Transcript
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज सुबह को मैं बाबूराम महाराज की किताब पढ़ रहा था प्रेमिक पुरुष प्रेमानंद उसमें एक इंसीडेंट है कि शशि महाराज उनको तो टीबी हो गया था उनकी इच्छा थी कि दक्षिण भारत में मां और राजा महाराज को बुलाएंगे दक्षिण भारत के भक्तों को उनका उनको कहेंगे कि दक्षिण भारत के भक्तों को आशीर्वाद देने को और दक्षिण भारत के तीर्थ है वह उनको भ्रमण करवाएंगे तो उसी में उनको तो टीबी हो गया था डॉक्टर कह रहे थे कि आप थोड़ा सा रेस्ट कर लीजिए इतना जो दौड़ धाम करते हैं उससे आपका स्वास्थ्य और भी बिगड़ेगा तो शशि महाराज ने उनकी बात सुनी नहीं किसी को बताया भी नहीं कि मुझे टीबी है करके और वैसे ही सीक्रेट वो अपना रोग को छुपा कर के राजा महाराज मां दोनों को दक्षिण भारत में भ्रमण करवाया और फिर आखिर में टीबी इतना बढ़ गया कि वह कलकाता जाकर के वह ट्रीटमेंट वो आखिर में कलकाता ट्रीटमेंट लेने को जाने के लिए राजी हुए तो अभी कलकाता में है मां के घर में उद्बोधन में और बाबूराम महाराज उस समय बलराम भवन में रह रहे थे तो वहां से बीच-बीच में आते थे प्रतिदिन और शशि महाराज की क्या ट्रीटमेंट है डॉक्टर ने उनको क्या औषध लेने को कहा है क्या उनको डाइट लेने को कहा है वह सब उसकी व्यवस्था करके चले जाते थे अभी ऐसे ही एक दिन बाबूराम महाराज आए आकर के शशि महाराज के साथ में कुछ बात कर रहा है तो शशि महाराज को उनकी कोई एक बात पसंद नहीं आई कौन सी बात पसंद नहीं आई यह तो जिन्होंने स्मृति कथा लिखी है यह उन्होंने नहीं बताया किंतु उन्होंने ऐसा कहा कि शशि महाराज बाबूराम महाराज की किसी एक बात से नाराज हो गए तो ठीक है अभी जैसे ही नाराज हुए तो उन्होंने पता थोड़ा सा उनके साथ में आर्गुमेंट वगैरह किया और गंभीर हो गए थोड़े से और जब बाबूराम महाराज चले गए तो उसके बाद में सेवक लोगों ने देखा कि शशि महाराज के मन में पता नहीं किस तरह का एक परिवर्तन आया है एकाएक उन्होंने खाना बंद कर दिया खाना बंद कर दिया और बीच-बीच में रो रहे हैं रोते-रोते कहते हैं कि बाबूराम को बुलाओ मुझे उसके साथ में बात करनी है तो सेवक लोग तो देख रहे हैं कि बाबूराम महाराज तो जदी नहीं आएंगे और शशि महाराज को तो वैसे भी टीबी हो गया है और टीबी है और खाना नहीं खाएंगे तो तो बड़ा ही डेंजरस है तो जाकर के सेवक लोग गए दौड़ते दौड़ते बलराम मंदिर में बाबूराम महाराज को लाने के लिए बाबूराम महाराज आए एकदम व्यस्त होकर के बड़े ही चिंतित होकर के अरे शशि भाई क्या हुआ खाना क्यों बंद कर दिया तो शशि महाराज एकदम रोते-रोते उनके पैर पकड़ कर के बोलते हैं कि भाई मेरे मुंह पर लात मारो मुझे ठाकुर के ऊपर में अविश्वास हो गया है तो यह बात सुनकर के बाबूराम महाराज इतने चौक गए इतने आश्चर्य चकित हो गए कि अरे भाई यदि और कोई भी कहता कि मुझे ठाकुर के ऊपर में अविश्वास हो गया है तो मैं शायद मान लेता किंतु तुम यदि ऐसी बात करते हो शशि महाराज ने तो ठाकुर की पूजा अपने संग में स्टार्ट की है शशि महाराज की निष्ठा से ही आज हमारे संग में जो निष्ठा भक्ति भाव पूर्वक ठाकुर की जो पूजा है वह आज चल रही है शशि महाराज शायद नहीं होते तो पूजा चलती क्योंकि किंतु फिर भी स्वामी जी का जो अद्वैत का भाव था वो देख कर के हमको थोड़ा सा संशय होता है कि शशि महाराज के नहीं रहते रहते पूजा किस तरह की होती खास करके स्वामी जी का है ना वो वहां अद्वैत आश्रम में गए थे मायावती में देखा कि बोल दिया है कि यहां पर किसी भी तरह की पूजा नहीं होने वाली है फिर भी देखा कि ठाकुर का एक छोटा सा वो ये बन गया है श्राइन तो स्वामी जी कहते हैं बूढ़ खाने ऐसे गैसे माने वो यहां पर भी आ गए है क्या तो स्वामी जी का ऐसा प्योर अद्वैत भाव था तो बोलकर के हमको थोड़ा सा मुझे पर्सनली ऐसा लग रहा है कि संग में किस तरह की पूजा चलती होगी शशि महाराज है जिन्होंने इतनी निष्ठा पूर्वक वैध पूजा अपने संग में इसका प्रचलन किया है अभी ये शशि महाराज बोल रहे हैं कि मेरे मुंह पर लात मारो मुझे ठाकुर पर अविश्वास हो गया है बाबूराम महाराज कहते हैं कि और कोई भी होता तो मैं यह बात मान लेता कि शायद उनको ठाकुर पे क्षणिक कुछ समय के लिए अविश्वास हो सकता है किंतु तुमको ऐसा हो मैं स्वीकार ही नहीं कर सकता तो फिर शशि महाराज क्या कहते हैं कि देखो कि ठाकुर की तुम्हारे ऊपर में जो भक्त तुम्हारे ऊपर में जो स्नेह और प्रेम था तो ऐसे तुम ठाकुर के इतने प्रिय संतान तुम्हारे साथ में कि तुम्हारी कोई एक बात मैंने ना सुन कर के तुम्हारे साथ में मैंने आर्गुमेंट किया है तो यदि मैं तुम्हारे पर मुझे यदि असंतोष हो जाए तो उसका तो यही एक अर्थ हुआ ना कि ठाकुर के ऊपर में मुझे अविश्वास हो गया यदि ठाकुर को तुम्हारे ऊपर में इतना स्नेह है तो तुम्हारे साथ में असहमत होने का या असंतोष प्रकट करने का कोई प्रयोजन ही नहीं होता मेरा तो बाबूराम महाराज बोलते अरे भाई मेरे मन में तो ऐसा कुछ था ही नहीं कि मैं तुम्हारे साथ में असहमत हो रहा हूं या तुम्हारी कोई बात से मैं नाराज हो गए छता इसके बावजूद यदि तुमको ऐसा लगता है कि मैं तुमसे नाराज हूं तो मैं अपने अंतःकरण से अपने हृदय के भीतर से तुमको क्षमा करता हूं यदि तुम्हारी कोई बात से मुझे बुरा लगा हो ऐसा तुमको लगता है तो मैं अपने हृदय के अंतःकरण से तुमको क्षमा करता हूं बिल्कुल भी यह मत सोचो कि मैं तुमसे नाराज हूं तो ऐसा जब कहा तब कहीं जाकर के शशि महाराज को शांतोना मिली और कहा यह जो फल थे तुम प्रसाद कर दो तब मैं इसको फल को खा कर के अभी मैं अपने आहार की शुरुआत करूंगा तो बाबूराम महाराज ने प्रेमानंद जी महाराज ने फल का प्रसाद किया और फिर वह फल खा कर के शशि महाराज ने आहार किया तो जद इन लोगों का जब जीवन देखते हैं तो देखिए कि ठाकुर के ऊपर में जो भक्ति श्रद्धा है उतनी ही श्रद्धा भक्ति अपने गुरु भाइयों के ऊपर में है क्योंकि वह गुरु भाई को भी तो ठाकुर का ही प्रेम मिला है और गुरु भाई के ऊपर में यदि अश्राथ या तो फिर उनके साथ में असंतोष या तो फिर उनके मन में उनके प्रति खुद के मन में नाराजगी होना यह तो ठाकुर के ऊपर में ही असंतोष ठाकुर के ऊपर में ही अश्राथा का चले जाना ऐसा हो गया तो मैंने ऐसी छोटी-छोटी कहानिया अपने संग में इतनी सारी है वो पढ़ कर के लगता है कि देखिए कि यह संघ अभी भी इतना साथ में मिलकर के कार्य कर रहे हैं सभी साधु लोग इसके पीछे ठाकुर का भी प्रेम और यह जो भालोबासा या तो प्रेम का बंधन दोनों ही यहां पे उसके लिए रिस्पांसिबल है अच्छा तो हम मां की किताब पढ़ रहे थे श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित कल हमने देखा कि मां अपने खुद के पिताजी और माताजी जनक जननी के बारे में क्या कहते हैं अभी हम थोड़ा सा आगे देखते हैं कि गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं रामचंद्र तीन कनिष्ठ सहोदर रामचंद्र यानी कि मां शारदा देवी के पिताजी उनके तीन छोटे भाई थे त्रैलोक्य नाथ ईश्वरचंद्र और नील माधव ताहर सहीद एक परिवार बास करते ये तीनों त्रैलोक्य नाथ ईश्वर चंद्र और नील माधव रामचंद्र के साथ में ही एक ही घर में निवास कर रहे थे ही परिवार अर्थो सलता कोनो दिन देखा जा तो ना इस परिवार में पैसों का प्रचूर या तो फिर पैसों की सुविधा किसी समय नहीं देखी गई थी वाक्य रचना कितनी सुंदर करते हैं कभी देखा नहीं गया था चाश और पौरोहित्य होते लबो स्वल्प आए कोनो प्रकारे यो संकुलन होई तो चाश अर्थात की खेती और पौरोहित्य अर्थात की कोई भी पूजा है कोई भी प्रसंग है वहां पर जाकर के विधि विधान करना कोई भी वैदिक प है उसका अनुष्ठान करना यह पौरोहित्य करके इनका घर चलता था कोनो प्रका य संकुलन हो तो किसी भी तरह से घर चल जाता था अथ च दाना दते रामचंद्र मुक्तो होतो लन किसी भी तरह घर चल जाता था फिर भी दान देने में रामचंद्र बड़े ही मुक्त हस्त थे बड़े ही उदार हृदय के थे इ हार प्रमाण अमरा पोरे पाइबो ये उदार हृदय से दान देते थे इसका प्रमाण इसका प्रूफ हमको बाद में मिलेगा अभी मां के जन्म का वृतांत है हम सभी ने यह वृतांत के बारे में सुना ही है पढ़ा ही है और वहां पर वह जो सि होड़ में शारदा मठ है तो वहां पे जहां पर मां का अवतरण हुआ था उसके पास में तो वह जगह भी हमने देखी है वह पेड़ भी देखा है हमने हम लोग टीसी में से हमको ले गए थे वो जो तीर्थ यात्रा करवाने केलिए आपने भी शायद बहुत सारे लोगों ने देखा होगा यहां पर सुंदर छोटा सा वर्णन है गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं एक बार शि होड़ ग्रामे उत्तर पाड़ा ु गृहे अस्थान काले एक समय शिहोर ग्राम में उत्तरपाड़ा नाम की जो जगह है वहां पर पितृ गृह के जगह श्यामा सुंदरी का पिताजी का घर वहां पर था तो श्यामा सुंदरी देवी वहां पर अपने पिताजी के घर रहने के लिए गई थी उस समय उस अवस्था के समय श्यामा सुंदरी देवीर उदरा होए उनको श्यामा सुंदरी देवी को पेट में थोड़ा सा दर्द होने लगा पेट में थोड़ा सा अस्वस्थ कर अनुभव होने लगा तीनी अंधकारे एला पुकुरे पाड़ सोचे जान वोह अंधकार में एला पुकुर पुकुर अर्थात की तालाब तो एला बोलकर के तालाब था उसके किनारे शोच करने के लिए जाती है यह उस समय की जो परिस्थिति थी कि अंधेरे में ही स्त्रियों को शोच के लिए जाना पड़ता था मां की जो परिस्थिति थी हमको पता है मां ने खुद कहा कि सोचेर बैग धोरे धोरे वो पेटे व सब रोग धरे गेलो माने क्या है कि अर्ली मॉर्निंग बहुत जब सूर्य सूर्योदय नहीं होता है उससे पहले जाकर के शोच के जाना पड़ता है बाद में तो यह पुरुष लोगों का आना जाना शुरू हो जाएगा तो स्त्रियों को तो बड़ी असुविधा होगी तो वो जो अर्ली मॉर्निंग वो कहीं तालाब के किनारे या नदी के किनारे सोच के लिए गए तो फिर दिन भर अभी और कोई मौका ही नहीं है सोच का वेग आने से सोच के लिए जा सके तो जो उस समय की परिस्थिति अभी भी बहुत सारी जगह पर खुले में शोच के लिए जाते हैं और इसीलिए यह जो गवर्नमेंट की जो योजनाएं हैं वो कितनी मतलब बाहर से लगता है कि अरे टॉयलेट बनाना उसमें कौन सा बड़ा काम है किंतु जो लोग ग्राम में जाकर के ग्राम्य महिलाओं की परिस्थिति जिन्होंने देखी है उनको पता चलता है कि ये छोटी-छोटी योजनाएं भी उनके लिए कितनी फायदे काक है तो वोह अंधकार में एला बोलकर के तालाब के किनारे सोच के लिए गई किंतु अकस्मात स्थान निर्णय करते ना पारिया कुमार देर पोया नेर अदूरे एक बेलगा छेर नीचे बोसिया पड़े किंतु अंधेरे में समझ नहीं आया कि वह एला पुकुर यानी कि एला तालाब है उसके किनारे गई है कि और कहीं पर तो गलती से वो वहां पर कुंभार लोग थे उनकी भट्टी थी ईट बनाने की तो ईंट बनाने की भट्ठी के पास में सोच के लिए बैठ गई ओमनी पोया नेर दिख होते एक झनझन शब्द उलो और बिल्ल रखे शाखा होते एक खुद बालिका नामिया आशिया कोमल हस्ते श्यामा सुंदरी गोला जोड़ाई या ीलो जैसे ही वह बैठी तो वहां पर यह जो भट्ठी है वहां से झन झन करके पायल की कुछ शब्द की आवाज की उनको सुनाई दी और वहां पर पास में ही एक बिल्व वृक्ष था बिल्व वृक्ष की वो एक ब्रांच के ऊपर में से ऊपर में से एक छोटी सी बालिका उतरी बहुत ही सुंदर बालिका छोटी अपने दोनों हाथों से श्यामा सुंदरी देवी को ऐसा करके जैसे छोटे बच्चे अपनी मां को ऐसा करके धरते हैं ऐसा करके पकड़ लिया गोला जोड़ाई या धरी लो उनके गले में अपना हाथ उन्होंने डाल दिया श्यामा सुंदरी तो चेतन होया भूमि ते लुटाया पड़ी लेन श्यामा सुंदरी देवी अचेतन हो गई और जमीन पर लेट गई कतो खण तीनी ई भाब लेन जाने ना इस तरह से वह कितना समय थी पता नहीं आत्मीय स्वजन परे तहा के खुज बाहर करीले और तहा स्या फिराया आनी ले तिनी अनुभव कोरी लेन ई कोची मेटी तहर गर्भे प्रवेश कोरिया छ जब उनके परिवार जनों को पता चला तो उनको खोजने के लिए गए कैसे भी करके उनको होश में लाए तब कहीं जाकर के श्यामा सुंदरी ने कहा वह जो छोटी बच्ची थी उसने उनके गर्भ में प्रवेश किया है देखिए यह जितनी भी अवतारों के जन्म की कहानियां है वो इतनी एक दिव्य कहानियां है बहुत सारे लोगों के मन में संशय हो सकता है कि चलो हमको मां का जो जीवन है मां की जो साधना है या तो फिर मां की जो करुणा है वो सब तो हम लोग स्वीकार करते हैं किंतु इनके जन्म का इस तरह का वृतांत जो कि साइंस के साथ में मेल नहीं बैठता जिसका इसको हम क्यों ग्रहण करेंगे इसको क्यों हम इसके ऊपर में विश्वास करेंगे यह प्रश्न सहज हो सकता है मेरे मन में भी था अभी भी मेरे मन में बहुत सारे प्रश्न है किंतु मैंने एक चीज देखी है यदि सही श्रद्धा भक्ति और निष्ठा अवतार के ऊपर में या तो फिर ईश्वर के ऊपर में आने से यह सब प्रश्न उसका कोई मायने नहीं रहता मां का जन्म किस तरह से हुआ किस तरह से नहीं हुआ इससे इस चीज का क्या मतलब है कि मैंने मां की करुणा अपने जीवन में क्षण क्षण उसकी उपलब्धि की है उसकी अनुभूति की है तो यह मां की करुणा मां का प्रेम और मां का आशीर्वाद इसका पावर जो है वो इतना ग्रेट है इतना मने विश्वव्यापी है कि बाकी सब कहानियां जो कि उनके बारे में कही जाती है इसके ऊपर में हम विश्वास करें ना करे डंट मैटर फिर जब समय होगा जब समय आएगा तो वही समय के अनुसार आपको सब समझ में आ जाएगा जैसे जीसस के साथ में हुआ था कि उनको क्रूसिफिकेशन थी बाकी जीसस के जो पुरुष डिसाइल थे जिनको आज हम अपोस्ट कहते हैं उनमें से किसी को विश्वास नहीं था कि जीसस को तो आप कृष विद्ध नहीं कर सकते हैं वह तो भगवान है वह तो अवतार है तो यह मेरी मैगडेलीन जोक एक हीन चरित्र महिला थी व उसने देखा कि नहीं जीसस का फिर से जीसस अपनी कबर में से फिर से पुनर्जीवित हुए हैं फिर से खड़े हुए और उसने जाकर के बाकी सब अपोस्ट को समाचार दिया गुड न्यूज दिया तब कहीं जाकर के वे लोग स्वीकार करके वो वापस आए वो जीसस को देखने के लिए तो यह विश्वास होना नहीं होना वो किसको विश्वास होता है वो सब ठाकुर की कृपा के ऊपर में निर्भर है उसको लेकर करके हमको ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं है यहां पर हमने यह सुन लिया यह मान लिया कि इस तरह से बिल्व वृक्ष के ऊपर में से एक छोटी सी सुंदर बालिका आकर के अपने दोनों हाथों को जैसे हार गले में डालते हैं ऐसे ही अपनी माता श्यामा सुंदरी देवी के गलों में अपने दोनों हाथ परो दिए और वैसे ही उनके गर्भ में प्रवेश कर गई और वहीं से मां का अवतरण हुआ य श्री मायर पिता श्री तो रामचंद्र मुखोपाध्याय कोलकाता लेन इस समय मां के पिताजी रामचंद्र कोलकाता में थे कोलकाता गमने संकल्प ग्रहण पूर्वे एक दिन मध्यान भोजन परे तिनी संसारे अभाव चिंताए क्लिष्ट हृदय निद्रा वि भूतो हुया स्वप्ने देखे कलकता गए थे इससे पहले उनको एक थोड़ा सा उनके मन में एक चिंता थी कि अपने परिवार का पालन पोषण कैसे करेंगे तो यह पालन पोषण करने की उनकी चिंता खुद के लिए तो कुछ नहीं चाहिए किंतु परिवार जन है छोटे बच्चे हैं पत्नी है धर्म पत्नी तो यह सबका तो उनको निर्वाह करना है फिर उदार हृदय है जो भी सामने आ गया उनको तंबाकू खिलाएंगे या तो फिर उनको कुछ भी दान दे देंगे तो दान करने के लिए भी तो अपने हाथ में कुछ चाहिए तो यह चिंता की वजह से वह थोड़े से वह सोच रहे थे कि क्या करें क्या ना करें उस समय निद्रा भी भूतो होया सपने देखे निंद्रा में जाकर के उन्होंने एक सपना देखा एकटी हेमांगी बालिका तहर पृष्ठ परी पड़िया कोमल बाहु पासे तहर कंठ बेन करिया छ एक हेमांगी हेम अंगी अर्थात की शुभ्र वर्ण छोटी सी बालिका उनकी पीठ के ऊपर में चढ़ कर के अपने दोनों कोमल दोनों हाथों से उनके गले में अपने दो दोनों बाहू उन्होंने व उन्होंने पोए हैं बालि का उ सामान्य रूप और मूल्यवान अलंकार सहज ता हार असाधारण त्वे परिचय दे बालिका का जो अत्यंत सुंदर रूप था और जितने महंगे कहने पहने थे वह देख कर के सहज में ही पता चलता है कि कोई सामान्य बालिका नहीं है असामान्य बालिका है अति बिस्म तो रामचंद्र स्वत ही प्रश्न करिले अति विस्मित होकर के रामचंद्र ने प्रश्न किया केगो तुमी कौन हो तुम वीणा विनिन तो ससने हो कुंठे बालिका उत्तर दिलन वीणा विनिन तो वीणा अर्थात की जो वीणा है जिससे यह स्वर्गीय संगीत प्रकट होता है वह भी जिसकी ईर्षा करती है इस तरह के सुमधुर स्वर से विनतो सुमधुर स्वर से बालिका ने उत्तर दिया ए आमी तुमार का लूम यह मैं आपके पास में आ रही हूं आई हूं लूम अर्थात की आई हूं मैं आपके पास में आई हूं रामचंद्र घूम भांग गलो रामचंद्र की नींद खुल गई स्वप्न विवरण चिंता कोरिया ताहर विश्वास जन्म लो जे स्वयं लखी कृपा कोरिया दर्शन दिया छन स्वप्न के बारे में चिंतन करके आखिर में उनको यह विश्वास हुआ कि स्वयं मां लक्ष्मी ने उनको स्वप्न में दर्शन दिया है अत एव अर्थो पार्जन इ हाई प्रशस्त समय अर्थात की अर्थ उपार्जन का यही एक अच्छा समय है मां लक्ष्मी ने स्वप्न दिया है तो चलो अभी कलकाता जाकर के कुछ प्रयास किया जाए तो अर्थ उपार्जन का कुछ यहां पर सुविधा होगा ठाकुर का है देखिए लक्ष्मी की अवगणना कोई नहीं करता ठाकुर भी नहीं ये टाका माटी माटी टाका अर्थात कि ये पत्थर और पैसे पत्थर और पैसे ऐसा बोल कर के तो गंगा में डाल दे रहे हैं पैसे फिर उनको चिंता हो गई जद मालखी रेगे और खट बंद करते मां लक्ष्मी जदी नाराज हो जाएगी और वह जो मासिक मताना मिलता है वो उनको खाने के लिए वो बंद कर देगी तो क्या होगा फिर वह जाकर के लक्ष्मी को प्रार्थना की फिर उनको मनाया तो लक्ष्मी की अवगणना करना ऐसा ठाकुर ने भी नहीं किया है क्योंकि मां लक्ष्मी स्वयं उनकी सहधर्मिणी होकर के शक्ति के रूप में पृथ्वी पे जन्म लेगी हमने यह सुना है कि वो शारदा सरस्वती जनते से छ शारदा और सरस्वती ज्ञान देने के लिए आई है तो मां का सरस्वती रूप जो है उसके बारे में तो हमको पता है यह बड़ा ही मने स्वामी जी का जैसे मैंने एक दो बार पहले भी कहा था कि वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में स्वामी जी जब बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने मां सरस्वती का स्मरण करके अपना वक्तव्य स्टार्ट किया प्रश्न होता है ठाकुर का स्मरण करके क्यों नहीं क्योंकि उनको पता है कि मां का पावर ठाकुर के पावर से ज्यादा है और इतने सारे लोगों को यदि ब्रेन वश करना है तो ज्यादा पावर चाहिए इसके लिए मां का स्मरण तो मां का सरस्वती स्वरूप हमको पता है किंतु मां का जो लक्ष्मी स्वरूप भी है गंभीरानंद जी हमको यहां पर बताते हैं जिसके बारे में ज्यादातर लोग हम हमको लगता है बहुत सारे जैसे कि साधक होते हैं संत होते हैं वो बोलते हैं कि अरे लक्ष्मी का कोई प्राधान्य नहीं है सरस्वती है या तो फिर साधना है यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष किंतु लक्ष्मी की अवगणना कोई नहीं करता य पोवली क्या होती है पोव होती है आपके इंद्रियों के भोग जो उसके लिए जो साधन है यह जो सब उप सब द्रव्य है जो सब उपकरण है इंद्रियों के भोग के लिए उसकी पॉवर्टी अपने मन की पॉवर्टी नहीं अपनी यह जो उदारता है उसकी गरीबी नहीं मन तो उदार होना चाहिए यदि आपको दान देना है तो दान देने के लिए आपके पास में तो द्रव्य चाहिए धन चाहिए किंतु वो क्या है सुसंस्कृत धन है सात्त्विक धन है सात्विक धन का अर्थ है कि वह दान देने के लिए वो उसका उसका यूज होता है मां अन्नपूर्णा अन्नपूर्णा के रूप में देखेंगे कि भगवान शिव स्वयं मां के सामने हाथ फैला कर के खड़े हैं और ये जो सुवर्ण अन्न पूर्णा का ठाकुर को दर्शन हुआ था तो ये अन्नपूर्णा लक्ष्मी जो धन दान देने के लिए जिसका वो जो रखा जाता है या तो दान देने के लिए जो धन अर्जन किया जाता है वह शुद्ध धन है उसमें कोई भी वह गलत बात नहीं है तो इसीलिए रामचंद्र इतने दानी थे बोलकर के वह यह भी सोच सकते हैं परिवार का तो रक्षण करना ही है किंतु दान भी देना है इसके लिए वह सोचते हैं कि हां लक्ष्मी का तो अवतरण हुआ है तो चलो थोड़ा सा धन उपार्जन का कुछ प्रयास किया जाए ताई तिनी कोलकाता गमन कोरी ले इसीलिए फिर उन्होंने कोलकाता गमन किया मुखोपाध्याय महाशय चेष्टा कतो खानी फलती होया लो ताहर सहित आदर ए ग्रंथ संबंध नहीं मुखोपाध्याय की यह प्रचे प्रचे कि चलो कलकाता जाकर के धन का उपार्जन करें कितनी सफल हुई थी इस बात के साथ में इस ग्रंथ का कोई प्रयोजन नहीं है इसके लिए वह बात हम यहां पर नहीं करेंगे ऐसा गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं किंतु हमको पता है मां का जो पूरा जीवन पढ़ कर के हमको पता है कि यदि रामचंद्र ने इतना जद मेहनत भी किया होगा तो भी कोई बहुत ज्यादा धन तो उनको प्राप्त नहीं हुआ है मुक्त हस्त से दान कर सके अपनी ये लाडली बेटी का पालन पोषण कर सके उतना उनको अवश्य मिला होगा किंतु कोई धनी हो जाना कोई भोग विलास में डूब जाना इसके लिए तो किसी तरह का धन उनको को नहीं मिला है यह बात तो हमको पता है तबे आमरा इहा जानी दे पारिया छी ज गृहे प्रत्यागमन पोर सहधर्मिणी मुखे किंतु हमको यह पता है कि जब वह कोलकाता से जयराम बाटी वापस आए तब अपनी सहधर्मिणी के मुंह से तीनी जोखन सिहोड़े देवा देवा देवा बीर भावे संवाद पायले तोख र आस्तिक और स्वधर्म निष्ठ मन सहज उहा के सत बोलिया ग्रहण करलो देव का आविर्भाव सि होड़ में जब श्यामा सुंदरी देवी गई थी वहां पर उनके ऊपर में देव का आविर्भाव हुआ था उनके गर्भ में छोटी सी बालिका ने देवी एक बालिका का स्वरूप लेकर आई है गर्भ में प्रवेश किया है यह बात उन्होंने सुनी और इस बात पर उनको सहज सरल विश्वास हो गया जब वह कोलका कता से फिरे थे तब भक्ति परायण ब्राह्मण दंपति तद बध भोग सुखे उदासीन थाक पवित्र देहे ओ पूत हृदय देव शिशु जन्म कालेर प्रति कोरीते लागी लेन भक्ति परायण ब्राह्मण दंपति उस दिन के बाद भोग सुख से सब दूर रह कर के एक पवित्र जीवन बिता करके अपने किसी भी तरह का वो कोई इंद्रियों का सुख इसका उसका त्याग करके एक बालिका के जन्म की वह प्रतीक्षा करने लगे श्री मा भूमि होवा पर्यंत रामचंद्र आर स्त्रीर अंग स्पर्श करे नाई मां का अवतरण होने के पहले फिर रामचंद्र ने अपनी पत्नी का स्पर्श नहीं किया था अधिक अतु श्यामा सुंदरी के तीनी देवता न्याय भक्ति श्रद्धा करते किंतु श्यामा सुंदरी देवी को स्पर्श ही की नहीं किया था इतना ही नहीं किंतु उनको देवता की तरह उनकी श्रद्धा भक्ति करने की उन्होंने शुरुआत की थी मायर मां एक बार श्री जुक्ता जोगिन मा के बोलि लेन मां की मां ने एक बार योगिन मां को कहा था गर्भावस्था अर ए रूप गर्भ अवस्था में मेरा ऐसा रूप था माथाय चूल आर धोरे ना सर के ऊपर में इतने बाल हो गए थे जैसे वृद्धावस्था होती है तो बाल का झरना शुरू हो जाते हैं किंतु बालों का इतना सुंदर बाल उनके सर के ऊपर में हुए थे श बार साधे कतो लोक जे कापड़ी छीलो तार आर अधि ने उस समय कितने लोगों ने उनको वस्त्र दान किया था इस बात का कोई अ परिमाण नहीं है तो आज यही तो फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु