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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

आविर्भाव : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 15 Jan 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते आज सुबह को मैं न्यू डिस्कवरी पढ़ रहा था स्वामी जी सेकंड टाइम अमेरिका गए थे उस समय का विवरण फिफ्थ वॉल्यूम में है तो बड़ा एक सुंदर एक उसमें एक पैसेज है स्वामी जी निवेदिता के साथ में रात को कहीं पर वकिंग करने के लिए गए हैं तो ग्राम्य वातावरण था रिजली कोटे रिजली मेनर में उस समय स्वामी जी रहते थे तो न्यूयॉर्क न्यूयॉर्क का ही एक सब एक टाउन है रिजली बोलक के उसमें यह फ्रांसिस लगेट का एक फार्म हाउस है वहां पर ये लोग गए थे तो ग्राम्य विस्तार है का वातावरण है ना ही आज की तरह ट्रैफिक वगैरह और कोई पोल्यूशन नहीं है तो इतना सुंदर शांति इतनी है के निवेदिता उस समय कह रही है कि इस शांति में चलते हुए पैरों की आवाज भी जब सुनते हैं तो उससे मन को विक्षेप पहुंचता है माने इतना शांत है वातावरण कि थोड़ा सा भी आवाज वहां पर मतलब मन ऐसा लगता है जैसे बहुत बड़ा हो गया तो यह बात सुनकर के स्वामी जी एक कहते हैं कि भारत में जब शेर वाघ टाइगर टाइगर जब शिकार करने के लिए जाता है तो पता है ना कि टाइगर का जो पंजा होता है वो बड़ा ही सॉफ्ट होता है उसके उसके पास वो स्किल होती है कि जमीन पर जब पैर रखे अपना पंजा रखे तो उससे थोड़ा सा भी आवाज ना हो वरना शिकार को पता चल जाएगा कि कोई शिकारी आ रहा है जिसका शिकार कर रहा है वो मने कोई वो भेड़ हो ना बकरी हो कोई भी हो तो वो दौड़ कर के चला जाएगा शिकार तो शेर ने या वाघ ने यह सिद्धि प्राप्त की है टाइगर ने कि बड़े ही हल्के कदम से वह जमीन पर पैर रखेगा जिससे कि वह सूखा हुआ पत्ता भी है ना उसके ऊपर भी पैर रखेगा तो ज्यादा आवाज नहीं आएगा मिनिमम आवाज आएगा तो स्वामी जी कहते हैं यह बात सुन कर के कि रास्ते में चलते हुए कदमों की आवाज सुनकर के भी मन में विक्षेप होता है इतनी शांति है यहां प तो स्वामी जी कहते हैं कि जब वाघ शिकार करता है और उसकी पूंछ जद थोड़ा सा भी आवाज करेगी तो क्या करता है वाघ अपनी पूंछ को जोरों से अपने दांतों में दबाए पूछ के ऊपर में गुस्सा करके और तब तक दांतों से दबाए जब तक उसमें खून निकलना शुरू हो जाए यानी कि अपने पैरों को तो टाइगर इस तरह से ट्रेन करता है कि जमीन पर आप पैर रखे तो थोड़ा सा भी आवाज ना आए पूछ को भी इस तरह से ट्रेन करता है कि चलते चलते थोड़ा सा भी आवाज ना हो तभी तो शिकार कर सकते हैं तो देखिए कि मैंने तो स्वामी जी तो यहां पर बोल कर के छोड़ देते हैं किंतु तो इसके बाद का हम थोड़ा सा एक दो स्टेप अपने जोड़ ऐड कर दे सकते हैं कि देखिए कि साधन शिकार भी करना है शेर को तो अपने को इस तरह से डिसिप्लिन करता है अपनी खुद की पूंछ को इतना जोर से काटेगा कि उसमें खून निकलने लगेगा तो शिकार करने के लिए इतना प्रचंड डिसिप्लिन और एक मनता पूरा मन उसका वह शिकार के ऊपर में है तो यदि शेर या तो वाघ इस तरह से कर सकता है तो हम भी तो अपनी साधना में व छोटे मोटे विक्षेप है तो वो जब सामने आते हैं तो अपने को इस तरह से डिसिप्लिन कर ही सकते हैं मने इतना इतना क्रोल डिसिप्लिन नहीं करके थोड़ा बहुत तो कर सकते हैं जैसे कि राजा महाराज का एक इंसिडेंट है कुसुम सरोवर वृंदावन में तपस्या कर रहे हैं रात को ठीक किया है कि मध्यरात्रि के बाद में उठ जाएंगे और प्रतिदिन बैठ कर के जप करेंगे और खाना पीना इतना सादगी भरा कि खोका महाराज थे उस समय उनके साथ में तो गांव में भिक्षा करके के ले आते थे उनके लिए और वो दिन भर तो वैसे ही एक दो रोटी वैसे ही पड़ा रहता था रात को जब संध्या के बाद में थोड़ा सा वो जब ध्यान