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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

स्वामी का पैतृक निवास || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 29 Apr 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्वधर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी [संगीत] गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध स्वामीर भटा पति का घर इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे थे। कल हमने ऑलरेडी देख लिया कि किस तरह से मां शारदा श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि के बाद में तीर्थ दर्शन करने के लिए वृंदावन वगैरह गई। एक साल के बाद में वापस लौटी और फिर जिस तरह से ठाकुर ने कहा था कि तुम अपना कामार पुकुर का घर कभी भी नष्ट मत करना। लोगों के घर रहना। इससे क्या होगा कि अपना यह जो आत्मसम्मान है उसको बलि देकर के रहना। तो हमेशा अपना घर तुम मेंटेन करना। तो ठाकुर का यह जो आदेश था उसका पालन करने के लिए उसको सम्मान देने के लिए मां शारदा कामार पुकुर आकर के रह रही है। और फिर हमने यह भी देखा कि किस तरह से मां जब कामार पुकुर आई तो रामलाल दादा जो कि ठाकुर के भाई के पुत्र थे और जिनको कि ठाकुर ने इतनी सहाय की है। ऐसा नहीं है कि रामलाल दादा यदि चाहे तो मां को इग्नोर करें। ये ऑब्लिगेशन कितना है? लक्ष्मी दीदी जो कि उनकी बहन है नबत में मां के साथ में रही है। मां ने उनको अपनी पुत्री की तरह ही स्नेह किया है। और रामलाल दादा स्वयं ठाकुर की ही वजह से वह दक्षिणेश्वर काली मंदिर में नौकरी मिला था उनको और ठाकुर की ही वजह से ठाकुर के रिलेटिव है। भतीजे हैं बोलकर के ही उनको फिर वहां पे काली मंदिर में पुजारी की नौकरी मिली। तो यह सब ऑब्लिगेशन इतने रहते हुए भी जब ठाकुर ने यह कहा कि जब मां कमरार पुकुर रहेगी तुम उनकी संभाल रखना तो फिर रामलाल दादा कहते हैं हां उनको जहां पे रहना हो रहे तो ठाकुर इमीडिएटली समझ गए कि यह जिम्मा लेने की दानत उनकी नहीं है और ठाकुर ने उसी टाइम उनको डांट के कहा था कि तुम पुरुष हुए क्यों हो तो इस तरह से पूरी घटनावली अभी तक की है कामार पुकुर में मां के तपस्या के दिनों का प्रारंभ हुआ है।

कामारपुकुर: श्रीरामकृष्ण के जन्मस्थान का विवरण 1

अभी का यह जो टॉपिक है, इस टॉपिक में गंभीरानंद जी महाराज उस समय के कामार पुकुर का वर्णन कर रहे हैं। तो मैं यह जो पूरा वर्णन है इसको मैं सीधा हिंदी में ही पढ़ लेता हूं क्योंकि वह बंगाली में से हिंदी करना और यहां पे सिर्फ वर्णन ही है। तो कौन सा घर, कैसा कहां पे क्या नक्शा है वही सब है। मैं उसको सीधा हिंदी में एक बार पढ़ लेता हूं। जो लोग कामार पुकुर गए हैं उन लोगों को तो यह पता ही होगा कि किस तरह से कौन का कौन सा कमरा कहां पे है। रास्ता कहां से जाता है वगैरह क्योंकि ये डिस्क्रिप्शन पढ़कर के ज्यादा हमको समझ में नहीं आएगा। वहां पे जाकर एक बार देखना पड़ेगा। तो डिस्क्रिप्शन है क्योंकि महाराज ने दिया है। मैं सिर्फ पढ़ लेता हूं इसको। कामार पुकुर में श्री रामकृष्ण के निवास स्थान के उत्तरी भाग में आम रास्ते के ऊपर दक्षिणाभिमुख तीन कमरे थे। ये तीन कमरे आप यदि काम पुुर गए होंगे आपने देखे ही होंगे। जैसे अब भी है। अभी भी वही ऐसे ही है। दीवार के बाहर पूर्व ओर का कमरा बैठकखाना था। बीच का कमरा अन्य कमरों की अपेक्षा बड़ा था। वो पहला वाला कमरा जो है वो बैठकखाना बीच वाला जो कमरा वो बड़ा है। अभी भी आप यह देख सकते हैं। उसमें रामलाल दादा के पिता स्वर्गवासी रामेश्वर रहा करते थे। उसके पश्चिम और रघुवीर के घर के उत्तर वाले कमरे में श्री रामकृष्ण रहा करते थे। यह भी आपको पता ही होगा। यह जो रघुवीर का घर जो है यही जो उस समय की एक एक घटना है मां उस समय वहां पर थी उद्बोधन में थी और यह सब चल रहा था कि यह जो ठाकुर का निवास स्थान है पूरा रामकृष्ण मिशन को दे दिया जाएगा। तो उस समय ये लक्ष्मी दीदी रामलाल दादा वगैरह एक बार मां के पास लक्ष्मी दीदी लक्ष्मी दीदी मां का दर्शन करने के लिए वहां पर गई है तो फिर बात ऐसी चल रही थी कि ठाकुर का जन्म स्थान है वहां पर मंदिर बनेगा और यह ठाकुर का कमरा है वो रामकृष्ण मिशन को सुपुत किया जाएगा वगैरह-वगैरह जो डिस्कशन चल रहा था तो उसमें लक्ष्मी दीदी ने जाकर के उद्बोधन में मां को पूछा कि अच्छा यह जो रघुवीर शीतला जिनकी पूजा वो जो हमारे गृह देवता है वो भी क्या रामकृष्ण मिशन करेगा? तो मां ने कहा नहीं नहीं वो सब पूजा तो आपको ही को ही करनी है। आपके घर की जो स्त्रियां है वही वहां पर जाकर के पूजा वगैरह व्रत वगैरह जो भी है वो ठाकुर के परिवार के ही हाथ में वो उनके गृह देवता का वो रहेगा। फिर उसके बाद में ये प्रश्न आया कि वहां पे एक्सेस कैसे हो? माने किस तरह से वहां पर जाया जाए। क्या वो जो मिशन का जो आश्रम का अभी आश्रम तो हमारे जहां पर भी बनते हैं वह कंपाउंड वॉल वगैरह लग जाता है। उसको एनक्लोज कर दिया जाता है। तो अभी यहां पे विशाखापटनम में कंपाउंड वॉल बन रहा है। एक्चुअली क्या है? यहां पे एक साइड में तो रास्ता है और एक साइड में एक नहर जैसा है। तो नहर की ओर कंपाउंड वॉल नहीं था। रास्ते की ओर तो ऑब्वियसली रहेगा। नहर वाले जो पोर्शन है वहां पर कंपाउंड वॉल नहीं था क्योंकि वह तो नहर है। उसको क्रॉस करके कौन आएगा? किंतु फिर भी अभी होना तो चाहिए ही लॉजिकली स्पीकिंग तो अभी वही काम चल रहा है। यहां पर चारों ओर कंस्ट्रक्शन कंस्ट्रक्शन यहां पे एक नहर के ऊपर में कंपाउंड वॉल यहां पास में एक बहुत बड़ा होटल बन रहा है। तो तो एनीवे उद्योग पर्व भारत अभी उद्योग पर्व के बीच में है। सो उस समय ये नली लक्ष्मी दीदी मां को पूछती है कि तो फिर कहां से ये लोग जाएंगे? तो मां ने कहा नहीं तुम लोगों के लिए एक दरवाजा रख देंगे। उस दरवाजे में से आपकी स्त्रियां सीधी वह जो है वो मंदिर में जा सकती है। गृह देवता के आपको आश्रम में से जाने की जरूरत नहीं रहेगी। तो ये सब डिस्कशन उस समय वो मां के वो मायर कथा में है मोस्ट प्रोबेबबली उसी में है। तो यहां पे भी देखिए कि जिस तरह से महाराज डिस्क्रिप्शन देते हैं कि जो रघुवीर का जो मंदिर है गृह देवता का मंदिर उसके उत्तर वाले कमरे में ठाकुर रहा करते थे। वो ठाकुर का वो जो कमरा है आप लोगों ने देखा ही होगा। हम लोगों का तो बड़ा सद्भाग्य यह होता है कि हम लोग वहां पर बैठकर के ठाकुर के कमरे में बैठकर के जप ध्यान कर सकते हैं। मुझे अभी भी याद है सर्वप्रथम मैं कामार पुकुर गया था। जबकि मैं बेलूर मठ में पीपीटीसी जॉइ करने को गया था। उस समय तो वो टूर की जाती है वहां पे एक बार सभी ब्रह्मचारियों को बस में बिठा के तो हम लोग भी गए थे कामार कुकुर गए सब डिस्क्रिप्शन तो सब पढ़ के ही रखा है तो जाने से ही पता चल जाता है कौन सा कमरा कहां पे है यह गृह देवता ये अपने ठाकुर के जन्म स्थान वो जो ढेकीशाल है वहां पे ठाकुर का वो जो एक्चुअल बर्थ हुआ उसके ऊपर में वो गर्भगह है फिर उसके यहां पे यह ठाकुर का कमरा वो तो एकदम फटाफट फटाफट पता चल जाता है। तो फिर हम लोग बाहर खड़े थे तो हमारे महाराज जी जो थे आचार्य महाराज बोलते जाओ अंदर जाओ अंदर जाओ बैठकर के जप ध्यान करो तो हम लोगों को इतना आश्चर्य हुआ कि क्या हमको भीतर में जाना अलाउ है क्योंकि ऑब्वियसली ठाकुर का ठाकुर खुद उस कमरे में रहे हैं तो बोला हां हां हां वो सब जाओ बैठो जप करो तो एकदम फटाफट हम सब जगह नहीं है भीतर में ज्यादा एक बड़ा वैसे ही तो कमरा बहुत छोटा है ऊपर में से एक बड़ा कोट जैसा है जहां वहां पर ठाकुर शयन किया करते थे और इसके अलावा ज्यादा कुछ फर्नीचर जैसा कुछ नहीं है। तो उस कोर्ट के चारों ओर हम लोग बैठ गए और तो पता है ना वह तो पुराने समय की वह जो मिट्टी की और अड़ की कुटिया है मिट्टी की दीवार है ऊपर में ये जो पुवाल से वो जो छत बनाई हुई है खड़ से तो माने गर्मी का समय था किंतु भीतर में जाने से ना इतना शीतल लगने लगा और जमीन भी वो जो वो गोबर से लिपी हुई वगैरह जो सब है वो बिल्कुल जैसे पुराने स्टाइल में होता था एग्जैक्टली ऐसे मेंटेन किया है। सो इतना मतलब भीतर में शीतल है और जैसे ही बैठे पट करके ऐसा मन एकाग्र हो गया दुनिया कहां पे जैसे वो दरवाजे से जैसे भीतर प्रवेश किए दुनिया दरवाजे के बाहर में ही रह गई भीतर में जैसे कि ठाकुर की ही उपस्थिति और वह भी तो बाल गोपाल ना ठाकुर तो वहां पे बच्चे जब थे तब रहा करते थे अभी एग्जैक्टली बच्चे थे उस समय माने कौन सी उम्र से उन्होंने उस कमरे में रहना प्रारंभ किया। आई एम नॉट दैट श्योर। किंतु मने ठाकुर का जो कामार पुकुर की लीला जो है मोर और लेस उसी कमरे में से तो सब प्रारंभ हुआ है। तो म वन ऑफ द बेस्ट टाइम वो जो दक्षिणेश्वर में ठाकुर के कमरे में जप करने के लिए बैठते हैं। वहां पे जय राम बाटी जाएंगे। मां के कमरे के बाहर में जो वरांडा है वहां पर आप जो बैठते हैं फिर यह कामार पुकुर में ठाकुर का कमरा है उद्बोधन में जाएंगे तो वो जो श्राइन ग्रह है उसके सामने जो एक जगह है म दीज़ आर सम ऑफ द बेस्ट प्लेसेस कि आपको यदि जप करना है तो पंचवटी में बैठने का सौभाग्य नहीं मिला थोड़ा रिस्ट्रिक्टेड है अभी वहां पे बेलतला में भी नहीं बैठा कभी किंतु दीज़ आर द बेस्ट प्लेसेस फॉर जप। तो यहां पे भी कहते हैं महाराज कि रघुवीर के घर के उत्तर वाले कमरे में श्री रामकृष्ण रहा करते थे। श्री मां का कामरार कुकुर का जीवन इसी में व्यतीत हुआ। मां भी ठाकुर के ही कमरे में रही थी। इन दोनों घरों के बीच में खिड़की थी। दोनों घरों के बीच में एक छोटा सा रास्ता जैसा था जिससे उत्तर के रास्ते पर जाया जाता था। पुराना रसोई घर दक्षिण की दीवार से लगा हुआ पूर्व पश्चिम की ओर था। तीन भागों में विभक्त इसी के एक कमरे में बाद में श्री मां का रसोई घर बना। यह मैंने नहीं देखा भीतर में जाकर के। भीतर में से तो वही ठाकुर का कमरा ही मैंने देखा है। पश्चिम की दीवार से लगा हुआ बीच में रघुवीर का कमरा था। पूर्व की दीवार के बीच में मकान का प्रवेश द्वार था। इस द्वार और रसोई के बीच ढेकी शाला थी। जहां श्री रामकृष्ण का जन्म हुआ था। उन दिनों श्री रघुवीर के कमरे में देवताओं के निर्मित जो वेदी थी उसमें उसे श्री रामकृष्ण के पिता खुदीराम जी ने अपने सर पर मिट्टी ढो- ढोकर बनाई थी। इस समय उस वेदी पर चार देवता स्थापित थे। गोपाल मूर्ति जो लक्ष्मी दीदी ने स्थापित किया था। खुदीराम जी रामेश्वर तीर्थ से श्वेत पत्थर के श्री रामेश्वर शिव लाए थे वो और फिर श्री रघुवीर को उन्होंने स्वप्न में पाया था। श्री शीतला का प्रतीक आम्रपल्लव युक्त तथा सिंदूर लिप्त घट है। श्री मां ने कहा था यही हमारे परिवार की आदि गृह देवी है। देखिए ये मां शीतला का ये एक कहानी है। मां शीतला की तो नहीं किंतु इसी तरह से कोजागरी पूर्णिमा की कहानी है। देखिए ये जो इस तरह से घर में देवता को स्थापित करना, स्वप्न में देवता को देखना वो सब चीजें इतनी मतलब सामान्य थी उस समय जैसे कि देवता हमारे जीवन के साथ में अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। आज हम आंख बंद करके सोचते हैं तो हम क्या सोचते हैं कि मेरा बैंक बैलेंस इतना है, मेरा सेविंग इतना है, मेरा इन्वेस्टमेंट इतना है, मैं मेरा इंश्योरेंस यह है और मेरा सोशल सिक्योरिटी बोलो ना जो भी बोलो ये ये सब है। यही चीजें लेकर के हमारा मन जो है व्यस्त रहता है। उस समय ना ही यह इन्वेस्टमेंट था, ना ही यह सोशल सिक्योरिटी थी, ना ही यह इंश्योरेंस था, कुछ नहीं था। तो फिर थे कौन? आप विपद में सहाय कौन थे? तो यह देवता हित है। तो देवताओं के साथ में ही जैसे घर करना है, उन्हीं के आशीर्वाद से रहना है, उन्हीं के ऊपर में लिटरली निर्भर करके रहना है। आज हमको देवता पे निर्भर होने के लिए थोड़ा सा मन को कसना पड़ता है कि हां ये मनोबुद्धि चित्त अहंकार माने जो यह सब मैं नहीं हूं। न तातो ना माता न भ्रातार न बंधु यह सब मैं नहीं हूं। चिदानंद रूप शिवोहम शिवोहम यह सब हमको थोड़ा सा जोर करके मन को कहना पड़ता है। तो उस समय क्या था यह सब जोर करके कहने की जरूरत नहीं थी। उन्हें आप विपद संकट जो भी है हंसी खुशी के जो भी पल है देवता ही हमारे सहाय है। तो एक कहानी है मां ने खुद ने कही है। खोजागरी पूर्णिमा का दिन था। यह थी चंद्रामणि देवी ठाकुर की माताजी और रामकुमार उस समय रह रहे थे वहां पे और रामकुमार हम गए थे कहीं बाहर में उनका तो वह तो ब्राह्मण थे एज ए यजमान जब बुलाएंगे किसी विधि करने के लिए पूजा करने के लिए तो वह जाएंगे फिर पूजा करके उनको जो वो भिक्षा प्राप्त होगी वह जो चावल मिलेगा फल मिलेंगे दक्षिणा मिलेगी वह ले वह वापस आएंगे तो यह तो उनका इस तरह से गुजरान चल रहा था तो रामकुमार गए थे इस तरह से किसी यजमान के पुकारने पे उनके घर पूजा करने और यह जो चंद्रामणि देवी है वह अकेली थी तो एकाएक देखा कि वहां से जो लाहा बाबू का घर है उस साइड से ना कि कहीं से एक बड़ी ही सुंदर युवती स्त्री बड़े ही सुंदर आभूषण से सज्ज होकर के ऐसा उनके कमरे के बाहर में आकर खड़ी रही। तो चंद्रामणि देवी तो इतनी विस्मित हो गई। इतनी सुंदर स्त्री और भी इतने सुंदर गहने पहने हैं। वह भी इस रात को क्या कर रही है? तो यह स्त्री ने कहा कि मां मैं क्या आपके घर में आ सकती हूं? तो चंद्रामणि देवी थोड़ी सी डर गई। डर गई होगी कि जो भी है वो उन्होंने कहा कि देखो बेटा अभी तो घर में कोई है नहीं। वो अभी तुम मत आओ। अभी ये स्त्री है। स्त्री से क्या डरना? किंतु खैर जो भी है वो ये स्त्री ने दो से तीन बार पूछा क्या मैं आपके घर में आ सकती हूं? क्या मुझे आपके घर में आने दीजिए। तो सब समय चंद्रामणि देवी ने कहा नहीं बेटा अभी कोई नहीं मैं अकेली हूं अभी मत आओ। तो ठीक है। फिर आखिर में यह स्त्री हंसती-हंसती वहां से चली गई। अभी जब रामकुमार आए तो फिर चंद्रामणि देवी ने इनको कहा कि देखिए इस तरह से एक सुंदर स्त्री सुंदर आभूषण पहन करके इस घनी रात घनघोर रात को अपने घर आई थी। तो अभी क्या है को तो यह ज्योतिष शास्त्र वगैरह आता है यह जो गिनती करना यह समय की गिनती करना तो उनको पता था कि आज कोजागरी पूर्णिमा है तो कोजागरी पूर्णिमा को इस तरह से सुंदर स्त्री सुंदर आभूषण पहनकर के घर आई है तो वो कौन हो सकती है वो तो लक्ष्मी स्वयं तो फिर तुमने कहा चंद्रामणि को कि अरे वो तो लक्ष्मी स्वयं थी जिसको कि तुमने घर में प्रवेश नहीं करने दिया अभी देखिए यह कहानी तो यहां पर समाप्त हुई। मां किंतु यह कहानी कहने के बाद में क्या कहती है कि देखो यह जो लक्ष्मी को घर में प्रवेश नहीं करने दिया बोलकर के ही यह परिवार हमेशा से दरिद्र्य से ग्रस्त रहा है। ये मां का कमेंट है अपने ससुराल पक्ष के ऊपर में। तो ये देखिए कि ये जो देवता है उनका घट स्थापन करना वहां पे गृह देवता उनकी नित्य नियमित पूजा करना इनके साथ में ही जैसे कि घर करना है उनका दर्शन होना सपने में होना किस तरह से जागृत अवस्था में यह सब सामान्य बातें थी ठाकुर को इतना भाव और दर्शन होता था ठाकुर यूनिक नहीं थे इस सब चीजों में ये उनके घर की ही यह सब परंपरा है ठाकुर ने खुद कहा है ना कि यह देवी उनके पिताजी के साथ में फूल तोड़ने को जाती है। छोटी बालकी का स्वरूप धारण करके छोटी बच्ची का स्वरूप धारण करके। और जब वो पेड़ की जो डाल है तो यह बच्ची खुदीराम को कहती है कि अच्छा मैं डाल को पकड़ करके रखती हूं। झुका करके रखती हूं। आप फूल तोड़ लीजिए। तो यह माने देवता का दर्शन देवता के साथ में निवास यह परिवार के भीतर में ही जैसे कि परंपरा की तरह था।

कामारपुकुर: गांव का विवरण 1

आगे क्या कहते हैं गंभीरानंद जी? उस समय कामार पुकुर समृद्ध जन बहुल और कोलाहल और कोलाहल पूर्ण था। परंतु इसी से लज्जाशीला श्री मां के लिए वह भयप्रद भी था। मां कोलकाता से वहां पर गई है तो इसमें भय क्या किंतु फिर भी कोलकाता से ज्यादा कोलाहल कहां हो सकता है और चलो ठीक है दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में रहना वो तो एक बात है वो तो बहुत ही शांत सुंदर जगह थी किंतु बाद में मां ये श्यामपुकुर है काशीपुर है वहां पर भी रही है वो घटना है कि एक बार ठाकुर ने मां को कहा कि बलराम की पत्नी बीमार है तो तुम जाकर एक बार उसको देख के आओ तो मां कहती है कि मैं कैसे जाऊं जाने के लिए? वाहन वगैरह तो कुछ है नहीं। तो ठाकुर थोड़े से उत्तेजित होकर कहा कि अरे मेरे बलराम का परिवार ध्वंस होता जा रहा है और तुम जाओगे नहीं जाओ कैसे भी करके जाओ पैदल जाओ कैसे भी करके जाओ। आखिर में एक वो घोड़ा गाड़ी ने कि ऐसा कुछ बंदोबस्त हो गया। किंतु ठाकुर माने ठाकुर मां को जिस तरह से रक्षण में रखे हैं। पुरुषों के सामने नहीं जाना नहबत में ही रहना। ठाकुर एक बार कहते हैं अह हृदय को कहते हैं कि अरे रदु वो तो गांव की औरत है। वो कहां पे शौच जाएगी? क्या करेगी? इतना संस्कार वगैरह संस्कार मेरा शब्द है। ठाकुर ने ऐसा कहा नहीं किंतु मैं थोड़ा सा ऐड करके कह रहा हूं कि कैसे संस्कार होंगे पता नहीं। वो लोगों की नजर के सामने निकलेगी तो लोग कमेंट करेंगे और उससे मुझे लज्जित होना पड़ेगा। अभी और फिर ठाकुर कहते हैं किंतु देखो इस तरह से यहां पर रह रही है किसी को पता नहीं है मुझे मुझे अभी सध्यारा पहुंचा कि नहीं वो म कोई दिक्कत नहीं कोई दिक्कत की बात नहीं है अभी मां यह पूरी बात सुन रही है और मां घबरा गई मां वो फिर वो मां काली को भवतारिणी को प्रार्थना करना चालू कर देती है कि देखो मां ठाकुर को तो जो दिखना है देखना चाहते हैं तुम दिखा देती हो अभी ठाकुर ने जब ऐसा कहा कि वो मां का तो मुझे कभी मां तो कभी कभी मुझे रास्ते पर दिखती ही नहीं। कब वो स्नान करने को जाती है, कब शोच के लिए जाती है, पता ही नहीं चलता। तो अभी ऐसा ना हो ठाकुर के मन में यह इच्छा प्रकट हुई है। तो किसी दिन मैं यह गंगा के किनारे जा रही हूं और ठाकुर की नजर में पड़ गई। तो आप मेरी मेरी यह जो लज्जा है उसको आप रक्षा करना। मां यह बात भवतारिणी देवी को कहती है। वो किससे अपने अपने को छुपाना है? ठाकुर से छुपाना है। जिस ठाकुर के साथ में मां एक कमरे में रही है कितने दिन उसी ठाकुर की नजर में मां नहीं पड़ना चाहती। तो फिर अन्य पुरुषों की तो क्या बात है? देखिए ये जो मन में जो इच्छा होना वो फलित हो जाना वहां पे क्वालपाड़ा की बात है। म मां की महासमाधि के कुछ सालों पहले की ही बात 1917 ना 1918 के आसपास की। मां जब वहां पर रह रही थी राधु की बीमारी की वजह से राधु पागल थोड़ा सा भी आवाज सहन नहीं होगा ऊपर में से वो प्रेग्नेंट तो और फिर अफीम खाने का यह ओपीएम खाने का उसने हैबिट बना के रखा है थोड़ा सा भी आवाज होगा तो उसका सर माने पता नहीं क्या हृदय धग-धग करने लगेगा चिल्लाना शुरू कर देगी तो पहले तो मां वहां पे निवेदिता स्कूल में जाकर के रही वहां पे भी उसको परेशानी हो रही है तो फिर क्वालपाड़ा आके रह रहा है तो वो क्वालपाड़ा के दिनों की बात है। वो मां के एक त्यागी संतान मां के साथ में वार्तालाप कर रहा है। तो मां ने कहा कि देखो वो जो एक पागल था ना वो पागल आता था। अभी आजकल आ नहीं रहा है। तो वहां पर वो मंदाकिनी देवी बोल के मां की एक सेविका थी और यह महाराज के त्यागी संतान थे। तो मंदाकिनी देवी कहती है मंदा समरी उसको बुलाते हैं। फिर अरे मां आपको इस तरह से क्यों उस पागल का नाम ले रही है? आपका तो मन में जो इच्छा होती है ठाकुर पूर्ण कर देते हैं। तो मां कहती है हां बेटा देखो बात तो सही है। यह कौवा है बहुत दिनों से यहां पर चिल्लाता था तो फिर राधु को परेशानी होती थी। फिर कुछ दिनों के लिए आना बंद हो गया। तो फिर देखा कि मां ने जैसा ही कहा ना कि ये कौवा नहीं आ रहा है। तो फिर से वो कौवा आकर चिल्लाना शुरू कर दिया। तो मां कहती है हां वो जो भीतर में होता है माने जो भी बात उठती है पता नहीं कैसे वो फलित हो जाती है। तो इन लोगों के मन में ये जो बातें उठती है वो पता नहीं कैसे वो ये हो जाती है कार्यशील हो जाती है। सो

कामारपुकुर: गांव का विवरण 2

एकने हमरा एक बार तखनकार कामार पुकुर दिके एक दृष्टि निक्षेप कर यहां पे हम एक बार उस समय के कामार पुकुर की ओर थोड़ा सा दृष्टिपात करेंगे तो श्री रामकृष्ण बाल लीला कामार पुकुर किंचित परिवर्तन होलेले ओ एवं मलेरिया वृद्धि ते नगर आकर्षण पल्ली बारशी संख्या क्रम हराश पते थकीले ओ श्री माय चोखे निश्चय उहा नूतन ठेके कहनाई उस समय श्री रामकृष्ण देव की बाल्य लीला के कामार पुकुर में थोड़ा सा परिवर्तन होने के बावजूद और मलेरिया की वृद्धि से नगर के मलेरिया की वृद्धि होने से और नगर के आकर्षण से ग्रामवासियों की संख्या धीरे-धीरे कम होती हुई होने पर भी श्री मां की दृष्टि से यह निश्चय कुछ नया नहीं लगेगा। ये म नरेशन भी देना है। एक सिंपल नरेशन वो गंभीरानंद जी इतना बड़ा चलाते हैं। हमको दो बार सोचना पड़ता है क्या कहते हैं। तो जो बेसिकली वो क्या कहना चाहते हैं कि ऑफकोर्स ठाकुर के समय मां जयराम भाटी से कामार पुकुर आती थी। यह बात तो हम सबको पता है। तो उस समय मां ने जो ठाकुर के रहते-रहते जो कामार पुकुर देखा था और आज का जो कामार पुकुर मां कब आई थी? ये 1858 1859 में ठाकुर की विवाह हुआ मां के साथ में उस समय से लेकर के आना जो प्रारंभ किया तो माने 1870 यह जो पूरा डिकेड है दस का है उसमें मां जयराम भाटी से कामार पुकुर आती थी। उसके बाद में फिर जब नियमित रूप से मां का दक्षिणेश्वर आना प्रारंभ हुआ तो फिर मां जब वापस जाएगी तो ऑब्वियसली वो जय राम भाटी जाएगी अपने मां के घर पिताजी के घर जाएगी तो उस समय शायद कामार पुकुर आना इतना नहीं हुआ होगा तो फिर मां उस समय जो कामार पुकुर आती थी 70ज में और अभी कामार पुकुर आई है यह 1886 में 18 1888 में 8788 में तो ऑलमोस्ट आप देख लीजिए कि 1215 साल साल का डिफरेंस है। अ ऐसा नहीं है कि मां कभी नहीं गई क्योंकि एक डिस्क्रिप्शन में आता है गंभीरानंद जी ही कहते हैं कि रामलाल दादा के विवाह के समय मां कामारपुकुर आई थी। अभी यह विवाह का डेट मुझे पता नहीं याद नहीं। किंतु माने मां का ऊपर ऊपर से आना जाना चलता रहा। किंतु अभी क्या है कि मां को वहां पर रहना है। तो यह जो एक लंबा मन में स्मृति में तो वही दिन रहते हैं ना कि ठाकुर के रहते-रहते वो वहां पर आती थी। ठाकुर की सेवा करती थी। उस समय का जो कामार पुर मां ने देखा है तो वो एक है और अभी का कामार पुकुर तो क्या है गंभीरानंद जी कहते हैं कि बाल्य लीला का जो कामार पुकुर है उसमें थोड़ा सा परिवर्तन हुआ है। क्या-क्या परिवर्तन हुआ है? सबसे पहले तो मलेरिया का आविर्भाव हुआ है। शरद महाराज एक जगह पर कहते हैं कि यह जो मलेरिया जब बंगाल के गांव में प्रवेश किया उसके पहले का जो जाहो जलाली के दिन थे सभी लोग उसकी बातें करते हैं कि समृद्धि थी गांव में। किंतु जब से यह मलेरिया प्रवेश किया है गांव वासियों की यह जो हेल्थ है वह भी टूटी है और फिर बहुत सारे लोग फिर बेटर अपॉर्चुनिटी ले प्राप्त करने के लिए शहर की ओर आना शुरू कर दिया है। तो यह मलेरिया का प्रकोप और यह फिर शहरों का आकर्षण ये दोनों ने मिलकर के बंगाल के गांवों की अवदशा अवनति की है। तो यहां पे भी गंभीरानंद जी वही बात कहते हैं कि मलेरिया की वृद्धि से और नगर के आकर्षण से दो वजह से यह गांव वासियों की संख्या भले ही चाहे कम हुई हो किंतु मां की दृष्टि से यह बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं है। तथापि स्मरण राखिते होबेजे 1887 ख्रिस्ताब्दे शेषो भाग कामार पुकुर आर वर्तमान कामार पुकुर मध्य आकाश पाताल तफात किंतु फिर भी यह स्मरण रखना होगा यदि आज हम कामार पुकुर जाकर देखें तो आज का कामार पुकुर देख कर के यह ना अनुमान कर ले कि उस समय का कामार पुकुर ऐसा है। माने यह याद रखना होगा कि 1887 ख्रिस्ताब् के अंत भाग का कामार पुकुर और वर्तमान का ये लिखा है 1853 यहां पे डेट लिखी हुई है। वर्तमान यानी कि 1853 में गंभीरानंद जी ये लिख रहे हैं। तो उस समय के का कामार पुकुर के बीच में आसमान पाताल का फर्क है। तो यदि वह ऑलरेडी 1887 से 1953 1953 1953 का डेट है तो यह जो ऑलरेडी 1887 से 1953 के बीच में यह जो डिफरेंस है तो फिर यह 2026 जब की हम बात कर रहे हैं आज के कामरार पुकुर में और उस समय के काम पुकुर में तो कितना बड़ा डिफरेंस होगा तखन श्री श्री ठाकुर बाड़ दक्षिण उहारे सहित संलग्न शुकलाल गोस्वामी देर पाका बाड़ी चिल उस समय श्री श्री रामकृष्ण देव की वाह घर के दक्षिण में उसी के साथ में संलग्न शुकलाल गोस्वामी का पक्का घर था। ग्रामवासी दे निकट उहा गोसाई महल नाम में परिचित छिलो ग्रामवासियों के पास में यह गोसाई महल नाम से परिचित था। अनेक काछारी बाड़ी मतो माने काछारी बाड़ी माने वो जो एक ऑफिशियल जो गवर्नमेंट काछारी अर्थात कचहरी माने ऑफिस ये ऑफिस की तरह एक गवर्नमेंट ऑफिस की तरह यह था चारदी के इष्टक निर्मितो प्राचर चारों ओर ईंट की बनी यह दीवार मध्य एक खानी पाका कोठा और बीच में जो है एक पक्का मकान था बर वर्तमाने ठाकुर मंदिर दक्षिणे जेने कुआ होया छे उहार पारश्व पश्चिमे रास्त के महलेर प्रवेश द्वार छिलो वर्तमान में ठाकुर के मंदिर के दक्षिण में जहां पे कुआं हुआ है उसके पास में ही पश्चिम के रास्ते की ओर उस महल का प्रवेश द्वार था महलेर दक्षिणे खुद्रो पुष्करिणी एवं ताहार तीरे पाइन बंशिया जने का शर स्मृति चिन्ह छिलो महल के दक्षिण में छोटी सी क्षद्र पुष्करिणी पुष्करिणी यानी कि तालाब क्षुद्र यानी छोटा एक छोटा सा तालाब और उसके किनारे पे पाइन वंशीय एक सती का स्मृति चिन्ह था ताहारो दक्षिणे लाहाबा बाबू देर अतिथिशाला उसके दक्षिण में लाहाबा बाबूओं की अतिथिशाला लाहादेर बाड़ीर पूर्व दिके ग्रामेर मध्यस्थले कामार पुकुर नामक बहत जलाशय इस लाहा लाहा की घर के पूर्व साइड में गांव के मध्य में कामार पुकुर नाम का एक बहद जलाशय है। इसी से यह गांव का नाम आया होगा। वही पुष्करणी दक्षिण पश्चिम तीरे एकनो कर्मकार दे बास ग्रहो रहया छे उस पुष्करिणी के दक्षिण पश्चिम किनारे पे अभी भी यह कर्मकार लोगों का वास गृह है। श्री श्री ठाकुर धात्री माता धनी कामारणी ए स्थान ही जन्म ग्रहण करें। ठाकुर को जो धात्री माता थी धनी कामारणी यहीं पे उसने जन्म ग्रहण किया था। ठाकुर बाड़ी उत्तरे सुब्रह हालदार पुकुर तत्कालीन हालदार बंशेर समृद्धिर परिचायक ठाकुर के घर के उत्तर में जो बहुत जो सुब्रहत अर्थात कि जो विराट विशाल हालदार पुकुर है उस समय के हालदार वंश की समृद्धि का परिचायक था। यही हालदार पुकुर जो लोग कामार पुकुर गए होंगे उन्होंने हालदार पुुर देखा ही होगा। ठाकुर का जो घर है उसके पास में ही है। ठाकुर कहते भी है कि यह वही हावलदार पुकुर कि जहां पे जिसके किनारे पर लोग शौच किया करते थे। लोग फिर लोग सुबह को जब स्नान करने को आएंगे तो देखेंगे कि किनारे पर सब शौच किया हुआ है। तो लोग कितनी गाली देंगे। किंतु फिर भी यह शौच जाना बंद नहीं हुआ। फिर एक बार ये कंपनी ने आकर के वहां पर हुक्म लगा दिया। माने आदेश वो जो पत्र है वो लगा दिया। यहां पे कोई किसी को शौच नहीं करना है। तब से यह शौच जाना बंद हो गया। यानी ये जो डिवाइन अथॉरिटी का क्या प्रताप है ठाकुर बताते हैं। तो वही हावलदार पुकुर उस हावलदार पुकुर में हमने भी स्नान किया। आपने भी जो भी गए होंगे वो उसमें प्रवेश तो किया ही होगा। आई होप तत्कालीन हावलदार वंश उस समय का जो हालदार वंश है उसकी समृद्धि का यह पर परिचायक है। माने ये परिचय देता है। हो सकता है कि उन्होंने यह तालाब बनाया हो। अदरवाइज किस तरह से उनकी समृद्धि का परिचय दे। वर्तमान तारा ग्राम छाड़िया छोड़या पड़िया छे। वर्तमान में वे लोग गांव छोड़कर के चारों ओर बिखर गए हैं। शुद्ध तहां देर भिटा देवालय और देव सेवा तहा देर स्मृति बहन कोते छे बस वही उनका घर उनका देवालय और देव सेवा उनकी स्मृति को वहन करता है। ग्रामेर जमींदार लाहा बाबू दे द्वितल हरम्य अह तखनो बाशेर अयोग्य होई ना उस समय के जो जमींदार लाहा बाबू है उनका जो द्वितल यानी कि जो दो मंजिला जो ये है महल जैसा घर है उनका अभी भी आवास के लिए अयोग्य नहीं हुआ है। माने बाद में आवास के लिए अयोग्य हो गया होगा। किंतु मां जब उस समय थी वहां वहां पे फिर भी वह रहने के लायक था। ठाकुर बाड़ी निकट बहु मोरार वास छिलो ठाकुर के घर के पास में बहुत सारे यह मैरा का वास था। मेरा का क्या अर्थ पता नहीं जो भी है एवं बाड़ी उत्तर पूर्व कोण है हाट तला होया बड़ो रास्तार दुई दिखे बहु बिपनी सज्जित छिलो और घर जो है उसके उत्तर पूर्व कोने से हाट तला जा जब जो बड़ा रास्ता जाता है उसके दोनों ओर बहुत सारी विपनी सज्जित थी विपनी का अर्थ नहीं पता बाड़ी उत्तर पश्चिम कोण रास्तार पारश्व डोमपल्ली तखनो जन शून्य होए ना घर के उत्तर पश्चिम किनारे पे रास्ते के पास में जो डोमपल्ली है डोमपल्ली अर्थात जहां पे यह डोम उस समय की तथाकथित निम्न वर्ण रहे वो उन लोगों का घर जो मिठाई बनाता है उनको मोरा बोलते हैं अच्छा अच्छा मोयरा है अच्छा अच्छा हलवाई अच्छा अच्छा तो [हंसी] वेरी गुड जो रास्ते के वो जो डोमपल्ली अर्थात कि ये जो डोम जो वहां पर रहते थे वह अभी भी जन शून्य हुई नहीं थी। जुगीराओ तो स्वगहे था क्या मंदिर शिव पूजा चलाते छ युगीरा अर्थात कि युगी एक वो नात होगी या तो सरनेम होगी बिपनी माने दुकान अच्छा वाह वेरी गुड थैंक यू [हंसी] तो ये जो युगी बोलकर के जो लोग थे वो अपने घर में रहकर के मंदिर में शिव पूजा चला रहे थे माणिक राजा आम्रकानन तखन ब्रो शून्य होए आए माणिक राजा का आम्रकानन तब भी वृक्ष शून्य हुआ नहीं था। ये कैसा है पता है वो जो पदावली है ना वृंदावन में वो जो यह सब पदावली गाते हैं इस तरह से वो म जिस तरह से गंभीरानंद जी अपनी वो गंभीर भाषा में ये लिख रहे हैं प्रोज़ में लिख रहे हैं किंतु आप इसको थोड़ा सा पोएट्री में ले जाएंगे कि वो जमींदार हलदार ला बाबू का जो दो मंजिला कमरा अभी वास के अयोग्य नहीं हुआ है। आम माणिक राजा का आम्रकाननन अभी भी वृक्ष शून्य नहीं हुआ है। इसके ऊपर में आप सुंदर एक पोएट्री लिख सकते हैं। माने लिखी भी जाएगी भविष्य में इसी सब डिस्क्रिप्शन को लेकर के। यह माणिक राजा का आम्रकानन हम लोग गए थे वहां पे। उस समय तो ज्यादा कुछ नहीं था। किंतु अभी रिसेंटली मैंने देखा कि अभी वो फिर से उसको अच्छे से ये आम के पेड़ों से आम के पेड़ वहां पर लगाए गए हैं। काफी उसमें अभी ये डेवलपमेंट हो रहा है। व्हिच इज गुड क्षुद्र बहत जलाशय गुलर तीरे अबस्थितो उच्चशर ताल वृक्ष श्रेणी श्रेणी तखनो निम्नेर स्वच्छ जले प्रतिबिंबित हो तो क्षद्र बहत जलाशय ये पूरा भी संस्कृत ये छोटा सा और बड़ा सा जलाशय उसके तीर पे अवस्थित उच्च शीर ताल वृक्ष श्रेणी उच्चशर यानी कि जो बहुत ही लंबी है ताल ताल वृक्ष श्रेणी ताल के वृक्ष है उसकी यह पंक्तियां जो है तखनो निमनेर स्वच्छ जले प्रतिबिंबित हो तो तब भी नीचे में स्वच्छ जल में प्रतिबिंबित हो रही थी ये एकदम पोएट्री है अभी माने क्या कहना चाहते हैं बाद में जो हुआ जो एक गांव की अवस्था का जो अध पतन हुआ होगा किंतु उस समय जो है जो छोटे से जलाशय और बड़े जल जलाशय इनके किनारे पे ये ताल वृक्षों की श्रेणियां जो है वो पानी इतना शुद्ध है कि अभी भी पानी में प्रतिबिंबित हो रही थी। ऐसा हो सकता है भविष्य में कि पानी जो है वह बिगड़ जाए। उसमें वो मिट्टी वगैरह कादव कीचड़ मिलकर के फिर यह जो वृक्ष है उसमें प्रतिबिंबित ना हो। बाद में कभी शायद ऐसा हुआ होगा। पता नहीं। गंभीरानंद जी कहते हैं कि एटलीस्ट जब मां वहां पर रह रही थी तब पानी इतना स्वच्छ था कि यह जो उच्च शीर जो ताल वृक्ष श्रेणी अभी भी स्वच्छ जल में प्रतिबिंबित हो रही थी। ठाकुर देर बाड़ी उत्तर भागेर शदर दर्ज ऊपर हां ये तो हमने पढ़ लिया। इसका तो हिंदी हुआ था। अच्छा ये पैराग्राफ को मैं स्किप कर देता हूं। इसके

कामारपुकुर: श्रीरामकृष्ण के जन्मस्थान का विवरण 2

बाद का जो डिस्क्रिप्शन है फिर से गंभीरानंद जी क्या कहते हैं तखनकार दिने रघुवीरे घरे देवता देर जन वेदी छिलो उहार माटी श्री श्री ठाकुर पिता खुदीराम निजे माथाए करिया आनिया स्वहस्ते उहा निर्माण करेन उस समय के दिन रघुवीर के घर में देवताओं के लिए जो वेदी थी उसकी मिट्टी ठाकुर के पिताजी खुदीराम अपने सर पर ले आकर के अपने हाथों से स्वहस्ते उसका निर्माण किया है। जिस वेदी पे देवताओं को स्थापित किया गया था उस वेदी उसका निर्माण खुदराम ने स्वयं किया और उसके लिए जो मिट्टी की आवश्यकता थी उन्होंने अपने सर पर वहन करके लाए हैं। हालांकि यह मिट्टी कहां से वहन करके लाए हैं वह नहीं लिखा है। किंतु जहां से भी लाए हो। जनरली शायद ऐसा होता है कि वो तालाब या नदी के किनारे से इस तरह की मिट्टी लाई जाती है मतलब जो भी है वही वेदीते वर्तमाने चारटी देव देवी स्थापितो आन इस वेदी पे वर्तमान में चार देव देवी स्थापित है गोपाल मूर्ति लक्ष्मी दीदी स्थापित गोपाल मूर्ति लक्ष्मी दीदी के द्वारा स्थापित है श्रीजुक्त खुदीराम रामेश्वर तीर्थ होते श्वेत पाथरे रामेश्वर शिव आन्या छिले श्रीजुक्त तो खुदीराम रामेश्वर तीर्थ से सफेद पत्थर के रामेश्वर शिव लाए थे रघुवीर के तीन स्वप्न पया छिलेन रघुवीर को उन्होंने स्वप्न में प्राप्त किया था शीतलार प्रतीक एक्टी आम्र पल्लव जुक्त सिंदूर लिप्त घोट शीतला का प्रतीक था एक आम्र पल्लव युक्त आम का जो यह पत्ते होते हैं उससे युक्त और सिंदूर लिप्त एक घट को था श्री मां बोलिया छ श्री मां ने कहा था इन्ही आमा देर आदि गृह देवता यही है हमारे आदि गृह देवता आर शसुर ना की दर्शन कोरिया छिलेन गलपे सुने छ मेरे ससुर अर्थात कि खुदीराम ने उनका दर्शन किया था मैंने गलपे सुने छ माने किसी को ग माने किसी को बोलते हुए सुना था श महामायाई शीतला मूर्ति ते अल्प बोयो शेर लाल सिंदूरे रंग एवं साड़ी परे हाथ झटानीय शकल अमंगल आर्जना झंट दीन वही महामाया ही शीतला मूर्ति से छोटी एक कन्या के रूप में लाल सिंदूर के रंग की साड़ी पहन करके हाथ में झांटा अर्थात कि यह जो झाड़ू लगाने के लिए जो झाड़ू होता है हाथ में झाड़ू लेकर के जितना भी अमंगल आर्जना अर्थात कि अमंगल कूड़ा कचरा है उसको झाड़ू दे रही है। आर कांकाले कोलशी कोरे अमृत बारी पल्लभ दिए छोड़िए छोड़िए शकल प्राणी के शांति दी और फिर कलसी में से यह अमृत वारी म चारों ओर बिखरती बिखरती सभी प्राणियों को शांति दे रही है। शीतल को छैन शीतल कर रही है। से महामाया रे एकटी रूप शीतला वही महामाया का एक रूप है शीतला ताई सिंदूर माखानो शांति जलेर घट इसीलिए सिंदूर लगाया हुआ शांति जल का घट यह शांति जल बेलूर मठ में जब दुर्गा पूजा समाप्त होती है विसर्जन होता है उसके बाद में वह जो शांति जल वगैरह होता है वो मैं पहली दुर्गा पूजा वो मुझे सब कुछ याद है उस पहली पहली दुर्गा पूजा का बाद में इतनी सारी दुर्गा पूजाएं मैंने बेलूर मठ में भी देखी बाकी सब जगहों पर भी देखी किंतु उसमें से अभी कुछ याद नहीं मैं बेलूर मठ में चार साल रहा था कंप्लीट वक्स के टाइम पे उस समय भी दुर्गा पूजा देखता था किंतु उसमें से कुछ याद नहीं पहले वाली बिल्कुल मुझे याद है वो किस तरह से वो शांति जल वो वगैरह फिर वो किस तरह से वो जो बिल्व पत्र होता है उसमें श्री मां का नाम लिखते हैं तो मैं तो बिल्कुल जॉइ करने को गया था बिल बिल पत्र पे वो मां का नाम लिखना है। तो बाकी अभी जो सभी लोग तो अपनी-अपनी लैंग्वेज में लिखेंगे ना। कोई इंग्लिश में लिख रहा है, कोई हिंदी में लिख रहा है। जो बेंगली है वो बेंगली में लिखते हैं। मैंने ठीक किया कि मां का नाम लिखना है बेंगली में। किंतु उस समय तो जस्ट मैं एंटर ही हुआ हूं। और बेंगली तो पता भी नहीं। पढ़ना सिर्फ लिखना शुरू ही किया। लिखना कहां? पढ़ना सिर्फ शुरू ही किया है। तो मैंने सोचा कि नहीं लिखना है तो बेंगली में ही लिखना है। मां का नाम। तो मैं आसपास में देख रहा हूं। देखा वो जो बंगाली में लिख रहा है तो उसको वो किस तरह से लिख रहा है देखा फिर उसको मैंने कॉपी किया। सो बेंगली में पहला शब्द जो मैंने लिखा है वही वो बिल्व पत्र के ऊपर में ही वो मां का नाम लिखा है। बाद में जब मैं ट्रेनिंग सेंटर में आया तो फिर मैंने बेंगली ग्रुप लिया था। उस समय हमारे प्रिंसिपल महाराज थे देवराज आानंद जी। अभी वो रिटायर हो गए हैं। अभी वो भाव प्रचार देख रहा है। तो मैंने रिक्वेस्ट किया कि वहां पे एक फॉर्म दिया जाता है। उसमें हमको लिखना है कि वो जो कुछ इंफॉर्मेशन मांगी जाती है। उसमें मैंने लिखा था मुझे बंगाली ग्रुप चाहिए। तो देवराज जी ने बुलाया मुझे उनकी ऑफिस में तो इंग्लिश में बोल रहे हैं। डू यू नो बंगाली? आई से यस महाराज ना बंगाली में बोल रहे हैं। सॉरी बेंगली में बोल रहे हैं। बांग्ला बोलते पारो। हम बोल हां महाराज बांग्ला बोलते पारी। बांग्ला लिखते पाो। बांग्ला लिख सकते हो क्या? मैंने कहा हां महाराज मैं बांग्ला लिख सकता हूं। बोला लिख क्या सकता हूं? वो जो बिलवा पत्र पे जो मां का नाम लिखा है वही लिखा है मैंने और कुछ मैंने बंगाली में नहीं लिखा। हालांकि पढ़ सकता हूं बहुत अच्छे से। समझ सकता हूं बहुत अच्छे से कि लिखने का प्रैक्टिस कौन करेगा? सो तो ये दो ही प्रश्न किए। बांग्ला पढ़ सकते हो? पढ़ सकता हूं। लिख सकते हो? लिख सकता हूं। तो ठीक है जाओ। बंगाली ग्रुप में जाओ। किंतु मैंने उस समय रिक्वेस्ट किया महाराज को कि महाराज मैं आपने पूछा मैंने कह तो दिया कि बांग्ला लिख सकता हूं किंतु जो परीक्षा होंगी ना टेस्ट होता है टेस्ट देना होता है आप मुझे कृपया अलऊ कीजिए कि मैं उसका रिप्लाई जो है इंग्लिश में लिखूं मैं इतना अच्छा भी बंगाली नहीं लिख सकता बोलने से तो बोल दिया तो महाराज बोलते हैं ठीक है ठीक है रिप्लाई देना तू इंग्लिश में देना तो वहां पे मैं पूरा ट्रेनिंग सेंटर बेंगली में किया था तो यहां पे भी ये सिंदूर लगाया हुआ शांति जल का घट और फिर यह जो विशेष दिन हां वो से महामाया ही एक रूपे शीतला ताई सिंदूर माखानो शांति जलेर घट वही महामाया ही एक रूप से शीतला देवी है और इसीलिए सिंदूर लगाया हुआ शांति जल का घट है विशेष दिन झोल बदले देवा होए खास खास दिन को उत्सव के दिन ना शुभ दिन को पानी जो है भीतर का वह चेंज किया जाता है। रघुवीर के निरामीश और शीतला के माच भोग देवा होए। रघुवीर को यह वेज और शीतला को यह मछली का भोग दिया जाता है। रघुवीर के लिए खिचड़ी बनाई जाए। यहां पे लिखा ही है। श्री मां इहाओ बोलिया छिलेन श्री मां ने यह भी कहा था रघुवीर रामचंद्र उत्तर पश्चिमांचले। रघुवीर अर्थात कि रामचंद्र ये तो उत्तर पश्चिम दिशा के हैं। यानी ये नॉर्थ इंडिया के हैं। ताई ठाकुर पिता तहां के मध्यम खिचड़ी भोग देते हैं। इसीलिए ठाकुर के पिताजी उनको बीच-बीच में खिचड़ी का भोग देते हैं। अच्छा इसके बाद का जो है कि कामार पुकुर में निवास स्थान और उस समय की घटना है। वही जो मां के तपस्या के दिन की जो बात है वह इसके बाद का टॉपिक प्रारंभ होता है जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु