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ओ स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः तो फिर कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर तो कोलकाता चले गए दक्षिणेश्वर और मां आ गई जयराम बाटी किंतु मां के हृदय में ठाकुर के साथ में जो संपर्क का एक सूत्र जो बन चुका था वह अभी कटने वाला नहीं है तो वही जैसे गंभीरानंद जी महाराज यह जो चैप्टर में लिखते हैं देवीर बोधन इस चैप्टर का नाम है अर्थात कि देवी का जागरण तो इस चैप्टर में जैसे शुरुआत में ही गंभीरानंद जी महाराज ने लिखा है कि वही जनक जननी है वही बंधु बांधव भगी सब है वही गांव है वही कार्य जो चल रहा था वही चल रहा है किंतु मां का हृदय बंधा पड़ा हुआ है ठाकुर के श्री चरणों में सब समय ठाकुर की ही बात उनके मन में व जागृत है तो अभी यहां पर इस गांव में रहना उनके लिए एक बहुत बड़ी एक एक क्या कहेंगे तपस्या बन गया था तो अभी देखिए और लोगों को भी क्या है कि लोगों को भी तो मजा आता है है इस तरह की बातें करने में कि अच्छा मैंने श्यामर मेर पागला बर पागला जमार संगे बे कोरे छ बे हुए से अर्थात कि यह श्यामा सुंदरी देवी की लड़की का पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है तो ऐसी बातें करने वालों की भी कमी नहीं थी तो अभी यहां से बात आगे बढ़ती है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि जब मां सब लोगों की बातों से त्रस्त हो जाती थी मां जब लोगों के यह सब ताने सुन कर के और सहानुभूति के रूप में लोग कष्ट पहुंचाना चाहते हैं जानबूझ कर के वैसे तो मुंह पर सहानुभूति के शब्द है किंतु इंटेंशन रहता है दूसरों के मन को क्षति पहुंचाना तो ऐसे लोग भी आकर के मां के झुठ मूठ की सहानुभूति के रूप में कहते हैं कि अच्छा पागल विवाह पागल के साथ में विवाह हुआ है तो क्या हुआ उसको भूल जाओ अपना जीवन यहीं पर रख जी कर के करो अभी और तो कोई उपाय नहीं है तो इस तरह के टानेनबाउम मां को हमेशा वहां पर जतन से यह भानु पीसी रखा करती थी और भानु पीसी ने ठाकुर को सही सही पहचाना था तो किस तरह से इसका वर्णन अभी गंभीरानंद जी महाराज एक पैराग्राफ में करते हैं कि भानु पसी का कौन थी और कैसे उन्होंने ठाकुर को पहचाना था तो गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं शुद्ध स्वभाव भानु पसीर एकटा अंतर दृष्टि छलो शुद्ध स्वभाव भानु पीसी अर्थात की मासी मोसी तो मैं पीसी शब्द ही यूज करूंगा मोसी की वजह व बेस्ट क्योंकि यह कल्चरल एप्रोप्रियेट दृष्टि के प्रभाव से इन्होंने श्री रामकृष्ण देव के सही स्वभाव को सही नेचर को पहचाना था और पहचान करके श्यामा सुंदरी देवी को कहा था बहु ठाकर तोमार जामा शिव साक्षात कृष्णा अर्थात की बहु ठाकर अर्थात की यह सम्मान के रूप में यह ठाकर शब्द व कहा जाता है ठाकुर पुल्लिंग है और ठाकर है स्त्रीलिंग तो किसी भी सम्मान देने के लिए हम यहां पर जैसे गुजरात में दादा शब्द व्यवहार करते हैं या ऐसा कुछ तो वैसे ही यहां पर किसी स्त्री है बड़ी उम्र की है और उनको सम्मान देना है तो ठाकुर शब्द यूज करते हैं तो भानु पसी कहते हैं कि बहु ठाकर तोमार जमाई शिव तुम्हारा जमाई शिव है साक्षात कृष्णा है एक जा विश्वास करते पार छो ना रे पार बे बोले राक्षी अभी विश्वास नहीं कर पा रही हो बाद में विश्वास हो जाएगा कह कर के रखती हूं और बाद में विश्वास हुआ भी था एक बार यही श्यामा सुंदरी कहती थी ठाकुर ने यह प्रसंग है एक बार श्यामा सुंदरी देवी ने कहा कि मेरी बच्ची शारदा को कोई मां बोलक के पुकारने वाला भी कोई नहीं मिलेगा बेचारी शारदा मां की पुकार भी नहीं सुन पाएगी यह बात सुनक के ठाकुर ने कहा था कि आप चिंता मत कीजिए एक ऐसा समय आएगा कि इतने लोग मां मां पुकार करके इकट्ठा हो जाएंगे कि बेचारी मां शारदा परेशान हो जाएगी और यह बात सही में सत हुई कि मैंने ऐसे सब पागल एक एक मने कुछ कुछ प्रसंग है इस तरह से उद्बोधन में उद्बोधन में ही शायद किसी ने प्रणाम करने के लिए गया तो अभी क्या है उद्बोधन में तो पहले से ही मां का नियम जो था कि जब ये बाद की बात ठाकुर की महासमाधि के बाद की बात है तो जब मां को प्रणाम करने के लिए लंबी लाइन लगती थी और सबको ऐसा था कि मां अपना घुटा टान कर के व खड़ी बैठेगी और पास में गोलाप मां खड़ी रहेगी और कोई भी कोई भी गड़बड़ नहीं करेगा देखेगी तो अभी गोलाप मां को थोड़ा इधर-उधर कुछ जाना हुआ तो एक भक्त आया मां को प्रणाम करने के समय अपना सर जो है जोर से मां के पैर के ऊपर में पटका तो अभी कोई सर पटके ग के ऊपर में तो थोड़ा तो दर्द होगा तो मां उ करके चिल्ला उठी तो जैसे ही ऐसा मां की आवाज सुनी गोलाप मा दौड़ी आई वोने देखा कि उसने मां के सर पर इस तरह से पैर पर सर पटका है तो वो चिल्ला उठी कि अरे पागल ऐसा क्यों किया तो वोह भक्त क्या कहता है पता है कि य तो इतने सारे भक्त आते हैं तो मां तो मुझे याद नहीं रख पाएगी तो मां को मैंने इस तरह से उनके पैरों में थोड़ा दर्द देकर के जाता हूं जब तक दर्द रहेगा मां मुझे याद रखेगी ऐसे पागल भी आते थे मां के पास में तो ठाकुर की बात बिल्कुल ठीक कि मां मां बोलकर के ऐसे पागल भी इकट्ठा हो जाते थे तो अभी देखिए भानु पसी जो ठीक कहती है कि श्यामा सुंदरी देवी को कि तुम्हारा जमाई है वह शिव है साक्षात कृष्णा है अभी तुमको नहीं समझ में आ रहा किंतु एक समय आएगा सब समझ में आ जाएगा विवाह पर द्वितीयो बार जयराम बटी आशिया ठाकुर जखन श्री मा शहीद जोड़े जान विवाह के बाद में जब ठाकुर फिर से जयराम बाटी आए थे और फिर मां के साथ में जोड़े जाना माने य एक प्रथा है साथ में दोनों मिलकर के कामर पुकुर जा रहे थे तो खन रोशिका भानु पीशी हर गौरी र कथा स्मरण कररिया गान धरिया लेन उस समय यह भानु पीसी जिसका एक रसिक स्वभाव था हर गौरी की बात को याद करके एक गाना गा रहे क्या गाना गाई नात नहीं तई जेमन सुरूपा तोर बर जुटे छ नेंटा खेपा नात नहीं अर्थात की भगिनी तुम पोती पोती तुम जितनी सुरूपा हो तुम जितनी सुंदर हो इतना ही तुम्हारा वर मिला है नेंटा खेपा नंगा और पागल मने ये हर और गौरी की बात शिव का में रहते थे व कहां पर व सब चीता जल रही है साप घूम रहे हैं साप भगवान शिव के गले में बैठ गए हैं सब अपना घर बना कर के भूत पिशाच नृत्य कर रहे हैं और वह देखिए कि गौरी माने उतनी सुंदर सुरूपा राजा की लड़की तो देखिए कि यह जो जैसे ही शिव और गौरी का जैसे शिव और गौरी की कहानी वैसे ही यहां पर ठाकुर और मां तो महाराज जी क्या लिख खते हैं पता है कि देखिए मने राखी ते होई बे जे मायर शरीर तखन भलो छलो यह याद रखना है कि मां का शरीर उस समय सुंदर था अभी हम यह जो मां का फोटो देखते हैं सब मां तो वृद्ध हो चुकी है तो हमको मां को देख कर के अपनी ही मां याद आती है किंतु यह तो मां के बचपन की बात है मां के यवन की बात है इसलिए महाराज जी लिखते हैं कि जो भानु पीसी कह रही है गलत नहीं है मां का शरीर सुंदर था एवं वर्ण छलो उज्जवल और वर्ण अर्थात की शरीर का रंग वो भी उज्जवल था सफेद सुंदर था भानु पीशी से आदिम काली ठाकुर और श्री माके हरगौरी रूपे चीनी ते पारी लेओ तिनी भाव प्रोना लेन बलिया लोके तहर कथा श्याओ शनी तोरा भानु पीसी को उसी समय पता था कि ठाकुर और मां हर और गौरी यह उन्हीं के प्रतीक स्वरूप है वही पृथ्वी पर फिर से शरीर धारण करके आए हैं किंतु भानु पीसी के बारे में ऐसी बात चलती थी कि वह थोड़ी भाव प्रवण है भाव प्रवण अर्थात कि जो भाव में आ जाती है अर्थात कि जद इसका हिंदी करेंगे तो लागण प्रवण है जो कि बीच-बीच में इमोशनल हो जाती है हम लोगों के सभी इस तरह के कोई ना कोई रिलेटिव होते हैं वैसे दो तरह के हमको देखने को मिल जाएंगे एक लोग होते हैं मैच्योर होते हैं प्रैक्टिकल होते हैं कोई भी काम दो संसार का कोई भी काम है कोई भी सलाह लेनी है तो आप ऐसे प्रैक्टिकल लोगों के पास में जाएंगे और उनको पूछेंगे कि अच्छा यह अभी इसकी शादी करवानी है तो यह जो दो-तीन पात्र है उसमें से आपको कौन सा अच्छा लग रहा है तो ये जो प्रैक्टिकल लोग होते हैं जो लोग मैच्योर होते हैं आपको बड़ा ही सुंदर एडवाइस देंगे और हमारे ही रिलेशन में देखेंगे कि ऐसे कुछ इमोशनल लोग होते हैं बिल्कुल इंप्रैक्टिकल काम में किसी भी काम में हाथ लगाएंगे तो पता नहीं किस तरह का कुछ गड़बड़ कर देंगे और इनको कोई भी किसी बात की सलाह में पूछेगा नहीं कोई पूछेगा नहीं क्या इच्छ इंपोर्टेंट काम करना है तो आपका क्या मत है तो ऐसे लोगों को इमोशनल बोलते हैं ओवर इमोशनल अनस्टेबल अनपैक्ड ऐसे हमारे ही रिलेशन में हमेशा आपको ऐसे कोई ना कोई देखने को मिल जाएंगे तो भानु पीसी के बारे में भी ऐसा कहा जाता था बड़े ही अच्छे शब्दों में कहा है महाराज जी ने भाव प्रवण या तो फिर लागण प्रवण या तो फिर इमोशनल किंतु ये अच्छे शब्द का लोग किस तरह से अपने मन में सोचते हैं हमको पता है देखा भी है हमने इंप्रैक्टिकल लोग बोलेंगे बोलेंगे उसको तो कोई सेंस ही नहीं है बोलेंगे इमेच्योर है तो अभी यह भानु पीसी को इस तरह से लेबल लग चुका था तो वो बेचारी जब बोलेगी कि ये तो हर गौरी स्वयं फिर से पृथ्वी पर आ गए हैं तो थोड़ी ना कोई सुनने वाला है तो ठाकुर ठाकुर ने भी कहा था लोके हमार मां के हाड़ो बोलतो अरे चंद्रा मणि देवी अपने पेट में कुछ रख नहीं पाती थी जो भी बात होगी सरल रूप से सबको बोल देगी तो इसलिए य हाड़ो शब्द ठाकुर ने खुद कहा है कि मां लोग मेरी मां को ऐसा कहते थे अर्थात कि एक सिंपल स्वभाव जो सिंपल टन कहते हैं ना थोड़ा सा मूर्ख तो नहीं किंतु जिसका जिनका दिमाग जो होता है बड़ा ही मने विकसित नहीं हुआ अविकसित ऐसा तो ऐसे ही चंद्रमणि देवी को भी ठाकुर ने खुद कहा था लोग मेरी मां को ऐसा कहते थे किंतु देखिए कि इस तरह से इंप्रैक्टिकल नासे इमोशनल और जो सरल स्वभाव है जिनके पेट में कोई कपट नहीं है जो कोई इस तरह से दाव पेच प्रपंच नहीं करते हैं यही लोग ईश्वर के इतने करीब है तो वो हमको कभी-कभी लगता है कि लोग जितना प्रैक्टिकल होते हैं जितना कार्य दक्ष होते हैं उतना ही वे लोग व क्या कहेंगे कि ज्यादा मतलब यूजफुल होता है किंतु ऐसा नहीं य ईश्वर रूपी य जो जगत है ना वह पूरा एक डिफरेंट जगत है वहां पर प्रवेश करने के लिए मन के भीतर में जो कोई भी अंकट बंकट है वह सब आपको दरवाजे के ऊपर में छोड़ कर के भीतर जाना है तभी हमारे लिए दरवाजा खुलता है हां स्वामी जी एक बात ऐसे है कि जिन्होंने यह ये इंप्रैक्टिलिटी ठाकुर की इंप्रैक्टिलिटी को यह अमेरिका की प्रैक्टिक काटी के साथ में उन्होंने य कॉमिनेशन किया है इसलिए देखिए कि हमारे संघ के जो साधु है माने जो श्रेष्ठ साधु है मेरे जैसे की बात नहीं कर रहा जैसे गंभीरानंद जी महाराज ये जैसे या तो फिर रंगनाथ आनंद जी महाराज है आत्मस्थानंद जी महाराज है भूतेशानंद जी महाराज है इन लोगों में दोनों गुण इतने इक्वली डेवलप हुए हमको दिखते हैं यह लोग जितने इमोशनल थे इतने ही प्रैक्टिकल थे रंग नाथा आनंद जी के बारे में तो मैं पूछना ही नहीं है मैंने वो वो अमेरिका जाते थे वो प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे अभी अमेरिका के जो जर्नलिस्ट है वो तो पता है ना वो लोगों तो मौका खोज करके ही बैठते हैं कि कब किसको खा जाते हैं कब इसको कोई ना कोई स्कैंडल बाहर निकालते हैं कब इसको कोई प्रॉब्लम में डाल देते हैं तो प्रश्न भी ऐसे उटपटांग करेंगे और महाराज जी ऐसा फटफट करके उत्तर भी देंगे किंतु साथ-साथ में ही ऐसा रंगनाथ आनंद जी के बारे में कहा जाता था कि वो मंदिर में नहीं जाते क्यों क्योंकि स्वामी जी का भाव से भरे हुए अद्वैत वेदांत के भाव से भरे हुए हैं प्रवचन देना ज्ञान स्वाध्याय यही सब उनके भीतर में है तो भक्ति उनमें ज्यादा नहीं है इसलिए मंदिर में नहीं जाते तो किसी ने उनके सेवक को यह बात पूछी कि क्या यह बात सही है कि अब ये लोग ऐसा नहीं है कि रंगनाथ आनंद जी मंदिर में नहीं जाते किंतु ये लोग बोलने वाले तो 10 मुंह से बोलते हैं तो ऐसा ही किसी ने साहस करके रंग नाथा आनंद जी के सेवक महाराज को पूछ लिया कि हां हमने सुना है कि महाराज जी मंदिर में नहीं जाते क्या यह बात सही है वो इतने पक्के वेदांत ती है कि वह भक्ति और यह सब कुछ छोड़ ही दिया है तो सेवक महाराज क्या कहते हैं पता है कि हम लोग जानबूझ कर के उनको मंदिर में नहीं ले जाते क्यों कि महाराज जी का समय तो बड़ा ही कीमती है 10 लोग अपॉइंटमेंट दिए हुए हैं 10 लोग वहां पर वेट कर रहे हैं और महाराज का प्रॉब्लम यह है मंदिर में ले जाने से कि एक बार मंदिर में जाकर के हाथ जोड़ कर के खड़े रह गए ठाकुर के मेन टेंपल में या तो मां के समाधि मंदिर में तो फिर वहां से जाना ही नहीं चाहेंगे बस वो खड़े ही रहेंगे पड़े ही रहेंगे उनके भीतर में प्रार्थना उनके भीतर में यह उनके प्रति यह जो शरणागति वो ऐसा उसका प्रवाह बहना शुरू हो जाएगा कि महाराज वहां से लेंगे ही नहीं महाराज को बार-बार रिमाइंड करना पड़ेगा अरे महाराज चलिए वापस वे लोग हमारा इंतजार कर रहे हैं या तो इनको अपॉइंटमेंट दी है या तो वो वहां प यह काम पड़ा है प्रेसिडेंट रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट होना यानी आपका एक एक क्षण आपका आपका नहीं है वो संघ का हो जाता है एकएक क्षण यूटिलाइज करना पड़ता है तो किंतु महाराज ऐसे डूब जाते थे भक्ति में और शरणागति में मंदिर में से जाएंगे ही नहीं तो इसलिए सेवक महाराज कहते हैं हम लोगों को बड़ा डर लगता था महाराज को मंदिर में ले जाने के लिए एक बार गए तो फिर वापस ही नहीं आएंगे तो यह रामकृष्ण संघ आज का जो संघ है हमने यह जो ट्रेडिशनल की ट्रेडिशनल कर्म की योग की सभी ट्रेडीशन का संगम अपने संग में है ये हमारी साधन प्रणाली यदि आपने हमारा लोगो देखा होगा तो एक सर्पाकार कुंडलिनी एक है अर्थात कि राजयोग का प्रतीक फिर वह सूर्योदय हो रहा है ज्ञान योग का प्रतीक फिर यह जो ये जो समुंदर की लहरें हैं कर्म योग का प्रतीक और उसके ऊपर में कमल खिला है भक्ति योग का प्रतीक और इसके ऊपर में यह हंस तैर रहा है परमहंस रूपी यह चारों साधना से ईश्वर को प्राप्त करने वाली हमारी आत्मन तो यह अपना लोगो य एकदम अभी ये जो जितनी भी डिफरेंट डिफरेंट ट्रेडिशनल संगम ये यहां पे है तो इसीलिए अभी भानु पीसी का ऐसा था कि व स्वामी जी को सुना नहीं था अभी उन्होंने उनको मौका नहीं मिला था स्वामी जी को सुनने का तो वो बेचारी वो जो इमोशनल रास्ता वो जो अपना पथ है भक्ति का उसी को लेकर रहती थी और इसीलिए वह बेचारी जो कहती थी और कोई उनको सुनता नहीं था किंतु ए भावे आत्म गोपन के आत्म खार अ द्वितीय स्ट्रो कोरिया चिरो काल काटते पारे ना आत्म गोपन को आत्मरक्षा करना हमेशा से संभव नहीं होगा मां हमेशा अपने को छुपा करके रखती थी क्यों क्योंकि जैसे ही दूसरों के सामने जाएगी लोग सहानुभूति के के रूप में मां को कष्ट देने के लिए वही ठाकुर की बात निकालेंगे और कहेंगे कि अच्छा अभी तो कोलकाता से एक लेटेस्ट न्यूज आया है ठाकुर हलधार ठाकुर का वो जो ये था ना अंकल तो हलधार ने एक बार देख लिया कि हलधार भी वहां पर पूजा करने के लिए काली मंदिर में रह रहा था तो उसने एक बार देख लिया ठाकुर दिगंबर होकर के पेड़ की डाल के ऊपर में बैठे हैं और वहां से वो पेशाब कर रहा हैं तो जैसे ही देखा वो ये क्या पागलपन कर रहा है तो जैसे ही अभी दक्षिणेश्वर से कोई कामर पुकुर ये तो उस गांव के आसपास में आएगा तो ठाकुर के ये जो सब नए-नए जो ब्रेकिंग न्यूज है वो लेकर के आएगा कि अच्छा अभी तो वो जो गदाई है वहां पर गदाधर उसने यह ऐसा नया कांड किया है य ऐसा नया नाटक किया है तो यह लोग भी जैसे ही मां शारदा जैसे उनको रास्ते में मिलेगी या तो फिर वो अमोदर नदी के किनारे पर मिलेगी या तो फिर यह किसी तालाब के किनारे मिलेगी तो वैसे ही वह उनको जाकर के बोलेंगे अच्छा सुना यह हमने लेटेस्ट न्यूज सुना है उसके बारे में इसलिए मां अपने को छुपा करके रखती थी किंतु महाराज क्या कहते हैं आत्म गोपन आत्म गोपन आत्मरक्षा का साधन नहीं हो सकता आप कहीं पर भी जाएंगे यह बातें तो आपका पीछा करेंगे ही करेंगी अवश्य इहा सतो श्री रामकृष्ण संबंध जे टुक कथा काने आश पड़ी तो तहा तिनी सुनीले ओ विश्वास परते ना किंतु यह बात भी सत्य है कि ठाकुर के बारे में जो कोई भी बातें मां को सुनाई देने में आती थी मां विश्वास नहीं करती थी क्योंकि मां को बेचारी को पता नहीं था कि ज्यादातर बातें सत्य है क्योंकि देखिए कि यह जो ठाकुर जो कुछ भी करते थे वह तो बिल्कुल अनयूजुअल था इस मामले में में तो कोई प्रश्न ही नहीं है हां इसका इंटरप्रिटेशन जो लोग लगाते थे वो गलत था अभी आप मां काली के पुजारी है मां को देने के लिए जो नैवेद्य आया है वो मां को नहीं देकर के अपने से यदि ग्रहण कर लेंगे मां को शयन करने के लिए जो मां का जो बिस्तर बनाया गया है उसके ऊपर में मां को शयन करवाने के साथ-साथ में अपने खुद पुजारी जद स्वयन शयन करना शुरू कर देगा तो यह सब तो लोग देख कर के तो बात तो करेंगे ही कि भाई यह किस तरह की भक्ति है यह किस तरह की पूजा कर रहे हैं यह पुजारी महाराज तो मां को भोग में देने के लिए पूरी बनी है तो एक बिल्ली आई तो बिल्ली भी तो मां काली का ही एक स्वरूप है उसके भीतर में भी तो मां काली है बोलकर के वो जो मां को बनाने वाली जो पूरी है वो बिल्ली को खिला दी तो यह सब जब नाटक चलेगा तो निश्चय लोग बात करेंगे अभी मां बेचारी सोचती है कि ठाकुर ऐसा कैसे करेंगे कि ठाकुर ऐसा ऐसा करते थे वही बात है कि लोगों का जो इंटरप्रिटेशन था वो गलत था ठाकुर पागल थे इसलिए ऐसा नहीं करते थे ठाकुर सभी चीजों के भीतर में मां काली को लक्ष्य करते थे मां काली का दर्शन करते थे इसलिए ऐसा करते थे अपने खुद के भीतर में मां काली का वो वो जो उनका जागरण है मां काली की अवस्थिति है वह अनुभूत करते थे इसलिए ऐसा करते थे तो बेचारी मां जब दक्षिणेश्वर जाएगी वो बेचारी को इतने के बाद एक शौक लगने वाले हैं शुरू शुरू में ठाकुर के साथ में एक ही कमरे में सोया करती थी तो ठाकुर ने कहा कि मेरे साथ में ही सोना तो अभी किंतु ठाकुर को तो रात को तो पता है कि वोह बिल्कुल भाव में आ जाएंगे और फिर वह एकदम जड़ की तरह बैठ जाएंगे कभी कभी मां के मां काली के साथ में बातें करेंगे तो अभी यह सब देख कर के तो गांव की सरला बालिका बेचारी मां शारदा वो तो देखेगी वो तो चिल्लाएगी कि अरे ये तो ठाकुर को क्या हो गया शरीर ऐसा जड़ हो जाता था कि लगेगा कि उनका देह त्याग हो गया है आधी रात को मां शारदा चिल्लाना शुरू कर देगी वो अरे अरे इनका शरीर गया क्या हो गया तब कहीं वो हृदय दौड़ कर के आएगा देखेगा कि ठाकुर को कई उनका शरीर त्याग नहीं हो गया वोह तो समाधि में चले गए फिर सब मिलकर के कोई ईश्वर का नाम सुनाएंगे तो ठाकुर को फिर से वो होश आएगा तो इस तरह से ऐसी तो कितनी ही घटना वो घटनी थी तो बाद में ठाकुर ने कहा कि मेरे साथ में सोने से तुमको रात को नींद नहीं आती तो एक काम करो नबत में चली जाओ वहां व चंद्रा मणि देवी भी उस समय वहां पर रह रही थी तो वहां पर जाकर के रहना तो मां बेचारी अभी तो सोचती है कि ठाकुर यह सब कहां से करने वाले जो कुछ भी मैं सुनती हूं किंतु सही सही ठाकुर यह सब करते थे 90 पर तो सही होगा ही फिर 10 पर लोग मसाला डाल देते हैं प्रेम घन मूर्ति जहार पूतो सानिध तिनी एक किछु दिन पूर्वे अनिर्वचनीय आनंदे बा बाते चले वही प्रेम घन जिसके पूत सानिध्य में अर्थात की पवित्र सानिध्य में पवित्र संग में यही कुछ दिन पूर्वे कुछ दिन पहले मां अनिर्वचनीय आनंद में तैरती थी भाते लेन अर्थात की तैरती थी अनिर्वचनीय इतना आनंद कि जिसको आप शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते हैं अनिर्वचनीय आनंद में तैरती थी जहार दिवो आवेश तहा तेओ संक्रम तो होया अनुन भूत उल्लास संचार करिया छलो जिनका दिव्य आवेश उनके मां के खुद के भीतर में संचारित होकर के प्रसारित होकर के एक ऐसा उल्लास अन अनुभूत अन अनुभूत जिसको कि पहले अनुभूत नहीं हुआ है इस तरह का उल्लास जिनके हृदय में संचारित हुआ था जहार पर हितो चिंता दर्शने तीनी चमत्कृत होया छले जिसकी परहित चिंता दूसरों के बारे में ठाकुर जो इतनी चिंता करते हैं दूसरों के बारे में ठाकुर की इतनी सहानुभूति है करण करुणा है यह देख कर के जो चमत्कृत हुई थी मां जहार ज्ञानो गर्भ उपदेश और हास्य कौतुक सकल के मंत्र मुग्ध तो होष उन्नो राज्य लया जाई तो जिसका ज्ञान गर्भ उपदेश ऐसा उपदेश जिसमें ज्ञान ठास ठास करके भरा हुआ है ऊपर से लगता है कि अरे ठाकुर ने इतनी सरल बात कर दी किंतु उसी बात को अब जितना दोहराएंगे अपने मन के भीतर में जितना उसके ऊपर में चिंतन करेंगे उस उतना ही उसके मल्टीपल एस्पेक्ट विभिन्न विभिन्न आयाम ओपन होते जाएंगे अपने जीवन के सभी क् क्त्र में वही एक उपदेश हमको कार्यरत होता है ऐसा महसूस होगा तो वह जिनका कि ज्ञान गर्भ उपदेश व हास्य कौतुक माने जो ज्ञान गर्भ उपदेश देते थे ऐसा नहीं जो भी हास्य और कौतुक से हरे भरे हैं वैसे ठाकुर जो कि जिन्होंने सभी को मंत्र मुग्ध वत अन्य राज्य में ले जाते थे ऐसी बातें करेंगे जिसमें कि ज्ञान भरा हुआ है और ऐसी बातें करेंगे जो कि हस कौतुक से बरी है और बातें करते करते आप अपना सब कुछ विस्मृत हो जाएंगे दूसरे राज्य में चले जाएंगे बा दीर्घ काल निजो शोका से बसाया राखी तो जो कि दूसरे राज्य में ले जाती थी या तो फिर लंबे समय तक अपने पास में बिठा के रखती थी ऐसी बातें करने वाला तीनी पागल इहा एकांतो अ विश्वास वह पागल है यह बात बिल बकल ही अविश्वास निय है देखिए यहां पर महाराज ने एक ही सेंटेंस में कितना सब कुछ बताया है प्रेम घनो मूर्ति अर्थात कि यह देखिए कि ठाकुर के पास में यह त्यागी संतानों की बात जो कि बात बात में लिपिबद्ध हुई है सभी लोग कहते थे कि ठाकुर ने अभी यह बाबूराम महाराज ही देखिए बाबूराम महाराज के बारे में कहा जाता है उनका नाम ही है प्रेमानंद ठाकुर का प्रेम स्वरूप जिनके भीतर में आवे हुआ है जिस प्रेम स्वरूप का ठाकुर के प्रेम स्वरूप का जिसमें प्रकट हुआ है वह बाबूराम महाराज वह स्वामी प्रेमानंद व अपने जो बेलूर मठ में एक बार सब साधु सन्यासियों को कह रहे हैं कि अरे मैं तुम लोगों को क्या प्रेम दे पाया हूं प्रेम तो दिया है ठाकुर ने हमको दिया है उनके प्रेम के बंधन से बंद करके ही हम लोग यहां पर रुके हैं एक बार ऐसा हुआ कि बाबूराम उस समय तो राजा महाराज वहां के अध्यक्ष थे बेलूरमठ के तो राजा महाराज अध्यक्ष है बाबूराम महाराज बेलूरमठ में मैनेजर है कोई बात लेकर के कुछ हो गया इनके दोनों के बीच में तो अभी ये होता है झगड़ा उसने ये ऊपर ऊपर से सरफेस के ऊपर में तो बाबूराम महाराज थोड़े से नाराज हो गए तो बोला कि चलो रखो तुम्हारा मठ अपने पास मैं निकलता हूं तो जैसे ही मठ के गेट के पास में पहुंचे बेलर मठ के गेट पास में वैसे ही देखा कि ठाकुर प्रकट हुए और ठाकुर ने प्रकट होकर के उनका यह जो अंग वस्त्र था उसको पकड़ा जोर से और क्या कहा जाबी को थाई चांद अर्थात कि बेटा कहां जाओगे और जैसे ही बाबूराम महाराज ने ठाकुर को देखा देखा कि उनका वस्त्र पकड़ कर के खींच रहे तब उनको समझ में आ गया कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं बेलर मट छोड़ कर के जाऊ तो ये देख कर के बाबूराम महाराज वापस आ गए तो ठाकुर ने सबको प्रेम के बंधन में बांधा था साधना तपस्या दर्शन यह फिलोसोफी यह सब तो थी ही थी ठाकुर की बातों में यह सब तो बिल्कुल भरा हुआ था ज्ञान गर्भ था उनका उपदेश किंतु संघ जब बनाना है तब प्रेम चाहिए बिना प्रेम के संघ नहीं बनता या तो फिर तपस्या ही करनी है तो मैं जाकर के हिमालय में बैठ जाऊंगा या तो नर्मदा के किनारे बैठ जाऊंगा या तो काशी वृंदावन चला जाऊंगा या तो फिर साउथ इंडिया में अरुणाचलम है जहां पे रमण महर्षि तपस्या कीए वहां पर चला जाऊंगा मुझे क्या पड़ी है इस तरह की किसी शहर में चारों ओर पोल्यूशन है हल्लागुल्ला है वहां पर मैं एक बैठ कर के कोई छोटे डिपार्टमेंट में मैं काम करूंगा मुझे क्या पड़ी है यह सब चीजों की यदि मेरे मन में सही सही त्याग तपस्या है तो मेरे पास में अच्छे-अच्छे जगह रहने की कितनी सारी है आप वहां पर ऋषिकेश वगैरह जाइए देखिए कि सत्र चलते हैं आपको कभी भी किसी भी चीज का अभाव नहीं रहेगा खाने पीने रहने के लिए तो बहुत सारी जगह है साधुओं को रहने के लिए उन स छंद रूप से मुक्त रूप से रहने के लिए हम लोग क्यों इस ऑर्डर में रहते हैं क्यों 10 लोगों के साथ में रहते हैं हमारा ईगो भी क्लेश होता है छोटी-छोटी चीजों में बुरा भी लगता है हमारे बड़े महाराज भी है बड़े महाराज के भी बड़े महाराज है सबकी गाली भी सुननी पड़ती है तो क्यों हम यह सब सहन करते हैं तो यह सब इसलिए क्योंकि मां ने और ठाकुर ने हम सबको एक प्रेम के बंधन में बांध कर के गए हैं यदि आप मां और ठाकुर को ठीक-ठीक पढ़ेंगे तो आप संग छोड़ कर के कभी नहीं जा पाएंगे मैंने सिर्फ यह साधुओं की बात नहीं भक्तों के बारे में भी आप पहले कोई कोई भक्त होता है कि यहां पर आएगा कुछ दिनों फिर आए नहीं फिर एक दो सप्ताह के बाद में फिर से दिखे तो मैंने पूछा एक लड़के को यहां पर पहले बहुत दिखता था फिर नहीं आया कुछ दिन फिर से आया तो मैंने पूछा कि अरे इतने दिन कहां पे थे तो बोला मैं वह जो ईशा योग है ना ऐसा कुछ है कुछ वहां पर वह लोग योग सिखाते हैं व प क्रिया करवाते हैं मैं वहां पर गया था मैंने कहा क्या रे पगले वहां पर तुमको जाने की क्या जरूरत है मैंने मैं दूसरों को नहीं कहता सब को तो फ्रीडम है जहां पर भी जाने का किंतु तुमको इस लड़के को मैंने इसलिए कहा कि भाई तुम्हारा ठाकुर के प्रति जब इतनी श्रद्धा है ही तुम जाहिर करते हो शब्दों में व्यक्त करते हो कि ना ठाकुर मेरे यह है ठाकुर मेरे वो है तो फिर तुमको जाने की जरूरत नहीं यदि ठाकुर के प्रति डेडिकेशन नहीं तुम जहां पर जाना है जाओ ठाकुर के जो सही सही भक्त है ठाकुर के पास में ही आएंगे मास्टर महाशय एक बार कुछ दिन आए नहीं फिर जाकर के ठाकुर के पास में जाकर के बैठे ठाकुर ने बोला कहां पे गए थे तो मास्टर महाशय ने कहा कि ये केशव सेन के वहां पर दुर्गा पूजा हो रही थी वहां पर गया था केशव ने दुर्गा पूजा की बहुत ही सुंदर व्याख्या की कि मां दुर्गा जब आती है तो साथ में कार्तिक गणेश जया विजया वो भी आते हैं अर्थात कि मां का अपने हृदय माने दुर्गा पूजा की प्रतिमा आप देखेंगे तो कार्तिक गणेश व वग सभी लोग रहते हैं तो अभी वो केशव सेन किस तरह की व्याख्या करता है कि अपने हृदय में मां दुर्गा की स्थापना करेंगे तो कार्तिक और गणेश अर्थात कि सिद्धि और श्री दोनों हमारे हृदय में साथ साथ में आएगा तो मास्टर महाशय कहते मुझे बड़ा अच्छा लगा यह व्याख्या तो ठाकुर ने सब कुछ सुन लिया फिर क्या कहता है कि देखो जारा एखाने आसे तारा सुदू एखाने ही आसे आर को थाए जाए ना जो लोग यहां पर आते हैं सिर्फ यहां पर ही आते हैं और कहीं नहीं जाते तो मैंने जब पहली बार सुना तो मैंने कहा ठाकुर ऐसा क्यों कह रहे हैं भाई माने हम लोगों को तो संग चलाना है डोनेशन कलेक्ट करना है काम निकालना है तो हम लोग लोगों को कहेंगे कि भाई यहां पे ही आना और कहीं पे मत जाना या तो एटलीस्ट डोनेशन यहीं पे देना और कहीं पे नहीं देना या तो हम लोग कहेंगे हम लोगों को तो ये आश्रम चलाना है सर के ऊपर में जिम्मा है ठाकुर ऐसा क्यों कहते हैं ठाकुर तो लोगों से फूटी कोड़ी भी नहीं लेते किंतु देखिए कि जब भी साधक है ठाकुर के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की है तो फिर ठाकुर के ही पास में आओ तो फिर ठाकुर के ही उपदेश को लेकर के अपना साधक जीवन उसका सुगठित प भी जाना है जाना पहले अपना साधक जीवन का फाउंडेशन डाल दो वही स्वामी जी पहारी बाबा के पास भागलपुर में जाकर के देखा कि पहारी बाबा के पास गए थे सोचा कि पहारी बाबा को यह हठ योग आता है तो मैं भी हठयोग सीखूं तो इस गाजीपुर भागलपुर नहीं गाजीपुर तो गाजीपुर जाकर के पहारी बाबा को देखा तो हठयोग सीख कर के उनका शरीर थोड़ा सा मजबूत होगा क्योंकि वह बहुत बीमार रहते थे तो क्या है कि इससे शरीर थोड़ा सा ठीक रहने से ठाकुर का काम और भी कर पाएंगे तो जाकर के पहारी बाबा को बार-बार कहते हैं आप मुझे योग सिखाइए तो पहारी बाबा रेडी हो गए अभी स्वामी जी अपने कमरे में जहां पर वो रहते थे जाकर के सो रहे हैं तो देखा ठाकुर सामने आकर के खड़े हैं कुछ बोल नहीं रहे वैसे ही आकर के खड़े हैं बड़ी ही करुण दृष्टि से उनके सामने देख र है तो स्वामी जी ने सोचा होगा वहां पर अकेला लग रहा होगा इसलिए आए हैं यहां पे गब लगाने के लिए ऐसा बोल ये मैं कह रहा हूं स्वामी जी नहीं तो ऐसा बोल कर के कुछ उन्होंने माइंड नहीं किया फिर दूसरे दिन रात को फिर से देखा कि ठाकुर वहीं पर आकर खड़े हैं तीसरे दिन देखा फिर उनको लगा कि नहीं ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं पहारी बाबा के पास से हठयोग सीख बोलकर के उन्होंने यह पूरा प्रोजेक्ट ही उन्होंने छोड़ दिया तो ये ऐसे ही ठाकुर के पास जो आएंगे सिर्फ ठाकुर के पास में ही आएंगे तो भाव घन मूर्ति प्रेम के बंधन में जिन्होंने सबको बांध दिया है प्रेम घन मूर्ति और जिनके पास में रहकर के अनिर्वचनीय आनंद आता है मां ने खुद कहा था वह जब ठाकुर के साथ में रह रही थी उस दिनों की घटना को याद करके मां कहती है मेरे हृदय में जैसे कि आनंद का एक पूर्ण घट स्थापित किया है ऐसा लग रहा था ऐसा लग रहा था कि दिन मेरे प्रत्येक क्षण आनंद में एक दिव्य उल्लास में व्यतीत हो रहे हैं और वही आनंद उनके भीतर में भी संकित हो रहा है संक्रमित को रहा है और एक बात यहां पर कही है कि जिनका उपदेश सुनकर के लोग उतने मंत्र मुग्ध हो जाते थे कि ठाकुर का पूत संग ठाकुर का सानिध्य छोड़कर के जाने की इच्छा नहीं होती थी तो यह बात बिल्कुल सही है आप कामर पुकुर में जब भी ठाकुर जाते थे तो कामर पुकुर की जितनी भी स्त्रियां है वह सब अपना व पता है कि गदाई आने वाला है गदाधर आ रहा है तो पहले ही अप अपने घर का जो भी काम है सब कुछ ठीक-ठाक करके फिर वो ठाकुर के पास में आक के बैठेगी और ठाकुर गप लगाते ही जाते हैं लगाते ही जाते हैं सब लोग एकदम मंत्र मुग्ध वत सुनते हैं सुनते हैं फिर एकाएक ठाकुर बोलेंगे कि अरे तुम लोग इतने इतनी देरी इतनी देरी तक यहां पे बैठी हो इतनी देर से बैठी हो तुम लोगों को क्या और कोई काम नहीं है तो वह बताएगी अरे नहीं मैंने सब कुछ ठीक-ठाक घर में सब खाना बनाना है जो भी करना है व सब बना कर के ही हम लोग आए हैं इस तरह से प्लान करके आए हैं कि आपके साथ में सब से ज्यादा समय बिता पाए एक बार एक औरत को ठाकुर ने बताया अरे तुम्हारा लड़का क्या कर रहा है तो बो अरे वो मेरा लड़का मने उसको कुछ खिलाना बिलाना था वो बेचारी को एकदम याद आया अपना खुद का लड़का वो भूल जाती है माने जैसे वो वृंदावन में भगवान कृष्णा का वो बांसुरी की आवाज सुन कर के गोपियां कैसे अपना अपना काम छोड़ कर के वो दौड़ कर के आती थी भगवान कृष्ण के पास में तो वैसे ही वहां पर ठाकुर की बातें ठाकुर का भजन ठाकुर के गीत यह सब सुनने के लिए सभी स्त्रियां अपना पूरा काम छोड़कर के उनके पास आकर के बैठ कर के मंत्र मुग्ध वत बैठी रहती थी दीर्घ काल तक ठाकुर का संग छोड़ कर के जाने की किसी की इच्छा नहीं होती थी तो ऐसे ठाकुर देखिए एक पूरे पैराग्राफ में पहले तो गंभीरानंद जी महाराज ने ठाकुर के सब गुण वर्णन किए अर्थात कि मां के पास में यह जो समाचार आ रहे हैं ना कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर पागल हो गए हैं तो मां यह ठाकुर के सभी गुण सभी उनके यह जो व्यक्तित्व के पहलू है अपने मन में सोचती है सोच कर के वह उनको मन में यह विचार आता है कि अरे मैंने तो ऐसे ठाकुर को देखा है यह ठाकुर पागल कैसे हो सकते हैं जो कुछ करते थे निवत होकर के घूमना या तो फिर वोह उटपटांग तरीके से मां काली की पूजा करना वो घटनाएं सही थी घटनाओं का इंटरप्रिटेशन गलत था किंतु मां को तो कुछ भी पता नहीं मां बेचारी सोच रही है अभी तो कुछ दिनों पहले इतने सुंदर ठाकुर को देखा और अभी क्या वह पागल हो जाएंगे यसा भी क्या हो सकता है एकांत ओ विश्वासो बिल्कुल संपूर्ण रूप से अविश्वसनीय है किंतु पल्ली उ कोलोग तो श्री श्री ठाकुरे उच्चा बोस्ता धारणा करी ते पारे ना परंतु पल्ली के अर्थात की गांव के अज्ञ लोग मूर्ख अज्ञानी लोग ठाकुर की उच्च अवस्था की धारणा तो करने पा रहे हैं सुतं ताहा देर उदम कल्पना अपति हतो गति ते चलते छलो इस वजह से उनकी उदम कल्पना मने वो पागल अखला होता है वह कैसे लगा मने वह दौड़ लगाता है वैसे ही उन्होंने अपनी कल्पना के सभी दरवाजे खोल दिए थे पागल की तरह अपनी कल्पना चलाते थे और इस कल्पना चलाते चलाते उनको तो ऐसा ही महसूस होता था आर तहादेर समालोचना र ओ शेष छेलो ना और उनकी कटु निंदा का भी समालोचना का भी अंत नहीं था सती साद भीर ताई मुने होलो ठाकुर गंभीरानंद जी कहते हैं मां को सती साधवी के रूप में सती साधवी को इसीलिए मन में हुआ श बाई एमन बोल से सभी लोग ऐसा कह रहे हैं आमी गए एक बार देखे आशी केमन आन मैं जाकर के देख के आती हूं कि ठाकुर कैसे हैं तो खन अर्थात कि चैत्र 1278 साल यह बंगोली साल है यह मेरे ख्याल से इंग्लिश ईयर है 18720 का यह साल था एक पर्व उपलक्ष ओई अचलेर अनेक स्त्री लोक गंगा स्नान जाते छलो किसी एक पर्व या तो फिर किसी एक उत्सव निमित्त उस गांव में से बहुत सारी स्त्रियां गंगा स्नान करने के लिए जा रही थी श्री मायरो इच्छा होलो जे तीनी तहादेर संगे जान मां के मन में भी यह इच्छा जागृत हुई कि वह भी बाकी सब स्त्रियों के साथ में गंगा स्नान करने के लिए जाएगी अभी कलकाता में गंगा है गंगा स्नान करने के लिए कलकाता जाएंगे तो ऑफकोर्स ठाकुर के साथ में ठाकुर की मुलाकात होगी ठाकुर का दर्शन तो होने ही वाला है तो ऐसा नहीं कि मैं ठाकुर का दर्शन करना चाहती हूं ऐसा वो लज्जा शीला मां कैसे कहेगी तो मां कहती है मैं भी सबके साथ में गंगा स्नान करने के लिए जाऊंगी श्री मायरो इच्छा होलो ज तिनी तहादेर संगे जाए किंतु तीनी भए और लज्जा पिता के किछु बोली ते पारे ना किंतु पिताजी को तो बताना है अभी वह लड़की होकर के पिताजी को कैसे बताएगी कि वह पति को मिलने के लिए जाना है तो भय और लज्जा से पिताजी को कुछ बता नहीं पा रही थी अथ च मनेर भाव एके बारे चापि राखा संभव किंतु मन का भाव बिल्कुल छुपा करके रखना भी तो असंभव है शेष पर्यंत एकटी मे के शॉप खुलिया बोली लेन आखिर में अपनी एक सहेली को सब कुछ मन की बात पूरी पूरी बता दी शे श जुक्तो रामचंद्र के शब बोलि दिलो जो जिस को अपने मन की बात बताई थी कि मैं भी चाहती हूं कि गंगा स्नान करने के लिए जाऊं और इसी बहाने ठाकुर के दर्शन करूं तो इनकी यह सहेली ने मां के पिताजी रामचंद्र को यह बात जाकर के बता दी उदार मना पिता सुनिया बोली लेन उदार मन वाले पिताजी ने सुनकर के बोला जाबे बेस तो जाओगी बहुत अच्छा तीनी निजई कन्या संगे चलीले वो खुद अपनी पुत्री के साथ में गंगा स्नान करने के लिए ठाकुर के दर्शन करने के लिए चले अभी रास्ते में क्या होता है इसका पाठ हम कल करेंगे आज यही तक ओम शांति शांति शांति हरि तसत श्री राम कृष्णर्पण
Questions & Answers
मस्तु यह जो है ना यह समदर्शी दव है समदर्शी अर्थात कि मैं अपना ही स्वरूप या तो ईश्वरीय स्वरूप सब में दर्शन करता हूं किंतु अद्वैत बात ही अलग है अद्वैत इस कॉस्मिक सब्जेक्टिविज्म अभी जहां तक मैं यह सोचता हूं मेरे भीतर में भी मां काली है बिल्ली के भीतर में भी मां काली है यह जो पुजारी खजांची वगैरह थे काली वाड़ी के उन लोगों का बड़ा ही कपट दृष्टिकोण था उसके भीतर में भी माहाकाली है तो इस में तो मैं और वो यह डिफरेंशिएबल हूं वो अलग है वो तो है वो डिफरेंस एक दीवार के रूप में तो खड़ा ही है तो अद्वैत अर्थात की कॉस्मिक सब्जेक्टिविज्म पूरा विश्व ही मैं फिर मैं तुम ये वो सब भेद रेखाएं समाप्त हो जाती है जगत ही जहां पर विलीन हो जाता है जगत दिखता ही नहीं है जगत के उर्ध्व चले जाते हैं स्पेस एंड टाइम मैटर और एनर्जी के परे चले जाते हैं तब वह सही सही अद्वित अनुभूति होती है इसलिए ज्ञान योग में देखिए कि स्वामी जी कितना मेहनत करते हैं अद्वैत की स्थिति को समझाने के लिए वैसे आपको जिसके मन में करुणा होती है उनको देख कर के हमको लगता है कि उन्होंने यह समदर्शी स्व कहो कि यह सबके भीतर में आत्म दर्शन प्राप्त कर लिया है किंतु फिर भी तो यह भेद मने एक बॉर्डर लाइन तो है ना कि यहां पे मैं समाप्त होता हूं वहां से वो स्टार्ट होते हैं अद्वैत में तो कुछ भी नहीं रहेगा बॉर्डरलाइन नाम की जो चीज है वही तो ये मने समय और अवकाश के भीतर की बात है यह माया के भीतर में है तो अ द्वेत अबाउ एवरीथिंग माने इस कंपलीटली सोटेरल जितना ही करेंगे उतना ही हम इसमें वो कंफ्यूज होते जाएंगे बट दिस इज एन एसोट एक्सपीरियंस पूरा विश्व में हूं बाकी सब चला जाएगा मैं भी नहीं हूं अवेद में मने अल्टीमेट स्टेप मैं भी नहीं हूं ब्रह्मण ही है तो किंतु आप जो बोल रहे हैं ठीक है कि जैसे ठाकुर का खुद का उदाहरण है सूर्य के जितने तकरीब पासपास जाते जाएंगे उतना ही सूर्य हमको थोड़ा बड़ा बड़ा हो कर के दिखेगा हमने ठाकुर ने उस समय यह एस्ट्रोनॉमी का यह कांसेप्ट खोज के निकाला था पता नहीं कैसे तो किंतु यह बात बिल्कुल सही है जैसे-जैसे अद्वैत के पास में जाते जाएंगे वैसे-वैसे वह सर्व भूतों में आत्म दर्शन तो होने ही लगेगा अपनाने एक्चुअल साइन क्या है सिर्फ यह नहीं है कि मान लो कि मैं अद्वित में मैं विश्वास नहीं भी करता हूं मेरी आध्यात्मिक प्रगति हो रही है उसका सबसे बड़ा ये मानदंड क्या है मेजरमेंट क्या है मेरा इगो क्षीण होना मेरा जो अहम है वो धीरे-धीरे करके उसका क्षय होना मेरी बजाय तुम नॉट आई बट यू म संसार इसके भीतर में माने हम लोग नेती नेती करके संसार का त्याग करते हैं किंतु सही सही आध्यात्मिक जागृति होती है कुंडलिनी का जागरण होता है तो वो इती इती करके सब कुछ एक्सेप्ट करना है ये एक्सेप्टेंस का स्टेज जैसे आता जाएगा वैसे ही वह सूर्योदय की वह लाली मा आकाश में जैसी छा जाती है ऐसा लगेगा हमको किंतु आप में वोह आइस ब्रेकिंग का टेक्निक थोड़ा होना चाहिए आप आपका नेचर थोड़ा सा मने क्या है मिक्सिंग नेचर है बोलकर के यह इजी हो जाता है आपके लिए किंतु साधु लोग ऐसे ही इमीडिएट सबके साथ में बात करना नहीं शुरू करेंगे तो थोड़ा सा क्या है ना आइस ब्रेकिंग आपके भीतर में वो मैंने इसी बात को लेकर के बताया था ना वो सचिन भाई यहां पर आए थे तो अब बिल्कुल पहली बार मिले वो वो चुपचाप बैठे मैं भी चुपचाप बैठा हूं नहीं वो मुझे पहचानता नहीं वो उनको किंतु फिर उन्होंने प्रश्न करना शुरू कर दिया साधु को प्रश्न करना है ज साधु को मजा आता है उत्तर देने में मुझे मुझे आता है मैं उत्तर दूंगा उ एक सटल गगो बूस्ट मिलता है ना तो जैसे ही उन्होंने प्रश्न किया मैं एकदम खुश हो कर के उत्तर देना शुरू कर दिया जब उत्तर शुरू खत्म हुआ बाद में बाकी सब बातें चालू हो गई ये देखिए स्नेह का बंधन तो है ही है किंतु ये आइस ब्रेकिंग करना पड़ता है स्वामी जी हेड सेड दैट आई एम ऑल नॉलेज आउटसाइड बट डिवोशन इनसाइड एंड श्री राम कृष्णा इज कंपलीटली रिवर्स ही इज ऑल डिवोशन आउटसाइड बट ऑल नॉलेज इनसाइड सो इट हैपेंस अ सी दैट इज व्हाई श्री रामकृष्णा सेज दैट वंस वी स्टार्ट फॉलोइंग हिम वी शुड गो टू एनी अदर टीचर बिकॉज सी वी हैव एक्सेप्टेड श्री राम कृष्णा इज अवर गाइड इज अवर टीचर इज अवर गुरु सो श्री रामकृष्ण भावा विल कम इन टू अस इट्स नॉट लाइक दैट वी हैव टू कॉन्शियसली अटेंप्ट एनीथिंग वी जस्ट हैव टू डू नाम जपम श्री राम कृष्णा दैट दीक्षा मंत्र वी आर गिवन वी गो ऑन टेकिंग श्री राम कृष्णा नेम गो ऑन डूइंग दिस जपम एंड ऑल द क्वालिटीज दैट वाज इनसाइड द ठाकुर माइ एंड स्वामी जी एंड डायरेक्ट डिसपे ऑटोमेटिक इट विल स्टार्ट कमिंग इनसाइड अस आई डोंट हैव टू कॉन्शियसली ट्राई दैट नाउ इन द मॉर्निंग आई विल डू मेडिटेशन एंड प्रेयर एंड इन द ड्यूरिंग द डे टाइम आई विल ट्राई माय हार्ड टू बिकम ए कर्मयोगी आई डोंट हैव टू मेक एनी एफर्ट इट बिकम इजी सहज दिस वर्ड इज देयर इट बिकम मने इंस्टिंक्टिव आई डोंट हैव टू मेक एनी एफर्ट दिस इज द पावर ऑफ दिस बीज मंत्र दिस इन बीज मंत्र ऑफ श्री राम कृष्ण एक्चुअली अपने ऑर्डर में यह एक है कि तीन साधनाएं है तो योग भक्ति और कर्म इसका फाउंडेशन क्या है द्वैत है ना कि अद्वैत है जैसे खास करके योग शास्त्र है योग शास्त्र तो मेथोडोलोग्य क्या है तो ज्यादातर लोग कहते हैं कि योगशास्त्र के पीछे की थिरी है सांख्य और सांख्य बेसिकली इज अ सॉर्ट ऑफ ए द्वैत फुल फ्लेड अद्वैत नहीं है द्वैत और अद्वैत के बीच में कहीं पर आता है कहते हैं कि हमारे भीतर में चेतन वंत पुरुष है किंतु सभी के भीतर में एक एक पुरुष है ऐसा वो कह दे भले ईश्वर को ना स्वीकारो किंतु एटलीस्ट सभी के भीतर में आत्मन है तो किंतु इंडिविजुअल आत्मन है सो य सम वेर इन हाफ वे टुवर्ड्स द अद्वैता तो योग शास्त्र भी फुल फ्लेज अद्वैत पर आधारित नहीं है ट्रेडिशनल स्पीकिंग भक्ति तो नहीं ही है कर्म भी नहीं है तो यह हम लोग द्वैत और अद्वैत का ये द्वैत वाली साधना हों को अद्वैत में कैसे ले आएंगे अद्वैत की साधना है स्मरण मनन विद्यास जबकि ये भक्ति कर्मा और योग तीनों साधनाएं के पीत में धत का एलिमेंट है तो यह मने यह कॉन्फ्लेट नहीं हो जाता तो कॉन्फ्लेट का रेजोल्यूशन यह है कि स्वामी जी ने जिस तरह से कर्म भक्ति और योग इन तीनों को फॉर्मुले किया है तो फॉर्मुले इज बेस्ड ऑन वेदांत बेस्ड ऑन अद्वैत वेदांत रदर देन सांख्य और द्वैत तो अभी इसके बारे में बहुत सारा कुछ डिस्कशन थिंकिंग रिसर्च भजनानंद जी ने किया है योग शास्त्र के बारे में कर्मा के बारे में अपने गंभीरानंद जी के काफी कुछ चिंतन है तो मैं भी इनके साथ में इंक्लाइंड होता हूं कि हम लोगों का भक्ति योग हम लोगों का कर्म योग और हम लोगों का राजयोग यह तीनों का फाउंडेशन अद्वैत वेदांत है नहीं कि ट्रेडिशनल रूप में सांख्य या तो ध्व यह सब यानी कि स्वामी जी ने नहीं कि सिर्फ यह अपनी ट्रेडिशनल साधना हों का एक संगम करके आज की लैंग्वेज में कहे तो एक पैकेज बना कर के हमको दिया है किंतु स्वामी जी ने इसको मैंने अपग्रेड किया है यूजिंग टुडेज लैंग्वेज किने अद्वैत वेदांत में नई वर्जन में इनको अपग्रेड किया है एकदम सटल सटल डिफरेंसेस है वैसे ही पता नहीं चलेंगे जैसे कि ठाकुर की ही साधना है ठाकुर जब खड़ग उठा कर के बिल्कुल पहली बार ठाकुर मां को कहते हैं अब पता है कि ठाकुर की साधना के दो फेज है फर्स्ट फेज है कि कामर पुकुर जाकर के शादी करने के पहले वाला फेज जबकि मन के आवेग से उन्होंने साधना की और दूसरा फेज है कि जब कमार पुकुर गए मां के साथ में विवाह किया वापस आए फिर ट्रेडिशनल रूप में एक के बाद एक गुरु से उन्होंने साधना की तो अद्वैत विदान तो जब सेकंड फेज में तोतापुरी 18636 में 62 में आए थे तभी की तो बात है ना उससे पहले जब अपने अंतर के आवेग से साधना कर रहे थे उस समय कहां पे वह अद्वैद था किंतु देखिए एक-एक घटना का एकदम डिटेल में विश्लेषण कीजिए कि ठाकुर ने मां को प्रार्थना कर रहे हैं मां दर्शन नहीं दे रही मां का खड़ उठा कर के सीधा अपने गले में मारना चाहा बोला कि मां तुम दर्शन नहीं दोगी तो मैं अपना गला काट दूंगा अभी हमको लगता है जब ये पढ़ते हैं तो हमको बड़ा सहज बिल्कुल क्लासिकल ध्व डिवोशन ध्व भक्ति ऐसा बिल्कुल लगता है कि संतान मां को प्रार्थना कर रहा है भक्त भगवान को पुकार रहा है किंतु गले प खड़क लगाने का क्या अर्थ है मैं अपनी हत्या करूंगा तो मां को कष्ट होगा मां दौड़ी चली आएगी यह बात कहां पर लिखी है भाई भक्त और भगवान का संबंध है भक्त के लिए ही भगवान है भक्त और भगवान का यह जो भागवत भक्त भगवान ट्रेडिशनल यह जो फॉर्मूलेशन हुआ है कि भगवान का भक्त के ऊपर में इतना स्नेह प्रीति है तो यह आप कह सकते हैं कि स्नेह प्रीति की वजह से ठाकुर अपने गले में वो खड़ग मार देंगे अपनी हत्या कर देंगे तो मां दौड़ के आएंगी तो यह तो एक इंटरप्रिटेशन है साथ में यह भी देखिए कि ठाकुर और मां एक ही है इसलिए ठाकुर ने यह सोच कर के कहा यदि मैं अपनी हत्या करता हूं तो यह कॉस्मिक सुसाइड जैसा कुछ हो जाएगा माने इसकी जो रिपल इफेक्ट है सिर्फ वो दक्षिणेश्वर मंदिर में ही नहीं पूरे विश्व में ये रिपल इफेक्ट फैले गी क्योंकि ठाकुर के शरीर में सही सही मां जागृता हुई थी सो एक अवेद का भी एक इंटरप्रिटेशन है मां सिर्फ इसलिए दौड़ कर के नहीं आई ठाकुर को दर्शन देने के लिए अरे मेरा बच्चा रो रहा है तो चलो मैं दर्शन दे देती हूं इसके लिए ही सिर्फ नहीं यदि ठाकुर सही सही में अपनी हत्या करते तो उसकी रिपल इफेक्ट पूरे कॉस्मो में फैल जाती पूरे संसार में पूरी अराजकता फैल जाती पता नहीं क्या से क्या हो जाता तो इसके लिए देखिए कि अद्वैत इंटरप्रिटेशन भी है सभी घटनाओं का अधविक इंटरप्रिटेशन है जितना जितना हम डीप में जाएंगे पता चलेगा