने की जगह स्थान यह नहीं है ठाकुर की दृष्टि से जो वर्णन होगा वह तो लीला प्रसंग में श्री श्री राम कृष्ण लीला प्रसंग में हो चुका है यहां पर मां के दृष्टि से मां के दृष्टिकोण से इस पूजा का वर्णन हुआ है तो महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मायर प्रथम आगमन पर तहर सहीद किछु दिन एक सज्ज सोयन कोरिया ठाकुर तहर पवित्रता संबंध संपूर्ण नि संदिग्ध होया छन मां के दक्षिणेश्वर में प्रथम आगमन के बाद एक ही शैया में मां के साथ में शयन करने के बाद ठाकुर मां की पवित्रता के बारे में संपूर्ण रूप से निश्चिंत हुए हैं ठाकुर ने कहा था मां को पूछा क्या तुम मुझे संसार में फिर से खींच लेने के लिए आई हो तो मां ने क्या उत्तर दिया था मैं तुमको संसार में फिर से क्यों खीचू गी मैं तो आपके धर्म पथ में ईश्वर साधना में ईश्वरीय रास्ते में सहाय होने के लिए आई हूं तो जगदंबा और भगवान विष्णु स्वयं इनका यह यहां पर जो वर्णन है इसकी यह हमको ऑलरेडी इसका पृष्ठ भूमिका हमने देख लिया है पर 1279 साले 24 जेष्ठ अर्थात की 5 जून 18720 5 जून अर्थात श्री विद्या बा त्रिपुर सुंदरी मूर्ति ते आराधना कोबार आग्रह श्री श्री ठाकुरे मने जागृत होया छ आज रात को श्री श्री जगदंबा को उनकी सड़सी अर्थात की श्री विद्या या तो फिर त्रिपुरा सुंदरी के रूप में पूजा करने की इच्छा ठाकुर के मन में प्रकट हुई है किंतु पुजार आयोजन मंदिरे ना होया ठाकुरे अभिप्राया अनु सारे गुप्त भावे तहर कोखे होया छ किंतु इस पूजा का आयोजन काली मंदिर में नहीं होकर के गुप्त भावे अर्थात कि बिना किसी को बताए सीक्रेट ठाकुर के रूम में ही इस पूजा का आयोजन हो रहा है ही सब कार्य ठाकुर हृदय सहा लोत ठाकुर पूजा का जो भी काम है वह सब कार्य के लिए जनरली हृदय की सहायता लेते किंतु हृदय आज काली मंदिरे विशेष पूजा व्रती किंतु हृदय आज काली मंदिर में स्पेशल विशेष पूजा में वह लगा हुआ है उसमें व्रत उसका उसने ग्रहण किया है सुतं तीनी ठाकुर के जथा संभव सहज कोरिया मंदिरे चोलिया गले अर्थात ने ठाकुर को जितना भी थोड़ा बहुत हो सका सहाय करके अभी वह मां काली के मंदिर में चला गया परे राधा गोविंदर रात्रिकालीन शेवा पूजा शेष कोरिया दिनु पूजारी ठाकुरे घोरे आशिया अवशिष्ट आयोजन मंद लेन इसके बाद में राधा गोविंद का जो मंदिर है उसमें रात्रि का जो पूजा वगैरह जो कुछ भी है वह समाप्त करके दिनु पूजा ी ने आकर के ठाकुर को पूजा के कार्य में सहाय करने का प्रारंभ किया और यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने फुटनोट में लिखा है दिनु पुजारी जाति संपर के श्री मायर भासुर पुत्र बाड़ी मुकुंदपुर है अर्थात की यह दिनु पुजारी मां का कोई रिलेटिव था उसका घर मुकुंदपुर में था पूजा द्रव्य समस्थ जथा स्थाने सज्जित होलो पूजा द्रव्य सब अपनी अपनी जगह पर सजा करके दिनु पुजारी ने रख दिया आराध्या देवीर कोनो प्रतिमा ना थाकी ले ओ तहर जन्नो आलिम पन शोभित पीठ ठाकुरे चौकी उत्तरे पूज केर सम्मुख स्थापित होलो आराध्या देवी अभी पूजा का आयोजन तो सब हो रहा है किंतु आराध्या देवी कौन है ना ही उनकी कोई प्रतिमा ना ही इन का कोई फोटोग्राफ ना ही इनका कोई और सिंबल वहां पर उपस्थित है किंतु फिर भी देवी के लिए बैठने के लिए जो आसन है वह ठाकुर की जो चौकी अर्थात की उनका जो बेड है उसके सामने उस आसन को स्थापित किया गया ए रूपे सड़ शर बा त्रिपुर सुंदरी पुजार समस्त आयोजन शेष कोरीते रात्रि नोटा बाजया गेलो इस तरह से शोड़ी या तो फिर त्रिपुर सुंदरी की पूजा का आयोजन शेष समाप्त करते करते रात को 9 बज गए श्री मां के पूजा काले उपस्थित थाकी बार जन्नो ठाकुर पूरब बोलिया पाठया लन मां को पूजा के समय में उपस्थित रहने के लिए ठाकुर ने पहले ही मैसेज भेज दिया था खन खन तीनी घोरे आशिया नि मने ठाकुरे पूजा देखीते लागि लेन ठाकुर ने कहा था कि पूजा होने वाली है आप उपस्थित रहिएगा तो मां भी उस समय उपस्थित होकर के बड़े ही शांति से ठाकुर की पूजा का आयोजन देखने लगी मां को तो पता ही नहीं था शायद कि मां उनकी खुद की पूजा ठाकुर करने वाले हैं जदी ठाकुर ने शायद ऐसा कहा होगा तो मां ने विरोध किया होता शायद ऐसा हो सकता है कि अरे आप मेरी पूजा के कैसे कर सकते हैं तो इस तरह से शायद हो सकता होगा तो ठाकुर ने शायद उनको नहीं बताया होगा ठाकुर पूर्व मुख होया पश्चिम दिख दोर्जर काछ बसिया लेन पश्चिम की तरह की पश्चिम दिशा की ओर जो दरवाजा है वहां पर ठाकुर पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बैठे हुए थे मंत्रोचार सकारे पूजा द्रव्य सकल शोधने प तिनी जथा विधि पूर्वक कृत्य शेष कर लेन एवं श्री मां के निर्दिष्ट पीठे उपशर जनन इंगत करी लेन मंत्रोच्चार की मदद से पूजा के जो द्रव्य है उसका शोधन या तो फिर उनको पवित्र करके ठाकुर ने आखिर में मां को विनती की कि वह देवी के आसन पर समा सित हो देवी के आसन के ऊपर में उपवेतूनीव पूजा देखीते देखीते माता ठाकुरानीर अर्ध बागज दशा उपस्थित होया छलो पूजा देखते देखते मां की अर्ध बाह्य दशा उपस्थित हुई थी अर्ध बाह्य दशा अर्थात की जब साधक या तो पूजक भाव में आ जाता है देवी के तो देवी के भीतर में ही उसका मन पूर्ण विलीन हो जाता है किंतु मां का मन देवी के भीतर में पूर्ण विलीन नहीं होकर के एक अंश विलीन हुआ था अर्थात कि आधा मन देवी त्व के भीतर में विलीन है और आधा मन इस जगत में पड़ा हुआ है आधा मन जगत में रहेगा क्योंकि मां को तो पूजा में भाग भी लेना है मतलब पूजा के आसन पर बैठना भी है जो थोड़ा बहुत ठाकुर कहेंगे वह उनको करना भी है इसलिए थोड़ा सा इस जगत में मनता किंतु ज्यादातर मन अपने जो सही स्वभाव देवी का स्वभाव उस में विलीन हो चुका था तरान केनो की कोरीते छन इत्यादि ना भाभिया तीनी मंत्र मुगदर न्याय पश्चिमा शयो होया ठाकुरे सम्मुख तो पीठे उपवेद बाह्य दशा है आधा मन देवी में विलीन हो गया है उनका देवत्व रूप जो असली स्वरूप है उसमें विलीन हो गया है इस इसलिए जब ठाकुर ने कहा कि आप देवी के आसन पर उपवेद कीजिए तो मां ने कोई भी तरह का विरोध नहीं करके मंत्र मुग्ध की तरह अर्थात कि जो ठाकुर ने उनको सम्मोहित कर दिया हो इस तरह से वह आकर के देवी के आसन पर विराजित हुई तखन मंत्र पूत कोलो शेर झोल लैया ठाकुर बारंबार श्री मायर अभिषेक करीले मां जब विराजित हुई तब ठाकुर ने एक कलसी में मंत्र से पवित्र किया हुआ जल लेकर के मां को बार-बार अभिषेक किया तार पर तहा के मंत्र श्रवण कराया प्रार्थना मंत्र उच्चारण करी लेन उसके बाद में एक के बाद एक पूजा के मंत्रों का पाठ ठाकुर करते गए किस तरह से हे बा हे सर्वशक्ति अधिश्वर मात त्रिपुर सुंदरी सिद्धि द्वार उन्मुक्त करो हे बाले अर्थात की हे बालिका हे सर्वशक्ति की अधिश्वर मात त्रिपुर सुंदरी आप सिद्धि का दरवाजा उन्मुक्त कीजिए सिद्धि अर्थात की ईश्वर प्राप्ति ईश्वर प्राप्ति का दरवाजा हमारे लिए खोलिए इ हार अर्थात श्री मायर शरीर मन के पवित्र करया य हाते आबीर भूता होया सर्व कल्याण साधन करो अर्थात श्री मां के शरीर में आ आविर्भव जगत का कल्याण कीजिए इस तरह से ठाकुर ने मंत्र पाठ किया बाद में परे तीनी माता ठाकुरानी अंगे मंत्र सकले जथा विधि विन्यास कोरिया शाखा तो देवी ज्ञाने तहा के सोड़ चारे पूजा कोरी लेन इसके बाद में उन्होंने माता ठाकुर रानी के श्री अंग में यह जो मंत्र वगैरे का जो न्यास होता है वह सब करके उनके भीतर में देवी ज्ञान से सड़ सो उपचार से उनकी पूजा की पूजानते भोग निवेदित होलो पूजा के आखिर में भोग देवी को निवेदित हुआ अशेष पूजक निवेदिता मिटा नादिर किय दंश स् हस्ते लिया देवीर श्री मुखे प्रदान करी लेन इसके बाद में ठाकुर ने देवी को जो भोग धराया गया था उसका एक अंश अपने हाथ से लेकर के मां के मुंह में प्रदान किया देखीते देखीते बाह्य ज्ञान श्या श्री मां समाधि तो होलेन देखते ही देखते बाह्य ज्ञान पूरा विस्मृत होकर के पहले तो अर्ध बाह्य दशा थी अभी बाकी ज्ञान संपूर्ण रूप से विस्मृत होकर के मां समाधि स्था हुई ठाकुर अर्ध बाच दश मंत्र उच्चारण करते करते समाधि राज्य चलि गले ठाकुर की भी अर्ध बाह्य अवस्था थी उसमें से मंत्रों का उच्चारण करते-करते वह भी समाधि में निमग्न हो गए श भूमि ते आत्म संस् पूजक ओ पूजिता आत्म स्वरूपे पूर्ण भावे एक भूतो होई लेन उस समाधि भूमि में आत्म संस् पूजक और पूजिता पूजक अर्थात की श्री राम कृष्ण आत्म सस्त अर्थात की अपने ही आत्मा में स्थित है ऐसे पूजक श्री रामकृष्ण और पूजिता अर्थात की जगदंबा स्वयं आत्म स्वरूप में पूर्ण भाव में एकी भूत हुए आत्म रूप में स्थापित होकर के इन दोनों का पूर्ण रूप से मिलन हुआ एकही भूत हुए ए प्रकारे दीर्घ काल काटिया जोखन मध्य रात बहु खण अती तो होया छ तो खन आत्माराम ठाकुरर युथा नेर किछु किछु लखण देखा दलो इस तरह से दीर्घ काल समाप्त हो गया बड़ा ही लंबा समय चला गया जब आधी रात बीत चुकी है तब आत्माराम ठाकुर के यत्न युथा अर्थात की बाह्य जगत में मन का आने का प्रारंभ होने का कुछ कुछ लक्षण देखने को मिला अर्ध बाच दश उपनीत होया तिनी देवी के आत्त निवेदन कोरी लेन अभी फिर से अर्ध बाह्य दशा में आकर के उन्होंने देवी को अर्थात की श्री मां को पूर्ण रूप से आत्म नि वेदन किया अनंतर आपना सहित निज साधना फल एवं जपर माला प्रवृति सर्वस देवीर श्री चरणे चिरो कालेर जन्नो विसर्जन दिया मंत्र उच्चारण करते कोरीते तहा के प्रणाम करी लेन आखिर में अपने खुद के साथ-साथ में ही अपनी साधना का फल और अपनी जपमाला मां को प्रणित कर के मां के श्री चरण में हमेशा के लिए चीर काल के लिए विसर्जन देकर के मंत्र उच्चारण करते करते अर्थात की मंत्रों का उच्चारण करते-करते उन्होंने प्रणाम किया क्या किया प्रणाम क्या मंत्रोच्चारण हे सर्व मंगले मंगल स्वरूपे हे सर्व कर्म निष्पक्ष दयनी त्रिनयनी शिव शिव गहिनीनाथ नारायणी तुमा के प्रणाम करी यह जो मंत्र उच्चारण है सर्व मंगलय मांगल्य हमारे रामकृष्ण संग में हमेशा संध्या आरती के बाद में इस मंत्रों का उच्चारण होता है पूजा समाप्त होलो पूजा समाप्त हुई मूर्ति मती विद्या रूपिणी मानवीर देहाबलम ईश्वरीय उपासना पूर्वक ठाकुरर साधना परि समाप्ति होई मूर्ति मती विद्या रूपिणी मानवी अर्थात कि मां शारदा में मां शारदा के देह का अवलंबन करके ईश्वर ईश्वरी की उपासना ठाकुर ने समाप्त करके अपनी साधना की परि समाप्ति की यह कोटेशन के भीतर में है सेंटेंस अर्थात कि यह लीला प्रसंग से गंभीरानंद जी महाराज ने इस सेंटेंस को लिया है श्री श्री माता ठाकुरानी रो देवी मानव तवेर पूर्ण बका सेर द्वार अन अर्गल मुक्त होई लो साथ साथ में ही मां का देवी और मानवत्वम ते प्रत्यावर्तन अंते स्वगृह जय बार पथे तहर मने पड़ी लो जे श्री श्री ठाकुरे प्रणाम फिराया देन नाही पूजा के बाद में जब मां अपने नबत में वापस जा रही थी तब मां को याद आया कि अरे ठाकुर ने तो उनको प्रणाम किया है तो जब वह देवी त्व के स्वभाव में स्थित थी अपना देवी के स्वरूप में स्थित थी उस समय तो मां ने ठाकुर का प्रणाम ग्रहण कर लिया किंतु अब जब मानवत्वम मां जब वापस चली आई है तो उनका तो यह कर्तव्य है कि ठाकुर को सामने प्रणाम करके उनका प्रणाम लौटा दिया जाए यह बात मां को याद आई कि उन्होंने ठाकुर को प्रणाम किए बिना ही वहां से चली आई है ताई तहा के मने मुने प्रणाम कोरिया नहते फिरी लेन इसीलिए मां ने ठाकुर को मन में ही मन में प्रणाम करके नबत में वापस आए देखिए यह पूरा जो वर्णन है यह वर्णन गंभीरानंद जी ने इतना सुंदर रूप से किया है और इतना पूर्ण रूप से किया है कि इसके ऊपर में और कोई कमेंट करने की जरूरत नहीं है या तो फिर इसकी कोई व्याख्या करने की हमको कोई आवश्यकता नहीं है जब अपना मन मायूस हो जाता है अपना रामकृष्ण जो साहित्य है उसमें से कुछ-कुछ पैसेज को आपको जो कि आपके मन को आपके हृदय को स्पर्श कर जाते हैं ऐसे कुछ-कुछ पैसेज पैराग्राफ सेंटेंस इसको आपको हाईलाइट करके रखना है और बीच-बीच में मन यदि मायूस नहीं भी हो है तो फिर भी नियम करके बीच-बीच में ऐसे जो पैराग्राफ है उसका नियमित रूप से पाठ करना है तो यह जो सड़सी पूजा का वर्णन गंभीरानंद जी ने किया है इसको भी यदि आपके पास में मां की यह किताब है तो इसको मार्क करके रखिए और महीने में तो आखिर में एक बार इसका पाठ अवश्य कीजिए देखिए कि कितना सुंदर रूप से ठाकुर ने यह गंभीरानंद जी ने ठाकुर की यह पूजा का वर्ण वणन किया है कैसे शब्दों ज्यादा ज्यादा शब्द उन्होंने नहीं व्यय किए कभी-कभी हमको लगता है कि यह घटना यदि इतनी महत्त्वपूर्ण है तो इसका वर्णन भी तो बहुत लंबा चलना चाहिए इसकी जो एक्सप्लेनेशन है वह भी तो बहुत लंबी चलनी चाहिए किंतु गंभीरानंद जी ने इतना कुछ वर्णन इतना कोई इसकी व्याख्या विश्लेषण नहीं किया एक ही पेज के भीतर में एक ही पन्ने के भीतर में गंभीरानंद जी ने इस पूरी घटना को आवृत कर दिया है किंतु इस घटना के इस वर्णन के प्रत्येक शब्द को देखिए कि कैसा नाप तुल करके गंभीरानंद जी महाराज ने यूज किया है प्रत्येक शब्द का अपना एक गांर है प्रत्येक शब्द का अपना एक महात्म्य है एकदम कम शब्दों से उन्होंने इतना सुंदर वर्णन देखिए कुछ कुछ जैसे कि उन्होंने कि माता ठाकुरा देवी मानवत्वम विकाश द्वार अर्गल मुक्त होलो अर्थात कि इस पूजा से परिणाम क्या आया मां के भीतर में देवी व और मानवत्वम विकास होना था उसका रास्ता खुल गया अभी ये एक ही जो शब्द था उन्होंने जो किया है कि देवी मानवत्वम का देवी में प्रतिष्ठित होने का दरवाज खुल गया है उन्होंने इस तरह से क्यों नहीं कहा ऐसा क्यों कहा कि देवी और मानवत्वम के रूप में मां के रूप में इस जगत में रहना है और मातृ भाव का प्रचार करना है यह रामकृष्ण संघ जो आज इतना सुचारू रूप से चल रहा है इतना सुंदर रूप से चल रहा है हम लोग जो यहां पर आते हैं साधु हो ना कि भक्त हो ना कि ये वॉलंटस हो सब अपने अपने इतने महिमा मंडित है यहां पर एक-एक साधु एक-एक ज व क्या कहेंगे वो शंकराचार्य हो सकते हैं एक एक वो आपके ये बड़े-बड़े ख्यात नाम एक-एक व्यक्ति हो सकते हैं सिर्फ साधु ही नहीं हमारे एक-एक साधकों में ऐसी क्षमता है अभी जैसे आपका महिमा या तो फिर आपकी टैलेंट या तो फिर आपके भीतर में यह जो ज्ञान का विकास होगा इसके साथ-साथ में थोड़ा बहुत तो घमंड आना ही आना है साथ-साथ में थोड़ा बहुत अहंकार आना ही आना है तो इतने सारे लोग इतनी छोटी सी जगह में एक साथ मिलकर के रहते हैं और अहंकार का क्लेश शायद बीच-बीच में होता होगा किंतु फिर भी ज्यादातर समय अपने अहंकार को संयम में रख कर के अपनी इच्छाओं को अपनी एंबिशन को कंट्रोल करके सबके साथ में मिलकर के जो रहते हैं जो साधना करते हैं यह कब संभव था जब मां का मातृ रूपी प्रेम मातृ रूपी भालो भाषा हम सबको एक सूत्र में यदि गठित नहीं करता तो यह रामकृष्ण संघ चल ही नहीं पाता हमको कभी-कभी लगता है कि ठाकुर ने संघ की स्थापना की तो हां यह बात सही है कि ठाकुर ने संघ की स्थापना की हमको लगता है कि स्वामी जी ने इस संघ को एक मूर्त स्वरूप दिया श्री ठाकुर ने तो गेरवा दे कर के छोड़ दिया था साधना पद्धति सिखा करके वहां पर उनका कार्य उनका मिशन समाप्त हुआ था किंतु संघ को एक मूर्त स्वरूप देना है इस जागतिक विश्व में उसको एक मिशन देना है इसको एक पूरा एक आकार देना है स्पष्ट आकार देना है इसको एक कांस्टिट्यूशन देना है इसको एक कायदे की नजर में कानून की नजर में एक कॉर्पोरेशन के रूप में संस्था के रूप में इसको गठित करना है और लो इसका जो यह स्ट्रक्चर है इसकी कार्य प्रणाली है इसकी नियमावली है वो जो सब देना है वह सब स्वामी जी करके गए किंतु यदि सिर्फ यही दो लोग होते तो संघ की स्थापना भी होती और स्वामी जी की मदद से संघ की कार्य प्रणाली भी प्रारंभ हो जाती किंतु जैसे ज्यादातर इस तरह के संघ के साथ में होता है इस तरह की संस्थाओं के साथ में होता है जैसे ही फाउंडर होते हैं उनकी समाधि होती है बाद में यह सब संस्थाएं बिखर जाती हैं यह सब संस्थाओं का कोई ज्यादा भविष्य नहीं रहता जैसे कि ब्रह्म समाज है तो ठाकुर का नाम शायद हमेशा के लिए रहता स्वामी जी का नाम हमेशा रहता किंदू यह संघ इस रूप में शायद नहीं रहता यदि मां का आशीर्वाद मां का मातृत्व इस संघ के भीतर में प्रवेश ना हुआ होता हम सभी लोगों को यहां पर ट कर रखने वाली तो मां ही है इसलिए देखिए कि एक ही शब्द में गंभीरानंद जी ने कहा है देवी त्व और मानवत्वम विकास का द्वार उन्मुक्त हो चुका है ऐसे प्रत्येक शब्द को हम जितना जितना इसके भीतर में जाएंगे जितना जितना हम इसके बारे में सोचेंगे इतना सब कुछ हमको जानने को मिलेगा ये अर्ध बाह्य दशा बाह्य दशा और अंतर दशा ये जैसे कि यहां पर ये कितना सुंदर सेंटेंस है कि शई भूमि ते अर्थात कि देखते देखते बाह्य ज्ञान शून्य श्री मां समाधि स्ता ईले जब ठाकुर ने मां की पूजा करने की शुरुआत की तो मां धीरे-धीरे करके समाधि में चली गई और ठाकुर भी मंत्रों का उच्चारण करते-करते समाधि में चले गए इसके बाद में गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं श भूमि ते आतो संस् पूजक और पूजित आतो स्वरूपे पूर्ण भावे एकी भूतो होई लेन यह एक सेंटेंस जो है इसके ऊपर में हम कितना सब कुछ सोच सकते हैं कि आत्म संस्था पूजक और पूजिता अपने आत्म स्वरूप में एकी भूत हुए पूर्ण रूप से एकी भूत हुए अभी यह आत्म स्वरूप क्या है हमको पता है यह देखिए कि द्वैत और अद्वैत यह जो ये जो जनरली ये ट्रेडिशनल जो ऐसा सब सोचते हैं ना कि ध्व अलग है अद्वैत अलग है ध्व की जो एलिजिबिलिटी है ध्व का जो अधिकारी है वो शायद अद्वैत का नहीं हो सकता तो ये ध्व अद्वैत का दोनों के बीच का ये जो एक डिफरेंस था एक यह सेपरेशन था इस पूजा से वो मिट गया जसे पूजा का प्रारंभ होता है द्वैत भाव से होता है नेचरली पूजक और पूज्य पूजिता इन दोनों के बीच में मैं पूजक हूं और यह मेरी आराध्य देवी है ऐसा द्वत का भाव रहने से ही तो पूजा का प्रारंभ होगा तो पूजा का प्रारंभ तो इस तरह से हुआ किंतु दोनों जब पूज्य और पूजक और पूजिता अर्थात कि पुजारी और देवी दोनों जब समाधि स्थ हो गए तो अपना जो आत्म स्वरूप है उसमें जब चले गए तो फिर तो यह मैं और तू यह जगत मैं यह पूजक या पूजिता यह सब डिफरेंशिएबल मिट जाएंगे वहां पे क्योंकि आत्म स्वरूप तो एक ही है यह हमारा मन बुद्धि चित्त अहंकार यह पंच प्राण पंच तन मात्रा पंच महाभूत पंच ज्ञानेंद्रिय पंच कर्मेंद्रिय का यह जो देह बना है यह देह तो हम जब जागतिक जगत में रहते हैं यह ध्व की भूमि में रहते हैं तभी तो हमको यह डिफरेंट दिखता है कि हां मैं अलग हूं यह ठाकुर अलग है यह मां अलग है किंतु जब हम सभी समाधि में चले जाएंगे हम अपने सही सही आत्म स्वभाव में जब हम अपने आत्म स्वभाव में पूर्ण रूप से विगलिंक जाएंगे तब यह मन बुद्धि चित्त अहंकार मेरे जन्म जन्मांतर से चले आते हुए यह कर्म का प्रवाह यह सब कुछ विघटित हो जाएगा यह सब कुछ कहां पृथ्वी पर पड़ा रहेगा और मैं कहां इस आत्मा स्वरूप में एकही भूत हो कर के विचरण करूंगा अर्थात कि यह मैं मैं चला जाएगा और सही ब्रह्म स्वरूप ही रहेगा तो दोनों की पूजा करने के समय तो द्वत से प्रारंभ हुआ ठाकुर मां की पूजा कर रहे हैं मां ठाकुर की पूजा स्वीकार कर रही है ठाकुर मां देख रही है कि ठाकुर उनको प्रणाम कर रहे हैं किंतु मां तो अभी देवी के भाव में वह आरोपित है तो ठाकुर का प्रणाम भी ग्रहण कर रही है ठाकुर ने जब उनको वो भोग अपने हाथों से खिलाया तो वह भोग भी ग्रहण कर रही है सब कुछ कर रही है तो उस समय तो ध्व का भाव था कि हां मैं देवी हूं वह मेरे पूजक है मां के मन में वह भाव उस समय तो होगा किंतु जैसे ही दोनों समाधि स्त हो गए तब कौन देवी कौन पुजारी कौन पूज्य कौन पूजक यह सब कुछ एक ही आत्म स्वरूप में वो विलीन हो गया तो एक एक सेंटेंस में गंभीरानंद जी हमको कितना गहराई में ले जाते हैं अभी महाराज जी आगे क्या लिखते हैं श्री मा तखन अष्टादश वर्षो समापन अते उन वर्षे पदार्पण करया छने मां अभी 18 साल समाप्त होकर के 19वें साल की ओर प्रवेश कर रही है 19 साल में प्रवेश कर रही थी तबे तीनी भ्रम क्र में बोली तेन जब किंतु मां भविष्य में सड़सी पूजा के बारे में बोलती तो यह तिथि वार नक्षत्र जैसे हनुमान जी को याद नहीं रहते थे वैसे ही मां तो बेचारी गांव की थी वैसे है मां सरस्वती स्वयं किंतु खुद का जन्म किस साल में हुआ और किस समय व सड़सी पूजा हुई थी वह सबके बारे में थोड़ी सी मां की जानकारी वह कम थी इसीलिए मां भूल करके बोलती थी आमी तखन सोलो बो छोरे पड़े छ अर्थ था कि मेरी उम्र उस समय 16 साल की थी अभी देखिए यहां पे इसके पहले भी जब ठाकुर ने मां के साथ में मां ठाकुर का विवाह हुआ था तब ठाकुर ने मां को कहा था कि तुम सबको ऐसा मत कहना कि जब वो जोड़े अर्थात कि ठाकुर जयराम बाटी आए थे फिर वह मां को लेकर के कामर पुकुर गए उस समय विवाह हुआ विवाह तो 6 साल की उम्र में हुआ कि 5 साल की उम्र में तो ऐसा कहना सही उम्र बताना वो गलत उम्र 2 साल बढ़ा कर के मत बताना ठाकुर ने भी मां को उस समय भी कहा था तो यहां पर भी देखिए कि मां का यह मैथमेटिक्स पूरा गड़बड़ गड़बड़ है तो यहां पर मां कहती है मेरी उम्र उस समय 16 साल की थी यह ठाकुर का भी एक बार ठाकुर ने मास्टर महाशय को पूछा कि अच्छा बताइए तो यह भरती और ओट होती है समुंदर में ये वो किस तरह से आती है तो अभी मास्टर महाशय बेचारे धर्म संकट में पड़ गए वो कहां वो ग्रेविटेशनल डायनेमिक्स वगैरह ठाकुर को समझाएंगे तो वो मिट्टी में वो चि दौर करके ठाकुर को यह सब चंद्र की जो गति है पृथ्वी के आसपास में वह समझाने लगे तो थोड़ी ही देर के बाद में ठाकुर क्या कहते अभी थाक थाक हमार माथा टोन टोन कोर छ अर्थात रहने दो रहने दो मेरा सर घूम रहा है तो वैसे ही ठाकुर को बेचारे को जैसे मैथमेटिक्स के साथ में कोई रिलेशन नहीं था वैसे ही यहां पर भी मां को बेचारी को सालों की गिनती इतनी पक्की नहीं आती थी तो यहां पर गंभीरानंद जी कहते हैं कि उस समय मां की उम्र 18 कंप्लीट होकर के 19 19 साल में व पदार्पण कर रही है किंतु भूल की वजह से वह अपने को 16 साल की गिनवाला तहा के जिज्ञासा पूर्वक आर जे शकल कथा अबतो होया लेन आमरा एखाने तहर सार संकलन करते जब सब भक्त लोग उत्सुक होकर के मां को पूछते थे मां कि यह जो शोशी पूजा है इसके बारे में हमको और ज्यादा कुछ बताओ तो वह जब पूछते पूछते मां ने जो कुछ बताया था इसका संकलन अभी हम यहां पर करते हैं पुजार प्रथमे ठाकुर श्री मायर पद जुगल आलता कपाले सिंदूर पराया दले पूजा के प्रारंभ में ठाकुर ने श्री मां के पद युगल में अर्थात की दोनों पैरों में आलता आलता अर्थात की लाल कलर का एक रंग वो जो बंगाल में कुमकुम की तरह उसको पानी में भिजा करके पहनाते हैं जिससे कि पैर लाल हो जाते हैं तो वो ला आलता पहना दिया और कपाल में सिंदूर पहना दिया था अंगे नूतन वस्त्र परिधान कोराई लेन और उनके शरीर में नया वस्त्र नई साड़ी उनको पहनाई थी मुखे पान मिष्टी प्रदान करी लेन मुंह में पान और मिठाई अर्पित की थी ही वर्णना श लोखी दीदी जोखन सो हास्य प्रश्न कोरी लेन यह सब वर्णन सुनक के लक्ष्मी दीदी ने हंसते हंसते प्रश्न किया तुम तो औरतो लज्जा करो तुम तो इतनी लज्जा करती हो कापड़ी इतनी लज्जा करती है मां कि ठाकुर के सामने भी वो घुटा तान के रहती है बाद में ऐसा हुआ कि एक ठाकुर को उस समय डा जेंट्री हो गया था बहुत डेंटरी हो गया था और मां को उस समय मां को भी प्रॉब्लम क्या था कि डाइसें वगैरह ये बुखार वगैरह गंगा के किनारे रहते रहते होता था तो मां के लिए एक ऐसी व्यवस्था हुई कि दक्षिणेश्वर गांव के भीतर में मां के लिए एक अलग मकान का निर्माण किया गया और मां वहां पर रहेगी अभी यहां पर ठाकुर रहते हैं काली मंदिर में और मां रहती है वहां पर गांव में मां ठाकुर के लिए खाना बना कर के उनके कमरे में आकर के लेकर आती थी और ठाकुर भी शाम को शाम को कभी-कभी मां के घर में जाकर के मां के साथ में वह सब ईश्वरीय वार्तालाप करते थे एक बार ऐसा हुआ कि ठाकुर मां के घर आए हैं पूरा जोर से बारिश हो रहा है और ठाकुर वहां पर वापस नहीं जा पाए काली मंदिर में तो रात को वहीं पर रहना पड़ा तो ठाकुर मस्करी करते-करते मजाक करते-करते कहते हैं कि ये जो सब कालीवाड़ा सब ब्राह्मण पुजारी है वो अपने घर कैसे जाते हैं अपनी पत्नी के साथ में रहने के लिए वैसे मैं भी तुम्हारे साथ में रहने के लिए लिए आया हूं तो इस तरह से मां वहां पर रहती थी और ठाकुर दक्षिणेश्वर में रहते थे ठाकुर को इतना सीरियस डाइजेंस तो उनकी सेवा करने के लिए वृंदावन से ना कहीं से एक स्त्री एक साधि का वो वहां पर आई थी तो ठाकुर की बहुत सेवा करती थी तो उसने जाकर के मां को कहा कि मां ठाकुर की ऐसी परिस्थिति है और आप यहां पर रहती है तो वो कैसे व वो तो ठीक नहीं लगता आपका स्थान तो ठाकुर के साथ में है ठाकुर की सेवा करने के लिए लिए तो मां ने कहा कि यह हृदय था हृदय की पत्नी भी उस समय मां के साथ में उसी घर में रहती थी तो मां ने कहा कि देखो हृदय की पत्नी भी मेरे यहां साथ में रहती है मैं चली जाऊंगी तो वह अकेली क्या करेगी तो यह जो साधिका थी ठाकुर की सेवा करने के लिए आई थी कहां से आ गई और कहां से ठाकुर के साथ में ऐसा होता है ना कहां-कहां से सब गुरु आकर के ठाकुर को साधना करके कहां अदृश्य हो गए पता ही नहीं चलता तो वैसे ही ये स्त्री आकर के ठाकुर की सेवा करके फिर कहां च ली गई थी मां को मां ने उनकी खोज की जब वह काशीन के वृंदावन कहां से जो आई थी वहां पर जाकर के मां जब तीर्थ यात्रा कर रही थी मां वहां प गई थी उनकी बहुत खोज की मिली नहीं तो जो भी है तो उस स्त्री ने मां को कहा कि अरे वो हृदय की पत्नी की संभाल रखने के लिए यह लोग किसी को रख देंगे आप चलिए ठाकुर के पास में तो वह मां को फिर से दक्षिणेश्वर में नबत में रहने के लिए लेकर के आई फिर वही स्त्री मां को लेकर के ठाकुर के पास में जाती है और फिर उसी ने क्या किया मां जो सब समय ठाकुर के सामने घुमता टान के रहती थी तो इसी स्त्री ने मां का घुमता ठाकुर के सामने खोल दिया और अभी पहली बार पहली बार इस तरह से तो नहीं किंतु फिर जब ठाकुर ने जैसे ही यह देखा तो ठाकुर ऐसा वो हर समय भाव में चले जाते हैं ना तो उन्होंने भी भाव में जाकर के ईश्वर के बारे में इतनी सारी बातें सब ईश्वरीय वार्तालाप साधना के बारे में ईश्वर के बारे में इतनी सारी बातें करना शुरू कर दी कि दोनों वो जो स्त्री जो साधिका और मां दोनों ठाकुर की बात सुनते पूरी रात भर ठाकुर की बात वो सुनते रहे तो वो इसलिए ये लक्ष्मी दीदी पूछती है कि ठाकुर के सामने घुटा भी टान कर के रखती हो इतनी लज्जा चला हो तो ठाकुर ने नया वस्त्र कैसे पहना दिया तो मां सरल भावे उत्तर दिले मां ने बड़े ही सरल रूप से उत्तर दिया आमी तो खन की रकम जनो होए गि छल मैं मेरी कैसी एक अवस्था हो गई थी कैसी एक अवस्था अर्थात की देवी में वह देवी के भाव में वह विलीन हो गई थी इस ऐसी एक देवी की अवस्था हो गई थी कि फिर ठाकुर उनको वस्त्र भी पहना रहे हैं इसके बारे में उनकी लज्जा शर्म नहीं रही मां गंगा जलर जालर दिके मुख कोरिया बोसिया छले वहां पर ठाकुर के कमरे में गंगाजल का एक घट रखा था उसकी ओर मु उसके सामने मुंह करके बैठी थी तहर दक्षिण दिख पूजा सामग्री सज्जित छलो मां के दक्षिण साइड की ओर पूजा की सामग्री सज्जित थी पूजा काले कुखर द्वार विद्ध थाका के हो इहा जानी ते पारे ना पूजा के समय में कमरे का दरवाजा बंद था बोलकर के किसी को पता नहीं कि ठाकुर ने मां को शोड़ी रूप में पूजा की है अथवा बाहर उत्स बर कोला हले पुजार व्याघात होई नहीं या तो फिर हो सकता है कि काली मंदिर में ऑलरेडी उस समय पूजा हो रही थी तो उसका जो कोलाहल था सभी लोग उसमें इतने बिजी थे कि कोई भी आकर के ठाकुर को उस समय रात को डिस्टर्ब नहीं किया था गृह ठाकुर और मां तीतो के हो छिले ना उस कम में ठाकुर और मां के अलावा और कोई उपस्थित नहीं था शेष शेष हृदय आश छिले किंतु पूजा के आखिर में हृदय आया था पूजा बसाने मायर एक समस्या उपस्थित कोई पूजा के बाद में आखिर में मां के सामने एक समस्या उपस्थित हुई पूजा प्राप्य शंखा साड़ी इत्यादि द्रव्य की रूप व्यवस्था होई बे पूजा में ठाकुर ने मां को जो जवाहरात यह साड़ी वगैरह जो ऑफर किया था इसके बारे में मां क्या करेगी कारण तहर तो आर गुरु मा छिले ना ज तहा के दिवेन मा की तो गुरु मा नहीं थी कि जिनको वह यह सब देती सर्व विषय ब्रह्म दृष्टि संपन्न ठाकुर यहा सुनिया एकट भाभिया बोली लेन सब विषय में ब्रह्म दृष्टि संपन्न ठाकुर इसके बारे में सुनकर के थोड़ा सा चिंतन करके कहे तो तुम्हार गर्भधारिणी मां के दते पारो तुम अपनी खुद की मां को दे सकते हो किंतु देखो ताकि जेनो मानुष ज्ञान करे दियो ना मां मेरी मां है मानवी मां है ऐसा ज्ञान करके मत देना साक्षात जगदंबा भवे देवे साक्षात जगदंबा मान कर के अपनी मां को अर्थात श्यामा सुंदरी को देना श्री माता ई कोरियाची श्री मां ने वही किया था तो यह सड़सी पूजा का वर्णन अभी इसके बारे में और भी जो कुछ भी है इसकी समाप्ति के बाद में जो वर्णन है वह सब अभी हम कल देखेंगे आज ओम शांति शांति शांति हरि ओ तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु

Questions & Answers

टेक्नोलॉजी का यही तो महात्म है राइट कि आप सब समय तो आश्रम में जाकर के सत्संग नहीं कर पाते तो जैसे स्वामी जी कहते हैं ना कि यदि मोहम्मद जद इफ द मोहम्मद डजन कम टू माउंटेन देन माउंटेन शुड गो टू मोहम्मद ऐसा प्रश्न किया है व्हाई आर देर सो फ्यू फीमेल रिलीजियस लीडर्स इन द वर्ल्ड मोस्टली दे वेर मेन हाउ डू वी सी शशी पूजा इन दैट लाइफ एक्चुअली ऐसा नहीं है कि स्त्री संत नहीं है प्रॉब्लम यह है कि पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से पुरुषों के बारे में ज्यादा लिखा गया है स्त्रियों को क्या है कि हमेशा एक मर्यादा के भीतर में रहना पड़ता है तो अभी जैसे कि ठाकुर ठाकुर ने जिस तरह से साधना की मां के लिए उस तरह की साधना या तो फिर और किसी स्त्री के लिए इस तरह की साधना करना संभव शायद नहीं होता है तो एक सामाजिक मर्यादा आ जाती है इसकी वजह से वे लोग साधना कर नहीं पाती इतना और फिर साधना करती है सिद्धि प्राप्त करती है तो फिर इनका इतना प्रचार नहीं होता है यह देखिए शारदा मठ की स्थापना के बारे में ही कितने स्वामी जी ने तो यहां तक कह दिया है कि पुरुषों का मठ होने से पहले स्त्रियों का मठ होना चाहिए बेलूर मठ होने से पहले उनकी इच्छा थी कि स्त्रियों का मठ हो किंतु सबको पता था कि यह प्रैक्टिकल नहीं है स्त्रियां जब अकेली कहां जाएगी कैसे करेगी यह सुधीरा देवी जो कि निवेदिता स्कूल में आचार्य टीचर थी तो अभी सुधीरा देवी के जो भाई थे वो क्या नाम मैं भूल गया उनका वो साधु हो गए थे अपने मिशन में तो वो उद्बोधन में रहते थे तो वह क्या करते थे तो वो क्या करते थे सुधीरा देवी को लेकर के जाते थे और जैसे कि रेलवे स्टेशन जाना है तो किस तरह से टिकट निकालना है यदि बाजार में जाना है तो किस तरह से क्या खरीदना है वो दोनों जाते थे फिर वहां पर जाकर के यह महाराज जी किसी किसी दीवाल के पीछे छुप जाते थे और देखते थे सुधीरा दीदी को कहते थे अब आप जाइए और खरीद कीजिए कुछ मैं देखता हूं आप ठीक-ठीक करते हैं कि नहीं ऐसा करके उनको सब सिखाना पड़ा था यह सरला दीदी जो घर छोड़ कर के गई उसके बाद में उनको कितना सफर करना पड़ा था तो यह क्या है कि जब 18 1953 की जब वो हुआ 63 53 तब कहीं जा करके यह मां की जन्म शताब्दी थी उस समय कहीं जाकर के यह शारदा मठ की स्थापना हुई तो क्या है कि जब तक समाज में एक स्त्रियों की सेफ्टी गारंटी नहीं होती तब तक यह स्त्रियों की साधना करने की यह बहुत ज्यादा सुविधा नहीं होती और यह स्वामी जी भी कहते हैं कि स्त्रियों की सेफ्टी किसी समाज में कितनी है उसके बेस पे आप काउंट कर सकते हैं कि भाई वह समाज कितना विकसित है जो कि पशु वत समाज होता है वहां पर स्त्रियों के लिए बिल्कुल सेफ्टी नहीं है और जो बहुत ही विकसित समाज है वहां पर स्त्रियां अलंकार पहन कर के मध्यरात्रि में बाजार से जा सकती है ऐसे वो एक संस्कृत श्लोक है कि जद ने अच्छा राज्य किस तरह से किसका राज्य अच्छा चल रहा है कहेंगे कौन राजा अच्छे से राज्य करा रहा है तो जिस राजा के राज्य में एक यंग एक युवान स्त्री पूरे गहने पहन करके वह रास्ते से बाजार से मध्यरात्रि को जा रही है व और उसको कोई हानि नहीं होती तब कहा जाएगा कि यह राजा अच्छे से शासन कर रहा है तो यह सोसाइटी को इतना डेवलप होना होगा कि स्त्रियों को 100% सेफ्टी एंड फ्रीडम हो तब कहीं जाकर के वो एक के बाद एक स्त्री संत बढ़ने लगेंगे इसीलिए जो अपना वेदिक युग था उसमें यह जो एक के बाद एक जो हमने वह स्त्री संतों को देखा वो इतना आज शायद मॉडर्न एज में बाद में जो मिडिवल एज था उसमें नहीं दिखाई दिया वो एक और दूसरा की जो आप कहते हैं कि श तुसी पूजा को यदि इस परिप्रेक्ष्य में किस तरह से देखें तो आप यह कह सकते हैं कि जो नारीत्व जो है पूरे विश्व का उसको उसके लिए एक क्या कहेंगे कि एक आदर्श स्थापित करके मां गई है किंतु देखिए कि हमने यह प्रश्न पहले भी डिस्कस किया था कि आज जैसे कि इसरो की कोई साइंटिस्ट है या तो फिर अमेरिका में न्यूयॉर्क में कोई स्त्री जॉब करती है तो उनको हम मां का जीवन कैसे दिखाएंगे कि पूरा जीवन एक छो छोटे से नहब में वह बिता करके गई अब नबत में रहना इतनी छोटी जगह में रहना घुमता टान के रहना किसी के सामने ना जाना कहीं बाहर ना जाना कि कहीं पर कुछ नहीं करना तो यह कैसा जीवन इस तरह का जीवन क्या हम आज की स्त्रियों के सामने आदर्श स्वरूप रख सकते हैं कि नहीं ऑफकोर्स रख सकते हैं किंतु आपको प्रॉपर्ली एनालाइज करना होगा कि मां के जीवन के किस किस एस्पेक्ट को आप लेते हैं यह लोग कोई परंपरा को तोड़ने के लिए नहीं आए थे इसलिए यह जो परंपरा थी स्त्रियों को बहुत ही ज्यादा मर्यादा में रहना है इस परंपरा को बजाए रखते हुए इन्होंने आधुनिक आधुनिक का प्रारंभ किया था तो यह प्रॉपर एक एनालिसिस होना चाहिए मां के जीवन को आज की स्त्रियों के सामने रखने से पहले