Invocation
ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः कल हम जो एक प्रश्न के बारे में डिस्कस कर रहे थे बड़ा ही सुंदर प्रश्न था कि मां को सर्वप्रथम तो ज्यादातर लोग पहचानते नहीं थे और वैसे तो ठाकुर कहा करते थे कि वह शारदा सरस्वती वह जगत को ज्ञान देने के लिए आई है और इस बार अपने रूप को ढक करके आई है कि जिससे कि लोगों के मन में पाप बुद्धि का उदय ना हो तो इस तरह की बातें वैसे तो ठाकुर कहा करते थे किंतु फिर भी इन जनरल एक ऐसा इंप्रेशन जाता है कि कोई कोई लोग सोचते थे कि हां वो तो ठीक है ठाकुर की पत्नी है ठाकुर की ठाकुर के साथ में रहती है तो फिर उनको तो थोड़ा सा रिस्पेक्ट देना होगा ठाकुर अवतार है किंतु मां शारदा के बारे में अभी जैसे कि रामचंद्र दत्त ही है वह तो ठाकुर का जीवनी उन्होंने लिखा है तो उनमें मां शारदा देवी का महात्म्य या शक्ति का महात्म्य ऐसा तो कोई विशेष रूप से उन्होंने वर्णन नहीं किया जैसे कि अक्षय कुमार सेन जिसने कि रामकृष्ण पुंथी लिखी है है तो जब यह पंथी के कुछ टेक्स्ट जब स्वामी जी को भेजा गया तो स्वामी जी बड़े ही खुश हो गए किंतु फिर रिप्लाई में क्या लिखा कि उसको कहो कि सशक्ति अवतार की आराधना करना ही मैं हिंदू धर्म का सार है हिंदू धर्म की प्रथा है और जिस तरह से ठाकुर के गुणगान गाते हुए यह जो सब पदावली यां उन्होंने निर्मित की है तो उसी तरह से ठाकुर के साथ में मां के भी शक्ति की आराधना के भी स्तोत्र वो उसमें ऐड कर दे तो जो लोग ठाकुर के बारे में किताब लिखते थे उन लोगों के भीतर में भी इतना यह नॉलेज नहीं था या तो फिर उनको इतना सेंस नहीं था कि मां जगत जननी जगदंबा स्वयं है तो अभी जैसे कि रामलाल है या लक्ष्मी दीदी है वह ठाकुर के दूसरे रिलेटिव को जितना सन्मान प्राप्त है जितना सम्मान प्राप्य था उतना ही मां को प्राप्य है अलग से तो उसमें और कुछ है नहीं तो वहां से प्रारंभ करके आखिर में जब मां को सभी साधु भक्तों ने जगत जननी जगदंबा आध्या शक्ति के रूप में स्वीकार किया वह जर्नी जो है उसमें ऐसे कौन-कौन से स्टेप्स थे कौन-कौन सी घटनाएं थी कि जिसकी वजह से स्टेप बाय स्टेप जैसे कि भक्तों के मन में यह क्लियर होता गया कि अरे यह मां जिनको कि हम आज तक एक सामान्य गृहिणी ही गिनते थे उनका तो सही स्वरूप इतना भव्य है इतना महान है तो उसके बारे में डिस्कस करते-करते हमने देखा कि इसमें जो लिंक जो है जो इन दोनों प्रारंभ को और अंत को जो जोड़ता है वह है अपने स्वामी विवेकानंद स्वामी जी को सर्वप्रथम भक्तों में यह आभास हुआ उनको यह पहले जैसे कि एक रियलाइफ क्या है मां को संघ में कितना प्राधान्य देना है यह सब जैसे स्वामी विवेकानंद ने ही सर्वप्रथम अनुभूत किया और फिर उन्होंने ही भक्तों में इस बात का प्रचार किया जैसे कि वो प्रख्यात विख्यात पत्र में उन्होंने लिखा है कि जीवंत दुर्गा की प्रति जीवंत दुर्गा की पूजा में दिखा करके जाऊंगा ऐसा करके स्वामी जी कहते हैं बाबूराम महाराज की मां ने दुर्गा पूजा का आयोजन किया था उसके सामने में स्वामी जी ने ऐसा लिखा था कि प्रतिमा में दुर्गा पूजा करने की वजह यह जीवंत दुर्गा मां शारदा है उनकी पूजा कीजिए तो ज्यादा फल मिलेगा तो यहां पर फिर यह प्रश्न होगा कि अच्छा चलो स्वामी जी ने तो इस तरह से मां का महिमा प्रचार किया किंतु स्वामी जी के खुद के जीवन में ऐसी कौन-कौन सी घटनाएं थी जो कि उनको मां का मां के सही स्वरूप के बारे में एक के बाद एक स्टेप बाय स्टेप जैसे कि उनको आभास दिलाती है कि हां यही मां का सही स्वरूप है तो देखते हैं हमने इसके बारे में भी देखा कि हमको ऐसा कुछ दिखता नहीं है जैसे ठाकुर के साथ में स्वामी जी का जो रिलेशन है ठाकुर के ऊपर में स्वामी जी की श्रद्धा उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है उसके बहुत सारे उदाहरण है बहुत सारी घटनाएं हैं जिन घटनाओं के माध्यम से हम देखते हैं कि हां प्रत्येक घटना से नरन के मन में ठाकुर के प्रति आस्था श्रद्धा भक्ति उनके अवतार क्व के संबंध में दृढ़ धारण ना वो दृढ़ होती गई तो यह पूरा आर्क जैसे कि ठाकुर और नरेण के रिलेशन के बीच में हमको देखने को मिलता है और नरेंद्र के मन में तो यह यात्रा पूरी जन्म जन्म पूरे जन्म की यह यात्रा थी बात सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने काशीपुर में ठाकुर को ठाकुर काशीपुर में है कैंसर से ग्रस्त है उस समय स्वामी जी जैसे कि संदेह करते हैं ठाकुर के अंतिम समय में स्वामी जी के मन में यह संदेह आता है कि हां यदि इस समय कहे कि मैं अवतार हूं तो मैं मानूं वो तो ठाकुर का अंतिम समय था अपने खुद के अंतिम समय तक स्वामी जी इस तरह के प्रश्न करते थे बेलूरमठ की स्थापना हुई उस समय स्वामी जी बेलूरमठ में थे और उन्होंने सोचा उस समय एक महाराजा कलकाता की मुलाकात के लिए आए थे तो स्वामी जी ने अपने मन में ही सोचा कि यदि यह महाराजा यदि मठ की मुलाकात लेते हैं तो मैं मानूं कि ठाकुर सही है या तो फिर तो मैं मानू कि ठाकुर सही में यहां पे विराजमान है अभी ऐसा तो संकल्प उन्होंने मन में किया और फिर वह उन्होंने किंतु यह बात किसी को बताई नहीं और फिर दूसरे ही दिन किसी काम से वह कोलकात्ता चले गए अभी जब कोलकात्ता से वापस आते हैं तब उनको ऐसा समाचार मिला कि जो महाराजा जिनके बारे में स्वामी जी ने सोचा था उस समय के विख्यात महाराजा जिनका कलकाता में आगमन से एक बहुत बड़ा एक हल्लागुल्ला मच गया था वह महाराजा ने वो महाराजा बेलूरमठ के पास में से ही गुजर रहे थे उन्होंने अपनी गाड़ी को थमा करके अपने एक असिस्टेंट को बेलूरमठ में भेजा था यह संवाद लेने के लिए कि स्वामी विवेकानंद है कि नहीं मठ में यदि है तो वह आकर के उनके साथ में मुलाकात करेंगे अनफॉर्चूनेटली उस दिन स्वामी जी कलकाता जाने के लिए निकल गए थे तो जैसे ही उनको यह संवाद मिला कि नहीं स्वामी जी नहीं है तो फिर महाराजा वहीं से अपनी गाड़ी में बैठ कर के चले गए अभी स्वामी जी को यह बात यह न्यूज़ जब वोह मठ में वापस आए तब उनको पता चला तब उन्होंने सोचा कि देखिए ठाकुर को हम लोग अभी तक परीक्षा करते हैं ठाकुर के अवतार क्त्व की इस अभी तक हमको जैसे कि मन में संदेह है और फिर स्वामी जी ने यह बात अपने गुरु भाइयों को बताई कि देखिए यह महाराजा के यहां पे आगमन का तात्पर्य क्या है मैंने मन में सोच के रखा था कि जद यह राजा यहां पे आएगा तो मैं मानूंगा कि ठाकुर सही सही विराजमान है तो देखिए कि राजा आने ही वाले थे वो तो मैंने एक एक्सीडेंट की वजह से वो मैं मैं नहीं था कलकत्ता था बोल कर के वह नहीं आ पाए वरना तो वह आ ही जाते देखिए कि ठाकुर की महिमा कितनी बड़ी है तो यह मने ठाकुर के अंतिम समय तक तो स्वामी जी के मन में यह संदेह था ही अपने खुद के जीवन के अंतिम समय तक स्वामी जी जैसे की ठाकुर को परीक्षा करते रहते हैं ऑन दी अदर हैंड वो मां के साथ में देखिए कि जब अमेरिका से वापस लौट करके मां का दर्शन करने के लिए जाते हैं नौका से जा रहे हैं गंगा में बार-बार अपने देह के ऊपर में गंगाजल छिटक रहे हैं तो उनके साथ में जो महाराज जी थे उन्होंने पूछा अरे स्वामी जी आप इतना बार-बार अपने पे गंगाजल छिटक रहे हैं आपको बुखार हो जाएगा वैसे भी तो आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो स्वामी जी ने क्या उत्तर दिया कि मैं विदेश में घूम कर के आया हूं पता नहीं कौन-कौन से कर्म कौन से पाप मेरे सर पर सवार है अभी इस तरह से मैं यदि मां के पास जाऊंगा तो कैसे चलेगा तो इसलिए मैं अपने को शुद्ध कर रहा हूं गंगा के जल में तो देखिए कि मां के साथ में स्वामी जी का हमेशा गंभीर विश्वास का एक रिश्ता था जब कश्मीर से स्वामी जी वापस आए और मां को मिलने के लिए गए तो मां को उन्होंने स्वामी जी ने कंप्लेन किया कि देखिए कि आपके ठाकुर में कोई दम नहीं है मैं वहां पर कश्मीर में था वहां पर एक तांत्रिक का चेला मेरे पास में आता था तो इस तांत्रिक ने मुझे श्राप दिया कि क्यों तुमने मेरे चेले को चुरा लिया मैं तुमको श्राप देता हूं कि खान थ कि तुम हाग हाग पा लिए जावे अर्थात कि तुम शौच करते करते भाग जाओगे यहां से स्वामी जी को डा जेंट्री ऐसा कुछ लूज मोशन जैसा हो गया था जिसने कि बड़ा ही विकट आकार धारण कर लिया बोलकर के स्वामी जी को कश्मीर से कलकाता वापस आ जाना पड़ा अभी स्वामी जी मां के पास में ठाकुर की कंप्लेन करते हैं कि देखिए आपके ठाकुर में कुछ दम नहीं है दो टके के तांत्रिक ने मुझे श्राप दे दिया और ठाकुर मेरी रक्षा नहीं कर पाए तो मां क्या कहती है बेटा शक्ति को तो मानना ही पड़ेगा तो देखिए कि यहां पर भी ठाकुर तो जनो भांग ऐसे से ठाकुर तो जन घड़ते ऐसे से भांग आसे नहीं ठाकुर तो जैसे कि ड़ने के लिए नए भारत का नव निर्माण करने के लिए आए थे पुरानी प्रथाओं को तोड़ने के लिए नहीं वह अपने से ही चली जाएगी उसको हमको उसके ऊपर में कोई आघात करने की जरूरत नहीं तो यहां पर घटना के बाद में घटना है कि ठाकुर के ऊपर में स्वामी जी संदेह करते ही रहते हैं किंतु मां के ऊपर में कभी भी संदेह नहीं किया तो यह प्रश्न होता है कि ऐसा तो क्या था कि मां के ऊपर में कभी भी प्रश्न नहीं किया मां को कभी मां के ऊपर में कभी संदेह नहीं किया किंतु ठाकुर के साथ में सब समय एक क्वेश्चनिंग एटीट्यूड उनका रहा है तो अभी देखिए कि यह सब प्रश्न ऐसे हैं कि जिनका कि सही बोला जाए तो कोई उत्तर नहीं होता हम लोग अपनी सामान्य बुद्धि से सोच कर के यह सब कुछ सोचना तो कुछ है ही अभी विचार करने का रोग जब लगा है तो और कुछ फालतू का विचार करने की बजाय यह सब कुछ विचार करते हैं कि क्यों ऐसा है तो मैं कल थोड़ा सा सोच रहा था तो मुझे दो पॉसिबिलिटीज दिखाई दी अभी उसमें से जो पहली पॉसिबिलिटी है वो वैसे सहज है समझने में अ देखिए कि स्वामी जी तो शिव के अवतार थे उनको पहले से ही पता था कि य सब तो लीला है यह सब माया है पृथ्वी पर आना है और जैसे कि पृथ्वी के इस रंग मंच के ऊपर में हम सबको अभिनय करना है जो कि पात्र हमको दिया गया है यहां पर जैसे कि उनका पात्र है कि एक निष्ठावान साधक का एक एक संपूर्ण रूप से समर्पित शिष्य का किंतु साथ-साथ में ही एक फिलोसोफर का तो यदि उनको भविष्य में अमेरिका यूरोप में फिलोसोफी भारतीय फिलोसोफी का प्रचार करना है तो उन को फिलोसोफी संबंधित जितने भी प्रश्न यह अमेरिकन या यूरोपियन करते हैं उन सबका एकदम परफेक्ट उत्तर उनके पास में होना चाहिए अदर वाइज जब वे लोग प्रश्न करेंगे और अपने पास में उसका उत्तर नहीं तो हम कुछ कह नहीं पाएंगे ठीक-ठीक उनके शंका का समाधान नहीं करवा पाएंगे क्योंकि यह यूरोप और अमेरिका है संदेह वादियों का देश है जैसे कि स्वामी जी ने कहा था यह विरोचन की जात है विरोचन की प्रजा है उनके सामने आप त्याग तपस्या लाइफ ये सब इतना दिखाने से नहीं चलेगा उनके यहां पर तो चाहिए विद्या का तोड़ और वक्त होता की धूम तभी यह लोग इनको समझेंगे तभी यह लोग स्वीकार करेंगे शक्ति का प्रदर्शन करना होगा बिना शक्ति के प्रदर्शन के यह लोग हमको बिल्कुल कमजोर मान कर के ठुकरा देंगे तो वहां पर शक्ति के प्रदर्शन के लिए फिलोसोफी एकदम परफेक्ट समझ लेने के लिए जैसे कि उनको एक पात्र का अभिनय करना है ठाकुर के सामने सब समय प्रश्न करते जाना है और देखना है कि ठाकुर युगा वतार उस प्रश्न का क्या उत्तर देते हैं तो यह हो गया एक ऑप्शन कि मां के पास में इस तरह का अभिनय करने की जरूरत नहीं थी यह सब ड्रामेबाजी सिर्फ ठाकुर के साथ में ही करनी थी जिससे कि ठाकुर के मुंह से इस युगो पयोग जो फिलोसोफी है जो दर्शन शास्त्र है पूरा निकाल दिया जाए और मां तो जैसे मां ही है उनका तो काम ही है आशीर्वाद देने का तो वह तो देती ही रहेगी रिस्पेक्टिव कि आप उनके साथ में किस तरह से व्यवहार करते हैं तो देखिए कि यह एटीट्यूड को फॉलो करते-करते निवेदिता ने भी जैसे कि निवेदिता जब स्वामी जी के साथ में फिलोसोफी डिस्कस कर रही है सब समय स्वामी जी को क्वेश्चन करती है सब समय स्वामी जी के साथ में आर्गुमेंट में भिड़ जाती है किंतु यही निवेदिता जब मां को प्रणाम करने के लिए जाती है तो कितना भाव भक्ति पूर्वक मां को प्रणाम करती है उस समय वह मां को यह प्रश्न नहीं करती कि आप जो कर कर रहे हैं आप जिस तरह का जीवन जी रहे हैं क्या इस जीवन जीने में कोई कोई अच्छा भी है कि नहीं कुछ भलाई भी है कि नहीं कि यह सिर्फ आप एक अपनी ग्रामीण प्रथाओं को फॉलो करते जा रहे हैं इस तरह के उटपटांग प्रश्न निवेदिता ने मां को कभी नहीं किए यह सब उनका रिजर्वेशन सब रिजर्व रखे थे स्वामी जी के लिए तो देखिए कि स्वामी जी भी और निवेदिता भी दोनों मन से तो समझते थे कि यह प्रश्न करना है तो किसको करना है और आशीर्वाद मांगना है तो किसके पास में मांगना है तो यह एक यह है सॉल्यूशन किंतु पता है यह बड़ा इजी सोल्यूशन है जब ऐसा कह दे कि हम तो सिर्फ यह रंग मंच के ऊपर में अभिनय करने के लिए आए हैं ये इस पात्र का इस तरह का अभिनय रहेगा इस पात्र के साथ में इस तरह का संबंध रहेगा तो यू नो वी फील चीटेड सम टाइम्स कि यदि उनको ड्रामेबाजी ही करनी है तो हमको क्यों इस सब चीजों में फंसाया है हम लोगों का तो जैसे कि जान निकलता जा रहा है हम लोग जैसे की साधना करते करते भी जन्म जन्मांतर की साधना से भी जैसे कुछ प्राप्त नहीं होता तो हमको यदि आपको यदि ड्रामेबाजी ही करनी है यदि आपको एक अभिनय ही करना है पहले ही हमको कुछ प्राप्ति करवा दो आध्यात्मिक प्राप्ति हम भी शांति से रहेंगे आप भी शांति से रहेंगे तो ऐसा एक लगता है कि यदि रंग मंच वाला थिरी सही है तो यह लोग हमारे साथ में एक तरह का चीटिंग कर रहे हैं किंतु खैर वो एक थिरी है लेजिटीमेट थिरी है दूसरी थिरी जो मैंने सोची वो थोड़ी सी कॉम्प्लिकेटेड अभी देखिए कि ठाकुर के जीवन के कुछ पर्व हमने देखे एक तो बाल्य पर्व देखा जिसमें कि ठाकुर कमार पुकुर में रह कर के वह बाल गोपाल की तरह बाल्य लीलाएं करते थे सुमधुर लीलाएं जिसके साक्षी उस समय की बहुत सारी स्त्रियां उनकी जो डिवोटा हुई थी और उनके जो बंधु थे बांधव थे वो बहुत सारे लोग इस बात की साक्षी देते हैं इसके बाद में प्रारंभ होता है साधन पर्व कि ठाकुर अपने बड़े भाई के साथ में कलकत्ता आए काली मंदिर में रहने लगे काली मंदिर में पुजारी भी हुए और फिर मां को दर्शन करने के लिए मां काली का दर्शन प्राप्त करने के लिए उन्होंने एक के बाद एक जो साधनाएं की वो साधना हों के परिणाम से एक के बाद एक गुरु जो उनके पास में आते गए विभिन्न साधनाएं करवाते गए उसके अंतिम स्वरूप में उन्होंने निर्विकल्प समाधि प्राप्त की और उसके बाद में तीर्थ भ्रमण वगैरह किया तो ये पूरा साधन पर्व है ठाक के जीवन का सिद्धि प्राप्त करने के बाद में क्रिश्चियनिटी इस्लाम धर्म की भी उन्होंने साधना कर दी थी अच्छा इसके बाद में तीसरा पर्व प्रारंभ होता है जबकि मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ ठाकुर ने मां की शोड़ी के रूप में पूजा की और मां की शक्ति को आधार करके उन्होंने कलकत्ता में धर्मचक्र प्रवर्तन करने का प्रारंभ किया तो यह जो आनंद पर्व जदिया है मां के दक्षिणे आगमन से लेकर के ठाकुर को जब तक कैंसर का प्रारंभ नहीं हुआ था तब तक का यह पाणी हाटी महोत्सव जो है वह इस पर्व का अंतिम घटना इस पर्व की अंतिम घटना के रूप में हम स्वीकार कर सकते हैं आनंद पर्व प्रारंभ हुआ मां की शोशी पूजा से तो उसका अंत आया पाणी हाटी महोत्सव से इसके बाद का जो पर्व है ठाकुर को गले में कैंसर हुआ उनको चिकित्सा के लिए पहले तो पुकुर फिर पहले तो यह यह कलकाता उनको लाया गया यहां पर उनको रखा गया और फिर उनकी चिकित्सा जो प्रारंभ हुई तो चिकित्स काशीपुर और श्यामपुकुर तो चिकित्सा करते-करते वहां पर उनका अगस्ट 18864 है वह है उनका आत्मप्रकाश पर्व अभी देखिए कि ठाकुर ने यह जो आनंद पर्व है और यह आत्म प्रकाश पर्व है कि कलकाता में दक्षिणेश्वर में रहते थे सब भक्त उनके पास में अंतरंग भक्त आना शुरू हो गए थे उनको लेकर के उन्होंने आनंद से जो लीलाएं की कीर्तन किया उपदेश दिए वो और यह जो आखिरी आत्मप्रकाश पर्व है कैंसर की ट्रीटमेंट के लिए वह कलकत्ता आए थे उसमें डिफरेंस क्या है देखिए कि आनंद पर्व में ठाकुर वैसे अवतार तत्व के बारे में बहुत सारी बातें करते हैं जैसे कि वह भगवान राम की कहानी है वह भगवान राम भरद्वाज आदि मुनि की कुटिया में गए तो मुनि ऋषियों ने उनको क्या कहा कि राम हम तो आपको पहचानते हैं आप दशरथ नंदन है इतना हम पहचानते हैं और ऐसे ही हम आपकी श्रद्धा करते हैं हम आपको अक्षर पुरुषोत्तम वही जो जगत के जो नारायण है जगत के नियंत्र जगत के संहार कर्ता इस तरह से हम आपको नहीं मानते हम तो मानते हैं दशरथ के पुत्र है तो भगवान राम हंस कर के वहां से चले गए अभी उस समय जो उनके श्रोताओं में एक डिवटी बैठा था उसने कमेंट किया कि ऋषि रा बोका चलन अर्थात कि वो ऋषि मुनि मूर्ख थे कि जिन्होंने भगवान राम की महत्ता उनकी उनकी जो ग्रेटनेस है उनका सही स्वरूप है समझ नहीं पाए तो इमीडिएट ठाकुर सीरियस होकर के बोले नहीं आप ऋषि मुनियों को इस तरह से उनका अपमान मत कीजिए उनका भी एक पथ है उनका भी एक मान्यता है किसी भी मा कभी भी किसी की भी मान्यता पे आघात नहीं करना चाहिए तो देखिए कि यहां पर ठाकुर अवतार तत्व के बारे में कहते हैं दूसरी ही और ठाकुर अपने बारे में क्या कहते हैं कि मुझे तीन बातों से ऐसा लगता है कोई मेरे देह में कांटे चुभा रहा है कौन सी तीन बातें जब कोई आकर के मुझे गुरु कहता है कर्ता कहता है या बाबा कहता है यह तीन कोई इस तीन नाम से कोई मुझे संबोधन करता है तो मुझे ऐसा लगता है कि जैसे कि मेरे देह में कांटे चुभ हो रहा है कोई क्यों ऐसा क्योंकि यदि आप किसी को बहुत ही ज्यादा रिस्पेक्ट करेंगे तो आप उनको जाकर गुरु कहेंगे ना कि कर्ता कहेंगे कि बाबा कहेंगे यहां पर ठाकुर का एटीट्यूड है कि मैं आपके चरणों की रेणु की रेणु हूं मैं आपके दासो का दास हूं तो इतना निरह काता ठाकुर यहां पर प्रकट करते हैं तो देख देख कि जब आनंद पर्व चल रहा है तो ठाकुर के विचार ठाकुर की उपदेश जैसे कि दो धारा में प्रवाहित हो रहे हैं वैसे तो बहुत सारे टॉपिक थे किंतु यह दो टॉपिक थे जैसे कि ऐसा लगता था कि एक दूसरे के अपोजिट है एक एक और तो वह अवतार तत्व का प्रतिपादन करने के लिए बार-बार बहुत सारी कहानियां बताते हैं बहुत सारे उपदेश देते हैं कि हां अवतार है अवतार सही है दूसरी बार दूसरी ही ओर ऑन द अदर हैंड जैसे कि अपने को एक बिल्कुल सामान्य विनम्र व्यक्ति के रूप में गिनते हैं अभी देखिए कि यह तो आनंद पर्व में था अब जैसे ही आत्म प्रकाश पर्व प्रारंभ हुआ और जैसे कि ना एक पूरा एक माहौल इंटेंस हो गया अभी भक्तों को भी लगने लगा कि ठाकुर जैसे कि इस जगत में ज्यादा नहीं है तो अभी ठाकुर के अंतिम दिनों में ठाकुर को आप किस तरह से देखते हैं और इस ये बातों का बड़ा महत्व था क्योंकि जब तक वो दक्षिणेश्वर में आते थे सप्ताह में एक एक दो बार जब भी अपने काम में से मौका मिला तब तो ऐसा ही लगता था कि यह नित्य कृष्ण नित्य लीला वह नित्य दक्षिणेश्वर में नित्य श्री राम कृष्ण बैठे ही रहेंगे नित्य कथामृत जैसे कि उनके श्री मुह से बहता ही रहेगा और हम जब भी इच्छा चाहे उसका अमृत पान करके धन्य हो जाएंगे ऐसा एक भाव सबके मन में था किंतु जब ठाकुर को कैंसर हुआ और यह लीला कथा का जैसे कि अवसान होना प्रारंभ हुआ तो भक्त लोगों के मन में एक एक दूसरा विचार आकर के घर कर गया कि हमको अभी ठाकुर ज्यादा दिन नहीं है इस जगत में तो फिर क्या हमको अपने जीवन के बारे में क्या करना है वह ठीक कर लेना है कि हमारी साधना क्या है ठाकुर ने जो उपदेश दिए उसके अनुसार हमको अपने जीवन को किस तरह से धन्य बना देना है तो यह बात भक्तों के मन में उस समय उदय हुई तो उस समय क्या हुआ कि कुछ कुछ लोगों ने ठाकुर का अवतार बोलकर के प्रचार प्रारंभ कर दिया अभी जैसे ही ठाकुर का अवतार बोलकर के प्रचार होना प्रारंभ हुआ वैसे ही दो जैसे कि बन गए डिवीजन सही कहे तो तीन डिवीजन बन गए एक तो था कि जैसे कि गिरीश घोष है रामचंद्र दत्त है वगैरह उन्होंने ठाकुर को एकदम अवतार है बोलकर के प्रचार किया दूसरा एक दल था भक्तों का उन्होंने सोचा कि अरे भाई वह खुद की ठीक नहीं कर सकते हैं अपनी व्याधि को अवतार किस काम के बोलकर के वे लोग उनसे दूर हो गए जो कि बहिरंग भक्त हो गए दूसरा तीसरा एक दल था त्यागी भक्तों का उन्होंने सोचा कि ठाकुर को अवतार बोलक के प्रचार तो ठीक है आप करते रहिए उससे हमको कोई आपत्ति नहीं किंतु एटलीस्ट हमको यदि ब्रह्म प्राप्ति करनी है तो ठाकुर ने खुद ने कहा है कि आपको तपस्या करनी पड़ेगी तो चलो आओ तपस्या करके अपना जीवन धन्य बना दें तो ये तीन डिवीजन हो गए एक तो था कि जो अवतार करके घोषणा करता था दूसरा था कि अवतार वाली पूरी बात से ही नाराज हो गया और तीसरा दल था त्यागी संतानों का जिन्होंने तपस्या प्रारंभ कर दी यह जो डॉक्टर सरकार जब ठाकुर के पास में आते हैं और गिरीश घोष वगैरह के साथ में जो आर्गुमेंट होती है देखिए कि उसका क्रक्स यही है वो डॉक्टर सरकार कहते हैं इतना अच्छा आदमी है उनको आप अवतार अवतार बोल कर के बिगाड़ क्यों दे रहे हैं उनके मन के भीतर में घमंड जद बैठ जाएगा तो बच्चे जैसा सरल व्यवहार है वह भूल कर के वह भी बाकी ढोंगी बाबा जीयों की तरह व्यवहार करना शुरू करेंगे तो इस तरह का आप क्यों उनको बेचारे अच्छे आदमी को बिगाड़ दे रहे हैं वो ये कहते थे डॉक्टर सरकार तो अभी देखिए कि यह लोग जो अवतार अवतार करके पुकारते थे उस बात को ठाकुर जैसे कि एक्सेप्ट नहीं करते थे ठाकुर ने अपने मुंह से कभी नहीं कहा कि तुम लोग मुझे अवतार करके पुकारो या तो फिर तुम लोग मेरी आराधना करो देखिए कि स्वामी जी के साथ में ठाकुर का जो एक स्पेशल रिलेशन था उस बात को यदि छोड़ दे तो ठाकुर बार-बार अपने भक्तों को पूछते हैं कि अच्छा तुमको क्या लगता है मुझे कितना अना ज्ञान हुआ है मास्टर महाशय को पूछते हैं तो मास्टर महाशय उत्तर देते हैं कितना आना कितना कला वह तो मुझे नहीं पता किंतु आपके भीतर में जो ज्ञान जो भक्ति जो प्रेम है वह मैंने और कहीं नहीं देखा तो यह बात सुनकर के ठाकुर हंसने लगे तो देखिए कि ठाकुर का एटीट्यूड कैसा है यह अवतार अपने खुद के अवतार क्व के प्रति स्पष्ट रूप से स्वीकार नहीं करेंगे नहीं कहेंगे कि तुम लोग मुझे अवतार कहो ऑन द अदर हैंड कि वह सब समय भक्तों को टेस्ट करते रहते हैं कि अच्छा बताओ तुम मेरे बारे में क्या मानते हो यदि वह कहेंगे अवतार है या ऐसा कुछ तो खुश हो जाएंगे किंतु साथ में प्रोटेस्ट भी करेंगे मुंह से आनंद पर्व में किंतु आत्म प्रकाश पर्व में ठाकुर चाहते थे कि यह लोग डिस्कवर करें रदर देन कि वह खुद कहे कि हां मैं अवतार हूं मैं अपने सही स्वरूप को प्रकट कर रहा हूं तो आप लोग मेरी आराधना कीजिए चालू ऐसा नहीं ठाकुर चाहते थे कि यह भक्त लोग अपने से इस बात को स्वीकार करें उनका एक जो जर्नी ऑफ एक्सप्लोरेशन है ज नी ऑफ डिस्कवरी है वो डिस्कवरी एक्सप्लोरेशन के अंत में जो प्राप्त व्य वस्तु है ठाकुर का अवतार क्व वह खुद अपने से जैसे कि वे लोग स्वीकार करें खुद जैसे कि वे लोग रियलाइफ करें तो किस तरह की घटनाएं हैं देखिए कि काली पूजा की रात को ठाकुर ने कहा कि अभी वो श्याम पुकुर की ही बात है कि सब तरह का आयोजन कर दो पूजा का तो पूजा का आयोजन किया गया पूजा के सब उपकरण रखे गए यहां पर सब भक्तगण इकट्ठा हो गए किंतु देखा कि ना ही प्रतिमा है ना ही पूजक है और पूजा का सब उपकरण पड़ा हुआ है तो अभी यहां पर ठाकुर खुद तो जैसे कि कोई अपनी ही जैसे कि चिंता में डूबे हुए हैं जैसे कि ईश्वर का नाम ले रहे हो इस तरह से अपने आप में जैसे कि वह डूब गए हैं तो यहां पर भक्त लोग बैठ कर के राह देख रहे हैं कि कौन आकर के पूजा करेगा कहां से प्रतिमा लाई जाएगी एकाएक गिरीश घोष के मन में हुआ मन में क्या हुआ वो तो एक इंपल्सिव पर्सन था ना पूजा के उपकरण के जो फूल थे सीधे ही उठा कर के ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित कर दिए यह कर कर के कि आप ही मां काली है जैसा गिरीश ने ऐसा किया वैसे ही ठाकुर फड़क करके समाधि में चले गए और सभी भक्तों में जैसे कि एक बिजली के प्रवाह की तरह यह भाव फैल गया कि ठाकुर के भीतर में मां काली का आविर्भाव हुआ है और सभी भक्तगण कोई ठाकुर के श्री चरणों में पुष्प अर्पित कर रहा है कोई ठाकुर का स्तव कर रहा है तो कोई जैसे कि किसी के भवा हुआ किसी के ऊपर में वह नाच रहा है कीर्तन कर रहा है रो रहा है तो जैसे कि पागलपन जैसा एक पूरे बिजली की तरह सभी भक्तों में फैल गया अभी देखिए घटना का यह क्या है कि एसेंस क्या है कि ठाकुर ने नहीं कहा कि तुम लोग मेरी मां काली के रूप में पूजा करो यह बात ठाकुर पूजा के उपकरण को तैयार करके सब रेडी करके चुपचाप बैठे थे वह चाहते थे कि भक्तगण अपने से रियलाइफ क्या है और सही में यह बात गिरीश घोष के मन में सर्वप्रथम उदित हुई कि ठाकुर को ही जैसे कि मैं अवतार के रूप में गिनता हूं यानी कि गिरीश घोष की भक्ति ऐसी थी वो जो मुंह से बोलता था ठाकुर अवतार है वो उसने उपलब्धि भी की थी अदर वाइज तो मास्टर महाशय भी वहां पे थे रामचंद्र दत्त भी वहां पे थे दो गृहस्थ भक्त बड़े गृहस्थ भक्त जो कि ठाकुर को अवतार स्वीकार तो कर लिया था किंतु जैसे कि मन के भीतर में कन्विंसेस गिरीश घुश को हुई और गिरीश ने जैसे ही वो ठाकुर के चरणों में पुष्प अर्पित किए वैसे ही सभी लोगों की हिप्नोटिज्म जैसे कि भांग गया टूट गया कि शब्दों से तो ठाकुर को स्वीकार किया है अवतार के रूप में किंतु कार्य तः अपने हृदय में कन्वे होना कि वह अवतार है वो उनको गिरीश के बाद में ही यह लाइट हुआ और इसी तरह की दूसरी घटना फर्स्ट जनवारी 18864 में ठाकुर उस दिन थोड़ा सा सुस्त महसूस कर रहे थे तो वहां पर अपने कमरे में से नीचे आए और टहल रहे हैं और सामने में देखा गिरीश को पेड़ के नीचे में आम के पेड़ के नीचे तो ठाकुर ने पूछा गिरीश को कि अरे गिरीश तुम यह जो सब लोगों को कहते घूम रहे हो क्या क्यों इस तरह से क्यों कर रहे हो क्या तुम्हारा भाव है क्या तुम्हारा तात्पर्य है तो इमीडिएट गिरीश ठाकुर के श्री चरणों में साष्टांग होकर के कहता है कि व्यास वाल्मीकि जिनकी महत्ता जिनके गुणगान गाते गाते उसका अंत नहीं ला पा रहे हैं मैं कौन मैं किस मुंह से जिनके गुणगान जिनकी महत्ता का वर्णन करूंगा तो वैसे ही ठाकुर समाधि में चले गए सबको कहा कि तुम लोगों को चैतन्य हो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर ने इनके ऊपर में छोड़ा कि आप लोग रियलाइफ कीजिए कि मेरा सही स्वरूप क्या है स्वामी जी के साथ में भी वही स्वामी जी ने बाद में एक जगह पर कहा था कि ठाकुर ने मुझे ऐसा कभी नहीं कहा कि तुम लोग मेरी पूजा करो यह मेरी पूजा पद्धति है मेरा मंदिर स्थापित करो मेरे अस्थि रख कर के नित्य उसकी पूजा करना इस तरह की बात ठाकुर ने मुझे कभी नहीं कही थी ऑन द अदर हैंड बात सिर्फ यह नहीं है कि नरेंद्र या तो स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि ठाकुर ने मुझे नहीं कहा कभी कि मेरी पूजा करो जब शशि महाराज ने स्वामी राम कृष्णानंद जी ने ठाकुर की पूजा करने का प्रारंभ किया वराह नगर मठ में तो सबसे बड़े विरोधी तो उसके स्वामी जी ही थे स्वामी जी बार-बार कहते हैं कि देखो हम लोग तो नंगे सन्यासी है आज यहां पर है कल कहां पर है तुम इस तरह से अस्थि को रख करके पूजा चालू कर दोगे तो इसको चालू रखने का सामर्थ्य क्या अपने है कि नहीं है ऐसा कर कर के स्वामी जी कितनी ही बार शशि महाराज के साथ में भीड़ गए हैं वो फेमस घटना कि स्वामी जी कहते हैं वो ठाकुर के वो गर्भ गुरु की ओर जाते जाते कि तुम्हारे ठाकुर को मैं फेंक दूंगा यहां से तब शशि महाराज एकदम नाराज होकर के दोनों तो कुश्ती बाज थे शशि महाराज भी कम नहीं थे नरन को जमीन पर पटका उसके बाल पकड़ कर के खींच कर के गर्भ गुरु से बाहर निकाल के ले आया बोलता हूं देखता हूं कि किस तरह से तुम ठाकुर को फेंक देखते हो यह पूरा यानी कि स्वामी जी एक्टिवली इस बात को अपोज करते थे आप कह सकते हैं कि स्वामी जी शशि महाराज का टेस्ट करते हैं जो भी है किंतु अपोज तो बड़ा सीरियसली किया है तो यहां पर देखिए कि गिरीश घोष मास्टर महाशय रामचंद्र दत्त स्वामी जी ठाकुर ने वैसे तो दोनों तरह से बात करते थे अवतार तत्व को प्रतिपादित भी करते थे कि हां अवतार है अवतार की आराधना करनी चाहिए दूसरी ही और अपने मुंह से स्पष्ट नहीं कहते थे जो स्वामी जी को कहा मैं राम जो राम जो कृष्ण वही राम कृष्ण इज वन ऑफ द रेयरेस्ट इंस्टेंस कि ठाकुर ने अपने खुद के मुंह से इस बात को स्वीकार किया है किंतु अदर वाइज आत्मप्रकाश पर्वों को देखिए कि ठाकुर चाहते थे कि यह सभी लोग उनकी महत्ता को अपने से स्वीकार करें उनकी जर्नी ऑफ डिस्कवरी या तो कहेंगे कि जर्नी ऑफ स्पिरिचुअलिटी आप जितना जितना स्पिरिचुअल जर्नी में आगे बढ बढ़ते जाएंगे वैसे-वैसे ही ठाकुर का सही स्वरूप आपके सामने उद्भाव होता जाएगा यह ठाकुर चाहते थे रदर देन की हमको बोल कर के बिठा दे अच्छा बैठ जाओ यहां पर चुपचाप मैं अवतार हूं मैं जो कहूंगा वो करना है ऐसा नहीं करके आप एक्सप्लोर कीजिए कि कहां पर ठाकुर की बातों को आप स्वीकार करते हैं कहां पर आप नास्तिक वाद का आप आश्र लेते हैं कहां पर आप शास्त्र को ले आते हैं किस तरह से सबका खिचड़ी करते हैं आपके मन में में यदि आप सिंसियर साधक है और साधना करते हैं तो ये खिचड़ी के सभी दाने धीरे-धीरे करके आप सेपरेट करना शुरू करेंगे पत्थर में से यह वो जो मोती है उसको चुनना शुरू करेंगे तो किंतु यह परमहंस होने की जर्नी है वह आपको अपने से लेनी है ए जर्नी का एक प्रत्येक माइल स्टोन पे ठाकुर का सही स्वरूप आपके सामने उद्भाव होता जाएगा तो ये आत्मप्रकाश पर्व का यह तात्पर्य था पहले तो एकदम स्पष्ट ही मना कर देते थे कि मुझे गुरु करता या बाबा मत कहो किंतु आत्मप्रकाश पर्व में उन्होंने इस तरह की सिचुएशन खड़ी करना शुरू की जिससे कि भक्तगण को यह समझना आसान हो जाए कि हां वही अवतार है तो यह हो गया ठाकुर का खुद का एक गेम प्लान अभी मां के साथ में कैसा है कि अभी यहां तो स्पेक्युलेटिव कल हमने बहुत सारे पॉइंट सोचे थे ऐसा तो क्या था कि जिसकी वजह से स्वामी जी जननी ही है क्या मां ने उनको दुर्गा के रूप में दर्शन दिया था क्या मां ने कुछ इस तरह से नरेंद्र को कुछ आध्यात्मिक अनुभूति करवा दी थी तो देखिए कि यह सब दर्शन फर्शन आध्यात्मिक अनुभूतियां तो स्वामी जी को बचपन से होती रहती थी वही बचपन में व अपने कमरे में बैठ कर के ध्यान कर रहे थे तो भगवान बुद्ध का दर्शन हो गया बाद में जिस दिन पहले ठाकुर के पास में आते हैं ठाकुर ने उनको छू लिया और उनको पता नहीं किस तरह की सब अनुभूतियां होने लगी वो हाजरा के साथ में बैठ कर के मजाक कर रहे हैं क्या ये घटी भी ब्रह्म है बाटी भी ब्रह्म है तब ठाकुर ने हंसते-हंसते आकर के दिगंबर अवस्था में उनको स्पर्श कर दिया उस दिन से नर को इस तरह के दर्शन होने लगे जैसे कि सही में पूरा विश्व ब्रह्मांड उसी ब्रह्मण की किरणों का बना हुआ है तो इस तरह के दर्शन इस तरह की आध्यात्मिक अनुभूतियां तो नरेण को हजारों हजारों होती थी वो जैसे सोने के समय पहले ही उनको ब्रह्म योनि का दर्शन होता था देखते थे कि पूरा जगत उसमें समा जाता है फिर वह ब्रह्म योनी चारों ओर फैल जाती है फिर वो में चले जाते थे तो वह पहले तो सोचते थे कि सभी को इस तरह से होता होगा सोने से पहले फिर मैंने अपने मित्रों को पूछा कि अच्छा मुझे सोने से पहले ऐसा दिखता है तो क्या तुम लोगों को दिखता है तो बोलते हैं नहीं ऐसा तो हमको तो कभी नहीं दिखता तब नरेद को पता चला कि ये दिस विजन इज यूनिक टू हिम एक यूनिक दर्शन है सिर्फ उन्हीं को होता है तो दर्शन आशीर्वाद आध्यात्मिक अनुभूतियां तो नरेण को पूरे कितने हजारों हजारों हो गई थी बाय दैट टाइम कि नरेंद ने मा शारदा देवी का प्रथम द किया होगा या उनके बारे में सुना होगा तो यहां पर प्रश्न है कि ऐसा तो क्या था जिसकी वजह से नर पहले से ही कन्विंसिंग दंबा है तो मुझे ऐसा लग रहा है मेरा जो थिरी है कि ठाकुर चाहते थे कि उनका खुद का स्वरूप लोग धीरे-धीरे करके डिस्कवर करें एस अ पार्ट एज ए प्रैक्टिस ऑफ द स्पिरिचुअल जर्नी किंतु मां का जो स्वरूप है सबसे पहले ही पहले से ही सबको पता होना चाहिए तो अदर वाइज मां का जो जगत में कार्य है कि मातृ भाव का प्रचार करना वे लोग वह कार्य शायद इतना आसानी से नहीं हो पाएगा क्योंकि ठाकुर के जीवन में इतने जो दर्शन के बाद दर्शन जो है वो लोगों को जो स्पर्श करके आध्यात्मिक अनुभूतियां करवा देते थे तो उससे लोगों के मन में धीरे-धीरे करके यह स्पष्ट होने लगा था कि ठाकुर कोई असाधारण व्यक्ति है कोई सामान्य साधक कभी इस तरह का दर्शन लोगों को नहीं करवा सक तो ठाकुर इवेंचर तो लोगों को समझ में आना ही था किंतु मां के जीवन में इस तरह के बार-बार भाव समाधि लोगों को दर्शन करवा स्पर्श करके उनको कोई आध्यात्मिक अनुभूतियां करवा देना इस तरह की शक्ति का प्रकाश मां के जीवन में नहीं होने वाला है तो रदर देन कि लोग एक सेल्फ डिस्कवरी के रूप में मां का सही स्वरूप समझे बेटर है कि पहले से ही ज्ञात कर देना चाहिए लोगों को कि हां मां साक्षात जगत जननी जगदंबा है तो वो जो आखिर आखिर में ठाकुर नरेंद्र को जो उपदेश देते थे अकेले बुला कर के अपने कमरे में कि हां तो इस तरह से संघ की अपने गुरु भाइयों को साथ में रखना है इस तरह से साधना करनी है इस तरह से तपस्या करनी है और भी कितना सब कुछ कहा होगा उनके जो वार्तालाप थे वह तो सीक्रेट थे किसी को तो पता नहीं थे तो पार्ट ऑफ दैट सीक्रेट कन्वर्सेशन यह जो गुप्त वार्तालाप इन दोनों के बीच में होते थे तो मेरा अभी एक ठाकुर ने नरेण को मां के सही स्वरूप के बारे में बताया होगा और यही सही स्वरूप समझ कर के नरेण की पहले से ही मां के ऊपर में श्रद्धा थी तो देखिए कि ठाकुर की ही जैसे ये स्ट्रेटेजी है उनका खुद का स्वरूप लोग धीरे-धीरे करके डिस्कवर करें एज अ पार्ट ऑफ द स्पिरिचुअल एनफोल्ड मेंट या तो पार्ट ऑफ द स्पिरिचुअल एसेंशन पार्ट ऑफ द स्पिरिचुअल इवोल्यूशन किंतु मां शारदा को सर्वप्रथम ही स्वीकार कर ले जगत जननी के रूप में तभी तो मां का मातृत्व है वह धीरे-धीरे हमको महसूस होने लगेगा उसका जो एक अनुभूति है वह हमको धीरे-धीरे प्राप्त होनी शुरू होगी सो दिस इज अनदर आंसर अभी क्या है कि यू कैन नेवर से कि सही बात कौन सी है और सही क्या नहीं है यह तो बैठे-बैठे जब विचार करते हैं तो यह बातें सब मन में आती है तो यह दो ऑप्शन मेरे मन में आए थे तो यह कल के प्रश्न के बारे में अभी आज से हम एक मां के जीवन में नया चैप्टर प्रारंभ कर रहे हैं चैप्टर का नाम है नीरव साधना अभी देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज ने अभी तक जितने भी चैप्टर लिए वो क्रोनोलॉजिकल ऑर्डर में लिए हैं पहले तो मां का शक्तिपीठ अर्थात की जयराम बाटी ग्राम का वर्णन उसके बाद में मां की बाल्य लीला उसके बाद में ठाकुर के साथ में विवाह उसके बाद में मां का विरह पर्व की मां जयराम बाटी में है सतत न्यूज़ आता रहता है कलकाता से कि अरे वह तो पागल हो गए हैं और यहां पर मां को सब सफर करना पड़ता है साइलेंटली फिर वह दक्षिणेश्वर पर्व कि मां ने ठीक किया कि मैं वहां पर जाऊंगी अपनी नजरों से देखूंगी अपने हाथों से सेवा करूंगी मां दक्षिणेश्वर आई फिर मां की सड़सी पूजा की ठाकुर ने और फिर मां वहां पर रहने लगी उन दिनों का वर्णन और आखिर में ठाकुर को कैंसर हुआ ठाकुर को कलकत्ता लाया गया तो यहां तक के जितने भी चैप्टर है गंभीरानंद जी महाराज ने क्रोनोलॉजिकल लिए हैं अभी जो दो चैप्टर है नीरव साधना और भार स्वीकार अर्थात कि एक जो शांति से माने ठाकुर के रहते-रहते जो शांति से साधना की बैकग्राउंड में रह कर के किसी को भी पता ना चले कि मां यहां पे है जो कुछ महिला भक्तों थी जो जिनको कि ठाकुर मां के पास में भेजते थे जो लेडी डिवटी आएंगी ठाकुर कहेंगे जाओ नौबत में मां है उनका दर्शन कर लो और यह जो कुछ मिठाई वगैरह ठाकुर को ऑफर करने के लिए लाए होंगे तो मां को जाकर के दे दो और जद खाना खाना है वगैरह विश्राम करना है तो नबत में जाकर कर लेना तो इस तरह से जो कुछ महिला भक्तों को ठाकुर मां के पास में भेजते थे और जो दो-तीन त्यागी संतान थे जिनको कि ठाकुर ने मां के पास में भेजा इसके अलावा मां का जीवन जैसे कि पर्दे के पीछे में बैकग्राउंड में जैसे कि अतिवाद हुआ है एकदम जैसे कि संपूर्ण शांति से संपूर्ण नीरवता में उन्होंने साधना की है तो यह जो साधन के दवन दिनों के जो प्रसंग है वो कुछ प्रसंग क्रोनोलॉजी को बाहर में एक इन जनरल कलेक्शन करके गंभीरानंद जी महाराज ने इस चैप्टर में दिए हैं और इस चैप्टर का जो सबसे बड़ा प्रसंग है सबसे पहला प्रसंग है वही फेमस पाणी हाटी की घटना लास्ट टाइम जब हमने पाणी हाटी की घटना का विवरण किया था वो मैंने पूरा किया था लीला प्रसंग में से क्योंकि वो विवरण वहां पर आवश्यक था वहां पे एक्चुअली देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज ने कैंसर होने से पहले पाणी हाटी घटना को नहीं लिया है बाद में लिया है ऐसा क्यों इसका लॉजिक तो अभी वही बता पाएंगे हमने क्रोनोलॉजी के अनुसार जाने के लिए जैसे कि सड़सी पूजा से प्रारंभ हुआ आनंद पर्व तो पाणी हाटी की घटना से समाप्त हुआ बोलकर के एक पूरा हमने ले लिया गंभीरानंद जी महाराज पाणी हाटी की घटना का वर्णन अभी यहां पर करते हैं तो यह जो चैप्टर है वह क्रोनोलॉजी से बाहर है यहां की जो घटनाएं हैं वह ज्यादातर दक्षिणेश्वर में ही घटी है और इस को एक अलग से थीम देकर के एक अलग चैप्टर गंभीरानंद जी महाराज ने बनाया है तो अभी हम इसका फर्स्ट पैराग्राफ एटलीस्ट आज पाठ कर लेते हैं गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं प्रयोजन उपस्थित होले श्री श्री माता ठाकुरानी पूर्व संस्कार और अभ्यास समूह होई ते आपना के मुक्त कोरिया निर्भय समयो चित कर्तव्य संपादने कतो दूर समर्थ लेन ताहर बहु दृष्टांत आमरा पाइया छी देखिए कि ठाकुर जैसे कहते थे कि हम लोग भांग के लिए नहीं आए हैं गढ़ने के लिए आए हैं अर्थात कि पुरानी जो प्रथाएं हैं उसका विरोध करके यह गलत है ऐसा करके इसको हटा दो बोल हम लोग नई प्रथाएं देते हैं ऐसा नहीं करके जो पुराना है उसको रहने दो वो अपने वो हिस्टोरिकल इवोल्यूशन के अनुसार वह सब हुआ है जो नया जो है उसका गठन करना शुरू कर दो तो यहां पर महाराज कहते हैं कि प्रयोजन जहां-जहां पर उपस्थित हुआ है वहां वहां हां पे मां उनके जो पूर्व संस्कार और अभ्यास है उससे अपने को उर्ध्व उठा कर के नई परिस्थिति के अनुसार जो कर्तव्य संपादन करना है उसको करने में कहां तक समर्था थी उसका उल्लेख हमने बहुत जगह पर किया है बहुत दृष्टांत प्राप्त किए हैं जैसे कि वही वो श्यामपुकुर में जाने की घटना कि वह दक्षिणेश्वर में तो मां किसी पुरुष की नजर के सामने भी नहीं आती थी श्याम पुखुरी एक छोटे से घर में मां को रहना है तो मां रहे पाएगी कि भी नहीं तो ठाकुर को भी संदेह था उन्होंने कहा जाओ जाकर के कहो उसको यदि उसकी इच्छा है तो आए तो मां बड़े ही आनंद से सहमत हो गई और वहां पर आकर के रहने लगी तो दक्षिणेश्वर में जिस तरह से अपने को छुपा कर के वैसे तो श्याम पुकुर में भी छुपा करके रखती थी किंतु नई परिस्थिति के अनुसार जो एक्स्ट्रा कष्ट कर लेना है रात को 11:00 बजे सोना है सुबह को मध्यरात्रि को 2 बजे उठ जाना है 11 से दो मुश्किल से तीन घंटे की नींद इस तीन घंटे की नींद लेकर के मा मां किस तरह से अपनी छाती में एक अपने हृदय में जैसे कि एक आशा को लेकर के आशा रूपी बल को लेकर के ठाकुर की सेवा करती थी वो हमने देखा इस तरह के और भी बहुत सारे उदाहरण हैं एक छोटा सा उदाहरण है कि मां उस समय उद्बोधन में थी व ठाकुर की महासमाधि स्वामी जी की महासमाधि के बहुत बाद का समय उस समय मां उद्बोधन में थी कोलकात्ता में उस समय एक छोटी लड़की को लेकर के उनके पिताजी वहां पर उपस्थित हुए लड़की की उम्र होगी 1617 साल तो अभी उस समय तो छोटी उम्र में विवाह होता था तो यह पिताजी अपनी लड़की को लेकर के मां के सामने उपस्थित होते हैं कहते हैं कि मां इसका लड़का आज ही सुबह को मर गया है उसका डेथ हो गया है यह लड़की मेरी बेचारी बड़ी ही शोक विला है बड़ी ही उसके मन में कष्ट है तो मैं आपके पास में लेकर आया हूं हो सकता है कि आपके सानिध्य से आपके उपदेश से उसको थोड़ा सा सांत्वना मिले तो मां तो एकदम दुखी हो अभी जैसे मां का स्वभाव है मां का हृदय पिघल गया कहती है कि अरे बेटा बेटा आओ आओ बैठो तो तुम्हारा संतान मर गया कितना कष्ट मैं समझ सकती हूं वगैरह वगैरह सब बातें तो बड़ी अच्छी करती है किंतु देखिए कि यह लड़की जैसे ही मां को चरण स्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ाया वैसे ही मां ने अपना पैर दूर कर दिया कहा कि अरे तुमको तो शौच हुआ है तुम पुत्र का डेथ हुआ तो शौच जिसको कहते हैं शौच जब होता है शोच सोच सोच नहीं सोच तो सोच की अवस्था में आप किसी को स्पर्श नहीं कर सकते तो मां ने इमीडिएट कहा तुमको तो शो छुआ है तुम मुझे स्पर्श कैसे करोगी तो जैसे ही मां ने अपना पैर हटा लिया उसके सामने से तो ये लड़की बेचारी इतनी दुखता हो गई वो तो बेचारी सोच के आई थी कि मैं तो मां को प्रणाम करूंगी और मा मां का हृदय तो बड़ा ही विशाल है बड़ा ही उदार है यह सब कहानियां तो बड़ी सुनी थी किंतु जैसे ही मां को स्पर्श करने को गई तो मां ने पैर हटा लिया बोलकर के लड़की तो और भी दुखित हो गई वहां पर बैठ गई और यहां पे मां ने ऐसा कहा तो सही किंतु इमीडिएट लिए अपनी बात को पलटा दिया अरे तुम तो यहां पर शांतोना पाने के लिए आए हो और मैं देखो कैसी हूं कि मैंने अपना पैर हटा लिया तुमको प्रणाम नहीं करने दिए आओ बेटा आओ करके एकदम उसको अपने पास में बिठाया पैर स्पर्श करके प्रणाम करने दिए फिर उसको प्रसाद दिया उसके साथ में कितनी अच्छी बातें की देखिए कि एक तो ब्राह्मण संस्कार है एक ब्राह्मण प्रथा है शोच जदी हुआ है संताप जदी हुआ है जिस दिन मृत्यु हुआ है उस दिन किसी को स्पर्श नहीं करना चाहिए सबके साथ में बैठ कर के नहीं खाना चाहिए वह सब तो बातें हैं किंतु यह तो मां जगत जननी स्वयं है वह यदि शांतोना नहीं देगी तो कौन देगा शांतोना तो यह दोनों किस तरह से कंफ्लेक्स के लिए तो जैसे कि मां ने कह दिया कि शोच हुआ है तो क्यों मुझे स्पर्श कर रही हो दूसरी ही क्षण माने कहा कि अरे नहीं बेटा आओ बैठो पास में बैठो स्पर्श करने दिया प्रणाम करने दिया सब कुछ तो देखिए कि प्रयोजन उपस्थित होने से मां अपने खुद के पूर्व संस्कार जो है और जो अभ्यास है ब्राह्मण शरीर का ब्राह्मण जीवन का ब्राह्मण जन्म का उससे भी उर्ध्व होकर के परिपार्टम श्री श्री ठाकुरर उपदेश फले होई तो स्थल विशेष श्री मां स्वत अवस्था अनुरूप व्यवस्था करते इस तरह के मां के अभ्यास का या तो मां के पूर्व संस्कार का परिवर्तन बहुत बार तो ठाकुर के कहने से होता जैसे कि बलराम की वो पत्नी बीमार थी तो ठाकुर ने कहा कि जाओ तुम जाकर के उसको मिल कर के आओ तो मां ने पूछा मैं कैसे जाऊंगी उस समय जो अच्छे घर की स्त्रियां है वो रास्ते पर नहीं निकलती थी वो पालखी वगैरह की व्यवस्था होगी जिनको कि आप पूरे ही आप प्रोटेक्शन में ले जाएंगे जिनके ऊपर में कोई जिनको कोई देख ना पाए उस तरह से वो जाएगी तो यहां पर ठाकुर कहते हैं अरे मेरे बलराम की पत्नी बीमार है और तुम यह सब बातें करते हो जाओ जाओ तुम पैदल चल के जाओ तो खैर मां को पैदल चल के नहीं जाना पड़ा था किंतु ठाकुर ने कह दिया था और माने ये सब चीजें याद रखी थी कि किस तरह से लोक व्यवहार करना चाहिए तो यहां पर महाराज कहते हैं कि बहुत बार मां का जो अभ्यास था पूर्व संस्कार थे उसका परिवर्तन ठाकुर के कहने से होता था तो स्थल विशेष श्री मां स्वत अवस्था अनुरूप व्यवस्था करतन और ऐसी ऐसी जगह पे जहां पे मां मां को खुद को लगता था कि नहीं मुझे अपना अभ्यास परिवर्तन करने की जरूरत है तो मां अपना अभ्यास परिवर्तन करती थी आज हमको लगता है कि अरे इस तरह का नाटक इनको क्यों करना पड़ा है यह जाति यह प्रथा यह सब क्या है यह सब आज के जमाने में तो हम उसको बिल्कुल स्वीकार नहीं करते आज कोई इतना सब कुछ कोई देखने को नहीं जाएगा कि आपका कलीग वो कौन सा जाति का है यदि नौकरी कर र हैं सब लोग साथ में मिलकर के तो उसके कैफेटेरिया में इसके साथ में बैठ के खाना है इसके साथ में बैठ के नहीं खाना है किसको श किसको शोच हुआ है किसको क्या हुआ है यह सब क्या तो क्या है कि हमको ये याद रखना है कि आज से 100 साल से भी पहले की यह सब बातें हैं जबकि समाज में इन सब चीजों का बड़ा ही प्रभाव था और इन सब चीजों के बारे में यदि आप यह कह देंगे कि मैं सब में स्वीकार ही नहीं करता हूं जैसे कि यह ब्राह्मण समाज वगैरह कहते हैं कि समाज में रिफॉर्म लाने की जरूरत है हम लोग इस बात को स्वीकार ही नहीं करते हैं तो क्या होता पता है एक जो बृहत हिंदू समाज है उसमें से फिर उनका रिस्पेक्ट चला जाता आपके पास में जब तक धन है आपके पास में जब तक शक्ति है तब तक लोग आपको स्वीकार करेंगे किंतु अपने से स्वतः प्रेरित होकर के कोई भी आपकी बात अपने जीवन में ग्रहण नहीं करेगा आपकी बात के अनुसार कोई अपने जीवन का परिवर्तन नहीं करेगा तो यह था कि आपको समाज स्वीकार करना चाहिए और समाज कब स्वीकार करेगा जबकि आपके हिंदू धर्म की जो मूल प्रथाएं हैं उसमें से रह कर के आप ऑर्गेनिकली ग्रोथ कीजिए तब हम आपको स्वीकार करेंगे अदर वाइज आप एक रेडिकल एजेंडा लेकर आएंगे कि यह सब जो भी जाति नाती यह सब हटा दो तो फिर आप समाज में से समाज की आपके ऊपर में जो ये कहेंगे जैसे कि आपकी एक्सेप्टेबिलिटी व एक्सेप्टेबिलिटी जैसे कि चली जाएगी तो यहां पर भी मां जगह-जगह पर अपनी इच्छा से परिवर्तन करती थी अपने अभ्यास को और कहीं-कहीं पर ठाकुर के कहने से करती थी अच्छा अभी यह पैराग्राफ तो वैसे काफी लंबा है तो अभी बात का अभी अभी हम कल देखते हैं आ ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु मुझे ऐसा लगता है ना जैसे कि यह
प्रश्न: स्वामीजी ने माँ को क्यों स्वीकार किया, इसके बारे में अलग-अलग सिद्धांत
अपनी यह जो स्पिरिचुअल इवोल्यूशन है ना उसमें एक चीज हम यह ठीक करते हैं कि ठाकुर का सही स्वरूप क्या है और दूसरी चीज दूसरी ओर हम यह सोचते हैं कि मां को हम ने क्यों स्वीकार कर लिया है यह दोनों प्रश्न पैरेलल चलते हैं अपने स्पिरिचुअल इवोल्यूशन में जिस दिन ठाकुर का सही स्वरूप पता चल गया उस दिन लटन मेंट मिल जाएगा और जिस दिन पता चल गया कि मां को हमने पहले से ही क्यों स्वीकार कर लिया उस दिन हम लाइटन मिल जाएगा क्योंकि हम ये बिल्कुल आप बैठ कर के स्पेक्युलेटिंग कि क्यों हमने मां को पहले सेही स्वीकार कर लिया क्यों स्वामी जी ने किया क्यों निवेदिता ने किया जिस दिन उसका प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा दैट इज र् जर्नी ऑफ डिस्कवरी माने इनका क्या है पता है हमको
प्रश्न: मैंने कई साधुओं और भक्तों से बात की है। वे बता सकते हैं कि उन्होंने ठाकुर या स्वामीजी को कैसे स्वीकार किया, लेकिन कोई भी यह नहीं बता सकता कि उन्होंने माँ को कैसे स्वीकार किया
श्री रामकृष्ण को पाने की जर्नी करनी है और यहां पर क्या है कि मां को पहले ही प्राप्त कर लिया है अभी रिवर्स पाथ ट्रेस करना है कि क्यों कैसे यहां तक पहुंच [हंसी] गए बिकॉज की वी अवर सेल्स आर सर्चिंग कि वई वी एक्सेप्टेड मदर मने रिवर्स पाथ ट्रेस करना है अभी हमको कि कहां यहां पर कैसे आ गए माने स्वामी जी ने कभी यह स्वीकार ही नहीं किया एक भी घटना नहीं है कि वो उनका यह जो ट्रेजे क्ट है मां के साथ में ऐसा कहीं है ही नहीं फ्रॉम द डे वन जब से स्वामी जी मां का नाम लेते हैं सीधा वो जगत जननी के रूप में ही लेते हैं उससे कम में तो कहीं बात ही नहीं चलती जबकि ठाकुर के साथ में वेल डिफाइंड ट्रेजे क्टर स्वामी जी खुद स्वामी जी खुद जैसे मां के पास जाते थे इतना डरते थे इतना रिस्पेक्ट देते थे सम्मान देते थे और ठाकुर के सामने फीयरलेसली आर्गुमेंट करते हैं आपके मन का भ्रम है यह सब एक्चुअली मां का जो महिमा है ना वह समझने में अभी भी हमको बहुत समय लगने वाला है क्योंकि देखिए कि हम लोगों की जो मेन जो सब कहानियां है लीला प्रसंग से आई है लीला प्रसंग को लिखा गया है एक्चुअली ठाकुर के पॉइंट ऑफ व्यू से तो एक्चुअली लीला प्रसंग लिखा जाना चाहिए मां के पॉइंट ऑफ व्यू से भी क्योंकि अभी मां के लिए अलग से जीवनी तो गंभीरानंद जी महाराज ने रचना की है किंतु अपना संघ का जो पूरा जो विकास है उसको ठीक-ठीक जद समझना है ना आई थिंक कि मां के पॉइंट ऑफ व्यू से उसको लिखा जाना चाहिए व्हिच विल गिव अस अ बेटर मच बेटर अंडरस्टैंडिंग क्योंकि पर्दे के पीछे रहकर के उन्होंने क्या किया और फिर घटनाएं भी इतनी सारी है जो कि अभी जैसे कल्पतरु की ही घटना हमको नहीं पता कि मां कहां पर थी और क्या कर रही थी मां का उसमें क्या रोल था इतनी सारी घटनाए है ठाकुर ने अपने संतानों को गेरवा दिया किंतु उसमें मां का क्या रोल था मदर मस्ट हैव बीन समवेल और उनका बड़ा इंपोर्टेंट रोल रहा होगा किंतु उन्होंने अपने को ऐसा छुपा करके रखा है आखिरी एक ही बात वो जो वर्ल्ड पार्लिमेंट ऑफ रिलीजन में यह प्रश्न मेरे मन में बहुत बार उठा था कि जब ठाकुर स्वामी जी ने बोलने की शुरुआत की तो बोला कि मैंने मां सरस्वती का नाम लेकर बोलने की शुरुआत की तब प्रश्न होता है कि वो तो ठाकुर के शिष्य है तो ठाकुर का नाम क्यों नहीं लिया [हंसी] क्योंकि ये तो बड़ा ट्रेडिशनल हो गया हम लोग तो इतने ट्रेडिशनल नहीं है कि सरस्वती का नाम लेकर करे अपने तो ठाकुर ही सर्व देव देवी स्वरूप आई है फिर आप ट्रेडिशनल देवी के पास में क्यों जा र है माने ये मां की ये रिवर्स जर्नी है मां को पा लिया है अभी यह समझना है कि क्यों पाया है ठाकुर को पाने की जर्नी है यहां पर समझने की जर्नी है अल्टीमेटली तो देखिए ठाकुर म स्वामी जी और यही तो सब है ना हमारी बात है क्या अभी यहां पर सुहितानंद जी आए थे तो यहां पर मंदिर में आरती के बाद बाद में पाठ होता है कथामृत का तो तो तेलुगु में होता है तो बड़े महाराज ने तेलुगु में पाठ किया फिर रात को बड़े महाराज के साथ सुहितानंद जी की बात हो रही थी तो सुहितानंद जी ने पूछा अच्छा ये चैप्टर पाठ कर रहे थे ना तो महाराज पूछे कि कैसे आपको पता चला तो क्या अभी तेलुगु नहीं आता तो क्या है कथामृत तो जीवन भर पाठ किया है दो तीन शब्द जद पकड़ जाएंगे तो उसी में पता चल जाएगा कि क्या चल रहा है