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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 31 Jan 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज कल हमने देखा कि किस तरह से द्वैत से अद्वैत की यात्रा होती है क्योंकि बहुत बार हमको लगता है एक कंट्रा विचार हमारे मन में आता है कि जद यह अवतार सर्व शक्तिमान है ऑल पावरफुल है तो हमारे दुखों का मोचन वह वैसे ही क्यों नहीं कर देते चुटकी बजाएंगे तो वह जो चाहे वह कर सकते हैं किंतु जिस जि तरह से कथामृत में मां सीता ने समझा कि जद भगवान राम अपना भंडार खोल देते हैं सबके लिए तो सब लोग काम करना बंद कर देंगे और यह जगत में आना है कर्म करने के लिए कर्म सही और गलत अच्छा और बुरा दोनों तरह का कर्म करते हैं अच्छे कर्म करके हम अपना पुण्य बढ़ाएंगे बुरे कर्म करके पाप बढ़ाएंगे अच्छे कर्म करते करते बुरे कर्म को काटना है तो यह एक विचार अपने शास्त्र में है क्रिश्चियनिटी या इस्लाम या तो फिर जुडा इजम जिनको कि अब्राहम रिलीजन कहा जाता है उनमें एक सिंगल लाइन में एक जीवन चलता है कि जन्म हुआ उसके बाद में अच्छे या बुरे कर्म किए और फिर जब मृत्यु होता है उसके बाद से लेकर के अप टू द डे ऑफ जजमेंट आप सोते रहेंगे अपनी कबर में और फिर एट द एंड ऑफ द लाइफ जीवन के आखिर में विश्व के आखिर में ईश्वर आकर के जज करेंगे कि जिसने अच्छा कर्म किया उसको स्वर्ग में भेजो बुरा किया तो उसको नर्क में भेजो तो यह उनका कांसेप्ट है अपना है कि जीवन एक चक्र की तरह है विश्व ब्रह्मांड या तो फिर इवोल्यूशन एक चक्र की तरह है जन्म मृत्यु जरा व्याधि का यह चक्र चलता ही रहेगा अपने इंप्रेशन अपने संस्कार अपने अंतःकरण के ऊपर में वो स्टोर होते रहेंगे जिसको कि मन बुद्धि चित्त और अहंकार कहते हैं उसके ऊपर स्टोर होंगे और फिर एक के बाद एक जन्म के द्वारा वह संस्कार वहन करते रहेंगे और फिर आखिर में अच्छे कर्म या तो फिर कहो कि साधना साधना हमने इतनी कर ली कि अपने कर्म कट गए तो हम मुक्त हो गए तो यह पूरा समझाने के लिए अवतार आते हैं तो ये जितने भी देखिए कि छोटे-छोटे इंसिडेंट है ठाकुर महा स्वामी जी के जीवन में वो जितना पढ़ेंगे उतना ही हमको जैसे कि ओनियन होती है ना एक प्याज तो प्याज के कितने लेयर्स होते हैं एक लेयर ओपन करेंगे तो दूसरा लेयर दिखेगा उसको ओपन करेंगे तो तीसरा तो वैसे ही यह ठाकुर म स्वामी जी या तो कोई भी अवतार हो उनका जीवन इस तरह से एक के बाद एक लेयर में होता है जीवन और संदेश दोनों बाह्य दृष्टि से बड़ा ही सरल लगता है कभी-कभी थोड़ा सा ह्यूमरस भी लगता है उनके कोई इंसिडेंट वगैरह और कभी-कभी इसके भीतर में प्रोफाउंड थिंकिंग होता है स्वामी जी एक बार अमेरिका गए थे तो जिनको कहते हैं कि जिस जगह को कहते हैं बैकस्टेज बैकस्टेज अर्थात की स्टेज के ऊपर जाकर प्रवचन देना होता है तो उसके पीछे में बैकस्टेज होता है जहां पर जो वक्ता वगैरह थोड़ा सा विश्राम करते हैं तो वहां पर स्वामी जी इस तरह से बैक स्टेज में एक कमरे में बैठे हुए थे और उनके साथ में जो ऑर्गेनाइज करने वाले थे वो शायद लेक्चर हॉल में थोड़ा सा ऑर्गेनाइज वगैरह कर रहे होंगे अभी समय हो गया प्रवचन का स्वामी जी आ नहीं