करके उठते थे राजा महाराज स्वामी ब्रह्मानंद जी महाराज तब ये रोटी को रोटी तो सूख गया है साथ में कु आचार वगैरह तो कुछ है ही नहीं सब्जी वगैरह तो क्या करते थे रोटी को पानी में भिगा करके वो रोटी खा लेते थे जैसे कि वो खाने में पचाने में वो थोड़ा सहज बने ऐसा करके और फिर थोड़ा सा विश्राम करके आधी रात के बाद में फिर से बैठ जाते थे खड़े हो जाए तो एक दिन ऐसा हुआ कि थोड़ा थक भी गए थे या बीमार थे जो भी कारण हो रात को मध्यरात्रि के बाद में उठ नहीं पाए उस समय क्या हुआ कि देखा एका कि कोई एक महात्मा जी बाबा जी वृंदावन तो बहुत सारे वो जो वैष्णव साधु साधक घूमते रहते हैं व वैष्णव बाबा जी के वस्त्र परिधान करके एक हाथ में माला लेकर वो जप करते करते घूमते रहते हैं तो ऐसे ही एक वैष्णव बाबा जी ने आया और उनको जोर से धक्का मारा बोला उठ अभी तो तुम्हारा जब धन का समय है सोए क्यों हो तो फटा कर के राजा महाराज ब उठ कर के खड़े हो गए और उठ कर के जद वोह थोड़ा सा उनका आभार मानने को जाते हैं वोह बाबा जी का जिन्होंने उनको उठाया देखा कि बाबा जी अदृश्य हो गए तो फिर दूसरे दिन उन्होंने खोका महाराज को ना किसी को बताया कि देखो कि मैं इतना इतनी निष्ठा पूर्वक तपस्या कर रहा था तो यह देख कर के वृंदावन में ऐसे अशरीरी बाबाज राजा महाराज का खुद का शब्द है अशरीरी बाबाजी तो ऐसे बहुत सारे साधक ये दिव्य शरीर धारण करके ओजस का शरीर धारण करके वो घूमते रहते हैं साधना करते और जो कोई साधक निष्ठा पूर्वक साधना करता है तो उसको फिर जद छोटी मोटी उसके साधना में बाधा विपत्ति आ जाए तो उसको सहाय भी करता है तो देखिए कि उनका निष्ठा इतना था अदर वाइज हम लोग तो यदि मान लीजिए कि ठीक किया है कि सुबह को उठकर मंगलारती में जाना है या या और कुछ यदि आज बहुत ठंडी है या तो फिर आज देरी रात से सोए हैं कुछ काम था या किसी के साथ गप लगा रहे थे तो चलो छोड़ दो सुबह को नहीं जाते हैं तो हमको उठाने के लिए कोई नहीं आने वाला है क्यों क्योंकि वो हमारी निष्ठा वो इतनी स्ट्रांग नहीं है कि इस तरह से कोई दिव्य डिवाइन हेल्थ को वो अट्रैक्ट कर पाए जैसे कि राजा महाराज की थी तो ये डिसिप्लिन जद हम अपने जीवन में डालेंगे ये टाइगर की तरह ना कि राजा महाराज की तरह तो इन लोगों का थोड़ा 1 पर 10 पर भी डिसिप्लिन अपनी लाइफ में हो साधना में तो हम कितना आगे बढ़ सकते हैं वह हम अनुमान करके सोच सकते हैं ओके मां शारदा देवी की जीवनी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखी हुई यह हम पाठ कर रहे थे मैंने आज देखा हमारे लास्ट क्लास 29 दिसंबर को हुआ था लंबा टाइम हो गया उसका जो लास्ट पैराग्राफ है वो मैं फिर से एक बार पढ़ लेता हूं बहुत ही सुंदर बात गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं इतना सुंदर एक पैराग्राफ है यह सब चीजें मैं पहली पहली बार पढ़ता था तोसा पढ़ के पढ़ के फटाफट करके वह मैं निकल जाता था आगे इसका कोई ज्यादा कौन सेंटेंस के ऊपर में क्या लिखा है इसमें कितना डेप्थ है वह समझ में नहीं आता था किंतु आज यह जब फिर से तीसरी चौथी पांचवी छठी बार पढ़ता हूं तो पता चलता है कि एक एक सेंटेंस में कभी-कभी सिर्फ प्रसंग का ही वर्णन होता है तो व प्रसंग ही चल उसमें तो ठीक है किंतु जब प्रसंग के अलावा गंभीरानंद जी महाराज मां के जीवन के ऊपर में फिलोसॉफिकली या तो फिर नरेशन के रूप में कुछ लिखते हैं तो प्रत्येक फिलोसॉफिकल पॉइंट में कितना डेप्थ होता है देखिए महाराज जी यहां पर लिखते हैं किंतु आमरा ज कालर कथा लिखते ी सेही समय उधव लोक पते धाम सद समाग मा देव मानत्व संधि स्थले अस्थान पूर्वक ई मोर् लीला कोन भावे ऊपर अधिकतर गुरुत्व आरोप करीबन ताहा जनो सहसा स्थिर कोरीते पीते छ लेना यह उन दिनों की घटना है मां के बचपन के दिनों की उस समय में मां अपना देव और मानवत्वम में से कौन से स्वभाव को ज्यादा प्रकाशित करें वह जैसे कि ठीक नहीं कर पा रही थी कभी देवत्व का प्रकाश हो जाता था तो कभी मानवत्वम जाता था छोटी बच्ची बनकर के अपनी मां के साथ में वो मां को सहाय करती थी अपने छोटे भाइयों की केयर करती थी उनको लेकर के अमोदर नदी में स्नान करने जाना फिर वहां पर किनारे बैठ कर के वो थोड़ा सा मुड़ी वगैरह खाना और कहीं कहीं अपने पिताजी के साथ में वह पिताजी का जो आदर है स्नेह है वह प्राप्त करना यह तो पूरा एक बालिका जैसा जीवन और कहीं वो सडन एक देवी भाव प्रकट हो गया कि जगत धात्री की की पूजा हो रही है वहां पर मां बैठ कर के बालिका रूपी मां व सामने बैठ केर ध्यान कर रही है वो एक व्यक्ति ने आकर के देखा कि तो समझ नहीं पाया कि मां जगत धात्री है ना कि वो मूर्ति जगत धात्री उसमें मां देवी का ज्यादा प्रकाश है और वह सोचते हुए इधर-उधर देख रहा है फिर आखिर में डर गया कि अरे इतनी छोटी सी बालिका में इस तरह का देवी भाव का प्रकाश भी क्या संभव है वो बेचारा डर के मारे वहां से भाग गया अभी हम सोच सकते हैं है कि उसका भी क्या सद्भाव होगा वहां पर इतने सारे लोग खड़े थे वहां पर जद जगद धात्री की पूजा चल रही है मां की पूजा तो तो सैकड़ों लोग वहां पर मां के दर्शन करने के लिए आए होंगे किंतु एक ही व्यक्ति एक ऐसा निकला कि जिनमें जिनको एक बालिका के भीतर में जगत धात्री का प्रकाश दिखाई दिया बाकी सबको ऐसा शायद लगा होगा कि हां चलो मां के भीतर में कुछ तो एक स्पेशलिटी है मां बाकी सब बालिकाओं की तरह चंचल नहीं है वो झगड़ा करना वो फिर मने वो छोटी-छोटी चीजों में उलझ जाना ऐसा मां के जीवन में नहीं है जो मां के साथ में रहते थे यहां वह अघोर मणि देवी की बात है कि मां बड़ी सरल थी और जब वह खुद तो किसी के साथ झगड़ा नहीं ही करती थी किंतु दूसरी बालिकाओं में आपस में जद झगड़ा हो जाए तो मां जाकर सुलह करवाती थी तो इन लोगों को यह तो लगता था कि हां मां में कुछ अनयूजुअल है मां के भीतर में ऐसी एक मैच्योरिटी है जो कि उनकी उम्र के साथ में मैच नहीं हो रही ऐसा उनको सब लगता होगा किंतु सही सही एक देवी का प्रकाश देखना वो भी तो जिसने यह देखा होगा व भी कितना भाग्यवान होगा तो उस प्रसंग को उपलक्ष करके गंभीर महाराज गंभीरानंद जी महाराज कह रहे हैं कि मां उस समय अजान से से ही वो देवत्व का अपने देव जो भीतर में प्रकाश है उसको वो निकल जाता था बाहर में मां को शायद मां ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि हां मैं ध्यान कर रही हूं तो दूसरे लोगों को ऐसा लगेगा कि मां जगत धात्री स्वयं बैठ कर के ध्यान कर रही है माने ऐसा प्लान भी नहीं किया होगा सोचा भी नहीं होगा वह ऑटोमेटिक हो जाता था क्योंकि जिसके भीतर में यह शक्ति है शक्ति को तो आप ज्यादा समय तक छुपा नहीं सकते और इसके बारे में हमने डिस्कस किया था कि हमको लगता है कि अरे तो तो अच्छी ही बात है ना मां तो जगद धात्री स्वयं जगद स्वयं यदि मनुष्य शरीर मनुष्य शरीर धारण करके पृथ्वी पर आई है तो लोगों को तो पता होना ही चाहिए तभी तो लोग उससे कुछ सीखेंगे यह तो अच्छी बात है कि मां के भीतर में देवत्व का प्रकाश हो किंतु फिर इसका यह जो एक क्या कहेंगे कि ड्रॉक ड्रॉबैक है वो भी हमने डिस्कस किया था ये इस तरह से कि यदि हम यह देखेंगे कि अरे मां तो देवी है वो तो जगत धात्री स्वयं है तो वो बैठ कर के दिन के 10000 जप करें उससे हमको क्या है हम हमारे से तो यह सब होने वाला नहीं है मां का जीवन अलग है हमारा जीवन अलग है ऐसा बोलक के फिर मां की तपस्या से सीख कर के हम लोग मां की तरह तपस्या नहीं करेंगे मां ने पंच तपा किया तो किया वो तो मां है वो करेगी पंच तपा हमारे से थोड़ी ना कुछ होने वाला है ऐसा करके हम मां को सिर्फ प्रार्थना करेंगे कि मां हमको शक्ति दो भक्ति दो मुक्ति दो और बस इसी से हमारा काम हो जाएगा तो ये नहीं ठाकुर के जाने के बाद में हमको पता है कि उनके भक्तों के दो दल हो गए थे एक तो था कि यह रामचंद्र दत्त वह कहता है कि अरे हमने तो अवतार वरिष्ठ का हमको स्पर्श प्राप्त हुआ है उन्होंने हमारे सर पर हाथ रख के आशीर्वाद दिया है तो अब यह साधन भजन तपस्या यह सब फालतू की बेतू की बातें क्यों आओ चलो हम नगर कीर्तन करते हैं ठाकुर के गुणगान गाते हैं जबकि यह स्वामी जी थे यह लड़के थे काली महाराज राजा महाराज लाटू महाराज इन लोगों ने मठ की स्थापना करके वहां पर प्रचंड तपस्या आरंभ कर दी और कभी-कभी रामचंद्र दत्त महाशय स्वामी जी की निंदा भी किया करते थे कि अरे वह चार पांच लड़के क्या एक मठ बना कर के अपने से नया कुछ एक हुजू बांगला ते बोले तो मैंने क्या एक नया एक आरंभ किया है नाटक चला रहे हैं तो ऐसा बहुत सारे लोगों के मन में हो जाता है कि पता चल जाएगा तो यह अवतार है तो तपस्या कौन करने वाला है रामचंद्र दत्त का जो पता है ना हृदय परिवर्तन हुआ था वो घटना स्वामी जी के बारे में मैंने बहुत बार कही है पहले बहुत सुंदर घटना स्वामी जी अमेरिका से वापस आए हैं और आकर के रामचंद्र दत्त को मिलने के लिए गए काकड़ काछी में वो थे और बीमार थे आखिरी बीमारी था बीमारी थी शैया गत थे तो आकर के जब स्वामी जी इतने विश्व विजय स्वामी विवेकानंद इतने लोगों से मने सम्मानित हुए राजा लोगों ने स्वयं उनका रथ उन्होंने टाना था ऐसे स्वामी जी जब उनको मिलने के लिए आते तो बड़े ही गदगद हो गए बोले कि अरे भाई नरेंद्र हम लोगों का जो यह सब में तुम्हारे बारे में जो सब बोलता था वो तो बड़ा ही गलत हुआ ऐसा सब बातें कर रहे थे उस समय रामचंद्र दत्त को बाथरूम जाने की जरूरत पड़ी तो अभी खड़े बैठे बहुत ही बीमार है बहुत ही शरीर असु है निर्बल है तो बैठ कर के बैठे तो सही बड़ी मेहनत करके फिर अपने जूते खोज रहे हैं वो खाट के ऊपर में बैठे थे तो हुआ क्या प्रॉब्लम कि जूते खाट के भीतर में अंदर में चले गए थे तो अभी वह तो झुक कर के जूते कितनी देर तक खोजें तो थक गए झुक भी नहीं पाएंगे ज्यादा वो खाट के नीचे हाथ डालना या ऐसा ज्यादा झुकना तो स्वामी जी सामने में कुर्सी पर बैठे थे वो कुर्सी से खड़े हुए अपने से पूरे झुके खाट के भीतर में जाकर के जूते बाहर निकाले और रामचंद्र दत्त को दिए यह देख कर के रामचंद्र की आंखों में आंसू आ गए बोले कि नरेंद ठाकुर ने तुम्हारे बारे में जो कुछ कहा था बिल्कुल सही कहा था मैं अभी तक स्वीकार नहीं कर पाया किंतु अभी मुझे यह सही सही ये अनुभूति हुई तो ये इन लोगों का झगड़ा यह सब लीला ही है मने जो ठाकुर के साथ में आते हैं मां के साथ में आते हमारे हमारे हमको समझ में आए बड़े ही गहन उनके जीवन का तात्पर्य ये घटनाओं के माध्यम से सहज सरल कर दे जिससे कि हम समझ पाए इसीलिए ये सब लीला होती है किंतु बहुत ज्यादा देवत्व का प्रकाश कर देने से फिर हम लोग तपस्या नहीं करते उनको उनसे यह प्रेरणा नहीं लेते तपस्या करने की हम लोग सिर्फ उनके ऊपर में भक्ति और श्रद्धा लाकर के बात छोड़ देते हैं उसके बाद का जो नेक्स्ट स्टेप है कि अपनी इंद्रियों उनके विषयों के भीतर में पीछे में जो दौड़ रही है तो इंद्रियों के विषय से मन को वापस लाना उसको एक किसी एकाग्र करना किसी ईश्वर के ऊपर में या किसी मंत्र के ऊपर में एकाग्र करना और नियमित जब ध्यान करना दिन के 15-20 मिनट भी हो क्यों ना हो वो भी इनफ है किंतु इतना करते जाना वो हम शायद नहीं कर पाएंगे यदि हमको पता चल जाए कि अरे ये तो संपूर्ण रूप से ईश्वर ही है इसीलिए ये लोग हमेशा देवत्व और मानवत्वम स्थल है वहां पर विराजमान रहते हैं कभी करुणा से अपने देवत्व का प्रकाश हो जाता है जैसे पहली जनवरी को ठाकुर ने सभी को स्पर्श करके कहा था तो मादर चैतन्य होक तुम सबको चैतन्य प्राप्त हो वो कभी-कभी हो जाता है जीवन के आखिरी समय में या तो किसी के ऊपर में बहुत ज्यादा करुणा से पर्वश होकर के किंतु यह मने स्पेशल इवेंट से अवतार के जीवन की अदर वाइज वे लोग अपने मनुष्यवकाशा कोथा मरण कोरिया तीनी पोरे बोली छन इसीलिए हम देखते हैं कि मां अपने खुद के बचपन के दिनों की बातों को याद करके कहती है क्या कहती है देखो बाबा छले बेला देख तुम अर मतो मे सर्वदा अर संगे संगे थके अर सकल काजर सहायता करतो मां कहती है देखो बेटा मैं जब छोटी थी तब देखती थी कि मेरी ही जैसी एक छोटी बालिका हमेशा मेरे साथ-साथ रहती थी और मेरे सभी कार्यों में सहाय करती थी आमार संगे आमोद अलाद करतो मेरे साथ में खेलना खेलती थी आनंद करती थी सब करती थी किंतु अन्य लोग एलेई आर ताके देखते पे तुम ना किंतु जद और कोई आ जाता तो यह बालिका अदृश्य हो जाता जाती तब मैं उसको नहीं देख पाती थी दोष 11 बछर पज तो रोकम होए छलो 10 11 साल की उम्र तक ऐसा हुआ था एक छोटी बालिका मां के साथ-साथ में रहके खेलती थी आनंद करती थी बातें करती थी व हंसी मजाक करती थी जब तक मां की उम्र 10 11 साल की थी तब तक ऐसा होता था किंतु जैसे ही कोई आ जाता तो वैसे ही यह बाली का अदृश्य हो जाती अभी इस बात का तात्पर्य क्या है वह तो हम कितना ही चाहे इसके भीतर में डिस्कस कर ले कि वह बालिका क्यों कौन थी क्यों आती थी यह हमको पता है कि मां जब कमार पुकुर में गई थी तो तो नई एक वह की तरह से जो पारिवारिक ट्रेडिशनल एक इंडियन हाउसवाइफ जिस तरह से उस समय का जो ट्रेडिशनल ताना वो अकेले-अकेले कहीं नहीं जाना यह सब मां को करना पड़ता था तो मां के साथ में कितनी वह जया और विजया जैसी वो पाच 10 और कोई लड़कियां मां के साथ में वह तालाब तक जाती थी तो क्या है कि मां जब आती है तो साथ में जगदंबा आएगी जगत धात्री आएगी तो जया विजया उनको तो साथ में ही लेकर आएगी लीला में संगी होने के लिए क्योंकि दो तीन चीजें हैं कि इन लोगों का फिर एक डिवाइन नेचर रहता है तो मनुष्य इनसे थोड़ा सा डर के रहते हैं भले ही चाहे ठीक-ठीक पता ना चले कि मैं इनसे क्यों डर रहा हूं या तो फिर इनके साथ में सभी तरह की बातें करने में क्यों संकोच हो रहा है क्योंकि देखिए छोटे लड़के होते हैं तो एक एक उम्र होती है कि फिर विषय की बातें उनके मन में प्रवेश करना शुरू हो जाती है तो फिर अपने मित्रों के साथ में भी वे लोग इसी तरह की बातें किया करते हैं तो ऐसे लड़के लड़कियां करके मां के साथ में इस तरह की बातें ना करें इसके लिए एक एक आवरण होता है दिव्यता का आवरण इनके चारों ओर वो आवरण हमको समझ में नहीं आता कि है किंतु इस तरह की कोई वैशक बातें या तो फिर दुनियादारी की बातें मां के साथ में करने से ही मैं अनुमान कर सकता हूं कि बाकी सबको संकोच होता होगा तो अभी यह ऐसा तो अभी नहीं है कि मां के साथ में उनके ही जितनी पवित्र बालिका और कोई है जिनके साथ में मां खेले दिन प्रतिदिन की बातें करें क्योंकि है तो मनुष्य का आकार मनुष्य का पंचमहाभूत का शरीर तो मां को भी तो एक कंपेनिया शिप चाहिए मां को भी तो एक फ्रेंडशिप चाहिए छोटी बालिका है तब तो यह उनकी जो संगिया है दिव्य संगी निया वो इस तरह से मनुष्य का बालिका का आकार धारण करके मां के साथ में खेलती थी आनंद करती थी दिव्य आनंद बाकी सब बच्चे खेलेंगे तो वैसे तो लगेगा कि बच्चे बड़े इनोसेंट है कि तु सही में देखें तो बच्चे इतने इनोसेंट होते नहीं है ज्यादातर समय होते हैं किंतु धीरे-धीरे करके संसार उनके भीतर में प्रवेश कर ही जाता है आज तो और भी छोटी उम्र में करता है पहले तो क्या था कि थोड़ा सा प्रोटेक्शन था सोसाइटी में स्कूल में परिवार में आज सब तरह का प्रोटेक्शन निकल गया है परिवार में भी तो प्रोटेक्शन मुश्किल है और जैसे ही स्कूल में गए घर के बाहर निकले तो पता नहीं कितना कचरा उन लोगों के ऊपर में फेंका जाता है तो ये इनोसेंस बहुत ही छो छ उमर से ही जाना शुरू हो जाता है तो मां को तो क्या है कि दिव्यत्वाची महाभूत का शरीर तो किसके साथ में बात करेगी किसके साथ में खेलेगी तो इस तरह से मां की संगी निया इ एक दिव्य शरीर धारण करके आती थी मां के साथ में बात करती थी यह मेरा इंटरप्रिटेशन है सभी का अपना अपना इंटरप्रिटेशन हो सकता है यह मेरा है इसके बाद में गंभीर महाराज लिखते हैं आगे झोले नामिया गरुर जन्नो दोल घास काटते गया तीनी देखीते एक सोमो बोयो का मे घस काटिया दते छ जल में जाकर के दल घस जिन लोगों ने खेत में काम किया होगा पता होगा कि खेत को फ्लड कर दिया जाता है जिससे कि उसकी फर्टिलिटी है या तो फिर उसका जो धान जो है वो उसमें ज्यादा आए तो खेत में फ्लड होता है तो फ्लड करते हैं खेत को तो पता है कि जो बड़े लोग रहते हैं हमारी उम्र के तो घुटन तक वो पानी भर देते हैं तो अभी मां तो छोटी बालिका है तो पूरा वो छाती तक ना कि इतना पानी आ जाता होगा तो इतने पानी में उतर करके गाय के लिए घास काटती थी वो पुआल काटती थी उस समय देखती थी मां कि उनकी की ही वही बालिका उनके साथ में आकर के घास काटने में मदद कर रही है देखिए कि हम एक बार आंख बंद करके अपनी कल्पना के सामने ये दृश्य का चितार य दृश्य को यदि अंकित करें तो कितना सुंदर दिखता होगा कि जो ट्रेडिशनल एक परिवार में बड़ी हुई एक बच्ची अपने माताजी पिताजी को सहाय करने के लिए सब कुछ कर रही है यहां तक कि वो इतना पानी भरा हुआ है वहां साब भी हो सकते हैं किसको पता मने तो डेंजरस जगह है ना बड़े लोगों को तो पता होता है कि कहां पर पैर रखना कहां पर नहीं वो एक मैच्योरिटी होती है ये तो मा तो बिल्कुल बच्ची है मनुष्य का पंच महाभूत का शरीर है तो वह तो शरीर के सब जो भी बीमारी है एक्सीडेंट है वोह तो है ही साथ में तो इतने पानी में जब जाएगी तो मां को सहाय करने के लिए वही दिव्य बालिका मां की दिव्य संगिनी वो घास काटने में मदद करती है और यह बात से वो बात याद आ ग कि खुदीराम जद जिस समय वह पेड़ में से वह फूल तुलते थे तो एक छोटी बालिका खुदीराम खुदीराम अर्थात की ठाकुर के पिताजी उस अर्ली मॉर्निंग को भगवान को ईश्वर को अर्पित करने के लिए फूल तोड़ने के लिए जाया करते थे तो जैसे वह फूल तोड़ने को जाते थे देखते थे ऐसी ही एक छोटी दिव्य बालिका वह आकर के फूल तोड़ने में सहाय कर रही है क्या बोलती है कि आमी नय धर अपनी तुले अर्थात की जो डाल है वो डाल को तो थोड़ी सी नीचे करनी पड़ती है तो बालिका आ कर के बोलती है कि आपने डाल नीचे कर दी है तो मैं डाल को पकड़ कर के रखती हूं आप उसमें से फूल को तोड़ लीजिए तो यह जिन लोगों का इस तरह से डिवाइन लाइफ होता है उनको कभी-कभी फ्रेंडशिप अपनी इच्छा के अनुसार नहीं मिल पाती य तो खुदीराम का तो पता है कि इतना उनका क्या कहे ऑस्टेरिटी उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी ऊपर में से विधि नियम का इतना पालन करना कि किसके पास में से भिक्षा लेनी किसके पास में से नहीं लेनी वह सब भी एकदम कठोर नियम यदि रास्ते से चलते हैं तो दुकान वाले जो सब अपनी दुकान पर बैठे हैं वे लोग सस भ्रम माने एकदम भक्ति पूर्वक खड़े हो जाते हैं और उनको प्रणाम करते तो इतना उनका यह था उनका प्रेस्टीज था उनकी प्रतिष्ठा थी तो इतनी प्रेस्टीज और प्रतिष्ठा जिनकी होती है उनके साथ में बात करने वाले लोगों की संख्या भी बड़ी कम हो जाती है बहुत पहले मैं जब नया-नया आया था यहां पर तो हम लोग मैं तो पीपीटीसी जवाइन किया हूं पीपीटीसी में