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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 26 Dec 2025

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकायच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध चीर सिमती चीर सधवा इस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं ऑलरेडी ऑलरेडी कल हमने देखा कि

श्रीरामकृष्ण ने जगत के पापों को अपने ऊपर लिया और हमें परमाणु युद्ध से बचाया

ठाकुर मां को कहते हैं कि जो कुछ भोग था कर्म के फल का वह सब मेरे ऊपर से ही चला गया। तुम लोगों को और किसी को कष्ट भोग करने की जरूरत नहीं है। जगत के सभी के लिए मैं कर्म का फल या तो फिर कर्म भोग करके गया हूं। देखिए इस स्टेटमेंट को पढ़कर के कल हमारा जो डिस्कशन हुआ था कि इवोल्यूशन कैसे होता है? इवोल्यूशन के बारे में जो आज की मॉडर्न थ्यरी है वो कहती है कि जब हम एक लेवल पर होती है ह्यूमन सिविलाइजेशन या ह्यूमन स्पीशीज या तो कोई भी स्पीशीज वहां से जब नेक्स्ट स्टेप में जाना होता है तो जेनेटिक डायवर्जेंस चाहिए। जेनेटिक म्यूटेशन चाहिए। उसके सामने अपनी हिंदू थ्यरी कहती है कि हमारे संस्कारों का प्रवाह है जो कि हमको एक के बाद एक इवोल्यूशन के उत्क्रांति के स्टेप्स हमको ऊपर में ले जाता है। और यदि मॉडर्न साइंस के अनुसार इवोल्यूशन हमको फिजिकल और मेंटल फिटनेस की ओर यदि ले जाता है तो हमारे हिंदू धर्म या तो फिर कोई भी धार्मिक पद्धति है उसके अनुसार मनुष्य की यात्रा है दिव्यत्व को प्राप्त करने की। फिर वह चाहे दिव्यत्व भले ही चाहे कहीं स्वर्ग में बैठा हो ना कि कहीं कैलाश पर्वत पर हो ना कि कोई तीर्थ धाम में हो ना कि मनुष्य के हृदय में हो या तो फिर अपना ही सही स्वरूप साक्षात्कार करना हो हम दिव्यत्व की डेफिनेशन चाहे कैसे भी दें किंतु धार्मिक थ्यरी के अनुसार यह दिव्यत्व की प्राप्ति दिव्यत्व का दर्शन साक्षात्कार उसमें स्थिति यही है मनुष्य के जीवन की यह ह्यूमन स्पीशीज जो है उसकी चरम गति। तो देखिए कि ठाकुर यहां पर कहते हैं कि हिंदू थरी के अनुसार यह जो हमारे कुसंस्कार का एक बहुत बड़ा बोझा हमारी प्रजा के ऊपर में सवार था। और सिर्फ देखिए यहां पे ठाकुर यह नहीं कहते कि भारतवासी सभी के भोग का वो उनके अपने ऊपर में ले लिए हैं। कुकर्म अपने ऊपर ले लिए हैं। ठाकुर कहते हैं कि जगत के जितने भी कुकर्म है सब उन्होंने उसके भोग को अपने ऊपर में ले लिया है। इसकी वजह से जो एक नेक्स्ट स्टेप ऑफ इवोल्यूशन होना था वह अभी जगत में हुआ। आप देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में कैसे एक के बाद एक साइंस और टेक्नोलॉजी में महापुरुषों का अवतरण होता गया और उन्होंने किस तरह से हमको एक बिल्कुल नई डायरेक्शन दी है हमारी ह्यूमन सिविलाइजेशन को। अभी देखिए कि कुछ-कुछ राक्षसों का भी आना हुआ है। अभी हम इसके बारे में कुछ कर नहीं सकते हैं। क्योंकि हमने तो देखा कि किस तरह से सेकंड वर्ल्ड वॉर में और फिर इसके बाद में भी यह जो पॉलिटिकल रेवोल्यूशन वगैरह जहांजहां पे भी हुए हैं वहां पे कितनी खूनामकी हुई है। किंतु देखिए कि यदि ठाकुर नहीं होते तो यह ब्लड शेड और कहीं गुना ज्यादा होता। यह देखिए कि सेकंड वर्ल्ड वॉर में तो फिर भी हमने यह टैंक है ना कि एरोप्लेन है ना कि रॉकेट है। इससे फाइट किया है। इसके बाद में तो हमने न्यूक्लियर वेपन डेवलप किए हैं। अभी यदि ठाकुर हमारे पापों को खा नहीं गए होते और हमारे पाप यदि हमारे सर पर मंडराते ही रहते तो होता क्या कि हम लोग घमंड के मारे ना कि ईर्ष्या द्वेष के मारे ना कि क्रोध के मारे यह न्यूक्लियर वेपन एक दूसरे पे फेंकते और फिर इससे जो भयानक एक नरसंहार होता पृथ्वी पे हो सकता है कि पूरी ह्यूमन सिविलाइजेशन ही नष्ट हो जाती। मुझे तो मैं जब यह 20थ सेंचुरी का हिस्ट्री पढ़ता था और इसमें यह न्यूक्लियर एक्सीडेंट उसके बारे में जब पढ़ता था कि कहां एक न्यूक्लियर डिवाइस चोरी हो गया ना कि कहां एक बम एक्सीडेंटली वो विमान में से गिर पड़ा। ना कि कहां किसी ने जोर जबरदस्ती ये न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी हथियाने का प्रयास किया। ना किसी टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन में यह सब चीजें आ गई। यह सब मैं जब पढ़ता था तब मुझे यही एक म आश्चर्य होता था कि यह जो सोवियत यूनियन और अमेरिका और यहां पे चाइना इन तीनों के पास में चाइना तो फिर भी इतना एडवांस नहीं था। खास करके यह सोवियत यूनियन और अमेरिका इन दोनों के साथ पास में हजारों हजारों न्यूक्लियर वेपंस इंटरकॉन्टिनेंटल बैलस्टिक मिसाइल और यह न्यूक्लियर सबमरीन और यह न्यूक्लियर बमबर जिसको न्यूक्लियर ट्रायर्ड कहते हैं। तो यह न्यूक्लियर ट्रायर्ड यानी कि हवा में से भी आप न्यूक्लियर बम फेंक सकते हैं। न्यूक्लियर बमबर के द्वारा, जमीन से भी आप न्यूक्लियर अटैक कर सकते हैं। आईसीबीएम के द्वारा और पानी में से भी न्यूक्लियर अटैक कर सकते हैं। यह सबमरीन के द्वारा। तो, यह तीनों हवा में, जमीन पे और पानी में हजारों हजारों एटम बम उन्होंने एक दूसरे के सामने तान के रखे थे। एक छोटा सा भी एक्सीडेंट होता और किसी ने गलती से भी एक बम फेंक दिया सामने के ऊपर