रहे हैं सभी श्रोता लोग और स्वामी जी को सुनने के लिए तो उस समय बहुत सारे श्रोता आते थे 100 200 300 उस समय तो ये बहुत बड़ी संख्या थी तो इतने लोग अभी लेक्चर हॉल में बैठे स्वामी जी दिख नहीं रहे क्या हो गया क्या हो गया तो फिर जो स्वामी जी के जो मित्र सब ऑर्गेनाइज कर रहे थे वो बैक स्टेज में जाकर के देखा कि दरवाजा बंद है खटखटाया कि स्वामी जी बाहर आइए प्रवचन का समय हो गया है तो स्वामी जी ने कहा अरे तुम मुझे बचाओ मैं तो फंस गया हूं यहां पे तो वो सोचा अरे क्या हो गया फिर वो दरवाजा खोल कर के देखा तो पता है क्या है वो जो कैनवास का चेयर होता है ना इजी चेयर वो लकड़ी का फ्रेम होता है उस परे कैनवास डाला होता है तो कैनवास के इजी चेयर में स्वामी जी बैठकर थोड़ा विश्राम कर रहे थे तो कैनवास फट गया और स्वामी जी वो लकड़ी के फ्रेम में वो भीतर में गिर गए और लकड़ी के फ्रेम में फस गए थे सच ह्यूमरस सिचुएशन तो हमको लगता है कि अरे अच्छा ठीक है तो ऐसा भी माने हम लोग अपने जीवन में कभी ऐसी कोई ह्यूमरस सिचुएशन आ जाती है तो हमको लगता है कि अच्छा ठीक है तो हम तो सामान्य मनुष्य है हमारे साथ में ऐसा होगा या अवतार या तो फिर अवतार के जो मैसेंजर्स होते हैं उनके जीवन में भी ऐसा होता है किंतु देर आर लेयर्स ऑफ मीनिंग बिहाइंड ऑल ऑफ दिस अपने साथ में ऐसा हो जाए तो इसका तो कोई अर्थ नहीं है इन लोगों के जीवन में जद सामान्य घटना भी होगी तो यह भी देखिए कि मनुष्य चाहे जितना ही प्रयास कर रहेगा माया हमेशा उसको अपने पंजे में अपनी माया शक्ति में उलझाने के लिए हमेशा तत्पर रहती है थोड़ा सा भी आपने आंख बंद करके विश्राम करने का प्रयास किया देखा कि कैनवास फट गया और स्वामी जी फस गए तो हम इवन देखिए स्वामी जी एक बार प्रवचन दे रहे थे तो ऐसा वो ऑडियंस के सामने ऐसा ऐसा करके देखते हैं ना तो देखा कि एक बड़ी ही सुंदर लड़की वहां ऑडियंस में बैठी हुई है तो स्वामी जी ने सोचा कि अभी अ ऐसे ज नजर घूमती है तो सभी के ऊपर में नजर जाती है अभी है तो बड़े भाव में बोल रहे हैं किंतु फिर भी तो एक मन के ऊपर में एक रजिस्टर तो होता है कि हां बड़ी सुंदर युवती बैठी है तो जब थोड़ी देर के बाद में उनको मन में ऐसा सबकॉन्शियसली विचार आया कि अच्छा तो फिर से उसको एक बार देखूं तो तो जैसे ही उनकी नजर वहां गई तो देखिए एक बंदरिया बैठी थी मैं अभी देखिए कि माया उनको फसाने का प्रयास भी कर रही है किंतु उनका मन या तो फिर उनकी साधना शक्ति या तो फिर ठाकुर का आशीर्वाद इतना स्ट्रांग था कि वह स्वामी जी को कैसे भी करके माया पकड़ नहीं पा रही एक बार स्वामी जी सपने में देखा कि एक औरत ऐसा घुमता टान के बैठी हुई है तो स्वामी जी ने सोचा कि अच्छा ऐसा लगा कि जो औरत बैठी है बड़ी खूबसूरत होगी तो स्वामी जी सोचते हैं कि देखो तो थोड़ा घुमता उठा करके कि कैसी है खूबसूरती मने जस्ट आउट ऑफ क्यूरियोसिटी और कुछ नहीं जैसे ह्यूमन क्यूरियोसिटी होती है तो स्वामी जी ऐसा घुटा उठा है जैसे घुटा उठा देखा ठाकुर बैठे है तो स्वामी जी कहते मैं तो लज्जा से मर गया तो मैंने ये माया किसी को छोड़ती नहीं सभी को फंसाने का बार-बार प्रयास करती है थोड़ा सा भी आंख बंद करके विश्राम करके लेने के बैठे या तो थोड़ा सा भी अपने को असावधानी छोड़ दिया तो कब आक के क्या पकड़ लेगा कुछ ठीक नहीं है इसीलिए यह साधना का जीवन सन्यास का जीवन हमेशा यू हैव टू बी विजिलेंट हमेशा यू हैव टू बी ऑन योर टोज अलर्ट रहना पड़ता है य हमको लगता है कि अरे इसमें क्या है वह ठाकुर कथामृत में है वर्णन कि नित्यानंद नित्य गोपाल नित्य गोपाल ठाकुर के पास आता था ठाकुर उसको बड़ा स्नेह करते थे और वह बार-बार समाधि में चला जाता था बातें बिल्कुल बच्चे जैसी एकदम तो मास्टर महाशय लिखते हैं कि एक बार नित्य गोपाल आया तो ठाकुर उसके साथ में बात कर रहे हैं वो बिल्कुल बच्चे जैसा उत्तर दे रहा है तो उस समय ठाकुर के पास में एक स्त्री भक्त भी आती थी तो वो ठाकुर के ऊपर बड़ी श्रद्धा थी और देखा कि ठाकुर जब कीर्तन वगैरह करते हैं तो यह नृत्य गोपाल भी कीर्तन करता है बार-बार समाधि में चला जाता है ठाकुर ने कहा इसकी परमहंस अवस्था तो को लगा कि लेडी डिवटी को लगा कि वो इसको तो बच्चे जैसा है बालक गोपाल जैसा है तो मातृ भाव से अपने घर ले जाती थी और खाना बाना खिलाती थी बड़ी उसकी सेवा करती फिर ठाकुर के पास बात पास में यह बात आई तो ठाकुर वो नित्य गोपाल जब आया एक दिन तो ठाकुर कहते चलो थोड़ा चांदनी गंगा के किनारे घूम के आते हैं तो साथ में मास्टर महाशय भी थे जो प्रसंग का वर्णन करते हैं तो ठाकुर कहते हैं कि अरे मैंने सुना कि वो लेडी डिवटी वो स्त्री भक्त तुमको अपने घर में ले जाती है क्या तुम जाते हो तो तो क्या यह बात सही है तो नित्य गोपाल एकदम बच्चे की तरह उत्तर देता है हां जाई मिए जाए मैं हां मैं जाता हूं वो ले जाती है मने बिल्कुल जैसे बच्चा है जिसको कि समझ में ही नहीं आता कि सांसारिक संबंध या तो संसार या तो माया क्या है मन उसका उतना शुद्ध है तो इतना शुद्ध मन है फिर भी ठाकुर ने कहा रे साधु सावधान शेखाने जावी ना शेखाने पड़े ब्रह्मा विष्णु महेश खता खावे मने है वो साधु सावधान तुम वहां पर जाना मत वहां पर जाने से ही ब्रह्मा विष्णु महेश भी वो भूल जाते हैं अपना सही स्वरूप तो यह माया अभी देखिए कि पुरुष प्रधान यह सब राइटिंग है तो स्त्रियों के बारे में सावधानी दी गई है यदि स्त्री प्रधान राइटिंग होता तो पुरुषों के बारे में ही इस तरह की सावधानियां दी जाती ऐसा नहीं है कि स्त्रियों का नेचर खराब है या पुरुष का नेचर खराब है ये मनुष्य का एक ह्यूमन क्यूरी टी है यह ह्यूमन नेचर ही है कि उस डायरेक्शन में जाने का यदि हम एनालाइज करें तो इतने छोटे-छोटे इंसिडेंट भी कभी-कभी इतने ह्यूमरस इंसिडेंट भी उसके भीतर में भी कितना सब कुछ छुपा हुआ है वह अपने को देखने को मिलता है अभी इसमें से हम पाठ करते हैं कल बड़ा ही सुंदर इंसिडेंट पड़ा था परसों दिन कि किस तरह से गहने वापस करने थे मां शारदा के पास से तो ठाकुर ने मां सोई हुई थी गहने लेकर के वो ले लिए थे तो उसके बाद में जो पूरा हमने डिस्कस किया था अभी थोड़ा सा आगे चलते हैं श्री रामकृष्ण शे बारे दई बछ राधिक काल कमार पुकुरे छिले ठाकुर उस समय दो साल से भी ज्यादा समय कमार पुकुर में थे किंतु यह कामर पुकुर में जो एक्सटेंडेड स्टे कहा जाएगा अपनी मातृभूमि के साथ में संपर्क यह प्राय आखिरी संपर्क था इसके बाद में शायद ठाकुर एक दो बार गए हैं कमार पुकुर किंतु अल्प समय के लिए और वह जो संबंध जो वहां के सभी लोगों के साथ था एक माधुर्य मय स्मृति थी वह सब अभी बाद में नहीं रहेगी क्योंकि चंद्राणी देवी स्वयं नबत में आकर के दक्षिणेश्वर में उनके साथ में निवास करने वाली थी तो यह कहा जाएगा कि ठाकुर की बाल्य लीला का समापन पर्व है क्योंकि जिस तरह से वृंदावन से एक बार श्री कृष्ण गए तो वृंदावन वापस नहीं लौटे ठाकुर एक बार ये वापस लौटे हैं विवाह करने के लिए किंतु इसके बाद में वो मातृभूमि के साथ में जो एक हृदय का जो संपर्क होता है वहां पर सभी लोग जैसे अपने हैं वो क्या लोग बड़े हो जाते हैं और जैसे वो श्री हरि के केस में हमने देखा ठाकुर ने खुद कहा कि जो लड़का इतना पवित्र है इतना कि ठाकुर के साथ में बचपन में मित्र के रूप में खेल धूल कर सकता है घूम सकता है घूम फिर सकता है उसी को देख कर के ठाकुर ने जब वह दक्षिणेश्वर में ठाकुर को मिलने के लिए गया तो ठाकुर ने कहा इसके चेहरे पर जैसे काले बादल का आवरण छा गया है मैं इसके चेहरे के सामने देख भी नहीं सकता तो इस तरह से धीरे-धीरे करके बचपन के जो संपर्क थे वोह विच्छी होते जाते हैं तो ठाकुर की बाल्य लीला का कह सकते हैं कि आखिरी पर्व था जबकि वो कामर पुकुर में बिल्कुल बच्चे की तरह जो पहले थे वो रहे थे तो ठाकुर उस समय दो साल से भी ज्यादा कमार कुकुर में थे वि बाहेर प्राय दुई बछर परे तिनी 1267 सालर अग्र हायने एक बार ससुर गृहे जान विवाह के लगभग दो साल के बाद 1267 साल के अग्र हायरण मास में एक बार ससुर गृह अर्थात की मां के घर जाते हैं ये 1267 यानी कि यह 181 59 के आसपास का समय होगा तो उस समय ई श मोयर कोथा मोर कोरिया श्री मा कोहिया ले उस समय की बात को याद करके माने कहा था अमार सात बछर बोयो शर समय ठाकुर जयराम बाटी लेन मैं जब सात साल की थी तब ठाकुर जयराम बाटी आए थे बिर परर जोड़े जाए ना विवाह के पर जोड़े म साथ में जाते नहीं है तो खन आमा के बोले छिले तब मुझे ब कहे थे तुमा के जद के जिज्ञासा करे को बरे ब हुए तखन पाच बछर बोलो सात बछर बोलोना जब कोई तुमको पूछता है कि तुम्हारा विवाह कौन सी उम्र में हुआ है तो कहना पा साल की उम्र में नहीं की सात साल की उम्र में तो जोड़े जावा माने यह जो बंगोल की जो भी रीति है विवाह के बाद की तो ठाकुर उस तरह से वो मां को जब मिलने के लिए गए तो अभी मां तो छोटी बच्ची है ना छोटी बच्ची की मेमोरीज अपने बचपन के दिनों की कितनी होगी अभी ठाकुर को अभी देखा है ठाकुर आए हैं तो मन में ये ना बैठ जाए कि मैं ठाकुर को 7 साल की उम्र में मिली थी तो उसी समय मेरा विवाह हुआ था 5 साल की उम्र में हुआ था यह कहना हालांकि ठाकुर ऐसा क्यों कहेंगे मुझे पता नहीं चलता है हम यदि मानते हैं कि सभी घटना के पीछे में कुछ ना कुछ तात्पर्य होता है ऐसी ऐसी घटना जब हमारे सामने आती है तो हमको बैठ कर के सोचना पड़ता है कि यह क्या तात्पर्य हो सकता है फिर जो तात्पर्य हम इसका निकालेंगे गहन गुड अर्थ इसका जद निकालेंगे तो फिर वह सब्जेक्टिव होता है क्योंकि सभी के लिए इस घटना का विभिन्न तात्पर्य हो सकता है जैसे-जैसे आप घटनाएं पढ़ते जाएंगे घटना आपके हमारे मन के बैक स्टेज में हमारे मन के सबकॉन्शियस में बैठी रहेगी जब कहीं कोई जब ध्यान का करते हैं या ऐसा कोई समय आ जाता है कि जबक हमको कोई साइन चाहिए हमको कोई एक इशारा एक एक हमको जैसे कि एक डिवाइन इंडिकेशन चाहिए कि हां ऐसा करो या वैसा करो तो उस समय यह घटनाए सडन मन के सामने आकर के हमको रास्ता दिखाती है तो अभी तो मुझे इसका कोई तात्पर्य समझ में नहीं आ रहा बाद में शायद आ सकता है जोड़े जावा की मां पाछ विवाह मने कर जनने ठाकुर था बोलिया थाकी ब जोड़ जा जाने को ही मां फिर जद विवाह ना समझ ले इसलिए शायद ठाकुर ने यह बात कही होगी मायर आरो मने पड़तो ई समय ठाकुरर सहित आग तो भगने हृदय कतक गुली पद फूल संग्रह करिया खद्र मामी के खोजिया बाहर करिया लेन एवं तिनी नितांत संकु चिता होले यहा द्वारा तहर पाद पूजा करिया छले मा को और भी एक बात याद है कि ठाकुर के साथ में उनका भागी नय अर्थात कि भांजा हृदय भी आया था और कहां है मां कहां है ऐसा करके मां को मां जैसे छोटी बच्ची होती है कोई कभी कोई गेस्ट आता है तो ऐसी संकोच और लज्जा की वजह से कैसे छुप जाती है सबके सामने नहीं आती और यह भी तो उनके पति थे तो किस तरह से मां सबके सामने आकर के उनके साथ बात करेगी मां का स्वभाव भी लज्जा शीला था तो कहीं छुप कर के होगी तो हृदय ने जाकर के मां को खोज निकाला और पद्म फूल से मां के पैरों की पूजा की थी यह हृदय को यह सब बातें किंतु बड़ी महंगी पड़ जाने वाली थी जब बाद में उसने एक बार कुमारी पूजा की थी वो उनके लड़के मथुर बाबू के लड़के त्रैलोक्य नाथ मोस्ट प्रोबेबली उनकी लड़की कि मथुर बाबू तो उस समय उनका मृत्यु हो चुका था तो कालीबाड़ी के संस्थापक तो यह थे दूसरे थे तो अभी उनका तो ठाकुर के प्रति वो श्रद्धा वगैरह कहां तो अभी जैसे ही हृदय ने उनकी लड़की की कन्याकुमारी पूजा की तो वैसे बड़े ही क्रोधित हो गए उनको पता है कि हालांकि धन वैभव सब भी है किंतु हम थोड़ा सा निम्न जात के हैं और हृदय तो ब्राह्मण है तो ब्राह्मण जद ऐसी निम्न जात की कन्या की पूजा करेगा तो शायद हो सकता है कि उनके परिवार का अकल्याणेंकीलम तो हृदय की यह सब हैबिट्स मां के साथ में भी हृदय ने झगड़ा कर दिया था मां चली गई थी वापस और यह घटना तो मुझे फिर भी इसके बारे में मैं काफी बार सोचा है कि हृदय जब मां के साथ में दुर्व्यवहार करता है तो ठाकुर चुपचाप सुन क्यों लेते हैं हृदय को धमकी देते हैं हां कि तुम मेरे भीतर में मतलब मेरा जितना भी अपमान कर लो कोई फर्क नहीं पड़ेगा किंतु मां के भीतर में जो है जो शक्ति विराजमान है तोन का अपमान करोगे तो त्रिभुवन में तुम्हारी रक्षा कोई करने वाला नहीं ऐसा धमकी तो दे दी किंतु ठाकुर ने कोई एक्शन नहीं लिया तो ऐसा हो सकता है कि बहुत सारे इंटरप्रिटेशन है इसके हो सकता है कि मां के मन में ही ठाकुर के साथ में रहने की जो एक डिवाइन इच्छा होती ही है तो शायद ठाकुर ने सोचा होगा कि जितनी भी कामना वासना है इवन दिव्य कामनाएं भी क्यों ना हो यह सत्व भी तो एक जंजीर है तो उसको भी तो तोड़ देना चाहिए मां का मन संपूर्ण रूप से निर्लिप्त हो जाना चाहिए ऐसा शायद ठाकुर ने सोचा होगा या तो फिर जिस तरह से पानी हाटी की घटना है कि ठाकुर जब सभी लोग पानी हाटी महोत्सव में जा रहे थे तो मां की भी इच्छा हुई क्यों नहीं होगी कि वह जाए तो माने कह के भेजा किसी को ठाकुर के पास में संदेश दिया कि मां भी जाना चाहती है मां आए कि नहीं तो ठाकुर ने क्या कहा और जद इच्छा था कि वो आशु माने उसकी जद इच्छा है तो आए तो यह सोच कर के ही माने सोच समझ लिया कि ना ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं जाऊं यदि ठाकुर की इच्छा होती कि हां मां जाए तो हां हां अवश्य आए अवश्य आए मैंने बोलने का तरीका बिल्कुल अलग होता तो इच्छा है तो आए ऐसा कहना उसका अर्थ एक ही है कि ठाकुर की इच्छा नहीं फिर ठाकुर को जब पता चला कि मां ने सामने से मना कर दिया है कि ना मैं नहीं जाना चाहती तो ठाकुर बड़े खुश हो गए क्या कहा लोकेरा जद जद जिता लोकेरा बोलतो हंसो हंसी े छ माने जद दोनों साथ में जाते तो लोग बोलेंगे कि हंस हंसी आए हैं यह मां जब दक्षिणेश्वर में थी तो मां को लेकर के कटुक करने वाले कटाक्ष करके बात करने वाले या तो मां की निंदा करने वाले लोगों की कमी नहीं थी वो कालीबाड़ी में ही कोई लोग ऐसा बोलते थे कि ठाकुर ने अभी मां को वहां पर लाकर के रखा है कोई अभी अपने से तो दक्षिणा स्वीकार नहीं करेंगे किंतु बोलेंगे मां को जाकर के दक्षिणा दे दो माने यह तो अपना एक धन अर्जन करने का एक साधन बना कर के माने समाज है समाज में लोगों को बोल 10 मुंह से लोग बोलते हैं तो ठाकुर इतने अलर्ट थे सब समय कि यदि धर्म की स्थापना करनी है तो छोटी-छोटी चीजों का बलिदान अब देखिए कि एक सुंदर घटना है कि मां हमेशा ठाकुर को भोजन देने के लिए आहार करवाने के लिए जाती थी दक्षिणेश्वर में तो अभी दिन भर तो ठाकुर के पास में भक्तों की भीड़ लगी ही रहती है मां बेचारी नहब में से तो बाहर भी नहीं आएगी लज्जा की वजह से क्योंकि सब समय पुरुष लोग वहां पर रहते हैं एक आहार ठाकुर को करवाने का यह एक समय था कि दो पल ठाकुर के साथ में बैठे तो और जब आहार करने का समय आएगा सबको बोल दिया जाएगा मां आ रही है आप क कमरा खाली कर दीजिए और सभी को पता है कि हां उस समय की प्रथा के अनुसार स्त्रियों के सामने स्त्रियां और पुरुषों का इस तरह से साथ में बैठना ठीक नहीं तो सभी लोग अपना ठाकुर का कमरा खाली करके निकल जाते थे फिर मां आती थी ठाकुर के साथ में बैठ कर के आहार करवाती थी और फिर वो चली जाती थी यह दिन भर में तो थोड़ा सा हो सकता है 1015 मिनट मिलती हो ठाकुर तो खाते खाते कभी-कभी समाधि में चले जाते थे या फिर लोगों को बुलाओ और किसी ईश्वर के नाम का मंत्र जप करो तब कहीं ज ठाकुर का मन समाधि में से नीचे आएगा तो मैंने वो चंद मिनट पल भी ठाकुर के साथ में बैठना मुश्किल था उसमें भी एक आई थिंक वो गौरी मां ना कि गुलाप मां एक बार उन्होंने कहा कि मां वो आई थी वहां से तो कहा कि मां हम र के आप खाना बना दिया है आपने हम ठाकुर के लिए खाना लेकर के जाते हैं तो अभी देखिए कि उनका स्वार्थ इतना था कि यह समझ नहीं पा रहे हैं यह जो लेडी डिवोटा थी मैं आधर गोलाप मा और गोरमा मैं नाम भूल गया हूं तो उनको स्वार्थ से अंध होकर के अपने बेनिफिट के लिए मैं ठाकुर के साथ में उस समय बैठूं जबकि कोई नहीं है तो ठाकुर के साथ में बात करने का एक बहुत ही सुंदर मौका है तो वो मां से वो खाना खाने का थाली लेकर के ठाकुर के पास जा मां को जो जो चंद पल ठाकुर के पास बैठने को मिलता था वो भी बंद हो गया सोच कर के देखिए कि संपूर्ण मन प्राण ठाकुर को अर्पित किया है यही आपने यदि दक्षिणेश्वर देखा होगा तो ठाकुर के कमरे से नबत कितना दूर है मुश्किल से 10-15 फुट दूर है वहीं पर रहती है और बीच में वो एक पर्दा लगाया हुआ है पर्दे में एक छोटा सा एक होल है उस होल में से एक पर्दे में छोटी सी एक फाट है उसमें से ठाकुर को देखती है और यही उनका ठाकुर के साथ में जो संबंध है सहधर्मिणी के रूप में अवतार की शक्ति के रूप में वरना तो ठाकुर सब समय भाव भजन और भक्तों को लेकर के मग्न थे और जो दो चंद पल भी ठाकुर के साथ में बैठने को मिलती थी आहार करवाने के नाम पर वह भी उस एक उन्होंने किसी एक ने जाकर के छीन ली तो यह किस तरह से जो ठाकुर के प्र प्रति यह दिव्य आकर्षण है को सांसारिक आकर्षण तो है नहीं किंतु यह भी तो एक दिव्य आकर्षण है इसको भी तो तोड़ देना है तो यह ट्रेनिंग मने ठाकुर खुद तो मने वो फकीरों के राजा थे उनको तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि मां है कि नहीं है किंतु मां का जो मातृ हृदय जो है वह तो रिलेशन मां मां का अर्थ ही है संबंध भाव भावात्मक संबंध यह जो भाव और प्रेम का बंधन तो मां के हृदय पे उस समय क्या बत्ती होगी किस तरह से ठाकुर मां को अपने से दूर-दूर रखते होंगे कि जब तक मां के भीतर में इवन यह दिव्य आकर्षण यह दिव्य बंधन का सेतु भी टूट ना जाए संपूर्ण रूप से निर्विकल्प भाव में वह स्थित ना हो जाए तब तक मां यह उनका जो युग में आने का प्रयोजन है मां का युग प्रयोजन वह समाप्त नहीं हो पाएगा ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां कोई संज कोई ऐसा हो ही नहीं सकता कि मां फिर अपना शरीर रखे किंतु उनका तो सही कार्य तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही प्रारंभ होना है तो मां को किस तरह से कितनी कठोर ट्रेनिंग से ठाकुर ने उनको बिताया है उनके दिन कितनी कठोर ट्रेनिंग दी है तब कहीं जाकर के जब ठाकुर की महासमाधि हुई मां ने कहा कि मैं भी तब उस समय सोचा कि मैं भी चली जाऊं ठाकुर के साथ में तब ठाकुर ने दर्शन देकर के कहा था एक के बाद एक इतने सारे दर्शन दिए थे कि फिर मां का मन भर गया था और फिर उनको यह समझ में आया था राधु को अवलंबन करके कि जगत में मातृ भाव का प्रसार करना है और यदि मां नहीं रहती तो रामकृष्ण संघ भी नहीं रहता ठाकुर ने 10 लोगों को संन्यास दिया था और स्वामी जी और हो सकता है कि और 152 उससे ज्यादा तो सन्यास तो और कौन देने वाला थी ये दोनों तो इतने कठोर उनके मानदंड थे इतने कठोर क्राइटेरिया थे एलिजिबिलिटी इतना होना चाहिए 90 पर प्लस होगा तो एडमिशन मिलेगा उसके आगे कोई भी एडमिशन नहीं मिलने वाला तो मा थी की जो फेल भी हो जाए उसको भी ले लो तो य मां की यूनिवर्सिटी बोलकर के हमको ग्रेजुएशन करने को मिल रहा है य ठाकुर और स्वामी जी यद वाइस चांसलर होते तो अपना पेर भी रखना मुश्किल हो जाता शारदा देवी तखन बुद्धि परिपक्व होई नहीं मां शारदा की बुद्धि तब भी भी परिपक्व हुई नहीं थी बच्ची के जैसी ही थी तथापि के हो सिखाया ना दिले हो तीनी ठाकुरे चरण जुगल धया दिया तहा के बाता श कोरिया छिले मां को पता नहीं था कि यह सहधर्मिणी होना यह विवाह करना यह बंधन य मनेय सांसारिक संबंध यह सब क्या है और उनका तो दिव्य संबंध था किसी ने मां को कुछ सिखाया भी नहीं था फिर भी मां ने अपने हाथों से ठाकुर के पैर धुए थे और उनको वो पंखे से हाथ वाले पंखे से हवा डाली थी इ हाते अनेके रही हशर उद्रे खोया लो इस यह घ ये देख कर के बहुत बहुत सारे लोगों को ह हंसी भी आई होगी कि यह छोटी बच्ची है उनको तो उने क्या छोटी बच्ची समझे छोटे बच्चे जैसे घर घर खेलते हैं ना किंतु घर घर खेलने का क्या अर्थ है पता भी नहीं है कि तो फिर भी देखिए कि अपने स्वामी जो है अपने पति है उनके प्रति कितनी श्रद्धा और निष्ठा है अपने हाथों से पैर धो दे रही है अपने हाथों से हवा डाल रही है व मने बड़े लोग जो होंगे मां के पिताजी मां की मां वो सबको हंसी आई होगी कि छोटी बच्ची देखिए कि है छोटी किंतु उनकी ऑन वन हैंड देखिए ये जो हम गंभीरानंद जी महाराज ने आगे में भी कहा था ना कि मानवत्वम और ईश्वर यह दोनों की संधि स्थल पे मां खड़ी थी और कब मानवत्वम जिससे कि लोग भय ना उनसे डर ना जाए और उनके साथ में एक बालिका के समान ही व्यवहार करें और कब देवत्व का प्रकाश करना कि जिससे कि लोगों को भरोसा मिले कि इस हलाहल कलयुग में भी हमारे लिए कोई आशा की किरण है तो यह एक मां के देवत्व का प्रकाश हालांकि देवत्व किस डायरेक्शन में उसका परि स्फुट हुआ था किस डायरेक्शन में इसका प्रकाश हुआ था यह देख कर के किंतु इस बार मां के जो पिताजी माताजी होंगे उनको अवश्य एक थोड़ा सा हंसी आई होगी अवश्य उनको एक ह्यूमरस था थोड़ा सा लगा होगा जयराम बाटी ईते ठाकुर श्री मा के लैया कमार पुकुरे गिया छिले जयराम बाटी से ठाकुर मां को लेकर के कमार पुकुर गए थे ये जो जोड़े जावा ये जो साथ में जाना मुझे लगता है यही वर जब कन्या को लेकर के अपने घर आता है साथ में तो यह इ हार ल्प परे तिनी दक्षिणेश्वर फिरिया आबार साधन सागरे डूबी लेन किंतु इसके कुछी दिनों के बाद में ठाकुर दक्षिणेश्वर चले गए और फिर से साधन साधन सागर में साधन समुद्र में डुबकी मार दी ईद के श्री माओ पुर्बे मतो स्नेह मोई माता जत पल्ली सौंदर्य म आपन भाबे गढ़िया उठते थाकी लेन और यहां पर मां शारदा स्नेहमयी मां के रक्षण में चंद्रा मणि देवी के रक्षण में पल्ली सौंदर्य मध्य ग्राम के सुहाना ग्राम के खू खूबसूरत वातावरण में अपने आपन भाबे गड़िया उठते थाक अपन भावे उनको जिस डायरेक्शन में उनको जो ट्रेनिंग देनी है उनको जिस डायरेक्शन में बड़े होना है वो उनकी डायरेक्शन में उनका भी विकास होने लगा ये पली पल्ली सौंदर्य कितना सुंदर शब्द है ग्राम के सौंदर्य के बीच में माने वो कलकत्ता का वो एक है हालांकि ठाकुर तो दक्षिणेश्वर में थे वरना तो शहर एक ऐसा चीज है कि प्राकृतिक सौंदर्य दिखता नहीं किंतु गांव है कि वहां पर वो एक प्राकृतिक सौंदर्य दिखता है उस प्राकृतिक सौंदर्य के बीच में मां का जो जीवन कार्य था उसके लिए जिस तरह से मा का जीवन गणतर होना था व चंद्रा मणि देवी के स्नेह आशीर्वाद के साथ-साथ यह गठन उनका होने लगा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पण मस्तु