प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार समर्पण इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे।
ठाकुर ने माँ से भक्तों के आध्यात्मिक कल्याण का उत्तरदायित्व लेने का अनुरोध किया
कल हमने देखा कि किस तरह से ठाकुर मां को अपना जिम्मा लेने के लिए तैयार कर रहे हैं। किस तरह से राम श्री रामकृष्ण देव के पास में जो भक्त आते थे जो ठाकुर ने भक्त मंडली का गठन किया था। इस भक्त मंडली को अभी भविष्य में कौन मार्गदर्शन देने वाला है? इस महत कार्य के लिए मां तैयार हो रही थी। मां का एक स्वाभाविक एक लज्जा एक थी मां के भीतर में और वह स्त्री थी और उस समय के जो नीति नियम थे उसके अनुसार स्त्रियों को तो समाज में ज्यादा कोई स्थान होता नहीं है तो मां विरोध भी करती थी कि आप जो बोल रहे हैं कि मैं ये सब भक्तों का जिम्मा लूं किंतु मैं तो स्त्री हूं मैं क्या कर पाऊंगी तब ठाकुर क्या कहते करते कहते हैं कि मैंने जो किया है उससे कहीं गुना गुना ज्यादा तुमको करना होगा। तो यह जो हमारा वार्तालाप चल रहा था महाराज जी गंभीरानंद जी महाराज इस चैप्टर में जो लिखे हैं इसी में अभी हम आगे पढ़ते हैं। यह पैराग्राफ में से एक लाइन हमने ऑलरेडी पढ़ लिया है। मैं फिर से उसको रिपीट कर देता हूं। फिर हम आगे जाएंगे। गंभीरानंद
ठाकुर ने शारदा-प्रसन्न महाराज को दीक्षा लेने के लिए माँ के पास भेजा
जी महाराज क्या लिखते हैं? शुद्ध स्वरूप स्मरण करया बाको द्वारा भार्पण को ठाकुर निरस्त तो हो ते ना ठाकुर सिर्फ स्वरूप स्मरण करवा करके या तो फिर शब्दों के द्वारा वाक्यों के द्वारा भार अर्पण करके ही शांत नहीं होते थे। मां को अपना सही स्वरूप क्या है? वह याद करवा करके यहां पर यह बात हमको ख्याल में रखनी है। वैसे कि ठाकुर ने कई बार कहा है कि मां को यदि अपना सही स्वरूप पता चल जाएगा तो यहां से वह सीधी वैुंठ लोक में चली जाएगी। किंतु हमको यहां पर इस शब्द का स्वरूप शब्द का यह अर्थ नहीं करके हे ठाकुर मां को कहते थे कि हां अभी तुम्हारा यह स्वरूप है ऐसा नहीं मां का रोल क्या है भविष्य में रामकृष्ण संघ में मां का कार्य क्या होने वाला है मां की महत्ता क्या होने वाली है वो ठाकुर उनको स्मरण करवा देते थे ठाकुर की वो सहधर्मिणी थी बोलकर के ठाकुर के द्वारा जो जीवन कार्य प्रारंभ हुआ है उसी कार्य को तो मां को आगे ले जाना होगा। तो यह जो रोल है यह रोल ठाकुर मां को याद करवा देते थे और सिर्फ किंतु सिर्फ यह स्मरण करवा करके या तो फिर शब्दों के द्वारा यह कह के कि हां भविष्य में तुमको कितना ही जिम्मा लेना है। सिर्फ इसी से ठाकुर शांत नहीं होते थे। श्रीक्त शारदा प्रसन्न के स्वामी त्रिगुणातीतानंद जी के मंत्र ग्रहण जो नोबते श्री माय निकट पाठाई बार काले तहार विश्वास उत्पादनार्थे त बोलिया छिले शारदा प्रसन्न महाराज अर्थात कि भविष्य के स्वामी त्रिगुणातेतानंद जी महाराज तो ठाकुर ने उनको कहा था कि तुम नहबत में जाकर के मां के पास में से मंत्र ग्रहण करो। तो यह मंत्र लेने से लेने के समय नहबत में भेजने के समय उनको शारदा महाराज के हृदय में मां के प्रति श्रद्धा जागृत हो। इसलिए ठाकुर ने क्या कहा था? अनंत राधा माया कहोने ना जाए। कोटि कृष्ण कोटि राम हो जाए रोए। अनंत राधा की माया उसका हम वर्णन नहीं कर सकते हैं। वर्णनातीत है। वाक्यातीत है। कोटि कृष्ण कोटि राम करोड़कर करोड़ राम आएंगे जाएंगे रहेंगे। होए जाए रय होंगे जाएंगे और रहेंगे। किंतु अनंत राधार माया अनंत राधा की अनंत माया कहोने ना जाए। उसको आप कह नहीं सकते हैं। शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते हैं। जो यह हम लोग इंडियन सेजेस जो भारत में जो प्रवचन दिया था स्वामी जी ने उसमें हमने वो स्वामी जी का वो जो स्टार्टलिंग स्टेटमेंट पढ़ा था देखा था कि स्वामी जी कहते हैं कि को रामः राम कौन है? सीता के भीतर में ही तो आध्यात्मिक शक्ति का सर्वोच्च निधि माने सर्वश्रेष्ठ निधि विद्यमान है। तो उस समय हमको लगता था कि यह शायद स्वामी जी ने अपने मन से यह सब बनाया होगा या तो फिर मां को देखकर के उनको ऐसा लगा होगा। शायद ठाकुर का कोई अलग मत होगा। किंतु देखिए कि ठाकुर इसी तरह के शब्दों में मां की महिमा का वर्णन करते हैं कि अनंत राधा की माया उसको आप शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते हैं। दूसरी ओर कोटि कृष्ण कोटि राम करोड़कर करोड़ कृष्ण और राम होंगे आए रहेंगे और जाएंगे। किंतु अनंत राधा की जो अनंत माया है उसकी जो गंभीरता और गहनता है शायद राम और कृष्ण भी इनको उनके जो अंतरस्तल में स्पर्श नहीं कर पाएंगे। उसकी जो गंभीरता कितनी है उसका उनको अंदाज नहीं आ पाएगा। श्री श्री माता ठाकुरानी निश्चय से दिन शमी पागो तो शारदा के दीक्षा दे मां मां ने निश्चय उस दिन उनके पास में दीक्षा लेने के लिए आए हुए शारदा महाराज को दीक्षा नहीं दी थी कारण तनी शुखे बोलिया छिलेन उसका कारण है मां ने अपने खुद के शब्दों में यह कहा था स्वामी जोगानंद ताहार प्रथम मंत्रो शिष्य स्वामी योगानंद ही थे उनके प्रथम मंत्र शिष्य शारदा महाराज भ्राता श्रीजुक्त तो आशुतोष मित्र अवश्य बोले जे तीन मायरे निकट मंत्र दिखा प्राप्त होइया छिलेन किंतु आशुतोष मित्र अर्थात कि शारदा महाराज के भाई उन्होंने अवश्य कहा था कि शारदा महाराज ही मां के पास में उन्होंने मां के पास में ही मंत्र दीक्षा प्राप्त की थी किंतु कब की थी पहले कौन था यह अभी पता नहीं जो भी है खूब संभवत इहा परवर्ती घटना हो सकता है पूरी संभावना है कि शारदा महाराज ने मां के पास में जो दीक्षा ग्रहण की वो योगानंद जी महाराज को जो मां ने दीक्षा दी इसके बाद की घटना है से जहां हो वो जो भी है आमरा आपत तो ए बटी माय दी खोते अनुधा ना कोरिया ठाकुर दी होते ही कोते छ इस क्षण हम इस घटना का विवरण मां की दृष्टि से नहीं देकर के ठाकुर की दृष्टि से ही कर रहे हैं। ठाकुर ने शारदा महाराज को मां के पास में भेजा था। अभी मां ने उनको दीक्षा दी नहीं दी वह हमको पता नहीं है। किंतु यह पक्का पता है कि शारदा महाराज मां के पास में अवश्य दीक्षा की प्रार्थना लेकर के गए थे। अभी उन अभी यह भी हमको पता है आशुतोष मित्र शारदा महाराज के भाई उन्होंने यह पक्के पाए हमने एकदम पक्का कहा है हमको कि शारदा महाराज मां के ही शिष्य थे। तो यह घटना शायद योगानंद महाराज को दीक्षा देने के बाद में हुई होगी जो भी
लाटू महाराज दक्षिणेश्वर में माँ की सेवा प्रारम्भ करते है
भक्त वृद्धि शंगेशंगे श्री माय जखन रोटी करा पानशाजा इत्यादि काजे शारीरिक श्रम खूबई बािया छे ठीक से समय श्रीक्त तो लाटू स्वामी अद्भुतानंद जी दक्षिणेश्वरे आशिया बास कोते लागी लेन भक्तों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ में ही जब मां का रोटी बनाना, पान सजाना वगैरह का वगैरह जो कार्य है उसमें शारीरिक श्रम बढ़ता चला है। उसी समय ठीक उसी समय लाटू महाराज अर्थात स्वामी अद्भुतानंद जी दक्षिणेश्वर में आकर के रहने लगे। लाटू महाराज की कहानी तो हमको पता है कि वह जब ठाकुर को अभी क्या था कि रामचंद्र दत्त उनके सेवक थे। उनके नौकर थे यह लाटू। तो फिर रामचंद्र को फिर ठाकुर के पास में बीच-बीच में यह मिठाई है, फल है वगैरह उनके पास में भेजना रहता था। तो वह क्या करते? लाटू के माध्यम से वह ठाकुर के पास में भेजते। यहां पर लाटू महाराज ठाकुर के पास में वह फल, मिठाई वगैरह लेकर के आते। ठाकुर के श्री चरण में अर्पण करते और फिर ठाकुर तो वैसे तो किसी को छोड़ने वाले नहीं है। ठाकुर तो सबके हृदय का यह संस्कार देखते थे। तो ठाकुर ने देख लिया कि भले ही चाहे यह रामबाबू का नौकर हो लाटू किंतु उसके हृदय जो है वह सोने का हृदय है। बड़े ही शुद्ध सात्विक संस्कार इसके भीतर में है। इसलिए फिर ठाकुर ने उसको उपदेश देकर के आध्यात्मिक मार्गदर्शन देकर के धीरे-धीरे करके अपने पास में खींच लिया। अभी ऐसा होने लगा कि लाटू फिर अपने वह रामबाबू के घर जाकर के काम करने की वजह वहां पर दक्षिणेश्वर में ही ज्यादा समय बिताने लगा। तो एक बार ठाकुर कहते भी है लाटू को कि अरे लेटो तुम बीच-बीच में जाकर के रामबाबू का काम करके आओ वरना तो तुम पैसा लेते हो रामबाबू का और पड़े रहते हो यहां पे। ऐसा कैसे चलेगा? तो देखिए कि यह ठाकुर स्वयं यह बात रामबाबू को कहते हैं। अभी रामबाबू को तो पता है कि यह सब ठाकुर की ही लीला है। उन्होंने ही इस बेचारे का ब्रेन वाश करके अपने पास में रख लिया है। ठाकुर की इच्छा नहीं होती तो थोड़ी ना लाटू महाराज ठाकुर के पास रह जाते। यह तो हृदय का आकर्षण है। तो यह हृदय के आकर्षण से लाटू ठाकुर के पास में रह रहा है। तो फिर रामबाबू ने भी कहा कि अच्छा महाशय एक काम कीजिए लाटू भले यहां पर रहे आपकी सेवा के लिए मैं अपने घर के लिए और कोई व्यवस्था कर दूंगा। तो तब से लेकर के लाटू महाराज ठाकुर के पास में नियमित रूप से रह रहे थे। तो यह उसी समय की घटना है कि यह लाटू महाराज वहां पर आए हैं दक्षिणेश्वर में ठाकुर के पास में रहने के लिए और यहां पर भक्तों की संख्या तो बढ़ती ही जाती है और फिर जैसे होता था कि कोई भक्त कोलकाता
माँ दक्षिणेश्वर में भक्तो के लिए भोजन बनाती है
से आएगा तो आकर के वह गाड़ी में से उतरेगा घोड़ा गाड़ी में से तो उतरने के समय ही वह पुकार करके कहेगा अभी रामबाबू ही खास करके कि आज मैं रोटी और दाल यह खाऊंगा ऐसा कुछ बोल देगा। उस उनको पता है कि नौबत में मां रह रही है और मां ठाकुर के लिए और भक्तों के लिए आहार बनाती है। खाना बनाती है। तो मां ने जैसे ही यह सुन लिया वैसे ही साथ-साथ में वह खाना बनाने का प्रयास वो कार्य प्रारंभ कर देगी। अभी वह नरेंद्र है। नरेंद्र जब आएगा कोलकाता से ठाकुर के पास में तो ठाकुर कहेंगे मां को कि इसका खाना बनाओ। तो अभी मां को तो पता है नरन आया है तो वह तो खाना खाएगा ही। तो पहले पहले एक बार मां ने जिस तरह का खाना बनाया अभी मां को तो क्या है कि ठाकुर के लिए खाना बनाने का अभ्यास था तो तो वो पतली दाल है वो पानी वाली ये सब्जी है पतली पतली रोटियां है ऐसा सब बनाएगी तो फिर ठाकुर ने एक बार नरेंद्र ने मां के हाथ का खाना खाया उसके बाद में ठाकुर ने नरेंद्र को पूछा क्यों रे तुमको खाना कैसा लगा तो नरेंद्र उत्तर देता है बहुत अच्छा महाशय ऐसा लगा जैसे मैं रोगी रोगी का पथ्य खा रहा हूं। रोगी के लिए जो डाइट बनाते हैं जिसको कि पेट का रोग है उनके लिए जो डाइट बनाते हैं इस तरह का डाइट खा रहा हूं। ऐसा मुझे लगा। तो फिर ठाकुर समझ गए कि यहां पर प्रॉब्लम क्या हुआ है। उनके खुद के लिए जिस तरह का खाना मां बनाती थी उसी तरह का खाना मां ने नरेंद्र के लिए बनाया है। तो फिर ठाकुर ने नहबत में जाकर के मां को कहा कि नरेंद्र जब आता है तो मोटी-मोटी रोटी और यह गाढ़ी चने की दाल ऐसा चने की छोले की दाल जो भी है वह तुम गाढ़ी दाल नरेंद्र के लिए बना देना। जब ठाकुर ने ऐसा कहा तब फिर मां उस तरह का आहार नरेंद्र के लिए प्रस्तुत करती थी। तो देखिए कि अभी तो यह नियमित रूप से यह भक्तों का आना जाना दक्षिणेश्वर में बढ़ रहा है। तो मां को अभी सिर्फ ठाकुर के लिए ही नहीं सब भक्तों के लिए भी खाना बनाना है। और फिर क्या है पता है? देखिए ठाकुर का यह जो एथिक्स
सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना: श्रीरामकृष्ण और विवेकानन्द के अनुसार सामाजिक/धार्मिक संस्थाओं में पैसों का हिसाब
जिसको कहते हैं ना वह बड़ा स्ट्रांग था। जैसे कि रामकृष्ण संघ की रचना करने के समय मिशन की रचना करने के समय स्वामी जी ने जो नियमावली बनाई है उसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है शाकेर कोड़ी माछे जावे ना माछेर कोड़ी शाके जावेना अर्थात कि हमारे पास में जो डोनेशन आता है भक्तों के द्वारा तो यह भक्त यदि आपको पैसा देता है यह कह के कि यह सब्जी खरीदने के लिए पैसा दे रहा हूं तो इस पैसों से सब्जी ही खरीदनी है मछली नहीं खरीदनी और यदि भक्त यह कह के पैसा देता है कि मछली खरीदने के लिए पैसा दे रहा हूं तो उस पैसों से मछली ही खरीदनी है। सब्जी नहीं खरीदनी। इसके लिए मछली का पैसा सब्जी में नहीं जाना चाहिए। सब्जी का पैसा मछली में नहीं जाना चाहिए। यहां पर स्वामी जी के कहने का आशय क्या है कि कोई भी एक पब्लिक ट्रस्ट कंपनी होती है जो कि लोगों के सहायता के ऊपर में चलती है। वहां का जो अकाउंटिंग सिस्टम है बड़ा ही स्पष्ट और क्लियर होना चाहिए। तभी लोग भरोसा करके हमको पैसा देंगे। और यह गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का भी उस समय तो क्या था ट्रस्ट रूल्स मुझे पता नहीं। किंतु आजकल तो यह बड़ा क्लियर है कि आपके पास में जो डिपार्ट अकाउंट हेड्स जो होते हैं जैसे कि यह डिस्पेंसरी का पैसा है यह स्कूल का अकाउंट है यह मंदिर का अकाउंट है तो मंदिर के अकाउंट में या मंदिर के हेड में वह अकाउंट ऐड में जो पैसा है वह ना ही आप डिस्पेंसरी के लिए खर्च कर सकते हैं। डिस्पेंसरी के लिए जो पैसा पड़ा है ना ही आप उसको मंदिर में खर्च कर सकते हैं। तो यह जो स्वामी जी का एक स्ट्रिक्ट रूल था वह आज से 100 सवा5 साल पहले स्वामी जी यह रूल एस्टैब्लिश करके गए थे जिससे कि यह जो पब्लिक ट्रस्ट जो ऑर्गेनाइजेशन होते हैं वो लंबे समय तक भक्तों का भरोसा बना रख के भक्तों के पास में यदि भक्तों का भरोसा बना रहेगा इस तरह के ऑर्गेनाइजेशन पे तभी वे लोग लंबे समय तक किसी ना किसी तरह की दान दक्षिणा करते रहेंगे। तो यहां पर भी ठाकुर का यह जो मोरल क्लेरिटी बड़ा ही क्लियर था। वह कहते थे कि कालीवाड़ी की जो रचना है कालीवाड़ी का निर्माण करने के बाद में रानी रासमणि ने वहां पे ये जो भंडार चालू किया है वह है साधु और कंगालियों को देने के लिए और वहां पे ही यह साधु है, कंगाली है यानी कि गरीब लोग हैं वे लोग भिक्षा प्राप्त करेंगे। ठाकुर के पास में जो यह भक्तगण आते हैं उन लोगों की यह जो आर्थिक अवस्था तो इतनी बुरी नहीं है कि वे लोग सब समय जाकर के वहां पर खाना खाते रहे। इसलिए हमने कथामृत में भी देखा कि मास्टर महाशय वहां पर रहने के लिए आते हैं। तो ठाकुर उनको कहते हैं कि देखो यह काली मंदिर में जो भंडार गृह है वहां का आहार जो है गरीब लोगों के लिए है। तुमको उसमें से आहार करना उचित नहीं है। बोलकर के फिर मास्टर महाशय अपने साथ में एक रसोइए को लेकर के आए थे जो कि उनके लिए खाना पका देगा। अभी ऐसा नहीं है कि ठाकुर कभी भी भक्तों को काली मंदिर के भंडार का खाना नहीं खाने देते थे। इनफैक्ट यह एक घटना है कि
कहानी: स्वामी अखण्डानन्द की दैहिक कठोरता और श्रीरामकृष्ण का मध्यम पथ
अखंडानंद जी को ठाकुर कहते हैं ये गंगाधर महाराज को कि तुम जाओ और मां काली का प्रसाद ग्रहण करके आओ। अभी यह क्या था पता है? इस तरह से जब ठाकुर कहते थे तो उसका एक पार्टिकुलर लॉजिक रहता था। जैसे कि यह अखंडानंद जी महाराज उस समय बहुत ज्यादा तपस्या करते थे। वो माने स्ना स्नान कितनी बार करेंगे सर में तेल नहीं डालेंगे। फिर यह हरितकी खाते रहेंगे। प्राणायाम करते रहेंगे। यह जो बाल ब्रह्मचारियों को जो तपस्या करनी है, उसका कुछ ज्यादा ही माने वो बढ़ा चढ़ा करके वह तपस्या करते थे। अभी उनका फिर ऐसा था कि यह जो वेजिटेरियन खाना है यह शाकाहार है वही करेंगे तो फिर उनके भीतर का यह एक तरह का यह सब चीजें क्या है ऑर्थोडॉक्सी एक तरह की रिजिडिटी हमारे भीतर में प्रवेश कर जाती है तो वह फिर हमें जो यह स्पिरिचुअल जो वाइड स्पेक्ट्रम है रिचनेस जो है उसको एक्सप्लोर नहीं करने देता दूसरा कि एक गुप्त अहंकार आकर के खड़ा रह जाता है कि हां मैं तपस्या कर रहा हूं। मैं इस तरह से सर पर तेल नहीं डालता। मैं इस तरह से दिन भर हरी तकी खाता हूं। मैं इतनी बार स्नान करता हूं। मैं यह मांसाहार नहीं करता। ऐसा बोलकर के एक गुप्त अहंकार आ जाएगा। और फिर दूसरे लोग जब यह सब करते होंगे तो उनके ऊपर में एक तरह की घृणा आ जाएगी। तो यह जो फनेटिसिज्म गंगाधर महाराज में ना आ जाए। इसलिए ठाकुर ने उनको एक बार कहा कि तुम जाओ काली मंदिर में जाकर के मां काली का प्रसाद खाकर के आओ। अभी मां काली को तो फिर यह मांसाहार भी ऑफर किया जाता है। मछली भी ऑफर की जाती है। तो गंगाधर महाराज सोचने लगे कि ठाकुर मुझे विष्णु घर में भी जाकर के प्रसाद लेने को कह सकते थे। वहां पर भगवान विष्णु राधाकांत का मंदिर था। जिनको कि यह शाकाहार ऑफर किया जाता था। उनको यह मांसाहार वैष्णव प्रथा के अनुसार भगवान विष्णु को यह मांसाहार नहीं दिया जाएगा। तो ठाकुर यदि मुझे कहना चाहते थे, ठाकुर यदि यह चाहते थे कि मैं यहां का प्रसाद ग्रहण करूं तो वह तो ऐसा भी कह सकते थे कि मैं विष्णु घर में जो भगवान विष्णु को जो ऑफर किया हुआ प्रसाद है, मैं वह ग्रहण करूं। किंतु ऐसा नहीं करके फिर मुझे ऐसा क्यों कहा कि मैं मां काली का प्रसाद खाऊं। ऐसा सोचते-सचते वह भंडार ग्रह की ओर जा रहे हैं। तो उनके मन में शायद ऐसा एक आ गया होगा कि ठाकुर ने भले ही चाहे मां काली का प्रसाद लेने को कहा हो किंतु मैं जाकर के भगवान विष्णु का ही प्रसाद लूंगा। तो ऐसा सोच कर के जैसे ही उन्होंने पीछे मुड़कर के देखा तो देखा कि ठाकुर वहीं पर खड़े हैं अपने कमरे के वरांदे में। वह देख रहे हैं कि वह गंगाधर महाराज कहां जा रहे हैं। तो बोल कर के जब गंगाधर महाराज ने देखा वह समझ गए कि हां ठाकुर मेरे पर नजर रख रहे हैं और उनकी यह इच्छा है कि मैं सही-सही मां काली का ही प्रसाद ग्रहण करूं। तो फिर वो मां काली का मांसाहार उन्होंने ग्रहण किया था। उस दिन यह क्या है कि अहम तोड़ने के लिए। बाबू राम महाराज
कहानी: मांसाहार न करने का स्वामी प्रेमानन्द का गर्व-खण्डन
की स्वामी प्रेमानंद जी की एग्जैक्टली यही कहानी कि वराह नगर मठ में वह खुद तो मछली नहीं खाते थे। और शायद ऐसा हो सकता है। शायद हो सकता है कि मुंह से नहीं बोले होंगे। किंतु मन में ही मन में ऐसा सोचते होंगे कि ठाकुर की यह जो बाकी जो शिष्य हैं त्यागी संतान है वह मछली खा रहे हैं। अर्थात कि उनके भीतर में इतनी पवित्रता नहीं है। ऐसा सोच कर के एक दिन सोए होंगे रात को। एकाएक ठाकुर ने सपने में आकर के उनको जो डांटा है। तुमको ये शर्म नहीं आती। मेरे में जो लड़के हैं बेचारे थोड़ा सा मछली खा रहे हैं और तुम उनकी घृणा करते हो। ऐसा बोलकर के ठाकुर ने जो डांटा फटाक करके बाबूराम महाराज नींद से उठ गए। दौड़ के वह किचन में गए जहां पर वो मछली रंध करके उसका थोड़ा सा अंश पड़ा होगा तो उंगली से स्पर्श करके अपने जिकवा के ऊपर में एक बार स्पर्श करवाया। यानी कि थोड़ा सा जब यह मछली खा लिया तो फिर भीतर का अहंकार टूट गया। अभी मैं भी मछली खाता हूं तो दूसरों को मैं कैसे कहूं कि भाई आप लोग मछली मत खाइए। तो यह ठाकुर एक पर्टिकुलर पॉइंट आउट करने के लिए अवश्य इनको यह भक्तों को वहां का आहार प्रसाद ग्रहण करवाते थे।
कहानी: माँ काली का प्रसाद और श्रीरामकृष्ण के त्याग पे स्वामी योगानन्द का संदेह
अब जैसे कि यह योगेंद्र महाराज का ही एक किस्सा है कि एक बार वह काली मंदिर का प्रसाद ठाकुर के कमरे में आने में विलंब हो रहा है। देरी हो रही है। तो ठाकुर व्याकुल होकर के इधर से उधर टहल रहे हैं और यह कह रहे हैं कि इस इस समय तक तो मां काली का प्रसाद आ जाना चाहिए। क्यों नहीं आ रहा है? तो फिर कुछ देर के बाद में वह कहते हैं कि ठाकुर कहते हैं मैं जाकर के वह जो कोठारी जो है वहां का चीफ एग्जीक्यूटिव उसको जाकर के मैं पूछता हूं कि क्यों अभी तक प्रसाद नहीं आया। बोलकर के ठाकुर वह जो चप्पल पहन के वह कोठारी की ऑफिस की ओर जा रहे हैं। अभी योगेंद्र योगेंद्र महाराज जो है वह वहां पर खड़े हैं। सब कुछ देख रहे हैं। तो उस समय उनके मन में यह विचार आया कि ठाकुर आखिर में तो चाल कोला बांधा बामुन अर्थात कि यह जो राइस है और केला है वो जो जाकर के जो विधि करता है उनको दक्षिणा में यह राइस और केला मिलता है। तो यह जो राइस और केला ग्रहण करने वाले ब्राह्मण ही तो है। आखिर में दक्षिणा ग्रहण करने वाले ब्राह्मण ही तो है। आखिर में ऐसा विचार योगिन महाराज के मन में आया। जैसे ही ठाकुर वापस आए तो योगिन महाराज के साथ में वह जो घटना हुई थी कि ठाकुर मध्य रात्रि को झाऊला की ओर जा रहे हैं तो उनके मन में यह संदेह हो गया कि ठाकुर जा रहे हैं मां के कमरे में नहबत में तो कैसा वह बाहर आकर के देख रहे हैं। तो फिर जैसे ठाकुर को झाऊला की ओर से आते देखा उनके चेहरे पर जो गिल्ट फीलिंग था ठाकुर इमीडिएटली समझ गए कि मेरे प्रति इसके मन में किसी तरह का संदेह उदय हुआ है। तो यहां पर भी ऐसा ही हुआ। ठाकुर जब वापस आए तो देख लिए कि वह योगेन महाराज के चेहरे पर संदेह की रेखा दिख रही है। तो ठाकुर ने इमीडिएटली कहा देखो रानी रासमणि ने यह भंडार ग्रुह वगैरह ये जो पैसा देकर के गई है जिससे कि यह गरीब भिखारियों को साधु संतों को यहां पे आहार मिले। तो किंतु यह जो यहां के कर्मचारी जो है वे लोगों का क्या है? कोई ना कोई उपपत्नी रखे हुए हैं कहीं पर और यह जो भगवान का जो प्रसाद है जाकर के उनको ऑफर कर देंगे। इससे बेटर है कि प्रसाद मेरे कमरे में आए और मैं यहां से भक्तों को डिस्ट्रीब्यूट करूंगा जो कि सही-सही भक्त है उनको जिससे कि जिस पर्पस के लिए रानी ने रासमणि ने पैसा दिया है वो पपस जो है वो उसका यह सही-सही इस्तेमाल होगा। तो ठाकुर का यह जो
सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना: श्रीरामकृष्ण और विवेकानन्द के अनुसार सामाजिक/धार्मिक संस्थाओं में पैसों का हिसाब - 2
एथिक्स एंड मोरालिटी वाला जो मामला है वह बड़ा ही क्लियर है। इसलिए यहां पर जब यह ठाकुर के पास में यह भक्तों की संख्या बढ़ने लगी मां तो आई थी दक्षिणेश्वर में 1872 उसमें उस साल में और वहां से लेकर के ऑलमोस्ट 10 साल तक ऑलमोस्ट 9 साल तक 18 1880 1881 तक बहुत ज्यादा कोई भक्त ठाकुर के पास में नहीं आते थे। किंतु यह 1881 1882 से प्रारंभ होकर के आखिरी जो तीन-चार साल थे ठाकुर के जीवन के 1882 83 84 85 86 इतने साल तक ठाकुर के पास में आने वाले भक्तों की संख्या जैसे बढ़ती ही जा रही है। बढ़ती ही जा रही है। तो उस समय जितने भी भक्त आते थे उनका आहार मां को तैयार करना होता था और उसके लिए नेचुरली है कि यह मां को शारीरिक कष्ट होगा तो उसी समय मां को सहाय करने के लिए ठाकुर ने लाटू महाराज को वहां पे अपॉइंट किया था।
लाटू महाराज दक्षिणेश्वर में माँ की सेवा प्रारम्भ करते है - 2
प्रथम प्रथम तनी प्राय पंचवटी प्रवृत्ति तपस्या पूत स्थाने अनेक खण ध्याने बसिया था कि तेन इ हाथ उहाते दिन काटिया ज तो लाटू महाराज जब आए थे तो पहले पहले कुछ दिन प्रपंचवटी जैसी तपस्या से पूत तपस्या पूत अर्थात कि तपस्या से भरपूर जगहों पे बहुत देरी तक ध्यान में बैठे रहते और इसी से उनका दिन चला जाता। आखिर में ठाकुर के पास में आए क्यों है? साधन भजन करने के लिए ईश्वर प्राप्ति करने के लिए। ठाकुर ने ही तो उनको कह दिया है कि ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। तो फिर उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए क्या करना होगा? तो नेचुरली है कि साधन भजन करना होगा। तो वह साधन भजन कहां पर करेंगे? तो गंगा के किनारे बैठकर के कभी चांदनी के घाट के ऊपर में बैठकर के कभी यह पंचवटी में जहां पर ठाकुर ने यह अद्वैत वेदांत की साधना की थी। कभी यह बिल्व तल के नीचे में बिल्व का वृक्ष है उसके नीचे में बैठकर के जहां पे कि ठाकुर ने तंत्र साधना की थी। यह पूरा जो जगह है ठाकुर के कमरे से बाहर का और इवन ठाकुर के कमरे का वो तपस्या से भरपूर जगह है। तो यह सब जगहों पर बैठकर के लाटू महाराज जब ध्यान किया करते थे शुरू शुरू में एक दिन झऊ तलार दिखे शौचे जाब पथे ठाकुर देखले श्री मां मैदा ठासीते छेन आर एकू दूर गंगा तीरे लाटू निश्चल भावे बसिया आ छे एक दिन झाऊ तला की और शौच जाने के लिए ठाकुर जब जा रहे थे अभी उस समय तो इंडोर प्लंबिंग था नहीं वह तो ये बाहर में पेड़ों के नीचे में ही जाना पड़ता था। तो झाऊ बोलकर के एक वृक्ष होता है। उस वो वहां के वो बहुत सारे झाऊ के वृक्ष थे। गंगा के किनारे उसके नीचे में सभी लोग शौच के लिए जाते थे। तो ठाकुर भी उस समय झाऊ तला अर्थात कि उसके नीचे का भाग तो यह झाऊ तला की ओर शौच के लिए जा रहे थे। उस समय उन्होंने देखा कि लाटू महाराज गंगा के किनारे स्थिर होकर के ध्यान कर रहे हैं। और फिर देखा कि मां जो है मैदा ठाशी छन अर्थात कि यह जो लुच्ची बनाने के लिए पूरी बनाने के लिए मैदे की जो पूरी होती है उसको बनाने के लिए आटा तैयार कर रही है। आटा प्रस्तुत कर रही है। अभी स्त्रियों को तो पता ही होगा। सभी बहनों को पता ही होगा कि रोटी या तो फिर यह पूरी बनाने के लिए जब आटा बनाया जाता है तो उसके लिए कितना मेहनत लगता है। आपको आटे में पानी डाल के उसको बार-बार उसको प्रेस करना पड़ता है। स्क्वीज़ करना पड़ता है। तब कहीं जाकर के एक पेस्ट की तरह आटा तैयार होता है। मुझे याद है कि मेरे घर में मां भी मेरी इस तरह से आटा बनाती थी। फिर एक बार हमने एक नया एक वो जो होता है ना घंटी जिसको कहते हैं एक ये आटा पीसने वाला एक आता है मशीन वो हमने नया परचेस किया था तो उसमें एक यह भी फीचर था कि आप उसमें आप यह जो रोटी बनाने के लिए जो आटा बनता है आटे में पानी डालकर के जो पेस्ट बनाया जाता है वह उसमें डाल के आप बना सकते हैं। तो कुछ दिन तक मेरी मां ने इस तरह से उसमें यह रोटी का आटा बनाने का प्रयास किया था। किंतु देखिए कि यह जो आटा बनाने का जो प्रोसेस है उसमें क्या है कि यह जो आटे के भीतर में पानी और ऑयल थोड़ा सा वो डालकर के बार-बार उसको यह स्क्वीज़ करना पड़ता है, ट्विस्ट करना पड़ता है। ऐसा करना पड़ता है। आप जितना जोर उसमें डालेंगे, जितना लंबे समय तक उसको करेंगे, उतना ही रोटी स्मूथ होगा और उतना ही रोटी फूलेगा और उतना ही रोटी का टेस्ट अच्छा होगा। जो अच्छी गृहिणी होती है जिनका कि हाथों का खाना अच्छा बनता है उनका यह सिद्ध हस्त होता है कि कितने समय कौन से समय कितना पानी डाला जाए कौन से समय कितना ऑयल डाला जाए यह पूरा आर्ट है। आप यह जो मशीन में एक साथ में सब डाल के मशीन चला देंगे और मशीन ऐसे गोल-गोल घूमेगा और वह पेस्ट बना देगा। वह पेस्ट से जो रोटी बनेगी उसका टेस्ट जो एक सही मां जो होती है वह जो इस तरह से आटा बनाती है रोटी का पेस्ट जो बनाती है उसमें कहीं डिफरेंस होगा। कुछ दिनों तक मेरी मां ने इस तरह से बनाया फिर हम सभी ने चिल्लाना शुरू कर दिया। अरे ये छोड़ो यह बेकार लगता है। तुम जिस तरह से बना रही थी वैसे ही बनाओ। तो मेरी मां फिर से उस तरह से बनाने लगी। किंतु उस समय हमको पता नहीं चलता था कि यह जो पानी और आटा दोनों को मिक्स करने करके उसको स्क्वीज़ करके जो पेस्ट बनाना है उसमें कितना मेहनत लगता है। वो हमको समझ में नहीं आ रहा था। हमको इतना ही लग पता चलता था कि मां जो आटा बनाती है उसका रोटी का टेस्ट वो मशीन के आटे की रोटी से कहीं ज्यादा अच्छा है। तो देखिए कि मां भी यहां पे अपने हाथों से इस तरह से आटा आटे की पेस्ट बना रही है। उस समय ठाकुर ने देखा कि लाटू वहां पर बैठकर के ध्यान कर रहा है। ठाकुर तखन ताहा के उठाइया भ्रम शोधनार्थ बोल लेन ठाकुर ने उसी समय लाटू महाराज को उठा के उनका यह जो भ्रम था कि ठाकुर के पास में आकर के जब ध्यान करना है इस भ्रम को शोधन करने के लिए भ्रम को तोड़ देने के लिए ठाकुर ने कहा ओ रे लेटो तू एकने बोिश और उननी जे नोबोते रूटी बेला लोक पा नाम ठाकुर ने कहा अरे लेटो तुम यहां पे बैठे हुए हो और उनको नहबत में रोटी बेलने के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं। उनको अर्थात की मां को तार पर लाटू के नहबते लया गया तनी बोली लेन इसके बाद में लाटू महाराज को नहबत में ले जाकर के उन्होंने कहा ए छलेटी बे शुद्ध शत यह लड़का बड़ा ही शुद्ध सात्विक है तुम्हार जखजा प्रयोजन हबे एक के बोलो एक कोरे देवे तुमको जब जो भी प्रयोजन होगा तुम इसको कहना यह कर देगा तदोबधी लाटू श्री माय परिवार भुक्त होइलेन उस दिन से लाटू श्री मां के परिवार में स्थान प्राप्त किया। देखिए यह जो पहला जो
कहानी: भक्त माँ सारदा का ध्यान कर रही है किन्तु माँ स्वयं वहां पे खाना बना रही है
स्टेटमेंट है ठाकुर का कि अरे लेटो तुम यहां पर बैठे हो। वहां पर उनको यह रोटी बेलने के लिए आदमी नहीं मिल रहा है। एग्जैक्टली यही घटना इस तरह की घटना जय राम बाटी में हुई थी। एक स्त्री भक्त है। मां का दर्शन प्राप्त करने के लिए जयराम बाटी गई है और वहां पर वह बाहर में सुबह को वहां पर मां के कमरे में के सामने बैठकर के ध्यान कर रही है। तो उस समय मां क्या कर रही थी कि वहां वो अपना जो घर था मां का वो तो एक छोटा सा घर जिस जिसने भी जय राम भाटी दर्शन का सौभाग्य मिला है पता होगा। मां का वो पुराना घर एक छोटी सी सिंगल रूम कुटिया ही तो है और तो कुछ है नहीं तो उसके भीतर में बैठकर के शायद वहां पर नहीं वो खाना बनाने का जगह वो किचन जो था वो एक सेपरेट घर था एक सेपरेट एक कमरा था जो भी है वो कहां जहां कहीं पर भी हो मां बैठकर के इस तरह से रोटी के लिए आटा तैयार कर रही है और मां ने देखा वहां पर वरांडे में बैठकर के वो लेडी डिवोटी है वो ध्यान कर रही है तो मां ने हंसते-हंसते कहा इस लेडी को कि अरे बेटी तुम जिसका ध्यान कर रही हो वह यहां पे यह रोटी पका रही है। तो जैसे ही मां ने ऐसा कहा वो लेडी डिवोटी बेचारी शर्मिंदा हो गई और वो इमीडिएटली उठकर के मां को सहाय करने के
सेवा है श्रेष्ठ साधना: गुरु सेवा और दरिद्र-नारायण सेवा
लिए आई। देखिए कि जब तक अवतार रहते हैं इस देह में पृथ्वी के ऊपर में तब तक यह अवतार की सेवा ही सर्वोच्च साधना है। आप देख लीजिए कि ऐसा नहीं है कि ठाकुर के पास में जो भक्तगण आते थे उसमें यह त्यागी संतान ही बहुत ज्यादा जप ध्यान करते थे और दूसरे लोग नहीं करते थे। ऐसा कुछ नहीं है। यह जो हाजरा महाशय हाजरा महाशय का था कि ठाकुर के कमरे के सामने ही बैठकर के दिन रात वो माला घुमाते रहेंगे। दिन रात जप करते रहेंगे। और फिर मन में मन में यह अहंकार भी बैठ गया है। और जो भी आते हैं वहां पे सबको कहते हैं कि यह राखाल वगैरह तो हो करे बैड आए। अर्थात कि हल्लागुल्ला करते-करते इधर-उधर घूमते रहते हैं। जप कहां करते हैं बैठ के। एक इस तरह का अभिमान उनके मन में आ गया था। किंतु देखिए कि ठाकुर ने कहा है दो बातें यहां पे एक जब आपको साधना में सिद्धि प्राप्त करनी होती है उस समय यह जो सेवा है यह बहुत ही एक श्रेष्ठ माध्यम है आध्यात्मिक उन्नति करने का और फिर ठाकुर ने साथ में यह भी कहा था सेवा के साथ में चाहिए संयम। ठाकुर ने कहा था कि कोलकाता में लोग लाखों लाखों जप करते हैं। खान की परजन तो जॉब करे नीचे छे अर्थात कि यह जो इस तरह की स्त्रियां जिनका चरित्र अच्छा नहीं है इस तरह वे लोग भी लाखों लाखों जप कर लेते हैं। किंतु होता क्यों नहीं है? क्योंकि जिस घटी में यह पानी डालते हैं, वह घटी नीचे में से टूटी हुई है। सब पानी बह जाता है, निकल जाता है। तो वैसे ही आपको सेवा और संयम यह दो यदि है हमारे जीवन में तभी हमारा जो आध्यात्मिक साधना है, वह कोई उसमें यह फल दिखाई देंगे। उसका कोई रिजल्ट दिखाई देगा। वरना तो यह टूटी हुई घटी है नीचे से। उसमें आप पानी डालते ही जा रहे हैं, डालते ही जा रहे हैं। आप कंप्लेन करेंगे कुछ समय के बाद में यह घटी तो भरती ही नहीं है। तो कैसे भरने वाली है? अच्छा अभी इसके बाद में एक दूसरा भी प्रश्न हो सकता है कि ठाकुर के रहते-रहते तो चलो गुरु भाई उनकी और मां की सेवा करके धन्य हो गए। आज हमारे लिए क्या है? आज अह अभी देखिए यदि आप ट्रेडिशनल वैष्णव अह सिस्टम में विश्वास करते हैं तो फिर यही जैसे कि शशि महाराज ने ठाकुर की महासमाधि के फौरन बाद ठाकुर का जो अस्थि कलश है उसकी उस तरह से सेवा करना शुरू कर दिया जिस तरह से शशि महाराज जीवंत ठाकुर की सेवा करते थे। उनके लिए जो दातून है अर्थात कि ये जो नीम की डाल ये जो अभी आज की तरह ब्रश तो नहीं थे तो नीम की डाल ये लोग चबाते थे दांत साफ करने के लिए तो अभी क्या है ठाकुर के जो यह है गम्स पेड़ा पेड़वे जिसको कहते हैं गम्स जो होते हैं बड़े ही कोमल थे अभी यह वैसे ही डाल उनके आप आप दांतों को चिबाने के लिए आप दे देंगे तो तो उनके गम्स जो है उसमें यह स्क्रैच हो जाएगा ब्लीडिंग होने लगेगा। अर्थात कि शशि महाराज यह जो नीम की एक छोटी सी ब्रांच तोड़ करके उसको बड़े ही अच्छे से उसको पत्थर से मार मार करके एकदम उसके यह जो है रेशे रेशे बना देते थे जो कि बड़ी कोमल हो जाती थी। फिर ठाकुर को ऑफर करते थे। जिससे कि ठाकुर जब उस दातून को चिबाए तो उसके यह जो कोई एक शार्प कुछ एक हेयर रह गया है वह कहीं उनके गम्स में स्क्रैच ना कर दे। तो इस तरह से यह शशि महाराज जिस तरह से जीवंत ठाकुर की सेवा करते थे वैसे ही ठाकुर की अस्थियों की ठाकुर के यह जो पट है ठाकुर का चित्र है उसकी सेवा करते थे वराह नगर मठ में एक दिन
कहानी: शशी महाराज और लाटू महाराज के बीच झगड़ा
की सुंदर घटना है कि ठाकुर के लिए शशि महाराज क्या करते थे सुबह उठकर के वह जो कोई एक कढ़ाई होगी उसमें कुछ बाल भोग बना के ठाकुर को देते होंगे तो एक दिन ऐसा हुआ कि उस दिन लाटू गुरु महाराज को थोड़ा सा भूख लग गया तो उन्होंने शायद आधी रात को उठकर के जो कढ़ाई जिसमें कि ठाकुर के लिए बाल भोग अर्थात कि सुबह की मंगल आरती के लिए जो मंगल आरती के समय जो ठाकुर को ऑफरिंग किया जाता है नैवेद्य जिस कढ़ाई में यह शशि महाराज बनाते थे बाल भोग ठाकुर का उसी में लाटू महाराज ने रात में उठकर के उसमें छोला ना कि ऐसा कोई दाल बनाकर के अपने लिए बनाया और उसको खा के शायद सो गए होंगे और उन्होंने वह कढ़ाई धोया नहीं। अभी यह सुबह को अर्ली मॉर्निंग शशि महाराज उठे और कढ़ाई में वह जैसे ही बाल भोग बनाने के लिए कढ़ाई हाथ में ली देखा कि यह तो गंदी है। लाटू महाराज ने उसमें निश्चय ही रात में कुछ बनाया होगा। शशि महाराज समझ गए। उनको शायद रात को यह आवाज भी आई होगी। लाटू महाराज ने शायद बताया भी होगा। किंतु शायद उस समय शशि महाराज ने यह अनुमान कर लिया होगा कि लाटू महाराज ने यह बना के अपने लिए जो नाश्ता बनाया है छोला ना कि जो भी कुछ बनाया है वह बना के कढ़ाई को धो दिया होगा। ऐसा अनुमान उन्होंने शायद उस समय किया होगा। किंतु सुबह को जैसे वह कढ़ाई को हाथ में लिया वह जो फ्राई पेन उसको कहते हैं स्टर फ्राई पेन। तो जैसे ही हाथ में लिया पता चला कि वह तो अभी तक गंदी है। तो यह देखकर के और शशि महाराज का तो ऐसा था ना ठाकुर की सेवा एग्जजेक्टली टाइम पर होनी चाहिए। एग्जजेक्टली उसी एग्जैक्ट माने जो एक माने एक सिस्टम होती है सिस्टम में थोड़ा सा भी इधर-उधर होगा तो नहीं चलेगा। जैसे ठाकुर जब जीवंत थे ठाकुर को तो कैंसर हो गया था। उनको कितनी माने यह सावधानी पूर्वक उनकी सेवा करनी पड़ती थी। तो उसी सावधानी पूर्वक ठाकुर की अस्थियां और ठाकुर के जो पट है ठाकुर का फोटो है उसकी करनी है क्योंकि जीवंत ठाकुर वहां पर विराजमान है प्राण प्रतिष्ठा हुई है बोल के उसी तरह से सेवा होनी चाहिए तो यह देख के कि कढ़ाई अभी तक गंदी है अभी यह उसको कढ़ाई को धोएंगे फिर उसमें बाल भोग बनाएंगे तो हो सकता है कि कुछ मिनट देरी हो जाए ठाकुर को बाल भोग ऑफर करने के लिए यह देखकर के यह सोचकर के शशि महाराज ऐसे नाराज हो गए और शशि महाराज का टेंपर भी बहुत ज्यादा था और जब खास करके ठाकुर की सेवा में कोई विघ्न आएगा तो फिर शशि महाराज बिल्कुल सहन नहीं कर पाते थे। उन्होंने फिर लाटू महाराज को जो गाली देना शुरू किया जो डांटना शुरू किया कि लाटू महाराज पहले तो थोड़े घबरा गए फिर नाराज हो गए। फिर कंप्लेन करके कहते हैं भाई तुम मुझे इस तरह से डांटोगे तो मैं मां को लेटर लिखता हूं। मैं मां को बता दूंगा कि मां शशि भाई मुझे इस तरह से डांटते हैं। देखिए कि एक तो है कि इन दोनों में आपस में कितना प्रेम है। लाटू महाराज भी तो वो तो कम नहीं थे। वो भी तो पहलवान जैसे थे। वो सामने में वो भी चिल्ला सकते थे। ममारी भी कर सकते थे। किंतु जब अपना भाई किस कारण की वजह से हमको डांट रहा है तो वह सुन लेना है और किंतु कंप्लेन यदि करनी है तो सीधी मां को करनी है। जैसे वो मां के पास में वो बच्चे आते हैं ना दौड़ के अभी खेल रहे हैं। अभी खेलतेखेलते झगड़ा हो गया तो सीधा मां के पास में दौड़ कर के गए। एक एक भाई कहेगा अपने दूसरे भाई के बारे में। मां इसने मुझे धक्का मारा तो वह दूसरा भाई कहेगा मां इसने मेरे बाल खींचे। तो अभी ये दोनों भाई झगड़ रहे हैं। भाई-बहन झगड़ रहे हैं तो मां फिर कैसे आपस में सुलह करवाती है। तो ऐसा गुरु भाइयों में था कि आपस में यदि झगड़ा होगा तो सीधा मां के पास जाकर कंप्लेन करेंगे। किंतु यहां पे यह एक बात देखिए कि वो एक ट्रेडिशन जो है कि सेवा करके सिद्धि प्राप्त करना वो एक वैष्णव ट्रेडिशन भी है जो कि हमारे ऑर्डर में बिल्कुल प्रारंभ से चली आ रही थी। और सेवा का अर्थ अपने गुरु भाई इसी को कहते थे कि हां ठाकुर की जिस तरह से सेवा करते थे वैसी ही सेवा जिस मूर्ति में या जिस फोटोग्राफ में ठाकुर की प्राण प्रतिष्ठा हुई है उसी की सेवा इसी तरह से की जाए तो आपको फिर सिद्धि मिलेगी। किंतु फिर स्वामी जी है कि स्वामी जी का जो एक एक्सपेंडेड विजन था इस वजह से उन्होंने यह कहा कि यदि आप यदि यह कहते हैं कि सभी के भीतर में ईश्वर है। सभी सर्व भूत के भीतर में आप ब्रह्म दर्शन करते हैं तो यह गरीब नारायण है, दरिद्र नारायण है, चंडाल नारायण है, मूर्ख नारायण है। इन लोगों की आप सेवा कीजिए और इतनी ही सावचेती पूर्वक इतनी ही श्रद्धा पूर्वक कीजिए जितनी कि श्रद्धा पूर्वक सावधानी पूर्वक गुरु भाई ठाकुर की सेवा करते थे और उससे देखिए कि आपको अपने आध्यात्मिक जीवन में कितना बूस्ट मिलता है। आपका आध्यात्मिक प्रगति कितना आगे बढ़
कहानी: लाटू महाराज की माँ सारदा के प्रति भक्ति
जाता है। तो यह जो पूरा एक है यहां पे कि यहां पे ठाकुर ने लाटू महाराज को अपॉइंट किया मां शारदा देवी के पास में उनकी रोटी बनाने के लिए आहार वगैरह बनाने में मदद करने के लिए। वहां से अपनी यह सेवा परंपरा प्रारंभ हो रही है। इसी सेवा परंपरा में नेक्स्ट स्टेप है कि ठाकुर और मां का देह का यदि अवसान होता है। वैसे तो आध्यात्मिक रूप से हम सबके साथ में ही है। भक्तों के हृदय में ही रह रहे हैं। किंतु जब उनका पंचमहाभूत का देह जब मिट्टी में विलीन होता है। पंचमहाभूत में वापस मिल जाता है तो उनकी सेवा अर्थात की घट की सेवा पट की सेवा अह पट अर्थात की फोटोग्राफ और उनको प्राण प्रतिष्ठा की हुई मंदिर में सेवा तो वो शशि महाराज ने प्रारंभ की वो सेकंड स्टेज हो गया और थर्ड स्टेज है कि स्वामी जी ने कहा कि यह सेवा को आप सिर्फ इसी दृष्टिकोण के भीतर में मत देखिए। सिर्फ इतने छोटे से दायरे में बंद मत रखिए जो कि अपनी एक वैष्णव परंपरा है। इसी सेवा को आप एक्सपैंड कीजिए। जगत के सभी लोगों को इसके भीतर में आवृत कर लीजिए। तो इस घटना से यह पूरी घटना परंपरा भविष्य की प्रारंभ होती है। तार पर लाटू के नबते लिया गया तनी बोली ले। इसके बाद में फिर ठाकुर ने लाटू महाराज को ले गए मां के पास में और कहा कि ये बड़ा ही शुद्ध सात्विक लड़का है। इनके ये तुम्हारी सेवा के लिए रहेगा। तुमको जो कुछ भी काम करवाना है इसके पास में करवा दो। देखिए ये बात बाद बात बाद की बात है। ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब लाटू महाराज वो तो अपने एक उनका अद्भुतानंद नाम क्यों हुआ? क्योंकि वह तो एक अद्भुत भाव में मग्न रहते थे। निराला जिनको कहते हैं हिंदी में वो निराले थे। वह कब कहां पर चले जाएंगे, कब किस भाव में रहेंगे, कहना मुश्किल है। स्वामी जी ने बेलूर मठ की स्थापना की। नियम बनाया कि सबको जब सुबह का घंटी पड़ता है, सबको यह मंगल आरती में उपस्थित रहना है। फिर मंदिर में बैठकर के जब ध्यान करना है। उसके बाद में जब घंटी पड़ता है तो खाने के लिए आना है। उस समय लाटू महाराज ने क्या कहा था कि भाई यह घंटी बढ़ेगी तुम्हारी और फिर मैं ध्यान करूं। ऐसा नहीं होने वाला है। जब मूड होगा तो मैं ध्यान करूंगा। इस तरह से मैं तुम्हारे रूटीन में नहीं रह पाऊंगा। मैं चल रहा हूं। ऐसा बोलकर के बेलूर मठ छोड़ने को तैयार हो गए थे। तब स्वामी जी ने दौड़ के जाकर के उनका हाथ पकड़ लिया। कहा भाई तुमको कहीं जाने की जरूरत नहीं है। भले तुम बेलूर मठ में ही रहो। यह रूटीन तुम्हारे लिए नहीं है। तो यह थे लाटू महाराज। तो यह लाटू महाराज कभी-कभी यह बलराम भवन में रहते थे और मां रहती थी बाग बाजार में उद्बोधन में। तो फिर लाटू महाराज वैसे जितने भी ठाकुर के संतान थे जितने भी भक्त थे सन्यासी थे सब लोग मां का दर्शन करने के लिए मां से आशीर्वाद लेने के लिए आ रहे हैं। किंतु लाटू महाराज पास में ही रहते हैं किंतु कभी मां के पास में नहीं आते। तो किसी ने मां को प्रश्न किया कि मां कि लाटू महाराज तो यहीं पर रह रहे हैं। आपका दर्शन करने के लिए आपको प्रणाम करने के लिए क्यों नहीं आ रहे हैं? तो यह बात उठती है ना यह लोगों को यह रूमर्स बड़ी पसंद है। मसाला वाली बातें बड़ी पसंद है। वहां लाटू महाराज कितना जप ध्यान करते हैं। रात भर तो सोते नहीं थे। ठाकुर ने मना किया था तो सिर्फ वो चादर ओढ़कर के लेटे रहेंगे। किंतु भीतर भीतर में जप करते रहेंगे। तो यह बातें नहीं करके यह सब रूमर फैलना शुरू हो गया कि लाटू महाराज पास में ही रहते हैं। सभी लोग आते हैं मां को प्रणाम करने के लिए। वो नहीं जाते। तो फिर किसी ने पूछा मां को तो मां ने उत्तर दिया अरे वह तो लाटू है। लाटू तो मेरा लड़का है। वह तो ऐसे ही रहने वाला है। उसके लिए तुम इतनी चिंता मत करो। उसके हृदय में मेरे प्रति जो प्रेम है वह मुझे पता है। तो यह प्रेम कैसा था लाटू महाराज का मां के ऊपर में? एक बार काशी की ही बात है। काशी के काशी में एक डिवोटी ने लेडी डिवोटी ने शायद ठीक किया कि वो दुर्गा पूजा करेगी। और फिर दुर्गा पूजा में आमंत्रण देने के लिए बेलूर मठ से वहां से इधर-उधर से जो साधुओं को आमंत्रण दिया जाता है तो उसमें चीफ गेस्ट के रूप में ना जो भी है राजा महाराज को उन्होंने आमंत्रण देने का टिक किया। राजा महाराज को निमंत्रण भेजा। यहां पर लाटू महाराज भी वहां पर रह रहे हैं। तो लाटू महाराज ने जैसे ही सुना कि यह लेडी डिवोटी दुर्गा पूजा तो कर रही है किंतु मां को आमंत्रण नहीं करके राजा महाराज को स्वामी ब्रह्मानंद जी को इनवाइट कर रहे। अभी राजा महाराज तो कोई ऐसे वैसे तो नहीं है। रामकृष्ण संघ के प्रेसिडेंट थे तो और ठाकुर के मानस पुत्र हैं। उनको भी इनवाइट करना वह भी आए आपकी दुर्गा पूजा में कितना बड़ा सद्भाग्य है। किंतु लाटू महाराज के मन में ऐसा था कि इतना महत्वपूर्ण फंक्शन जब आप अपने घर में कर रहे हैं तो आपको यह उचित है कि अपने संघ में जो सर्वोच्च आध्यात्मिक शक्ति है उनको सबसे पहले इनवाइट करें और वह कौन है? तो वह है श्री श्री मां। तो मां को इनवाइट नहीं करके राजा महाराज को कर रहे हैं। तो यह बात सुनकर के लाटू महाराज को थोड़ा नाराजगी हो गई लाटू महाराज के मन में उस लेडी डिवोटी के प्रति तो फिर वो अपनेपने साथ में ही कुछ ना कुछ बोलते जा रहा है कि देखो कि मां को नहीं बुला के राजा महाराज को बुला रहे हैं। ऐसा ऐसा फिर एक दिन हुआ ऐसा जब दुर्गा पूजा हुई प्रारंभ उस समय देखा गया कि पहले तो शायद राजा महाराज ने इनविटेशन स्वीकार कर लिया था। किंतु जब जाने का समय आया काशी कुछ काम आ गया कि सेहत कुछ हो गई उसमें कुछ प्रॉब्लम कि राजा महाराज नहीं आ पाए तो ठीक है दुर्गा पूजा तो हुई किंतु उसमें नहीं राजा महाराज उपस्थित थे नहीं मां उपस्थित थी तो लाटू महाराज को लगा कि ठीक ही हुआ ऐसा ही होना चाहिए मां को नहीं बुलाकर के राजा महाराज को इनवाइट करते हो ऐसा ही होना चाहिए राजा महाराज भी नहीं आए मां भी नहीं आई ठीक है अभी यह तो पर्व यहां पर समाप्त हुआ एक दिन इस दुर्गा पूजा समाप्त होने के कुछ ही दिनों के बाद में यह लेडी डिवोटी ने ठीक किया कि लाटू महाराज का आशीर्वाद लेने के लिए जाना है। तो वह सुबोधंद जी महाराज को साथ में लेकर के लाटू महाराज का दर्शन करने के लिए आई। तो यहां पर लाटू महाराज को पता चल गया कि वो लेडी डिवोटी आ रही है मेरा दर्शन करने के लिए। अभी उनकी लेडी डिवोटी के प्रति स्नेह था। यह डिवोटी का लाटू महाराज के प्रति श्रद्धा थी। इसके बावजूद लाटू महाराज के माइंड में फिट हो गया है कि इन्होंने मां को इनवाइट नहीं किया। तो यह नाराजगी के मारे उन्होंने क्या किया? जैसे ही सुबोधनांद जी और लेडी डिवोटी अपने उनके कमरे में प्रवेश किया उसी समय वह यह चादर ओढ़ के लेट गए और ऐसा दिखा रहे जैसे कि वह सोए हुए हैं। तो अभी यह दोनों ने सोचा लाटू महाराज सो रहे हैं तो कहां उनकी नींद में विघ्न डाले थोड़ा सा वेट कर लेते हैं। तो वे लोग वेट कर रहे हैं। कर रहे हैं। कर रहे हैं। लाटू महाराज खड़े ही नहीं हो रहे हैं। वो राह देख रहे हैं कि जब तक यह लोग जाएंगे नहीं तब तक मैं खड़ा नहीं होऊंगा। क्यों? क्योंकि उस डिवोटी के साथ में बात करने की उनकी कोई इच्छा नहीं। तो सही में वही हुआ। बहुत देरी तक अपेक्षा करने के बाद में फिर यह दोनों चले गए लेडी डिवोटी और सुबोधनांद जी। तब कहीं जाकर के लाटू महाराज फिर बैठकर के खड़े हुए। तो यह देखिए कि उनकी मां के ऊपर में कितनी भक्ति थी। कभी-कभी वह विचित्र आचरण करते थे जिससे कि लोगों को यह गोसिप करने का मसाला मिल जाता था। किंतु उनके हृदय में मां के प्रति जो श्रद्धा थी वह अवर्णनीय थी। शब्द से परे। अच्छा इसके बाद का जो प्रसंग है इसको अभी हम नेक्स्ट क्लास में लेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: क्या आप शरणागति का अर्थ समझाएंगे?
देखिए शरणागति का अर्थ क्या है पता है? हम जो कर्म करते हैं वह सब उसके फल जो है ठाकुर को अर्पित कर देना। अर्थात कि ऐसा नहीं है। जैसे मास्टर महाशय ने ठाकुर को पूछा कि जो भक्त है वह क्या अपने आर्थिक उसकी जो उन्नति हो इसके लिए प्रयास कर सकता है। ठाकुर ने कहा आप कर सकता है। उसमें क्या है? आप संसार में रह रहे हैं। बोल रहे हैं कि आपको अभी सब छोड़कर के भगवान की यह उपासना करनी है तो तो होगा नहीं ना। आपको तो संसार चलाना है। तो आर्थिक उन्नति हो उसके लिए प्रयास कर सकते हैं। ठाकुर ने बस इतना ही कहा कि सतार्ग से कीजिए। दूर माने यह मिथ्या बोल के इस तरह से आप मत कीजिए। किंतु साथ-साथ में हमको यह ख्याल में रखना है कि भले चाहे आप अपना प्रयास बढ़ाइए अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए। उसका जो फल आता है ना वह ठाकुर को अर्पण कर देना है। इस अर्थ में देखिए मामला थोड़ा कॉम्प्लिकेटेड है। थोड़ा सा आपको समझना होगा। मैं प्रमोशन के लिए प्रयास कर रहा हूं। अपनी नौकरी में अच्छी बात है। बुरा कुछ नहीं है। किंतु प्रमोशन के लिए प्रयास कैसे करना है? ठाकुर ने कहा ऑनेस्टली करना है। अभी मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं। मुझे प्रमोशन चाहिए तो मैं क्या करूंगा? बेटर सॉफ्टवेयर लिखूंगा। रेदर देन कि मेरे जो कलीग है उसके अगेंस्ट में जाकर के पीछे मैं रूमर्स फैलाऊंगा या तो मैं बॉस के पास में जाकर के कंप्लेन करूंगा। यानी प्रमोशन प्राप्त करने के दो रास्ते हैं। एक तो है पॉजिटिव एक तो है नेगेटिव। तो पॉजिटिव रास्ते से आप प्रमोशन प्राप्त करने के लिए प्रयास कीजिए। यदि प्रमोशन नहीं भी मिलता है तो डज नॉट मैटर। आपने प्रयास किया है। फल ईश्वर के हाथ में है। वरना यदि आपने यह सोच लिया मुझे प्रमोशन अच्छे रास्ते से यानी कि जो लेजिटमेट रास्ता है उस पे चल के नहीं मिला है तो मैं अभी इललेजिट रास्ते पर जाऊंगा प्रमोशन प्राप्त करने के लिए। ऐसा मत कीजिए। कर्म हमको करना है प्रमोशन प्राप्त करने का। किंतु वह प्राप्त हो उसके लिए किसी भी तरह का नेगेटिव उपाय इस्तेमाल नहीं करना है। फल जो भी आता है ठाकुर पर छोड़ देना है। मैंने अच्छे से प्रयास किया। यदि ठाकुर का लगा अच्छा तो ठाकुर मुझे प्रमोट करेंगे। नहीं हुआ तो ठाकुर नहीं करेंगे। वहां पर मुझे छोड़ना है। किंतु बहुत सारे लोग क्या करते हैं? रिजल्ट नहीं मिलता है तो फिर यह सेकंड स्टेप लेते हैं। पहले तो लेजिटमेटली प्रयास करते हैं। रिजल्ट प्राप्त करने के लिए रिजल्ट नहीं मिलता है तो इलेजिट प्रयास करते हैं उसी को प्राप्त करने के लिए। तो वो सेकंड स्टेप हमको कभी नहीं लेना है।
प्रश्न: शिवानंदजी ने संघ में इतना कंट्रीब्यूशन किया फिर भी ठाकुर उन्हें ईश्वरकोटि क्यों नहीं कहते?
कंट्रीब्यूशन के ऊपर में यह डिपेंड नहीं करता। संस्कार के ऊपर डिपेंड करता है। राजा महाराज के संस्कार इतने पवित्र थे। देखिए म यह थोड़ा सा समझने वाली बात है। यदि आप यह कहेंगे कि खोखा महाराज है कि लाटू महाराज है जो कि बाल ब्रह्मचारी थे वो इनको कि उन्होंने जीव कोटि में रखा है और फिर राजा महाराज को रखा है ईश्वर कोटि में। अभी राजा महाराज विवाहित भी थे। एक लड़का भी हुआ था। आप प्रश्न कर सकते हैं कि किसका संस्कार बेटर है। किंतु क्या है कि हृदय तो ठाकुर ही देख पाते हैं। बाहर से तो हम जज नहीं कर पाएंगे। जिसका संस्कार सबसे ज्यादा शुद्ध है वह ईश्वर कोटि है। किंतु यहां पर मामला खत्म नहीं होता है। शिवनंद जी महाराज का वो फेमस स्टेटमेंट है। तपस्या करके आप अपने संस्कार को शुद्ध कर सकते हैं। शिवनंद जी ने कहा कि हम लोग को ठाकुर ने ईश्वर कोटि बना दिया है। हम लोग ईश्वर कोटि होकर जन्मे नहीं है। किंतु ठाकुर ने हमको ईश्वर कोटि बना दिया है। यह अपने जीवन के आखिरी समय में महापुरुष महाराज स्वयं यह बात कहते हैं। यानी कि संस्कार जन्म के समय दे ये कैसा है पता है? ओपनिंग बैलेंस जैसा है। आपका बैंक अकाउंट है। अभी दो मित्र हैं। एक के बैंक अकाउंट में ओपनिंग बैलेंस है 1 लाख और दूसरे के बैंक अकाउंट में ओपनिंग बैलेंस है 1000। तो डजंट मैटर कि 1000 जिसके बैंक अकाउंट में है वो मेहनत नहीं कर सकता है। हमेशा उसका पूरा लाइफ 1000 से ही कटेगा। वो मेहनत करेगा तो कोटि करोड़पति हो सकता है। और जिसका ओपनिंग बैलेंस 1 लाख है, वह आलसी बना रहेगा तो 1 लाख भी हाथ से जाएगा। यानी यह सिर्फ ओपनिंग बैलेंस है। इस जन्म में आप जो यदि तपस्या करते हैं तो आप कहीं आगे बढ़ जाएंगे।
प्रश्न: एक और ठाकुर माँ को कहते है की त्यागी सन्तानो को रात को ज्यादा रोटी मत खिलाओ क्योंकि उन्हें ध्यान करना है, दुरारी और लाटू महाराज ध्यान कर रहे है तो कहते है जा के रोटी बनाने में मदद करो. यानि रोटी खाने से अच्छा है रोटी बनाना!
ना यह अच्छा आपने कहा कि रोटी के लिए आटा बनाना वह ध्यान करने से बेटर है। किंतु फिर उस आटे की बनी हुई रोटी नहीं खाना उससे बेटर है कि माने उससे बेटर है कि आप ध्यान करें। उस आटे की बनी रोटी खाने से बेटर है कि आप ध्यान करें। यह बहुत अच्छा आपका यह कंपैरिजन है। यह परफेक्ट एग्जांपल फॉर कर्मणवा ही अधिकारस्ते मा फलेशु कदाचनम। कर्म पे अधिकार है। फल के ऊपर में नहीं। रोटी बनाने पे अधिकार है। रोटी खाने के ऊपर में नहीं। इसीलिए भगवान कृष्ण कहते कहते हैं कि मैंने जो किया है वो मत करो। मैं जो कहता हूं वो करो। क्योंकि उनके जैसा करने को जाएंगे तो खींच जाएंगे हम लोग। किंतु देखिए इससे माने अल्टीमेटली इसका रेजोल्यूशन क्या था कि मां ने कहा कि तुम इसकी चिंता मत करो इनका जिम्मा मैं लूंगी। यानी कि हो सकता है कि ठाकुर ने एक ऐसा मायाजाल खड़ा किया है। माने ठाकुर के वे तो मूर्ख तो नहीं थे। मतलब भोलेभाले नहीं थे। जितने वो दिखते हैं। उनके भीतर में यह सब टेक्निक था। साइकोलॉजी समझ में आता था। तो हो सकता है कि मां के सामने अभी मां स्वीकार नहीं कर रही है कि मुझे भक्तों का जिम्मा लेना है। तो उनको अब लगा कि मां का जो मातृत्व है ना उसके ऊपर में आघात किया जाए। तब कहीं जाकर के ये जो भार स्वीकार जो करना है मां सामने से आकर करेगी। तो ठाकुर ने शायद हो सकता है जानबूझ के ऐसा किया हो। कहा हो कि इन लोगों को ज्यादा रोटी मत खिलाओ। तो सामने ही इमीडिएटली मां ने जाकर कह दिया कि तुम इसकी चिंता मत करो। वो चिंता मैं करूंगी। ये ठाकुर का साइकोलॉजी बड़ा पावरफुल था। माने ये जितने भोलेभाले दिखते ऐसे थे नहीं वो एक दिन की घटना है ना कि वो महापुरुष तारक दा के साथ में ही एक लड़का वहां पे आया तो थोड़ा रेस्टलेस था बैठ नहीं पा रहा है शांति से तो ठाकुर ने उसको पूछा कि अच्छा बताओ तो यह तारक यहां पे आ रहा है मेरे पास में तो इसके बारे में तुम्हारा क्या मत है क्योंकि वो लड़के के चेहरा देख के ही लग गया कि ठाकुर के प्रति श्रद्धा नहीं है तो ठाकुर ने देखा कि टेस्ट करते हैं कि उनका जो उसका खुद का मित्र जो आ रहा है उनके पास में तो उसके बारे में में क्या मंतव्य है? तो लड़का कहता है कि वो आप जानेंगे। मुझे क्या पता? लड़का भी थोड़ा सा स्मार्ट था। तो अच्छा तो ठाकुर ने कहा अच्छा एक काम करो तुम ये सब बिल्डिंग वगैरह देख के आओ। जाओ ठाकुर का वो जो स्टैंडर्ड था एक ट्रिक कि ये जब लोग बैठ नहीं पाते तो ऐसा कहता है। तो लड़का सामने कहता है कि अच्छा ये सब बिल्डिंग तो मैंने देख ली है और कहीं जाने की इच्छा नहीं है अभी मेरी। तो ठाकुर को लगा यह पकड़ में नहीं आ रहा है। इसको थोड़ा सा डंडा मारा जाए। तो फिर ठाकुर क्या कहते हैं? वो मास्टर वहां से पास में ही बैठे थे। तो उन्होंने कहा यह हेड मास्टर है। तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा लड़का चौंक गया अच्छा यह हेड मास्टर है। यानी कि क्या है वो तो ब्रिटिश सिस्टम था ना उसमें जो ऑथॉरिटी फिगर है उनके प्रति डर रहता था और वो भी था स्टूडेंट और यह है हेड मास्टर। तो हेड मास्टर के पास में तो पावर होता है लड़कों को डांटने का। तो जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा तब एकदम वो ठंडा हो गया। तो देखिए ठाकुर साइकोलॉजिकल ट्रिक आजमाते हैं। एक के बाद एक पहले तो उसको भगाने का ट्राई किया। फिर उसको ओपिनियन पूछा महापुरुष महाराज के बारे में दोनों से ठीक नहीं हुआ तब उसको डर दिखा दिया।
प्रश्न: ठाकुर ने लाटू महाराज को ध्यान छोड़कर माँ की सेवा करने को कहा। क्या यह उनके कथन "शिव ज्ञान जीव सेवा" के समान ही है? स्वामी विवेकानन्द ने इसी कथन से तो प्रेरित हो कर कर्मयोग का प्रचलन किया और शकराचार्य के उपदेश की 'ज्ञान ही सर्वोपरि है' इसका विरोध किया.
देखिए कि शंकराचार्य या तो फिर जो ट्रेडिशनल वेदांत है उसमें गुरु की उपासना गुरु की सेवा पर बहुत ध्यान दिया गया है। किंतु कहीं पर यह नहीं कहा गया कि यह आपका स्मरण मनन निध्यासन और महावाक्य विचार का सब्स्टट्यूट है गुरु सेवा जबकि अपने ऑर्डर में हालांकि कोई ऐसा स्पष्ट नहीं कहता है कि आप जप ध्यान मत करो। लाटू को उठाया तो इसका यह अर्थ नहीं कि लाटू को एकदम मना ही कर दिया कि कभी जप ध्यान मत करना। ऐसा भी तो नहीं है। लाटू महाराज ने अनेक जप ध्यान उस समय भी किया था। बाद में भी किया। किंतु यदि एक अंडरलाइंग आप देख अंडर करंट यदि आप देखेंगे ना तो बड़ा स्पष्ट दिखता है कि यह अवतार की सेवा ही गुरु की सेवा ही सर्वश्रेष्ठ साधना है। एकदम क्लियर दिखता है और इसी का जैसे आपने कहा कि उसका जो मेजर एक्सपेंशन है यह जीव सेवा शिव ज्ञान जीव सेवा आप गुरु को ही इस लोगों के भीतर में देखकर के उनकी सेवा कीजिए। दैट इज इक्विवेलेंट टू और वही कर्म योग के माध्यम से ही आपको सिद्धि प्राप्त होगी। आपको और कहीं ज्ञान योग, राजयोग करने की जरूरत नहीं है। तो दिस इज अ यूनिक आप कहेंगे कि डेवलपमेंट बाय आवर ऑर्डर।
प्रश्न: एक ओर ठाकुर लाटू महाराज को ध्यान बंद करने और माँ की मदद करने के लिए कहते हैं, दूसरी ओर वे कहते हैं कि रात को सोएँ नहीं और ध्यान करें। क्या यह कर्म और ध्यान योग का सामंजस्य है? मानवाधिकार के लोग शिकायत करेंगे कि ठाकुर लाटू महाराज को भ्रमित कर रहे हैं!
ना ऑलरेडी यह फेमिनिस्ट लोग कह रहे हैं कि ठाकुर ने मां की अवगणना की थी। ऐसा लिखने वाले बहुत है। फेमिनिज्म
प्रश्न: स्वामीजी ने बाद में योगों के समन्वय के रूप में जो सिखाया, वह ठाकुर की शिक्षाओं में बहुत पहले से ही बिखरा हुआ था।
और इसका जो की है ना वो है अधिकारित्व। यदि मान लीजिए कि आपके संस्कार इतने शुद्ध हैं कि आप एक बार आइडियल क्या है ज्ञान योग का कि गुरु के पास में से आपने महावाक्य श्रवण किया साथ-साथ में ही गुरु शक्ति आप में प्रवेश की और इमीडिएटली आपको ब्रह्म साक्षात्कार हो गया। फिर जगत पड़ा रहा। फिर जैसे ठाकुर कहते हैं कि वो वो जो मकरध्वज है उसको बोतल के भीतर में तैयार किया। फिर वह वैद्य बोतल को रखे ना तोड़े डज नॉट मैटर। आपका जगत कल्याण करवाना है तो मां आपका शरीर धारण करवाएगी वरना फिर शरीर जाएगा। तो महावाक्य श्रवण जैसे ही सिद्ध गुरु के पास में से किया वैसे ही शुद्ध संस्कार मति जो शिष्य है उसको वो साक्षात्कार हो गया। यहां पर प्रॉब्लम कहां से स्टार्ट होता है कि नो डाउट ठाकुर के शिष्य कोई सामान्य तो थे नहीं। किंतु फिर भी यदि 100% शुद्ध भक्तों को लेकर के ठाकुर आते तो फिर लीला नहीं होती ना। हमको सिखाने के लिए कुछ मिलता नहीं। यह महामाया ने माया का एक अंश इनके भीतर में रख दिया है तमस और रजस का जिससे कि इनको हमारी तरह मेहनत करनी पड़े और ठाकुर उनको सिखाए और जिससे कि हम लोग सीखें तो यह संस्कार शुद्ध करने के लिए यह सब बहुत कुछ किया जाता है। यह व्हाट इज द मीनिंग ऑफ हार्मोनी ऑफ योगा। आप यदि आपका संस्कार इतना शुद्ध है तो एक बार वो आपने वो दास्य भाव संतान भाव से आराधना करना शुरू किया साथ में ही इष्ट दर्शन हो गया एक बार आपका संस्कार अच्छा है तो महावाक्य श्रवण से ही आपको यह मिल गया है संस्कार अच्छा है तो धरणा ध्यान समाधि इमीडिएटली आपका हो जाता है नहीं है उस लेवल का बोल के ही हमको मिक्स एंड मैच करना पड़ता है
प्रश्न: शरणागति की आपकी परिभाषा बहुत उपयुक्त है। हम गृहस्थों को दिनभर आध्यात्मिकता के साथ बहुत कम संपर्क में रहना पड़ता है। हमें ऐसे काम करने पड़ते हैं जो हमें पसंद नहीं। इसलिए जीवन जीने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम जो कुछ भी करते हैं, उसे ईश्वर को अर्पित कर दें।
देखिए शरणागति की आप ट्रेडिशनल व्याख्या भी कर सकते हैं कि आंखों में आंसू आ रहे हैं। आप ईश्वर के सामने बैठे हैं। भजन गा रहे हैं। पूजा कर रहे हैं। नवधा भक्ति जिसको कहते हैं कि ठाकुर के लिए पायस बनाना, वस्त्र पहनाना, भजन गान सुनाना, पाठ करके सुनाना, सेवा करना, पूजा करना एक ट्रेडिशनल वे में भी आप शरणागति को एक्सप्रेस कर सकते हैं। उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है। किंतु क्या है कि ज्यादातर जो डिवोटी है वो उन लोगों के पास में इतना टाइम ही नहीं होगा कि अपने पास में जो भगवान की मूर्ति रखी है या फोटो रखा है उसका इतना मतलब वो समय दे पाए। हमको क्या है कि माने आपको तो छोड़ ही दीजिए। इवन इंक्लूडिंग आवरसेल्फ पुजारी महाराज ही मंदिर में जाकर पूजा करेंगे। मैं तो अपने घर में वह फोटो रखा है। कभी फूल भी ऑफर नहीं करता। कुछ नहीं करता। बहुत सारे लोग करते हैं। बहुत सारे साधु करते हैं। मेरे पास में यह भी मतलब मेरा माइंडसेट थोड़ा ये है। किंतु ये जो है ना कि यह ट्रेडिशनल वे में शरणागति को एक्सप्रेस करना उसके लिए जो समय चाहिए ना आज के फास्ट युग में है नहीं। आपको आपकी डे टू डे एक्टिविटी में ही इसको खोजना होगा। और इसीलिए जो ठाकुर कहते हैं वो जो हमने वो कन्वर्सेशंस विद स्वामी तुर्यानंद पढ़ा था। यू कैन मेडिटेट विद योर आइज क्लोज्ड एंड यू कैन मेडिटेट विथ योर आइज ओपन। तो हम प्रश्न करेंगे कि आंख खुल करके किस तरह का ध्यान कर सकते हैं? सो दीज़ आर द प्रैक्टिससेस। डे टू डे एक्टिविटी में ध्यान को यानी कि स्पिरिचुअल प्रैक्टिस को बुन लेना है। जिससे कि आपका डे जो है देखिए यह भी तो मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि हम रिजल्ट को फट करके अर्पण कर देंगे। आज आपको मार्केटिंग का काम दिया गया। आप कहीं जाकर के ट्रैवल करके करके कस्टमर्स के साथ में बात करके अपनी प्रोडक्ट सेल करने का प्रयास करते हैं। अभी वह आपने बड़ी आशा रखी है कि मैं इतना टाइम दिया है, इतना एफर्ट किया है। इतना ऑर्डर आएगा तो ऑर्डर तो आया नहीं। ऊपर से वो उसने आपके कॉम्पिटिट को ऑर्डर दे दिया तो फिर मन को धक्का लगता है कि अरे मेरी जो पूरा एफर्ट है वेस्ट गया। तो इट इज़ ओके। मन को धक्का लगेगा। किंतु वहीं पर हमको अटक जाना है। फिर आप यदि सेबोटेज करने का प्रयास करेंगे जो कि इंडस्ट्रियल सेबोटेज आज के एक बहुत बड़ा एक टॉपिक है। आपके कॉम्पिटिट की प्रोडक्ट यदि सेल हो रही है तो वहां जाकर के ये लोग सेबोटेज कर देंगे तो फिर आपकी कॉम्पिटिट का नाम बदनाम होगा और लोग आपसे आपके पास में प्रोडक्ट परचेस करना शुरू करेंगे। इट इज़ अ वेरी वाइड स्पेड प्रैक्टिस एक्चुअली। तो क्या है कि वो स्टेप फिर हमको नहीं लेना है। हमने जाकर के मेहनत करके प्रोडक्ट सेल करने का प्रयास कर दिया। बट फिर वहीं पर हमको रुक जाना है।
प्रश्न: क्या शरणागति का अर्थ है कोई महत्वाकांक्षा या अपेक्षा expectations न रखना?
एक्सपेक्ट एक्सपेक्टेशन रखना है। एंबिशन रखना है। ठाकुर मां स्वामी जी ऐसा कभी नहीं कहेंगे कि आप अपने जीवन में एंबिशन न ना रखिए। एक ठाकुर की ही एंबिशन थी कि मुझे भक्तों का राजा होना है। स्वामी जी की एंबिशन थी कि जिस तरह से भगवान बुद्ध ने पूर्व में मैसेज फैलाया है आध्यात्मिकता का मुझे पश्चिम में फैलाना है। ये एंबिशन ना हो एक्सपेक्टेशन ना हो तो मनुष्य जीवन ही संभव नहीं है। हम लोग जो साधना भी करते हैं तो हमारी एक्सपेक्टेशन रहती है कि साधना का फल कभी ना कभी मिलेगा। जो नहीं करना है कि माने गलत रास्ते से अपनी एंबिशन को साधन साधन करने का प्रयास नहीं करना है। लेजिटमेट रास्ते से जो हो सके वो करना है। हां हां हां यस यस यस यस शते रास्ते जतो हमरा किु करते पारी हमरा करो अशखनो मने सहाज ने