मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित उसका हम पाठ कर रहे हैं। चिर सिमंतिनी यह अध्याय है और मां शारदा ठाकुर की महासमाधि
ठाकुर की महासमाधि के बाद: वृन्दावन में विरह-विह्वला श्री माँ
के बाद में तीर्थ यात्रा के लिए निकली है। तो ऑलरेडी हमने देखा कि देवघर, काशी और अयोध्या यह तीन क्षेत्र ऑलरेडी हो चुके हैं। और मैंने आपके साथ में वह इमेज भी शेयर किया है। मैप कि किस तरह से मां कोलकाता से प्रारंभ करके देवघर फिर काशी फिर अयोध्या फिर वहां से जो जो जगहों पर मां गई है वो पूरा मैप बनाया है मैंने। सो वो भी मैंने आपके साथ किया है शेयर। यह सब जहां पर भी मां गई ज्यादातर घटनाएं जो अपने पास में लिपिबद्ध है वो वृंदावन की ही है। और वृंदावन के बारे में हमने कल ऑलरेडी देख लिया कि कितना सुंदर यह वृंदावन की शोभा का वर्णन किया है गंभीरानंद जी महाराज ने और साथ में भगवान कृष्ण की जो लीला वहां पर हुई है उसका भी एक सुंदर वर्णन और फिर आखिर में किंतु महाराज जी कहते हैं कि सब कुछ यहां पर है। ब्रजभूमि में सब कुछ वृंदावन की शोभा वही निकुंज कानन वही श्री राधिका के विरह अश्रु से सिक्त विरह अश्रु से भीगी हुई धुली कणा यह सब कुछ ब्रज गोपियों की शत्रुष्ण दृष्टि ब्रज गोपी भगवान कृष्ण को जिस आकांक्षा के साथ में उनकी राह देख रही है वो शत्रुष्ण दृष्टि बस सब कुछ है सर्वत्र ब्रजराज की स्मृति जागृत है। जाज्वल्यमान है। किंतु नाइतिनी भगवान कृष्ण स्वयं ब्रजराज स्वयं वहां पर विराजमान नहीं है। तो यह विरह का भाव यही विरह के भाव से क्या हुआ? मान मां का जो ऑलरेडी विरह विधुर मन था। मां भी तो भगवान रामकृष्ण को गवा करके माने स्थूल देह में उनको गवा करके यहां पर आई है तो मां के मन में हाहाकार हो उठा इहार पूर्वेनी श्री रामकृष्ण अंतत तो तीन चार तीन बार चखुश दर्शन प्रत्य लाभ करिया छिले इससे पहले मां ने एटलीस्ट तीन बार ठाकुर के दर्शन प्राप्त किए थे वृंदावन आने से पहले वह भी हमने देख लिए कि महासमाधि के ही दिन ठाकुर मां को चूड़ियां निकालने को मना करते हैं। वह एक दर्शन वहां पर काशी में विश्वनाथ की आरती से मां का हाथ पकड़ कर के निवास स्थान पर ले आए। वह दूसरा दर्शन और वह जो तावीज जो कवच मां ने जो पहना था वह कहीं गिर ना जाए कहीं खो ना जाए इसके बारे में ठाकुर सावधान करते हैं वह तीसरा दर्शन तो एटलीस्ट तीन दर्शन के बारे में तो हमको पता है किंतु जो चिरवाछित है जिनके श्री चरण में मां ने मन प्राण का प्रतिसूत्र दृढ़ संबद्ध है मां के मन और प्राण का प्रत्येक एक सूत्र जिनके श्री चरण के साथ में दृढ़ संबद्ध है उनके नियत प्रत्यक्ष का अभाव प्रत्येक मुहूर्त में मां के मर्म को मथित करके यह प्रश्न जगाई जगाता रहता है। कोतायतिनी कहां है श्री राम कृष्ण तो देखिए कि यह सुंदर विरह का वर्णन ऑलरेडी हम पढ़ चुके हैं। इसके बाद में फिर थोड़ा सा पढ़ते हैं आगे कि क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज
वृंदावन में विरह में डूबी माँ शारदा से ठाकुर बोले: "तुम इतना रो क्यों रही हो? मैं एक कमरे से दूसरे कमरे में ही तो गया हूँ"
वृंदावन आशिया श्री मां अभीराम चोखेर जोले भाषेते लागी ले वृंदावन आकर के श्री मां अविराम आंखों के अश्रुओं से भीगने लगी आरश अश्रुर सहित जोग दिलो श्रीमती जोगिन मार नयन बारी और मां के उस अश्रुओं के साथ में योग दिए श्रीमती योगिन मां की नयन वारी तो मां भी रो रही है योगिन मां भी रो रही है योगिन मां का पता हो तो याद हो तो काशीपुर में ही योगिन मां ने ठीक किया था कि वृंदावन आकर के तपस्या करेगी अभी यह निर्णय क्यों योगिन मां ने लिया इसके पीछे कोई सांसारिक उनका कोई कारण था कि और कुछ था इसका तो कहीं कोई डिस्कशन मैंने पढ़ा नहीं किंतु वही बात है कि ठाकुर ने उनको कहा था कि मां के दर्शन ले मां के आशीर्वाद लेकर के जाना। तो मां के आशीर्वाद से ही फिर योगिन मां यहां पर आई थी। एक इंटरेस्टिंग घटना है कि एक बार दक्षिणेश्वर में ही ठाकुर और मां रहते थे। एक बार मां को जयराम भाटी जाना हुआ। तो ऑलरेडी योगिन मां वहां पर आ रही थी। मां के साथ में बहुत ही स्नेह का सूत्र बंध चुका था। तो फिर दक्षिणेश्वर छोड़कर के मां गई जयराम बाटी और फिर जब जयराम बाटी से वापस आती है तो ठाकुर ने कहा से डागर डागर चौक में बड़े-बड़े आंखों वाली जो एक लड़की आती है ना यहां पे तुम्हारे जाने से बहुत रो रही थी तो मां ने कहा हां से जोगेन हां वो जोगेन है तो देखिए कि मां का विरह उस समय भी जबकि ठाकुर मां दक्षिणेश्वर में थे और मां मां को जय राम भाटी जाना पड़ा था। तो उस समय ही योगेन मां को योगेन मां से मां का विरह सहा नहीं जाता था। तो यहां पर तो अभी देखिए कि ठाकुर का विरह तो नेचुरली है कि योगिन मां भी रो रही है और मां भी रो रही है। योगिन मां ठाकुर देहो त्यागे पूर्वे ही वृंदावन आशिया छलेन योगिन मां ठाकुर के देह त्याग के पूर्व ही वृंदावन आई थी अधना श्री मां तांहा के देख आई शोका बेगे जोगेन गो बोलिया बुके जोड़ाया कादी ते लागी लेन अभी जैसे ही मां खुद वृंदावन आई और जैसे ही योगिन मां का साक्षात्कार हुआ साथ में ही शोकावेग शोक के आवेग में अरे योगिन ऐसा बोलकर के उनको अपने हृदय से लगा के रोने लगी अश्रु भार क्रांता माता ठाकुरानी के पया एवं अपर देर मुखे समस्त शून्या जोगिन मारो नयन जल अभीिरल धाराए प्रवाहित होइलो अश्रु भारा क्रांता अश्रुओं से आक्रांत माता ठाकुरानी को प्राप्त करके की और दूसरे लोगों के मुंह से समस्त विवरण सुनकर के योगिन मां का भी नयन जल अविरल धारा में प्रवाहित होने लगा। अवशेष श्री रामकृष्ण एक रात्रे देखा या बोली लेन आखिर में श्री रामकृष्ण ने एक दिन रात को दर्शन देकर कहा हांगा तुमरा तो कांद छो केनो अरे तुम लोग इतना रो क्यों रही हो ए तो आ रोए छ यही तो मैं हूं ग छ को थाई कहां गया हूं ए जमन ए घर आर ओई घर यही तो जैसे कि इस घर से दूसरे घर में तो देखिए यही शब्द ठाकुर ने मां को उस समय भी कहे थे जब चूड़ियां उतारने को मना किया था और वही बात कि कहां मैं गया हूं बस इस कमरे से उस कमरे में इस घर में से उस घर में तो वही बात यहां पर भी ठाकुर कहते हैं
लीला विलास से आरम्भ होकर इष्ट में तन्मय हो जाने तक—रासभूमि में गोपियों की अद्वैत अनुभूति
इहार परे श्री माय उद्वेलितो शोको सिंधु कथंचितो शांत होया छिलो इसके बाद में श्री मां का उद्वेलित शोक सिंधु सिंधु अर्थात सागर उद्वेलित अर्थात कि जिसमें बड़ी-बड़ी तरंगे बह रही है उसको उद्वेलित कहते हैं। तो मां का उद्वेलित शोक सिंधु थोड़ा सा शांत हुआ था। किंतु श्री राम कृष्ण अदर्शन जनित बिरहो एक होते अन्नो भावे आत्म प्रकाश कर ते लागीो किंतु श्री रामकृष्ण के अदर्शन जनित विरह अदर्शन जनित अर्थात कि श्री रामकृष्ण के देहावसान से उत्पन्न हुआ विरह अभी से लेकर के और एक रूप से आत्म प्रकाश करने लगा। विरह जब प्रारंभ होता है तो फिर क्या होता है कि पहले तो कोई भी मनुष्य है रोना धोना तो करता ही है किंतु कुछ समय के बाद में आंसू तो शायद सूख जाएंगे किंतु ऐसे व्यक्ति के स्वभाव में बिहेवियर में काफी परिवर्तन आ जाएगा। तो यहां पर भी गंभीरानंद जी कहते हैं कि अभी जो मां के अश्रु जो थे वो थोड़ा सा तो सूख गए हैं किंतु यही विरह और अन्य रूप से आत्म प्रकाश करने लगा। श्रीमद् भागवत गोपी गीता उल्लेखित आ जे राभूमि होइते श्री कृष्ण के सहशा अंतर हितो देखिया गोपीरा बबल चित्ते तहां के अन्वेषण करते लागी ले श्रीमद् भागवत में गोपी गीता में उल्लेखित है कि रास भूमि से श्री कृष्ण को सहसा अंतरहित देखकर के एकाएक अदृश्य होते हुए देखकर के गोपियां विहवल चित्त से उनका अन्वेषण करने लगी। उनकी खोज करने लगी। किंतु उहात ते विफल मनोरथ होइया बिरह जनित तन्मय ततार फले आपना दग के श्री कृष्ण मने कोरिया तहार शुभ लीला विलाशेर अनुकरण करते थाकी लेन किंतु उसमें भगवान कृष्ण सहसा अंतरहित हो गए हैं। सहसा अदृश्य हो गए हैं। यह देखकर के गोपियां विहवल चित्त से उनको खोज तो रही है। उनका अन्वेषण तो कर रही है। किंतु अन्वेषण करतेकरते खोजतेखोजते भगवान कृष्ण मिलते नहीं है। तो फिर क्या होता है? इस खोज में विफल मनोरथ होकर के मनोरथ अर्थात कि मन की इच्छा विफल हो अर्थात कि विफल होना फेल हो जाना। तो यह भगवान कृष्ण को खोजने की मन की इच्छा में विफल होकर के भगवान कृष्ण का अन्वेषण करने में विफल मनोरथ होकर के विरह जनित तन्मयता के फल से तन्मयता अर्थात कि एक ततानता यह जो ध्यान का जो सूत्र है ना पतंजलि योग सूत्र में धारणा ध्यान समाधि तीन स्टेजेस मेडिटेशन के कहे गए पहला स्टेज क्या है? धारणा। देश बंद चित्तस्य धारणा। एक कोई भी ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपने मन को एकाग्र करना इसको धारणा कहते हैं। किंतु फिर क्या है ना प्रथम प्रथम हम मन को एकाग्र करने को जाएंगे तो मन 10 दिशाओं में दौड़ा दौड़ा छूटेगा। तो फिर इसी मन को बार-बार पकड़ कर के आप एक ऑब्जेक्ट के ऊपर में लगाते ही रहेंगे और आखिर में उस ऑब्जेक्ट के ऊपर में अपना मन एक तान होकर के एक लय होकर के जब प्रवाहित होगा तब वह होगा ध्यान तत प्रत्यय एक तानता ध्यानम वह जो ऑब्जेक्ट है उसके ऊपर में जो मन को लगाया है एक तान होकर के जो मन लगा रहता है वह है ध्यान तो वह जो एक तानता है वही यहां पे तन्मयता है तो फिर यह जो तन्मयता है विरह जनित तन्मयता यह तन्मयता भी कैसे आती है देखिए शोक ऐसी एक चीज है कि सब भुला करके आपका मन उसी शोक के ऊपर में ही पड़ा रहेगा तो जैसे ठाकुर का वह उदाहरण आप दुनिया भर का काम कर रहे हैं किंतु यदि यदि दांत एक दुख रहा है तो आपका मन उसी दांत के दुख पेन जो है आपके दांतों में उसी के ऊपर में पड़ा रहेगा क्योंकि वह पेन जो है बाकी सब चीजों को ओवराइड कर देता है। शोक भी ऐसा है। ठाकुर ने कहा है कि वैसे तो मनुष्य काम कांचन से बंधा हुआ है किंतु जिस अह जो दंपति है उनका उनके किसी संतान का मृत्यु हुआ है जिस दिन उस दिन क्या उनको काम प्रवृत्ति करने का मन करेगा नहीं करेगा क्योंकि क्या है उनकी पूरी प्राणशक्ति है वो यह शोक खा जाता है तो यह वैसे तो ईश्वर के प्रति जो स्नेह है या यह जो भाव साधना जो है दास्य भाव संतान भाव वात्सल्य भाव मधुर भाव वगैरह भाव साधना करने से अपना मन सहजता से तन्मय हो जाता है तो वह जिस तरह से अपना मन तन्मय होता है तो शोक है ग्रीफ जो है उससे भी अपना मन तन्मय हो जाता है तो इसलिए महाराज यहां पे लगते हैं विरह जनित तन्मयता एक इस तरह का ध्यान जो कि विरह से उत्पन्न हुआ है। इस तन्मयता के फल स्वरूप अपने को श्री कृष्ण मानकर के वह श्री कृष्ण के शुभ लीला विलास का अनुकरण करने लगी। देखिए ये कांसेप्ट वैसे संस्कृत में बहुत कुछ लिखा है। पूरा पैसेज पूरा एक सिंगल सेंटेंस है। तो सिंगल सेंटेंस पूरा संस्कृत का पढ़ेंगे तो थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड लगेगा। किंतु इसमें कॉम्प्लिकेशन कुछ नहीं है। श्रीमद् भागवत में है ही है कि रास लीला में से भगवान कृष्ण जब अदृश्य हो जाते हैं तो गोपियां पहले तो उनको खोजने का प्रयास करती है। किंतु जब वह नहीं मिलती है तो प्रत्येक गोपी भगवान कृष्ण का ही अनुकरण करना शुरू कर देती है कि भगवान कृष्ण इस तरह से बंसुरी बजाते हैं। इस तरह से त्रिभंग होकर के खड़े रहते हैं। इस तरह से वह रास में नृत्य करते हैं तो बिल्कुल जो कि अपना प्रिय पात्र है उसके साथ में अपना मिलन नहीं होता है तो फिर वो जो लेस डिजायरेबल ऑप्शन है उसकी ओर मन जाता है। यह लेस डिजायरेबल ऑप्शन वि इज आयरनी क्योंकि हम जो एक स्टैंडर्ड वेदांत पढ़ता है उसको पता है कि पहले तो है द्वैत अर्थात कि ईश्वर का दर्शन प्राप्त होना फिर है अद्वैत यानी कि ईश्वर स्वयं हो जाना। तो यहां पर किंतु भक्ति शास्त्र में रिवर्स है। ईश्वर होना जो है वह दैट इज ए लोअर लेवल पर आता है। ईश्वर का सानिध्य प्राप्त करना उनके साथ में लीला करना उसका हायर स्टेज है। इसीलिए श्री रामकृष्ण कहते हैं चीनी होते चाहिए ना मां चीनी खेते चाहिए। मैं चीनी होना नहीं चाहता। मैं चीनी खाना चाहता हूं। क्यों ऐसा कहते हैं ठाकुर? यदि आप अपने से शुगर हो जाते हैं तो शुगर का स्वरूप हमको मिल जाता है। किंतु शुगर खाने का जो आनंद है, मिठाई खाने का जो आनंद है, वह हमको फिर प्राप्त नहीं होता। हां ऑफ कोर्स अद्वैत वेदांत तो आपको यही कहेगा कि चीनी खाने का जो आनंद है उससे लाखों गुना आनंद चीनी होना है। यानी कि ईश्वर के साथ में आप बाल्य रूप से या तो फिर मधुर भाव से ना कि यह मातृ भाव से जो लीला करें ईश्वर के साथ में उससे आपको जो आनंद प्राप्त होगा उससे कोटि-कोटि गुना ज्यादा आनंद जब आप ईश्वर स्वयं हो जाएंगे निर्विकल्प समाधि में स्थित हो जाएंगे तब आपको होगा। तो खैर वह अद्वैत वेदांत का मत है। अद्वैत वेदांत का मत के अनुसार निर्विकल्प समाधि से बड़ा आनंद और कुछ नहीं। और यहां पे भक्ति शास्त्र के अनुसार भक्ति मार्ग के अनुसार भगवान के साथ में लीला करना इससे बड़ा कोई आनंद नहीं। यदि हमको चॉइस दी जाए तो मैं शुगर खाना चाहूंगा नहीं कि शुगर होना चाहूंगा। तो यह जो भक्ति शास्त्र का यह जो सीक्वेंस है, भक्ति शास्त्र का जो प्रायोरिटी है, वह हमेशा यह है कि ईश्वर के साथ में श्री कृष्ण के साथ में लीला करना। तो अब किंतु यदि भगवान कृष्ण अदृश्य हो जाए तो फिर आप क्या करेंगे? यदि लीला नहीं हो सकती तो फिर आप क्या करेंगे? तो फिर आप कहेंगे अच्छा ठीक है यदि भगवान कृष्ण अदृश्य हो गए हैं उनके साथ में लीला नहीं हो सकती तो एज अ लास्ट रिसोर्ट चलो हम निर्विकल्प समाधि में चले जाते हैं श्री कृष्ण मय हो जाते हैं। श्री कृष्ण स्वयं हो जाते हैं। तो भक्ति शास्त्र के अनुसार श्री कृष्ण होना अर्थात कि अद्वैत भाव यह लोअर स्टेज है। जब तक लीला के भीतर में जब तक रास मंडल के भीतर में भगवान कृष्ण उपस्थित है तब तक उनके साथ में गोपी होकर के लीला करना यही सर्वोच्च धेय है। किंतु जब रास मंडल से भगवान कृष्ण अदृश्य हो जाएंगे तब यह लोग बेचारी गोपियां कहेगी कि भगवान तो चले गए हमको छोड़ के हमको त्याग करके तो चलो अभी ऋषि मुनियों का जो रास्ता है कि स्वयं श्री कृष्ण हो जाओ तो वो कर लेते हैं और क्या कर रहे सो वि इज सच ए डिलीशियस कंट्रास्ट यहां पे इसीलिए गंभीरानंद जी कहते हैं कि श्रीमद् भागवत में गोपी गीता में जो उल्लेखित है कि रास भूमि में से श्री कृष्ण सहसा अंतरहित होते हुए श्री कृष्ण को सहसा अंतरहित होते देखकर के गोपियां विहवल चित्त से उनका अन्वेषण करने लगी। किंतु इस अन्वेषण में विफल मनोरथ होकर के विरह जनित तन्मयता के फल स्वरूप अपने को श्री कृष्ण मानकर के उनकी शुभ लीला विलास का अनुकरण करने लगी। देखिए ये किंतु गंभीरानंद जी टेक्निकली पूरा एक्यूरेट डिस्क्रिप्शन लिखते हैं। सबसे पहले तो रास मंडल में भगवान कृष्ण उपस्थित है तो उनके साथ में लीला ही करनी है। किंतु जब भगवान अदृश्य हो जाते हैं और गोपियां भगवान कृष्ण का भगवान कृष्ण का अनुकरण जब करती है यानी कि सिंबॉलिक रूप से अद्वैत भूमि में प्रवेश करती है तो इसके बीच में किंतु यह दो शब्द गंभीरानंद जी ने ऐड कर दिए हैं। विरह जनित तन्मयता ये तन्मयता होनी आवश्यक है। धारणा ध्यान समाधि देशबंध बंध चित्तस्य धारणा कोई भी एक भगवान कृष्ण के ऊपर में मैंने अपने मन को बांधा यह हो गया धारणा तत प्रत्यय एक तानता ध्यानम इनके प्रति मेरा मन संपूर्ण रूप से श्री कृष्ण के ऊपर में ही प्रवाहित हो रहा है तो तन्मय हो गया है एक तान हो गया है वह है ध्यान और फिर आता है समाधि थर्ड स्टेप तदैव अर्थ मात्र निर्भासम स्वरूप शून्यम इव समाधि भगवान कृष्ण ही रह गए मैं अदृश्य हो गया तो फिर समाधि हो गई तदैव अर्थ मात्र निर्भासम स्वरूप शून्यम इव समाधि तो ये टेक्निकली गंभीरानंद जी ने एकदम परफेक्ट डिस्क्रिप्शन यहां पर किया है कि श्री रामकृष्ण के भागवत में गोपी गीता में उल्लेखित है कि रास भूमि से भगवान कृष्ण को सहसा अंतरहित देखकर के गोपियां विहवल चित्त से उनका अन्वेषण करने लगी। यह विहवल चित्त अर्थात कि व्याकुलता अर्थात कि मुमुक्षुत्व कोई भी साधना है साधना में आगे बढ़ने के लिए आपको मुमुक्षुत्व चाहिए। बिना मुमुक्षुत्व के, बिना व्याकुलता के हम ज्यादा कुछ आध्यात्मिक जीवन में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। यानी कि पहले तो विहवल चित्त से उनका अन्वेषण कर रही है। भक्ति शास्त्र है तो भक्ति शास्त्र की दृष्टि से लिखा है। यानी कि फर्स्ट प्रायोरिटी दी है भगवान कृष्ण के साथ में लीला करने को। किंतु लीला करने का उनको अवसर प्रदा प्राप्त नहीं होता है। उसमें वह विफल मनोरथ हो चुकी है। क्योंकि भगवान कृष्ण स्वयं अदृश्य हो चुके हैं। तो उनका अन्वेषण करने में उनको खोजने में गोपियां विफल मनोरथ हो चुकी है। तो फिर क्या होता है? विरह जनित तन्मयता। विरह जनित तन्मयता अर्थात कि विरह से प्रकट हुआ मन का एकीकृतता मन की एकाकारता मन का ध्यान उसके परिणाम से फले उसके परिणाम से अपने आप को श्री कृष्ण मन मान करके उनके शुभ लीला विलास का अनुकरण कर रही है। यानी भक्ति शास्त्र की दृष्टि से फर्स्ट प्रायोरिटी है कि चीनी खाना चाहता हूं। किंतु चीनी खाने का सद्भाग्य नहीं मिल रहा है तो फिर सेकंड प्रायोरिटी में आता है चीनी होना।
वृंदावन में माँ पर छाया ठाकुर का दिव्य आवेश
श्री मायरो देहो मने ए समय अनुरूप तन्मयता प्रकाश पया छिलो श्री मां के देह और मन में इस समय इसी तरह की अनुरूप इसी तरह की तन्मयता प्रकाश प्राप्त कर रही थी प्रकाशित हो रही थी तनी कनो आत्महारा होया अपरे ओ शाखा ते एकाकी सु विस्तुत बालुकामय तीर भूमि अतिक्रमण पूर्वक जमुना उपस्थित हो। अभी देखिए गोपियों के जीवन में जिस तरह से पहले तो द्वैत लीला उसको प्राप्त करने का प्रयास किया विफल मनोरथ हुई तो सेकंड ऑप्शन में अभी अद्वैत भूमि में उन्होंने पदार्पण किया है। ठाकुर भी कहते हैं कि जब भगवान कृष्ण ब्रह्म साक्षात्कार का ब्रह्म ज्ञान का उपदेश गोपियों को देने लगे तभी सभी गोपियां समझ गई कि ये ब्रह्म ज्ञान का उपदेश क्यों दे रहे हैं तो उन्होंने कृष्ण को कहा कि क्या तुम हमको छोड़कर चले जाने वाले हो इसलिए क्या तुम हमको ब्रह्म ज्ञान सिखाते हो क्या तो यहां पे भी अह मां के देह मन में एग्जैक्टली इस तरह की तन्मयता प्रकाश प्राप्त प्रकाशित हो रही थी कभी-कभी आत्महारा होकर के मां क्या करती थी आत्महारा होकर के अर्थात कि भाव के आवेश में वह क्या कर रही है वह शुद्ध बुध गवा करके अपर ओ असाक्षाते दूसरों के असाक्षाते अर्थात कि दूसरों को पता नहीं है कि मां कहां पे है क्या कर रही है दूसरों के असाक्षाते एकाकी अकेली सुविस्तृत बालूका मय तीर भूमि अतिक्रमण पूर्वक यमुना के किनारे उपस्थित होती पूरा संस्कृत सुविस्तृत बहुत ही चौड़ी है इस तरह की बालूकामय तीरभूमि बालूका यानी कि रेती रेती से भरी हुई यह जो यमुना का जो किनारा है वह अतिक्रमण पूर्वक उसको पार करके यमुना के किनारे उपस्थित होती पोरे शंगी ओ शंगीरा तहां के अनुसंधान कोरिया फिराया आते और फिर जब लोगों को पता चलता कि अरे मां कहां चली गई तो उनका अनुसंधान करके उनको वापस ले आती है के जाने तो श्री मां अपना के श्री राधिका एवं श्री राम कृष्ण के श्री कृष्ण ज्ञाने हृदय वृंदावन नित्य ब्रज लीलाए मग्न थाकीते कीना किसको पता उस समय श्री मां अपने आपको श्री राधिका का एवं श्री राम कृष्ण को श्री कृष्ण के रूप से देखकर के हृदय वृंदावन में वृंदावन कैसा हृदय में जो स्थित है वह हृदय वृंदावन में नित्य व्रज लीला में मग्न रहती कि नहीं किसको पता शोना जाए एक समय तैक भक्त प्रश्न उत्तरे बोलिया छिलेन आमी राधा सुनने में आता है कि एक समय माने ने एक भक्त के प्रश्न के उत्तर में कहा था मैं ही हूं राधा आमी राधा मैं ही हूं राधा कखन आ श्री राम कृष्ण चिंताए तनी श्री रामकृष्ण मोह होया जतेन कभी-कभी मां श्री राम कृष्ण की चिंता में श्री रामकृष्ण मय हो जाती कभी द्वैत में कभी अद्वैत में कभी भक्ति मार्ग में कभी ज्ञान मार्ग में देखिए यह जो साधक जीवन का हाईएस्ट लेवल जो है वह यहां पे आ गया है। पता है ना कि दो तरह की कार होती है। एक तो होती है कि जिस कार में गियर होता है तो आप जैसे-जैसे वो उसका एक्सीलरेटर म उसको आप स्पीड बढ़ाने का प्रयास करेंगे तो क्या है कि वो गियर आपको टू फर्स्ट गियर, सेकंड गियर, थर्ड गियर, फिफ्थ गियर वगैरह में ले जाना है। जिससे होगा क्या कि फ्यूल कंजमशन जो है पेट्रोल जो ईंधन जो है वो जितना लगता है उससे कम लगेगा। माने वो फ्यूल कंजर्वेशन करने के लिए ये गियर सिस्टम है। ये शाफ्ट सिस्टम वो आप यदि फास्ट जाना चाहते हैं तो बेटर है कि आप टॉप गियर में जाइए। स्लो जाना चाहते हैं तो बेटर है कि लोअर गियर में जाइए। इससे आपका फ्यूल कंजर्वेशन होगा। फ्यूल जो है प्रॉपर्ली यूटिलाइज होगा। तो एक तो यह गियर वाली गाड़ी आती है जिसमें आपको स्पीड के अनुसार गियर चेंज करने होते हैं। फिर आती है गियरलेस कार। अभी आजकल जो कुछ-कुछ कार्य आती है उसमें क्या होता है वह तो डिजिटल वह होता है सिस्टम उसके भीतर में माइक्रोपर होता है एल्गोरिदम होता है उस स्पीड के अनुसार ऑटोमेटिकली जो मशीन के भीतर में जो ऑप्टिमाइजेशन करना है फ्यूल यूटिलाइजेशन का वो ऑटोमेटिक उसका जो कंप्यूटर ब्रेन है वह सब करता है। वह जो ड्राइवर है उसको यह टेंशन नहीं लेना है कि मुझे यह कौन से गियर में गाड़ी चलानी है। फर्स्ट ना कि सेकंड ना कि थर्ड ना फोर्थ वह टेंशन उसको नहीं लेना है। बस उसको जो यह है अपना एक्सलरेटर उसी पे ध्यान देना है। कितना स्पीड से चलाना है, कितना स्लो चलाना है। फिर यह गियर चेंज करना, फ्यूल ऑप्टिमाइजेशन करना वो गाड़ी अपने से गाड़ी का जो ऑनबोर्ड कंप्यूटर है, उसका जो एल्गोरिदम है, सॉफ्टवेयर है, वह सब मैनेज कर लेगा। तो यहां पर भी देखिए कि जो एक ट्रेडिशनल होता है एक है द्वैत एक है अद्वैत आपको द्वैत से अद्वैत में जाना है तो पूरा माइंडसेट है आपका वो चेंज करना है कॉन्शियसली आपको गियर चेंज करने हैं कि हां मैं अद्वैत में जा रहा हूं कि हां मैं अद्वैत में से द्वैत में आ रहा हूं। एक पूरा शिफ्ट ऑफ माइंडसेट होता है। पूरा गियर चेंज होता है। किंतु रामकृष्ण संघ में अभी यह गियरलेस कार की तरह है। वो आप जितना स्पीड से जाना चाहे उतने स्पीड के अनुसार जो गियर चेंज करना है वह ऑटोमेटिक हो जाता है। यदि आपकी विरह वेदना बढ़ जाती है तो अद्वैतमय चले जाएंगे। विरह वेदना थोड़ी सी कमती है तो फिर क्या है कि आप यह लीला विलास करेंगे। ठाकुर के साथ में जैसे मास्टर महाशय ने ठाकुर ने खुद ने कहा कि चैतन्य देव की जो कितनी अवस्था होती थी बाह्य दशा अर्ध बाह्य दशा अंतरर्दशा तो बाह्य दशा में भक्तों के साथ में वार्तालाप करते थे अर्धबाह्य दशा में मत्त होकर के नृत्य कीर्तन करते थे और अंतर्दशा में समाधिस्थ हो जाते थे। तो यहां पर भी कभी-कभी मां श्री कृष्ण के भगवान रामकृष्ण के साथ में हृदय वृंदावन में व्रज लीला में मग्न रहती थी। कभी-कभी वह मां श्री रामकृष्ण स्वयं हो जाती थी। कभी-कभी वह कहती थी कि मैं ही राधा हूं तो कभी-कभी श्री रामकृष्ण की चिंता में श्री रामकृष्ण मय हो जाती थी। एक भक्त प्रश्न उत्तरे बोलिया छिलेन आमी राधा एक भक्त के प्रश्न के उत्तर में कहा था मैं ही राधा हूं कखनो आ श्री रामकृष्ण चिंता श्री रामकृष्ण मय होइया जते कभी-कभी श्री रामकृष्ण की चिंता में वह श्री रामकृष्ण मय हो जाती थी तो इतना सीमलेसली गियर चेंज यहां पे होता है ये प्योर गियरलेस कार है यह जो भीतर का वह द्वैत अद्वैत ट्रांजिशन जो है वह ऑनबोर्ड कंप्यूटर वो सबकॉन्शियस लेवल पे डीएनए लेवल पे ऑटोमेटिक हो जाता है। वह एल्गोरिदम सब फिट ठीक करता है मशीन लेवल का। आपको कॉन्शियसली यह सोचने की जरूरत नहीं कि मैं द्वैत गियर में हूं ना कि अद्वैत गियर में। आपकी व्याकुलता है। आपका यह जो विरह जनित तन्मयता है वही सब ठीक करेगा कि आपको भीतर में क्या चेंजेस आना है। उसका गियर माने वो द्वैत अद्वैत को लेके आपको टेंशन नहीं लेना। सो देखिए कि देयर इज़ अ ग्रेटनेस ऑफ रामकृष्ण भावधारा कि कितना सीमलेसली हम लोग ये सब फिलॉसोफीस है। साधन पद्धतियां है। ये ये सब चेंज करते हैं। इतना सुंदर मिश्रण हो जाता है कि हम रामकृष्ण संघ के भक्तगण या साधक गण अब ट्रेडिशनल डिबेट जब पढ़ेंगे द्वैत और अद्वैत के बीच में तो हमको ना बड़ा आश्चर्य होता है। चाइल्डिश लगता है कि यह क्या बचपना जैसी बातें सब कर रहे हैं। हमारे लिए तो एकदम स्पष्ट है कि किस स्थिति में कौन से लेवल पे कौन सा फिलॉसोफी कौन सा साधन मार्ग उसको फॉलो करना है। इसको लेके इतना डिबेट क्यों कि भाई हम ही सुपीरियर है। हमारे अलावा बाकी निकम में है या तो वे लोग निम्न कक्षा के हैं। इस तरह से क्यों डिबेट करना हमको तो समझ में ही नहीं आता। तो एनीवे दिस इज वन ऑफ द प्रिविलेज ऑफ फॉलोअ ऑफ बीइंग ए फॉलोअ ऑफ श्री रामकृष्ण
समाधि में माँ सारदा और उन पर ठाकुर का आवेश
काला बाबू कुंजे एक दिन ध्यान करते कोरते तनी गंभीर समाधि ते निमग्न होइया छिलेन काला बाबू के कुंज में एक दिन ध्यान करतेकरते मां गंभीर समाधि में निमग्न हुई थी समाधि किु ते भांगे ना समाधि कोई किसी भी तरह टूट नहीं रही थी योगिन मां अनेक क्षण नाम सुनाई ले ओ व्युत्थानेर कोनो लक्षण देखा गैलो ना योगिन मा ने बहुत देरी तक नाम श्रवण करवाया उसके बावजूद व्युत्थान का कोई लक्षण देखा नहीं गया व्युत्थान अर्थात कि समाधि में से बाहर आना शेष योगीन महाराज आशियाना नाम सुनाईले समाधि एकू उपशम होइलो आखिर में योगी महाराज ने आकर के जब नाम सुनाया तब समाधि का थोड़ा सा उपशम हुआ ठाकुर की महासमाधि के समय 1:00 बजे 1:2 पे एकाएक उनके जो रोम हर्षण हुआ था पूरे देह में जो आनंद की जो लहरें हैं वह बहने लगी थी देखकर के सभी को डर तो लग गया कि ये महासमाधि है किंतु फिर भी आशा तो वैसे तो टूटती नहीं है। तो सब भक्तों ने मिलकर के नाम श्रवण करना शुरू कर दिया था। नाम गुणगान कीर्तन करना ईश्वर का कि यदि इसको सुनकर के ठाकुर यदि अपना यह जो प्रॉमिस है कि चीनी होते चाहिए ना मां चीनी खेते चाहिए। ईश्वर होना नहीं चाहता ईश्वर के साथ में लीला संभोग करना चाहता हूं। यह जो ठाकुर का प्रॉमिस है वो प्रॉमिस उनको रिमाइंड करवा करके अद्वैत भूमि से यदि उनको द्वैत भूमि पर लाया जाए तो यहां पे भी वही लॉजिक काम करता है जो भी साधक होते हैं सर्वोच्च लेवल के देखिए साधको भी प्रकार है ना ठाकुर ने कहा कि बहादुरी काट माने कोईकोई जो लकड़ी होती है भीतर से सड़ी होती है तो इस तरह की सड़ी लकड़ियों की नौका बना करके आप यदि यदि समुंदर पार करने को जाएंगे तो लकड़ी तो सड़ी हुई है। थोड़ी ही देर में वह नौका डूब जाएगी। आप भी समुंदर के भीतर में डूब जाएंगे। किंतु फिर बहादुरी काट अर्थात कि मजबूत लकड़ी जो होती है उसकी नौका बनाएंगे और फिर उसमें बैठ बैठकर के भवसागर पार करेंगे तो वह आप आराम से भवसागर पार हो जाएगा। तो नारद वगैरह जो ऋषि मुनि है उनकी साधना है जगत कल्याण के लिए नहीं कि सिर्फ अपने खुद के सेल्फिश मुक्ति के लिए तो कोई है कि ठाकुर कहते हैं कोई-कोई होते हैं साधक कैसे भी करके अपनी खुद की मुक्ति हुई कि बस जान बचा करके निकले यहां से और नारद वगैरह जो ऋषि मुनि गण है बहादुरी काट की तरह है एक स्ट्रांग वो लकड़ियों की तरह है उनका सहारा लेकर करके आप जो है यह भवसागर पार कर सकते हैं। तो मां निश्चय जगत जननी स्वयं उनको तो सिर्फ यह नहीं है कि खुद का आध्यात्मिक कल्याण चाहिए। जगत कल्याण के लिए इनका अवतरण हुआ है। तो जगत कल्याण के लिए यह इनका जो प्रॉमिस है हमेशा कि वो लीला संभोग करना चाहते हैं। वो अद्वैत भूमि में आरूढ़ होकर के जो लीला ब्रजेश्वर यहां पे जो जिस तरह से कहा गंभीरानंद जी ने वो ब्रजेश्वर होकर के रहना नहीं चाहती। ब्रजेश्वर के साथ में वह लीला करना चाहते हैं। तो जैसे ही उनको नाम श्रवण करवाएंगे तो नाम श्रवण के मोह से उस लोभ से वे लोग अद्वैत भूमि से नीचे आ पाएंगे। तो यहां पे भी पहले तो योगिन मां ने बहुत प्रयास किया नाम सुनाने का किंतु उस समय समाधि से व्युत्थान का कोई लक्षण नहीं देखा गया। आखिर में किंतु योगिन महाराज ने आकर के जैसे ही नाम सुनाया समाधि एकू उपशम होलो समाधि का थोड़ा सा उपशम हुआ समाधि के उच्च क्षेत्र से मां थोड़ा सा नीचे आई एवं समाधि भंगे ठाकुर जैमन बोली तेन श्री मां तेमनी बोलीन खाबो और समाधि भंग के बाद में ठाकुर जैसे कहते वैसे ही श्री मां ने कहा खाऊंगी। तो अभी हिंदी में क्या है? ये जेंडर स्पेसिफिक है। खाऊंगा या खाऊंगी। किंतु बंगाली में खाबो इज अ नॉन जेंडर जेंडर न्यूट्रल टर्म है। सो दैट वे ठाकुर जैसे कहते थे खाबो तो वैसे ही मां ने कहा खाबो व्हिच इज मोर एप्रोप्रियट इन बंगाली। हिंदी में करने से वो जेंडर यूज़ आ जाता है। सो एनीवे तो समाधि का जैसे ही उपशम हुआ ठाकुर जैसा कहते थे वैसा ही मां ने कहा। अभी देखिए हमको ठाकुर के बारे में पता है। ठाकुर कोई ना कोई एक सामान्य वासना प्रकट करते थे। क्योंकि हम लोगों के साथ में क्या है कि हमको वासनाओं का त्याग करना है। जैसे कि अपना मन उर्ध्व उठे। क्योंकि अपना मन जो है ना वह ग्रेविटी के बंधन में बंधा हुआ है। वो जमीन के साथ में बंधा हुआ है। ज आप एक बॉल होता है क्रिकेट का जिन्होंने क्रिकेट या ऐसा कुछ खेला होगा पता होगा बॉल आप हवा में जितना ही ऊपर में फेंके थोड़ी देर के बाद में वो जमीन पे आके पटकने वाला है। क्यों? क्योंकि ग्रेविटी का बंधन यह जगत के सभी पदार्थों के ऊपर में है। उसके निकलने के लिए आपको वह रॉकेट इंजन चाहिए। रॉकेट चाहिए। इवन जेट प्लेन भी है वह ग्रेविटी से निकल के एस्केप वेलोसिटी नहीं प्राप्त कर पाएंगे। तो हमारा सभी का मन जो है ना वह ग्रेविटी के बंधन में बंधा हुआ है। वासनाओं के यह पाश से बंधा हुआ है। हमको कितनी साधना करके वासनाओं के पाश से मुक्त होना है। यह एस्केप वेलोसिटी प्राप्त करना है। तब कहीं जाकर के यह पृथ्वी के यह ग्रेविटी के बंधन से मुक्त होंगे। ठाकुर का उल्टा है। वो इस तरह के पदार्थ के बने हैं जिस पर ग्रेविटी काम ही नहीं करती। नेचुरली उनकी उर्ध्व गति है। उनको आप यहां पर छोड़ देंगे जमीन को सीधा वो हवा में उड़ के स्पेस में चले जाएंगे। उनको रिवर्स है कि कुछ कुछ सामान्य वासनाओं से अपने को बांध के रखना है। जैसे कि वह पृथ्वी पर हमारे साथ में रहे। हम हमारा हमारा कल्याण करने के लिए हमको उपदेश दे। हमको मार्गदर्शन दे। तो ठाकुर जब समाधि में बहुत ही डीप में चले जाते थे तो समाधि भंग करने के लिए या तो समाधि में से थोड़ा सा वापस आकर के वही जो अर्धबाह्य दशा अंतर्दशा में तो पूर्ण समाधिस्थ है किंतु कैसे भी करके यदि अर्धबाह्य दशा में आते हैं तो थोड़ी सी एक वासना प्रकट करेंगे कि मैं तंबाकू का सेवन करूंगा बाजे जाओ माने शौच के लिए जाऊंगा या तो फिर यह लूची वगैरह कुछ खाऊंगा ऐसा कोई एक सामान्य यह वासना प्रकट करते थे। तो इस वासना के बंधन से बंध करके वह अपने को बाह्य दशा में फिर से ला सके। तो यहां पे भी मां एग्जजेक्टली वही बात करती है जैसे कि ठाकुर कहते थे कि मैं खाऊंगी। अर्थात कि अपने मन को बाह्य दशा में बांधने के लिए एक सामान्य वासना प्रकट करती है। किछु खा जल ओ पान सन्मुखे धोरी ले तीन ठाकुर मोतो एकू खई लेन जैसे ही मां ने कहा कि मैं खाऊंगी तो वैसे ही खाने के लिए कुछ जो सामग्री होगी वो उसके साथ में जल अर्थात कि पानी और पान ये लोगों को पान बड़ा पसंद था और मां की वो कहानी भी है वो योगेन मां मां को एक बार नहबत में मां पान बना रही है तो योगिन मां ने देखा मां दो तरह के पान बनाती है। एक तो बड़ा सुंदर रूप से सजा करके जिसमें कबाब चीनी वगैरह जो अच्छी-अच्छी चीजें डाल के बनाती है। दूसरा एक सामान्य पान बनाती है। तो योगिन मां ने पूछा मां शारदा को कि मां यह दो तरह के पान किस क्यों बना रही हो? यह अच्छा वाला किसके लिए है? यह सादा वाला किसके लिए है? तो मां ने कहा देखो यह सादा वाला है ठाकुर के लिए। वह तो अपने ही है। उनको तो उनको ले कोई टेंशन नहीं करना है। जबकि यह भक्तगण है उनको तो हमको स्नेह से अपना लेना है। इसलिए यह जो स्पेशल पान है वह उनके लिए है। ठाकुर कहते तो ऑप्शन नहीं है। मां जो खिलाएंगी वो खाएंगे बेचारे। तो ठाकुर तो अपने ही है। सादा पान देने से भी वो खा लेंगे। वो थोड़ा बहुत कंप्लेन करेंगे। अल्टीमेटली मां के पास में कुछ कर नहीं पाएंगे। तो पान का बड़ा सुंदर सब प्रसंग है। तो यहां पे भी मां के सामने थोड़ा सा खाने के लिए कुछ साथ में ही पानी और पान मां के सन्मुख में जैसे ही लाया गया उन्होंने ठाकुर की तरह ही थोड़ा सा खाया ऐन कि ठाकुर जेमन पाने शरू दिक दते काटिया फेलिया दिया खते श्री माओ श्री भाबे खन यहां तक कि ठाकुर पान का जो यह अग्र भाग जो है सामने का जो पतला भाग उसको दांत से काट करके फेंक दे फेंक करके खाते थे। कैसे यह क्या उसका अर्थ है मुझे पता नहीं। ये सिंपल लिखा है कि उसका जो पतला भाग है वह दांत से काट के फेंक करके खाते थे। तो जो लिखा है वह लिखा है। तो जिस तरह से ठाकुर इस तरह से खाते थे तो श्री मां भी उसी तरह से यह पान खाती है। देखिए ठाकुर नहीं है। उनके साथ में लीला करना संभव नहीं है तो फिर ठाकुरमय हो जाते हैं। द्वैत को प्रायोरिटी है। किंतु अभी ईश्वर अदृश्य हो जाते हैं। तो फिर क्या करेंगे? अद्वैत भाव में जाने के अलावा उपाय नहीं। तो मां के ऊपर में भी जैसे कि ठाकुर का भर हुआ है तो श्री मां ने एग्जजेक्टली उसी तरह पान खाया तो जोगिन महाराज को एक टी प्रश्न कोले ठीक ठाकुर मतो उत्तर दिल उस समय जब योगिन महाराज ने कुछ प्रश्न किए तो माने बिल्कुल ठाकुर के ही स्टाइल में ठाकुर की ही तरह उत्तर दिए वस्तुत वही समय तहार हाव भाव अभी कोल ठाकुर मत हो छिलो सही सही में उस समय मां का जो हाव भाव है चाल चलन व्यवहार जो है बिहेवियर है बिल्कुल ठाकुर के जैसा हुआ था साधारण भूमि ते नामनी निजे बोलिया छिले जे तहां के ठाकुर आबेश होइया छिलो साधारण भूमि में अवतरण करके माने अपने से स्वीकार किया था कि उनके ऊपर में ठाकुर का आवेश हुआ था। अभी देखिए इस सब ये जो तत्व है इसकी व्याख्या करना बिल्कुल अपनी बुद्धि के परे है। हमने एक सामान्य व्याख्या तो कर ली कि अद्वैत या तो ज्ञान मार्ग के अनुसार भक्ति या तो फिर ईश्वर के साथ में लीला विलास सेकंड प्रायोरिटी है हाईएस्ट प्रायोरिटी है ईश्वर स्वयं हो जाना ब्रह्म स्वयं हो जाना अहम ब्रह्मास्मि जीव ब्रह्म ऐक्य वो तत्व उपलब्धि करना जबकि द्वैत मार्ग से भक्ति मार्ग से या तो फिर कहेंगे कहेंगे कि अवतार तत्व जो है यह अवतार तत्व यदि हम फॉलो करते हैं तो फिर यहां पे अवतार के साथ में लीला विलास का ही प्राधान्य है। आत्म तत्व और अवतार तत्व देखिए इन दोनों में कितना एक डिलीशियस कंट्रास्ट भी है और दोनों में कॉम्प्लीमेंटिटी भी है। यह दोनों एक्सक्लूसिव नहीं है। कंट्रास्ट है बोलकर के दोनों एक्सक्लूसिव नहीं। दोनों ऑोजिट नहीं दोनों के बीच में कॉम्प्लीमेंटिटी है। यदि भक्ति अवतार तत्व को आप ठीक-ठीक फॉलो करेंगे तो अवतार के साथ में लीला ही जीवन का प्राधान्य है। किंतु फिर जब भी अवतार अदृश्य हो जाए, अवतार के साथ में लीला करने का कोई हमको मार्ग नहीं मिलता है तो फिर यह सेकंड प्रायोरिटी है अवतार स्वयं हो जाना। तो यहां पर भी यह आत्म तत्व और अवतार तत्व दोनों अपने संघ में देखेंगे कि कितना अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। कॉम्प्लीमेंटिटी एज वेल एज कंट्रास्ट दोनों के बीच में कैसा चलता है। इसके बाद एक नया टॉपिक प्रारंभ होता है जो कि अभी हम कल देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णारपणमस्तु
प्रश्न: मैं ऐसे वैष्णवों को जानता हूँ जो दृढ़ द्वैतवादी हैं और अद्वैत को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। इससे समझ में आता है कि विभिन्न धार्मिक मतों के बीच कितनी गहरी दूरी है। ठाकुर का समन्वय वास्तव में कितना क्रांतिकारी है, इसका हमें सहज अनुमान नहीं होता।
और प्रॉब्लम देखिए हम हमारा दोनों दो प्रॉब्लम है। आई मीन एडवांटेज इज कि बिकॉज़ के अपना माइंडसेट इतना यूज्ड टू हो गया है द्वैत अद्वैत के बीच में गियर शिफ्ट करने में कि हमको वो लगता ही नहीं है कुछ वो एक एडवांटेज है डिसएडवांटेज क्या है पता है हम हमारा जो साधन पद्धति है ना उसमें अभी भी हम यह सब कंस्ट्रेंट से बंधे हुए हैं कि यह द्वैत पद्धति है उसको फॉलो करना है या द्वैत है उसको फॉलो करना है अपना थिंकिंग प्रोसेस इन अ वे अभी भी टाइट डाउन है जो यह पावर उसका बेनिफिट लेना चाहिए गियरस कार का। वह बेनिफिट अभी भी नहीं ले पा रहे है। गाड़ी को ऐसे ही चला रहे हैं जैसे कि हम वो गियर वाली गाड़ी की तरह चला रहा है। उसका जो फुल पोटेंशियल है वो अभी हम रियलाइज नहीं किए साधना में। अभी देखिए अ जैसे किंतु
प्रश्न: द्वैत हो या अद्वैत—कोई एक मार्ग दृढ़ता से पकड़ लीजिए, जीवन धन्य हो जाएगा। सही है न?
किंतु देखिए आप एक्सक्लूसिवली जाएंगे ना आपको मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी। दैट इज व्हाट आई वास सेइंग कि फुल पोटेंशियल हम लोग रियलाइज नहीं किए। व्हाई वुड आई व्हाई एट ऑल वुड आई गो एक्सक्लूसिव? मैं कर्म योग ही क्यों करूं? मैं क्यों नहीं साथ में भक्ति योग भी करूं? बंगाली बेस रेमिनेशंस है वो क्यों ना पढूं? मैं क्यों शास्त्र ना पढूं? मैं उसके अनुसार साधना क्यों ना करूं? राइट? मैं इस तरह का माइंडसेट बना ही क्यों देता हूं कि वह एक ही करना चाहिए मुझे।
प्रश्न: ठाकुर की शिक्षा के अनुसार साकार-निराकार, कर्म-ज्ञान-भक्ति आदि को एक ही साधना-पद्धति में समन्वित किया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि यह कार्य अभी तक पूरी तरह नहीं हुआ है। -- उत्तर: महापुरुष महाराज ने यह समन्वय किया है
मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि नहीं हुई है। देखिए आप महापुरुष महाराज का वो जो देवलोक के पुस्तक है। देखिए महापुरुष महाराज एक क्या है ना कि एक माइलस्टोन थे। बिटवीन टू वर्ल्ड्स। एक तो था कि डायरेक्ट डिसाइपल ठाकुर मां स्वामी जी का जगत और दूसरा है हम लोगों का जगत माने हम लोग आम आदमी का जगत तो इन दोनों के बीच में ना महापुरुष महाराज इज अ ब्रिज क्योंकि उनका जो प्रेसिडेंसी है राजा महाराज की महासमाधि के बाद में प्रारंभ हुआ 1923 22 के आसपास में राजा महाराज की महासमाधि हुई फिर शरद महाराज उस समय जीवित तो थे किंतु 23 से 26 बस वहीं तक 1926 में शरद महाराज की भी महासमाधि यानी शरद महाराज के साथ में मेजॉरिटी ऑफ़ डायरेक्ट डिसाइपल चल बसे हैं। अभी बचे हैं महापुरुष महाराज बचे हैं। खोका महाराज बचे हैं। विज्ञान महाराज और अखंडानंद ये काली महाराज ये पांच बचे हैं। तो इसमें क्या है कि आप जो एक मेजर स्पिरिचुअल डेवलपमेंट जो होना था बाय दिस टाइम हो चुका है। अभी प्रत्येक का तो अपना-अपना स्ट्रीम है ना। मां का एक स्ट्रीम है। स्वामी जी का एक स्ट्रीम था। ठाकुर का एक स्ट्रीम था। तीन मेजर स्ट्रीम्स थी। राजा महाराज की यदि आप एक ऐड कर दे तो राजा महाराज की एक स्ट्रीम थी। महापुरुष महाराज रिकंसाइल्स ऑल फॉर इन ह टीचिंग्स। सो महापुरुष महाराज इज वन ब्रिज कि जो कि वो जो चार महासत्ताएं चार मेजर स्ट्रीम वो जो अपनी डेवलप हुई थी इन ईच इन इट्स ओन प्लेस। अब स्वामी जी का पूरा जगत अलग है। मां का जगत पूरा अलग है। ठाकुर का जगत पूरा अलग था। राजा महाराज का भी आप कह सकते हैं कि जगत पूरा अलग था। तो जो चार स्ट्रीम जो ऑलरेडी डेवलप हो चुकी थी। महापुरुष महाराज रिकंसाइल्स ऑल फॉर और फिर वह अपने भक्तों को बताते हैं। सो फ्रॉम द एज ऑफ गॉड टू एज ऑफ मैन ये जो ब्रिज है दैट इज महापुरुष महाराज। तो इतनी मोटी-मोटी किताबें हैं महापुरुष महाराज की स्मृति संग्रह है वगैरह। वो पढ़ने से एग्जजेक्टली पता चल जाता है कि हाउ टू कंबाइन। प्रॉब्लम इज कि ज्यादातर स्मृति कथाएं ट्रांसलेट नहीं हुई है। बंगाली में है। दैट इज ना आई थिंक कि यह दोनों ट्रांसलेट हो चुकी है। हिंदी में है। ये दोनों है। शिवंद स्मृति संग्रह इतना मोटा नागपुर से हिंदी में प्रकाशित हो चुका है। देवलोके वो भी अरूपानंद जी का वो भी प्रकाशित हो चुका है। सो, यह दो आप पढ़ेंगे ना, आपको पता चलेगा कि हाउ दिस एज ऑफ़ मे गॉड ट्रांज़िशन इंटू एज ऑफ़ मैन। कि हमारे लिए किस तरह से कंबाइन करना है। प्रॉब्लम इज कि यह सब चीजों का प्रॉपर प्रचार प्रसार नहीं हुआ है। उनको जितना आप पढ़ेंगे ना उतना ही आपको यह कॉम्बिनेशन पता चलता जाएगा कि डायरेक्ट डिसाइपल में से एक डिसाइपल ने किस तरह से उन लोगों को रिकंसाइल किया है। म व्हाई वुड वी लुक एट अस? हम कौन होते हैं? जिन्होंने ठाकुर का दर्शन किया है वही लोग जब यह रिकंसाइल करके हमको देते हैं। सो दैट इज अ बेस्ट रिसोर्स फॉर अस। अभी जब सुहितानंद जी यहां पे आए थे ना। सो ही सेड समथिंग वेरी इंटरेस्टिंग। उनका भी ये रीडिंग बहुत अच्छा इनसाइट होती है उनकी। तो मेरे से बात कर रहे थे तो मुझे उनको पता है कि मैं ये सब ऑब्सेशन है मेरा ये लिटरेचर का रामकृष्ण वेगान लिटरेचर का। तो मुझे पूछ रहे हैं तुमने वो रिसेंट वो लेटर्स सब पब्लिश हुए पढ़े। अब मैंने कहा कि नहीं अभी मैं टच में नहीं हूं। अ जब से राजकोट छोड़ा तब से कि कौन सी नई किताब अब क्या वगैरह तो मुझे पता नहीं कि क्या अभी रिसेंट पब्लिश हुआ है। तो मुझे बोला अखंडानंद जी के लेटर्स पब्लिश हुए हैं। मोस्ट प्रोबेब्ली अखंडजन जी के ही तो मैंने कहा अच्छा ठीक है चांस मिलेगा तो मैं पढूंगा। वो मुझे एक बात कहते हैं पता है क्या है कि देखो अभी तक हम सिर्फ रेमिनेशंस पढ़ते थे ना तो यह पता चलता था अखंडानंद जी के रेमिनेशंस पढ़ के पता चला अखंडानंद जी ने क्या किया स्वामी जी के रेमिनेशंस पढ़ के पता चला कि स्वामी जी ने क्या किया तो ये रेमिनेशंस और उनकी लाइफ काफी कुछ पब्लिश हो चुकी है किंतु अभी ये जो लेटर पब्लिश हो रहे हैं ना अखंडानंद जी ने महापुरुष महाराज को लिखा महापुरुष महाराज ने योग बाबूराम महाराज को लिखा ये जो लेटर्स अभी जो पब्लिश हो रहा है ना उससे एक नया पता चलता है कि यह लोगों ने आपस में क्या इंटरेक्शन था। महापुरुष महाराज का बाबूराम महाराज के साथ क्या इंटरेक्शन था? अखंडानंद जी का महापुरुष महाराज के क्या साथ क्या इंटरेक्शन था? तो यह लेटर पढ़ के ना एक पूरा नया लेयर हमको मिलता है। इट एनरचेस आवर अंडरस्टैंडिंग। हम लोग इनको इंडिविजुअली देखते थे। बट नाउ वी लुक एट देम एज अ नेटवर्क इफेक्ट। बट इट इज़ इंटरेस्टिंग। ऑब्जरवेशन ना मतलब हम मैंने लेटर्स काफी पढ़े हैं किंतु इस तरह का ऑब्जरर्वेशन जो एक इंसाइटफुल एक ऑब्जरवेशन है आई लाइक इट वेरी मच एक्चुअली मैं जब बेलूर मठ में गया ना जॉइ करने के लिए तो हमको एक रिकमेंड किया जाता है किताबें तो उस समय जो और लॉजिक दिया जाता है ये किताब का क्याेंस है तो वन ऑफ द बुक रिकमेंडेड टू अस कि लाटू महाराज की स्मृति कथा तो क्यों यह रिकमेंड किया है क्योंकि स्वामी जी को तो आपने पढ़ा पता है कि इंटेलेक्चुअल जो हाइट होती है वहां से आप आध्यात्मिकता को कैसे अप्रोच करेंगे। किंतु लाटू महाराज का कोई इंटेलेक्चुअल अचीवमेंट नहीं था। मन प्राण के आवेग से वो आकर के उन्होंने आध्यात्मिक जीवन में मुक्ति प्राप्त की है। तो वो एप्रोच क्या है? इन ऑर्डर टू अंडरस्टैंड एक्सप्लोर दैट एस्पेक्ट हमको रिकमेंड किया गया कि यह किताब आप पढ़िए। सो इन दैट जो लिस्ट था एक किताब थी अतिर स्मृति जो कि वीरानंद जी की बायोग्राफी है। तो इस किताब को क्यों हमको रिकमेंड किया गया है? तो दिस इज अ ब्रिज बिटवीन एज ऑफ डायरेक्ट डिसाइपल्स एंड एज ऑफ अस। कि क्योंकि वो तो उसी वराह नगर मठ से ज्वाइन किए थे। किंतु बाय दैट टाइम ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है। डायरेक्ट डिसाइपल की तपस्या संपूर्ण हो चुकी है। मोर और लेस। और फिर यह अभी वर्ल्ड बिल्डिंग स्टार्ट हो रहा है अपने स्वामी जी का। सो वो जो एज था उसको बहुत ही तकरीब नजदीक से उन्होंने देखा था। एंड ही लिव्ड फॉर अ लॉन्ग टाइम आफ्टरवर्ड्स एज अ प्रेसिडेंट। तो उन्होंने यह ब्रिज का काम किया है। सो हिज लाइफ इज दैट ब्रिज। तो इस हिसाब से मैंने वो किताब पढ़ी है। सो दैट आईडिया इज देयर इन माय माइंड कि ऑलरेडी हम वीरानंद जी को एज ए ब्रिज के रूप में देखते हैं बिटवीन दिस टू एज। किंतु टू मी जैसे मैं महापुरुष महाराज को जितना जितना पढ़ते गया ना तब मुझे लगता है कि ही इज़ अ बेटर ब्रिज देन वीरानंद जी। क्योंकि ऑब्वियसली ही इज़ अ डायरेक्ट डिसाइपल अ फार ग्रेटर स्पिरिचुअली देन वीरानंद जी। दैट इज़ वन पॉइंट एंड सेकंड कि ही हैज़ नोन ऑल थ्री वेरी इंटिमेटली। ठाकुर मां स्वामी जी राजा महाराज चारों को उन्होंने बहुत ही घनिष्ठता रूप से उन्होंने देखा है स्टडी किया है। अब वह जब रिकंसाइल करते हैं चारों का दैट हैज़ टू बी ऑन अ डिफरेंट लेवल ऑल टुगेदर। यस यस यस वो हमेशा बैकग्राउंड में रहे हैं। दैट इज ट्रू के देखिए ऑब्जरवेशन करने के लिए ना आपको वो एक पर्सनालिटी चाहिए। आपने बिल्कुल ठीक कहा। वो एक क्या कहेंगे कि पैसिव शब्द मैं नहीं यूज करूंगा। नॉन एक्टिव टाइप का पर्सनालिटी चाहिए। आपका खुद का एक एजेंडा नहीं होना चाहिए। अदरवाइज यू विल नॉट बी एबल टू ऑब्जर्व अदर्स। करेक्ट अब अब जैसे अखंडानंद जी राइट तो अखंडानंद जी का एक था एजेंडा कोट अनकोट एजेंडा नॉट इन दैट सेंस एजेंडा मिशन म उस अर्थ में शिवनंद नाम फिट है महादेव की तरह निर्विकार निर्विकल्प है या तो फिर माने व्हिच इज दिस इज आल्सो अ पॉसिबिलिटी कि ऐसी इतनी सारी घटनाएं हुई है कि जो कि हमको पता ही नहीं है। राइट? अभी अब जैसे हमारा बार-बार वही डिस्कशन होता है कि ठाकुर ने स्वामी जी को क्या बताया होगा? इतना तो क्या बताया होगा। सो इट कुड बी दैट वन ऑफ़ द टॉपिक कुड हैव बीन दिस। इट कुड हैव बीन के शरद महाराज की मां के ऊपर में भक्ति होगी पहले से ही वो होगी ही। इंसिडेंट्स जो है हमको नहीं पता। क्योंकि देखिए ना नियरली 100 ईयर की ये जर्नी है 1836 से लेकर के 1936 ये मेन टेंपल बनने की कि जब तक महा अपने डायरेक्ट डिसाइपल जीवित थे 100 इयर्स की घटनाओं को आप यदि इकट्ठा करें तो आपके रूम के रूम भर जाएंगे। इतना तो नहीं है अपने पास में। दैट मींस सिलेक्टेड मेजर इंसिडेंट ही अब ठाकुर का एक दिन का वर्णन आप करेंगे तो आपकी म लाइब्रेरी भर जाएगी। तो उनकी पूरी लाइफ का अपने पास में दो ही किताब है मेनली क्योंकि लीला प्रसंग और कथामृत और यदि जय रूपे देखियाची को एक ऐड करें तो इतने में ठाकुर का पूरा नियरली 50 इयर्स लाइफ आ जाता है स्वामी जी का है ना स्वामी जी वहां पे गंगा के किनारे बैठे थे हिमालय में कहीं पे एकाएक उनको विज़न हुआ कि वही गंगा के किनारे ऋषि मुनिगण बैठे हैं और वेद की रिचाओं का पाठ कर रहे हैं और जिस स्टाइल से पाठ कर रहे वह तो लुप्त हो चुकी है। फिर स्वामी जी ने उस स्टाइल का प्रोपगेशन किया। सो यह तो स्वामी जी का पूरी म सामगान स्वामी जी ने डिस्कवर कर दिया है ऐसे। वो क्रीट वाला वो क्रीट वाला विज़ मेडिटेरनियन से आ रहे थे। वो क्रीट आइलैंड के पास में देखा कि वहां पे एक बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री थी। वो जीसस वहां पे स्टडी कर रहा है। पॉसिबल है। हां म देखिए समय अल्टीमेटली वो एक लाइन में तो नहीं चलता ना। इस लेवल पे देश काल पात्र वाले लेवल पे चलता है एक लाइन में वो परे चले जाएंगे तो एवरीथिंग कोएस्ट सुपरपजीशन बहुत बार ऐसा होता है कि नहीं चाह के भी वो सब हो जाता है माने मैंने अभावनीय यह शब्द अपने लिटरेचर में बार-बार आता है अभावनीय मतलब मैंने कल्पना नहीं की थी फिर फिर भी हो गया अब माने तो ऐसा कहीं कॉन्शियसली प्लान नहीं किया होगा कि वह ठाकुर का आवेश उनके ऊपर में हो वो लेवल पर पहुंच ने से ऑटोमेटिक सब स्टार्ट हो जाता है।
स्वामीजी के जीवन के टर्निंग पॉइंट : "साधक स्वामीजी" कैसे "civilization स्वामीजी" में परिवर्तित होते है.
ये सब स्वामी जी के जीवन के फेस चेंजेस है ना। जैसे-जैसे स्वामी जी का लाइफ हम स्टडी करते जाएंगे। ट्रांसफॉर्मेटिव इवेंट्स हाउ ग्रेटली दे कंट्रीब्यूटेड इन स्वामी जीसस लाइफ। अल्मोड़ा की वो घटना गुफा में थे। वो आना पड़ा वापस। बहन की मृत्यु का समाचार प्राप्त करके। फिर कन्याकुमारी की घटना कि भीतर से आदेश हुआ। ठाकुर ने खुद आदेश किया कि वहां पर जाओ। फिर वहां पे वो जो थाउजेंड वो जो लेक मिशिगन के किनारे बैठे थे और एकाएक उनका मन हू हू करके वो समाधि बंगना हो रहा है। और किंतु फिर उनको लगा कि नहीं मिशन बाकी है। अभी यह समाधि का टाइम नहीं है। तो फिर से वापस आए। ईच ऑफ दैट हैव बीन अ फेस ट्रांजिशन। और उसके बाद में उनका जीवन का गति पूरा परिवर्तित हो गया है। यह अल्मोड़ा और खीर भवानी वन ऑफ द बिगेस्ट यू कैन से ट्रांसफॉर्मेटिव इवेंट। अ सो ईच ऑफ दिस इवेंट वी विल सी इन अ ग्रेट डिटेल एंड हाउ स्वामी जीसस लाइफ ट्रांसफॉर्म्ड आफ्टरवर्ड्स कंप्लीटली ट्रांसफॉर्म। दैट इज साधक स्वामी जी ट्रांसफॉर्म्स इनू सिविलाइजेशनल स्वामी जी। राइट? हां। क्योंकि देखिए आभास सब मिलना स्टार्ट हो गया है। अल्मोड़ा से ही वह पता चल गया था कि ये इनर लाइफ मेरे लिए नहीं है। सो दैट इज अ बिगिनिंग बुक एंड की तरह दो पॉइंट चाहिए तो प्रारंभ हो गया है प्रोसेस का ट्रांस ट्रांजिशन का साधक स्वामी जी हाउ ही ट्रांसफॉर्म्स इनू ट्रांसेंट्स इनू सिविलाइजेशनल स्वामी जी। सो दैट इवेंट स्टार्ट्स फ्रॉम अल्मोड़ा एंड कलमिनेट्स इन कन्याकुमारी। तो जैसे यह कोलंबो टू अल्मोड़ा है वापस आने के बाद में तो पहले वाले में अल्मोड़ा टू कन्याकुमारी है ना दैट ट्रांसफॉर्मेशन इज कंप्लीटेड हियर बाय दैट टाइम उनको भी कंफर्म पता चल गया है कि मुझे क्या करना है। उसके बाद में देखेंगे फिर वो आइसिंग अपॉन द केक जैसा है। फिर वो वहां से चेन्नई जाते हैं। बाय दिस टाइम उनका पक्का पता है कि अभी क्या करना है। फिर अभी मिशन मोड में आ जाते हैं। देखिए चेन्नई से पहले जहां-जहां पे भी गए हैं उन्होंने ऐसा कॉन्शियसली प्रयास नहीं किया कि लोगों को अट्रैक्ट करें। जो आता है उसके साथ में बात करेंगे। बट दिस इज अ फर्स्ट टाइम कि स्वामी जी एक कॉन्शियस ट्राई करते हैं कि लोगों को कलेक्ट करने का। हैदराबाद जाकर के पहली बार लेक्चर देते हैं व्हिच स्वामी जी नेवर डीड। सो शांत बैठकर के लोगों को अपने पास ना आने देना और यह फिर अभी लोगों के पास जाना और दैट कि मोहम्मद पहाड़ के पास जाता है। अभी पहाड़ मोहम्मद के पास में आ रहा है। दैट ट्रांजिशन ऑकर एट कन्याकुमारी। उसके बाद में स्वामी जी इस एन मिशन मोड़ नाउ। अभी सब जगह पे सामने से एक्टिव होकर के वो कार्य करते हैं। पहले वह पैसिव रहते थे। आज्ञा का राह देखते थे। आदेश की राह देखते थे। मुझे क्या विज़न होता है? क्या दर्शन होता है? क्या आदेश मिलता है? उस तरह से वो पैसिव चलते थे। बट नाउ ही इज़ एक्टिव कि बस अभी तो इसको खत्म करना ही है। दैट आपको पहली बार चेन्नई में दिखेगा। चेन्नई का मद्रास का इवेंट्स और पूरे भारत में भ्रमण करके उन्होंने जो किया जो कंपेयर इट कितना बड़ा कंट्रास्ट दिखता है वहां पे। म अल्मोड़ा से यह पता चल गया कि यह रास्ता मेरे लिए नहीं है। किंतु फिर है क्या? क्या नहीं है पता चल गया। किंतु क्या है वह पता चला। बाय दैट टाइम उसके लिए उनको कन्याकुमारी तक आना पड़ा। बीच-बीच में फ्लेशेस होते थे। किंतु यह फुल पिक्चर जो है दैट क्लियर्ड इन कन्याकुमारी। देखिए आप एक जगह पर बैठकर के सिविलाइजेशन के रिलेटेड 10 बातें करते हैं। दैट डजंट ब्रिंग यू ऑन द स्केल ऑफ सिविलाइजेशन। व्हाई? बिकॉज़ यू आर नॉट एक्टिंग अकॉर्डिंगली। अब ठाकुर खुद है। वहां पर ही दक्षिणेश्वर में ही बैठ के कहते हैं कि एक उपाय है जाति प्रथा चली जाएगी और वो उपाय है कि भक्ति। दिस इज अ सिविलाइजेशनल स्केल टीचिंग। बट ठाकुर का खुद का लाइफ है ना इट वास सराउंडिंग दक्षिणेश्वर ओनली। हालांकि वो कोलकाता जाते थे। हालांकि भक्तों को मिलते थे। बट दैट वाज़ द फोकल पॉइंट। दक्षिणेश्वर वाज़ द फोकल पॉइंट। ठाकुर ने खुद कहा है मैं मेरी महासमाधि का लक्षण क्या है? जिस तिस के हाथ खाऊंगा कोलकाता में मैं रात्रि निवास करूंगा। अभी आप घर छोड़ना है तभी तो यह सब करना है ना। जब तक आप घर में हैं तब तक आपके पास में वह लग्जरी है कि मैं जिस तिस के हाथ नहीं खाऊंगा। तब तक आपके पास में यह लग्जरी है कि अपने घर में ही शयन करूंगा। ठाकुर हैज़ टाइड हिमसेल्फ डाउन टू दक्षिणेश्वर। और जैसे ही दक्षिणेश्वर छोड़ने की बारी आई सीधा महासमाधि की ओर चले गए। सो हिज लाइफ इवन दो हिज टीचिंग्स सम ऑफ द टीचिंग्स यू कैन से कि क्रॉस द बॉर्डर इनू सिविलाइजेशनल स्केल ही नेवर एक्टेड अपॉन इट। जबकि स्वामी जी को घर छोड़ना दैट इज अ पार्ट एंड पार्सल ऑफ स्वामी जी। वहां से तो उनका स्टोरी स्टार्ट होता है। सो ऑलरेडी ही हैज़ क्रॉस दैट बॉर्डर इनू सिविलाइजेशनल स्केल एंड देन कन्याकुमारी जाकर के वो कंफर्म हो जाता है कि अभी मुझे करना क्या है। स्वामी जी कहते हैं अपने बारे में। आमी भव गुरु अर्थात कि यह भवघर अर्थात कि ये उनका जो जन्म है ना वो भ्रमण करने में ही गया है। ये भव गुरु शब्द अपने बारे में स्वामी जी यूज़ करते हैं। डिफिकल्ट टू ट्रांसलेट कैसे ट्रांसलेट करेंगे? यू जस्ट आस्क एआई बट म ये ये जन्म जो है ना उनके पैरों की कुंडली ही ऐसी है कि एक जगह पे उनको बैठने नहीं देती है।
प्रश्न: जब स्वामीजी वराहनगर मठ में थे तब से उनके मन में था की यह परिचित जगह छोड़कर विश्वभ्रमण करना है. सही है न?
सिर्फ ये नहीं कि भीतर से था। बाहर से भी तो फैक्टर्स थे। बलराम बाबू और सुरेंद्र बाबू सुरेश बाबू दोनों का निधन हुआ तो मठ की आर्थिक परिस्थिति बिगड़ने लगी। तो उस समय स्वामी जी ने पूरा प्रयास किया कि मठ में रहकर के एज इट इज चलाएं। इसके लिए प्रमदा बाबू को उन्होंने लेटर लिखा कि हम लोग चाहते हैं कि ठाकुर की अस्थियों की रक्षा पूजा रेगुलर हो गंगा के किनारे। इसके लिए हमको जमीन चाहिए। आप धनी है। धनी लोगों के साथ आपकी पहचान है। काइंडली हेल्प अस। और उसके रिप्लाई में फिर प्रमदा बाबू ने बिल्कुल ही एक उनके उत्साह को तोड़ दिया। तो फिर स्वामी जी कहते हैं कि अभी हमने ठीक किया है कि एक-ए दो-द की पैर में हम लोग यहां से निकलना शुरू करेंगे। सो इट वाज़ नॉट जस्ट इनर फैक्टर एक्सटर्नल परिवर्ड भी ये सब था कि अभी पैसे ही नहीं है एक जगह पे सबको मेंटेन करने के लिए और इसलिए तो मां जब बोधगया जाकर के यह कहती है कि इनका मठ देखकर के मुझे बड़ा दुख हुआ। हमको प्रश्न होगा कि वरा नगर मठ तो एस्टैब्लिश हो गया है। फिर मां को यह कहने की क्या जरूरत पड़ी? बट दैट क्राइसिस अनपढ़ी थी बाय दैट टाइम ओम