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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद नंद जी द्वारा रचित चैप्टर का नाम है प्राण टान अंतर का आकर्षण हमने देखा कि किस तरह से मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ ठाकुर ने मां की सड़सी के रूप में पूजा की श्री रामकृष्ण संघ का सुवर्ण युग प्रारंभ हुआ दक्षिणेश्वर में मां शारदा ठाकुर स्वयं और सभी त्यागी संतान एक के बाद एक आकर के मिलना शुरू हुए वहां पर एक आनंद का बाजार जैसे कि ठाकुर ने बिठा दिया था आनंद और आध्यात्मिकता का एक अमर प्रवाह दक्षिणेश्वर से बहना शुरू हुआ किंतु जैसे कि यह माया का जगत है जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय तो यह साइकल के अनुसार इस आनंद का हार्ट आनंद की बाजार इसका भी अंत आया ठाकुर को गले का कैंसर हुआ और फिर भक्तगण ने ठीक किया कि ठाकुर को ट्रीटमेंट के लिए कलकत्ता लाया जाए और यह डिस्कस करने से पहले गंभीरानंद जी महाराज ने हम को यह भी बताया कि ठाकुर ने खुद ने अपने महाप्रयाण के बारे में क्या भविष्यवाणियां की थी ठाकुर ने तीन बातें कही थी सबसे पहले कहा था कि मैं जिस तिस के हाथ का खाना खाऊंगा दूसरी बात कही थी कि कलकाता में मैं रात्रि वास करूंगा और तीसरी बात कही थी तीसरी भविष्यवाणी थी कि मैं किसी को खाने का अग्रभाग देने के बाद में अवशिष्ट अंश जो है वोह मैं ग्र करूंगा यह तीनों भविष्यवाणियां श्री मां की नजरों के सामने फलीभूत होती हुई दिख रही थी और मां के अंतर में जो व्यथा थी वह भी हमने देखा कि किस तरह से बलराम मंदिर में ठाकुर ने रात्रि वास कर रहे थे बीच-बीच में किस तरह से वह अब जैसे कि केशव सेन के वहां पर गए थे तो किसी धोपा ना नापत धोपा अर्थात कपड़े धोने वाला नापित अर्थात की बाल काटने वाला उस समय क्या था कि जो आपका प्रोफेशन है वही आपकी कास्ट है तो आपके धोपा जाति में जन्म हुआ है तो आप कपड़े ही धोएंगे नापत में जन्म हुआ है तो बाल ही काटेंगे अभी तो आजाद भारत में यह सब रहा नहीं किंतु उस समय के उस परिप्रेक्ष्य की बात है तो उसने क्या लाकर के दिया तो ठाकुर ने खा भी लिया ठाकुर कहते भी है कि पता नहीं कौन लाकर दिया मैंने खा भी लिया तो यह भी एक होना शुरू हो गया था और आखिर में नरेंद्र को खाने का अग्रभाग देकर के अवशिष्ट ठाकुर ने ग्रहण किया था और साथ-साथ में और भी कुछ घटनाएं हैं कि हमने देखा था कि ठाकुर खुद कहते थे कि मैं बूढ़ा होने वाला नहीं हूं मैं बूढ़ा होने से पहले ही चल बसू तो यह सब इंगित के रूप में ठाकुर बता ही रहे थे मां देख कर के भी जैसे कि उसको भूलने का प्रयास कर रही थी अपने प्रियजन का मृत्यु का संवाद किसको अच्छा लगेगा मृत्यु का जो आभास है वो कौन सहन कर पाएगा तो वैसे ही अभी यह अंतिम समय वापस अंतिम समय अभी आन खड़ा हुआ है रामकृष्ण संघ का जो एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण फेज यहां से स्टार्ट हो रहा है देखिए अंतरंग और बहिरंग ये दोनों डिवीजन भक्तों में अभी होने वाले हैं अभी तक तो ठाकुर के पास में कई साधक आए इवन ठाकुर के गुरु भी जो थे तोतापुरी ना कि भैरवी ब्राह्मणी उन्होंने ठाकुर के पास से आकर के पूर्णता प्राप्त की किंतु फिर वो पूर्णता प्राप्त करने के लिए या तो फिर प्राप्त करने के बाद में वहां से चले गए ठाकुर के ही आसपास रह कर के ठाकुर को ही अपना जीवन समस्त समर्पण करना यह कार्य किया था ठाकुर के अंतरंग भक्तों ने देखिए यह जो ठाकुर वो नरेंद को कहते हैं ना नरेंद जब ठाकुर को कहता है कि मैं चाहता हूं कि मैं सब सब समय के लिए निर्विकल्प समाधि में रहूंगा बीच-बीच में वापस आकर के इस लोक में थोड़ा बहुत आहार करके शरीर को टिकाने के लिए जो दैहिक कर्म है करके फिर मैं समाधि में बुंद हो जाऊंगा तब ठाकुर ने क्या कहा कि तुम ऐसी नीच बातें करोगे मैंने तो सोचा ही नहीं था मैंने तो धारणा रखी थी कि तुम एक विशाल वटवृक्ष की तरह बनोगे जिसके तले कितने पापी तापी आ कर के छाव ग्रहण करेंगे शीतल छाया ग्रहण करेंगे तो वो जो ठाकुर कहते हैं कि देर इज समथिंग बियोंड अवर इंडिविजुअल मुक्ति दैट इज द समष्टि अ व्यष्टि और समष्टि दोनों का आपको देखना है मैं यदि मेरी ही मुक्ति के बारे में सोचूंगा तो मैं स्वार्थ पर हो जाऊंगा और स्वार्थ ही है मुक्ति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा तो ये तो पैराडॉक्स हो गया मतलब आप साधना के रास्ते में जैसे जैसे आगे बढ़ते जाएंगे इस तरह के पैराडॉक्स आकर के आपके सामने खड़े होना शुरू हो जाएंगे कि मुझे मुक्ति चाहिए मैं अपनी मुक्ति के लिए साधना कर रहा हूं जैसे ही आपने कहा कि मुझे कुछ चाहिए साथ-साथ में ही आप साधना के रास्ते से ही चले गए दिस इ अ वेरी इंटरेस्टिंग तो यहां पे जिस तरह से एक ठाकुर कहते हैं नरेंद्र को कि गो बियोंड इंडिविजुअल साल्वेशन तुम अपनी खुद की मुक्ति के भी परे जाओ तब कहीं जाकर के तुम सही सही मुक्ति पा पाओगे यहां पर भी देखिए उसी बात को यहां पर भी अप्लाई होता है कि ठाकुर के पास में जो भक्त आते थे उसमें से कुछ कुछ का मानना था कि ठाकुर की शिक्षा ग्रहण करने के बाद में हम अपनी मुक्ति पा कर के यहां से चल लेंगे फिर ठाकुर का जो होना है सो हो ठाकुर को कैंसर है तो उनके परिवार जन देखेंगे जहां पे नौकरी करते हैं दक्षिणेश्वर में उनका वो जो कर्त पक्ष है वहां के जो मालिक है जिन्होंने ठाकुर को सैलरी पर रखा है वे लोग देख उससे हम लोगों का क्या है भले ही चाहे कॉन्शियसली इस तरह से ना कहते हो किंतु सबकॉन्शियसली यह सब चलता रहता है कि ठाकुर के साथ में जो होता है उससे फिर मेरा भी तो संसार है मेरी भी तो साधना है मेरा भी तो यह सब कुछ है तो मैं कैसे यह सब छोड़ कर के उनकी चिंता करना मैं चालू करूं किंतु देखिए कि जैसे ही आपने अपनी खुद की मुक्ति के लिए ठाकुर की चिंता छोड़ दी वैसे ही आप वही पैराडॉक्स में फंस गए जिस पैराडॉक्स में से आपको निकलना था कि आप वही स्वार्थ के चक्र में स्वार्थ के चक्रवात में फंस गए हैं मैं ठाकुर की चिंता नहीं करूंगा मैं मेरी चिंता करूंगा मैं सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचूंगा बोल कर के आप ठाकुर के बारे में नहीं सोच रहे हैं ये वही प्रॉब्लम स्टार्ट हुआ जिस प्रॉब्लम के अगेंस्ट में ठाकुर ने नरेंद को सावधान किया था नरेंद्र को चेतावनी दी थी कहा था कि सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोचोगे तो सही मुक्ति कभी भी हाथ में नहीं आएगी संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होना होगा तब कहीं जाकर के तुम मुक्त होगे तब तुमको यह निर्वाण या तो फिर यह आत्मज्ञान प्राप्त होगा तो वहां पे जैसे कि नरेंद्र को संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होने के बारे में ठाकुर कह रहे हैं यहां पर अपने भक्तों को संपूर्ण रूप से शरणागत होने को कह रहे हैं यदि ठाकुर की शरण में नहीं आए और सिर्फ अपने बारे में अपनी मुक्ति या अपने आत्मज्ञान के बारे में अपने ईश्वर दर्शन के बारे में सोचा तो आपको वह ईश्वर दर्शन भी यदि मिलेंगे शायद ऐसा नहीं है कि नहीं मिलेंगे ठाकुर के पास में जितने भी भक्त आए थे उन सबको कोई ना कोई उच्च कोटि की आध्यात्मिक अनुभूति हुई ही थी किंतु फिर वह संपूर्ण कक्षा की माने सर्वोच्च कक्षा की जो अनुभूति होती है वह शायद नहीं होगी उसके लिए सर्वोच्च आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त करने के लिए ठाकुर के शरणागत आना होगा मुझे मुक्ति चाहिए यह भाव भी दूर कर देना होगा जो ठाकुर कहे वही सही ठाकुर के ही श्री चरणों में अपनी साधना अपना जीवन इहलोक परलोक सब कुछ मैंने दे दिया है उनकी कृपा से ही मैं जीवित हूं उनकी कृपा से ही मुझे मेरे अध्यात्मिक जगत में आनंद प्राप्ति होगी यह संपूर्ण रूप से शरणागत होने का भाव वही लोगों के जिन लोगों के मन में यह आया है वही लोग आध्यात्मिक जगत में सर्वोच्च लेवल पर पहुंचे हैं तो ये दोनों घटनाएं नरेंद्र को यह कहना कि अपना स्वार्थ मत सोचो पूरे जगत के बारे में सोचो और भक्तों को यह कहना कि अपना स्वार्थ मत सोचो ईश्वर के अर्थात कि जो ईश्वर अवतार का रूप धारण करके पृथ्वी पर आए हैं उनके पूर्ण शरणागत हो जाओ किंतु देखने की बात यह है कि यह दोनों जो मैसेज है संपूर्ण निस्वार्थ का और संपूर्ण शरणागति का इन दोनों मैसेज को ठाकुर ने डायरेक्टली नहीं बताया है आप बड़े ही ध्यान से कथामृत और लीला प्रसंग का पाठ कीजिए ठाकुर स्वामी जी और मां के जीवन और वाणी का पाठ कीजिए तब कहीं जाकर की यह सब सूक्ष्म जो तार है सूक्ष्म जो थ्रेड्स है जो है अपने वाणी और रचना और जीवनी की इसमें से हमको धीरे-धीरे करके मिलना शुरू होंगे कि ठाकुर आउटरा इट नहीं कहते कि तुम अपनी की अपनी मुक्ति की चिंता मत करो तुम जगत के बारे में सोचो यह जगत के बारे में सोचने के लिए नरेंद्र को पूरे भारत का भ्रमण करना पड़ा था तब कहीं जाकर के कन्याकुमारी में जाकर के ठाकुर ने दर्शन देकर कहा था कि हां तुमको पश्चिम की ओर जाना है क्या ठाकुर यह बात काशीपुर में नहीं कह सकते थे क्या ठाकुर को नहीं पता था कि भविष्य में यह सब होने वाला है क्या ठाकुर की नजरों से यह सब ओझल था कि नरेंद्र को पश्चिम में जाना है ये पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन तो एक घटना है वो नहीं भी जदी होती तो भी तो ठाकुर नरेण को वहां पे जाने के लिए कह सकते थे ठाकुर को तो सब तरह के दर्शन होते थे एक दिन उनको इस तरह से एक दर्शन हुआ काशीपुर की ही घटना है मतलब कोलकाता की ही घटना है कैंसर का प्रारंभ हो गया था मां खाना लेकर के ठाकुर के पास में आई जिस तरह से मां ठाकुर को खिलाती थी सब जगत की पूरी बातें करके उनके मन को पृथ्वी लोक पे रख कर के खाना खिलाना तो मां इस तरह से बात करके ठाकुर को खिला रही थी उसी टाइम ठाकुर क्या कहते हैं कि मैंने एक आश्चर्य दर्शन देखा दर्शन ना स्वप्ना दो में से एक मैंने देखा क्या देखा मैं ऐसे एक देश में गया हूं वहां पर सबाही जनो शादा शदा अर्थात कि सभी लोग जिनका रंग जो है वर्ण है उज्जवल वर्ण है धवल वर्ण है वहां पर सभी लोग गोरे गोरे हैं तो मां सोचने लगी अरे ऐसा तो कैसा देश हो सकता है कि जहां पर सब लोग गोरे गोरे हैं हालांकि ब्रिटिश साम्राज्य में रहते थे ब्रिटिशर को तो देखा ही होगा किंतु क्या है मां को बेचारी आज की तरह वो सब वो इंस्टेंट न्यूज वगैरह पढ़ने को नहीं आता था और मां का जगत भी तो अलग था तो मां बेचारी सोच रही है कि यह सब गोरे लोगों का देश यह कैसा हो सकता सता है फिर मां ही कहती है कि अमेरिका से जब यह सारा लीबू निवेदिता वगैरह स्वामी जी के साथ में भारत में आए मां को मां का दर्शन करने के लिए मां को प्रणाम करने के लिए तब मुझे पता चला कि अच्छा अच्छा तो नरेद इसके बारे में बात कर रहा था कि इन लोगों के देश के बारे में तो ठाकुर को नहीं पता था ऐसा नहीं कि नरेण वहां प जाएगा तो नरेण को पूरा भारत घुमा दिया कन्याकुमारी जाकर के कहा पहले ही तो कह सकते थे कि जाओ तुम विदेश में जाओ गोरे लोगों को योग और वेदांत सिखाओ ये तो पहले भी कर कह सकते थे क्यों बेचारे को बिना मतलब पूरा घुमा दिया तो ये ठाकुर को देखिए कि ये जो संपूर्ण निस्वार्थ ता या तो फिर संपूर्ण शरणागति इट इज लाइक ये क्या है ना कि आपको अर्न करना होगा आपको इसको अर्जन करना होगा जैसे कि यह मंदिर में जाना है तो अपने घर के पास में भी एक मंदिर है वो सुबह को स्नान करके थोड़ा सा वो फूल और धूप लेकर के मंदिर में गए देवता को अर्पण किया 510 मिनट बैठे आधे घंटे में तो घर वापस आ गए और फिर अपना बिजनेस जॉब जो भी है वो चले गए वो भी तो एक आसान तरीका है ईश्वर का दर्शन का और फिर यह कैलाश मानसरोवर की यात्रा है अमरनाथ यात्रा है नर्मदा परिक्रमा है यह सब भी ये चार धाम है कठिन यात्राएं वो भी है कि ईश्वर का दर्शन करने के लिए आपको कष्ट सहन करना पड़ेगा यू विल हैव टू अर्न नीट आपको उसको अर्जन करना पड़ेगा वैसे ही मुफत में बैठ के नहीं मिलने वाला है तो मुक्ति का जो विचार है मुक्ति का जो टीचिंग है वह आपको घर बैठ कर के मिल जाएगा कथामृत ना की यह सब पढ़ कर के किंतु यह संपूर्ण निस्वार्थ संपूर्ण शरणागति यह एक ऐसे मैसेज है कि जिसके लिए हमको मेहनत करनी पड़ेगी बांगला ते जेवन बोले टते होवे ना खाट ले पावा जावे ना मेहनत करनी पड़ेगी बिना मेहनत के इस तरह के उपदेश हमारे हृदय गम्य नहीं होंगे हमको डाइजेस्ट नहीं होंगे हम उसको अपना नहीं पाएंगे तो यह जो सेकंड लेवल ठाकुर का उपदेश था आनंद क्या हार्ट बाजार जब ठाकुर ने बसाया था तो वहां का उपदेश था कि हां आत्मज्ञान के लिए ईश्वर के दर्शन के लिए आपको त्याग करना चाहिए साधना करनी चाहिए किंतु यह जो सेकंड फेज है ठाकुर के टीच का उनको कलकाता में लाने के बाद में ठाकुर की जो अंत्य लीला प्रारंभ होती है उस समय का जो मुख्य उपदेश है कि गो बियोंड इंडिविजुअल फ्रीडम गो बियोंड आपका ये जो व्यष्टि आनंद है व्यष्टि मुक्ति है उसके भी परे जाओ और समष्टि के बारे में सोचो और यदि आप अद्वैत में विश्वास करते हैं तो और धत में विश्वास करते हैं तो संपूर्ण रूप से शरणागत तो वो उनके जो कि इस पृथ्वी पर अवतर है यह दो हाथ दो पैर एक सर वाला शरीर लेकर के देह धारी के रूप में जो ईश्वर पृथ्वी पर अवतरण किए हैं उनके संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाओ ये गोइंग बियोंड इंडिविजुअल साल्वेशन इज ठाकुर टीचिंग इन दिस सेकंड फेज और यहां पर भी आप जब संपूर्ण रूप से शरणागत हो गए संपूर्ण रूप से निस्वार्थ हो हो गए तो फिर आपको संघ बद्ध होकर के आपको कार्य करना है ठाकुर का यह जो अद्भुत विचार पृथ्वी के प्रत्येक कोने में प्रत्येक मनुष्य के पास में पहुंचाना है तो यह सेकंड फेज ठाकुर के टीचिंग्स का ठाकुर के मिशन का यहां पर प्रारंभ होता है मां की अति महत्त्वपूर्ण भूमिका है उसके बारे में अभी हम देखेंगे कल हमने देखा कि ठाकुर को कलकाता लाया गया तो उसमें फिर मां बेचारी वहां पर दक्षिणेश्वर में ही है और बेचारी सोच रही है कि ठाकुर की सेवा का जो एक आखिरी मेरे पास में जो था एक माध्यम शरीर को टिका के रखने का वह भी तो चला गया अभी ये मैं क्या करूं तो किंतु कुछ ही दिन के बाद में कलकत्ता में भक्तों को पता चल गया कि नहीं मां के बिना ठाकुर का जो पथ्य प्रस्तुत करना है डाट आहार वो कौन करेगा इसलिए फिर ठाकुर को पूछा गया किंतु यहां पर बड़ा प्रश्न है कि दक्षिणेश्वर तो एक मुक्त एक बड़ा सा एक गार्डन है और बड़ा सा एक जगह है वहां पर पुरुष भक्त यदि आके रहना चाहे तो अलग से रह सकते हैं ठाकुर के साथ में अलग से वार्तालाप कर सकते हैं मां इतनी लज्जा शिला है वो किसी के साथ में वार्तालाप नहीं करेगी वो तो छोड़ ही दीजिए अपना चेहरा भी किसी को नहीं दिखाएगी मां की अपूर्व लज्जा शलता की बातें सभी भक्तों को पता थी तो यहां पर प्रश्न होता है कि क्या मां वहां दक्षिणेश्वर छोड़कर के ठाकुर के पास आकर के कोलकात्ता में रहेगी एक ऐसी जगह पर एक ही घर है उसी घर में पुरुष भक्त भी रहते हैं सब पुरुष भक्त अर्थात की ठाकुर की ये त्यागी संतान और बाकी जो गृहस्थ भक्त है वो तो सब आते ही रहते हैं मास्टर महाशय बलराम बसु गिरीश घोष रामचंद्र दत्त सुरेश मित्र ये सब तो आते ही रहेंगे नियमित रूप से तो ऐसे घर में मां को रहना क्या संभव होगा फिर यह घर में अंतः पूर्व वाली कोई बात नहीं है जनरली यह जो भद्र समाज बोले ये जो मिडल क्लास क्या तो फिर अपर क्लास जो घर होते हैं उसमें क्या स्त्रियों के लिए अलग से रहने की व्यवस्था होती है अंतःपुर जिसको कहते हैं जैसे बलराम मंदिर में आप जाएंगे तो स्त्रियों के लिए एक अंतःपुर अलग से था तो वहां पर यदि आप मां अलग से रहती है पुरुष भक्त बाहर की ओर रहते है यह सब चलेगा किंतु ये जो श्याम पुकुर जहां पे ये अ ठाकुर का ये कमरा ठाकुर के लिए घर जो निर्दिष्ट किया गया था भाड़े लिया गया था वहां पे तो ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी तो मां बेचारी आकर के कैसे रहे यह प्रश्न भक्तों के मन में हुआ उन्होंने ठाकुर को यह प्रश्न किया कि मां क्या इस तरह की व्यवस्था में आके रहेगी यहां पे तो ठाकुर ने कहा कि उसको बोलो उसको पूछो वो यदि आके रहना चाहती है तो आए तो अभी यह बात मां को बताई गई कि मां ठाकुर की सेवा के लिए आपका आगमन आवश्यक है क्या आप वहां पे आके रहेगी मां आनंद से सहमत हो गई और इमीडिएट वहां पे श्यामपुर आकर के रहने लगी अभी यहां पे एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग कंट्रास्ट खड़ा होता है देखिए कि पाणी हाटी जाने के समय भी एगजैक्टली यही हुआ था ठाकुर ने एगजैक्टली यही बात कही थी मां ने जब ठाकुर को मैसेज पहुंचाया कि हां मैं क्या आप सबके साथ में आ सकती हूं सभी भक्त जाएंगे महिला भक्त भी जा रही है तो मां बेचारी क्यों यहां पे दक्षिणेश्वर में अकेली रहे उनको भी तो मन से इच्छा होगी कि मैं भी जाऊं आध्यात्मिक आनंद जो बहेगा उस उसका मैं भी दर्शन करूं स्पर्श करूं मैं क्यों नहीं जाऊंगी तो मां ने जैसे ही मैसेज पहुंचाया ठाकुर ने कहा उसकी इच्छा है तो आए तो इमीडिएट मां ने कह दिया नहीं ठाकुर की इच्छा नहीं है इसलिए मैं नहीं जाऊंगी क्यों यदि ठाकुर की इच्छा होती तो वो कहते आग्रह पूर्वक कहते हां हां वो आए क्यों नहीं आएगी तो इसलिए मैं समझ गई कि ठाकुर की जो वाक्य रचना है जो उत्तर देने की जो स्टाइल है उसी से मैं समझ गई कि ठाकुर के इच्छा नहीं है कि मैं जाऊं साथ में यहां पे श्यामपुर में ठाकुर एगजैक्टली वही बात कहते हैं उसको पूछ के देखो उसकी जद इच्छा है तो वो आए यहां पे मां देखिए मां किस तरह से ठाकुर के शब्दों का अर्थ घटन करती है व यहां पे यदि लिटरेरी देखा जाए तो वही बात ठाकुर ने पाणी हाटी के इन्विटेशन के रिप्लाई में कही थी वही बात यहां पर मां को आकर के सेवा कर ने के बारे में कही थी अभी मां शारदा देवी क्या इन दोनों ऊपर से समान दिखने वाली बातों को इस तरह से अर्थ घटन करेगी कि हां पाणी हाटी में भी ठाकुर की इच्छा नहीं दिखी मैं आऊं और यहां पर भी शायद ठाकुर की इच्छा नहीं होगी कि मैं आऊं माने ये श्याम पुकुर वाला जो बात है ठाकुर की व किस रूप से ग्रहण की होगी वो हमको नहीं पता है ना ही इसके बारे में मां ने कुछ कहा है ना ही गंभीरानंद जी मा महाराज कुछ कहते हैं किंतु हम अपनी शुद्र बुद्धि से जो सामान्य बुद्धि है हमको जो दिखता है बाहर बाहर से हम अपना एनालिसिस करके कह सकते हैं कि दोनों प्रसंग में मां ने अलग-अलग रूप से क्यों उसको कार्य किया वहां पर नहीं गई यहां पे आ गई वहां पे जाने में अपना खुद का स्वार्थ था वो खुद जाएगी वो खुद आनंद उठाएगी खुद नृत्य कीर्तन देखेगी उनको खुद को एक आध्यात्मिक एक भीतर में से पुष्टि मिलेगी अपना स्वार्थ था और यहां पर श्याम पुकुर आकर के इस तरह से रहना कैसी कठिनाई में मां रहेगी उसका वर्णन आएगा बाद में तो उस कठिनाई में रहना नीरव से जगदंबा को प्रार्थना करना कि ठाकुर का स्वास्थ्य फिर से ठीक हो जाए और कड़ी मेहनत करके उनके लिए आहार प्रस्तुत करना मां का लाइफ स्टाइल जो श्याम पुकुर में है पढ़ेंगे हम उसको मैंने कैलकुलेट करके देखा रात बेचारी को मुश्किल से तीन-चार घंटे नींद सोने को मिलता था अदर वाइज क्या है कि वहां पे एक ही टॉयलेट है तो पुरुष भक्त भी यूज करेंगे मां को भी वहीं जाना है तो फिर मां क्या करेगी जैसे दक्षिणेश्वर में ऐसा था ना कि मां जब बाहर में जाएगी गंगा किनारे शौच वगैरह करने के लिए तो पुरुषों की नजरों में ना आ जाए इसके लिए बड़ी ही अर्ली मॉर्निंग वहां पे जाकर के स्नान शौच वगैरह वो मां समाप्त कर देती थी तो बड़ी अर्ली म उठना है और रात को सोना नहीं है ज्यादा रात को सोते सोते भी तो देरी हो जाएगी ठाकुर के लिए खाना बनेगा भक्त लोग कभी भी आएंगे उनके लिए आहार प्रस्तुत करना है तो रात को सोने का समय कम दिन में तो सतत कुछ ना कुछ कार्य चलता ही रहता है ठाकुर ने खुद कहा था कि कभी भी बिना काम के नहीं बैठे रहना है मां का खुद का है कि मोन ना की मत तो हस्ती मन है ना कि पागल हाथी है जैसे ही उसको बिना काम के छोड़ दिया वो तोड़ फड़ करना शुरू करेगा बहुत साल पहले मैं उस समय ट्रेनिंग सेंटर में था तो हमको मायर बाड़ी बाग बाजार जहां पर उद्बोधन कार्यालय है मां जहां पर रहती थी कलकाता करके वहां पर दर्शन करने के लिए ले गए थे तो हम जो श्राइन ग्रह में जाते हैं तो वहां पर एक मैंने देखा कि वोह टाइप करके प्रिंट आउट लेकर के वहां पर एक पेपर चिपकाया हुआ है दीवाल के ऊपर में एगजैक्टली यही कोटेशन मोन ना की मतो हस्ती मन है ना कि पागल हाथी है जैसे ही उसको थोड़ा सा छोड़ देंगे वो तोड़फोड़ करना शुरू करेगा मन को सब समय कार्य में लगा कर के रखना है ये जो मां का कोटेशन है वहां पे टाइप करके प्रिंट आउट लेके चिपका के रखा था मैंने सोचा कि ये श्राइन ग्रह में गर्भ ग्रह में जो ब्रह्मचारी लोग काम करते हैं उनके लिए शायद रे लगा के रखा होगा कि थोड़ा सा भी आलस नहीं करना है गर्भ ग्रह में जिसको सेवा का मौका मिला है वो धन्य है और साथ-साथ में ही वो बेचारा दया का भी पात्र है ड आवर्स में सब काम करना होता है एकदम अर्ली मॉर्निंग उठ कर के फिर यह गर्भ ग्रह बंद हो जाए उस समय आपको क्लीनिंग वगैरह करना है तो जिन लोगों की मंदिर में ड्यूटी आती है वे लोग बेचारे हमारा ना ही नाइट क्लास टाइम पर अटेंड कर पाते हैं खाने पीने का समय उनका पूरा अस्तव्यस्त हो जाता है तो उनका लाइफ स्टाइल बेचार का बड़ा ही कठिन होता है तो मैंने सोचा कि वो आलस ना कर दे उनको एंकरेज करने के लिए शायद हो सकता है कि ये चिपका के रखा होगा तो यहां पे भी मां का जीवन देखिए अर्ली मॉर्निंग उठना है बाथरूम जैसे वो दक्षिणेश्वर में था वही बात यहां पर श्यामपुकुर में है एक ही टॉयलेट है पुरुष भक्त भी यूज करेंगे मां को भी यूज करना है अर्थात कि 3:00 बजे से पहले वहां पर जाके टॉयलेट स्नान और शौच सब कुछ समाप्त करके मां को ठाकुर के लिए जो पथ्य प्रस्तुत करना है उसके लिए कार्य प्रारंभ कर देना है और फिर जब शाम को रात को सभी पुरुष भक्त चले जाएंगे उस समय आकर के मां को फिर से अपनी छोटी सी कमरा जहां पर मां रहती थी वहां पर जाकर के विश्राम का थोड़ा मौका मिलेगा तो हृदय पर पत्थर बांध करके हृदय में एक आशा लेकर के मां दिन के बाद दिन इस तरह का इस तरह की तपस्या करती जाती है तो यह तपस्या मां के लिए जो थी तो इसलिए मां ने यह सोचा देखिए मां जब ठाकुर को खाना खिलाती है ज्यादा करके दूध पिलाती है तो ठाकुर की बात भी नहीं सुनेगी असत्य बोल कर के ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती है यानी कि ठाकुर के उपदेश को मां किस तरह से ग्रहण करती है यहां पर एकदम पक्का उनके उपदेश को ग्रहण किया कि उनकी इच्छा नहीं है वोह पाणी हाटी जाए नहीं जाएगी क्योंकि उनको पता है कि वहां पर जाने में मेरा स्वार्थ है किंतु ठाकुर को ज्यादा करके दूध पिलाना झूठ बोलना उसके लिए झूठ बोलने से पाप भी लग सकता है या तो फिर ठाकुर ने श्याम कुकुर के बारे में कहा उस उसकी इच्छा है तो आए अभी इसका किस तरह से अर्थ गटन किया होगा माने कि ठाकुर की इच्छा नहीं है इसलिए बोल रहे हैं ठाकुर की इच्छा होती तो आग्रह पूर्वक कहते कि हां हां उसको लेके आओ मेरे पथ्य के बारे में तो किंतु मां मां को पता है कि यहां पर अपना स्वार्थ नहीं है इसलिए मां श्याम पुकुर आई अभी देखिए कि ठाकुर की दृष्टि से आप इसको किस तरह से एनालाइज करेंगे पाणी हाटी जाना है तो ठाकुर ने कहा कि उसकी इच्छा है तो आए क्यों ऐसा कहा क्योंकि ठाकुर ने कहा कि यदि हम दोनों वहां पे साथ में जाएंगे तो लोग कहेंगे कि हंस हंसी आए हैं तो बिना मतलब की लोक निंदा होगी मां को ही इसको ज्यादा इसमें सफर करना पड़ेगा तो वह ना आए तो बेटर है ठाकुर का यहां पे यह लॉजिक था यानी कि ठाकुर की निस्वार्थ होता थी ठाकुर सिर्फ यह नहीं देखते हैं कि लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे ठाकुर यह भी देखते हैं कि मां के बारे में क्या कहेंगे एक चीज है दूसरा कि ठाकुर का जो मिशन है इस जग में वो ठाकुर का उपदेश जो फैलना है उसको कोई ग्रहण ना लग जाए कोई बिना मतलब ठाकुर के सामने उंगली निर्देश करके यह ना कह दे कि अरे जैसे कि ये त्रैलोक्य बाबू है वोह क्या कहते थे उसने अभी यह पगला था वो मथुर बाबू कहां उसका लड़का कहां तो यह लोगों को ऐसा कहना शुरू कर दिया था कि परमहंस महाशय व्यवसाय करेंगे इसके लिए अपनी पत्नी को यहां पर लाकर रखा है खुद तो पैसा छूते नहीं है तो अपनी पत्नी के पास में भक्तों को भेजेंगे भक्त लोग उनको पैसा देंगे तो ठाकुर को यह पता चला ठाकुर रोते-रोते मां काली के मंदिर में जाकर कह रहे हैं कि मां वे लोग ऐसी बात करते हैं यानी कि ठाकुर को पता है कि मां के बारे में जब ऐसी कोई बात करेगा तो पहले तो है कि मां को कष्ट होगा दूसरी बात है कि जिसने ऐसा कहा है उसी का अ कल्याणगुलाम निस्वार्थ भाव से सोच रहे थे जबकि श्याम पुकुर में मां आए ठाकुर का स्वार्थ था ठाकुर को पथ्य प्रस्तुत करके खिलाना था तो ठाकुर अपने स्वार्थ के लिए मां को यहां पर बुलाए मां के पास में इतनी कठिन तपस्या करवाए तो ठाकुर ने वहां पे जो ना आए इसके लिए इस तरह से वाक्य रचना बनाए कि उसकी इच्छा है तो आए और यहां पर भी ठाकुर अपने स्वार्थ के लिए नहीं अपने स्वार्थ के लिए बुला रहे हैं इसलिए इस तरह की वाक्य रचना कर रहे हैं इसलिए उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि हां वो आए वो आए ऐसा जद स्पष्ट कहते अपना स्वार्थ सिद्ध होता इसलिए अपना स्वार्थ सिद्ध ना हो इसलिए उन्होंने सेम वाक्य रचना अपनाई ठाकुर की दृष्टि से भी देखिए कि इन दोनों में कंट्रास्ट है और यहां मां की दृष्टि से भी देखिए कि किस तरह से कंट्रास्ट बनता है तो ये सब एक इंटरेस्टिंग एनालिसिस अपनी क्षुद्र बुद्धि से हम यह सब करते हैं सामान्य बुद्धि से अभी उनके मन में सही क्या चल रहा होगा किसको पता और दूसरी बात है कि जैसा जैसा हम राम कृष्ण विवेकानंद साहित्य में गहराई से जाना शुरू करेंगे और भी कितने लेयर इन सब घटनाओं में मिलेंगे वो भी किसको पता तो अभी आज फिर से वोह पाठ प्रारंभ करते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं हमने यहां पे छोड़ा था कि मां दक्षिणेश्वर में है भक्त लोग कल ठाकुर को लेकर के वहां पे आ गए हैं श्यामपुकुर में नया घर भाड़े पर लिया गया है पहले का जो घर था वो तो छोटा था ठाकुर नहीं रह पाए इमीडिएट बलराम मंदिर चले गए वहां पर एक सप्ताह रुके और एक सप्ताह के बाद में नए घर में श्यामपुकुर में उनका आगमन हुआ यहां से कहानी फिर से स्टार्ट होती है ठाकुर श्याम पुकुरे आगने को एक दिन पर भक्तगण बुझीते पारले सु चिकित्स सहित दिवा रात्र सेवा और सु पथ प्रस्तुत करार व्यवस्था थाका आवश्यक श्याम र के श्याम पुकुर के आगमन के कुछ ही दिन के बाद में भक्तों को समझ में आ गया कि ठाकुर के लिए जैसे सु चिकित्सा प्रॉपर ट्रीटमेंट करने के लिए प्रॉपर डॉक्टर कविराज को आना वहां पर सहज हो इसलिए ठाकुर को यहां पर जो बुलाया तो साथ साथ में ही प्रॉपर डायट उनके लिए प्रस्तुत हो वह भी बड़ा आवश्यक है युवक भक्तगण सेवा भार ग्रहण करी लेओ पत्थर जनन श्रीमा के ई बाटी ते आनन बति तो पाया अंतर देखा गेलो ना युवक भक्तगण ने सेवा भार ग्रहण तो कर लिया किंतु पथ्य के लिए डायट आहार के लिए मां को वहां पर बुलाने के अलावा और किसी को कोई चारा नजर नहीं आ रहा था किंतु तखन आर एक समस्या उपस्थित होलो मां को वहां प लाने की बात है किंतु जब जैसे ही यह सोचना शुरू किया कि मां को लेके आया जाए साथ में ही एक नई समस्या का उदय हुआ बाटी ते स्त्री लोक थाकी बार जन्नो निर्दिष्ट अंतर महलन बाटी में अर्थात की इस घर में इस मकान में स्त्रियों को रहने के लिए एक अंदर महल नहीं है काजी श्री मा खाने की रूप एका की थाकी बन हाहा भक्तगण स्थिर करते पारी लेना इसीलिए मां यहां पर अकेली कैसे रहेगी भक्तगण यह बात ठीक नहीं कर पाए विशेष तो तहर अपूर्व लज्जा शलता कथा स्मरण करिया अनेके तहर आगमन संबंध संधि हान होले और खास करके मां की अपूर्व लज्जा शलता की बात को याद करके बहुत सारे भक्तों के मन में यह संदेह भी हुआ कि मां को यदि कहेंगे भी तो मां क्या यहां पर आने के लिए सहमत होगी कि नहीं तु दीर्घ काल नबत थाकि आओ जिनी कखन कहारो दृष्टि पते पति तो होई नहीं तिनी सर्व प्रकार लज्जा संकोच त्याग कोरिया ई बाटी ते पुरुष म आश बास करीबन यहा अने के विश्वास करते पारले ना इतना लंबा समय नबत में रहने के बाद में भी जो कभी भी किसी के भी दृष्टि में नहीं आई थी दृष्टि प पति तो हो नहीं देखिए गंभीरानंद जी महाराज किस तरह से लिखते हैं कि किसी के भी आंखों में आकर के पतित नहीं हुई थी ऐसी मां शारदा देवी सर्ब प्रकार लज संकोच त्याग कररिया सब तरह के लज्जा और संकोच को छोड़ कर के त्याग करके इस घर में पुरुषों के बीच में आकर के रहेगी इस बात पर कि बहुत सारे लोगों को विश्वास ही नहीं हो रहा था अथ च गत्य अंतर ना थाका तहा के आनि बार ई प्रस्ताव ठाकुरे अनुमति लेते होलो किंतु फिर ठाकुर के पथ्य के बारे में और कोई सुविधा नहीं हो रही थी और कोई उपाय नहीं दिख रहा था इसीलिए भक्तों ने ठीक किया कि ठाकुर को ही इसके बारे में पूछा जाए ठाकुर की ही अनुमति ली जाए तिनी भक्तो दिग के श्री मायर पर्वत प्रकार स्वभाव कथा स्मरण कराया बोली लेन ठाकुर ने ठाकुर को जैसे ही पूछा गया मां को लाए कि नहीं यहां पर आमंत्रण दे कि नहीं तो ठाकुर ने भक्तों को सबसे पहले तो याद करवा दिया कि याद रखना कि वह कितनी लज्जा शीला है और यह बात याद करवाने के बाद में में फिर उन्होंने कहा शकी खाने ऐसे थकते पार पे वो क्या यहां पर आकर के रह सकती है जा हो ताके जिज्ञासा करे देखो जो भी है उसको पूछ कर के देखो शकोल कथा जने सुने से आस्ते चाय तो आसु सब बात समझ करके यदि उसकी इच्छा है तो वह आए वो यदि आना चाहती है तो वो आए भक्तगण और श्री राम कृष्ण ज सकल उपादान अवलंबन विचारे प्रवृत लेन ताहा होते रू अनुमान होई स्वाभाविक भक्तगण और श्री रामकृष्ण उन्होंने मां का स्वभाव मां का चरित्र मां के कार्यकलाप को समझ करके निरीक्षण करके इस जो एक सिद्धांत प आए थे कि मां शायद नहीं भी आ सकती है कैसे रहेगी पुरुषों के बीच में वहां पर दक्षिणेश्वर में तो जैसे वोह कहानी है कि ठाकुर एक बार हृदय को कह रहे थे कि अरे हृदय यह गांव की लड़की है यहां पर आएगी कहां पर सोच जाएगी कहां पर घूमती रहेगी क्या करेगी यदि लोग देख लेंगे तो निंदा होगी फिर मुझे लज्जित होना पड़ेगा तो किंतु देखो कि आज तक मैंने खुद ने उसको कभी नबत से बाहर जाते हुए नहीं देखा तो माने यह बात सुन ली थी तो उन्होंने मां शारदा देवी ने मां काली को प्रार्थना करना शुरू किया मां कहती है कि ओ मां व तो उनी तो जा देखते चान मां काली सेही देखिए देन एक खुन देखी ज बेरते उर नजरे पतित होते होई उर नजरे आस्ते होवे अर्थात की मां ने सोचा कि अरे बाप रे ठाकुर तो जो देखना चाहते हैं माहा काली सब कुछ दिखा देती है तो अभी मुझे लगता है कि जैसे ही मैं नबत से बाहर आऊंगी वैसे ही ठाकुर की दृष्टि में मुझे आना होगा फिर उन्होंने मां काली को प्रार्थना की कि मां मेरी लज्जा की रक्षा करना और फिर मां शारदा फिर कहती है कि देखो इस तरह से मां काली ने मुझे यहां पर रक्षण में रखा था इस तरह से मुझे बचा के रखा था कि किसी की भी नजर में आना नहीं हुआ तो यह थी मां शारदा अभी यही मां शारदा को कहा जाएगा कि पुरुषों के इस घर में आकर के रहना होगा ठाकुर की सेवा के लिए तो यह जो मां का जो पूरा चरित्र कार्यकलाप है सब सोच समझ कर के भक्तगण और ठाकुर जिस सिद्धांत पर आते आए थे कि मां शायद ना आए तो वह सिद्धांत कोई गलत नहीं था वो स्वाभाविक था किंतु ंगे भावी बार छलो श्री माय स्थान का पात्र अनुयाई शय जीवन धारा के परिचालित कोरार अपरम खमता विशेष तो श्री रामकृष्ण जन्नो सर्व प्रकार सुख सुविधा और लज्जा संकोच परित्याग प्रस्तुत था का कोथा किंतु जैसे ही उन्होंने यह सोचा कि लज्जा शीला मां यहां पर आएगी कि नहीं आएगी वहां पर हमको दूसरी भी एक बात देखनी होगी कि स्थान काल और पात्र अनुयाई अपने को उस परिवेश में ढाल देने की मां की क्षमता यह तो एक फैक्टर है अपरिमय मा में है स्थान काल और पात्र के अनुसार अपने को ढालने की यह तो एक बात है स्वीय जीवनधारा के परिचालित करार माने अपनी जीवनधारा को इस ढाल में ढाल देने की परिचालित करने की अनंत क्षमता दूसरी ही और है श्री राम कृष्ण के लिए सब तरह की सुख सुविधा लज्जा संकोच परित्याग करने के लिए प्रस्तुत होने की बात ठाकुर की सेवा करनी है तो लज्जा संकोच सुख सुविधा सब कुछ त्याग करके ठाकुर की सेवा करनी है तो ये दो फैक्टर भी साथ-साथ में मां के जीवन में थे ये दोनों गुण भी मां में थे जैसे ही मां अपूर्व लज्जा शीला थी तो साथ-साथ में ही जिस परिस्थिति में रहती है उस परिस्थिति के अनुसार अपने जीवन को ढालना यह भी मां में था और फिर ठाकुर की सेवा के लिए लज्जा घृणा सब त्याग करके सेवा करने के लिए प्रस्तुत रहना यह गुण भी मां में था इसमें जो देश काल पात्र वाली जो बात है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां को किस तरह से अलग-अलग जगह पर रहना पड़ा था पहले तो तीर्थ यात्रा के लिए गई थी फिर बीच-बीच में यह बलराम मंदिर में या तो फिर मास्टर महाशय के घर आक के रहती थी कैसी सब परिथि स्थितियों में मां को रहना पड़ा था और इसीलिए ठाकुर ने मां को यह भी कहा था देखिए ठाकुर की भी एक दुर दृष्टि थी ठाकुर ने कहा कि तुम चाहे जहां पर भी रहो भक्तों के घर में रहो कलकाता आ करके बीच-बीच में रहो सब कुछ करना किंतु कमार कुकुर में अपना जो घर है उसको कभी बेच मत देना उसको कभी छोड़ नहीं देना और ठाकुर ने क्या कहा था पर भाता हुआ बरम भालो पर घोरा हुआ बालो नहीं अर्थात कि जद किसी के पास में मांग करके खाना पड़े तो वह भी भले ही चाहे ठीक है किंतु किसी के घर पर जाकर के रहना पड़े वो ठीक नहीं है क्योंकि किसी के घर पर जाकर रहना अर्थात की फिर अपनी स्वतंत्रता को फिर गिर रख देना अपनी स्वतंत्रता को खो कर के जिस घर में रह रहे हैं उसके अनुसार हो कर के रहना है तो ठाकुर ने मां को यह बात कही तो थी किंतु ठाकुर को साथ-साथ में यह भी पता था कि यह जो रामलाल है लक्ष्मी दीदी है उन लोगों का स्व ऐसा विचित्र है और दूसरी बात की कामर कुकुर में मां की रक्षा करने वाला मां की देखभाल करने वाला कोई नहीं था तो जब यह श्यामा सुंदरी देवी एक बार जयराम बाटी से कमार पुकुर गई ठाकुर की महासमाधि के बाद में जबकि मां कमार पुकुर रहती थी वहां पर एक छोटा सा बागान बनाया था सब्जी वगैरह वो बोती थी और उसी में से कुछ ना कुछ छोटा वो जो धान का एक खेत था छोटा सा उसमें से धान ये सब्जी बागान में से सब्जी इतना करके मां खाती थी तो ये जब ये श्यामा सुंदरी देवी जब मां को मिलने के लिए आई कामर कुकुर ऐसी दुरावस्था देखी मां फटी हुई साड़ी पहन के रह रही है तो इमीडिएट उन्होंने कहा कि नहीं मैं अभी तुमको यहां पर नहीं रहने दूंगी चलो मेरे साथ किंतु ऐसा नहीं है कि श्यामपुर कोई जयराम बाटी कोई इससे अच्छा है वही भाइयों के घर में रहना है वही भाइयों के घर में खाना पकाना है उनको खिलाना है और मां अभी एक मां का एक त्यागी संतान था उस समय मां के साथ में रहता था मा आपको बड़ी हेल्प करता था अभी सतत रहता हो कि बीच-बीच में रहता हो इतना डिटेल नहीं पता किंतु यही त्यागी संतान ने बाद में ऐसा कुछ गड़बड़ किया कि उसको संग छोड़ कर के जाना पड़ा तो कुछ-कुछ लोगों को अभी एक होता है ना कि परनिंदा पर चर्चा करने की एक हैबिट होती है इससे आनंद आता है एक तरह का तो किसी ने जाकर के मां को कहा कि मां देखा वो आपकी इतनी सेवा करता था फिर भी उसको संग छोड़कर जाना पड़ा फिर भी उसने ऐसा गड़बड़ कर दिया तो आपकी सेवा करने का क्या लाभ हुआ मन में आनंद आ रहा है कि देखिए उसके साथ में ऐसा हुआ तो मां ने इमीडिएट कहा कि देखो आजकल तो इतने सारे भक्त लोग आते हैं इतनी सेवा करना चाहते हैं किंतु उस समय जबक मैं अपने भाइयों के घर रहती थी और भाइयों के घर में वो बड़ी-बड़ी डिया होती है उसमें भात पकाना था मुझे उसमें उन लोगों के लिए मैं खाना बनाती थी तब मेरी सहाई करने के लिए कौन आता था उस समय तो यही एक अकेला था मेरे साथ में पूरे शरीर पर काली लगा कर के राख लगा कर के सुबह से लेकर के रात तक मुझे सहाय करता था बड़ी-बड़ी हांडी उठानी है चूल्हे पे उतारने है वो वही मुझे सहाय करता था तो यह तुम यह मत सोचो कि उस पूरा गड्ढे में गिरा है ईश्वर किसको किस रास्ते से ईश्वर प्राप्ति की ओर ले जाए कोई नहीं बता सकता आप तुम अभी अच्छे हो कल क्या होगा किसको पता है तो ये देखिए कि जिस परिस्थिति में मां रहती थी उस परिस्थिति में अपने को ढाल लेती थी तो ये थी मां तो यहां पे भी देखिए कि कार्यत ओ देखा गेलो और वास्तविक रूप से भी यह सब देखा गया कि ज आह्वान आशीवाद संगे संगे तीनी बिंदु मात्र इत तो ना कोरिया श्याम पुकुरे आगमन पूर्वक निर्दिष्ट कर्तव्य रोतो होलेन कार्य रूप से ही कार्य तर भी यह देखा गया प्रैक्टिकली भी कि जैसे ही आह्वान आया कि आओ श्याम पुकुर आइए ठाकुर की सेवा के लिए साथ-साथ में बिंदु मात्र इत स्त तो ना करिया क्षण भर के लिए भी संको ना करके क्षण भर के लिए भी चिंतन न करके साथ-साथ में ही श्याम पुकुर आगमन के लिए वो श्याम पुकुर में उन्होंने आगमन किया और उनका जो निर्दिष्ट कर्तव्य था ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करना उसमें वह रत हो गई अच्छा तो आज यही तक अभी इससे आगे कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्व श्री राम कृष्णर्पण स्तु