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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

भार समर्पण || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 13 Jun 2025

प्रार्थना

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी की जीवनी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा रचित भार समर्पण इस प्रकरण का हम पाठ कर रहे थे ऑलरेडी हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज अपने साहित्य का जो सर्व वन ऑफ द बेस्ट पैसेज वो वो गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित वो देख रहे थे कि किस तरह से हम लोग चाहते हैं साधक चाहते हैं कि स्वर्ग की देवी पृथ्वी पर अवतरित हो हमारी जननी के रूप में और हमको स्नेह करें प्रेम करें। हम चाहे मां का प्रेम उसके लिए एलिजिबल हो कि ना हो। उसके लिए हमारा अधिकारित्व हो कि ना हो। चाहे हम सत्कर्म करें ना कि दुष्कर्म करें। चाहे हम मां के प्रति अच्छी भाव मां के प्रति श्रद्धा रखें ना कि अश्रद्धा रखें। हमको वह एक सतत बिना किसी कंडीशन के बिना किसी जजमेंट के मां का प्रेम मिले। देवी का प्रेम प्राप्त हो। स्नेह आशीर्वाद प्राप्त हो। यह सब हम सबके हृदय की एक आकांक्षा रहती है और इस आकांक्षा का पूर्ण करने के लिए इस बार देवी का जगत धात्री का जगत जननी का मां शारदा के रूप में पृथ्वी पर आगमन हुआ।

माँ सबको समान रूप से प्यार करती है

मां का जीवन जितना ही हम पाठ करेंगे, जितना ही हम उसके बारे में सोचेंगे, पढ़ेंगे, चिंतन करेंगे, उतना ही पता चलेगा कि मां उनके पास में जितने भी संतान आते थे, उन सबको कितना समान रूप से प्रेम करती थी। एक बार की बात है, मां उद्बोधन में उस समय मां थी। कोई एक वृद्धा स्त्री मां का दर्शन करने के लिए आई। अभी उसको तो पता नहीं है कि मां के बारे में ज्यादा कुछ किसी ने कहा होगा चलो चलते हैं तो वह आ गई होगी। वह जैसे मास्टर महाशय को उनके मित्र ने कहा था ना सिद्धू ने कि चलो वहां पर दक्षिणेश्वर में सुंदर बागान है। वह देखने के लिए जाते हैं और फिर वहां पे परमहंस भी रहते हैं। तो लगे हाथ उनका भी दर्शन कर लेंगे। तो परमहंस कौन है? कहां से है? क्या है? कुछ पता नहीं। मास्टर महाशय जब उनकी बात सुनते हैं तो वह आश्चर्यचकित हो जाते हैं और फिर वह वृंदा बोलकर के दासी थी उसको पूछते भी है कि अच्छा इन्होंने बहुत पढ़ाई लिखाई की होगी बहुत सारे शास्त्र ग्रंथों का पाठ किया होगा इसलिए इतनी अच्छी बातें करते हैं तो वृंदा क्या उत्तर देती है सब कुछ तो उनकी जीहवा पर सवार है उनको कोई ग्रंथ पाठ करने की कोई आवश्यकता नहीं तो वैसे ही एक वृद्धा स्त्री मां के पास में आई मां के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था तो मां को प्रश्न कर रही है कि अच्छा सुना है अभी उद्बोधन में जब वह जाएंगे तो देखेंगे कि बहुत सारे साधु सन्यासी लड़के हैं यंग लड़के सब सन्यासी वह फर्स्ट फ्लोर पर देखने को मिल जाएंगे और सेकंड फ्लोर पे जहां पर मां रहती थी बहुत सारी ये जो लड़कियां हैं स्त्रियां है मां की डिवोटी है वह सब वहां पर देखने को मिलेगी तो वह वृद्धा ने देखा सब नीचे में सब लड़के हैं ऊपर में सब इतनी सारी स्त्रियां है तो वह मां को जाकर के पूछती है मां शारदा को जाकर के कि अच्छा मां यह सब क्या आपके संतान है? आपने खुद ने क्या इनको जन्म दिया है? तो ऐसा करके जब मां कहती है तो दूसरी एक डिवोटी थोड़ी नाराज हो जाती है। वो कहती है इस वृद्धा को कि अच्छा आपको पता नहीं है क्या मां के बारे में कुछ इस तरह की बेतुूकी बातें करते हैं वगैरह-वगैरह। तो जो भी है वो पर्व तो वहां पर समाप्त हुआ। बाद में मां उसको कहती है जिस डिवोटी ने इस तरह से थोड़ी नाराजगी दिखाई थी। मां उसको कहती है कि तुम कह ही सकती थी कि वह मेरे संतान है। क्या है? उसमें गलत क्या है? तो देखिए कि यह मां सबको भले ही चाहे मां ने उनको खुद को जन्म ना दिया हो किंतु सबको अपने संतान की तरह स्नेह करती थी। अभी देखिए कि

मा शारदा के पास आने वाले शिष्यों के प्रकार

जितने भी संतान मां के पास में आते थे, सबका मां के साथ में एक-एक विशेष रूप से रिश्ता था। उसमें भी हम देखते हैं कि खास करके यदि हम कैटेगराइज करने को जाए कि मां के पास में कौन-कौन आता था और उनका किस तरह का भाव था तो देखिए कि एक तो कैटेगरी है कि ठाकुर के समय के भक्तों की ठाकुर के समय के यह जो गृहस्थ भक्त और सन्यासी संतान तो गृहस्थ भक्तों में धीरे-धीरे करके मां की महिमा का वो प्रचार हुआ था। किंतु जो ठाकुर के सन्यासी संतान थे उन्होंने मां के प्रति या तो फिर कहेंगे कि मां की महिमा के प्रति सर्वप्रथम जागरूकता या तो सर्वप्रथम ज्ञान उनको हुआ था। उसमें भी खास करके स्वामी विवेकानंद स्वामी जी ने ही सबसे पहले मां की महिमा का प्रचार करना शुरू किया था। गुरु भाइयों के बीच में स्वामी जी ने कहा था कि वहां पर मेरी यह जो गोंडामी है अर्थात कि वहीं पर मेरी रूढ़ि चुस्तता है। गोंडामी को क्या कहेंगे? कहेंगे कि रूढ़िच चुस्तता या तो फिर ऐसा ही कुछ। तो स्वामी जी कहते हैं कि वहीं पर मैं सबसे ज्यादा रूढ़िच चुस्त हूं। वहीं पर मैं सबसे ज्यादा ऑर्थोडॉक्स हूं। वहीं पर मेरी अंधश्रद्धा सबसे ज्यादा है। क्यों? क्योंकि जिसको ठाकुर के प्रति श्रद्धा नहीं है उसकी कोई चिंता नहीं है किंतु मां के प्रति श्रद्धा नहीं है उसको धिक्कार दो। इस तरह से स्वामी जी हमको कहते हैं। तो वो डायरेक्ट डिसाइपल की एक बात हो गई ठाकुर के। उसके बाद में देखिए कि जो गृहस्थ संतान थे ठाकुर के उनके भीतर में धीरे-धीरे करके मां की महिमा का प्रचार होना शुरू हुआ था। इसके बाद के समय में हम देखते हैं तो कोलकाता में जो भक्त आते थे उनका एक मां के प्रति था संबंध। बड़ी ही श्रद्धा भक्ति पूर्वक मां की सेवा भी करते थे और उनकी बड़ा आदर भी करते थे। उसके सामने यदि आप देखें तो क्वालपाड़ा के जो लड़के थे वही वह फेमस स्कूल के टीचर केदार बाबू और केदार बाबू के वो जो स्टूडेंट्स थे सब वो सब धीरे-धीरे करके मां के पास जाना शुरू हुए और वही स्टूडेंट्स में से कई लोग तो बाद में सन्यास ग्रहण करके मां के सेवक भी हुए जैसे कि वरदा महाराज। तो इस तरह से देखिए कि जो क्वालपाड़ा के लड़कों का मां के प्रति जो स्नेह था जैसे कि बिल्कुल संतान की तरह और सिर्फ क्वालपाड़ा नहीं वहां आसपास के गांव में से जैसे कि यह राममई महाराज है तो एक बार शरद महाराज वहां पर

माँ शारदा, शरत महाराज और राममय महाराज की कहानी

गए थे जयराम बाटी में तो उन्होंने देखा राममई महाराज खुद लिखते हैं कि महाराज ने देखा कि मैं तो छोटे बच्चे जैसा ही हूं। स्कूल से आता हूं और बिना किसी झिझक के मां के पास में जाता हूं और उस समय जो वह था पर्दा प्रथा वह पुरुषों के सामने वह घुमटा तानना है वगैरह-वगैरह तो मैं तो बच्चा हूं तो फटाक करके मां के पास में चला जाता हूं। मां बड़ी सहज रूप से मेरे साथ में बात करती है। मुझे स्नेह करती है। तो फिर यह शरद महाराज उसको कहते हैं अच्छा देखो तुम मेरा एक काम करो। तुम जाकर के देखना मां कब फ्री होती है। जब मां के पास में कोई काम नहीं रहता है तब आकर के मुझे खबर देना और देखो कि कोई अपनी ज्यादा अपनी खुद की अकल मत लगाना। इतना ही काम तुमको करना है। मां फ्री है। वह देख के सीधा मुझे खबर देना है। और कुछ नहीं करना है। तो राममई महाराज कहते हैं अच्छा ठीक है। तो फिर देखेंगे वो एक जब देखा कि मां ने वो जो तरकारी वगैरह है वह काट लिया है। तो वह शरद महाराज के पास जाकर कहते हैं कि मां अभी फ्री है। तो शरद महाराज फिर धीरे ऐसे करके वह मां के कमरे में जाएंगे। फिर मां वो लाज निकाल करके वो घुमटा टान करके बैठी है। वो मां के सामने प्रणाम करेंगे। पूछेंगे मां कैसी हो तो मां कहेंगी बेटा आ भो अच्छी तुम ही केवन नाो तो वो कहेंगे कि हां आ वो भो आ मैं भी अच्छा हूं बस इतना ही वार्तालाप और फिर वो बाहर आ जाएंगे तो देखिए कि ये राममई महाराज है फिर यह वरदा महाराज है जो कि मां की सेवा करते थे वहां पर रहकर के तो उन लोगों का एक बिल्कुल ही संतान के जैसा भाव था मां के प्रति वो जो

कहानी: पहला कर्तव्य क्या: माँ का आदेश पालन या माँ की सेवा

फेमस घटना कि राम महाराज और वो ज्ञान महाराज यह दोनों वहां पर जय राम बाटी में वो मां का बगीचा था। उसमें वह केले का पेड़ लगा रहे थे। तो उस समय वो खाने का टाइम हो गया तो मां चिल्लाती है कि अरे राममई ज्ञान आओ खाना खा लो। भोजन का समय हो गया है। तो ज्ञान महाराज तो थोड़ा वो कर्मवीर थे। तो राममई महाराज को कहते हैं कि अच्छा देखो एक काम करो। यह तो मां का ही काम है। मां का काम पहले खत्म करेंगे बाद में मां की बात सुनेंगे। तो अभी राम महाराज तो बिल्कुल सैंडविच हो गए। यहां पर मां का कार्य है और यहां पर मां की पुकार है। दो में से किसको प्राधान्य दे? किसको ज्यादा प्रायोरिटी दे? तो वो वैसा वो होता है ना वो प्रोग्राम में वो इनफाइनाइट लूप में चला जाता है। वो तो वैसे बेचारे वो फंस गए। अभी ज्ञान महाराज कहते थे तो लॉजिक भी तो ठीक लगता है कि मां का ही तो कार्य है ना। तो मां का कार्य को प्रायोरिटी पहले देनी चाहिए मां की पुकार से पहले। तो तो ऐसा सोच करके वह फिर से वह वो गड्ढा करना शुरू किया केले का पेट डालेंगे बोल के यहां पर मां समझ गई कि यह ज्ञान महाराज ही है जो कि राममई महाराज को नहीं आने देते तो फिर मां ने फिर ज्ञान महाराज को छोड़कर के सीधे राममई महाराज को पुकारा कि अरे राममई पहले आकर के खाना खा लो बाद में जो काम करना है वह करना इस बार राममई महाराज समझ गए कि अभी मां की पुकार को ही प्राधान्य देना पड़ेगा प्रायोरिटी देना पड़ेगा तो वह इनफाइनाइट लूप ब्रेक हो गई वो सीधा वो जो फेंक करके के वह जो गार्डन के औजार वगैरह थे सीधा मां के पास दौड़ के गए। तो यह था बिल्कुल की संतान की तरह वे लोग मां को श्रद्धा भी करते थे। मां का कार्य भी करते थे। तो यह सब देखिए

जगतजननी के साथ साधक का मान और अभिमान

कि सभी तरह के भक्तों का एक-एक भाव था मां के साथ में। किंतु जिस तरह से यह जो मान और अभिमान की बात यहां पर की है यूजुअली यदि आप ईश्वर के साथ में जो एक सर्वोच्च प्रकार का जो नाता है वो है मान और अभिमान का कि मैं ईश्वर पर नाराज होकर के मेरे दोषों का टोपला जो है सीधा ईश्वर के ऊपर में डाल दूंगा कहूंगा कि मैं जब ध्यान करने को बैठता हूं और फिर मेरा मन जब भटक जाता है तो इसके लिए तुम ही जिम्मेदार हो। तुमको मुझे ईश्वर तुम्हारा दर्शन देना ही होगा। आत्मज्ञान तुमको मुझे देना ही होगा। वरना वरना तो फिर मैं तुम्हारे खिलाफ में कोर्ट में केस करूंगा। और फिर माए पोए मुकदमा धूम होवे। राम प्रसाद बोले। मां और संतान में मुकदमा होगा और धूम मच जाएगी। ऐसा राम प्रसाद कहता है। तो वो जो मान और अभिमान का जो सिलसिला है वो ऐसे व्यवहार वास्तव में मैंने किसी का देखा नहीं है कि मां के साथ में इस तरह का रिश्ता हो। देखिए पागली मामी है, राधु है। इन लोगों का मां के साथ में रिश्ता था। पागली मामी इस तरह की मां को गाली देती थी कि वह हम लोग सुन भी नहीं सकते हैं। किंतु क्या है कि वह एक भक्त की दृष्टि से नहीं है। वह एक आत्मीय की दृष्टि से है। भक्त की दृष्टि से मुझे ऐसा याद नहीं आ रहा है। कुछ कुछ लोग थे कुछ-कुछ पागल थे। एक कवि था वो उद्बोधन की कोलकाता की ही बात है कि वह रात को शराब पी के वो वहां से मां के कमरे के सामने से उद्बोधन के सामने से जाया करता था और फिर वह जोर-जोर से कभी-कभी गीत भी गाता था। तो और फिर मां को रास्ते पर ही साष्टांग प्रणाम भी करता था। तो वो एक था किंतु इसका कोई इतना क्लोज मतलब मां के साथ में ये हो साथ में कोई इतना लंबा कोई भक्ति भक्त का रिश्ता ऐसा मुझे ख्याल नहीं है। तो एनीवे अपने ऑर्डर में जिसने यह जो अभिमान का रिश्ता किसी के साथ में रखा हो वो सबसे फेमस केस है अपना गिरीश घोष का। गिरीश घोष और ठाकुर के बीच का जो रिश्ता था गिरीश घोष कभी-कभी जाकर के ठाकुर को गाली भी देते थे और जाकर के ठाकुर के सामने अभिमान भी करते थे तो यह गिरीश घोष ने किंतु इंटरेस्टिंगली मां के साथ में ऐसा कुछ करने का प्रयास कभी नहीं किया। अ

कहानी: गिरीश घोष ठाकुर से झगड़ते हैं लेकिन मां के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा है

मां के साथ में और ठाकुर के साथ में इन दोनों के गिरीश का जो रिश्ता था या गिरीश की जो भक्ति थी बिल्कुल आपको ऑपोजिट तरह की दिखाई देगी। ठाकुर के साथ में तो जो कुछ हुआ हमको सब अच्छे से पता है। वो स्टार थिएटर में ठाकुर गए थे। एकाएक आकर के उसने ठाकुर के साथ में झगड़ा करना शुरू कर दिया। ठाकुर को कहते हैं कि आपको मेरे संतान के रूप में मेरे घर में जन्म लेना होगा। तो ठाकुर कहते हैं हम बोए गए छ संतान होए तो घरे जन्म लेवा मुझे कोई जरूरत नहीं है मैं मेरी कोई ऐसी इच्छा भी नहीं है कि मैं तुम्हारे घर में तुम्हारा संतान होकर के जन्म लूंगा ऐसा कुछ बातचीत हुआ उसके बाद में गिरीश ठाकुर को गाली भी देता है ठाकुर के सामने वह नाराजगी भी प्रकट करता है उस समय लाटू महाराज वहां पर थे और लाटू महाराज किंतु वह तो थे एक तो पहलवान ठाकुर के ऊपर में श्रद्धा भक्ति भी है महावीर की तरह महावीर कैसे वह भगवान राम की रक्षा करने के लिए तत्पर रहते थे। तो लाटू महाराज खड़े हो गए। सोचा कि गिरीश की पिटाई करेंगे। किंतु साथ में और कोई डिवोटी थे। उन्होंने कहा कि देखो ठाकुर तो सब कुछ चुपचाप सहन कर रहे हैं। तुम इसमें नाराजगी क्यों प्रकट करते हो? ठाकुर यदि कहेंगे कि इसकी पिटाई करो तो कर देना पिटाई। फिर कोई बात नहीं है। किंतु जब तक ठाकुर तुमको आदेश नहीं देते हैं तब तक तुम कुछ मत करना। तो ठीक है उस समय वह लोग तो गिरीश ने जो कुछ भी कहा ठाकुर वापस आ गए दक्षिणेश्वर में और फिर ठाकुर किंतु जो भी भक्त वहां पे आता है सबको ठाकुर पूछते हैं प्रश्न करते कहते हैं कि देखो गिरीश ने मेरे साथ में ऐसा किया गिरीश ने मेरा अपमान किया मुझे गाली दी वगैरह-वगैरह उसमें यह जब रामचंद्र दत्त ठाकुर के वही सेवक फेमस सेवक वो जब भक्त वो जब आए ठाकुर ने जब उनको यह कहा तो रामचंद्र क्या कहते हैं कि देखिए देखिए महाशय जो जिसके पास में जो है वही तो आपको अर्पण करेगा। वो जो कालीय नाग है उसने तो कहा कि जो आपने मुझे जहर ही दिया है। भगवान कृष्ण को कहता है तो मैं आपको जहर ही तो सामने दूंगा। तो आपने आपने खुद ने गिरीश को जो दिया है वही से तो उसी से तो वह आपकी पूजा करेगा। तो ऐसा जैसे वो रामचंद्र ने कहा इमीडिएटली वो ठाकुर कहते हैं हां किया तुम्हारी बात तो बिल्कुल ठीक है और फिर कहा कि चलो गाड़ी करते हैं और गिरीश के घर जाते हैं तो वहां पर गिरीश के घर गए देखा कि गिरीश बिना खाए पिए वहां पे एकदम मायूस होकर के बैठा था और सोच रहा था कि इस जीवन के साथ में क्या करें अभी उस समय जब सामने से गाड़ी में से ठाकुर उतरे तो सीधा ठाकुर के पैरों में जाकर के साष्टांग प्रणाम करके कहा कि देखिए आप यदि मेरे मुझे मिलने को नहीं आते तो मैं सोचता कि आप कोई सामान्य महापुरुष है। किंतु मेरा इतना अपमान सहन करने के बाद में भी आपकी कृपा मेरे पर हुई है। आप मुझे आशीर्वाद देने के लिए मेरे घर आए हैं। इसका एक ही अर्थ है कि आप अवतार स्वयं है। अवतार यदि आप नहीं होते यदि आप ईश्वर स्वयं नहीं होते तो मेरा जो यह अपमान था उसको आप कभी भी सहन नहीं कर पाते इसको आप कभी भी खा नहीं जा पाते तो ऐसा जब गिरीश ने कहा तो ठाकुर भी बड़े खुश हो गए और उसके बाद में से सबको कहते हैं कि देखिए गिरीश की कैसी मेरे ऊपर में भक्ति है। तो यही गिरीश ठाकुर को कहता है कि आप मेरे संतान के रूप में आइए ऑन वन हैंड दूसरी ठाकुर की श्रद्धा भी इतनी करता है और जब शराब पीता है तो ठाकुर को गाली भी देता है। एक बार की बात है कि यह दाना काली ये गिरीश वगैरह रात को शराब पी रहे थे। फिर रात को शराब पीते पीते ही एक बार एकदम वो लगा उनको बुद्धि में ऐसा विचार आया कि चलिए जाकर के दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास में जाया जाए। ठाकुर के दर्शन किए जाए। वह सब शराबी वह सब शराब की अवस्था में ही पीएल अवस्था में ही दक्षिणेश्वर में आए। वह जो दरवान था वहां पर गेट तो बंद था। तो उसको थोड़ा सा रुपया देकर के गेट खुलवाया। ठाकुर के घर में जाए तो ठाकुर का कमरा बंद था। तो कम दरवाजे के ऊपर में जोर-जोर से वो धक्का मारना वो आवाज करना जोर-जोर से ठकठकाना शुरू कर दिया और साथ में चित्कार कर रहे राक्षसी चित्कार और कोई होता तो बेचारा डर ही जाता किंतु ये तो ठाकुर थे और ठाकुर जग ही रहे थे तो इन्होंने इमीडिएटली दरवाजा खोला और यह सब पियक्कड़ सब शराब पी हुई अवस्था में माताल और ठाकुर के कमरे में जाकर के ठाकुर को घेर करके जोर-जोर से चिल्ला करके नृत्य करने लगे है तो यह था कि गिरीश का ठाकुर के साथ में रिलेशन। किंतु फिर यही गिरीश उसका मां के साथ में क्या रिलेशन था? या तो फिर मां के साथ में जो गिरीश के प्रसंग है वो बिल्कुल ऑपोजिट टाइप के है। माने वो मां की इतनी श्रद्धा करता था कि मां का अपमान करना तो छोड़ ही दीजिए। मां के सामने नजर उठाकर के वह कभी नहीं देखता था। एक दिन की बात है कि मां उस समय बलराम बाबू के घर में रह रही थी। बलराम मंदिर में और पास में ही तो गिरीश का घर है। तो उस समय मां बलराम बाबू की छत पर वह टहल रही होगी या धूप में अपने बाल सुखा रही होगी। उस समय गिरीश अपनी पत्नी के साथ में अपने मकान की छत के ऊपर में उठा। तो एकाएक उसकी पत्नी ने कहा कि देखिए देखिए मां वो मां शारदा देवी बलराम बाबू के घर की छत के ऊपर में बैठी हुई है। साथ-साथ में ही गिरीश उस छत के ऊपर में से नीचे उतर गया। अपने कमरे में चला गया। कहा कि मेरे पाप नेत्र है। इस पाप नेत्र से मैं मां का दर्शन कभी नहीं करूंगा। मां के सामने में कभी नहीं देखूंगा। तो यह थी गिरीश की मां के प्रति भक्ति। एक बार ऐसा हुआ और यह प्रसंग मां ने खुद ने वर्णन किया है। ये जैसे वो गिरीश ने कहा था ना ठाकुर को कि आप मेरे घर में आइएगा। मेरे पुत्र होकर के जन्म लीजिएगा तो मैं आपकी सेवा ठीक-ठीक कर पाऊंगा। तो ठाकुर ने पता नहीं उस समय तो मना कर दिया था। या तो फिर हां ऐसा स्पष्ट नहीं कहा था। किंतु ठाकुर की महासमाधि के बाद में गिरीश को सही में एक पुत्र संतान का जन्म हुआ। इतना सुंदर देखने में इतने सुंदर उसके संस्कार गिरीश बिल्कुल ठाकुर ही उसके घर में अवतरित हुए हैं। बोलकर के उसकी संभाल रखते थे। जतन करते थे। उसके लिए खाने का थाला, पहनने के कपड़े सब बिल्कुल नए रखकर के किए थे और बड़ा अच्छा खाना खिलाता था। बड़ा प्रेम करता था। अभी हुआ ऐसा कि एक बार शायद मां कहीं पर थी और यह लोग भी यह गिरीश और उसका संतान यह छोटा बच्चा उस समय उसकी उम्र थी 4 साल। अभी 4 साल का हुआ है किंतु कुछ बोल नहीं रहा है। ऐसा कभी-कभी होता है ना। कोई बच्चा जो बड़ा ही मेधावी होता है या तो इसमें कोई दिव्य गुण होते हैं तो उसकी इच्छा नहीं होती कि और किसी के साथ में वह वार्तालाप करें। वह राधा रानी और कृष्ण की बड़ी सुंदर कहानी है कि वह राधा रानी का जन्म हुआ। आंख नहीं खोल रही थी। और फिर सभी लोग टेंशन में थे कि आंख क्यों नहीं खुल रही है। उस समय बाल कृष्ण वहां पे कैसे भी करके वो टहलते टहलते ना कि किसी कार्य के लिए चले गए और देखा कि राधा रानी की आंखें बंद है तो उनकी आंखों के ऊपर में उन्होंने अपना हाथ रखा और जैसे ही हाथ रखा राधा रानी को समझ में आ गया कि यह भगवान कृष्ण स्वयं है। तब उन्होंने आंखें खोली। क्यों? उस समय आंखें क्यों खोली? क्योंकि आंखें खोल करके सर्वप्रथम दर्शन वो भगवान कृष्ण का करना चाहती। तो ऐसा भी शायद यहां पे हो सकता है कि छोटा बच्चा 4 साल का हुआ है। कुछ बोल नहीं रहा है। एक बार ऐसा हुआ कि उद्बोधन में ही शायद जगह का नाम नहीं पता। मां ने जगह का नाम उल्लेख नहीं किया। मां ने सिर्फ इतना कहा है कि मैं यहां पर फर्स्ट फ्लोर पर थी और ग्राउंड फ्लोर पर गिरीश और उसका लड़का आए हुए थे। अभी एकाएक इस लड़के ने ऊपर की ओर इशारा करके जहां पर मां रह रही थी वह गिरीश का हाथ खींचना शुरू किया और बोला अभी मुंह से कुछ बोल नहीं रहा है तो वह इशारा करके किंतु उसका चेहरे पर ऊ हूं उू ऐसा करके वह इशारा कर रहा है और बोल रहा है मां का नाम मां का दर्शन करना है कुछ उसको पता नहीं सिर्फ इशारा कर रहा है बड़े व्याकुल भाव से वहां पर जाना चाहता है तो फिर गिरीश को पता चल गया कि यह तो अभी गिरीश को को पता है वो माने गिरीश तो यही सोचता है कि यह लड़का तो ठाकुर का ही अवतार है। तो नो डाउट इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वह मां का दर्शन करना चाहता है। तो फिर वहां पे से ही किसी ने बच्चे को उठाकर के मां के पास में ले गए। मां खुद कहती है यह बात कि वह बच्चा आया। बड़े भक्ति भाव से उसने मेरे पैरों में प्रणाम किया और फिर मां ने भी उसको इतना स्नेह किया। अभी मां मां कहती है कि गिरीश मानता है कि यह तो ठाकुर का ही अवतार है। मां कहती है मुझे पता नहीं यह भक्त की क्या इच्छा है और ठाकुर की क्या लीला है। मां खुद तो यह स्वीकार नहीं करती किंतु मां यह कहती है कि वह बड़े ही भक्ति भाव से उसने मुझे प्रणाम किया। अच्छा अभी वह लड़का नीचे तो गया किंतु फिर अभी गिरीश का हाथ पकड़ के ऊपर की ओर खींच रहा है कि चलो चलो मां का दर्शन करते हैं। बोल नहीं रहा है मुंह से कुछ किंतु हाथ खींच करके ऊपर की ओर उसको ले जाने का प्रयास करता है। तब गिरीश ने जोर से रोना शुरू कर दिया। गिरीश कहता है कि अरे भाई मैं तो इतना पापी हूं। मेरी पाप दृष्टि है। पाप नेत्र है। मेरे किस मुंह से मैं मां का दर्शन करने को जाऊंगा। किस क्या चेहरा लेकर के मैं मां के सामने उपस्थित होऊंगा। किंतु यह बच्चा रुक ही नहीं रहा है। उसको खींच ही रहा है। खींच ही रहा है। तब कहीं जाकर के गिरीश रोते-रोते अपने बच्चे को गोद में उठा के फर्स्ट फ्लोर पे आया। आकर के सीधा मां के चरणों में साक्षात साष्टांग दंडवत हो गया। और फिर मां को कहता है कि मां इस बच्चे की वजह से मुझे आपका दर्शन करने का आपके श्री चरणों का दर्शन करने का। नजर उठा करके तो मां के सामने देखेगा ही नहीं। श्री चरणों का दर्शन करने का मुझे मौका मिला। मुझे सद्भाग्य मिला। ऐसा करके वो मां का दर्शन करके रोते-रोते फिर से नीचे चला गया। तो देखिए कि यह जो और फिर मां कहती है कि वो बच्चा बेचारा 4 साल का वो 4 साल की उम्र में ही चल बसा। वो पृथ्वी पर ज्यादा रहा नहीं। अभी ठाकुर ही आए थे गिरीश की मनोवांछा पूर्ण करने के लिए कि नहीं किसको पता किंतु जो भी है यहां पर देखिए कि यही गिरीश जो कि ठाकुर के साथ में इतना गालागाली करता है ठाकुर जैसे कि पूरे अपने आत्मीय है इस तरह से व्यवहार करता है और यहां पे मां के सामने कितना भक्तिपूर्ण मां के चरण छोड़कर के मां के सामने कभी देखेगा भी नहीं इस तरह की इस गिरीश की भक्ति है तो यह जो कंट्रास्ट है व्हिच इज़ रियली सरप्राइजिंग कि यदि इस तरह का मान और आबदार बांग्ला में जिसको कहते हैं मान और अभिमान यदि कोई करता था अपने ऑर्डर में तो वह गिरीश ही था। किंतु गिरीश ने इस तरह से मां के साथ में कभी नहीं किया। जिसने किया है वह है वह पागली मामी और रा माने मां का जो पूरा फैमिली है उन लोगों ने मां के साथ में जो दुर्व्यवहार किया है अरे बाप रे वो पागली मामी मां को इस तरह की गाली देती थी बात बातबात में मां के साथ में झगड़ा करती थी मां को मारने को दौड़ जाती थी क्या से क्या नहीं करती थी किंतु भक्तों के भीतर में इस तरह से मां के साथ में किसी का बिहेवियर बीच-बीच में हुआ होगा एक पागल की कहानी बीच में हमने देखी थी कि किस तरह से वह मां के पास में जाकर के कहता है कि मां ठाकुर की जो भक्ति है, ठाकुर का पागलपन है, उसका एक अंश मुझे भी दे दो। उसका एक छींटा मुझे भी दे दो। ऐसा करके फिर वो मां को कहता है कि क्या मैं ठाकुर की तरह दिगंबर हो जाऊं? ठाकुर की तरह अपने कपड़े निकाल करके बस मैं अभी वह ईश्वर में मग्न हो जाऊं। तो मां बोलती है बेटा धीरे-धीरे होगा। जल्दबाजी मत करो। यह सब जोर करके यह सब होता नहीं है। स्वाभाविक अवस्था में यदि वस्त्र निकल जाते हैं तो वह ठीक है। तो तब तक तो यह भक्त खड़ा हो गया कपड़े निकालने के लिए कि मैं अभी दिगंबर हो जाता हूं। तब वो जो बाकी वो जो मां के साथ में जो सेवक संतान थे उन्होंने पकड़ करके उसको वहां से ले गए। तो जो भी है किंतु वह तो जो म सही-सही में पागल था। वो उद्बोधन में जाकर के गड़बड़ करता था। फिर वहां पर भक्तों ने उसकी पिटाई भी की थी और फिर बाद में कहीं उसका दिमाग बाद बातबाद में कहीं पर ठिकाने आया था। वह जो हरीश की कहानी है वह भी मां के पीछे में दौड़ा था। इस तरह से किंतु बाय दैट टाइम उसका दिमाग बिल्कुल बिगड़ गया था। तो जिन लोगों का वो सर्टिफाइड पागल थे उन्होंने ही मां के साथ में ऐसा कुछ करने का प्रयास किया है। जो नॉर्मल डिवोटी थे उन्होंने मां के साथ में मान अभिमान बात बातबात में किया होगा। किंतु जितना एक्सट्रीम यह गिरीश चला गया था ठाकुर के साथ में ऐसा किसी ने नहीं किया। तो एक बात है यहां पे जो गंभीरानंद जी महाराज कहना चाहते हैं कि मां पृथ्वी पर आती है जिसकी वजह से हम उसके साथ में मान और अभिमान कर सके। उसके साथ में झगड़ा कर पाए। जैसे कि ठाकुर का जगत जननी के साथ में जो रिलेशन था वह पूरा हमने देखा कि कितना आत्मीयता का वो नाता था। कभी-कभी ठाकुर नाराज भी हो जाते थे। कभी-कभी ठाकुर वो मां के सामने यह भी करते थे कि अरे बैठ बैठ मैं थोड़ा सा मंत्र बोल लूं बाद में खाना खाना। किंतु नहीं वो भोग धराया है। जगत जननी ने वो मंत्र समाप्त होने से पहले ही खाना खाना शुरू कर दिया। और ठाकुर नाराज भी हो जाते थे। तो वह जो रिश्ता था दिव्य रिश्ता वो किसी भक्त ने सदै पंच महाभूत के शरीर में रहते रहते मां के साथ में नहीं रखा। किंतु यह जो हम अपने मानस दृष्टि से मानस यह जो नेत्र है उसके माध्यम से हम मां के साथ में यह रिश्ता रख ही सकते हैं। इसीलिए जो मां काली के साथ में जगत आध्या शक्ति जगदंबा के साथ में ठाकुर का जो रिश्ता था वही रिश्ता हम अपने मानस जगत में मां शारदा देवी के साथ में रख सकते हैं। सो दैट इज़ वन क्लेरिफिकेशन कि यह जो इतनी सारी हमने बात की किंतु वास्तविकता में अह फिजिकल वर्ल्ड में इस तरह से मां का जो मां के संतानों का मां के प्रति भाव था वो बड़ा ही रिस्पेक्टपूर्ण था। बड़ा ही श्रद्धापूर्ण था। अच्छा अभी इस चैप्टर में थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं। क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज? अहेतु करुणामय गुरु शिष्य के उच्च तत्व परिचय और उपदेश दिया ताहार मने जागतिक भोग सुख प्रति वैराग्य संचार करेन जो अहेतुक और करुणामय गुरु है अहेतुक अर्थात कि क्या कि इस तरह के गुरु करुणामय तो समझ गए किंतु अहेतुक अर्थात कि इस तरह के गुरु जिसका कि शिष्य के प्रति किसी स्वार्थ की भावना नहीं है शिष्य मेरा यदि राजा होगा तो मुझे कोई राजगुरु की पदवी दे देगा या तो फिर मुझे बहुत सारी दक्षिणा दे देगा या तो फिर मुझे सब यह भोग की चीजें मेरे लिए जुगाड़ करके रखेगा इस तरह के गुरु नहीं जो संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होते हैं उस तरह के गुरु हालांकि देखिए कि यहां पे एक रिवर्स भी एक बात है वो जो ठाकुर का ही बड़ा सुंदर उदाहरण है इसी एक अच्छा पहले तो इस सेंटेंस को कंप्लीट कर लेते हैं बाद में उस उदाहरण को देखेंगे तो क्या कहते हैं गंभीरानंद जी जो संपूर्ण रूप से निस्वार्थ है जो करुणामय है इस तरह के गुरु शिष्य को उच्च तत्व का परिचय देते हैं और उपदेश देते हैं और परिचय और उपदेश देकर के उसके मन को सांसारिक भोग सुख से उसके मन में वैराग्य का संचार करते हैं। सांसारिक भोग सुखों के प्रति वैराग्य का संचार करते हैं। अच्छा ये तो हो गया कि ये यदि गुरु करुणामय होते हैं गुरु निस्वार्थ होते हैं तो फिर उसके जो भक्त है उसका वो कल्याण करेंगे किंतु यदि भक्त की भी यदि गुरु के ऊपर में भक्ति है तो गुरु यदि स्व निस्वार्थ नहीं भी होंगे करुणामय नहीं भी होंगे स्वार्थी भी होंगे दुष्ट भी होंगे तब भी वह शिष्य का तो कल्याण होगा साथ में गुरु का भी कल्याण होगा वही फेमस कहानी कहानी जो ठाकुर कहते हैं कि एक गोपालन थी उसके गुरु थे तो गुरु के वहां पर कुछ प्रसंग था तो गुरु ने इसको कहा कि तुम जाकर के उस दिन जब प्रसंग है मेरे लिए इतनी हांडी भर के दही है, मलाई है, दूध है यह सब लेकर के आना। अभी इसके पास में तो ज्यादा कुछ था नहीं। तो वह जितना कुछ था एक छोटी सी हांडी में लेकर के गई। गुरु बड़े नाराज हो गए। कहा कि इसको ले जाओ यहां से। मैं तो तुम्हारे पास में से इतनी सारी अपेक्षा कर रहा था। ले आई हो सिर्फ इतना सा ही। अभी यह जब बात उन्होंने कही तब कहीं जाकर के वह रोती-रोती वापस गई। उस अभी देखिए कि उसकी गुरु के प्रति जो भक्ति थी वह इतनी ज्यादा थी कि गुरु ने उसको स्वीकार नहीं किया। तो वह भक्ति की वजह से उसके मन में जो कष्ट हुआ भगवान ने आकर के उसको दर्शन दिया। कहा यह हांडी ले जाओ। इसमें से जितना भी दूध, घी है जो निकालना चाहते हो निकाल सकती हो। तो वह बड़ी खुश होकर के गुरु के पास में गई। गुरु ने देखा तो गुरु आश्चर्यचकित हो गए कि अरे तुमको भगवान ने दर्शन देकर के ऐसा कुछ दिया तो मुझे भी तुम भगवान का दर्शन करवा दो। तो फिर वह उसको लेकर के वो नदी के किनारे जहां पर वह भगवान का दर्शन हुआ था गई और फिर भगवान उसको दर्शन नहीं दे रहे हैं गुरु को। तो फिर यह गोपालन ने वह कहा कि आप उनको भी दर्शन दीजिए। यदि मैं आप मुझे यदि सही-सही प्रेम करते हैं, मुझे सही-सही आप मेरे पर करुणामय है, आशीर्वाद देते हैं, तो इनको भी दर्शन दीजिए। तो फिर भगवान ने उसको एक अशरीरी आवाज के रूप में कहा कि अच्छा मैं दर्शन तो तुमको ही दूंगा किंतु यदि तुम्हारे गुरु पे इतनी भक्ति है तो भले माने वह अच्छी बात है। ऐसा करके कुछ एक आवाज आई और गुरु भी बड़े धन्य हो गए। तो देखिए कि यहां पे दोनों हो सकता है कि गुरु यदि अहेतुक और करुणामय है तो वह शिष्य का कल्याण कर सकते हैं और यदि शिष्य की गुरु पे अपार भक्ति है तो फिर वह शिष्य गुरु का भी कल्याण कर सकते हैं। अशेष ऐश्वर्यमई सर्वगुणालंकृता इष्ट देवी जागतिक शशिता और पंकलतार उर्ध्व अवस्थान पूर्वक साधके सम्मुखे एक अनबद्ध अतिलोभनीय आदर्श तुल्या ध्वर्या ताहार मने तल्लाभेर जन अभिराम प्रेरणा जागा थाकेन इष्ट देवी जो हमारी इष्ट है माने कि मां शारदा या तो फिर मां काली जिसको भी हम इष्ट के रूप में स्वीकार करते हो जागतिक ससीमता अर्थात कि यह सांसारिक लिमिटेशन है। असीम यानी कि अनंत। ससीम यानी कि लिमिटेड। तो यह जागतिक यानी कि इस जगत को जो रिलेटेड है वह यानी कि सांसारिक लिमिटेशन और पंकीलता यानी कि यह जो दुष्ट भाव होते हैं मन के उसके ऊपर में उर्ध्व अवस्थान पूर्वक उसके ऊपर में अवस्थान करके साधक के सामने एक अनबद्ध्य जिसको कि आप भाषा में व्यक्त नहीं कर सकते हैं। इस तरह का अति लोभनीय आदर्श बड़ा ही जिसके प्रति हमारा आकर्षण होता है। इस तरह का एक आदर्श उसके सामने प्रस्तुत करके उसके मन में उस उच्च आदर्श को प्राप्त करने के लिए अविराम प्रेरणा जगाती है। यहां पर देखिए कि जो अशेष ऐश्वर्यमई और जिसके भीतर में सर्व प्रकार के अल गुण गुण रूपी अलंकार है। गुणालंकृता गुण रूपी अलंकार है। वो देवी इष्ट देवी वो पूरे जगत की जो लिमिटेशन है उसके ऊपर उठकर के साधक के मन में एक लक्ष्य उच्च लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अविराम प्रेरणा जगाती रहती है। यहां पे देखिए कि यदि हम कर्म का सिद्धांत को थोड़ा सा फॉलो करेंगे तो यह जिसको हम मुमुक्षुत्व कहते हैं वह हमारे भीतर में से आना चाहिए। ऐसा मैंने मुझे याद नहीं है कि वेदांत पढ़ते-पढ़ते मैंने कभी ऐसा पढ़ा हो कि ईश्वर यह जो आत्म तत्व है वह आत्म तत्व हमारे भीतर में अपने को प्राप्त करने के लिए आकर्षण जगाता है। जितना मेरा रीडिंग जाता है उसमें मुझे ऐसा ही लगता है कि हमारे भीतर में वह मुमुक्षुत्व जागृत होना चाहिए। जब वह मुमुक्षुत्व जागृत होगा उसके बाद में हम यह यम नियम रूपी या तो फिर यह जो बाकी की साधनाएं हैं महावाक्य का स्मरण मनन निद्यासन इस तरह की साधना का प्रारंभ करेंगे। किंतु यह आत्म तत्व या तो ब्रह्म तत्व स्वयं अपने को प्राप्त करवाने के लिए हमारे भीतर में मुमुक्षुत्व प्रदान करें। इस तरह से मैंने कहीं नहीं पढ़ा। किंतु यहां पर देखिए कि गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? देवी स्वयं इस तरह का एक उच्च आदर्श हमारे सामने प्रस्तुत तो करेगी साथ-साथ में ही हमारे अंतर्मन में उस आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रेरणा भी जागृत करेगी जिससे कि हमारा मन यह जो संसार जागतीय ससीमता अर्थात कि सांसारिक लिमिटेशन है और पंकीलता अर्थात कि यह जो दुष्ट भाव है इसके उर्ध्व उठकर के हमारा मन मन सतत वह ईश्वर तत्व को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता रहे। कृपा सुमुखी सहाश बोधना मां संताने हृदय स्नेह द्रवीभूत करिया ताहार दुखमय अतीत भुलाइया देन एवं प्रबल आकर्षण एक अनिर्वचनीय निश्चिंततामय आनंद सागर दिके ताहा के टानिया लोया चले यह लिखा है बेंगली में किंतु है पूरा संस्कृत कृपा सुमुखी जिसके भीतर में कृपा का आविर्भाव हुआ है। जिसका चेहरा कृपा से भरा हुआ है। शहास्य बोधना जिसका वदन यानी कि चेहरा सहास्य साहास्य वदना यानी कि जिसका वदन या चेहरा हास्य से भरपूर है। इस तरह की मां संतान के हृदय को स्नेह से द्रवीभूत करके स्नेह से आपुत करके स्नेह से भर करके स्नेह से उसके हृदय को पूरा सिंच करके उसका दुखमय जो अतीत है वह भुला देती है और प्रबल आकर्षण से उसके मन को एक अनि अनिर्वचनीय निश्चिंततामय आनंद सागर की ओर उसको खींच करके चलती है। यह बड़ा ही इंपॉर्टेंट है। देखिए कि क्या कहना चाहते हैं। जो कि जिसके भीतर में कृपा है जिसका चेहरा हास्य से भरपूर है इस तरह की मां हमारे मन को एक हमारा जो दुखमय जो इतिहास है हमारे जीवन में जितने भी दुख है ये जो रिग्रेट मिडिल एज में ये जो सब रिग्रेट आती है हमारे मन में मिडिल एज में ओल्ड एज में कि अच्छा मैं ऐसा करता तो कैसा रहता ऐसा नहीं किया इस बात का मुझे बड़ा दुख है वो अपॉर्चुनिटी थी मेरे पास में वह मेरे हाथ में से चली गई। यह कितनी हजार तरह की रिग्रेट यह मिडिल एजेस में या तो ओल्ड एज में होती है। युवावस्था में पता नहीं चलता। किंतु जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे ही जीवन में जो निष्फलताएं हैं वह निष्फलताएं जैसे कि हमारे मन में एक बहुत बड़ा आकार धारण करके प्रकट होती है। तो यहां पर महाराज कहते हैं कि यह जो दुखमय अतीत जो है हमारा अतीत यानी कि इतिहास भूतकाल उसको भुला कर के उसको हम उसको हमारे मन में से विस्मृत करा करके हमको एक प्रबल आकर्षण से हमारा हाथ खींच करके चलती है। प्रबल आकर्षण किस ओर अनिर्वचनीय निश्चिंततामय आनंद सागर किस तरह का आनंद सागर जो कि अनिर्वचनीय है अर्थात कि इसको आप वाणी से प्रकाश नहीं कर सकते हैं। निश्चिंततामय वहां पर किसी भी तरह की निश्चिंता नहीं है। आप संपूर्ण रूप से निश्चिंत होकर के संपूर्ण रूप से ईश्वर पर भरोसा करके इस आनंद सागर में आप तैर सकते हैं। इस आनंद सागर में आप डुबकी लगा सकते हैं। तो क्या करती है मां? हमारा जो दुखमय अतीत है उसको हमको भुला देती है। उससे हम वह हमारे मन में से निकाल करके यह जो इस तरह का एक आनंद सागर जिसके बारे में आप शब्दों में वो आनंद व्यक्त भी नहीं कर सकते। इस तरह का आनंद सागर कि वहां पर जाकर के सब तरह की चिंताएं, वासनाएं, सब तरह की रिग्रेट संपूर्ण रूप से अदृश्य हो जाएगी। इस तरह का आनंद सागर के प्रति हमको खींच करके ले जाएगी। सर्वप्रथम तो इस आनंद सागर के प्रति हमारे मन में एक प्रबल आकर्षण खड़ा करेगी और फिर प्रबल आकर्षण जब खड़ा होगा तब हमारे हाथ पकड़ करके हमको उस ओर खींच के चली जाएगी। देखिए यह जो संस्कृत लैंग्वेज का जो एक पावर है कि शब्दों एक के बाद एक शब्द इस तरह से रचना करेंगे कि एक-एक शब्द को समझने के लिए हमको एक-एक सेंटेंस बनाना होगा। इसीलिए जब और कोई भी भाषा हो चाहे बेंगली हो ना हिंदी हो ना गुजराती उसमें एक सेंटेंस पढ़ने से उसका अर्थ सीधा समझ में आ जाता है। जबकि संस्कृत में इस तरह के हैवी वर्ड जब लिखे हुए होते हैं तो एक-एक वर्ड को एक-एक सेंटेंस बना करके समझाना पड़ता है। तो देखिए फिर से एक बार यह पढ़ता हूं। यह जो सेंटेंस है कृपा सुमुखी साहस्य वदना मां इस तरह की मां जो कि कृपा सुमुखी है जो कि साहस्य वदना है संतान के हृदय को स्नेह से द्रवीभूत करके उसके दुखमय अतीत को भुला करके और प्रबल आकर्षण से उसको अनिर्वचनीय निश्चिंततामय आनंद सागर की ओर उसको खींच करके ले जाती है। एक-एक शब्द समझने के लिए आपको एक-एक सेंटेंस कंपोज करना पड़ेगा। विशेषत ए पवित्र भा आबिलतार स्पर्श मात्र नाई आर नाई एकने स्वार्थ लेेश अथवा अर्थहीन उच्छवास खास करके इस पवित्र भाव में किसी भी तरह का दुष्ट भाव किसी भी तरह की यह जो सांसारिकता है उसका स्पर्श भी नहीं है ना ही है यहां पर स्वार्थ या तो फिर अर्थहीन उच्छवास देखिए यह जो उच्छ्वास का अर्थ क्या है उंखलता या तो फिर रजस या तो फिर कहेंगे कि अर्थहीन एंथूजियाज्म यूज़लेस एंथूजियाज्म ये जो किसी किसी के मन में यह बहुत ज्यादा उल्लास प्रगटित हो जाता है ना अभी जैसे देखिए कि ये उच्छवास किस तरह से हम समझेंगे इस भाव को ठाकुर ने मां को कहा था कि यह लक्ष्मी है वो लक्ष्मी देवी यानी कि ठाकुर की भतीजी तो उसका यह जो भाव है वैष्णव भाव वो जब भी वह भक्त इकट्ठा होते हैं तो उनके सामने नृत्य कीर्तन करके भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करना शुरू कर देती है। किंतु ठाकुर कहते हैं कि तुम उसके उसके साथ में ताल से ताल मिलाकर के अपनी लज्जा को भांगना मत। लज्जा ही स्त्री का सर्वश्रेष्ठ आभूषण है। लक्ष्मी दीदी थी, लक्ष्मी देवी थी जो कि भक्तों के सामने इतनी लज्जित नहीं होती थी। नृत्य कीर्तन भी कर देती थी। यानी कि उनके जो उनका जो भाव था उसमें यह उच्छवास था। जबकि मां के भाव में लज्जाशीलता थी। तो यह इसलिए यहां पर लिखा है कि अर्थहीन उच्छवास बिना कारण का कहेंगे कि उच्छवास ये मां के देवी के भीतर में नहीं होता है। क्या कहते हैं? खास करके इस पवित्र भाव में सांसारिकता का स्पर्श मात्र नहीं है और ना ही है यहां पर स्वार्थ या तो फिर यह अर्थहीन उच्छवास ए संजोमेर प्रतिमूर्ति और प्रसादमई मायर तुलना ना यह जो संयम की प्रतिमूर्ति है और प्रसादमई मां उसकी तुलना नहीं है। यहां पर प्रसादमई अर्थात कि सिर्फ यह जो वो खाने वाला जो प्रसाद होता है सिर्फ वही नहीं किंतु जैसे कि योग शास्त्र में चित्त प्रसाद के बारे में कहा गया है। चित्त प्रसाद के बारे में चार गुणों का वर्णन है। मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा जो हमारे समवयस है, जो हमारे कलीग हैं उनके साथ में मित्रता का हमारा वर्तन होना चाहिए। फिर जो हमारे से छोटे हैं उनके प्रति करुणा होनी चाहिए। जो हमारे से बड़े हैं विद्या में या तो गुण में या तो उम्र में उनके प्रति हमारी श्रद्धा होनी चाहिए और जो हमारे दुश्मन है उनको हमको नजर उनको हमको इग्नोर करना है। यानी कि उनकी दुश्मनावट अपने मन में भर के सामने दुश्मनावट प्रकट नहीं करनी। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि कोई शत्रु हमारा हानि करने को आए तो हम चुपचाप यह सहन कर ले। वह जब हमको हाम करने को आता है हमारे सामने हाथ उठाता है तो हाथ को तोड़ देना है। उसमें कोई प्रश्न नहीं। किंतु झूठमूठ का उसके प्रति वेर रोपण करके द्वेष भाव अपने मन में रोपण करके अपने मन को टॉक्सिक नहीं बनाने देना है। तो यह मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा इसको चित्त प्रसाद कहते हैं। तो जब यह यहां पे यह कहते हैं गंभीरानंद जी कि प्रसाद दात्री या तो फिर प्रसाद मई तो यह जो संयम की प्रतिमूर्ति

संयम की प्रतिमूर्ति माँ सारदा

और यह प्रसाद मई मा यह संयम की प्रतिमूर्ति भी तो हमको पता है। इनफ एग्जांपल है हमारे सामने कि किस तरह से वह मां वहां पे नबत में रहती थी। किस तरह से मां वहां पे काशीपुर में रहती थी। किस तरह से मां श्यामपुकुर में रहती थी। श्यामपुकुर जब था वह तो शुरू-शुर में ठाकुर को कुछ समय के लिए रखा गया था। उस समय वहां पर एक ही कमरा था जिसका कि सभी लोग व्यवहार भी करते थे। बाथरूम एक था। तो जिसको कि सभी लोग व्यवहार करते थे। तो फिर मां को दो रात को 2:00 बजे उठकर के वह शौच वगैरह स्नान वगैरह सब समाप्त करके फिर वह छत थी वहां पर वह बैठ जाती थी जप करने के लिए। रात को सोना देरी से है और सुबह को उठना इतना जल्दी है। इसके बावजूद वो गंभीरानंद जी लिखते हैं कि अपनी हृदय में आशा और भरोसा रखकर के मां ठाकुर की सेवा करने के लिए तत्पर हुई थी। तो यह जो संयम की प्रतिमूर्ति है और यह जो प्रसाद मई है वह है हमारी मां इसकी कोई तुलना नहीं है। साधक मातार अंचल धरिया मातु क्रोड़े निर्भय बोश्या संसार कांतार अतिक्रम करते पारे साधक मां का आंचल पकड़ करके मां की गोद में निर्भय रूप से बैठकर के संसार अरण्यय अतिक्रम कर सकता है। संसार रूपी ये जो वेस्ट लैंड है उसको वो पार कर सकता है। अधिकंतु भोग लोप ओ इह लोक सर्वस्व देहात्मवादी मानव समाज के उच्चतर अनुभूति राज्य उद्बुद्ध करार जनो श्री भगवती ए जुगे मातृ मूर्ति ते अवतीर्ण होवा एकांतो आवश्यक छिलो साथ-साथ में ही भोग लोलूप और इहलोक सर्वस्व देहात्मवादी मानव समाज किस तरह का मानव समाज जो कि भोग लोूप है इहोलोक सर्वस्व अर्थात कि यह जगत जो है सांसारिक जगत भौतिक जगत यही सब कुछ है। इसके परे और कुछ नहीं है। इसके परे जो कहानियां सुनते हैं पुराण में वेदों में वह सब कहानियां ही है। इस तरह का यह लोक सर्वस्व देहात्मवादी देह के भोग सुख के ऊपर में जिसकी पूरी नजर है। इस तरह के मानव समाज को उच्चतर अनुभूति राज्य की ओर धावित करने के लिए प्रेरित करने के लिए श्री भगवती का इस युग में मातृति के रूप में अवतरण होना अवतीर्ण होना बहुत ही आवश्यक था। अत्यंत आवश्यक था। भारत ताई आज अपूर्व चेतन विग्रह के हृदय प्रतिष्ठित कोरिया धनो इसीलिए भारत आज इस अपूर्व चेतन विग्रह को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करके धन्य हुआ है। देखिए कि इस जो समाज है आज का जिसमें यह देह के प्रति जो आकर्षण दैहिक आकर्षण है। इंद्रियों के विषय के प्रति जो आकर्षण है। इस तरह के समाज में आप किस आप यदि यह कहेंगे कि वैदिक युग की तरह सतयुग की तरह आप सालों के बाद सालों तपस्या करते ही जाइए और फिर कहीं जाकर के आपको वंस वाइल आपको थोड़ा बहुत कुछ दर्शन होगा या तो फिर आध्यात्मिक अनुभूति मिलेगी। इस तरह की जो तपस्यामय जीवन, कठोरतामय जीवन, इंद्रिय सुख के प्रति विरागमय जीवन, ब्रह्मचर्य यह यदि आप इन लोगों को बताएंगे तो यह बच्चे लोग आजकल के बड़े डर जाएंगे। यह जो मैं यहां पर वो स्टूडेंट्स का क्लास लेता हूं। मैं कभी यह ब्रह्मचर्य शब्द उसका कोई उच्चारण नहीं करता। क्योंकि इस तरह के शब्द सुनकर के ही लोग डर जाते हैं। और फिर क्या है कि न्यूज़ पेपर में देखते रहते हैं कि इस तरह की बातें करने वाले क्या-क्या सब वो ये सब स्कैंडल करते रहते हैं। तो इसके लिए इस तरह की बातों के प्रति इस तरह के शब्दों के प्रति लोगों के मन में एक तरह का एक विद्वेष भाव जैसे कि जागृत हो गया है। भले ही चाहे मुंह से हजार बातें करें। मुंह से 10 मंदिर में चले जाए। वह कहां-कहां वह तीर्थ क्षेत्र चले जाए, वह दान दक्षिणा भी कर देंगे। किंतु इस सब बातों में कोई सत्यता है। इस तरह से उनके मन में गंभीर रूप से कोई रेखापात नहीं करता। मन के भीतर में कोई इसकी इंपैक्ट नहीं होती। वह सब सरफेस के ऊपर में है। मेरी जो यह भोग वासना है, वह मुझे अच्छे से मेरी भोग वासना की पूर्ति होती रहे। मेरा यह जो सांसारिक जीवन है, वह अच्छे से चलता रहे। इसीलिए यह लोग प्रार्थना करते हैं। नहीं कि यह संसार मेरा जो चल रहा है वह टूट जाए और इसके बाद में मुझे ईश्वर के प्रति मेरा मन जो है वह धावित हो जाए। देखिए कि यहां तक कि ठाकुर और स्वामी जी स्वयं इन दोनों के पिता का छोटी उम्र में ही देहांत हुआ था। और वह जो उनके हृदय में जो एक शोक जागृत हुआ ग्रीफ जो जागृत हुई इस ग्रीफ ने इस शोक ने उनके मन को ईश्वर की ओर ले जाने में बड़ी सहाय की थी। यदि ठाकुर और स्वामी जी के बारे में स्वयं यह बात सही है तो यह जो जिसका मन इस तरह के संसार के प्रति इतना गंभीर रूप से आसक्त है उन लोगों के मन में कब कहीं जाकर के ईश्वर के प्रति थोड़ा सा भी वह प्रेम प्रकट होगा ना कि आध्यात्मिक जीवन के प्रति आकर्षण प्रकट होगा ना कि आत्म तत्व है यह स्वीकार भी करेगा यह कब करेंगे लोग तो इसलिए इस देहात्मवादी यह लोक सर्वस्व भोग लोलुप मानव समाज को उच्चतर अनुभूति के राज्य की ओर प्रेरित करने के लिए श्री भगवती का इस युग में मातृति में अवतीर्ण होना बड़ा ही आवश्यक था। यदि मातृति का मातृति के प्रति हमारे मन में थोड़ा सा भी एक प्रेम प्रकट होता है थोड़ा सा भी एक स्नेह प्रकट होता है हमारे मन में थोड़ा सा भी यह संतान भाव जागृत होता है तो यह भाव जो है वह हमारे संस्कारों के सामने युद्ध करता रहेगा। जैसे कि कल हमने देखा था कि हमारे मन के भीतर में तीन तरह के एक फैक्टर्स है। तीन डायमेंशन है हमारे मन की। एक तो है हमारे विचार। दूसरा है हमारे संस्कार और तीसरा है हमारा भाव, इमोशन या तो सेंटीमेंट। अभी यह संस्कार जो है उसका यह जो तांडव नृत्य जो है यह यहां पर महाराज ने कहा ना कि हमारा दुखमय अतीत यह संस्कार ऐसा एक तांडव नृत्य करेंगे बीच-बीच में कि हम लोग हैरान परेशान हो जाएंगे। कोई-कोई लोग तो आत्महत्या तक करने के लिए चले जाते हैं। सबसे फेमस एग्जांपल हमारे मास्टर महाशय का। तो यह संस्कार है या तो फिर यह संसार है। इसका यह जो कष्ट है उसके सामने हम यदि विचार मात्र से फाइट करने को जाएंगे तो हो सकता है कि इस फाइट में हम सक्सेसफुल ना हो। क्योंकि विचारों की शक्ति तभी बढ़ेगी कि जब हम संपूर्ण रूप से इंद्रियों के विषय के प्रति विरागवान हो जाए। इंद्रियों के विषय के प्रति संपूर्ण वैराग्य हमारे मन में प्रकट हो। 100% ब्रह्मचर्य का पालन करें तो फिर हमारे विचारों में वह शक्ति आएगी कि जैसे वह ठाकुर की कहानी ज्ञान रूपी खड़ग से ज्ञान रूपी अस से उन्होंने इवन मां को भी दो टुकड़ों में बांट दिया था और उनका मन सीधा अद्वैत वेदांत अद्वैत अनुभूति की ओर निर्विकल्प समाधि की ओर चला गया था तो वह विचारों की शक्ति तो अपने में है ही नहीं क्योंकि मन तो आसक्त होकर के रहा है मन तो डूब रहा है इस विषय वासना में तो फिर यह संस्कारों का यह जो तमूलनाद है, संस्कारों का यह दानव नृत्य है, इसके सामने हम किस चीज से फाइट करेंगे? तो वह है भाव। भाव के भीतर में वह शक्ति है कि आप संस्कार के सामने टिक सकते हैं। यह संस्कार और भाव। यह दोनों एक दूसरे को खत्म कर दे, कांटे से कांटा निकाल दे ठाकुर की भाषा में। और फिर जब यह दोनों चले जाएंगे तब हमारा मन वासना मुक्त हो जाएगा। वासना मुक्त मन से हम यह आत्मविचार जब करेंगे जब हम महावाक्य विचार करेंगे प्रणवोपासना करेंगे उपनिषद की यह जो उपासना पद्धतियां है उसका अनुष्ठान करेंगे तब कहीं जाकर के हम ब्रह्म भाव में स्थित हो जाएंगे। तो यह कांटे से कांटा निकालने के लिए इस मां का मातृति के रूप में भगवती का श्री भगवती का इस युग में मातृति के रूप में अवतीर्ण होना अत्यंत आवश्यक था। और इस मूर्ति के रूप में जब मां भगवती अवतीर्ण हुई है। इसीलिए भारत आज इस अपूर्व चेतन विग्रह को अपने हृदय में प्रतिष्ठित करके धन्य हुआ है। आज यहीं तक अभी मिलते हैं नेक्स्ट क्लास में। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु उसमें जैसे स्वामी जी बोलते हैं कि लव इज द ग्रेट पावर। सो लव टेकिंग कोटेशन फॉरगेट से ऑल दिस अबव अबव ऑल दिस इज़ लव। सो बड़ीड़ी बातें होती है। फॉरगेटिंग ऐसा है कि दिस नॉट दिस सबके ऊपर लव होता है। लव लव काइंड ऑफ़ एक बड़ी सूदिंग फीलिंग तो आती है कि सपोज समबडी लव टू योर मदर तो आपको बड़ी सूदिंग एक सूिंग फीलिंग आती है। बहुत ही सुखकारी फीलिंग आती है। दैट इज़ बट स्वामी जी बोलते लव इज़ द ग्रेटेस्ट पावर। पावर वेरीाइल से पावर एक बड़ी अजीब सी आपके दिमाग में अलग एक इमेज होगी इसराइल पावरफुल सो यू क सी पावर समथिंग वायलेट समथिंग खुशी समथिंग व्हिच कन्फ्लुएंस समथिंग व्हिच बट लव इस काइंड ऑफ़ एक छोटा सा फूल ऐसा फूल वाली वो फीलिंग स्वामी जी से लव इज अ ग्रेट पावर व्हाट इज दिस

प्रश्न: शारीरिक सामर्थ्य शक्तिशाली है लेकिन प्रेम कैसे शक्तिशाली हो सकता है?

क्योंकि वह संस्कार के सामने लड़ता है। माने वो आपके दुश्मन दानवों का संहार करना फिर भी इजी है। संस्कार का संहार कैसे करेंगे? तो यह भाव के माध्यम से संस्कार का संहार करेंगे। अभी जैसे देखिए हाइपोथेटिकल एक एग्जांपल है कि मुझे मिठाई नहीं खानी है। राइट? मेरी नजर के सामने मिठाई आ जाती है। तभी वह जो मेरे संस्कार है, यह मिठाई के प्रति जो मेरा आकर्षण है, वह मेरे मन को इतना लुभाता रहेगा कि वह नहीं खाए बिना मैं नहीं रह पाऊंगा। इस समय यदि मैं हजार विचार करूं कि मुझे डॉक्टर ने मना किया है, डायबिटीज हो गया है, मिठाई नहीं खानी। तो शायद हो सकता है कि मेरे विचार मेरे जो आकर्षण है मिठाई के प्रति वो उसको ना रोक पाए। माने वो वो आकर्षण इतना पावरफुल है। उस समय यदि यह भाव साधना यानी कि यह जो मां के साथ में मैं वार्तालाप कर रहा हूं। मां के साथ में मैं हंसी मजाक कर रहा हूं। मां मुझे स्नेह कर रही है। यह भाव यदि अपने मन में प्रकट करें तो हो सकता है कि यह जो आकर्षण है मिठाई के प्रति उसको वो काट दे। यानी कि दो इमोशन है यहां पे। दोनों स्ट्रांग इमोशन है। तो, यह जो मिठाई के प्रति जो हमारा स्ट्रांग अटैचमेंट है, उसके अपोजिट यह जो अट्रै अट्रैक्शन है, वो इट इट विल कट इट ऑफ। और सबसे इंपॉर्टेंट है कि जैसे काम भाव। अपने मन में जब काम भाव जागृत होता है, स्वामी जी ने कहा है कि यदि मन में काम भाव जागृत हो तो साधुओं के बीच में जाकर के निवस्त्र हो जाइए। और कहिए कि देखिए मेरे मन में यह भाव आ रहा है। यह काम भाव जो है ना वह अंधेरे में पनपता है। अकेलेपन में पनपता है। सबके सामने जाकर के अपने मन की भावना को व्यक्त कर दीजिए। यह वो पूरा भाग जाएगा वहां से। वह दिन का प्रकाश जो है या तो यह जो एक्सपोज़र है वो यह सहन नहीं कर पाएगा। किंतु ऐसा करने की क्षमता कितने लोगों में है। राइट? तो अभी उस समय यदि यह मां के साथ में संतान का भाव इस भाव को यदि हम जागृत करते हैं अपने माइंड में यह विजुअलाइज करते हैं कि मैं भी ठाकुर की तरह वहां पर दक्षिणेश्वर में मां काली के मंदिर में पूजा कर रहा हूं और मां काली स्वयं जाग्रता होकर के मेरे साथ में वार्तालाप कर रही है। मुझे कह रही है कि मेरे साथ में मेरे बिस्तर पर शयन करो। मेरे मैं जो खा रही हूं वह अपने हाथों से मुझे खिलाएगी। ऐसा जब वो वो विजुअलाइज करेंगे तो दैट इज अ वेरी पावरफुल एंटीडोट टुवर्ड्स दिस काम भाव।

प्रश्न: हमें मुमुक्षुत्व - महान आदर्शों के प्रति आकर्षण - कौन देता है?

ना मैं समझ गया। स्वामी जी ने खुद अब मास्टर महाशय गए थे वराह नगर मठ में तो स्वामी जी बड़ा दुख करके कहते हैं कि देखिए वेदांत में कहा है कि मनुष्यत्व मुमुक्षत्व महापुरुष संश्रय यह तीन होगा तो फिर आप वेदांत की साधना में आगे बढ़ेंगे। तो स्वामी जी कहते हैं मनुष्यत्व भी मिल गया, मुमुक्षत्व भी मिल गया और महापुरुष संश्रय भी हो गया। ठाकुर का संश्रय। किंतु फिर भी मैं साधना में क्यों आगे नहीं बढ़ रहा हूं? क्यों मुझे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त नहीं हो रही? तो मास्टर महाशय कहते हैं कि इनकी ये अवस्था देखकर के मैं बड़ा ही मंत्रमुग्ध हो गया कि क्या व्याकुलता है इन लोगों के भीतर में। राइट? तो यह जो मनुष्यत्व मुमुक्षत्व महापुरुष संश्रय दैट इज अ फाउंडेशन ऑफ वेदांत साधना। अभी इसके बाद में आप फिर जितना भी है षड रिबु के साथ में लड़ते रहिए। फिर साधन चतुष्टय करते रहिए। महावाक्य विचार करते रहिए। यह जो ये सब करते रहिए। बट दैट फाउंडेशन इज नॉट देयर। आप मनुष्य ही नहीं है। महापुरुष संशय ही नहीं हुआ है। मुमुक्षत्व ही नहीं मिला है। तो फिर आप क्या कर लेंगे? सो यहां पे हमारी बात आकर के अटक जाती है। मां को जाकर के कहेंगे कि यह तो मुझे मुमुक्षत्व ही नहीं मिला। मैं वेदांत साधना में आगे कहां से बढूंगा? तब कहीं जाकर के मां का रोल आता है। अच्छा। वो जो कल हमने वो राम प्रसाद के वो गीत में देखा था ना कि मैं सोच रहा हूं मैं कि मैं तुम्हारा नाम करूं किंतु मैं तुम्हारा नाम करना ही विस्मृत हो जाता हूं। तो अभी तक मैं यह सोच रहा था कि मेरी गलती है किंतु अभी मुझे समझ में आया तुम्हारी सब चतुराई है ये सब। देखिए मैं अपना खुद का अनुभव बताता हूं। मैं ऑफिस में बैठाता हूं। अभी 10 से 12:00 में बैठूंगा वहां पर जाकर के। तो बीच-बीच में अभी काम करना है। बीच-बीच में मन कहां दौड़ता रहेगा? उस समय में इमीडिएटली मैं यह विजुअलाइज करना स्टार्ट कर देता हूं कि मैं मां के साथ में खेल रहा हूं या मां के साथ में बात कर रहा हूं। तो वो इट फर्स्ट ऑफ ऑल इट इज़ वेरी इजी टू विजुअलाइज। कंपेयर टू के मैं आत्मन हूं। मेरे मन में ये सब डिस्ट्रैक्शन कहां से आ गए? उससे ज्यादा मने फार इज़ियर है कि यह विजुअलाइज़ करना कि मैं मां के साथ में बात कर रहा हूं। और जैसा ही मैं विजुअलाइज करूंगा एंड फर्स्ट ऑफ ऑल इट इज इजी सेकंड इट इज वेरी पावरफुल इंस्टेंटली बाकी सब गायब हो जाएगा। दोप मिनट ऐसा होने से फिर से मेरा मन ठिकाने आ जाएगा फिर से काम करना शुरू कर दूंगा। सो इट इज़ लाइक दैट कि आप इंस्टेंटली इसको इनवॉक कर सकते हैं इस फोर्स फील्ड को। इंस्टेंटली यह जो यह बाहर से अटैक होता है उससे अपने को बचा सकते हैं। वेरी इजी एज वेल एज वेरी पावरफुल। यह जो है ना अजपा जप बहुत लोग कहते हैं कि अजपा जप करना है। सतत अपने मन में यह जप चलते रहना चाहिए। तो यदि जप चलता रहेगा सतत अपने मन में तो बाकी सब विचार नहीं आएंगे। डिस्ट्रैक्शन नहीं आएगा। मैंने यह करने का प्रयास किया है। मैं कभी सफल नहीं हुआ कि मैं सोचता हूं कि यह सुबह से जैसे ही यह क्लास खत्म हुआ। मैं जब राजकोट में था तो जैसे ही वो क्लास खत्म होता था। में प्रयास करता था कि अजपा माने यह जो जप है वह सतत अपने से सांसों के साथ में चलता रहे और पहले कॉन्शियसली करना है फिर यह सबकॉन्शियस हो जाएगा ऑटोमेटिक हो जाएगा सांस के साथ में जप चलेगा अपने मन में सतत जप चलता ही रहेगा ठाकुर कहते हैं ना कि राखाल का देखो उसके होंठ वो घूम रहे हैं होठ होठनाडच अर्थात कि उसके होंठ जो है वो चल रहे है क्यों क्योंकि वह सतत जप कर रहा है फिर उसको देख करके ठाकुर को भाव हो जाता था तो यह सब करने का मैंने प्रयास किया है। पढ़ा तो सब कुछ है। पढ़ा नहीं है। ऐसा तो नहीं है। समझा नहीं है। ऐसा भी नहीं है। प्रयास करने से विफल हो गया हूं। 100% आधे घंटे के बाद पता चलेगा। अच्छा मैं तो वो अजपब कर रहा था ना क्या हुआ उसका? तो दैट इज व्हाई आई हैव सीन दिस कि ये विजुअलाइज करना। नहीं मैं मां के साथ में बैठा हुआ हूं। एनीथिंग माने ये कंस्ट्रक्ट आपको खड़े करने पड़ेंगे। बट वंस दोस कंस्ट्रक्ट्स आर रेडी। दे आर सो इजी टू इनवोक एंड दे आर सो पावरफुल इन देयर इफेक्ट। कि वो आपका मन डिस्ट्रैक्शन में से ईजीली वो वापस आ जाएगा। शुरू में थोड़ा सा आपको लगेगा मेहनत करना पड़ रहा है। जैसे आपने कहा कि शुरू में तो एग्जॉस्टिंग है। किंतु एक बार इसके साथ में भाव एसोसिएट हो जाएगा ना तो बहुत इजी हो जाएगा। एक्चुअली देखिए ये जो स्टोरी है ना जो मैं लिख रहा हूं उसको लिखने की मैंने शुरुआत ऐसे ही की थी। यह सब विजुअलाइजेशन ही थे मेरे माइंड में एक समय। फिर मैंने सोचा क्यों नहीं इसको थोड़ा बहुत सिस्टेटिक किया जाए। सो दैट इज व्हाई एक्चुअली आई स्टार्टेड राइटिंग दैट स्टोरी।

प्रश्न: क्लास के दौरान हमारा मन उच्च स्तर पर उठ जाता है, लेकिन क्लास समाप्त होने के बाद हम सामान्य स्तर पर वापस आ जाते हैं। जिस प्रकार वाटरशेड (watershade) पहाड़ी पर पानी को बचाये रखता है, उसी प्रकार हम क्लास समाप्त होने के बाद इस दिव्य भावना को कैसे बनाये रख सकते हैं?

देखिए आपकी तो बात छोड़ ही दीजिए। मेरा खुद का यही हालत है। जब क्लास चलता है तो मन ऐसा वो मतलब ऐसे उच्च भाव में चला जाता है। अभी ऑफिस में जाकर बैठेंगे वही सब चला आएगा। तो ये परिस्थिति तो मेरे साथ में भी है। ये यहां भी चेक डैम यहां पे भी नहीं है। और इसी को कहते हैं संसार क्योंकि क्या है थोड़ा बहुत हमको ये स्वीकार करना पड़ेगा। संसार में आए हैं पंचमहाभूत का देह है तो यह सब तो होगा ही। किंतु जैसे कहा यह जो भाव है मैंने अभी जैसे कहा कि ऑफिस में यदि बहुत ज्यादा डिस्ट्रैक्शन आ जाएगा अपने कमरे में मैं वापस आऊंगा दोपहर को थोड़ा बहुत पढ़ाई लिखाई करने का प्रयास करूंगा उस समय ये डिस्ट्रैक्शन आ जाएगा। तो फिर इमीडिएटली अब जैसे मां का उदाहरण मां किसी ने मां को पूछा कि मां तुमको क्या सब समय तुम्हारा स्वरूप याद रहता है? तो मां कहती है बेटा कैसे होगा? वरना मैं यदि सब समय अपने स्वरूप को याद रख के बैठूंगी तो यह सब काम कौन करेगा? ऐसा कहती तो है किंतु साथ-साथ में ही क्या कहती है? जब भी किंतु मेरी इच्छा होगी वैसे ही मैं अपने स्वरूप को याद कर लूंगी। तो क्या है कि काम तो सब करना ही है और जैसे काम करेंगे तो काम के साथ में जो विक्षेप है वह भी आएंगे। यू कैन नॉट डू अवे विद दैट। किंतु जब ऐसा लगे कि हां यह हद से बढ़ रहा है तो फिर इच्छा करके ऐसा एक पावरफुल टूल होना चाहिए जो कि इमीडिएटली ये सब डिस्ट्रैक्शन को भगा दे। तो जैसे मैंने कहा कि मेरा यह विजुअलाइजेशन का टूल है। उसको मैं जैसे ही इनवोक करता हूं वैसे ही सब डिस्ट्रैक्शन भाग जाता है। सो दैट इज देयर। सो दैट टूल इज देयर। वी हैव टू यू लर्न टू यूज़ इट। वी हैव टू लर्न टू डेवलप इट। ये कंस्ट्रक्ट जो है ना कंस्ट्रक्ट इज़ वन ऑफ द मोस्ट पावरफुल मेथड। जो अभी तक जैसे मैंने जितनी भी मेथड प्रैक्टिस की है यह अजपा जप कह दीजिए। माला पे जप करना है। यह कथामृत का पाठ करना है। कथामृत का पाठ दैट इज अनदर गुड मेथड। जैसे मैंने कहा था कि आप जप कर रहे हैं। मन डिस्ट्रैक्ट हो रहा है। इमीडिएटली कथामृत में से दो-तीन पेज पढ़ लीजिए। तो ऐसा एक आप कर सकते हैं कि कथा मैंने मैं जब ट्रेनिंग सेंटर में था। उस समय नरेंद्रपुर आश्रम से कथामृत पॉकेट साइज में पब्लिश हुआ था। फुल कथामृत पांच वॉल्यूम में तो उसको मैंने खरीद लिया था। और वह मेरा कांस्टेंट कंपैनियन कितने सालों तक बना रहा अभी तक अभी मैं उसको अपने पॉकेट में लेकर नहीं घूमता वरना पहले मैं हमेशा अपने पॉकेट में लेकर घूमता था तो कुछ भी होने से फटाक करके कथामृत पॉकेट में से निकाल करके थोड़ा पढ़ लेना है फिर से वापस रख देना है सो मैंने बहुत साल तक किया था सो अभी भी वह है मेरे पास में किंतु अभी मैं पढ़ता नहीं हूं उसको अभी मैंने यह सब कंस्ट्रक्ट वगैरह डेवलप कर दिए हैं। सो दे रिमेन कंटीन्यूअसली इन माय माइंड। किंतु ये सब टूल्स हमको डेवलप कर लेना। कथामृत इज वेरी गुड टूल। वो पॉकेट साइज कहीं से जुगाड़ कर लेना। गुजराती में मैंने प्रयास किया था। उन लोगों को मैंने बोला था कि हम लोग यह बाइबल किस तरह से वो मुफ्त में बांटते हैं या तो सस्ते में या तो फिर यह गीता कैसे एक रुपए में यह गोरखपुर की ओर से चल रहा है। वैसे ही हम ₹1 का पॉकेट कथामृत करें पब्लिश। ऐसा था मेरा प्रयास। वो हुआ नहीं। किंतु ऐसा होना चाहिए। कथामृत जैसी किताब पॉकेट वर्जन में मिलनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि अपने ऑर्डर में यह नरेंद्रपुर छोड़कर के और किसी ने इसको पॉकेट वर्जन किया हो डेवलप और वो भी यह एवरेज वर्जन नहीं फुल वर्जन। सो इट इज़ समथिंग यूनिक। तो ऐसा कुछ अपनी पॉकेट में लेके रखना है। जैसे ही कुछ भी डिस्ट्रैक्शन लगे निकाल करके पढ़ना शुरू कर देना है। अभी मोबाइल में सब कुछ अवेलेबल है। सो दैट ऑप्शन इज देयर। किंतु मोबाइल को खोलने से खतरा क्या रहता है? फिर 10 नोटिफिकेशन पर और मन चला जाता। अब

ठाकुर की घड़ी

ठाकुर की घड़ी ठाकुर की घड़ी पता है ना कैसे काम करती है। ठाकुर के पास में वह वाली घड़ी तो थी नहीं किंतु ठाकुर क्या करते हैं? अपने हाथों में वो बाल गिनते हैं। जब हाथों के बाल नहीं गिन सकते हैं। बस संध्या हो गई है तो ठाकुर ऐसा देख बाल नहीं दिख रहे। चलो अभी सब छोड़ के ठाकुर ईश्वर का नाम लो। किंतु यह दो तीन इजी है। एक कंस्ट्रक्ट का है। फिर यह कथामृति ऐसी कोई भी किताब पास में रखनी है। मोबाइल में और कहीं पर नहीं हो सके तो एटलीस्ट मोबाइल में और फिर हमने गुजराती में पब्लिश किया है। पता है ना डिजिटल वर्जन है गुजराती में। वो उसमें भी अवेलेबल है। अपना प्ले स्टोर में भी अवेलेबल है और kind में भी अवेलेबल है। हां। और यह जो है बंगाली वर्जन और इंग्लिश वर्जन यह अपनी जो वेबसाइट है पब्लिकेशन वेबसाइट जो है उसके ऊपर में अवेलेबल है। वो सब फ्री रीडिंग ना राजकोट की नहीं अपनी बेलूर मठ की वेबसाइट पे अवेलेबल है। मैं उसकी लिंक दे दूंगा। बहुत सारी इंग्लिश और बंगाली किताबें अवेलेबल है। लीला प्रसंग है। फिर यह कथामृत है। स्वामी जी का लाइफ है। बहुत सारी किताबें अवेलेबल है। हां हां हमने

ध्यान के लिए कल्पना का प्रयोग कैसे करें

ऑलरेडी एक क्लास किया है। अभी जैसे कि मेरा एक फेवरेट कंस्ट्रक्ट है कि मैं बच्चा हूं और मां शारदा देवी मेरी मां है और हम लोग किसी पहाड़ के ऊपर में बैठकर के ध्यान कर रहा है। नाउ यह आपको एक कंस्ट्रक्ट प्रॉपर्ली खड़ा करना पड़ेगा कि इतना सुंदर पहाड़ है। फिर चारों ओर इतना सुंदर नजारा है। हिमालय के ऊपर में बैठे हुए हैं। आकाश इतना सुंदर है। फिर सामने में आपने वो जो फायर है धुनि उसको प्रज्वलित किया है। यहां पर मां बैठी है। यहां पे मैं हूं। कभी मैं मां की गोद में बैठता हूं तो कभी मैं सामने बैठता हूं। मां का दर्शन करता हूं। और इतना सुंदर एटमॉस्फियर है और मैं मां का ही नाम ले रहा हूं। मां सामने बैठी है और मैं मां का नाम ले रहा हूं। सो वि इज वन ऑफ माय वेरी मतलब इफेक्टिव कंस्ट्रक्ट। सो इस तरह से आपको यह कंस्ट्रक्ट खड़ा करना पड़ेगा। मेन चीज है कि वो आपका भाव प्रकट होना चाहिए। धीरे-धीरे होगा। कंस्ट्रक्ट क्रिएट करके इमीडिएटली होगा नहीं। किंतु थोड़ा आप प्रयास करेंगे। इमीडिएटली यह भाव प्रकट हो जाएगा। मेरे ऐसे बहुत सारे हैं। दक्षिणेश्वर का बेस्ट है कि दक्षिणेश्वर में ठाकुर और मां वो खाट के ऊपर में बैठे हैं और नरेंद्र है, राखाल है, लाटू है, मैं हूं। हम लोग सामने बैठे हुए हैं। और मैंने कल कहा था ना कि मेरी फेवरेट जगह भी है। वो जो दरवाजा है, गंगा की ओर खुलता है। वहीं पे एग्जैक्टली मैं बैठता हूं। तो, मैं यहां बाहर में नजर दिखाऊं, करूंगा, तो वह गंगा भी दिखेगी, आकाश भी दिखेगा। यहां पर मुझे ठाकुर और मां भी दिखते हैं। सो दैट इज और यदि मैं अपने को यदि एक छोटे शिशु के रूप में कल्पना करता हूं तो मैं सीधा मां की गोद में भी जाकर के बैठ जाऊंगा और मां बड़े स्नेह से मुझे अपनी गोद में बिठा करके रखेगी। मां खुद जैसे कि मंत्र जप कर रही है। मैं सुन रहा हूं। इतना एक मधुर भाव का एक हम वातावरण अपने मन में खड़ा कर सकते हैं। नो नो लीला चिंतन को ही आप कंस्ट्रक्ट कह सकते हैं। कंस्ट्रक्ट मैंने एक फैंसी नाम इसलिए खड़ा किया है जस्ट फॉर माय बेनिफिट। ओ अच्छा अच्छा अच्छा समझ गया समझ गया यह जो चेतनानंद जी वाला लीला चिंतन की बात कर रहा है हां ठीक है आप अपने को सेपरेट रख के सिर्फ उस समय का जो हुआ था उसको विजुअलाइज कर रहा है हम हम आई एम नॉट ए पार्टिसिपेंट देयर यू यू हैव टू

कंस्ट्रक्ट और सामान्य कल्पना के बीच अंतर

पार्टिसिपेट योरसेल्फ दैट इज अ थिंग माने वो जो शिफ्ट चल आई एम जैसे सिनेमा देखते हैं और वीडियो गेम है दोनों में क्या डिफरेंस है सिनेमा वो चलता रहता है वीडियो गेम में हम खुद शूटिंग करते हैं वहां पे वो हीरो शूटिंग करता है यहां पे मैं शूटिंग करता हूं एक ब्राह्म भक्त आया था ठाकुर के पास में। यह पहले की बात है। माने रामचंद्र दत्त वगैरह जो भक्त आना शुरू नहीं हुए थे। जब पहली पहली बार ये ब्राह्म भक्तों ने ही ठाकुर को डिस्कवर किया था। उस समय की बात है। तो एक ब्राह्मण डिवोटी उसने अपनी स्मृति कथा में लिखा है कि मैं ठाकुर का दर्शन करने के लिए गया और ठाकुर ने मुझे कहा कि एक बिल्ली का बच्चा जैसे अपनी मां के गोद में सुख पूर्वक सो जाता है। वैसे ही मैं इमेजिन करता हूं कि मैं जगत जननी की गोद में सुख पूर्वक सोया हुआ हूं। तो उसको यह बड़ा स्ट्राइक हुआ था। वह बोला कि मुझे इतना अच्छा लगा यह बात ठाकुर का करना। ठाकुर एक बार ध्यान करने का प्रयास करते हैं। फिर बोलते हैं कि अरे यह कल्पना फिर ध्यान करते-करते उनका मन नहीं लगा। तो फिर वो क्या कहते हैं कि यह कल्पना के अलावा और तो कुछ नहीं है। ध्यान कल्पना व आर्टों की छू ना। कल्पना छोड़ के और तो कुछ है नहीं। बोल के मैंने ध्यान बंद कर दिया। ऐसा कहते हैं। यानी कि वह भी ध्यान में जाकर के इस तरह की कल्पना करते थे कि वह मां के सामने खड़े हैं या वगैरह। फिर वो तो नो डाउट नेक्स्ट स्टेज पर पहुंच गए थे कि उनको एक्चुअल दर्शन हो रहा था। किंतु देखिए कि कंस्ट्रक्ट और दर्शन में फिर डिफरेंस क्या है? वही वास्तविकता का ही तो डिफरेंस है कि वो फिर इतना रियलिस्टिक हो जाता है कि आपको एक वास्तविकता की तरह ही दिखेगा दर्शन। वो कंस्ट्रक्ट है कि हम मेहनत करके खड़ा करते हैं। यदि कंस्ट्रक्ट को हमने अच्छे से प्रैक्टिस किया लंबे समय तक तो इट माइट इवन गेट कन्वर्टेड इनू दर्शन हु नोस

ॐ विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजांतर्गतं मायया बहिरिवोद्भूतं यदा निद्रया।

जैसे आपने कहा वेदांत में तो वो दक्षिणामूर्ति स्तोत्र में है ना कि विश्वम दर्पण दृश्यमान नगरी तुल्यम निजांतरगतम ये विश्व है दर्पण में दृश्यमान एक नगरी की तरह सब कुछ हमारे भीतर में है वो भीतर में से ही सब प्रोजेक्ट होता है और भीतर में ही सब विलीन हो जाता है हम क्या प्रोजेक्ट करते हैं एवरीथिंग डिपेंड्स ऑन दैट यदि अज्ञान की वशत प्रोजेक्ट करेंगे तो जगत को प्रोजेक्ट करेंगे और ज्ञान को यह जैसे सूर्य प्रकाश है उसमें आप प्रिज्म रखेंगे बीच में तो कैसा वो सात रंग में वो डिवाइड हो जाता है तो प्रिज्म यदि क्लाउडेड होगा तो फिर अंधेरा ही प्रोजेक्ट करेगा किंतु वो क्लियर होगा तो सप्तरंगी इंद्रधनुष प्रकट करेगा सो बीच में क्या हम रखते हैं दैट इज व्हाट मैटर्स ज्ञान की अज्ञान अदरवाइज बोथ आर प्रोजेक्शंस वो जो नरेंद्र को कहा था नरेंद्र जाकर के पहला ही फेमस प्रश्न कि आपने ईश्वर को देखा है तो जैसे मैं तुमको देख रहा हूं ऐसे ही बल्कि इससे भी ज्यादा स्पष्ट रूप से मैं ईश्वर को देखता हूं और इतना ही नहीं मैं तुमको भी दिखवा सकता हूं।

प्रश्न: हम अपनी आँखों से जो देखते हैं, दर्शन उससे अधिक स्पष्ट कैसे हो सकता है

डिफरेंस क्या है पता है? मुझे लगता है हमारा पार्टिसिपेशन यहां पे इस जो सांसारिक जगत है ना अपना पार्टिसिपेशन शायद इट इट मे नॉट गो बिय्ड वन लेवल। अब जैसे कि हम लोग वार्तालाप कर रहे हैं तो जैसे आप और सुबिरदा बात कर रहे हैं तो मैं सुन रहा हूं। अभी मैं जब मेरा पार्टिसिपेशन कब होगा कि मैं जब खुद बोलता हूं जब तक मैं कुछ बोलता नहीं तब तक तो मेरा पार्टिसिपेशन नहीं। यानी कि जगत में ऐसा बहुत बार होता है। हम लोग सिर्फ एक मुख दृष्टा मात्र है कि हम लोग विटनेस ही करते हैं। ये जो डिसएवरमेंट का फीलिंग कहां से आता है कि मेरी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं हो रहा। मेरी इच्छा के अनुसार ना ही मित्र मेरे साथ में वर्तन कर रहा है। मेरी इच्छा के अनुसार ना ही मेरे करियर बढ़ रही है। आगे मेरी इच्छा के अनुसार ना ही मेरा बॉडी मुझे फिटनेस साथ दे रही है। सब कुछ मेरी इच्छा के विरुद्ध जा रहा है। जैसे कि मेरा कुछ यहां पे विल पावर ही नहीं है। मेरा कोई कर्तृत्वपन ही नहीं है। बिल्कुल मैं कमजोर होकर के डिस एंपावर होकर के बैठा हूं। दैट मींस के जगत में मेरा कोई पार्टिसिपेशन ही नहीं। दर्शन ऑन दी अदर हैंड आई एम सो इंटेंसली इनवॉल्वड बिकॉज़ गॉड्स एंटायर फोकस इज अपॉन मी। आई एम सो इंटेंसली इनवॉल्वड सो इंटेंसली पार्टिसिपेटिंग कि मेरी इच्छा के अनुसार या तो शायद यदि मेरी इच्छा के अनुसार नहीं भी होगा ईश्वर की इच्छा के अनुसार होगा तो वह भी मेरे मन को भाएगा। मैं उससे कोई क्रुद्ध नहीं होऊंगा। उससे मैं द्वेष नहीं करूंगा। मैं उससे नाराज नहीं होऊंगा। वो सब जैसे कि वो मुझे अच्छा लगता है। दैट मींस माय पार्टिसिपेशन इज वेरी इंटेंस एंड वेरी पॉजिटिव। अब जैसे कि देखिए कि जगत को हम ग्रहण करते हैं पंच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रिय के माध्यम से। किंतु आध्यात्मिक जगत जो होता है उसमें ये जो मानस चक्षु जो होते हैं यह जो हमारा भाव है डायरेक्ट हम उसको यह करते हैं। राइट? अभी जैसे कि यह फिजिकल लव है तो यह हमारी इंद्रियों के माध्यम से ही तो हम प्रेम करते हैं। अभी वह हमारे ब्रेन पे कितना इंपैक्ट करेगा? ऑन दी अदर हैंड जो आध्यात्मिक प्रेम है हम बिय्ड आवर इंद्रिय आत्मन का आत्मन के साथ में संबंध दैट मींस द इंपैक्ट अपॉन अस विल बी फार मोर ग्रेटर बी फार मोर पावरफुल