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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

शक्तिपीठ : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 30 Nov 2023

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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्रीमा शारदा देवी शक्तिपीठ यह जो फर्स्ट चैप्टर है उसका हम पाठ कर रहे थे तो जहां तक हमारा हुआ उसके बाद में थोड़ा सा और मैं पाठ करता हूं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं मैं हिंदी में ही बोलूंगा पाठ करूंगा गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं जयराम वाटी के चारों ओर जिन ग्रामों से श्री राम कृष्ण एवं मां की पवित्र स्मृति जुड़ी हुई है उनमें से शि होड़ कोवाल पाड़ा आनू और श्याम बाजार उल्लेखनीय है शिहोर ग्राम में श्री रामकृष्ण की फुफेरी बहन हेमांगिनी देवी की ससुराल और श्री मां का ननी हाल था इसी संबंध से बाल्यावस्था से ही दोनों वहां अनेक बार जा चुके थे बाद में विष्णुपुर के मार्ग से कलकत्ता आते जाते समय मां कोआलपाड़ा में प्राय दो एक दिन विश्राम करती थी दो बार तो वे अधिक दिनों तक रही थी आनू में श्री विशालाक्षी के दर्शन के निमित्त जाते समय श्री रामकृष्ण को मार्ग में देवी का आवेश हुआ था श्याम बाजार में तो वे एक बार सात दिन और सात रात संकीर्तन में मतवाले हुए थे वो उस समय की बात है ठाकुर ने कहा था कि यह देवी आकर्षण किस तरह का है मां को बोला कि दिखाओ मुझे तब कहीं जा करर के वह जो सात दिन सात रात वो व ढोल बजते ही रहते हैं लोग नृत्य कीर्तन चलता ही रहता है वह वाली जो घटना वोह वहां पर श्याम बाजार में हुई थी इनके अतिरिक्त और बहुत से ग्राम श्री राम कृष्ण तथा मां की लीला स्मति से जुड़ है जयराम बाटी के पूर्व अमोदर के दूसरे पार एक बड़ा ग्राम ताजपुर है ताजपुर के जमींदार की लड़की लड़के के साथ राधु का विवाह हुआ था दक्षिण में जीवटा है जो जमींदार राय बाबुओं का निवास स्थान है दक्षिण पश्चिम से दक्षिण पश्चिम में मसीना आपु और पश्चिम में शिह गाम है यह सब गां जयराम बाटी से एक मील की दूरी में ही स्थित है शिहोर के पश्चिम में मुसलमान की बस्ती शिरोमणि पुर है यही शिरोमणि पुर जहां से अमजद आया करता था जयराम बाटी कलकत्ते से अधिक दूर नहीं है फिर भी वहां आना जाना कष्टदायक था विशेषकर उन दिनों बहुत से लोग कामर पुकुर और उचा के मार्ग से पैदल चलकर चट्टंचल से रेलगाड़ी पकड़ते थे यह जो पैदल चलके चोटी में रुक करके जाना इसकी एक सुंदर कहानी है मां एक बार कोलकात्ता आ रही है कि जा रही है वो मैं एगजैक्टली भूल गया साथ में ये सब त्यागी संतान भी है और यह राधू माकू वगैरह दो-तीन लोग भी होंगे तो एक बार वहां पर छोटी के पास में रुकना हुआ तो अभी रुकना है तो खाना भी वहीं पर चोटी तो चोटी का अर्थ क्या है कि गांवों के बीच में आज की तरह तो सिटीज एक दूसरे के साथ में इतना मिल गए हैं कि आपको लगता ही नहीं कि एक सिटी से दूसरे सिटी की ओर जा रहे हैं तो बीच में कुछ होगा वो कंटीन्यूअस आपको रेसिडेंस होटल यह सब देखने को मिलेगा एटलीस्ट हाईवे के किनारे पे फिर गांव की बात अलग है किंतु ऐसा ही लगेगा जैसे कंटीन्यूअस सिटी है मैं कभी वड़ोदरा से अहमदाबाद अहमदाबाद से राजकोट वगैरह आता हूं राजकोट की ओर तो ठीक है थोड़ा सा फिर भी थोड़ा खाली जगह आपको दिख जाएगा किंतु यह वड़ोदरा अहमदाबाद यह जो पूरा जो लाइन है हाईवे का पूरा भरा भरा आपको दिखेगा किंतु यह पुराने दिनों की बात है वह भी गांव की बात एक गांव छोड़ कर के निकले तो पूरे जंगल में ही पहुंच गए रास्ता खेतो खेतों से के बीच में से जाता है और चैतन्य महाप्रभु की लाइफ में जब पढ़ रहा था तब मैंने पढ़ा था कि यह जो मुस्लिम राज उन लोगों का आक्रमण हुआ उस समय युद्ध जब होता था सैन्य का तो अपने सैन्य के आने जाने के लिए राजाओं ने यह बड़े कुछ कुछ रास्ते बनाए थे तो जो पगदी या केड़ी या तो य रास्ता यदि कहा जाए तो ऐसे रास्ते थे या तो सेनाओं के जाने के लिए रास्ते होंगे या तो फिर यह तीर्थ यात्रा करने के लिए जो लोग जाएंगे जगन्नाथ पुरी है या तो वहां पर है गंगासागर तो इस तरह के कुछ रास्ते होंगे यदि जिसको रास्ता कहा जाए तो बाकी तो जंगल थे और खेत के बीच में से जाना होता था तो एक एक तरह एक दिन की बात है वो लोग इस तरह से एक चोटी में रुके आसपास में तो कुछ है नहीं साथ में वह राइस वगैरह इन लोगों ने ले लिया था तो माने एक चोटी में वोह एक हांडी होती है मिट्टी की तो उसको उसके ऊपर में भात उसके भीतर में वह राइस रखा पानी रखा और वह जैसे उस समय होता था अभी भी बहुत सारे जगह पर होता है लकड़ियां कुछ सुकी इकट्ठा करके उसमें अग्नि जलाया गया उसके ऊपर में मिट्टी का हंडी रखा हुआ है भात बनाने के लिए थोड़ी देर के बाद में ह भात बन गया और मां ने सबको बोला कि चलो सभी लोग आ जाओ अभी मैं सबको खाना परोस हूं तो अभी यह दो तीन त्यागी संतान जो भी मां के साथ में थे सब इकट्ठा हो गए और अभी जो हांडी उठा कर के वह भात वाली हांडी उठा रहा था जो जो मां का शिष्य वो हांडी अचानक टूट गई टूट गई तो सब भात बाहर निकल गया तो अभी क्या होगा अरे यही तो खाने पीने का जो कुछ था वोह तो यही था भात था बस और कुछ होगा शायद सा साथ में किंतु भात तो यहीं पर खत्म हो गया तो सब लोग बड़े ही परेशान हो गए अरे आज अभी का तो खाना गया और तो पता है ना यात्रा करते हैं तो भूख ज्यादा लगती है हमारी तरह नहीं कि वो ट्रेन में बैठ गए या तो फिर कार में बैठ गए तो निकल गए वो तो बेलगाड़ी प जाना या तो पालखी में जाना वो इतना ही कष्ट करर होता है माने फिजिकली स्ट्रेन अस होता है क्योंकि वो कंटीन्यूअस जर्क आते रहते हैं तो आजकल के जो रास्ते पर हमको चलना एक हैबीच हो गए हैं स्मूथ रास्ता है उस समय तो ऐसा नहीं था कंटीन्यूअस जर्क आएंगे रास्ते में गड्ढे होंगे वो एक त्रिगुणा तिता नंद जी की कहानी है मां जा रही थी ऐसे ही कामर पुकुर ना जयराम बाटी बेलगाड़ी में बैठ कर के रास्ते में बड़ा गड्ढा आया उसमें रात की रात का समय था मां सोई हुई थी तो त्रिगुणा तिता नंद जी ने सोचा कि अरे मां इस रास्ते से जद बेलगाड़ी जाएगी तो एकदम जर्क लगेगा और मां की नींद खुल जाएगी अभी मां को तो विश्राम कर देना चाहिए उनको उनके के विश्राम में आघात ना पहुंचे इसके लिए क्या करूं मैं वो गड्ढे में सो गए जैसे कि उनके शरीर के ऊपर में से ये बेलगाड़ी चली जाए अभी मां उसी समय मैंने दे देवान योग कहे कि मां की कृपा कहे वो उसी समय मां की नींद खुल गई और देखा वो त्रिगुणा तिता अनंद जी गड्ढे में सोए हुए और मां इमीडिएट पलक झमक ही समझ लिया मां ने कि क्या हो ये ऐसा क्यों कर रहे है तो एकदम वो नाराज होकर के डांटना शुरू कर दिया अरे ये क्या कर रहे हो तुमको मैंने देखो कि अपने मा संतान को जितनी मां की फिक्र है मां को इतनी ही संतान की फिक्र होगी वो बेलगाड़ी तो बड़ी हेवी होती है ना बेल का पहिया जद उनके शरीर के ऊपर से जाएगा शायद महाराज पहलवान है कुश्ती भी करते हैं एकदम दृढ बलिष्ठ भी है एक बार एक चोटी में गए थे ऐसे ही कहीं पर गांव की तो जितना खाना था सब खा लिया था उनका ऐसा था त्रिगुणा तिता अंद जी का कि जब खाएंगे तो इतना खाएंगे और नहीं खाएंगे तो बिना खाए भी कितने दिन निकाल देंगे तो एक चोटी में गए थे सब खाना खा लिया फिर वो वहां पर जाकर के उसके मालिक को पूछते हैं कि अच्छा बताओ तो कितना हुआ रुपया तो मालिक बड़ा हाथ जोड़ कर के कहता है कि महाराज जी आपको कुछ देने की जरूरत नहीं है किंतु फिर यहां पर खाना खाने के लिए मत आइएगा व सब खा लिया था उन्होंने तो ऐसे ही अभी ये जर्नी करते हैं तो फिजिकल एक्सर्शन भी होता है भात सब गिर गया तो अभी क्या करेंगे तो माने जो प्रैक्टिकल और फिर क्या है कि बात यह नहीं है कि लोगों का माके सब संगियोवेसे जमीन पर गिरा हुआ था तो ऊपर ऊपर से वो हांडी के टुकड़े से भात इकट्ठा कर लिया और एक दूसरे पात्र में लखा और फिर ठाकुर को उसमें से थोड़ा सा निवेदन करके मां बोल रही है आज के एमनी में पे छो शिगर शिगर खे नाओ बांगला में मां बोलती है आज यही मिला है आप आप आज आपको यही मिलने वाला है जल्दी जल्दी खा लीजिए और मैंने ऐसा करके वो ठाकुर को भोग दिया तो बाकी सब लोग हंसने लगे वो मतलब ये मां का एक मधुर भाव एक होता है ना बालिका जैसा कि देखिए कि एक सरलता भी है वो प्रैक्टिकल सेंस भी है फिर मां ने सबको बिठा दिया पात्र में वो जो ऊपर से भात कलेक्ट किया था सबको वो दे दिया तो मैंने वो उस समय का भी एक बात था आजकल जर्नी वो समय क्या था तीर्थ स्थान पर जाते हैं तो बात यह नहीं है कि आप मंदिर में जाकर के प्रणाम करते हैं जो यात्रा इट सेल्फ जो है ना वह अपने आप में एक साधना है आज क्या होता है हम हेलीकॉप्टर में बैठ कर के एक कैलाश मानसरोवर जाएंगे या तो फिर कार में बैठ कर के नर्मदा परिक्रमा कर लेंगे बस में बैठ कर के अभी तो यह पैकेज डीएल आता है चारधाम आपको करवा देंगे लग्जरी बस में या ऐसा वगैरह बैठ कर के तो वो ठीक है आप प्रणाम करते हैं सब कुछ करते हैं किंतु जो पहले का ट्रेडिशनल पूरा सोच समझ करके बनाया गया था कि आपको कष्ट करके जाना है रास्ते में और ईश्वर के ऊपर में निर्भर हो करर के जाना है अभी ऐसा नहीं है कि आप जही अभी कुछ जाना है कहीं पर तो वह ओला और उबर मंगवा दिया या तो फिर जहां पर भी जाएंगे आपको व होटल वगैरह सब कुछ मिल जाएगा सब कुछ ईश्वर के ऊपर में निर्भर है यदि मिला तो मिला नहीं मिला तो नहीं मिला अभी यह नर्मदा परिक्रमा भी पहले इस तरह से संपूर्ण रूप से भर हो कर के की जाती थी किंतु अभी है कि नर्मदा के किनारे देखेंगे कि हर दो-तीन किलोमीटर पर आपको एक ना एक कहीं आश्रम या धर्मशाला या तो कहीं पर आहार की व्यवस्था मिल ही जाएगी मैं खुद कुछ दिनों तक जिसको परिक्रमा नहीं कहते जिसको विचरण जैसा कुछ कहते हैं मैंने 1520 दिन चला था मैं नर्मदा के किनारे हमारे ओमकारेश्वर में सफेद कुटिया है वहां पर मैं एक महीना रुका था और फिर वहां से 15 दिन तक मैं चला था आ वहां पे 15 दिन के आसपास चला था तो मुझे 15 दिन कहीं प भी खाने का सोने का कोई भी चिंता मुझे नहीं हुआ क्योंकि हर आप जाएंगे दो-तीन किलोमीटर पर कुछ ना कुछ आपको मिल ही जाएगा साधु सेवा की व्यवस्था हो ही जाएगी खास करके ये जो गुजरात में ये जो मारवाड़ी कम्युनिटी है इन लोगों का बड़ा ही ये सब चीजों में दान देने का ये उन लोगों का ये है उनका तो बहुत सारी जगह पे आज उत्तराखंड में भी देखेंगे वो जो चोटी है जो साधु वहां पर जाकर के वो ये खाते हैं अन्न अन्न क्षेत्र जिनको कहते हैं जहां पर साधुओं को अन्न भिक्षा में मिलता है वह भी ज्यादातर देखेंगे कि यह मारवाड़ी लोगों ने ही वहां पर दान दिया होता है तो अभी आज के जमाने में ये यात्रा तपस्या नहीं रही अभी आज के जमाने में बाकी सब तपस्या हो गई है यह जो स्ट्रेस है टेंशन है मॉडर्न लाइफ का यह हमारे लिए तपस्या हो गई है शिवमयानंद जी महाराज मैं पीपीटीसी में जॉइन किया था बेलूर मठ में बेलूरमठ में नए आ हुए ब्रह्मचारी के लिए एक छोटा सा एक ट्रेनिंग सेंटर है दो ट्रेनिंग सेंटर एक छोटा ट्रेनिंग सेंटर एक बड़ा ट्रेनिंग सेंटर छोटे ट्रेनिंग सेंटर में जो लोग जवाइन करना चाहते हैं उनको वहां पर एध साल के लिए रखते हैं और बड़ा ट्रेनिंग सेंटर यानी कि वह तीन साल के बाद में ब्रह्मचारी लोग वहां पर जाते हैं दो साल का प्रॉपर ट्रेनिंग होता है दिन पूरा सुबह ओ वैसे छोटे वाले ट्रेनिंग सेंटर में भी व मतलब दोनों का रूटीन एक ही है टाइम टेबल एक ही जैसा है तो मैं वहां पर रहा था तो हम लोगों को जो जॉइन करने के लिए जाते हैं वहां पर हेड क्वार्टर में जीएस महाराज के साथ में नाइट क्लास होता है रात को आहार के बाद में जीएस महाराज खुद वहां पे वो एक एक पैसेज जैसा है एक छोटा सा एक कमरे जैसा है वहां पर जीएस महाराज भी बैठेंगे हम लोग जी हेड क्वार्टर में जितने साधु सन्यासी काम करेंगे वे लोग भी जाएंगे हम ब्रह्मचारी लोग भी जाएंगे और कोई एक किताब लेकर के पाठ होगा तो उस समय की जो बातें होती थी ना शिवमयानंद जी थे उस समय स्मरणा अंद जी जीएस थे श्रीक आनंद जी महाराज बैठते थे तो उन लोगों की बात मैं मतलब सुन कर के इतना अच्छा लगता था बांगला में बात होती थी मैं तो नया नया गया था तो बहुत सारा कुछ समझ में नहीं आता था बाद में किसी अपने मित्र को पूछ लेता था ब्रह्मचारी को क्या बोल रहे थे तो शिव मना जी महाराज एक थे वो हिंदी में बार-बार बीच-बीच में बात करते थे तो एक बार उन्होंने कहा था कि शिवमयानंद जी का तो तपस्या का भाव बड़ा था विचरण कर भ्रमण करना ऐसा उनका बड़ा उनको इस इस तरह की लाइफ स्टाइल के प्रति उनका बड़ा लगाव था तो एक बार वह कहीं के क्रिश्चियन मोनेस्ट्री में गए तो शिवमयानंद जी ने उनको पूछा कि व्हाट पिनस डू यू परफॉर्म माने किस तरह की तपस्या किस तरह की ऑस्टेरिटीज आप लोग करते हैं तो व एबोट था वहां का उसने कहा सोशल लाइफ माने साथ में रहना वही हमारी ऑस्टेरिटी है तो आजकल का जो युग है ऐसा नहीं है कि जिसको कहेंगे सफरिंग या तो ऑस्टेरिटी यह सब चला गया है इसका स्वरूप बदल गया है उस समय प्रकृति हमारे लिए एक चैलेंज थी आज साथ में रहना हमारे लिए एक चैलेंज हो गया है और ऐसा नहीं है कि मैं चाहूं कि मैं किसी के साथ ना रहूं थोड़ा सा अलग जाकर के आज के जमाने में पॉसिबल ही नहीं है आप देखिए कि कोई भी आप कोई आप कोई अपार्टमेंट में रहते होंगे या कोई सोसाइटी में रहते होंगे कहीं पर भी आप रहते होंगे इतना डेंसली पेक आजकल का अर्बन यह यह आर्किटेक्चर है तो मने यू कैन नॉट अवॉइड पीपल आपके घर के पीछे में वह कहीं पे कोई जोर-जोर से वह म्यूजिक लगा रहा है तो कहीं पर कुछ हो रहा है इस कंटीन्यूअस डिस्टरबेंस आपको होता ही रहेगा सबको एक दूसरे के साथ में एडजस्ट हो कर के रहना इतने क्लोज एन क्लोज स्पेस में बड़ा ही डिफिकल्ट है यह अमेरिका जैसे वहां पर देखेंगे कि पॉपुलेशन डेंसिटी का एक मेजरमेंट होता है कि पर किलोमीटर कितने लोग रहते हैं तो इंडिया इज वन ऑफ द डेंसेस्ट पॉपुलेशन डेंसिटी जिसको कहते हैं वन ऑफ द मोस्ट डेंसली पॉपुलेशन है पाकिस्तान है ये थाईलैंड है व चाइना का सी कोस्ट है एकदम डेंसली पॉपुलेशन यह जो सोशल लाइफ इट सेल्फ बिकम एन ऑस्टेरिटी तो उस समय का था कि वह नेचर एक चैलेंज था आज है कि पीपल आर चैलेंज अवर लिविंग टुगेदर इज अ चैलेंज तो यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि विशेषकर उन दिनों बहुत से लोग कामर पुकुर और उचा के मार्ग से पैदल चलकर चोटियों में विश्राम करते हुए बर्दवान पहुंचते थे और वहीं से रेलगाड़ी पकड़ते थे दो चार बरले धनी लोग ही पालकी आदि की सहायता ले सकते थे मां के लिए हमेशा जब भी पॉसिबल हुआ है पालकी की व्यवस्था की गई है और जैसे हम लोग विवरण में बार-बार पढ़ेंगे कि जयराम बाटी से कोवाल पाड़ा आने के समय मां और राधू पालकी में बैठे हैं और जद साथ में गोलाप मां है योगेन मां है शरत महाराज है तो यह लोग सब बेलगाड़ी में आ रहे हैं पालखी में क्या होता है कि इतना जर्क नहीं लगेगा कंपर ली स्मूथ जर्नी होगा सारे पथ में उस समय डाकुओं का भय था डाकुओं की दो बातें मां और ठाकुर दोनों के साथ में हो चुका है मां की घटना तो बड़ी फेमस है वो एक आदमी आधी रात को मां ने देखा य बागदी बागदी का भी एक सुंदर एक प्रसंग है एक तो मां ने उनको देख कर के कहा कि कि रात को जा रही थी बाकी सब लोग तो आगे चले गए थे मां अकेली रह गई थी थोड़ी बीमार भी थी मां तो एक काला लंबा चौड़ा एक आदमी पूरा डाकू जैसा दिखता हुआ तेलो भेलो के मैदान से जा रहे थे उस समय वो आकर के मां के सामने आया तो इमीडिएट मां का बालिका स्वरूप प्रकाशित हुआ और जैसे ही उस आदमी ने कहा के रे के जाचे कौन जा रहा है तो मां ने इमीडिएट कहा मैं आपकी बेटी हूं शारदा बाबा मैं आपकी बेटी हूं ऐसा बिल्कुल बाली का भाव मां में प्रकट हुआ था अभी देखिए कि इसका काउंटर पॉइंट जयराम बाटी में एक लड़का आया बागदी लड़का लड़का आकर के मां को बोल रहा है कि मां मुझे दीक्षा दीजिए अभी जयराम बाटी में वो जो कास्ट सिस्टम वगैरह वो रूढ़ी चुस्त इतना था वो ऑर्थोडॉक्सी कि मां ने कहा कि देखो कि मैं तुमको यहां पर दीक्षा दूंगी तो ये लोग सब क्या कहेंगे अच्छा एक काम करो तुम कोलकात्ता जाना कोलकाता आना में बाग बाजार में वहां पे उद्बोधन में तुमको दीक्षा दूंगी तो ये बागदी लड़का वो बड़ा चालाक था वो क्या कहता है समले एक जन बागदी के बाबा बोलते पली तु एकन तुम एकजन बागदी के बेटा बोलते पार ना समय जब आया था जब जरूरत थी एक बागदी को बाबा बोल दिया था किंतु आज तुम एक बागदी को अपना लड़का नहीं बना सकती मा सुन कर के पहले तो थोड़ी नाराज हो गई फिर कहा ठीक है चलो मैं तुमको दीक्षा दे तो वही व रास्ते में वो डाकुओं का भई तो रहता ही था ठाकुर का था कि रास्ते से जा रहे थे पालखी में बैठ कर के और डाकू जैसे लोग वहां पर चारों ओर आ गए तो ठाकुर ने वो हनुमान हनुमान दुर्गा दुर्गा काली काली सबका नाम लेना शुरू कर दिया जे खाट मने जो काम करें तो वो रास्ता डाकुओं से भरपूर तो था ही इसी रास्ते से चीजें बेलगाड़ी से दूसरे ग्रामों की ओर भेजी जाती थी उ चालन बर्दवान से लगभग 16 मील है और कामर पुकुर से भी उतना ही है एक दूसरा रास्ता कमार पुकुर से जहानाबाद या आरामबाग होते हुए तेलो भेलो के मैदान पार करके तारकेश्वर तक गया है इस रास्ते से कलकत्ते की दूरी कम होने पर भी यह रास्ता अधिक भयानक था पता है हमको कि भयानक था बंगाल नागपुर रेलवे लाइन के खुल जाने के बाद बहुतेरे लोग विष्णुपुर के रास्ते से ही जाया करते हैं यह विष्णुपुर वहां पर अ मां के जीवन की जितनी भी स्मृति कथाएं हैं मां के साथ में ये भक्तों का मिलना हुआ यह सब तो ठाकुर ठाकुर की महासमाधि स्वामी जी की महासमाधि के बाद की ही सब घटनाएं हैं ये 1903 च पा जब मां रेगुलर कोलकात्ता आना शुरू हुई और मां के त्यागी संतान मां के साथ में मां के भक्त मां के साथ में जाते थे जयराम बाटी तो सब समय ये विष्णुपुर का वर्णन है आरामबाग विष्णुपुर रेल में जाएंगे फिर वहां से क्वाल पाड़ा जाएंगे और क्वाल पाड़ा से केदार बाबू उनको जयराम बाटी जाने की व्यवस्था कर देंगे ऐसा वर्णन हम लोग बार-बार सुनते हैं यानी कि यह जो हमारी स्मृति कथाएं हमारी किताब पढ़ते हैं उनके लिए यह सब बड़े ही परिचित स्थान है भले ही चाहे हम लोग वहां पर गए ना हो मैं भी गया हूं ऐसे एक दो बार किंतु ऐसा कोई ज्यादा वहां पर रहने का हुआ नहीं है किंतु पढ़ कर के हम लोग सभी परिचित है जैसे कि अपने खुद के घर है वहां पे ऐसा अपनापन यह सब नाम को सुन कर के हमको लगता है कलकत्ते के लोग विष्णुपुर तक रेलगाड़ी में आकर वहां से मोटर बस की सवारी कर कोतुलपुर क्वाल पाड़ा तथा देस होते हुए जयराम बाटी जाते हैं यह मोटर बस की सवारी यह तो 1960 के आसपास की बात है जबकि यह सब फैसिलिटी थी मां की स्मृति कथाएं पढ़ने से पता चलेगा कि वहां विष्णु जैसे ही मां जाने वाली है क्वाल पाड़ा में केदार बाबू को पता वो लेटर में लिख देते थे शरद महाराज या तो कोई भी वहां से फिर ये जब ट्रेन में बैठ कर के विष्णुपुर जाएंगे फिर वहां से बेलगाड़ी वहां लपाड़ा आश्रम से भेज देते थे फिर बेलगाड़ी में या तो बेलगाड़ी में शायद वो बैठ कर के क्वाल पाड़ आएंगे क्वाल पाड़ा से पालखी में और बेलगाड़ी में ऐसा व्यवस्था करके उनको वहां पर पहुंचाया जाएगा जयराम बाटी कोई कोई तो बर्दवान तक रेलगाड़ी में जाकर मोटर बस से आरामबाग पहुंचते हैं और वहां से बेलगाड़ी में या पैदल कमार कुकुर होते हुए जयराम बाटी चले जाते हैं सिवाय इसके छोटी लाइन की गाड़ी में चापा डांगावास में वर्षा के समय बेलगाड़ी से आरामबाग जाया जा सकता है आरामबाग से जयराम बाटी लगभग 11 मिल है आधुनिक सभ्यता के केंद्र स्थल से विछिया बाटी में किसी भी समय आनंद उत्सव का अभाव नहीं रहा साल भर यहां बहुतेरे उत्सव मनाए जाते हैं फिर शरद ऋतु में श्री सिंहवाहिनी के मंदिर में तीन दिन तक बड़ी धूम के साथ पूजा भोग आदि होता है उस समय ग्रामवासी मतवाले हो जाते हैं श्री राधाष्टमी तथा श्री श्यामा पूजा में वे आनंद उत्सव कीर्तन आदि करते हैं शिवरात्रि के दिन वे शिहोर जाकर श्री शांतिनाथ की पूजा करते हैं और सामयिक शैव सन्यासी बनकर व्रत उपवास करते हैं वैशाख जेठ के महीने में आज भी श्री शीतला देवी की पूजा धूमधाम से प्रचलित है समृद्ध शली घरों में आज भी विशेष अवसरों पर आठों प्रहर कीर्तन पौराणिक अभिनय आदि हुआ करते हैं अभिनय में शामिल होने के लिए बगल में चटाई लिए हुए और आंचल में लाई बांधे एक गांव से दूसरे गांव में जाने की प्रथा आज भी प्रचलित है सबसे बड़ी बात तो यह है कि जयराम बाटी मां शारदा मणि देवी को अपने अंक में धारण कर वर्तमान युग के सर्वश्रेष्ठ शक्ति पीठ के रूप में परिणत हुआ है उनके जन्मस्थान के ऊपर ईंटों का एक मंदिर बना हुआ है जो शुभ्र शिखर वाला है उसकी चोटी पर मां नाम से अंकित धातु निर्मित एक पताका है जो दूर दूर के पथ कों को श्री मां का स्मरण कराती है और देश विदेश के प्रणाम को खींच लोगों के आने जाने की सुविधा हो जाने से तथा रामकृष्ण मठ मिशन के केंद्र की स्थापना और उस केंद्र के जरिए से विविध सेवा विविध सेवा अष्ठा होने के फलस्वरूप जन समाज की दृष्टि उत्तरोत्तर इन इस पुनीत पीठ के प्रति आकृष्ट होती जा रही है और साथ ही साथ ही साथ ग्राम की भी उन्नति हो रही है मंदिर के प्रतिष्ठा दिवस अक्षय तृतीया के अवसर पर मां की चरण रज से पवित्र इस भूमि पर लौटने के लिए प्रतिवर्ष बहुत से भक्तों का समागम होता है मां की जननी द्वारा प्रारंभ की गई जगद धात्री पूजा भी प्रतिवर्ष यहां बड़े समारोह से मनाई जाती है जगदंबा की यह एक अपूर्व महिमा है कि नगण्य जयराम वाटी उनके पाद पद्म से पाद पद्म के स्पर्श से आज पुण्य तीर्थ में परि होकर अपने गौरव की सर्वत्र घोषणा कर रहा है श्री माने स्वयं एक दिन इस भूमि की धूली अपने मस्तक पर धारण करके कहा था जननी जन्मभूमि च स स्वर्गादपि गरीयसी अभी दूसरा चैप्टर है आविर्भाव तो इसको हम कल से प्रारंभ करेंगे आज तक ओम शा शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु