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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी अभी तक हमने देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज एक के बाद एक हमको स्टेप बता रहे हैं कि क्यों भारत की भाग्य विधात यह जगदंबा आध्या शक्ति को पृथ्वी पर भारत की भूमि पर जन्म लेने की आवश्यकता पड़ी और इसके पीछे के रीजंस क्या थे एक के बाद एक महाराज ने बताया और इसीलिए मैंने कल एक लिंक भी शेयर किया था कि अब तक के जितने भी क्लासेस है वह सबके वो प्लेलिस्ट मने सभी का वोह उसमें आ जाए लिंक तो व आप मैंने रिपीट करने की बजाय आप वही एक बार देख सकते हैं तो पता चल जाएगा कि अभी तक क्या हुआ तो फिर मैं अभी नए जो भी नेक्स्ट जो महाराज जी लिखते हैं गंभीरानंद जी महाराज वहां से पढ़ना शुरू करता हूं लास्ट सेंटेंस था हमारा ताई देवी गुरु मात शक्ति समन बिता एक अत्युक्ति एवं पाश्चात्य समाज केव शे रखा स्तले आकर्षण करते पारे कि जिसकी सहाय से भारत अपने को यह जो पाश्चात्य संस्कृति का आक्रमण है उससे बचा सके उसकी सहाय से भारत अपनी पुण्य भूमि में पूर्व और पाश्चात्य दोनों के जो सर्वश्रेष्ठ गुण है यह दोनों का समन्वय करके एक नवी सभ्यता की नीव डाल सके फाउंडेशन जहां पर डाल सके और जहां से वह विदेश में जो लोग हैं जो कि वहां के ऑब्जेक्टिफिकेशन है या फिर यह मटेरियल जम है इससे जो लोग थक गए हैं जिन लोगों को एक सुख और शांति एक पीस ऑफ माइंड चाहिए वे लोग यहां पर आकर के थोड़ा सा सुकून प्राप्त कर सकते हैं इसके लिए भरत की भूमि की रक्षा करनी है मैंने कहा था पिछली बार कि किस तरह से मैंने एक सरप्राइजिंग न्यूज आइटम पढ़ा था कुछ सालों पहले कि इजराइल के जितने भी सोल्जर्स है आर्मी के वे लोग छुट्टी मिलने से ही या रिटायर होने से सीधा य अपने उत्तराखंड की मुलाकात के लिए जाते हैं यह जो हिमालय की प्रशांति है यह वहां का जो संस्कृति है अपना साधुओं का वेद का उपनिषद का उसमें वे लोग थोड़ा सा समय बिताते हैं और अपने मन को शांत करते है ऐसा एक न्यूज़ आइटम मैंने कहा था कि मैंने पढ़ा था अभी देखिए कि यह इजराइल में सही सही यह बीच-बीच में अशांति जो प्रकट होती है वह कितनी भयानक होती है तो अभी हमने देखा कि कल परसों दिन इजराइल पे इतना भयानक अटैक हुआ अभी जिस तरह की अशांति वहां पे है हम सोच ही सकते हैं कि वहां के सैनिकों को कितनी शांति की जरूरत पड़ती होगी ये जिसको हवा फेर कहते हैं ना चेंज ऑफ एयर कभी डॉक्टर के पास जाएंगे तो डॉक्टर कहेगा कि आपको दवाई की जरूरत नहीं है आपको चेंज ऑफ एयर चाहिए आपको हवा यह महाबलेश्वर है यह ऊटी है यह जो सब यह यात्रा स्थान है पिकनिक स्पोर्ट जिसको कहते हैं वह इतने पॉपुलर क्यों है कि वहां जाकर के वहां का प्राकृतिक सौंदर्य है उससे अपना मन लोभी हो जाता है उसमें अपना मन लग जाता है तो जिससे कि अपनी दिन प्रतिदिन की चिंता है उसमें से हम चिंता अर्थात की स्ट्रेस टेंशन उसमें से अपना मन मुक्त हो जाता है अभी आधुनिक लोगों को तो यह नहीं कहेंगे कि आप किसी मंदिर की मंदिर में जाइए किसी भगवान के पास जाइए ये लोग तो आजकल तो यह सेकुलरिज्म का सब चलता है उन लोग अपने मंदिर इसीलिए एक्चुअली देखिए कि जितने भी अपने मंदिर है अपने तीर्थ स्थान है ऐसे कोई प्राकृतिक रमणीय जगह पे यह बने हैं क्यों क्योंकि ऐसी सब जगह पे अपना मन ऑटोमेटिक उर्ध्व में जाना शुरू हो जाता है यह जो दिन प्रतिदिन की अपनी यह जो रूटीन लाइफ है रूटीन लाइफ की ये जो रूटीन सब चिंता धाराएं हैं उससे फटाफट उसको तोड़ करके फटाफट कर ये सब जंजीरें तोड़ कर के फटाफट मन ऊपर उठना शुरू हो जाता है तो इसीलिए रमणीय कुदरत प्राकृतिक सौंदर्य जहां पे है वहीं पे तीर्थ स्थान भी बनते हैं और वहीं प जाने को डॉक्टर सलाह भी देते हैं यदि मानसिक शांति चाहिए तो ऐसी सब जगह पे पिकनिक स्पॉट प जाकर के हवा फेर करके आइए तो इस तरह से एक पुण्यभूमि यहां पे मां को बनानी थी हवा फेर करने के लिए यह जितना भी मटेरियल जम में डूबे हुए हैं जितना भी भोगवा में डूबे हुए हैं उससे जद मन अशांत हो जाता है मन में एक तरह का एक मायूसी का भाव छा जाता है तो कहां जाकर के मन को सुकून मिलेगा कहां जाकर के मन को यह एक अपना अपने घर आए हैं इस तरह का एक आत्मा अपना शरीर तो अपने शरीर का तो घर है जहां पर हम लोग रहते हैं किंतु आत्मा का भी एक घर है और जितने भी मनुष्य पृथ्वी पर जहां कहीं भी रहते हो उनकी आत्मा जद सही सही उत्तराखंड में जाएंगी ये हिमालय की प्रशांति का अनुभव करेंगे गंगा का यह कलकल नाद सुनेंगे तब आत्मा को लगेगा कि हां हम लोग यहां पर सही में अपना घर है और अपने घर पर वापस आए हैं तो क्योंकि हजारों सालों से साधु ऋषि मुनियों ने तपस्या की है इसकी वजह से वहां पर एक पवित्र तन मात्रा पवित्र वातावरण की सृष्टि हुई है तो इसी वातावरण की पवित्रता को बजाए रखने की के लिए मां को पृथ्वी पर अवतरण करना पड़ा अभी महाराज जी आगे लिखते हैं क्या लिखते हैं ज दिख दयाई धरा जाऊ ना केनो जिस दिशा से भी आप देखे जिस डायरेक्शन से भी आप इसके बारे में सोचे वर्तमान जुगे ए देशे आदर्शों के संजीविरायण छलो वर्तमान युग में इस देश के आदर्श को पुनर्जीवित करने का और उसकी पराकाष्ठा प्रदर्शन करने का एक विशेष प्रयोजन था पराकाष्ठा प्रदर्शन करना जितने भी देवी गुरु मानवी यह जितने भी गुण है हमने बहुत सारे लोगों में देखे होंगे अपने पिताजी में अपनी मां में अपने नाना नानी में दादा दादी में चाचा चाची में अपने आसपास यह आश्रम में आए ंगे तो साधु महाराज है इन लोगों में हम लोग किसी ना किसी तरह की दिव्यता का दर्शन करेंगे किंतु दिव्यता का सर्वोच्च स्वरूप स मतलब एक्सट्रीम में जाकर के इस आदर्श को किस तरह से आप इंप्लीमेंट हो सकता है जब भी आदर्श की बात चलती है तो मैं जब यहां पर साधु होने को आया था तो मेरा एक मित्र मेरा बचपन का मित्र हम लोग बहुत साल साथ में पढ़ाई किए थे और साथ में खेले भी थे सब कुछ उसका घर मेरे बगल में ही था मेरे घर के पास में ही था तो वह मुझे आकर के बोलने लगा अरे भाई तुम यह जब साधू बाधुची उम्र में यह सब क्या पागलपन करके रखा है यदि तुमको यह सब धर्म वगैरह करना ही है तो पहले तुम अपना एक करियर बनाओ एक बैंक बैलेंस बनाओ अपने फैमिली का एक पूरा तुम सब व्यवस्था करके जाओ बाद में यह सब साधु होना या फिर वो किसी मंदिर में जाना इस छोटी उम्र में यह सब करने का ये क्या पागलपन तुम्हारे सर पर सवार हो गया है अभी मैं इसको किस तरह से समझाऊं कि यह आध्यात्मिक चिंता का पागलपन जब मनुष्य के ऊपर में सवार होता है तो यह अपने परिवार का सबसे पहले कुछ ठिकाना करके जाएंगे ना कि पछ कुछ रिस्पांसिबिलिटीज होती है सामाजिक वह सब पहले निष्पत्ती हैं किंतु इवन हमारा जो मुमुक्षु उव है वह स्वामी जी का मुमुक्षु उव हमारे मुमुक्षु तोव से कहीं कहीं ज्यादा था कहीं उर्ध्व में था स्वामी जी जब वरा नगर मठ और उससे पहले भी काशीपुर में जब तपस्या कर रहे थे तब उनकी यह मक्ष तोव ईश्वर प्राप्ति की यह भीतर में से प्रचंड एक एक एक जिजी विशा या तो फिर एक प्रचंड इच्छा जो भीतर में से प्रकट हो रही थी और उस मुमुक्षु तोव को अनुसरण करके स्वामी जी एक के बाद एक कठिन साधनाएं जो कि ठाकुर उनको बता रहे थे वह निष्पक्ष अनुराग देख कर के कुछ कुछ गुरु भाइयों के मन में बड़ा ही श्रद्धा का उद्रेक हुआ बड़ी ही श्रद्धा प्रकट हुई और वह उसमें से कोई जाकर के ठाकुर को कहने लगा कि महाशय उस समय तो ठाकुर को परमहंस महाशय कहते थे तो ठाकुर को जाकर के कहने लगे कि महाशय नरेण का यह प्रचंड ईश्वर अनुराग यह साधना में इतनी उसकी व्याकुलता साधना करके ईश्वर को प्राप्त करने की यह व्याकुलता अद्भुत है क्या साधन जगत में इस तरह की व्याकुलता इस तरह का मुमुक्षु कहीं और प्रकट हुआ होगा कि भी नहीं कि नरेण एक यूनिक है इस जगत में इस तरह का व्याकुल मुमुक्षा ईश्वर को प्राप्त करने वाला तब कहीं जाकर के ठाकुर क्या कहते हैं कि अरे देखो नरेंद्र की जो नरेंद्र का जो मुमुक्षु है नरेंद्र की जो ईश्वर प्राप्त करने की व्याकुलता है उसका एक शिकर शिकी भाग खाने ज तोटा छलो तार शिकर शिकी भागो नरेण भीतरे परिल ना अर्थात कि यहां का ठाकुर तो यह नहीं कहेंगे मेरे भीतर में या मेरा तो अपने शरीर की ओर इशारा करके कहा यहां पर जो व्याकुलता प्रकट हुई थी यहां पर जो मुमुक्षु तोव प्रकट हुआ था उसका शिकर शिकर भाग ओ माने एक रुपया होता है तो रुपया का एक पैसा होता है 100 पैसों का एक रुपया बनेगा तो यह सीकी जो है वो उस समय का यूनिट था कि कितना सीकी 25 30 ना की पता नहीं अब मुझे उतना सीकी इकट्ठा होकर के एक रुपया बनेगा या तो जो भी कुछ बनना था उसको तो आधुनिक भाषा में कह सकते हैं कि यहां पर जितना प्रचंड व्याकुलता प्रकट हुआ था उसका एक पैसे का एक पैसे जितना भी व्याकुलता यानी एक 100 पैसों का एक रुपया होता है तो एक पैसों का पैसों जितना भी सवा भग के भी सवे भाग का 100 पार्ट ऑफ द 100 पर् 100 पार्ट ऑफ दी मुमुक्षु जोक यहां पर प्रकट हुआ था उसका 100वां भाग भी नरेण के भीतर में नहीं देखने को मिलेगा तो शरत महाराज ने यह रेमसंस लिखा है लीला प्रसंग में उन्होंने लिखा है तो शरत महाराज कहते हैं कि नरेण का यह ईश्वर अनुराग देख कर के हम लोग इतने प्रभावित हो गए थे और जब ठाकुर यह कहते हैं कि उनके भीतर में जो ईश्वर अनुराग की जो प्रचंड आंधी प्रकट हुई थी उसका 100वां भाग भी नरेण में देखने को नहीं मिलता तो ना ठाकुर के जीवन में जब ठाकुर ईश्वर प्राप्ति के लिए साधना कर रहे होंगे तो किस तरह का एक प्रचंड एक ईश्वर स्वयं आसमान में से यदि स्वर्ग है तो वहां से पृथ्वी पर आ गए होंगे ठाकुर को आशीर्वाद देने के लिए दर्शन देने के लिए उत्सुक होकर के तो शरत महाराज कहते हैं कि नरेण का ये नरेण की जो व्याकुलता है वो इतनी है तो उससे 100 टाइम ग्रेटर ठाकुर की व्याकुलता वो कितनी होगी तो अभी हम देखिए कि यह जो मेरा मित्र जो मुझे कह रहा है कि उसने उसने अच्छे इंसानों को देखा होगा उसने त्यागी वैरागी लोगों को भी देखा होगा ईश्वर प्राप्त करने की इच्छा जिन लोगों में है जो लोग नियमित मंदिर में जाते हैं ऐसे लोगों को भी देखा होगा ऐसे लोग हमारे भारतीय समाज में हजारों लाखों करोड़ों की संख्या में है जो लोग नियमित रूप से अपने जीवन में अपना बिजनेस है जॉब है जो कुछ भी करते हैं नौकरी करते हैं उसमें से नियमित रूप से वे लोग कोई ना कोई धार्मिक प्रवृत्ति में वे लोग हिस्सा ग्रहण करेंगे उसमें कंट्रीब्यूशन करेंगे ऐसे लोगों की भारतीय समाज में कमी नहीं है तो इन लोगों का ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता और हम साधुओं में ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता हम लोगों में कहीं ज्यादा है क्योंकि हम लोग यह नहीं चाहते कि जिस तरह से हम लोग संसार का भी थोड़ा सा काम करें अपना बैंक बैलेंस भी थोड़ा सा बनाए अपनी कैरियर भी थोड़ी सी बनाए और थोड़ा सा ईश्वर प्राप्ति के लिए भी थोड़ा सा समय नियोजित करें हम लोग इस तरह से नहीं सोचते हम लोगों ने संपूर्ण जीवन ठाकुर को दे दिया अभी हमारी जो ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता है उससे यह गुरु भाइयों की ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता कितनी हजारों लाखों गुना ज्यादा होगी वह तो आप अनुमान करके कह सकते हैं अभी शरत महाराज जो कि डायरेक्ट डिसाइल थे ठाकुर के वह स्वामी जी की तपस्या से प्रभावित हो गए थे स्वामी जी की मेडिटेशन जब ध्यान से इतने वह एक प्रभावित हो गए थे तो फिर स्वामी जी की व्याकुलता ईश्वर प्राप्ति की शरत महाराज या तो फिर अन्य गुरु भाइयों से कितनी ज्यादा होगी लाटू महाराज एक बार बता रहे थे कि मैं सोचता हूं वरा नगर के समय की बात होगी शायद कि नरेन इतना लोरेन वो अपनी वह बिहारी भाषा में लाटू महाराज स्वामी जी को लोरेन करके पुकारते थे नरेन और नरेन का अपभ्रंश हो गया लोरेन तो लाटू महाराज एक जगह पर कहते हैं कि मैं देखता हूं कि लोरेन भाई इतना आगे बढ़ रहा है तपस्या करके तो मैं भी कोई कम नहीं हूं मैं भी जब ध्यान इतना करूंगा इतना जप करूंगा इतना जप करूंगा कि लोरेन भाई को पकड़ लूंगा वो हम लोग जद रेस लगाते हैं तो रेस में जितना भी आगे जाए मैं भी उतना झड़प से आगे जाऊंगा और उनके साथ में चला जाऊंगा ऐसा सोच कर के मैं जप करने की शुरुआत करता हूं मैंने जप किया जप किया इतना जप किया किंतु फिर जब लोरेन भाई के सामने देखता हूं तो वह पता चलता है वोह मैं जितना जप कर रहा हूं ध्यान कर रहा हूं उससे हजारों गुना जब ध्यान करके वो मैं जितना आगे बढ़ा हूं उससे कई गुना आगे वो लो भाई चले गए हैं तो फिर मुझे पता चला कि ठाकुर क्यों लोरेन भाई को इतना भालो भाषा इतना प्रेम करते थे लोरेन भाई के ऊपर में ठाकुर की इतनी स्नेह क्यों था तो देखिए कि गुरु भाइयों का जो मुमुक्षु प्राप्ति करने की जो व्याकुलता है तपस्या करने की जो कैपेसिटी है वह कहीं गुना ज्यादा नरेंद्र में थी स्वामी जी में थी और स्वामी जी में जितनी थी ठाकुर ने खुद कहा है कि यहां पर जो व्याकुलता की प्रच ंड आंधी आई थी उसका 100वां भाग भी नरेण में नहीं देखने को मिलेगा तो देखिए यह एक के बाद एक स्टेप्स आपको समाज में दिखाई देंगे यदि हम लोग सामान्य आदमी को आम गृहस्थ आदमी को देख कर के अपने नजर के सामने एक आदर्श स्थापित करने को जाएंगे तो हमको हमेशा ऐसा लगेगा कि अरे भाई अभी क्या इतना जल्दबाजी करने की जरूरत है अभी तो उम्र इतनी कहां ज्यादा हो गई है चलो थोड़ा सा जगत देख लेते हैं चलो थोड़ा सा यूरोप में टूर पे चले जाते हैं कहीं यह जापान और यह होंग कोंग की टूर करके आ जाते हैं अमेरिका की बाद में यह सब जो है मंदिर में जाएंगे साधुओं का संग करेंगे अभी गृहस्थ को देख कर के या तो फिर हमको देख कर के ऐसा लगेगा कि क्या जल्दबाजी है हम लोग को भी देखिए हम लोग यह सब काम को लेकर के बैठे हैं कर्म को लेकर के बैठे हैं रामकृष्ण आश्रम में जब भी जाएंगे तो आप आपको ऐसा नहीं मिलेगा कि साधु लोग क्या मंदिर में जाकर के जप ध्यान करने में बड़े ही व्याकुल होकर के जप कर रहे हैं जप कर रहे हैं जप कर रहे हैं तो आंखों में से आंसुओं की धारा बह रही है और फिर जब करके उठे तो ऐसा अनाउंस कर दिया कि मुझे ठाकुर का दर्शन हो चुका है अब यह शरीर रहे कि जाए डजन मैटर ऐसा कहीं आपको नहीं देखने को मिलेगा मैं पीपीटीसी में था जॉइन किया था बेलूर मठ में तो एक लड़का आया ब्रह्मचारी होने के लिए तो हम लोग तो एक कमरे में बड़े-बड़े कमरे हमारे लिए रखे थे ट्रेनिंग सेंटर में नए आए हुए लड़कों के लिए तो एक कमरे में पांच-पांच लड़कों को रखा जाता था तो मेरा बगल का वह जो बेड था वहां पर उसको अलॉट किया गया तो हम लोग जब नए आते हैं तो एक बड़ा ही क्यूरियोसिटी रहता है यह पूछने का कि भाई तुम कहां से आए हो किस विचार को लेकर के यहां पे आए हो किस आइडिया को लेकर के आए हो अभी मैं कभी किसी को नहीं पूछता अभी एक लड़का अभी रिसेंटली जवाइन किया है मैंने उसका नाम पूछा सिर्फ उसके अलावा और कुछ नहीं पूछा कि कहां से आए हो क्यों आए हो उसके माताजी पिताजी का क्या मत है क्या उसने ठाकुर महास्वामी जी को ठीक से पढ़ा है कि भी नहीं मतलब वो अभी मुझे वो क्यूरियोसिटी नहीं होती इतने साल संघ में हो गए जिसको आना है वो ठाकुर उनको लेके आएंगे जिसको नहीं आना है वो यदि आ भी जाए तो ठाकुर उनको टिकने नहीं देंगे सब कुछ ठाकुर के ऊपर में है तो अभी वो क्यूरियोसिटी नहीं रहती किंतु उस समय जब मैं खुद नया आया था मुझे आए हुए एक दो महीने ही हुए होंगे तो बड़ा ही क्यूरियोसिटी रहता था जो भी नए लड़के आते थे मैं पूछता रहता था तो ये लड़का मेरे बगल के बेड पे उसको अलोट किया गया तो मैंने उसको पूछा कि भाई तुम कहां से आए हो क्या है तो वो मुझे कहने लगा लड़का कि मैं तो बस यहां पे आया हूं गंगा के किनारे पूरा दिन भर बैठा रहूंगा जब करूंगा गंगा का दर्शन करूंगा और फिर सुबह शाम आरती अटेंड करूंगा बस मुझे और कुछ नहीं करना तो जब उसने ऐसा कहा तो हमारा टाइम टेबल वहां पर टांगा हुआ था तो मैंने वो उठा कर के उसके हाथ में दे दिया अब जैसे ही उसने देखा कि सुबह 3:30 बजे उठना है 4:00 बजे मंगलारती अटेंड करनी है फिर वो 400 बजे से फिर 410 से 5 5:30 तक मेडिटेशन करना है मंदिर में उसके बाद में वो पीपीटीसी हमारे ट्रेनिंग सेंटर में आकर के योगा क्लासेस अटेंड करना है उसके बाद में ब्रेकफास्ट है उसके बाद में एक घंटा वेजिटेबल कटिंग है फिर उसके बाद में आपका वो वाशिंग एंड क्लीनिंग जो भी है वो है उसके बाद में क्लासेस है क्लासेस के बाद में भोजन है आहार आहार के बाद में फिर से बैठ कर के ब्रह्मचारी लोग पाठ करेंगे उसके बाद में ई बजे से क्लास स्टार्ट हो जाएंगे मुश्किल से 1:30 बजे रूम में आए हैं ई बजे क्लास चालू फिर उसके बाद में वॉलीबॉल प्रैक्टिस उसके बाद में फिर से मेडिटेशन आरती क्या यह देख कर के रूटीन देख कर के रात को 10:30 को फिर से सोने को मिलेगा 10:30 3:30 को उठ जाना है दोपहर में एक घंटे का विश्राम वो देख कर के वह इतना परे परेशान हो गया मुझे बोला ये कंपलसरी है क्या यह रूटीन फॉलो करना मैंने कहा भाई यह कंपलसरी है इसको इसके बिना तुम यहां पर नहीं रह पाओगे तो सही में उसने बेचारे ने स्ट्रगल किया दो-तीन दिन किंतु फिर उसने कहा कि मुझे तो इस तरह से मैं नहीं रह पाऊंगा मुझे मैं तो मुक्त मन है मेरा मैं तो मुक्त पंछी हूं मैं जब इच्छा हो तब मैं उठूंगा जब इच्छा हो तब सोऊंगा जब इच्छा हो मैं गंगा के किनारे पर जाकर बैठूंगा तो जाकर के उसने हमारे जो बड़े हमारे जो इंचार्ज स्वामी जी थे उनको जाकर के कहा तो उन्होंने कहा भैया तुम अपने घर जाओ और घर जाकर के मुक्त पंछी की तरह जितना रहना है वह रहना यहां पर जद रहना है तो तुमको यह रूटीन फॉलो करना ही पड़ेगा तो देखिए अब हमारे साधुओं को भी देख कर के आपको ऐसा नहीं लगेगा कि हां हम लोग क्या ना कि क्या जब ध्यान कर दे रहे हैं और क्या ईश्वर प्राप्ति प्राप्त कर मतलब ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर र है लगेगा कि हम लोग यही सब रूटीन ही फॉलो कर रहे है तो देखिए कि इसके प पीछे एक लॉजिक है अपना मन अभी तैयार नहीं हुआ है कि एक प्रचंड साधना तपस्या करने के लिए इसलिए स्टेप बाय स्टेप यहां पर ये सब मेथड ये सब व्यवस्था की गई है तो अभी किंतु जद आदर्श स्थापित करना है तो कोई गृहस्थ को देख कर के कि इवन हमको देख कर के आपको प्रेरणा नहीं मिलेगी आपको प्रेरणा कब मिलेगी जब आप यह गुरु भाइयों को देखेंगे जब आप स्वामी जी को देखेंगे जब आप ठाकुर की तपस्या देखेंगे तब कहीं जाकर के आपको प्रेरणा मिलेगी इसीलिए जो प्रेरणा दाता जो होता है जो प्रेरणा देने वाला होता है उसका जीवन एक प्रचंड तपस्या से भरपूर होना चाहिए तब कहीं जाकर के यह सूरज जैसे पूरा पृथ्वी को प्रकाशित करता है अदर वाइज ये ट्यूब लाइट करेंगे कि ये लाइट बल्ब करेंगे तो जिस कमरे में बैठे हैं वो कमरा सिर्फ प्रकाशित होगा इससे आगे कुछ नहीं होने वाला तो वैसे ही ठाकुर की तपस्या ठाकुर का मोक्ष उव ठाकुर की ईश्वर प्राप्ति की व्याकुलता पूरे जगत को प्रेरणा देती है और हम लोग या तो जो भी सद गृहस्थ है हम लोग जिस कमरे में बैठे हैं उस कमरे में यदि आकर के हमारे साथ में बात करेंगे तो आपको थोड़ा बहुत लगेगा कि अच्छा चलो इनके जैसा कुछ करने का प्रयत्न करते हैं किंतु जैसे ही यह कमरा छोड़ कर के यह हमारा ऑफिस से बाहर निकल गए या आश्रम से बाहर निकल गए वो प्रेरणा यहीं पर रह जाएगी हमारी प्रेरणा यहां से बाहर में आश्रम से बाहर काम नहीं करेगी यदि पूरे जगत को प्रेरणा देनी है यह बाहर में रास्ता यह बड़ा हाईवे बिजी हाईवे है यहां पे तो इसको यदि यहां पे कोई आदमी खड़ा है दुकान में बैठा है सब चारों ओर से मुश्किलों से घिरा हुआ है अपना बैंक बैलेंस के सामने देखता है अपने फैमिली के सामने देखता है अपना बिजनेस के सामने देखता है सब चीजें उसके मन को खा जा रही है तब कहीं जाकर के उसके मन को पकड़ कर के कान पकड़ कर के ऊर्ध्वगामी कर देने की शक्ति जदी किसी में होगी तो वह ठाकुर मंदिर में बैठे हैं उनकी है हमारा जीवन या हमारी वाणी की कोई इसमें विसात नहीं इसमें किसी भी तरह का कोई क्षमता नहीं इसीलिए यहां पर महाराज जी लिखते हैं पराकाष्ठा प्रदर्शन एकटा विशेष प्रयोजन छलो अत्युक्ति एक आवश्यकता थी और यह आदर्श संपादन एकमात्र जगदंबा के सा लिए ही संभवत था जगदंबा ही इस आदर्श को स्थापित कर पाएगी एक और अवतार और एक और शक्ति पुरुषों के लिए वैसे तो पूरे जगत के लिए अवतार है किंतु नारियों के लिए स्त्रियों के लिए स्पेसिफिक आइडियल स्थापित करना वो शक्ति के द्वारा ही संभव है कारण उन शताब्दी ते अन्न कोन उपाय पराधीन भारत के आत्म संस् करा क्यों क्योंकि उन शताब्दी 19 सेंचुरी में और कोई उपाय से और कोई रास्ते से पराधीन भारत को आत्म संस्था करना अपने में श्रद्धा दिलाना आत्म श्रद्धा दिलाना और समस्त विश्व के ही प्राण प्रद आदर्श संबंध अहि तो करा अपने में आत्म श्रद्धा दिलाना अपने में एक निष्ठा श्रद्धा का प्रतिपादन करवाना अपने खुद के ऊपर में आत्मविश्वास जगाना और इस जगत को भारत के पास जोय अमृत मई यह ट्रेजर है यह खजाना जो है सालों साल पुराना अपने पुरखों का यह पूरे विश्व में यदि बांटना है और विश्व जदी भारत को सीरियसली लेगा हम लोग तो बांटते जाएंगे चलो हम लोग बोलते जाएंगे यह रे पास में यह योगा का विज्ञान है आयुर्वेद का विज्ञान है यह जब ध्यान का विज्ञान है आप लोग कीजिए इसको ग्रहण क्योंकि ये लोग हमको रिस्पेक्ट क्यों देंगे पराधीन भारत है गुलाम भारत है खुद को कुछ कर नहीं पाएगा और जैसे चंद्रयान हमने भेजा तो यह विदेशी कमेंटेटर्स होते हैं ना यह सब निकम में लोग वे लोग बोलना शुरू कर दिया कि यहां आधे लोग तो गरीब हैं ये 15 20 ना 30 करोड़ लोगों को रात को सोने से पहले खाना नहीं मिलता है भूखे पेट सोते हैं ना ही चलने ये चंद्रयान भेजने के लिए पहले अपने गरीबों का तो ख्याल करो फिर चंद्रयान भेजना चांद पे तो ऐसा बोलने वाले लोगों की कमी नहीं है कि जगत को जगतगुरु होने को जा रहे हो पहले अपना तो घर ठीक करो अपने घर में जो आग लगी है उसको तो बुझाओ वो क्षमता नहीं है अपने को प्रोटेक्ट नहीं कर पा रहे हैं करोड़ों भूखों को कुछ अन्न नहीं दे पा रहे हैं और जगत को आध्यात्मिकता सिखाने को को चले हैं कौन हमसे सीखेगा तो भारत को सिर्फ आत्म श्रद्धा या आत्मविश्वास नहीं दिलाना भारत को पराधीनता की बेड़ियों से जंजीरों से मुक्ति भी दिलानी है देखिए हमारा यह जो नॉन कोऑपरेशन मूवमेंट यह सत्याग्रह का यह फ्रीडम मूवमेंट जो चला हमारा उसके पीछे भले ही महात्मा गांधी का एक्टिव एक अवदान हो किंतु आदर्श जो इसके पीछे वह ठाकुर महा स्वामी जी का ही था जितने भी देश है उन्होंने विदेशी सत्ता हों से मुक्ति प्राप्त की है जैसे कि अमेरिका का वर ऑफ इंडिपेंडेंस देखिए या तो फिर जितने देशों ने यह शोषण करने वाले लोगों से मुक्ति की है तो व वो देखिए कि जैसे कि यह फ्रेंच रेवोल्यूशन है रशियन कम्युनिस्ट रिवोल्यूशन है चाइनीज रिवोल्यूशन है तो यह शोषण कर्ताओं से मुक्ति प्राप्त की ना कि विदेशी शासन कर्ताओं से मुक्ति प्राप्त की अमेरिकन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस ना कि रशियन रिवोल्यूशन ना कि चाइनीज रिवोल्यूशन सब समय देखिए यह खून से उन्होंने अपने को आजादी प्राप्त करवाई है और भारत में क्या हुआ अपने मुंह पे ईश्वर की वाणी अपने हृदय में आशीर्वाद और सबकी भलाई चाहते हुए भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की तो यह आशीर्वाद देकर के स्वतंत्रता प्राप्त करना यह पूरे विश्व के इतिहास में भारत ही अकेला एकमात्र देश है जिसने यह कार्य कर दिखाया है तो ठाकुर महा स्वामी जी की वजह से बिना खून की नदियां बहाए हमने अपने को मुक्त किया है हां आप कह सकते हैं कि पार्टीशन में जो हुआ उसके बारे में क्या तो सही सही में कि पार्टीशन में जितना कत्लेआम हुआ है उसका मतलब वह एक बहुत ही एक भयावह चीज हुई है किंतु फिर उसके लिए हम अपने को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते उसके लिए सामने वाली जो पक्ष है सामने वाले जो लोग थे उन उन लोगों के डिसीजन उन उसके लिए ज्यादा रिस्पांसिबल थे रदर देन हम गांधी जी यहां तक कहने को तैयार थे कि नेहरू को छोड़ करके जिन्ना को प्राइम मिनिस्टर बनाया जाए यदि भारत के पार्टीशन रुके तो मैं यहां तक जाने को तैयार हूं किंतु फिर वह नेहरू ने बोल दिया कि अरे भाई इतना भी हमारा हृदय उदार नहीं है हम लोग जिन्ना को प्राइम मिनिस्टर नहीं देखना चाहते तो फिर कहीं जाकर के पार्टीशन अवश्यंभावी हुआ किंतु हमारे प्रथम पंक्ति के जो नेता थे जो सर्वश्रेष्ठ नेता थे उन्होंने कभी भी दूसरों का बुरा नहीं चाहा दूसरों ने चाहा कि कि हमको लूटे दूसरों ने चाहा कि हमारी जमीन हमसे हमसे वो हड़प कर ले हमारी जमीन हमसे छीन ले दूसरों ने चाहा है हमने कभी ऐसा नहीं कहा कि भारत में रहने वाले जो विभिन्न संप्रदाय के विभिन्न धर्म के लोग हैं उसमें हम भेदभाव देखते हैं हमने नहीं कहा उन्होंने कहा कि हम भेदभाव देखते हैं हम अलग होना चाहते हैं हमने किसी को अपने घर से नहीं निकाला यह जू ये पारसी लोग पारसी जब यह पारस देश में ईरान में जब इस्लाम का आक्रमण हुआ और वहां के जो ओरिजिनल निवासी थे पारसी लोग उनको रहने की कोई जगह नहीं थी तो वे लोग भारत में आए यह सूरत के पास में जहां पर एक राजा था वहां पर समुंदर के किनारे वे लोग उतरे और राजा को मैसेज दिया कि हम लोग यहां पर सूरत ही है शायद मैं एग्जैक्ट जगह भूल गया मोस्ट प्रोबेबली सूरत है तो वहां पर जाकर के राजा को मैसेज दिया कि हम लोग यहां पर रहना चाहते हैं तो राजा ने क्या किया एक दूध से भरा हुआ संपूर्ण भरा हुआ एक गिलास उनके पास में भेज दिया तो अभी यह बाकी जो पारसी लोग थे वे लोग सोचने लगे कि राजा ने उत्तर नहीं देकर के दूध से संपूर्ण छलो छल भरा हुआ गिलास क्यों भेज दिया तो उनका जो लीडर था वह समझ गया कि राजा क्या कहना चाहता है उसने उस गिलास में एक शक्कर का मिश्री का एक दिया थोड़ी सी शक्कर उसमें मिला दी और कहा इसको वापस ले जाओ अब जब वह दूध का गिलास राजा के पास वापस आया देखा कि वह इतना ही भरा हुआ है उसमें कोई चेंज दूध में नहीं दिख रहा दूध कम हुआ है दूध को निकाल करके और कुछ उसमें डाल दिया है कुछ नहीं हुआ दूध वैसे का वैसा है जब राजा ने दूध टेस्ट किया तब पता चला अभी इसकी मिठास बढ़ गई है इसमें चीनी डाली गई है तो अब राजा ने कहा कि हां ठीक है उनको यहां पर रहने की अनुमति दे दो तो भी वो बाकी लोग जो सब दरबार में बैठे थे वे लोग राजा ये हुआ क्या राजा जी बताइए तो हुआ क्या ये हमको तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है तो राजा ने कहा देखो यह दूध से छला छल छलो छल गिलास जो मैंने भेजा उसका अर्थ कि भारत में ऑलरेडी इतने सारे लोग रह रहे हैं ये नए रिफ्यूजीस जो है यह जो आश्रय लेने के लिए लोग आए हैं आप लोग हम आपको कहां रखेंगे हमारा देश तो फिर यहां पर सब ये ओवरफ्लो हो जाएगा पानी दूध से भरा हुआ ग्लास है उसमें और ज्यादा दूध डालेंगे तो वह तो ओवरफ्लो हो जाएगा तो लीडर ने क्या किया कि वहां पर मछरी डाल दी यह तो शक्कर डाल दी तो शक्कर डालने से वो उसकी मिठास बढ़ गई यानी कि वह यह कहना चाहते हैं कि आपकी सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में किसी भी तरह का खले पहुंचाए बिना किसी भी तरह का डिस्टरबेंस किए बिना बड़े ही शांति से हम लोग यहां पर रहेंगे तो देखिए कि पूरे विश्व में से जितने भी रिफ्यूजी है जिन्होंने अपने अपने खुद के देश में आतंक सहन किया है उनको यदि आश्रय चाहिए तो हमने अपने देश में उनको पनाह दी है तो यह मां भारती का यह वर्ल्ड मिशन है कि पूरे विश्व में से जहां जहां किसी को भी मानसिक अशांति मानसिक बीमारी जिनको है वो यहां पर आकर के शांति प्राप्त करें इसके लिए यह पुण्यभूमि तीर्थ भूमि यह सिर्फ पुण एक बहुत बड़ा तीर्थ है हम लोग सोचेंगे कि हां यह एक तीर्थस्थान है यह हिमालय में है यह अमरनाथ है यह केदारनाथ है यह यहां पर द्वारका है सोमनाथ है किंतु यह तो तीर्थ स्थान है ही है पूरा भारत एक तीर्थ है यहां पर जो भी अवतरण करेगा अपने पैर रखेगा इसकी भूमि पर अपना सिर मत्था टिकाए उनको शांति मिलनी ही है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तस्स श्री राम कृष्णर्पण मस्तु