हम लोगों का क्लास लेते थे श्रीमत स्वामी स्मरणा जी महाराज जो कि अभी हमारे परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज है तो हमारा वो उस समय जनरल सेक्रेटरी महाराज थे और हम लोगों का रात में क्लास लेते थे तो ऐसे ही उनके साथ में कभी-कभी ऐसी बात हो रही थी तो एक बार उन्होंने ऐसा कह दिया था कि देखो कि जिन लोगों के पास में जो भी समस्याएं हैं पूरे ऑर्डर में सब आकर के मेरे सर पर डालते हैं या तो फिर आकर के मुझे वर्णित करते हैं मुझे बताते हैं तो अभी यह तो नेचुरल है कि जनरल सेक्रेटरी का काम ही यही है कि संघ के जितने भी साधु है सबकी जो भी समस्याएं हैं भक्तों की समस्याए सबको सुनना थोड़ा सा अच्छी बातें करना हो सकता है कोई एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेप लेना जो भी है तो उनके पास में ट्रबल शूटिंग के लिए तो लोग आते हैं तो महाराज जी कहते हैं कि जो कुछ सम लेकर के ही सब हमारे पास में आते हैं कोई आकर के कोई अच्छा कुछ बातें अच्छी बात नहीं बताता कि हां महाराज मैंने ऐसा कोई अच्छा काम किया है या तो फिर आज मैंने बहुत अच्छी किताब पढ़ी ना कि आज मैंने हम लोगों का जैसे मैं फॉर एग्जांपल कह सकता हूं कि आज हमने पब्लिकेशन में से वो चेतनानंद जी महाराज की मां की जीवनी है वो पूरी हमने पब्लिश की है ईबुक के रूप में तो कोई आके ऐसा कोई पॉजिटिव न्यूज नहीं देता हमेशा कोई ना कोई एक अपनी समस्या ही आकर के मेरे सामने ने रखता है तो देखिए कि जब मैंने यह बात सुनी तो मुझे भी लगा कि एक तरह का उस लेवल पर लोनलीनेस रहता है ना जनरल सेक्रेटरी महाराज के साथ में जाकर गप कौन लगाने वाला है किसका साहस है जैसे मैं अपने मुझे कोई भी मेरे मन में अच्छा लगा बुरा लगा तो मेरा उम्र का जो मेरा मित्र है उनको या कोई अच्छे-अच्छे डिवटी है उनके साथ में जाकर के मैं अपने मन की बात करूंगा अरे भाई आज ऐसा है आज ऐसा है तो वो क्या है कि वो समान एज के समान लेवल के लोगों के साथ में हम अपना मन थोड़ा हल्का कर सकते हैं कोई अच्छी बुरी बातें कर सकते हैं जनरल सेक्रेटरी महाराज के सामने इस तरह का गल्प लगाने के लिए गप लगाने के लिए कौन जाएगा वो उस लेवल प जाने से एक तरह का लोनलीनेस आ ही जाता है लोग आपसे डरते हैं लोग आपको बड़ी ही श्रद्धा करते हैं और फिर मिनिमम जो बात करनी है वही करते हैं या तो फिर आप जो कहेंगे वो बड़ा ही ध्यानपूर्वक सुनेंगे श्रद्धा भक्ति पूर्वक किंतु अपने मन की बात उनके सामने रखना खास करके अपने हिंदू कल्चर में जो है ट्रेडिशनल में वगैरह जाएंगे तो लोग बड़े ही बकबक करने वाले खास कर के अमेरिकन लोग व मुह में मुंह में जो भी आता है वो बोल देते हैं अपने हिंदू कल्चर में ऐसा नहीं है हम अपने माताजी है पिताजी है जो वडील है जो उम्र में बड़े हैं बड़ा ही सोच समझ कर के उनके साथ में बात करते हैं ठाकुर ने कहा ना कि यह लड़के अभी मेरे सामने नरन वगैरह को दिखा कर के ये लोग लड़के अभी मेरे सामने बैठे हैं बोलकर के अभी बड़े शांत हैं जैसे कि पिताजी के सामने वो लड़का उनका बैठा हो किंतु अभी चांदनी में खेलने के लिए जाएंगे देखना क्या हल्लागुल्ला करते हैं पिताजी के सामने बैठे हैं ठाकुर के सामने बैठे जड़ा शांत होकर बैठे अभी स्वामी जी का तो ऐसा नहीं था कि ठाकुर के सामने भी शांत होकर बैठे स्वामी जी का तो स्वभाव ही अलग था किंतु बाहर में जो हल्लागुल्ला जिस तरह का स्वामी जी करते थे एटलीस्ट ठाकुर के सामने कंपैरेटिव इतना हल्ला नहीं मचाएंगे तो क्या है कि जो वडील होता है जो बड़ा होता है जिनके प्रति हमारी एक रिस्पेक्ट होती है हम ऑटोमेटिक मन में से वो थोड़ा उनसे थोड़ा भयभीत होते हैं थोड़ा दूर रहते हैं और क्या कहना क्या नहीं करना 10 बार सोचते हैं तो उस लेवल पर जाके एक लोनलीनेस भी एक थोड़ा सा महसूस होता है हां आपके भीतर में दिव्यता का प्रकाश है तो ठाकुर ही आपके साथ में है कंपेनिया है किंतु क वो बात करने की कभी इच्छा हो जाती है तो इसीलिए मुझे लगता है कि ये ठाकुर के साथ में मां के साथ में खुदीराम के साथ में इस तरह से एक दिव्य जो देवता एं हैं या तो फिर अवतार के संगी है संगी संगी निया वो आकर के उनके साथ में खेलते हैं बात करते हैं यह मेरा अनुमान है श्री मायर बालो जीवन कतो कर्म बहुल छलो ताहर किंचित आभास आमरा पाइया छी मां का बचपन का जीवन कितना कर्म बहुल था कितना कार्यक्षम कार्य मय था कार्य में लिप्त था कर्म में लिप्त था इसका एक आभास हमको यह सब पढ़ कर के मिला है अपने छोटे भाइयों की संभाल रखना मां को मदद करना वो ये पते बांगला दे जाके बोले उसको बनाना कॉटन में से फिर यह खेत में जाकर के काम करना मां कितना काम करती थी मां के बचपन में ही मां के जीवन में कितना कर्म था यह हमको इस बातों से पता चलता है ताहर बालो स्मृति ई हमरा ओ अवगत होई अति अपत बय तहा के समय विशेष रना दी श्रम शद काजो कोरीते होतो और मां के खुद के स्मृति से हमको यह पता चलता है कि उनको श्रम साध्य जिस काम में श्रम है जिस काम में थोड़ा सा मेहनत लगता है जैसे कि खाना पकाना रंधन राधना खाना पकाना इस तरह का काम भी करना पड़ता था गांव में जाएंगे आजकल क्या है कि वो गवर्नमेंट के ऐसा होता है ना कि चाइल्ड लेबर लो यानी कि आप वो कुछ एक उम्र तक के बच्चों को ना कि 15 16 18 जो भी है कि जो छोटे बच्चे रहते हैं उनसे आपको कोई श्रम साध्य कार्य नहीं करवा सकते तो किंतु उस समय तो ऐसा कुछ नहीं होता था अब अपने घर में है तो जो कुछ भी घर में मां पिताजी करते हैं सब कुछ को जैसे ही आपने होश संभाला वैसे ही करते जाना है मां बेचारी कहीं वो कुछ काम कर रही है छोटे बच्चों की संभाल ले रही है ना कि वो कुछ कर रही है तो खाना भी पकाना है तो मां को पकाना पड़ता था मैंने श्रम साध्य जो जिसको करने से शारीरिक श्रम लगता है ऐसे कार्य भी मां करती थी कोची मेयर तुलना तहर बुद्धि और कोर्म प पटुता जथ थाकी लेओ हाथ दुखानी तोखोनो थेट शब होईना छोटी बच्ची की तरह से छोटी बच्ची के साथ में जैसे होता है उससे तो उनकी बुद्धि कहीं ज्यादा विकसित थी उनके भीतर में वह मैच्योरिटी का प्रकाश कहीं ज्यादा था किंतु हाथ तो बेचारी के दोनों इतने छोटे ही थे छोटी बच्ची के ही हाथ थे मन चाहे कहीं वो मां जगदंबा का था हृदय के भीतर में जगदंबा निवास करती थी हाथ तो छोटी बच्ची के ही थे हाथ दुखानी थे खोनो थेट शल होई नहीं कितनी सुंदर बात की है दो हाथ अभी भी इतने सबल इतने सशक्त नहीं हुए थे ताई रंधन शेषे भारी पात्र गुली ना माई बार जननो पिता के डाकी ते ई तो इसीलिए जब खाना पक गया तो वह खाना भरा हुआ जो पात्र है वह स्ट के ऊपर में से नीचे उतारना है तो पिताजी को बुलाया करती थी खाना बना दिया पिताजी को बुला या पिताजी आइए अभी यह पात्र है इसको नीचे उतारिए तो पिताजी आकर के मां को हेल्प करते थे कितना सुंदर दृश्य आबार गृहो का जर जन्नो पुष्कर होई ते कोलोस कोरिया जोल आनी ते होई तो घर में रंधन वगैरा कार्य करने के लिए तालाब में से घट में भर कर के पानी लाना पड़ता था ई ओबोकाश तीनी कोलोस ढोरिया शांता काटी तेव सख्या लेन और ऐसा करते करते घट या तो कलश हाथ में पकड़ कर के तैरना भी वह सीखी थी कितना सुंदर पारिवारिक दृश्य माने मन हृदय भले ही चाहे जगदंबा का है हाथ तो बेचारी जो न 10 साल की बालिका का है वही है पंचमहाभूत का शरीर तो वैसा ही है पिताजी को बुलाना पड़ता था पिताजी आइए तो पिताजी आकर के मां को हेल्प करते थे य कितना सुंदर मां के जीवन की यह सब घटना है तो आज यही तक कल फिर से मिल ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु