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ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज हमने अभी तक महाराज जी ने जो पूर्व भूमिका लिखी है उसके बारे में हमने देखा और मेरे ख्याल से यह पूरा हमने पढ़ ही लिया है। आखिरी पैराग्राफ जो है वह मैं फिर से एक बार देख लेता हूं। यहां पर महाराज जी जिस तरह से शक्ति के प्रादुर्भाव या तो शक्ति के पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करने का क्या तात्पर्य है वह पहले तो बताते हैं। फिर बाद में हमको बताते हैं कि कहां पे जिस स्थान में शक्तिपीठ कहा जाएगा ना। मां का जन्म जहां पर हुआ वो तो शक्तिपीठ की ही तुलना में उसको उसका महात्म कहा जाएगा। तो जयराम बाटी ग्राम में मां ने जन्म ग्रहण किया तो इसके पीछे क्या कोई तात्पर्य था कि ये एक रैंडमली सिलेलेक्ट की हुई एक जगह है ऐसा एक प्रश्न महाराज जी हमारे सामने रखते हैं। अभी इसका उत्तर हम अपनीपनी भावना के अनुसार अपने अपने श्रद्धा के अनुसार दे सकते हैं। किंतु महाराज जी अपने से जो कहते हैं वो मैं एक बार देख लेता हूं। पहले तो उन्होंने कहा कि किस तरह से भगवान कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ। भगवान जीशु का जन्म एक अस्तबल में हुआ। तो ऐसे महापुरुषों का जन्म एक ऐसे स्थान में जिसका कि कोई महात्म्य ऊपर ऊपर से नजर नहीं आता। उपलक दृष्टि से नजर नहीं आता। ऐसा तो होता ही रहता है। यह हमको महाराज जी कहते हैं। किंतु साथ-साथ में ही जयराम भाटी ग्राम के बारे में वह जो कहते हैं प्रश्न करते हैं कि जय राम भाटी की कोनो निजस जयराम बाटी की कोनो निजस महिमा छिलो जहर फले से एतो सौभाग्य अधिकारी हलो जयराम भाटी का कोई महिमा था कि जिससे कि वो इतने बड़े सौभाग्य की सौभाग्य का अधिकारी हुआ जयराम भाटी ग्राम मां का आगमन वहां पर हुआ इसके लिए महाराज लिख रहे हैं बहु शने तेमन किु दृष्टिगोचर हो ना श इतिहास पष्ठागुली आमादिग के स्मरण कोया दे बहुत सर्च करने के बाद में भी बहुत सारा चिंतन करने के बाद में भी ऐसा हमको नहीं लग रहा है कि जय राम भाटी का कोई अपना विशेष महात्म्य था जैसे कि कोई बहुत बड़ी पुण्य भूमि हो कोई बहुत बड़ा मंदिर हो कोई बहुत बड़े महात्मा ने वहां पर साधना की हो ऐसा कोई महात्म्य हमको नहीं दिख रहा है। भारत में जैसे 34 लाख गांव जो है उसी में से यह भी एक गांव है। इसका निश्चय वहां के लोग लोगों के भीतर में लोगों के मन में धर्म भावना होगी ही थी। तो वह तो आपको भारत के किसी भी गांव में देखने को मिल जाएगी धर्म भावना। ऐसा थोड़ी ना है कि जय राम भाटी में कुछ ज्यादा था जो कि बाकी सब जगह पर नहीं था। तो जयराम भाटी तो उपलक दृष्टि से बाह्य दृष्टि से बाह्य विचार करके ऐसा लगता है कि उसका अपना कोई महात्म नहीं है। बस फिर वो एक एक कन्वीनिएंट प्लेस था। पास में ही कामरार पुकुर है और ठाकुर के लिए जब वो शक्ति की खोज जब प्रारंभ होगी तब वो मां पास के गांव में होनी चाहिए। बोल के एक कन्वीनिएंट क्लेश क्या मां को दे दिया है? ऐसा एक प्रश्न जदी हो सकता है। महाराज जी लिखते हैं बहुधाने हो तेमन किु दृष्टि गोचर हो ना बहुत ज्यादा बहुत कुछ खोजने के बाद में भी सर्च करने के बाद में भी ऐसा कुछ नहीं लग रहा है कि कामार पुकुर की अपनी कोई जयराम भाटी की अपनी कोई महिमा है। समाज तात्विक सिद्धांत होते हमारा जानिते पाई जे देश नगरवासी शिक्षित ओ धनिक को संप्रदाय चिंता विप्लव ओ उपस्थित होले ओ चिंता विप्लव उपस्थित होले ओ जातीय संस्कृति बहुकाल जा प्ली शांत जीवन आश्रय पूर्वक आत्मरक्षा करिया थाके किंतु यहां पे महाराज जी एक और पॉइंट हमारे सामने रखते हैं। जैसे सभी जगह पे होता है मेट्रोपॉलिटन सिटी है, महानगर है। वहां पे नए-नए विचार बाहर से भी आते हैं और वहां के लोग भी वहां के लोगों के पास में इतना टाइम है कि वो नए-नए विचार कर सके। तो जब विचारों का विप्लव थॉट रेिवोल्यूशन प्रारंभ होता है तो वो महानगरों में ज्यादा होता है क्योंकि वहां पर वो जो शेयरिंग ऑफ लेबर इतना होता है कि आप कोई व्यक्ति जैसे गांव में ऐसा होता है ना ज्यादातर लोग खेती करते हैं या पशुपालन करते हैं या तो फिर खेत में मजदूरी करेंगे माने बहुत ही प्राइमरी लेवल पर उनका एग्जिस्टेंस होता है। जबकि सिटी में होता है कि लॉयर होता है, डॉक्टर होता है, कंसलटेंट होता है, वो टीचर होते हैं। बहुत सारे ऐसे प्रोफेशन है, ऐसे व्यवसाय हैं जो कि बिल्कुल प्राइमरी लेवल पर एग्जिस्टेंस के जीवन निर्वाह के बिल्कुल प्रथम स्तर पर सीमित नहीं है। बहुत ही उच्च स्तर पर यह सब प्रोफेशन, यह सब व्यवसाय वह वहां पे बैठे हुए हैं। तो उनके लड़के होंगे या वह खुद उनके पास में समय होता है कि अपने दिन प्रतिदिन का जो जीवन निर्वाह का जो स्ट्रगल है उसमें से थोड़ा सा ऊपर आकर के थोड़ा सा नए विचार करें। तो यह जो फिलॉसोफर्स होते हैं, यह जो भी आइडियाज नए आते हैं, वो मेट्रोपॉलिटन सिटी में ही ज्यादा आते हैं। तो अभी भारत में ऐसा है। ये तो सब जगह पे है कि नए आइडियाज सिटी में बड़े-बड़े महानगरों में प्रकट होते हैं। किंतु यहां पे भारत की विशिष्टता क्या है? वह महाराज जी लिखते हैं जातीय संस्कृति बहुकाल जा प्ली निश्व शांत जीवन आश्रय पूर्वक आत्मरक्षा करिया थाके नेशनल लाइफ नेशनल आइडियाज नेशनल थॉट्स नेशनल थिंकिंग प्रोसेस गांव के लोगों के भीतर में रहकर के बहुत लंबे समय समय तक अपने को सेफ रख सकता है। क्यों महाराज जी ऐसा लिखते हैं? क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है कि नए विचार जो होते हैं, वह कोई सब समय कोई फायदेक या तो सभी के लिए समाज के लिए कोई पॉजिटिव आइडियाज नहीं होते। उसकी नेगेटिव असर भी हो सकती है। आजकल हम देखते ही हैं कुछ-कुछ आइडियाज ऐसे हैं कि जैसे कि अब जैसे कि नए-नए ट्रेंड चलते हैं। यह सोशल मीडिया के ऊपर में दिन भर बैठे रहना, पढ़ाई लिखाई नहीं करना, स्मोकिंग करना, इस तरह के विचार करना जो कि स्वच्छंद हो। आपके जीवन को कोई उल्टी जगह पे गलत रास्ते पर ले जाए। इस तरह के विचार आजकल की स्कूल्स कॉलेजेस में हमको बहुत सारा देखने को मिलता है। एक समय था कि हमारे यह एजुकेशनल इंस्टट्यूट थोड़े बहुत सेफ थे। आजकल तो एजुकेशन इंस्टट्यूट में भी आप देखेंगे कि जो कि जिन ऐसा इंप्रेशनिस्ट माइंड कहेंगे ना कि ऐसा मन कि जिसके ऊपर में कोई भी बाहर का विचार बहुत ही जल्दी से उसको प्रभावित कर सके। बच्चों का मन इस तरह से वह इनोसेंट होता है, नाजुक होता है। उसके ऊपर में किसी भी तरह का बाक्य विचार बहुत ही जल्दी से असर करेगा। तो ऐसे बच्चों को तो आपको सेफली रखना चाहिए। ठाकुर क्या कहते हैं कि पौधा जब छोटा होता है तब उसको आपको चारों ओर बैरियर करनी चाहिए। उसको सेफ रखना चाहिए। पौधा बड़ा हो जाएगा तब उसके साथ में आप हाथी को भी बांध दो कुछ होने वाला नहीं है। अभी ठाकुर की और एक बात है कि स्वामी जी नरन वगैरह वहां पे पंचवटी में कुछ खाना बना रहे हैं। चढ़वी म पता नहीं उसका क्या होगा हिंदी। तो इस तरह से कुछ बनाया अपने से और फिर ये सब लड़के लोग मिलकर के खा रहे हैं और ठाकुर को तो अच्छा लगता है ये सब जहां पे भी माने क्या है कि एक बॉन्ड ऑफ लव एक भलो भाषा एक बंधन एक प्रेम और स्नेह का बंधन उनके शिष्यों में गठित हो। यह तो ठाकुर चाहते ही थे। ठाकुर ने हमने बार-बार पढ़ा है कि ठाकुर जिस तरह का जिसका मन है उसी तरह के मन वाले दूसरे लड़कों के साथ में भक्तों के साथ में उन लड़कों की वार्तालाप परिचय करवा देते थे। जैसे कि दोनों आध्यात्मिक जीवन में जीवन में साथ-साथ आगे बढ़े। तो इसीलिए गंगाधर महाराज जब पहली बार आए थे दक्षिणेश्वर पहली पहली बार आना जब शुरू किया उसी समय ठाकुर ने कहा था कि जाओ तुम जाकर के सिमुलिया पल्ली सिमुलिया जो स्ट्रीट है कोलकाता में वहां पर नरेंद्र रहता है नरेंद्र को मिलो वो दिन में 100 पान खाता है जो चाहे वो खाता है किंतु फिर भी उसका मन कितना शुद्ध है उस समय ये गंगाधर महाराज ये सब परहेज वगैरह जो करते थे अपने हाथों से खाना बना के खाना वगैरह जो उनका जो था एक ब्राह्मण के लड़के थे ब्राह्मण कुमार थे बाल ब्रह्मचारी थे तो उन लोगों को किस तरह से परहेज रखना है। किस तरह से खानेपीने में प्रचंड संयम रखना है। अपना जीवन किस तरह से कठोर करके चलना है। बालों में तेल नहीं डालना है। हरी तक खाते रहना है। यह सब उनका बड़े ही उनका एक स्ट्रिक्ट रिजिड एक तरह से कहा जाए तो लाइफस्टाइल था। तो ठाकुर ने कहा कि देखो नरेंद्र को जाकर के मिलो। वो 100 पान खाता है। जो मिलता है वही खा लेता है। किंतु मन उसका कितना शुद्ध है। तो वैसे गंगाधर महाराज बाहर बाहर से ये सब करते थे कठोरता। किंतु मन में जो सही-सही शरणागति होती है वो प्रकट हो चुकी थी। वरना तो वो हाजरा भी वहां दक्षिणेश्वर में बैठकर के बहुत सारा दिखावा करता था। यह लड़कों को ये राखाल वगैरह तो वैसे ही हो करे बेड़ाए। माने राजा महाराज वगैरह ये राखाल जो लड़के आते थे ठाकुर के पास में वो हो हल्ला करके वो इधर-उधर घूमते रहते हैं। ऐसा वो हाजरा बैठकर के बोलता रहता था। किंतु वह बाहर से कठोरता का दिखावा करना और सही-सही भीतर में त्याग संयम, शरणागति, निष्ठा और भक्ति वह होना यह दोनों बहुत अलग-अलग चीजें हैं। ठाकुर ने खुद कहा था कि हाजरा के ऊपर में कुछ पैसा है, ऋण है इसलिए वो यहां पर बैठकर के वो पीतांबरी लगा के वो तिलक और माला लेकर के जप करता रहता है। तिलक लगा के सर के ऊपर में जैसे कि कोई धनवान व्यक्ति वहां पे आ जाए देखे कि अरे यह तो बड़ा ही त्यागी और महापुरुष साधु है। चलो उसको कुछ दक्षिणा दे देते हैं। ऐसा यदि कुछ हो जाए तो फिर उसका जो ऋण है वो वो समाप्त हो जाए। ऐसा वो अपने मन में ऐसा वो उल्टा विचार करके ये सब कर रहा है। ठाकुर को पता था। तो ठाकुर वो अब मन की बात तो समझ सकते थे। वो तो बाहर से कोई दिखावा करने से ठाकुर तो ठगने वाले नहीं थे। तो इसीलिए जिन लोगों का मन सही-सही निष्ठावान था, ऐसे लड़कों को ठाकुर ने मिला दिया था और यही हुआ हमारे संघ का फाउंडेशन भित्ति मूल। तो अभी यह लड़के सब एक दिन इकट्ठा होकर के वहां पर पंचवटी में वैसा कुछ खाना वगैरह बनाया और वो खाकर बैठकर के खाने की शुरुआत कर रहे हैं। उस समय एक बाउल बाउल तो हमको पता है कि बेंगल में इस तरह से एक साधु संप्रदाय है जो कि इधर-उधर भ्रमण करते रहते हैं और गान गा करके जीवन निर्वाह भिक्षा करते हैं और साथ में ही कोई ऐसी कहानियां वगैरह भी कहते होंगे। तो ऐसा एक बाउल एक लड़का वह वहां पे इन लोगों के साथ में बैठने के लिए आया। उसने सोचा कि चलो यह सब लड़के यहां मंदिर में इस तरह से खाना बनाए हैं। नरेंद्र वगैरह के साथ में शायद मित्रता भी हो गई होगी। स्वामी जी का था ऐसा कि जो भी ऐसा कोई मिलता है उसके साथ में गप लगाना शुरू कर देंगे। तो वो आकर के बैठ गया इनके साथ में। तो ठाकुर बोलते हैं अरे यहां नहीं। यहां नहीं अभी नहीं। अभी तुमको जगह नहीं मिलेगी। ये लोग खा लेंगे यदि बाद में थोड़ा बचेगा तो तुम खाना। इन लोगों के साथ में मत बैठना। तो नरेंद्र सोचता है कि अरे ठाकुर किस तरह के विचार वाले ये है। अब तो छुआछूत का ये भारतीय समाज में स्वामी जी ने अमेरिका जाकर के कहा था। बाद में भी भारत में जो परिस्थिति देखी उन उन्होंने देखा कि किस तरह से एक प्रकार के लोग उनका चरित्र अच्छा नहीं है। ऐसा बोल करके उनको आउटकास्ट कर दिया गया है और फिर उसी में से ये भारत की सब समस्याएं खड़ी हुई है। बहुत बड़ा एक समाज का एक हिस्सा है जो कि समाज का प्रॉपर पार्ट नहीं है। तो स्वामी जी का तो ऐसा एक इगलिटेरियन एक इलिट एक एप्रोच था। एलिट नहीं कहेंगे इगलिटेरियन कहेंगे। तो एक सबको साथ में म सबका समान अधिकार है। आजकल का यह जो ह्यूमन राइट्स वाली जो बात चलती है ना कि सबका समान अधिकार होना चाहिए सभी चीजों के ऊपर में समाज में जो भी चीजें सोसाइटी में जो होती है तो स्वामी जी सोच रहे हैं कि अरे स्वामी जी ने ठाकुर को कहा कि भले वो भी बैठकर के खाए हमने हमने ज्यादा करके बनाया है तो उसको भी आ जाएगा। तो ठाकुर कहते हैं नहीं वो तुम्हारे साथ में नहीं बैठेगा। बाद में उसको साथ में बिठा करके तुम खा सकते हो। तो ये ये बात हमको लगेगी कि ठाकुर क्यों इस तरह से अपना संघ का गठन भी किया है ऑन वन हैंड ऑन दी अदर हैंड ऐसे लोगों को अपने लड़कों से दूर भी रखते हैं तो अभी यह प्रश्न एक हो सकता है ये इगलेटेरियन थिंकिंग है वो क्या ठाकुर एक्सेप्ट नहीं करते थे सबको समान अधिकार मिलना चाहिए सबको इक्वली ट्रीट करना चाहिए किंतु ठाकुर को था कि जिसके भीतर में जो संस्कार है उस संस्कार के अनुसार उसका गठन होना है। ऐसा नहीं है कि वह बाउल जो है उसके संस्कार गलत है तो वह उसकी निंदा की जाए या फिर उसको जो है तिरस्कृत किया जाए। ऐसा नहीं है। उसके भीतर में उसके पास में इनफ अपॉर्चुनिटी है कि वो अपना भविष्य अच्छा बना सके। उसके उसको भी इनफ अपॉर्चुनिटी देना चाहिए। किंतु ये जो लड़कों का जो संस्कार है वो गलत वो अलग संस्कार है। वो अलग संस्कार से ईश्वर के रास्ते की ओर जा रहे हैं तो उसमें वो मिलावट ना हो जाए इसलिए उनको एक सेफली रखना है कुछ समय के लिए। जब बड़े हो जाएंगे तो स्वामी जी जब अमेरिका गए थे तो उस जो घर लेकर के भाड़े का घर लेकर के रहते थे तो मिसेज मिस वाल्डो है या तो फिर मिस ये सारा मिस ये जो हसब्रो है मिसेज हसब्रो है ये लोग भी तो उनके साथ में एक ही घर में रहते थे तो उस समय स्वामी जी के चरित्र को कोई हानि नहीं होने वाली थी क्यों क्योंकि पौधा बड़ा हो गया है अभी इसके साथ में हाथी भी बांध दो तो कोई फर्क नहीं होने वाला। तो जो भी है ये एक पूरा एक साइड पे साइड लाइन पे हम चले गए। यहां पे जो था महाराज जी लिख रहे हैं कह रहे हैं कि शहरों में ऐसा होता है कि नए-नए विचार आते रहते हैं। अभी नए जब विचार आते हैं तो ऐसा नॉट नेसेसरी कि सभी विचार अच्छे हो। कोई बुरे विचार भी हो सकते हैं। तो इसीलिए जो समाज है, जो संस्कृति है, जो देश है, जो सिविलाइजेशन है उसके जो मूलभूत आदर्श है, उसको गांव में सेफ रखना है। गांव में तो ऐसा फटाफट करके नए-नए विचार नहीं आएंगे। गांव में जो वो पहले से ही परंपरागत आपकी ये जो ये रामायण, महाभारत की कहानियां, पौराणिक कहानियों का पाठ जो होता रहा है वो होता रहेगा। अभी आजकल जिस तरह से सोशल मीडिया और इंटरनेट गांव-गांव चला गया है, हमको पता नहीं कि उसका इफेक्ट क्या होगा। हमारी समाज व्यवस्था ऐसी है कि जो फॉरवर्ड थिंकिंग हो सिटी में हो और जो ट्रेडिशनल वैल्यू्यूज को कंजर्व करना है वो गांव में हो। इस तरह से सिटी और विलेज शहर और ग्राम इन दोनों का कार्य विभाजन हमारे शास्त्रों में हमारी समाज व्यवस्था में कर दिया गया था। तो इस हमारी आदर्श समाज व्यवस्था को तोड़ के सभी के हाथ में गांव में भी यह आधुनिक संसाधन आधुनिक ये कम्युनिकेशन के गैजेट्स वगैरह वो दे दिए हैं। तो हमारी वैल्यू्यूज को प्रिजर्व कौन करेगा? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। नो डाउट स्वामी जी ने रामकृष्ण संघ की स्थापना की। हमारे जैसे दूसरे भी संघ है, सन्यासी संघ है जो कि वैल्यूस को प्रिजर्व करते हैं। किंतु प्रॉब्लम यह है कि रामकृष्ण संघ में जो साधु होने के लिए लड़के आते हैं वह इसी समाज से आते हैं। और यदि समाज में ही दूषण प्रवेश हो गया तो संघ के लिए वो परिशुद्ध एक उच्च विचार वाले लड़कों को जो रिक्रूटमेंट होना है वह फिर धीरे-धीरे करके कट ऑफ हो जाएगा। हम लोग ऑलरेडी देख रहे हैं कि हमारे सेंटर्स हमारी एक्टिविटीज बढ़ती ही जा रही है। बढ़ते ही जा रहा है। किंतु इसके सामने जो क्वालिफाइड मैन पावर जिनके के ऊपर में आप भरोसा करके जो लोग त्याग तपस्या साधना स्वाध्याय एक ऐसा एक अंतर्मुख रास्ता भी अपनाएं और यह बाह्य प्रवृत्ति है उसको भी साथ में लेकर के चलें। यह दोनों का संयम करना हमारे लिए आज बहुत ही कठिन हो रहा है। बहुत बार ऐसा होता है कि एक्टिविटी चालू करने का स्कोप हमारे पास में बहुत सारा है। इनविटेशन बहुत सारी जगहों से आते हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले एक जाम खंभाड़िया बोल करके एक शहर है गुजरात का। वहां से मुझे किसी ने फोन किया। मुझे बोला कि ये राजकोट में जिस तरह का आश्रम है। इस तरह का आश्रम हमको यहां पर चालू करना हो तो क्या करना होगा? मैंने कहा बहुत अभी मैं उसको क्या बताऊं बहुत कुछ करना पड़ेगा ऐसे ही आश्रम चालू नहीं होता सालों सालों तक वहां पर आपको भक्तों को इकट्ठा होकर के कोई केंद्र में जाकर के स्टडी करना है साधना करनी है जप ध्यान करना है दीक्षा लेनी है लिटरेचर सेल करना है साधुओं को इनवाइट करना है आपका खुद का जीवन परिवर्तित करना है तब कहीं जाकर के एक दिन ऐसा आएगा कि भक्त मंडली इतनी स्ट्रांग हो जाएगी कि वह बेलूर मठ में जाकर करके रिक्वेस्ट कर सके कि हां हमारे पास में अभी एक स्ट्रांग फाउंडेशन है रामकृष्ण विवेकानंद विचारधारा का इस शहर में यदि अभी आप साधु भेजेंगे किसी को अभी ऑफिशियली सेंटर को आप ग्रहण करेंगे तो निश्चय वो वो सभी के लिए फायदेमंद होगा। रामकृष्ण मिशन ऐसी कोई जगह पर जाके केंद्र स्टार्ट करें जहां पर कुछ भी नहीं है तो साधु लोग बेचारे करेंगे तो क्या करेंगे? यदि मंदिर में भक्त नहीं आते हैं, एक्टिविटी हम करने के लिए वंटियर्स नहीं मिलते हैं तो वो उस जगह पर जाके तो हम लोग क्या कर सकते हैं? इसीलिए आजकल सेंटर चालू करना देखिए किंतु दूसरी बातें हैं कि ऐसे भक्त मंडली बहुत सारे शहरों में है। बार-बार हमको इनविटेशन आता है कि हां हमने सब कुछ तैयार कर दिया है। हमारे पास में इंफ्रास्ट्रक्चर भी है, एक्टिविटीज भी है, डिवोटीज भी है, वॉलंटियर्स भी है। सालों साल से है। ऐसा नहीं कि 510 साल से 50 60 साल से यहां पे है। किंतु फिर भी हम वहां पर केंद्र अपना ऑफिशियल रामकृष्ण मिशन का सेंटर स्टार्ट नहीं कर पाते। वो प्रॉब्लम है क्वालिफाइड मैन पावर का। तो अभी यह प्रश्न है कि गांव में अपनी संस्कृति को जीवित रखने का हमारे पुरखों का प्लान था और जितने भी फॉरवर्ड आइडियाज, रेवोल्यूशनरी आइडियाज वो चाहे अच्छे हो ना कि बुरे हो यह सब महानगरों में बनते रहे। और इवेंचुअली क्या हो कि गंगा और यमुना का संयम जिस तरह से संगम जिस तरह से होता है, ट्रेडिशनल वैल्यूज़ और फॉरवर्ड आइडियाज इन दोनों को मिलाकर के बीच-बीच में एक नए तरह से अपनी संस्कृति को रिफ्रेश किया जाए। बहुत बार कोई लोग सोचते हैं जो ट्रेडिशनली माइंडेड होते हैं कि क्या हमको नया कुछ देखने की ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है? हमारी ये जो पुरातन संस्कृति, सनातन संस्कृति उसमें तो सब कुछ है। क्या हमको कोई नया आदर्श, कोई नए विचार, कोई नई वैल्यू्यूज बाहर से ग्रहण करने की जरूरत है। आवश्यक है कि नहीं? तो है यदि हम सतत अपने को रीइन्वेंट नहीं करते रहेंगे एज ए सिविलाइजेशन एज ए स्टेट एज ए गवर्नमेंट और एज ए सोसाइटी तो हमारे लिए बहुत बड़ा खतरा है कि यह जो इनोवेशन दूसरे देशों में होती है वो इनोवेशन ले आकर के जब हमारे पे आक्रमण करें तो हमारे पास में किसी तरह का डिफेंस ना रहे। ये जो पहली पहली बार वो ये मुगल लोगों ने वो बंदूक लेकर के आक्रमण किया था तो ये हमारे राजा लोग हाथी पर सवार होकर के युद्ध करने के लिए गए थे। अभी वो एक बंदूक फोड़ेंगे तो हाथी डर के मारे पागल हो जाएगा। इधर-उधर दौड़ने लगेगा। अपने ही सैन्य के अपने पैरों के नीचे कुचड़ देगा। तो ये मॉडर्न टेक्नोलॉजी कभी-कभी इतना एक सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं क्योंकि टेक्नोलॉजी तो एक सोसाइटी सोसाइटल प्रोसेस का पार्ट है। कल मैं एक मैं देख रहा था छोटा सा डॉक्यूमेंट्री आधुनिक शस्त्रों के ऊपर में। तो एक शस्त्र एक फाइटर प्लेन होते हैं। ये मशीन गंस होती है आजकल कि क्या-क्या लेटेस्ट डेवलपमेंट क्या है? वो वॉरफेयर टेक्नोलॉजी में है। तो वो मैं देख रहा था। फिर मैंने सोचा ये ये शस्त्र जिसके पास में चले जाएंगे वह तो जो चाहे वह करेगा। फिर किंतु मैंने सोचा कि सिर्फ शस्त्र हाथ में लेकर के उसको चलाने से तो नहीं होगा। उसका मेंटेनेंस करना उसका सर्विसिंग करना उसको फिर डेवलप करते रहना यह भी तो एक बहुत बड़ा पार्ट है। और यह मेंटेनेंस सर्विसिंग और न्यू इनोवेशन डेवलपमेंट ये कौन करेगा? ये तो स्कूल के ग्रेजुएट लड़के करेंगे। यह थोड़ी ना सोल्जर्स करने वाले हैं। सोल्जर्स के भीतर में बहादुरी होती है। शौर्य होता है। वह अपने सीनों पे गोली ग्रहण करने के लिए अपना आत्मबलिदान करने के लिए तैयार होते हैं। किंतु ये नए-नए वेपंस की खोज करने के लिए जो मैथमेटिक्स और फिजिक्स का जो अंडरस्टैंडिंग है वो वही जो अपने इस तरह से एक छोटी सी केबिन में चश्मे पहन के बड़े-बड़े वो किताबें लेकर के कंप्यूटर के सामने बैठकर के वो जो टाइपिंग करते होंगे ऐसे ही लोग इस तरह की वेपंस का डेवलपमेंट मेंटेनेंस सर्विसिंग कर सकते हैं। तो वेपंस तो अपने अपने आप में कुछ नहीं है। उसके पीछे पूरा एक एकेडेमिक इंडस्ट्रियल कॉम्प्लेक्स खड़ा है जो कि इस वेपंस को मेंटेन करता है। इस वेपंस को जन्म देता है। तो वैसे ही यह लोग जो आ गए अपने ऊपर आक्रमण करने के लिए वो कुछ शस्त्रों या गनबोट या गन पाउडर यही उनके पास में एक्स्ट्रा नहीं था। एक पूरी नई विचार सरणी थी। सोसाइटी को किस तरह से दूसरे तरीके से रिऑर्गेनाइज किया जाए। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन जब आया तो यह इंडस्ट्रियल सिविलाइजेशन एक अग्रेरियन सिविलाइजेशन में से इंडस्ट्रियल सिविलाइजेशन में जो ट्रांजिशन ये पूरा सोसाइटल लेवल पे ट्रांजिशन यूरोप में हुआ था। और यही यूरोपियन जब भारत आए पहले तो ये इस्लामिक सिविलाइजेशन भी इतना एडवांस धीरे-धीरे हुआ था। बाद में तो चलो उन लोगों के भीतर में डिटेरेशन होना स्टार्ट हुआ। जब इस्लामिक सिविलाइजेशन में डिटेरेशन स्टार्ट हुआ तब वो द स्लेक वास पिक्ड अप बाय यूरोपियन सिविलाइजेशन। तो वे लोग जब भारत आए हम लोग इतने पश्चात हो चुके थे हमारा सोशल स्ट्रक्चर कि हम अपने को डिफेंड ही नहीं कर पाए। तो ये देखिए कि ऑन वन हैंड ट्रेडिशनल वैल्यू्यूज को विलेजेस में प्रिजर्व रखना है। न्यू आइडियाज को सिटीज में उसको डेवलप होते देना है। और एक समय आएगा जैसे कि दक्षिणेश्वर में ग्राम और शहर अपनी ट्रेडिशनल वैल्यूस और आधुनिक विचार सारणी भगवान रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद ये दोनों का संगम हमने दक्षिणेश्वर में देखा। तो इस तरह से जब ट्रेडिशनल वैल्यूस का नए विचारों के साथ में संगम होता है तब एक बिल्कुल ही नई तरह से नई सिविलाइजेशन के बीज पनपते हैं और एक पूरा एक नया मानव समाज में एक पूरी नई विचारधारा का प्रारंभ होता है। तो यहां पे महाराज जी इसलिए लिखते हैं कि जातीय संस्कृति बहुकाल जा पल्ली निश्व शांत जीवन आश्रय पूर्वक आत्मरोखा कोरिया थके हमारी भारतीय ट्रेड कोई भी देश की ट्रेडिशनल वैल्यूस भारत के लिए खास भारत के हमारे ऋषि मुनियों ने जो व्यवस्था की है हमारी वैल्यूज ग्राम में रहकर के वो सब वो आधुनिक ये विचार सरणी से दूर ग्राम में रह अपने को प्रिजर्व कर सकती है। अपने को वह सेफ कर सकती है। विशेषत भारतीय संस्कृति दरिद्र ब्राह्मण और कपर्दक हीन धर्म गुरु के आध्यात्मिक उच्चासन छाड़िया दिया आतखार एक अद्भुत उपाय आविष्कार कोरिया छे। यह बहुत बड़ा सेंटेंस महाराज जी ने कहा है। महाराज जी लिखते हैं कि भारतीय संस्कृति ने एक दूसरा बड़ा काम क्या किया है कि एक तो है कि शहर और ग्राम दोनों को अपना-अपना कार्य अपना-अपना आइडियल्स दे दिया है। और साथ में ही समाज में सर्वोच्च स्थान किसको दिया है? जिस जो निर्धन ब्राह्मण है, जो स्कॉलर है, जो पंडित है, जो साधक है, जो धर्मगुरु है, उसके लिए उच्च आसन रिजर्व करके रख दिया है। स्वामी जी कहते हैं जब वो अमेरिका से भारत लौटे थे तो कहते हैं कि वो यूरोप में ऐसा होता था कि ये जो बड़े-बड़े कार्डिनल होते हैं वो कहते हैं कि मेरे पूर्वज मेरे पुरखे बहुत बड़े लुटेरे थे। बहुत बड़े वो लोगों को ऊपर में राज करने वाले वे लोग राजा थे। उनको यह गर्व होता है धर्म गुरुओं को कि उनके पुरखे बड़े-बड़े राजा थे या तो बड़े-बड़े लुटेरे थे। भारत में उल्टा है। भारत में बड़ा राजा भी कहेगा कि मेरे पूर्वज मेरे मैं जिनका वंशधर हूं। वे लोग धर्मगुरु थे। वे लोग ब्राह्मण थे। वे लोग तपस्वी थे। वे लोग ऋषि मुनि थे। और इस ऋषि मुनियों के वंश में मैंने जन्म ग्रहण किया है। ऐसे ऋषि मुनि जो कि वह आश्रम में रहते थे जंगल में से फल फूल लेकर के वही सब खाते रहते थे। तो ऐसे ऋषि मुनियों के आश्रम में हमारा वंश बना है। बड़ा हुआ है और आज मैं इसी वंश में से निकल कर के राजा हुआ हूं। तो स्वामी जी कहते हैं देखिए दोनों देशों का दोनों सभ्यताओं का आदर्श किस तरह से डिफरेंट होता है। यूरोपियन सभ्यता का आदर्श है कि इवन कोई बहुत बड़ा धार्मिक व्यक्ति भी होगा तो वो कहेगा कि मेरे पुरखे बड़े-बड़े राजा थे और यहां पे बड़ा राजा भी होगा। तो वो कहेगा कि हमारे पुरखे ऋषि मुनि थे। तो ये सिविलाइजेशनल डिफरेंस जो है वो यहां पे फिर से महाराज जी हमको पॉइंट आउट कर रहे हैं। भारतीय सभ्यता में भारतीय समाज में उच्च आसन यानी कि सर्वश्रेष्ठ श्रद्धा भक्ति और जिनके प्रति रिस्पेक्ट तो किन के प्रति है? तो जो धर्मगुरु है, ऋषि है, मुनि है, साधक है, ब्राह्मण है, पंडित है, जो आचार्य है, जो गुरु है, इनके लिए सर्वोच्च आसन रिजर्व रखा गया है। आजकल उल्टा होता है रिजर्वेशन में। उस समय इस तरह का रिजर्वेशन था कि जिनके पास में विद्या है और जिनके पास में त्याग है। तो इन लोगों के लिए सर्वोच्च आसन रिजर्व था। तो देखिए कि किस तरह से भारतीय संस्कृति की रक्षण किया गया। सबसे पहले तो गांवों को इस तरह से एक सेल्फ सफिशिएंट यूनिट बनाया गया कि ये जो आधुनिक विचार रेवोल्यूशनरी आइडियाज कहीं बहुत ज्यादा आकर के दिन प्रतिदिन ग्राम के ऊपर में ग्राम के सरल लोगों के ऊपर में यह आघात ना करते रहे। जैसे कि उनका मतिभ्रम ना हो जाए कहीं कि अरे शहर में जैसे ड्रग्स का आजकल ट्रेंड चलता है ये सोशल मीडिया को लेकर ये गेम्स हमारे यहां पे जो कंप्यूटर मेंटेनेंस करने के लिए एक भाई आते हैं बड़े रेगुलर आते हैं बड़े समय से आते हैं तो ऐसे मैं उनको कभी-कभी पूछता रहता हूं कि क्या आजकल ट्रेंड क्या है बताओ हमारे शहर का ये टेक्नोलॉजी कंप्यूटर वगैरह के बारे में तो वो अभी मुझे रिसेंटली कह रहे थे कि अभी हमारे शहर में बड़े-बड़े गेमिंग पीसी लेकर के दिन भर गेम खेलने वाले लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई है। एकदम लाख लाख दो तीन 5 लाख रुपयों का पीसी वे लोग खरीदेंगे और ये एकदम महंगीमहंगी एकदम कॉम्प्लिकेटेड वो ग्राफिक्स हैवी गेम्स वो लोग खेलते रहेंगे। मैंने कहा ये सब तो वो बंबई अहमदाबाद ये सब जगहों पे होगा। ये तो हमारा तो राजकोट तो ऐसा कोई ऐसा कोई मतलब ट्रडी सिटी नहीं है कि यहां पे ये सब होगा। तो नहीं महाराज जी यहां पे भी अभी ये सब होता है। यहां पे भी गेम खेलने वाले इस तरह से लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। तो मैंने कहा अरे ये सौराष्ट्र तो वैसे ही एक ट्रेडिशनल जगह है। संतों की भूमि है। यह सौराष्ट्र जिस जगह पर हमारा शहर है इसको सौराष्ट्र कहा जाता है। संतों की भूमि है। वीर लोगों की भूमि है। यहां पे इस तरह से ये गेमिंग वगैरह क्या अभी क्या चला है देखिए कि ये किस तरह से हमारी जहां पर ट्रेडिशनल वैल्यूज प्रिजर्व हो। देखिए राजकोट आश्रम सक्सेसफुल गुजरात में सबसे ज्यादा इसीलिए भी है कि यहां के लोग बड़े सरल है। साधु संतों के ऊपर में अपने हृदय में से इमीडिएटली वे लोग भरोसा करना शुरू कर देंगे। वे लोग ऐसा नहीं सोचेंगे कि गेरवा पहना तो है किंतु पता नहीं भीतर में क्या होगा। गेरवा देखा तो नमन करते हैं। गेरवा देखा तो रिस्पेक्ट देते हैं। इस तरह का वो सरलता है। हां। गेरवा पहनने के बाद में आप गड़बड़ करेंगे तो फिर इतना ही जितना आपको जितना इजीली आपको रिस्पेक्ट देना शुरू कर दिए थे इतना ही इजीली आपके ऊपर नाराज हो जाएंगे और इतना इजीली मारकाट करना भी शुरू हो जाएंगे किंतु खैर दैट इज अनदर पॉइंट ये श्रद्धा भक्ति सरलता ये सौराष्ट्र में तो बहुत है। तो यहां पे इस तरह के वो ट्रेंड चल रहे हैं। अभी क्या कहेंगे? तो यह जो प्रिजर्व करना है ट्रेडिशनल वैल्यूस को दो तरह से एक तो ग्राम में प्रिजर्व हो दूसरा कि यह ब्राह्मण गरीब ब्राह्मण साधक जिसकी कोई अपेक्षा नहीं है कपर्दकहीन जिसको कहा जाता है धनहीन जो होता है मानहीन नहीं होता धनहीन जो होता है और जो धनहीन होता है उसी के पास में सर्वोच्च सम्मान जाता है क्योंकि वह आदर्श के लिए जीता है नहीं कि इंद्रियों के भोग के लिए तो यह वैल्यू हमारे भारतीय समाज में एकदम हमारे जड़ मूल में डाल दी गई है। प्रत्येक भारतीय के हृदय के भीतर में ह्रदय के अंतः स्थल में यह डाल दिया गया है कि हमारा खुद का जीवन कैसा भी हो। हम लोग चाहे जितने भी धन के लिए हमारा मन लालायित होता रहे। मान सम्मान के लिए हम जो कुछ भी करते रहे किंतु जैसे ही एक त्यागी को देखा। जैसे ही ऐसे किसी व्यक्ति को देखा कि जिसके लिए धन मान और स्मान कुछ भी नहीं है। तुच्छ है इजीली इमीडिएटली उसके प्रति हमारी श्रद्धा भक्ति चली जाएगी। यह नरेंद्र मोदी की प्रति भी लोगों का आजकल जो सम्मान है वो इसीलिए है। देखते हैं कि देखिए उसका पर्सनल लाइफ तो हम लोग देखने के लिए नहीं गए हैं। वो क्या कर रहा है क्या नहीं कर रहा है। किंतु हम देखते हैं कि वो उस उनकी मां खास करके उनकी मां के बारे में मैं कहूंगा। किस तरह से वो एक वो वड़ नगर में ना विशगर वो जहां पर वह वो रहते हैं और वहां पर ही अभी भी उनका उनकी मां का देहांत भी वहीं पर हुआ था। तो देखिए कि अपनी मां को भी वह दिल्ली ले जाकर के कितने सुख वैभव में रख सकते थे। किंतु वो वहीं पर रही वो छोटे से शहर में। तो यह त्याग जब भी हम लोग देखते हैं इमीडिएटली हमारी श्रद्धा भक्ति चली जाती है। उसकी पॉलिसी और फिर जो कुछ भी हो वो दैट इज अनदर मैटर। किंतु त्याग देखकर के सम्मान देना यह हमारे भारतीयों का जीवन मंत्र है। तो इसीलिए यह दूसरा एक यहां पे हमारे पुरखों का हमारे ऋषि मुनियों का ये एक सिस्टम बनाया हुआ है कि सर्वोच्च आसन सर्वोच्च सम्मान किसके लिए तो जो त्यागी है जो विद्वान है जो साधक है जो धर्मगुरु है जो ऋषि है। जयराम भाटी की शई अध्यात्म संपदे घोरियान आखिर में यह समाप्त होने से पहले महाराज जी एक प्रश्न करते हैं। जयराम भाटी ग्राम भी क्या इन दोनों गुणधर्म ये जो लाक्षणिकताएं बताई गई है उससे गरियान इससे धनवान इससे समृद्ध है कि नहीं दो लाक्षणिकताएं सर्वप्रथम तो एक शांत गांव एक शांत ग्राम्य जगह जहां पे कि यह आधुनिक विचार सरणी का आक्रमण नहीं होता। दूसरा कि ऐसे लोगों का वसवाट जो कि दरिद्र तो है किंतु उनका जीवन उनका हृदय निष्ठा भक्ति और एक आत्म गरिमा जिसको कहते हैं आत्मश्रद्धा जिसको कहते हैं उससे भरपूर है। क्या यह दो आध्यात्मिक संपद जयराम भाटी ग्राम में थी? इसके लिए क्या इस ग्राम में मां ने जन्म ग्रहण किया? महाराज जी यह प्रश्नार्थ करके छोड़ देते हैं। इसका कंक्लूजन आपको करना है। देखिए आज सुबह को मैं एक गुजराती ट्रांसलेशन देख रहा था। तो गुजराती ट्रांसलेशन में बाकी सब तो ठीक है किंतु ये आखिरी जो सेंटेंस में महाराज जी ने प्रश्न किया है क्या जयराम भाटी ग्राम में इस आध्यात्मिक संपदा का प्राचुर्य है भरपूर है तो वहां पर प्रश्नार्थ चिन्ह नहीं किया है जिसने भी ट्रांसलेशन किया होगा पता नहीं किस तरह से ट्रांसलेशन हुआ है किंतु वहां पर सीधा-सीधी लिख दिया गया है कि जय राम भाटी ग्राम इस जयराम भाटी ग्राम में यह आध्यात्मिक संपद भरपूर है। ऐसा स्टेटमेंट देकर के छोड़ दिया है। तब फिर मेरे मन में विचार आया कि यह जो ट्रांसलेशन है यह गलत तो है। आपने प्रश्न चिन्ह छोड़ दिया है। किंतु ये सिर्फ सेंटेंस का स्ट्रक्चर चेंज कर दिया। ये इतना ही गलत है कि कोई फंडामेंटल मिस्टेक है इसके भीतर में। मैं आज सुबह को सोच रहा था। महाराज जी ने प्रश्न चिन्ह नहीं किया होता ओरिजिनल में और प्रश्न चिन्ह किया है जो कि अभी है तो क्या डिफरेंस होता? यदि ऐसा आपको तो इतना ही एक स्टेटमेंट ही तो देना है ना कि यहां पर आध्यात्मिक संपद है और ऐसा बोल करके आपको कहना है कि इसीलिए मां का जन्म यहां पर हुआ। किंतु प्रश्नार्थ चिन्ह जो ऐड किया है मुझे लगता है मैंने पहली बार जब पढ़ा था तो मुझे इतना इसका तात्पर्य मुझे ऐसा समझ नहीं आया। किंतु जैसे ही मैंने गुजराती के साथ में कंपेयर करके देखा कि अरे वहां पर प्रश्न चिन्ह नहीं है तो फिर मेरे मन में हुआ कि प्रश्न चिन्ह का क्या महत्व है? नहीं रखने से भी तो चल जाता। महाराज जी ने जब इतना सब कुछ एनालिसिस किया है तो एक छोटा सा कंक्लूजन दे ही देते। उस कंक्लूजन को क्वेश्चन मार्क करने का क्या आवश्यकता था? किंतु फिर देखेंगे कि ये पूरा जो आइ ये पूर्व भूमिका जो महाराज जी ने लिखी है उसमें वो ऐसा कहना चाहते हैं। पहले भी लिखा है और पूरी किताब का जो एक ओवर आर्चिंग थीम जिसको कहते हैं ना कि एक किस थिंकिंग किस थीम को लेकर के किताब लिखी गई है। तो ये महाराज जी हमारे सामने कंक्लूजन नहीं रखना चाहते कि हां ये मां शारदा सरस्वती मां दुर्गा का ही अवतार है। आध्या शक्ति जगदंबा का ही अवतार है। हमारे कल्याण के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई है। ऐसा स्टेटमेंट नहीं देना चाहते। वो ऐसा स्टेटमेंट देना तो बड़ा ही सहज है। ऐसा किसी के ऐसे हजारों लोग हैं जिनके बारे में उनके भक्त लोग इस तरह के स्टेटमेंट देते रहते हैं। तो वो स्टेटमेंट देने से ही तो कुछ होने वाला नहीं है। आपको स्टेप बाय स्टेप मां के जीवन के जो प्रसंग है उसको अपनी एक एक धारा में एक लॉजिकल सीक्वेंस में सजा करके हमारे सामने प्रस्तुत करने हैं। वो सीक्वेंस को इस प्रसंग को अनुध्यन करने के बाद में प्रसंग के ऊपर में प्रसंग का पाठ च स्मरण और मनन करने के बाद में उसका अनुध्यन करने के बाद में यह बात हमारे हृदय में स्वतः स्फूर्त स्वयं प्रगटित होनी चाहिए कि हां मां आध्या शक्ति जगदंबा स्वयं है। हां जय राम भाटी ग्राम में ये आध्यात्मिक संपत्त थी बोलकर के मां का आविर्भाव वहां पे हुआ है। यदि अपने मन में से यह बात ना आए और महाराज जी ने जो कहा वो सुन ले तो फिर तो ये इतना बड़ा जो एक्सरसाइज है इसका क्या अर्थ है? क्या जरूरत है आपको 250 300 400 पेज की किताब पढ़ने की? आप पहले से ही मान ले कि हां मां आध्या शक्ति है। मां दुर्गा का अवतार है। काली का अवतार है। जय राम बाटी ग्राम जैसे कि बाकी सब शक्तिपीठ है। उसी का उसी तरह की एक आध्यात्मिक शक्ति से भरपूर है। ये स्वीकार कर लो। बात खत्म कर दो। किंतु सिर्फ स्वीकार करने से सिर्फ स्टेटमेंट देने से आजकल के लोग उसे नहीं मानते हैं। इसीलिए हमारे सामने स्टेप बाय स्टेप लॉजिक और प्रसंग एक एक तर्क और प्रसंग दोनों का एक सममिश्रण सुंदर मिश्रण करके महाराज जी ने ये किताब लिखी है। इसीलिए यह पूर्व भूमिका के आखिर में उन्होंने प्रश्न किया है। क्या सही में जयराम भाटी ग्राम का यह महात्म है कि नहीं? और ये क्वेश्चन हटा के गुजराती ट्रांसलेशन में एक बहुत बड़ी फंडामेंटल एरर है। ये सिर्फ सेंटेंस स्ट्रक्चर की एरर नहीं है। ये कि इस तरह से प्रश्नार्थ चिन्ह को सामान्य सेंटेंस बना दिया। सिर्फ इस ग्रामेटिकल एरर नहीं है। पूरी थीम पूरा जो ओवर आर्चिंग थीम है। यही वो एक प्रश्नार्थ चिन्ह मिस होने से वो थीम मिस हो जाती है। तो जो भी है इसकी नई एडिशन में हम लोग देख लेंगे। कभी-कभी ट्रांसलेट अभी ये तो ये किताब बहुत पहले ट्रांसलेट हुई थी। बहुत साल हो गए। मैं तो यहां पे था भी नहीं। और जब ट्रांसलेट होता है तो हम कभी-कभी ये चीजों को मन में भी नहीं रखते हैं कि क्या इसका महत्व है। किंतु जब बाद में बैठकर के चिंतन करते हैं तो यह सब विचार उत्पन्न होना शुरू होते हैं। और जो किताब लिखते हैं, जो किताब पढ़ते हैं, उनका सार्थक, उनका जीवन, उनका पढ़ाई, उनका स्वाध्याय सार्थक कब है? जब यह प्रश्न हो और यह प्रश्नों का समाधान मिले तभी यह पढ़ा ये हमारा स्वाध्याय सार्थक है। वरना जो लिखा है पढ़ लिया और फिर भूल गए या तो फिर आजकल परीक्षा में जैसे होता है कि हमने रट लिया परीक्षा देनी है तो रट लिया। सिर्फ पढ़ना सिर्फ रटना नहीं इसको समझना सोचना चिंतन करना अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करना। स्वाध्याय का वही सार्थक है। तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणस्तु।