में तो सामने वाला 10 फेंकता फिर आप 100 फेंकेंगे और सामने वह 1000 फेंकेंगे वो हजार की बारी आएगी ही नहीं 101 में ही पूरा सफाया हो जाता सिविलाइजेशन का वो हुआ नहीं इस तरह के घोर संसारी लोगों के हाथ में इतनी महा भयानक संहार शक्ति बैठी थी इसके उसके बावजूद पृथ्वी का विनाश नहीं हुआ था। उस समय इससे बड़ी आश्चर्यजनक घटना और कोई नहीं है। इवन आज भी देखिए उस समय एक तरह का खतरा था कि न्यूक्लियर वेपंस हेयर ट्रिगर पर रखे थे और अर्थात कि कुछ भी होने से फट करके एक बटन दबाएंगे फटाफट करके बम छूटना शुरू हो जाएगा। किंतु चलो ठाकुर की कृपा से यह जो कोल्ड वॉर का अंत आया सोवियत यूनियन का डिसोल्यूशन हुआ तब से यह न्यूक्लियर वेपन रखे तो है किंतु एक सेकंड की जो हेयर ट्रिगर पे ऐसा नहीं रखे हैं। माने थोड़ा सा तो टाइम लगेगा रेडी हो के एम हो के एक एक के सामने फेंकने को। तो चलो वह एकदम फ्रंट लाइन पर जो थे हेयर ट्रिगर पर थे उससे तो थोड़ा जो यह है रेट लेवल कम हुआ है। तो यदि यह कम हुआ है तो एक बहुत बड़ा दूसरा खतरा यह बढ़ गया है कि कितने पता नहीं टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन के हाथ में यह सब बम चले गए होंगे। किंतु यह जो नॉर्थ कोरिया है या पाकिस्तान है यह दोनों तो टेररिस्ट कंट्री ही है। उनके हाथ में बम जाना उसका अर्थ है कि टेररिस्टों के हाथ में अवश्य पहुंच गया होगा। अभी यह पगले पता नहीं कौन से दिन क्या कर दे। गवर्नमेंट होती है तो फिर भी 10 बार सोचेगी बम फेंकने से पहले। किंतु ये टेररिस्ट लोगों का तो कोई ठिकाना नहीं है ना। वैसे ही तो सुसाइड करना है उनको सुसाइड बमबर। तो यह सुसाइड बमबर यदि न्यूक्लियर बम ही फेंक दे तो उनको तो और भी अच्छा लगेगा। तो क्या है कि वह एक खतरा था सोवियत यूनियन के समय में कि न्यूक्लियर ट्रायर्ड हेयर ट्रिगर पे था। आज एक दूसरा खतरा है कि नॉन स्टेट एक्टर्स के पास में यह सब न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी पहुंच गई है। तो अभी कब क्या होगा कुछ ठिकाना नहीं। किंतु देखिए कि इतना महा भयानक वह पैशाचिक विनाशी शक्ति हमारे हाथ में होने के बावजूद हम लोगों ने इसका इस्तेमाल नहीं किया। हम लोगों में से कुछ-कुछ पगलों ने उसका इस्तेमाल नहीं किया। यह ठाकुर जो हमारे पाप खा गए हैं, उसी का परिणाम है। वरना तो फिर यह जो ग्रेट पावर गिव्स अस ग्रेट रिस्पांसिबिलिटी। यदि हमारे पास में महाशक्ति आ जाती है संहार करने की तो फिर हमारे सामने एक महाशक्ति एक रिस्पांसिबिलिटी के रूप में भी आती है। यदि हम इस रिस्पांसिबिलिटी को ठीक से नहीं निभाएंगे तो पता नहीं हम लोग पूरी सभ्यता को ही खत्म कर देंगे। और फिर एक बार यह पृथ्वी नष्ट हो गई तो फिर क्या रहेगा इस विश्व ब्रह्मांड में। हो सकता है नो डाउट कि करोड़ों-करोड़ों प्लेनेट्स हैं तो और कहीं पे जीवन पनप रहा होगा। कहीं पे और इवोल्यूशन चल रहा होगा और कहीं पे यह एक के बाद एक स्पीशीज इवॉल्व हो रही होगी। और यदि माने साइंस फिक्शन पढ़ेंगे ना तो यह सब सिनेरियोस आपको देखने को मिलेंगे कि कोई भी एक ग्रह पे जब एक स्पीशीज इवोल्यूशन सिविलाइजेशनल के लेवल पर पहुंच जाता है उसके बाद में ना जैसे कि उन लोगों का एक टाइम बम टेकिंग स्टार्ट हो जाता है। यह रिवर्स काउंटडाउन स्टार्ट हो जाता है। किस अर्थ में? क्योंकि अभी आप सिविलाइजेशन के लेवल पर पहुंच गए हैं तो इसका अर्थ है कि आप साइंस एंड टेक्नोलॉजी भी डेवलप कर रहे हैं। अभी आपका एथिक्स एंड मोरालिटी यदि साइंस और टेक्नोलॉजी के साथ-साथ में कदम नहीं रखेगा तो क्या होगा कि एक दिन ऐसा आएगा कि जितने भी पगले हैं उस सिविलाइजेशन के वह सब मिलकर के यह जो एडवांस वेपनरी है एडवांस वेपन सिस्टम है एक दूसरे पे करेंगे अटैक और पूरी सिविलाइजेशन का सफाया कर देंगे। तो कोई-कोई साइंस फिक्शन सिनेारियो इस तरह से वो सोचते हैं कि एक के बाद एक विभिन्न ग्रहों के ऊपर में सिविलाइजेशंस आफ्टर सिविलाइजेशंस का जन्म हुआ। वो एक एडवांस लेवल पर पहुंची। न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड तक पहुंची और उस न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड तक पहुंचने के बाद में किंतु उनकी जो एथिक्स और मोरालिटी जो है उसने वहां तक उनके साथ में आगे कदम नहीं किया। उसके जो जिस लेवल पर उनकी इंटेलेक्ट पहुंची थी उस लेवल पर उनकी एथिक्स या मोरालिटी नहीं पहुंची। इसकी वजह से उन्होंने एक दूसरे पर अटैक करके न्यूक्लियर अटैक करके पूरी सिविलाइजेशन को खत्म कर दिया। यानी कि कोई भी सिविलाइजेशन है इस यूनिवर्स में इस कॉस्मोस में वो न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड पार यदि करेगी इस अर्थ में कि न्यूक्लियर वेपन न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी हाथ में आ भी गई है और साथ में हृदय में करुणा और दया का भी उद्भव हुआ है। यह कंपैशन कहता है कि देखिए यह मेरे जितने भी भाई बांधव हैं इस अह इस सिविलाइजेशन के भीतर में इस ग्रह के ऊपर में यदि मैं उनकी संभाल नहीं रखूंगा। यदि मैं उनके साथ में मेरी प्रोस्पेरिटी नहीं शेयर करूंगा। यदि मैं उनकी केयर नहीं करूंगा तो वे लोग फिर क्रोध में आकर के देखेंगे कि यह एक प्रोस्पेरस आदमी बैठा है। सब जितने भी मींस ऑफ प्रोडक्शन ये कम्युनिस्ट वर्ड कम्युनिस्ट फेमस कम्युनिस्ट फ्रेज मींस ऑफ प्रोडक्शन जितने भी है वह सब हथिया करके बैठा है और फिर वही अपने से अकेले मजाक कर रहा है। और हमारे हाथ में यह चंद टुकड़ों के अलावा एक और कुछ नहीं आया है। तो फिर वे लोग क्या करेंगे कि न्यूक्लियर बम लेंगे और यह प्रोस्पेरस जितने भी है उन पे फेंकेंगे। देखिए यह 91 अमेरिका में जो टेरर अटैक हुआ वो वो किस चीज का परिणाम था? यह जो अफगानिस्तान में जो सब पागल लोग बैठे थे, वे लोग सोच रहे हैं कि अमेरिका एक ऐसी महासत्ता है अपने प्रोस्पेरिटी के मद में अंध होकर के इस तरह से दुनिया पर राज चला रहा है कि अभी उसको एक सबक सिखाने की जरूरत है। बोल अभी अमेरिका भी तो अफगानिस्तान में गया था। अपना जब काम खत्म हो गया सोवियत यूनियन को भगा दिया तो फिर अमेरिका भी वहां से निकल आया। ऐसा नहीं सोचा कि यह लोग जो पहाड़ में जंगल में जीते हैं इन लोगों का क्या कुछ कल्याण करने के लिए हम लोग जितना पैसा यह वेपन सिस्टम में डाले थे उस उसका 10% भी तो यहां के औरत और बच्चों के कल्याण में डाले ऐसा नहीं सोच करके बस सोवियत यूनियन को भगाया अफगानिस्तान से अपने भी निकल गए तो फिर अफगानी लोग वे तो तो वैसे ही पागल थे और ऊपर में से सोवियत यूनियन का हमला हुआ वह जो स्वामी जी की कहानी है ना वह स्वामी जी कहते है अपना मन कैसा है? तो मन है बंदर जैसा। फिर इस बंदर ने शराब पिया। फिर इस शराबी बंदर को बिच्छू ने काटा और फिर इस बिच्छू के काटे हुए शराबी बंदर के ऊपर में भूत सवार हो गया। फिर देखिए कि वह कैसा उत्पात करता है। तो यह अफगानिस्तान वाले थे ही पगले। ऊपर में से यह सोवियत यूनियन ने अटैक किया। ऊपर में से यह पाकिस्तान वहां जाके कुछ ना कुछ गड़बड़ कर रहा है। ऊपर में से ये अमेरिका वाले चले आए। तो फिर जो परिस्थिति उनकी थी अभी अमेरिका इनको छोड़कर अपने घर में जाकर बैठ गया। सोचता है कि हम लोग बड़े मजे से रहेंगे यहां पे। किंतु ऐसा होने नहीं वाला है। यह जो नियम कानून है इस जगत के कि एक आदमी यदि सफर कर रहा है, एक यदि यंत्रणा प्राप्त कर रहा है तो उसका जो दूसरा मनुष्य है वह कभी भी शांति से नहीं जी पाएगा। क्योंकि स्पिरिचुअली हम सभी लोग कनेक्टेड है एक दूसरे के साथ में। आप चाहे अफगानी हो ना कि यह चाहे श्रीलंका के हो ना कि चाहे केन्या के हो ना कि यह सुदान के हो ना कि यह तिबेट के हो ना कि कहां पे भी हो जहांजहां पे भी मनुष्य की यंत्रणा मनुष्य को यातना दी जा रही है। जहांजहां पे भी मनुष्य सफर कर रहा है। जो सर्वोच्च सिविलाइजेशन है, जो प्रोस्पेरस सिविलाइजेशन है, उनको जाकर के वहां पर मदद करनी होगी। चार दीवारी के भीतर में अपने को बांध नहीं सकते हैं। वह गलती भारत ने कर दी। हमारे पास में यह हमारे पुरखों ने दिए हुए यह एक बहुत बड़ा खजाना था ब्रह्म ज्ञान रूपी उपनिषद रूपी। हम लोगों ने क्या किया? पहले तो अपने देश के दरवाजे बंद कर दिए कि जो देश के बाहर जाएगा वह काला पानी क्रॉस करेगा उसको नाथ बाहर कर देंगे। पहले तो यह पगलामी की। उसके बाद में अपने ही देश के भीतर में डिवीजन करना शुरू कर दिया। यह ब्राह्मण है। यह नॉन ब्राह्मण है। यह उपनिषद वेदों का अधिकार सिर्फ ब्राह्मण के पास में है। नॉन ब्राह्मण के पास में नहीं है। तो ऐसा करतेकरते यह जो ब्रह्म ज्ञान रूपी अमृत जो था उपनिषद रूपी हमारा यह जो ट्रेजर हाउस जो था उसका दरवाजा हम बंद करतेकरते बस वही कुछ चंद गिनेचुने लोगों के पास में यह आकर रह गया। और फिर यह लोग यदि यह सोचते हैं कि हम शांति से अभी उपनिषदों के आनंद का उपभोग करेंगे तो यह कभी होने वाला नहीं है। यह जो बंद दरवाजे हमने किए थे यह जितने भी हमलावर है वह चाहे सेंट्रल एशिया से आए हो ना कि यह चाहे यह ईस्ट एशिया वेस्ट एशिया से आए हो ना कि यह चाहे वेस्टर्न कंट्रीज से आए हो। सब लोगों ने आकर के हमारे दरवाजे तोड़े हैं। तो ऐसा कभी होगा ही नहीं। आज अमेरिका फिर से यह कह रहा है कि हम लोग अपने दरवाजे बंद कर देंगे। हम लोग अकेले रहेंगे। आइसोलेशनिस्ट हम लोग फुल प्रोस्पेरिटी में जिएंगे और फिर पूरा जगत गड्ढे में गिरना हो वह गिरे। तो ऐसा कभी नहीं होने वाला है। यह जगत जैसे ही कुछ कुछ लोग जब सफरिंग है, यंत्रणा है, यह कष्ट है, यह दरिद्र्य है, उसका भोग जब करेंगे तब उनका मन के भीतर में ना भयानक क्रोध प्रकट होगा। और फिर वह क्रोध को लेकर के वे लोग जितने भी प्रोस्पेरस लोग हैं उन पे धावा बोलेंगे। यह कम्युनिस्ट रेवोल्यूशन या जहांजहां पे भी आया है यह फ्रेंच रेवोल्यूशन देखिए वह जो राजा बड़ा मजे से प्रोस्पेरिटी में रहता था तो लोगों ने आकर के उसको और उसकी बीवी का कत्ल कर दिया। अब अब रहो करो आनंद। तुम लोग बड़े-बड़े महलों में रहोगे। सब अच्छा-अच्छा खाना खाओगे। अच्छे-अच्छे कपड़े पहनोगे और बड़े-बड़े बॉल रूम बना करके वहां पर डांस करोगे। और यहां पे जो आम जनता है उसको खाने को भी नहीं मिल रहा। तो आप लोग सोचते हैं कि हम आपको शांति से जीने देंगे। ऐसा कभी नहीं होगा। जो गरीब है, दरिद्र है, जो कि पदददलित है, वे लोग इकट्ठा होंगे होकर के यह जो जितने भी धनी मानी लब्ध प्रतिष्ठित है जो समाज के उन पर धावा बोलेंगे ही बोलेंगे। तो यह तो जगत का नियम ही है। और इसीलिए यह जो न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड साइंस फिक्शन में जो कांसेप्ट है कि कोई भी सिविलाइजेशन यह न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड को कब पार करेगी? देखिए यह जो रेवोल्यूशन आता है या तो फिर युद्ध हुआ था। अभी तक जो रेवोल्यूशन या तो फिर वॉर हुई है उसमें देखिए कि वेपंस क्या थे? तो बंदूक थी, तोपे थी, रॉकेट्स थे। यह सेकंड वर्ल्ड वॉर में टैंक थी, फाइटर प्लेन थे, बमबर थे। अभी तक यही तो अभी आजकल ड्रोन है। तो यहां तक ही तो हम लोगों ने वेपंस यूज किए हैं। किंतु मान लीजिए कि कोई एक दरिद्र कष्ट में पड़ा हुआ जो एक समूह है लोगों का वो कोई देश हो ना कि कोई जाति समूह हो। उनको इतना गुस्सा आ गया। बाकी सब जो धनी लोगों पे, प्रोस्पेरस लोगों पे, पावरफुल लोगों पे, कैपिटलिस्ट क्लास के ऊपर में और फिर न्यूक्लियर वेपन ला के उन्होंने रेवोल्यूशन लाना शुरू किया तो सोचिए कि पूरा सिविलाइजेशन खत्म हो जाएगा। तो यह न्यूक्लियर थ्रेशहोल्ड कौन पार कर सकता है? वही सिविलाइजेशन पार कर सकती है कि जिसके भीतर में यह कंपैजन और यह जो दया करुणा है उसने उतना ही एडवांस किया है उतना ही वह एडवांस हुई है जितना कि साइंस एंड टेक्नोलॉजी हुई है। यदि जो प्रोस्पेरस पर्सन है जो कि जिसके पास में यह पावर है जिसके पास में यह टेक्नोलॉजी है वह यदि दरिद्र है चंडाल नारायण है दरिद्र नारायण है पद दलित नारायण है उनको सहाय करने का नहीं सोचेगा वह सोचेगा कि मैं अपने दरवाजे बंद कर लेता हूं। चारों ओर बड़े-बड़े गार्ड रख देता हूं और फिर यह मैं आराम से जिऊंगा। यह चार दीवारी के भीतर में यह चार दरवाजे बंद करके यह कभी नहीं होगा। यह सिविलाइजेशन जहां पर भी इस तरह से स्प्लिट होती है धनी और गरीब लोगों के बीच में वहां पर या तो युद्ध या तो फिर रेवोल्यूशन आता ही है और फिर वो सिविलाइजेशन सीधी मिट्टी में मिल जाती है। और यदि इस सिविलाइजेशन के पास में न्यूक्लियर वेपन हो तो फिर बस वो पृथ्वी ही वो ग्रह ही नष्ट हो जाएगा। वो ग्रह ही डिस्ट्रॉय हो जाएगा। तो यहां पर भी देखिए कि ठाकुर ने एक समय फॉर नाउ अभी तक का जो हमारा लेखाजोखा था बैलेंस शीट का उसमें यदि कुकर्म ज्यादा थे तो वह सब ठाकुर खा गए हैं। हमको एक कोरी पार्टी करके यह सिविलाइजेशन दिया है। एक ब्लैंक स्लेट हमारे हाथ में थमाई है। किंतु इसका अर्थ यह तो नहीं कि ठाकुर हमारे जितने भी कुकर्म है खा गए हैं। हम लोगों ने जिसके पास में यह प्रोस्पेरिटी है वे लोग बस प्रोस्पेरिटी का आनंद करेंगे और जिन लोगों के पास में खाना अर्जन करने के लिए खाना खाने के लिए भी कुछ नहीं है उन लोगों को संपूर्ण नजरअंदाज करेंगे तो अब तक तो जो किया सो किया ठाकुर हमको ब्लैंक स्लेट देकर के गए किंतु एज ऑफ नाउ ऑनवर्ड्स यदि हम फिर से वही बात करना शुरू करेंगे तो फिर क्या होगा कि पता नहीं नेक्स्ट टाइम अवतार आएंगे कि भी नहीं। नेक्स्ट टाइम यदि वह हमारे पाप को खा जाएंगे कि भी नहीं। नेक्स्ट टाइम यदि वह ऐसा सोच भी ले कि यह जितने भी मनुष्य हैं उनका पाप मैं बार-बार धो दे रहा हूं। फिर भी वह जो है जितनी बार मैं उनको ब्लैंक स्लेट करके देता हूं। जितनी बार इनका मैं अकाउंट क्लोज करता हूं। उतना ही बार यह लोग फिर से अपना पाप का अकाउंट खोलते हैं। फिर से यह धनी अमीर लोग जिनके पास में पावर पोजीशन प्रोस्पेरिटी है वे लोग दूसरों का शोषण करते हैं और यह मिडिल क्लास है। उसमें सहायता करता है। किसी के हृदय में ना ही करुणा है, अनुकंपा है, दया है, कंपैजन है या तो फिर ईश्वर के प्रति प्रेम है। वे लोग बार-बार यही सब घनघोर मटेरियलिज्म में डूबे जा रहे हैं। तो फिर तो एक बार उनके मन में आएगा कि इस स्पीशीज को आगे बढ़ाने से काम क्या है? यह जो सिविलाइजेशन या यह जो ग्रह है उसको बचाए रखने से क्या काम है? उसको नष्ट हो जाने दो। ऐसे करोड़ों करोड़ों करोड़ों ग्रह है। अभी एक गिनती मैं रिसेंटली पढ़ रहा था कि कितने ग्रह है इस कॉस्मोस में। माने विजिबल कॉस्मोस में। तो पृथ्वी पर जितने भी समुंदर है इस समुंदर के किनारे जितनी भी रेती है इस रेती के जितने ये कण हैं जितने दाने हैं एक-एक कण जो है रेती का वो 4000 प्लेनेट्स को रिप्रेजेंट करता है। तो जितने भी रेती के कण है पृथ्वी के ऊपर में गिन लीजिए वो एक कण के बराबर 400 प्लेनेट है। इतनी प्लेनेट्स कॉस्मोस में है। तो इतनी प्लेनेट्स में यदि 0.01% में भी यदि इवोल्यूशन ऑर्गेनिज्म डेवलप हुआ है, इवोल्यूशन हुआ है, सिविलाइजेशन एस्टैब्लिश हुई है तो भी आप मान लीजिए कितनी करोड़ों-करोड़ों-करोड़ों सिविलाइजेशन है। तो फिर एक सिविलाइजेशन को बचा के रखने का क्या फायदा है? यदि वे लोग बार-बार एक घमंड में आकर के स्वार्थ में आकर के अपने ही भाई-बहन है, बंधु बांधव है उनको नेगलेक्ट करते हैं। तो इस सिविलाइजेशन को बचाने का क्या लाभ है? वो भगवान कभी इस तरह से सोच भी सकते हैं। तो देखिए कि इस बार तो एटलीस्ट हमको यह ब्लैंक स्लेट करके ठाकुर ने दिया है। अभी तक हमने जो किया सो किया। अभी इसके बाद में हमारे पास में फिर से एक ऑप्शन है कि हां आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च यह जो ट्विन आइडियल्स है अपने संघ के एक और तो है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए जो थोड़ा बहुत साधन भजन हो सके और दूसरा है कि लोक कल्याण के लिए जो थोड़ी बहुत सेवा हो सके। अभी ऐसा नहीं है कि घरवार छोड़कर के सब कुछ त्याग करके आप यह सब करें। किंतु यथाशक्ति यथासंभव हमको करना ही होगा। वरना तो फिर जब तक हम यह ईश्वर आराधना के लिए थोड़ा बहुत यथाशक्ति प्रयास ना करें लोक कल्याण के लिए यदि प्रयास ना करें तो फिर क्या होगा कि हमारा जीवन है वो घनघोर मटेरियलिज्म में घनघोर स्वार्थ परता में डूब जाएगा और यह स्वार्थ के मारे यह भौतिक जगत की सुख भोग के पीछे दौड़ने के मारे हम जो कोई भी एक्शन लेते हैं, जो कोई भी कर्म करते हैं, वह सब हमारा नेगेटिव बैलेंस ही बढ़ाता जाएगा। और फिर से एक बहुत ज्यादा नेगेटिव बैलेंस बढ़ गया, तो हो सकता है कि नेक्स्ट टाइम अवतार सोचे कि हां मैं पृथ्वी पर नहीं आकर के और किसी ग्रह पर जाता हूं। क्योंकि देखिए यह भी तो एक बात है ना कि गीता में भगवान हमको वचन तो अवश्य देते हैं कि यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानी भवतु भारत जबजब भी धर्म का ह्रास होगा साधु पुरुषों का अपमान होगा अवगणना होगी तब तक मैं अवतार ग्रहण करूंगा और यह धरा का भार जो है हल्का करूंगा किंतु यहां पर भगवान यह तो नहीं कहते कि पृथ्वी ही एकमात्र ग्रह है और पृथ्वी ग्रह पे ही मैं अवतरण करता रहूंगा अवतार लेता रहूंगा। ऐसा तो कहीं नहीं लिखा है। अपने जितने भी वेद उपनिषद है, हो सकता है कि यह जो करोड़ों करोड़ों ग्रह है, करोड़ों-करोड़ों सिविलाइजेशंस होगी। वहां पर भी तो भक्त लोग होंगे। भगवान ठीक करेंगे कि इस बार यदि पृथ्वी पर आया और फिर इन लोगों को ब्लैंक स्लेट करके दे दिया। इसके बावजूद यह लोग सुधरे नहीं है तो फिर मरने दो उनको। अभी और किसी ग्रह पर जाकर के अवतार ग्रहण करता हूं। बीच-बीच में भगवान हमको चांस देते हैं कि हां नींद से जगा देते हैं कि चलो अभी तक यह मोह माया के फंदे में पड़ के मटेरियलिज्म के चक्कर में पड़कर के कामिनी कांचन से आहत होकर के जैसे कि हिप्नोटाइज होकर के आप लोग रह रहे थे। ठीक है चलो एक बार तुम लोगों पर दया करके तुम्हारी आंखें खुलवा दी। किंतु फिर इससे भी यदि आप लोग थोड़ी दिन के बाद में फिर से नींद में चले जाएंगे। फिर से वही काम कांचन के लोभ में अंध हो जाएंगे। फिर से वही यह जो भौतिक चीजें हैं, सुख उपभोग है इसके पीछे में अंधी दौड़ लगाएंगे। तो फिर कितने दिन तक मैं आकर के आपको बार-बार नींद से जगाता रहूंगा? कितनी बार मैं आपका पाप खाता रहूंगा? तो यह प्रश्न हो सकता है। तो बेटर है कि ठाकुर आए हैं। हमको ब्लैंक स्लेट दिया है। लेट अस टेक एडवांटेज ऑफ दैट एंड लेट अस चेंज आवर लाइफ। लेट अस ट्रांसफॉर्म आवर लाइफ। लेट अस ट्रांसेंड दिस हिप्नोटिज्म ऑफ काम कांचन। दिस हिप्नोटिज्म ऑफ सेल्फिशनेस। एंड जितना भी हो सके ईश्वर आराधना करें। जितना हो सके लोक कल्याण करें। यथाशक्ति यह यह शब्द हमेशा ख्याल में रखना है। यथाशक्ति भाई जोर जबरदस्ती करके करने से भी फिर पागलपन आ जाएगा। यह एक दूसरा खतरा है कि हां चलो भगवान ने एक बार आकर के ब्लैंक स्लेट कर दिया है। अकाउंट हमारा क्लोज कर दिया है। फिर से अकाउंट खुले नहीं। इसके लिए भी आज मैं जंप करके लग जाता हूं। चोटी बांध करके बैठ जाता हूं। किंतु ऐसा कुछ करने से फिर दिन में 10,000 जप मां ने कहा है करना है तो मैं मां की तरह 10,000 जप स्टार्ट करूंगा। तो ऐसा ना हो जाए ऐसा करते-करते कहीं दिमाग ना बिगड़ जाए तो यथाशक्ति स्टेप बाय स्टेप स्लोली एंड ग्रेजुअली यह सब हमको ख्याल रखना है।

श्रीरामकृष्ण के आखिरी दिनो की कहानी : भक्तवृंद समझते हुए भी समझना नहीं चाहते थे

इसके बाद में अभी जो नया टॉपिक गंभीरानंद जी प्रारंभ करते हैं। ठाकुर के आखिरी दिन आ चुके हैं। आखिरी दिन की घटना का वर्णन करने से पहले बिल्कुल आखिरी दिन क्या हुआ उस दिन का घटना घटनावली वर्णन करने से पहले किंतु ठाकुर हमको और एक प्रसंग बताते हैं। क्या कहते हैं? गंभीरानंद जी हमको और एक प्रसंग बताते हैं। क्या कहते हैं? क्रम 1886 ख्रिस्ताब्दी श्रावण मास प्राय शेष होया क्रमशः 1886 साल का श्रावण महीना ऑलमोस्ट खत्म होने को आया। ऑलमोस्ट शेष होने को आया। इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार यह अगस्त का महीना था। आखिरी दिन है 16th अगस्त। 15 अगस्त की रात और 16th अगस्त की अर्ली मॉर्निंग सुबह को 1:00 बजे तो अगस्त महीना प्रारंभ हो ही गया है नाना कथाएं नाना इंगते श्री श्री ठाकुर अंतरंग गण के जाना ते लाले जे तहार नित्य धाम प्रयाण काल क्षमागत विभिन्न बातों से विभिन्न इशारों से श्री ठाकुर अंतरंग गण के बताने लगे अंतरंग गण को बताने लगे कि उनके नित्य धाम में प्रयाण का समय समागत हो चुका आ चुका है। नित्य धाम में प्रयाण ऐसा नहीं कि ठाकुर जैसे कि नित्य धाम वो जो फेमस ठाकुर की बात मां जब रोती है मां को कहते हैं कि एक घर से दूसरे घर ही तो गया हूं ना और कहां गया हूं। तो यह पृथ्वी के ये जो लीला धाम है फिर वो नित्य धाम है। ये पृथ्वी लोक पे आते हैं लीला करने के लिए और नित्य धाम में रहते हैं। जैसे ठाकुर खुद उदाहरण देते हैं ना कि सांप जब कुंडली बनाकर के पड़ा रहता है स्थिर तो फिर वो सांप वो ब्रह्म है और जब वो सर्पाकार गति से वह चलता है तो शक्ति है। तो वह नित्य धाम है। यह लीला धाम है। नित्य धाम में जैसे कि ठाकुर अपने महा महादेव किस तरह से कैलाश पे महान निर्वाण में महान निर्वाण के आनंद में समाधस्थ होकर के बैठते हैं तो वैसा वो कैलाश पर्वत पे ना कि वृंदावन में ना कि वाराणसी में वो समाधिस्थ होकर के बैठते हैं और यह पृथ्वी पर जब आएंगे तो वह लीला करेंगे तो ठाकुर कहते हैं कि विभिन्न बातों से विभिन्न इशारों से ठाकुर अंतरंग गण को जनाने बताने लगे कि उनके नित्य धाम में प्रयाण का काल समागत हो चुका है। किंतु प्रियज विच्छेद चिंता अपार भक्त वृंदो गुजिया गुते चाहले ना किंतु प्रियजन की विच्छेद चिंता विच्छेद अर्थात कि वियोग चिंता वियोग चिंता से जैसे कि एक तरह से पैरालाइज हो चुके भक्त वृंद समझ करके भी समझना नहीं चाहते थे। ये देखिए कितना सुंदर शब्द प्रयोग है। बुझिया बुझते चाह लेना समझ करके भी समझना नहीं चाहते थे। हृदय में से तो पता चल ही गया है कि ठाकुर अभी लीला धाम त्याग करके नित्य धाम की ओर जा रहे हैं। किंतु हृदय स्वीकार कर लेता है। बुद्धि स्वीकार करने से मना कर देती है। क्यों? क्योंकि प्रियजन का जब विच्छेद होता है, प्रियजन का वियोग होता है तो हमको इतनी पीड़ा देता है, इतना कष्ट देता है कि मनुष्य का मन जैसे कि एस्केपिज्म चाहता है इस पीड़ा से इस कष्ट से और इसीलिए जो नजर के सामने है भी सही उसको स्वीकार करने से वह मना कर देता है। बुझिया बुझते चाह लेना समझ करके भी समझना नहीं चाहते थे। श्री भगवान से अति विषाद शत आवरण खने के जनने उन्मोचित करिया पर मुहूर्त शकल के माया भुलाया श्री भगवान भी श्री ठाकुर भी यह अति विषादमय सत्य का आवरण क्षण भर के लिए उन्मोचित तो कर देते थे क्षण भर के लिए जो सत्य का आवरण है कि हां नित्य धाम में जाने का समय आ प्रकट हुआ है। यह जो लीला धाम है, यहां पर लीला समाप्त हो रही है। यह जो हृदय विधारक सत्य है, उसके ऊपर में से बीच-बीच में पर्दा हटा तो देते थे। पर्दा उन्मोचित कर तो देते थे। किंतु पर मुहूर्त ही शकल के मायाएं भुलैया देते लाले। किंतु परक्षण ही पर मुहूर्त ही सबको माया से भुलाने लगे। माया में भुलाने लगे। क्यों? क्योंकि देखिए ठाकुर को यह इंगित तो देना होगा। यह जो साइन है, लक्षण है, जो इशारे सब है वह तो करने ही होंगे कि नित्य धाम में जाने का समय आन प्रकट हुआ है। प्रयाण का काल समागत हो गया है। किंतु और और यह साइन क्यों देनी है? क्योंकि नरेंद्र ने तो अपने गुरु भाइयों को कहा ही था। बाकी जो ठाकुर के त्यागी और गृहस्थ संतान थे सबको कह दिया था कि ठाकुर इस बार शरीर रक्षा नहीं करना चाहते हैं तो आओ जितनी हो सके साधना कर ले ठाकुर के रहते रहते ही जितना हम आध्यात्मिक जीवन में उन्नति सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं जितनी हमसे हो सकती है इतनी हम प्राप्त कर ले तो यह जो इन लोगों ने जो साधना का जो प्रचंड प्रवाह बहाया था ठाकुर के यह जो त्यागी संत संतानों ने और गृहस्थ भक्तों ने भी अपनी-अपनी साध्य शक्ति के अनुसार इससे ऐसा जमझमाट आध्यात्मिक वातावरण इस काशीपुर में खड़ा हुआ था और इसी के परिणाम तो नरेंद्र को उसी समय निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई थी। बाकी गुरु भाइयों को भी बहुत सारे दर्शन हुए थे। गृहस्थ भक्तों का भी हमेशा के लिए कल्याण हो चुका था। आध्यात्मिक कल्याण हो चुका था। तो वो जो एक आनंद और आध्यात्मिकता का फवारा बहे इसके लिए ठाकुर को यह बताना आवश्यक था कि हां अभी आपको जो भाता बांधना है भाता अर्थात वो टिफिन लंच बॉक्स किसान खेत में जाता है तो गुजराती शब्द है किसान खेत में जाता है तो अपनी वह पुटली में वह रोटला है फिर वह जो प्याज है फिर गुड़ है वगैरह सब बांध लेता है फिर खेत में काम करेगा फिर धूप जब होगी दोपहर होगी तो पेड़ की शीतल छाया में बैठकर के पुटली खोल के वह सब आहार करेगा। वो रोटला इसको कहते हैं गुजराती में वो सब खाएगा। तो यह जो भातु ये जो बांधना है पर भवसागर पार करने के लिए जो पुण्य का संचय करना है अभी आप कर लो। आध्यात्मिकता का जो संचय करना है वह अभी कर लो। इसके लिए ठाकुर को यह बताना आवश्यक तो था कि अंतिम घड़ी आन पहुंची है। किंतु साथ-साथ में ही ठाकुर देखते थे कि यह सत्य को उन्मोचित करके सबके सामने प्रकट करने से भक्तों के हृदय में जो कष्ट होता है निदारण जो कष्ट होता है उससे फिर भक्तों लोगों का कष्ट ठाकुर नहीं सहन कर पाते हैं। फिर से माया का आवरण इस सत्य के ऊपर में ढक देते हैं। फिर से कहीं हंसी मजा कहीं आध्यात्मिक रस प्रसंग प्रारंभ कर देते हैं। आखिर आखिर में तो मुंह से बोल भी नहीं पाते थे। किंतु फिर भी देखिए एक कहानी है मास्टर महाशय कहते हैं कथामृत में कि गिरीश घोष आया है ठाकुर के पास में बैठकर के वो सब तरह की बातें कर रहा है तो गिरीश के लिए ठाकुर ने ये जो फागगू की दुकान वो पता है ना कि ठाकुर तो कचोरी वगैरह खाने के बड़े शौकीन थे तो फागगू की दुकान थी वहां पे अच्छी कचोरी मिलती थी मिलती थी स्वादिष्ट तो वो मंगवा लेते थे किसी के पास से तो इस तरह से गिरीश के लिए भी कचोरी मंगवाई है। पूरी भी है, कचोरी भी है। तो गिरीश खा रहा है। तो गिरीश कहता है कि कचोरी बड़ी स्वादिष्ट है। तो ठाकुर ऐसा इशारा करके कहते हैं कि फागगू की दुकान की है। फिर कहते हैं कचोरी खाओ पूरी रहने दो अभी। तो ऐसा गिरीश मजे से कचोरी खा रहा है। और फिर जब उसने खा लिया तो ठाकुर अपने से देखिए इतने क्रूशका काय हो गए हैं। हड्डी पसली दिख रही है। संपूर्ण रूप से देह नष्ट हो चुका है। स्वास्थ्य संपूर्ण रूप से नष्ट हो चुका है। इसके बावजूद बिस्तर में से खड़े होने की क्षमता नहीं है। इसके बावजूद अपने हाथों से अपने को धकेलते हुए कैसे भी करके पास में जो पानी का कुंजा पड़ा था, पानी का घट पड़ा था, उसमें से पानी निकाल करके गिलास में गिरीश को देते हैं। और जब ठाकुर इस तरह से वो पानी के कुंजे की ओर आगे बढ़ रहे थे सभी लोग निस्तब्ध होकर के देख रहे हैं। ठाकुर को जैसे कि अटकाने की कुछ बोलने की कोई शक्ति ही किसी में नहीं। सब लोग निस्तब्ध होकर के देख रहे हैं। ठाकुर ने वह गिलास में पानी लिया। उनकी इच्छा थी कि गिरीश को ठंडा पानी दे। यूजुअली ये जो मिट्टी का कुंजा या घट होता है तो उसमें पानी ठंडा हो जाता है। किंतु क्या है कि वो पानी उसी समय किसी ने फ्रेशली भरा होगा। बोलकर के पानी इतना ठंडा नहीं था। तो देखा ठाकुर ने कि पानी इतना ठंडा नहीं है तो थोड़े निराश हो गए। किंतु फिर देखा कि और कहीं पर इस तरह से ठंडा पानी मिलेगा नहीं जो कि कुंजे में एक घंटे या तीन-चार घंटा रखा है और ठंडा हो गया है। तो ऐसा तो मिलेगा नहीं। तो फिर जो पानी था वही उन्होंने इच्छा नहीं थी। फिर भी गिरीश को दिया पीने के लिए। देखिए कि आखिर तक ठाकुर की यह जो भक्तों के प्रति यह जो भक्त वात्सलता जो है यह जो भक्तों के प्रति करुणा और उनका एक आंतरिक संबंध है वह इस तरह से बना रहा था कि किसी को लगता नहीं था। ठाकुर का देह देखेंगे तो अस्थि चर्मसार हो गया है। सिर्फ हड्डी दिखती है और हड्डी के ऊपर में यह जो चमड़ी है यह दिखती है। जितने भी मसल है जितना भी फैट है संपूर्ण रूप से गल गया है। इसके बाद में भी भक्तगण ठाकुर का जो आनंद था ठाकुर का भक्तों के प्रति जो प्रेम था उसको देखकर के यही लगता था कि नहीं ठाकुर कैसे भी करके ना यहां से निकल लेंगे। म अपने को कैसे भी करके बचा लेंगे। एक दिन काशीपुर की ही घटना है। एक दिन ठाकुर कहते हैं एकाएक गले में बहुत कष्ट हो व्यथा हो रही है। बहुत पेन हो रहा है। तो ठाकुर बोलते हैं अरे देखो गले में कैसा हो रहा है। तो उस समय सामने एक भक्त बैठा था। वो कहता है एक कथा यार भूली ना। माने यह सब बातों से अभी मैं भूलने वाला नहीं हूं। अभी मैं पटने वाला नहीं हूं। उनके मन का यही भाव कि ठाकुर गले में कैंसर का बहाना करके कोलकाता आए हैं। जिससे कि भक्तगण जो है ठाकुर के साथ में रह पाए। उनकी सेवा कर पाए और वह धन्य हो। इतना ही ठाकुर एक लीला ही कर रहे हैं कैंसर रूपी। जैसे ही भक्तगणों का कल्याण हो जाएगा कैंसर को फेंक करके फिर से आराम से दक्षिणेश्वर चले जाएंगे। तो ऐसा सोचने वाले भी भक्त थे और ठाकुर बीच-बीच में इंगित तो दे देते थे। वह जो साइंस तो दे देते थे कि हां अभी महाप्रयाण का क्षण जो है महाप्रयाण की घड़ी जो है आगत प्राय है सामने ही खड़ी है किंतु फिर भी उनको पता चलता था कि ऐसा बोलने से ऐसे बातें करने से लोगों को कष्ट होता है तो फिर माया के आवरण से इस सत्य को फिर से ढक देते थे। किंतु देखिए मां

श्रीरामकृष्ण के आखिरी दिनो की कहानी : क्यों पता नहीं, मेरे मन में सदा ही ब्रह्मभाव का उद्दीपन हो रहा है

शारदा के सामने ठाकुर इस तरह का कोई बहुत ज्यादा दिखावा नहीं करते थे। कभी-कभी थोड़ा क्रूल भी लगेगा। किंतु फिर भी मां को पता चलना चाहिए कि क्या माजरा है। मां तो महामाया स्वयं है। तो ऐसा तो है नहीं कि महामाया की आंखों में धूल झोंक सके आप। महामाया दुनिया भर की आंखों में धूल झोंकती है। माया में भुला करके रखती है। ठाकुर जैसे कहते हैं लाल चूशी देकर के भूलिए भूलिए रहिए। लाल चूशी अर्थात कि लाल कलर की लॉलीपॉप वो आपका हाथ में देख के आप वो चूसते रहिए। वो जगत के भोग करते रहिए और आध्यात्मिक सत्य के प्रति आप संपूर्ण रूप से वो इग्नोर कीजिए आध्यात्मिक सत्य को या फिर उसके प्रति बेफिक्र रहिए। महामाया यह सब लोगों के साथ में खेल करती है। मायामाया की खुद की आंखों में आप तो धूल नहीं झोंकने वाले हैं। तो फिर इस तरह से एक दिन क्या हुआ? एक दिन त श्री मां के डाक्या आवार बार जनो श्रीक्त शशि के स्वामी रामकृष्णंद जी के पाठया बोली लेन एक दिन ठाकुर ने श्री मां को बुलाकर के ले आने के लिए श्री जुक्तो शशि भविष्य के स्वामी रामकृष्णानंद जी को भेजा और क्या कहा तिन्ही खूब बुद्धिमती मां खूब बुद्धिमती है सुतान तीनी आशिले ठाकुर तोखुनकार अवस्था था ठीक ठीक बुझते पारी में अर्थात कि मां जब आएगी तो ठाकुर की क्या अवस्था है वह ठीक ठीक समझ पाएगी भक्तों की नजर में तो ठाकुर धूल झोंक देते थे बीच-बीच में यह कह के आनंद करके हंसी मजाक करके मुंह से वाक्य शब्द नहीं निकल रहे हैं उसके बावजूद लोगों को तो भुला करके रखते थे किंतु ठाकुर की ठीक-ठीक मानसिक और शारीरिक अवस्था क्या है वह समझने तो मां ही समझ सकती है। तनी खूब बुद्धिमती वह बहुत बुद्धिमती है। उसको बुला के ले आओ। श्री मां उपस्थित होईले ठाकुर बोली लेन श्री मां उपस्थित होने से ठाकुर ने कहा देखो सुनो सुनो जी केनो जानी ना क्यों पता नहीं है आार मने सर्वदा ही ब्रह्म भावे उद्दीपना हो छे मेरे मन में सर्वदा ब्रह्म भाव की उद्दीपना हो रही है अर्थात कि पृथ्वी के जितने भी यह आकर्षण थे माया माया के सात्विक माया के बंधन विद्या के संसार के बंधन अविद्या का संसार एक है विद्या का संसार दूसरा है काम कांचन का बंधन एक है शुद्ध पवित्र ईश्वरीय भाव से जो प्रेम होता है वह दूसरा है तो वह जो सात्विक बंधन भी जो था माया ये जो विद्या का जो संसार था उसमें भी अभी ठाकुर का मन नहीं टिक रहा है। कहते हैं अरे सुनो पता नहीं क्यों मेरा मन हमेशा मेरे मन में हमेशा ब्रह्म भाव का उद्दीपन हो रहा है। जननी की आर उत्तर दी जननी और क्या उत्तर देगी? देखिए मां के मन में भी मां के जीवन

आख़िरी दिनों में माँ सारदा ने अपनी लाड़ली कन्या राधू के प्रति भी माया का बंधन काट दिया था

में भी आखिरी आखिर में ऐसा ही हुआ था ना इतने दिनों तक तो राधुराधु करके पागल किंतु जब आखिरी समय आन आन पड़ा आखिरी घड़ी आन पड़ी उस समय मां ने कहा यह राधु को यह नलिनी माकू राधु का बच्चा सबको भेज दो काम जय राम भाटी यहां पर मत रखो तो जैसे यह समाचार शरद महाराज को मिला तब शरद महाराज ने कहा कि तबे बोध होई मां ए बार देह रख देना। लग रहा है कि मां अभी इस बार देह रखना नहीं चाहती। देह की रक्षा नहीं करना चाहती। देह त्याग का संकल्प ले बैठी है। तो मां के मन में भी यह राधु के प्रति जो माया थी आखिरी घड़ी में कट गई। और फिर शरद महाराज स्वयं मां के पास में आकर विनती करके कहते हैं कि मां अभी इस समय हम लोग यदि यह नलिनी है, राधु है इन सबको गांव भेज देंगे ना तो गांव वाले इन की निंदा करेंगे। कहेंगे कि कहां मां आखिरी समय बीमार है तो मां की सेवा नहीं करके यह लोग मां को छोड़ के यहां पर गांव में क्यों आ गई है? ऐसा करके लोग उनकी निंदा करेंगे। बोल के अभी इनको कुछ दिन तक रहने दीजिए। यानी शरद महाराज भी देखिए चालाक कैसे हैं कि यह पता है कि ठाकुर और मां गढ़ते ऐसे भांगते नहीं अर्थात कि कंस्ट्रक्ट करने के लिए आए हैं डिस्ट्रॉय करने के लिए नहीं तो यह समाज समाज में लोग क्या कहेंगे समाज के बंधन आखिरी घड़ी तक उन्होंने यह सब चीजों का पालन किया है। अभी जाकर के मां के मन में से यदि राधु के प्रति माया संपूर्ण रूप से खत्म हो चुकी है तो अभी यह कहना कि नहीं मां कैसे भी करके राधु को रख दो तो हो सकता है कि मां यदि स्वीकार ना करें इस बात को तो फिर मां को भुलाने के लिए महामाया को भुलाने के लिए शरद महाराज ही कर सकते हैं यह काम कि महामाया की आंखों में धूल डालने के लिए मां को आकर के उल्टा समझाते हैं कि मां यदि इस समय इनको भेज देंगे गांव में तो गांव वाले निंदा करेंगे और फिर जो बात उन्होंने नहीं की किंतु जो मां समझ गई कि भांगते आशनी घोड़ते ऐसे छ तोड़ने के लिए नहीं आए बनाने के लिए आए तो फिर लोक लाज लोग क्या कहेंगे आखिरी घड़ी तक उन्होंने यह रखा है तो फिर मां ने कहा ठीक है भले यह लोग यहां पर रहे किंतु मेरी नजर के सामने कोई ना आए इस बात का ख्याल रखना तो शरद महाराज के मन में इतना तो एक सध्यारा बैठा कि चलो राधु के ऊपर में से जो 100% माया जो चली गई थी। उसमें से हो सकता है कि राधु बगल वाले कमरे में भी है तो 1% माया रहे तो हो सकता है शायद कि मां लीला धाम में और कुछ दिन रहे। किंतु क्या है कि देखिए इन लोगों की लीला का जो अवसान होता है तो फिर इस घड़ी को तो ईश्वर भी नहीं टाल सकता। तो यहां पर भी जब ठाकुर ने कहा कि देखो गो अरे सुनो जी क्यों पता नहीं मेरे मन में हमेशा ब्रह्म भाव का उद्दीपन हो रहा है जब ऐसा कहा तो फिर गंभीरानंद जी क्या कहते हैं जननी की आर उत्तर दवेन जननी और क्या उत्तर देगी से कंकाल शार देह दोषों ने व्यथितो व्यथित हृदय द्वटी प्रबोध पाक को बोलिया मुंह मुंह फिराया निरबे अश्रु विसर्जन को ले वह कंकाल सार देह का दर्शन करके व्यथित हृदय से दो प्रबोध वाक्य कह के मुंह घुमा करके मुंह फिरा करके निरवे अश्रु विसर्जन किया प्योर संस्कृत वो कंकाल सार देह दर्शन करके ठाकुर का देह कैसा हो गया था उस समय कंकाल सार हो चुका था उस तरह के देह का दर्शन करके व्यथित हृदय हृदय कैसा होगा इस समय मां का व्यथित हो जाएगा दो प्रबोध वाक्य बोलकर के छोटा बच्चा जब जििद करता है तो मां उसको पटाती है कहती है कि यह जो तुमको खिलौना चाहिए बाद में दूंगी पहले ये थोड़ा पढ़ाई लिखाई कर दो ऐसा करके जो बच्चे को पटाती है उसको कहते हैं प्रबोध वाक्य तो दो प्रबोध वाक्य कह करके ठाकुर को पटा करके फुसला करके शांत करके मुंह फिरा करके निरवे अश्रु विसर्जन कर रही है। किसी को आवाज ना आए रोने की इस तरह से आंखों से अश्रुओं की धारा बहा रही है। मने मने जान ले मन में ही मन में जान लिया ब्रह्म में लियमान ए मोन के आर टानिया रखा जाए बेे ना ब्रह्ममान ब्रह्म में लीन होने के लिए जो प्रस्तुत हुआ है उस तरह के मन को ब्रह्म में लियमान इस मन को और अभी बांध करके नहीं रख सकते हैं। इसके बाद अभी आखिरी दिन का वर्णन है जिसको कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम