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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 10 Aug 2023

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ओम स्थापना स्वामी गंभीरानंद जी महाराज लिखने हैं श्रीमद् स्वामी शारदानंद जी ताई लिखी अच्छी लेने अर्थात वह शारदानंद जी महाराज की लीला प्रसंग पुस्तक है श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रश्न जो की श्री राम कृष्णा देव की प्रमाणिक जीवनी है उसमें से उदाहरण करते हुए उसमें से को करते हुए कहते हैं चैतन्य शाहिद शक्तिर नित्य मिलन शर्वत्र प्रत्यक्ष कोरिया विशेष शक्तिशाली पदार्थ थे एवं सामग्र जगत ए भारते ऋषिगण शाबाश आराधना कोरिया जिले चैतन्य के साथ शक्ति के नित्य मिलन को चारों दिशाओं में सभी जगह पे नित्य अवलोकन करके नियमित रूप से उसका दर्शन करके विशेष शक्ति शैली पदार्थ में एवं और साथ में ही सामग्र जगत में भारत के ऋषि गण व और शिवा की आराधना की है हमारे भारत के ऋषि गाने देखा की पूरा जगत जो है वह सब और शिवा का यह मिलन भूमि है शक्ति और चैतन्य इन दोनों का इन दोनों से ये जगत बना हुआ है अभी किस तरह से शक्ति और चैतन्य से जगत बना है तो संख्या फिलासफी हमको कहती है की यह सामग्र जगत जो देखते हो वो 24 तत्वों का बना है पांच महाभूत पांच ज्ञानेंद्रिय पंचकर्मेंद्रीय पांच तन मंत्र यह पांच 20 यह हुए और मां बुद्धि चित और अहंकार इस तरह से 24 तत्वों का यह जगत बना है इस जड़ जगत को जड़ नहीं कहेंगे कहेंगे की प्रकृति मे जगत बना है और इस 24 टैक्टर से बनी हुई प्रकृति के पीछे में एक अनंत शक्तिशाली समय अवकाश कल और सबसे पैर एक चैतन्य सकता है तो यह चैतन्य सत्ता जिसको की पुरुष कहा गया है और इन 24 तत्वों के मिश्रण को या 24 तत्वों की अधिष्ठान तारी को प्रकृति कहा गया है इसीलिए हमारे ऋषि मुनियों ने देखा की समझ जैसे की ये मेरा शरीर जैसे की मैं कोई भी व्यक्ति हो तो मेरे जो पांच कर्म इंद्रिय है पांच ज्ञानेंद्रिय है मेरा मां है मेरी बुद्धि है मेरा चित है और मेरा अहंकार है किंतु यह जो वाक्य शरीर जो है मेरा वो तो प्रकृति महेश शरीर है इसके पीछे जो चैतन्य सत्ता जो निवास करती है वह चैतन्य सत्ता तो जिसको की आत्मा कहा गया है या तो ब्राह्मण कहा गया है या तो फिर पुरुष कहा गया है विभिन्न विभिन्न दर्शन शास्त्र में वह तो इन सबसे पहले ही है तो चाहे यह मेरा एक मनुष्य का शरीर हो एन की चाहे यह सामग्र प्रकृति हो मां लीजिए की यह पूरा विश्व ब्रह्मांड है इस तारे हैं सितारे प्लैनेट्स से फिर स्पेस टाइम मटर और एनर्जी फिजिक्स इस जगत को किस तरह से देखते हैं वे लोग देखते हैं देवर इसे एन स्पेस एन टाइम और देन थिस मेटल और एनर्जी मी और एनर्जी यानी की सामग्र इस तरह की चीज जिसको की हम स्पर्श कर सकते हैं जिसको की हम अनुभूति कर सकते हैं और स्पेस और टाइम यानी की डाइमेंशन यानी इसके भीतर में यह सब मटर और एनर्जी निवास करता है तो यह सामग्र विश्व जो है वो विश्व ब्रह्मांड अभिव्या लोग यहां तक इसको डिफाइन करके रुक जाते हैं वे लोग बोलते हैं की यह जो मटर एनर्जी स्पेस और टाइम इसको इसका अधिष्ठात्री कौन है इसको पालनपुर कौन करता है इसका यह डायनामाइज्म जो है है इसको चलता कौन है तो फिर यह कहते हैं ढेरैरो फोर्सेस कर फोर्स कहते हैं ग्रेविटी फिर स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स वीक न्यूक्लियर फोर्स और यह जो बस इस तरह से जो फोर्स होती है यह फोर्सेस ये जगत को चलती है तो ये आप देख लीजिए की ग्रेविटी हो ना किया न्यूक्लियर फोर्सेस ऑफ न्यूक्लियर फोर्स ने किस्त स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स तो ये और स्पेस और टाइम और मटर और एनर्जी यह हमारे मॉडर्न साइंस की दृष्टि से इस विश्व ब्रह्मांड को देखा जाता है किंतु हमारे ऋषि मनी देखें हैं की यह जो जड़ जगत जो है या तो फिर प्रकृति मैं जो जगत है इसके पीछे भी एक सर्वदा नित्य नियमित चेतन सत्ता है ब्राह्मण जो की सृष्टि स्थिति और प्रलय की साइकिल बार-बार भले चाहे होती रहे वो वहां पर एक अखंड सत्ता के रूप में हमेशा विराजमान राहत है तो चाहे मनुष्य का शरीर हो ना की चाहे यह विश्व ब्रह्मांड हो सामग्र जो कुछ भी हम देखते हैं उसको उन्होंने कहा की जड़ प्रकृति और चैतन्य मे एक सत्ता इन दोनों के मिश्रण से इन दोनों के मिलन से सब कुछ बना है तो हमारे ऋषि मुनियों ने देखा की चैतन्य के साथ शक्ति का नित्य मिलन सर्वत्र नजर में आता है सर्वत्र आप देख पाते हैं और इसीलिए हमारे ऋषि मुनियों ने सब और शिवा की आराधना की थी सब यानी की जो निष्क्रिय चैतन्य में पदार्थ है वो और शिवा अर्थात की जो डायनेमिक है जो कार्य करती है वह प्रकृति जोशी पाठ प्रदर्शन गुरुर भीतर जगत विमोहिनी स्त्री मूर्ति भीतर अर्थात की पाठ प्रदर्शन गुरु के भीतर में जगत को मोहित कर देने वाली त्रिमूर्ति के भीतर में विद्याज्ञान क्षमा शांति मोहन निद्रा भ्रांति प्रभृति सात्विक और तामसिक गनर भीतर विद्या क्षमा शांति मो निद्रा भ्रांति प्रकृति यह सब तामसिक और सात्विक गुना के भीतर में श्री अद्वितीय भारत भाई कर मुंड मालिनी देवी अबीर भाव दर्शाने वही अद्वितीय जो की एक ही है दूसरी नहीं है वराह भाई कर जिसके हाथ हमेशा वरदान देते हैं मुंड मालिनी जो नरमुंड की माला पहनती है ऐसी देविका आमिर भाव दर्शन करके श्रद्धा के साथ श्रद्धा शाहिद अर्ध नेता हर अपना कुर्ता तो हुई इस तरह की देवी की श्रद्धा सहित आराधना करके विलो कृतार्थ हो करके मानव के शरीर दिखा दिया छीलन हमको इस पाठ पे चलने की शिक्षा देकर के धन्य हुए थे देखिए महाराज कितना सुंदर रूप से देवी का वर्णन करते हैं देवी के वर्णन को हम दो तरह से देख सकते हैं एक तो वेदांत की दृष्टि से दूसरा की हम आ भक्ति की दृष्टि से भाव की दृष्टि से वेदांत कहता है की प्रकृति जो है ये 24 तत्वों की यह स्पेस टाइम मटर एनर्जी और जो फोर्सेस इनकी बनी हुई ये जो प्रकृति है वो जड़ है उसको चेतन देने वाला एक चैतन्य नित्य स्वरूप एक अलग ही सत्ता है इन दोनों से ये जगत बंता है किंतु भक्ति की दृष्टि से देखते हैं यदि हम शर्ट वेदांत मत हो गया शक तो मत शक मत क्या कहता है की जिसको की हम जड़ प्रकृति कहते हैं वह एक्चुअली इसको प्रकृति है किंतु उसको जड़ कहना गलत होगा इस तरह से कहिए की वो वराह भाई कर हमको सामग्र सब समय आशीर्वाद देती हुई देवी मूर्ति है देवी स्वरूप है मानव के जितने भी गन है हमारे सत्य अहिंसा एस्ट परिग्रह जैसा की यहां पे लिखा है महाराज ने विद्या सम शांति मो निद्रा भ्रांति ये तामसिक गन हो एन की सातवीं गन को जो कोई भी हमारे गन है वो सब गन यही देवी के प्रभाव से प्रगति होते हैं देवी को प्राप्त करने के लिए हमको यह साधना की दुर्गुण से सदगुण की साधना करनी है देवी के आशीर्वाद प्राप्त करके हमको चैतन्य सत्ता की उपलब्धि करनी है यह शर्ट मत और वेदांत मत देखिए की दोनों में कितना डिफरेंस है दोनों कहते हैं की हां प्रकृति जो है उससे पैर जाकर के हमको चैतन्य को प्राप्त करना है किंतु वेदांत क्या कहता है की प्रकृति जड़ है और त्याग करके उसको छोड़ो और त्याग करके ईश्वर को या तो फिर चैतन्य सत्ता को पाव है तब की शर्ट मत क्या कहता है प्रकृति शायद जड़ हो शक्ति है किंतु प्रकृति जो है वह देवी है वह दिव्या है उसकी आराधना करके उसको प्रश्न करके उसका आशीर्वाद लेकर के उसको माना करके उसको शरणागत होकर के उससे हमको विनंती करनी है की मां आप रास्ता छोड़ दे तो मैं आपके पीछे आपके द्वारा आवृत्ति जो चैतन्य महेश सत्ता है आत्मन या तो ब्राह्मण या तो पुरुष इसके दर्शन कर सुकून या तो फिर मैं उसमें स्थित हो स्थित हो सुकून जैसे की ठाकुर एक बहुत ही सुंदर उदाहरण देते हैं कहते हैं की वन में भगवान राम मां सीता और लक्ष्मण तीनों जा रहे हैं अभी सबसे पहले भगवान राम है फिर मां सीता है आखिर में लक्ष्मण अभी मां सीता बीच में चल रही है तो मैं लक्ष्मण को भगवान राम के दर्शन नहीं होते तो वह क्या करेगा क्या वो मां सीता को ऐसे त्याग कर देगा रहेगा की सीता का त्याग करो तभी भगवान राम मिलेंगे तो ठाकुर कहते हैं की लक्ष्मण सीता को प्रश्न करने के लिए प्रार्थना करता है कहता है मां आप भगवान प्रताप के रास्ते में भगवान दर्शन के रास्ते में अंतरराय है कृपा करके आप रास्ता छोड़ दीजिए तो मुझे भगवान का दर्शन होगा तो प्रकृति को शरणागत होना है प्रकृति को प्रार्थना करनी है प्रकृति की भक्ति करनी है तब कहानी जाकर के देवी दिव्या प्रकृति हमको आशीर्वाद देगी आशीर्वाद के प्रभाव से हम भगवान का ईश्वर का दर्शन कर पाएंगे और हमारे रामकृष्ण सॉन्ग में बहुत बार एक डिबेट होती है की क्या हम लोग वेदांती है ना की हम लोग शर्ट है ना की हम लोग भक्ति मार्गी है हम लोग कौन सा मत फॉलो करते हैं तो किंतु मैंने देखा है की अलग अलग साधनाएं जैसे की स्वामी जी ने वो जो राम इनफॉरमेशन का जो सिंबल बनाया है उसमें कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान चारों साधनाओं को इक्वल इंर्पोटेंस दिया है जैसे की सिंबल में हमको पता है की जो कुंडली सर्प है वो राज्यों का प्रतीक है कमल जो है वो भक्ति योग का प्रतीक है जो लहरें जो है वो कर्मयोग का प्रतीक है और सूर्य जो है वो ज्ञान योग का प्रतीक है तो इन सब का इन सब का अनुष्ठान करके सबकी साधना करके परमहंस रूपी हमारी आत्मा ईश्वर को प्राप्त होती है तो ये सुंदर सिंबॉलिज्म जो है सभी मत का हमारा जो समन्वय है वह एक्चुअली देखा जाए तो सभी युवाओं का संबंध भाई है अभी आपको भक्ति योग समझना के लिए ध्वनि तो वेदांत या तो विशिष्ट अद्वैत वेदांत या तो फिर ये शर्ट फिलासफी है उसका सहारा लेना पड़ेगा यह जो राजयोग उसको समझना के लिए संख्या समझना पड़ेगा संख्या दर्शन समझना पड़ेगा ज्ञान योग है उसको समझना के लिए वेदांत समझना पड़ेगा अथवाहित वेदांत या तो फिर अजटवाड़ और कर्मयोग है उसको समझना के लिए गीता का पाठ अवश्य है तो हम लोग कहते हैं की सबसे इंपॉर्टेंट हमारे लिए है ये साधना फिर उसे साधना को समझना के लिए जो कोई भी दर्शन शास्त्र की आवश्यकता हो उसका सहारा ले हालांकि ये भी एक मत है की अद्वैत वेदांत ही सर्वश्रेष्ठ दर्शन शास्त्र है हमारे ऑर्डर की बात कर रहा हूं और अद्वैत वेदांत के मध्य से चारों साधनाएं समझ सकते हैं तो वह भी एकमत है और यह भी एकमत है की प्रत्येक साधना को समझना के लिए उसे साधना के साथ एसोसिएट जो एक दर्शन शास्त्र है उसका बड़े उसका अभ्यास करें यह दोनों मत है दोनों मत में से हमको जो लेना हो वो हम ले सकते हैं जी महाराज आगे लिखने हैं अभी शारदानंद जी का कोटेशन यहां पर समाप्त हुआ गंभीर आनंद जी लिखने हैं रामकृष्ण उपासनाए संतुष्ट श्री देवी के वर्तमान झुकी पुनः राय मानव कल्याण निरता देखिए राम भगवान रामकृष्ण की उपासना से संतुष्ट देवी आमिर्भुत होकर के भारत के और जगत के कल्याण में व्याप्रित हुई ये देखकर के पूज्यपद आचार्य स्वामी विवेकानंद आमआदिग के उडटपैंथे आह्वान कोरिया छान ये देख करके पूज्यपद स्वामी विवेकानंद हमको उड़द तार कंठ से मुक्त रूप से मुक्त वाणी से अपमान किया हैं व्यापिनी प्रतिध्वनि जागृत हुई अच्छे जी शक्ति के आविर्भाव मंत्र से अभी तो अभिरभूत हुई किंतु आमिर भाव के शुरू से ही आमिर भाव के प्रारंभ से ही यह दिगंता व्यापी जो ध्वनि का आरंभ हुआ है यह आपकी जो इसको क्या कहेंगे की प्रतिध्वनि हमको प्राप्त हुई है जो रिस्पांस हमको प्राप्त हुआ है तहर पुर्नावस्था कल्पनाएं अनुभव करो एवं वृत्त संदेह दुर्बलता और दास जाति सुलभ इरशाद वेस्ट त्याग कोरिया चक्र प्रवर्तन सहायता करो उसका अभी देखिए की अभी तो भगवान श्री राम कृष्णा का आविर्भाव हुआ अभी तो भगवान श्री राम कृष्णा के मध्य से जगरीयता यह शक्ति ने जगत कल्याण का कार्य आरंभ किया और आरंभ मंत्र से ही पूरे जगत में ये जो प्रतीत ध्वनि उसका जो रिस्पांस ए रहा है जगत इम्मीडिएटली साथ-साथ ही उनके शरीर चरणों में ए गया है यह देखकर के उसकी उसकी जो पूर्ण आविर्भाव होगा अभी तो यह शुरू का आविर्भाव है तो यह देखकर के कल्पना करो की उसका पूर्ण आविर्भाव कैसा होगा और साथ-साथ में ही वृद्धा संदेह दुर्बलता और यह हम तो दास थे उसे समय तो दास किस तरह से हमारे ही लोगों की निंदा करेगा और जो हमारे मलिक हैं हम जिनके गुलाम थे उनके सब समय प्रशंसा करते रहेगा विदेशियों की जो विदेशी करते हैं सब सही और हम जो करते हैं वही गलत ऐसा एक गुलाम प्रजा का इस तरह का एक नेगेटिव हो जाता है तो स्वामी जी कहते हैं की यह दास जाति सुलभ अर्थात की गुलाम प्राजों की होने वाली मेंटालिटी जो है उसको त्याग करो और यह महायुद्ध चक्र परिवर्तन में सहायता करो अभी देखिए की क्रिश्चियनिटी के बड़े में कहा जाता है की क्रिश्चियनिटी को पूरे जगत में व्याप्रित होने के लिए 400 साल लगे थे पूरे जगत में अर्थात की मैग्नेटिक का प्रभाव भले ही चाहे वह यूरोप और अमेरिका में हो किंतु बहुत साड़ी संख्या में क्रिश्चियन लोग पूरे जगत में रहते हैं किंतु भारत में क्या हुआ की जैसे ही ठाकुर की महादी हुई 1886 में वो तो 1893 मैन वो साथ साल के बाद में ही स्वामी जी वहां वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में ठाकुर के द्वारा उद्बोधित वेदांत का प्रचार करना शुरू कर दिए थे तो स्वामी जी का जीवन तो 86 में ठाकुर की महासमाधि और 1902 1902 में स्वामी जी की मा समाधि तो ये कितने साल हुए 86-96 10 साल और ये 4 है ये 16 17 साल में पूरे विश्व में स्वामी जी ने स्वामी जी की महासमाधि से पहले 16 17 साल में उन्होंने पूरे विश्व में भगवान श्री राम कृष्णा और वेदांत की वाणी का प्रचार किया तो इतना जो कामसूत्र उसे समय तो 16-17 साल में जो किया थे वो आमिर भाव में ही हेवीर भाव से ही उनको जोर रिस्पांस प्राप्त हुआ था अमेरिका में एक स्त्री एक स्वामी जी की डेवोरिटी जो बाद में हुई थी वो वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में उपस्थित थी तो उसने जब स्वामी जी ने सर्वप्रथम स्पीच दी सर्वप्रथम प्रवचन दिया उसके बाद में उसका उसने अपनी स्मृति कथा में लिखा है वो कहती है की स्वामी जी का प्रवचन और के उसे सभा खंड में उपस्थित महिलाएं हैं जो इतनी प्रभावित हो गई थी इतना वो स्वामी जी से आकर्षित हो गई थी की वह उन्हें सब जितनी भी महिला है वो स्वामी जी को मिलने के लिए स्टेज की और जा रही थी की उसको मिलेंगे उनके साथ में बात करेंगे इस तरह से स्वामी जी को मिलने के लिए जा रही है वो स्टेज के पास में तो यह देख करके स्वामी जी की यह जो देवोटी थी वह वहां पर उपस्थित थी उसने कहा की तो तुम यदि इस आक्रमण को सहयोग एहसान कर सकते हो इस आक्रमण के सामने तुम दत करके खड़े र सकते हो तुम सही सही भगवान हो क्यों क्योंकि स्त्रियों की मोहिनी माया होती है और इसके साथ ये देखकर के स्वामी जी यदि लोग और कम में वो फस गए तो फिर उनका जो तेज है वो वहीं पे समाप्त हो जाएगा भले चाहे वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन में जो बोल दिया उसको बोल दिया बाद में कुछ बोलने के लिए बचेगा नहीं तो ये महिला इस तरह से लिखती है और हमको पता है की स्वामी जी इस आक्रमण को भी स्वामी जी ने दत करके उसके सामने खड़े रहे थे उनका तेज उनका प्रभाव उनका ओजस उनका ब्रह्मचर्य आखिर तक वो बना रहा था तो देखिए की जी क्षण स्वामी जी बोलने का आरंभ करते हैं पूरे विश्व में अभी अमेरिका देखिए की सबसे एडवांस कंट्री है पूरे जगत का और अमेरिका की महिलाओं के बड़े में स्वामी जी स्वयं कहती है की वहां पर जी तरह से सफेद सफेद बर्फ मिलती है वैसे ही शुभ्रा उनका चरित्र है वैसे ही शुद्ध उनका चरित्र है तो इस और विद्या और बुद्धि में वहां के पुरुष जो है वो जड़ बुद्धि के हैं उनका सिर्फ एक ही कम है पैसा कामना किंतु जिसको कहते हैं कलर जिसको कहते हैं संस्कृति जिसको कहते हैं वालुज जिसको कहते हैं की एक तरह का एक सभ्यता ये सभ्यता संस्कृति कलर को सिर्फ महिलाओं ने ही बच्चा के रखा है तो जैसे ही स्वामी जी हम बोलने की शुरुआत की तो सबसे एडवांस जिसको कहा जाएगा संस्कृति और सिविलाइजेशन जिन लोगों में सबसे ज्यादा है इस विषय में वे लोग स्वामी जी से इतना प्रभावित हो गए थे तो स्वामी जी कहते हैं की जी शक्ति के आविर्भाव के प्रारंभ से ही उसने इस जगत को मोहित कर दिया है या तो फिर ये जगत ने इस शक्ति के प्रारंभ से ही इसको इतना श्रद्धा भक्ति इसको दे रहे हैं ये शक्ति यदि संपूर्ण रूप से वो प्रगातीय होगी तब इस जगत में क्या होगा उसका अनुमान करो और विद्या और संशय का त्याग करो दास एवं तो हमारे भारत में जो जिनका जन्म हुआ ठाकुर मां तो इन लोगों की क्या वैल्यू है हम लोग तो मानते हैं की ये जो वेस्टर्न फिलॉस्फर है जैसे की यह कांड है ना की शॉप है और है ना की ये है जल है एन की ये कल मार्ग से ये जो वेस्टर्न फिलॉस्फर है या तो फिर ये वेस्टर्न सेंड से वो सेंड फ्रांसिस ऑफ एसएससी या तो सेंट टेरेसा ऑफ एवला ये लोग वो भक्ति या तो फिर दर्शन या तो फिर फिलासफी उसमें सर्वश्रेष्ठ है और भारत के साधु संत दर्शनी कुछ नहीं है इस तरह की दास जाति सुलभ गुलाम मानस त्याग करो और इस शक्ति के प्रचार में इस महाशक्ति के अपमान को आप संपूर्ण रूप से स्वीकार करो इसमें अपना जीवन व्यतीत करो इसको अपना जीवन समर्पित करो यह बात स्वामी जी कहते हैं अच्छा तो आज यही तक थोड़ा सा जल्दी समाप्त करते हैं कल फिर से मिलता है यह थोड़ा सा हैवी है अभी तक हम जो स्मृति कथाएं वगैरा कहते थे वो समझना उसके बड़े में बात करना उसके उदाहरण देना बड़ा सहज था किंतु यह थोड़ा सा फिलोसॉफिकल है उसके बड़े में बात करने से थोड़ा सा हमको वो एक इस तरह से एक मेहनत करनी पड़ती है बोलने में भी और शायद समझना में भी किंतु मैं मानता हूं की मां शारदा देवी को या तो फिर रामकृष्ण संघ को सही-सही समझना तो यह जो शक्ति का आविर्भाव जो है उसको हमको समझना होगा हमारे भारतीय शास्त्रों की ये खास करके बंगाल के बाहर में शक्तिशाड़ना को समझना में थोड़ी सी एक मिस अंडरस्टैंडिंग जैसा है बहुत सारे लोग कहते हैं की शक्ति साधना अर्थात की तंत्र साधना और तंत्र साधना अर्थात की सिर्फ किंतु ठाकुर मैं खुद जी तरह से शक्तिशाड़ना की थी स्वामी जी ने की थी उससे हमको पता चला है की शक्ति की साधना या तो फिर शक्ति की शक्ति क्या है उसके बड़े में समझना यह जो पूरा दर्शन शास्त्र शक्ति के आसपास में भुना हुआ है उसको समझना रामकृष्ण सॉन्ग के जितने भी भक्ति हैं उनके लिए बहुत ही आवश्यक है और भले चाहे हमको उसके बड़े में बोलने में इसके बड़े में समझना में थोड़ा सा डिफिकल्ट लगे किंतु जैसे-जैसे समय जाएगा मुझे लगता है की हमारे लिए सहज होता जाएगा और मां के प्रादुर्भाव को मां के आविर्भाव को हम प्रॉपर्ली समझ पाएंगे जैसे मेयर कथा है या तो फिर वह सब किताबें पढ़ने हैं तो मां की दया मां का प्रेम मां का भालोबासा मां का मातृत्व वह सब पढ़ कर हमको कितना सुकून मिलता है कितना शांति मिलता है शांति मिलती है किंतु साथ-साथ में ही मां के एवरी भाव के पीछे क्या मड रहस्य है मां की ममता के पीछे मां का स्नेहा और प्रेम के पीछे कोई एक गंद दार्शनिक चिंतन भी छुपा हुआ है वह जल्दी हमको समझ में आए तो मां का जो प्रेम है हम सबके प्रति उसको हम और भी ज्यादा अच्छे तरह से समझ पाएंगे इसीलिए हम इस किताब का पाठ करते हैं तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति हरि ओम तट सात श्री राम कृष्णा