देवी स्तुति
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः आज आगमनी गान फिर से उसके ऊपर में चर्चा करेंगे। मैं आप सबको रिक्वेस्ट करूंगा कि अपना माइक ऑफ कर दें जिससे कि बाकी और किसी को सुनने में डिस्टरबेंस ना हो। प्रारंभ करते हैं देवी स्तुति से लाली दी प्रपन्थ हरि प्रस प्रस जगतस प्रसिपा विश्वम देवी चरा चरस आधार पूता जगतमेत स्वरूपया अपम अलंग शक्ति अनंतिया विश्व बीजम परमाया समोम देवी समस्तम एकतम प्रसन्ना मुक्ति हेतु विद्या समस्त श्री समस्त सकला जगत तितम स्तुति परा सर्वता देवी मुक्ति मुक्ति प्रदाय संता भवंतु परम सर्वस बुद्ध रूपणा जनस्या संस्थे सर्वा देवी नारायण नमोस्तुते रूपणा हरि नाम प्रदाय विश्वसो शक्ति नारायण नमोस्तुते सर्व मंगल मंगलय शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्य त्र्यंबके गौरी नारायण नमोस्तुते सृष्टि स्थित विनाम शक्ति भूते सनातनी नारायण नमोस्तुते शरणागत सर्व देवी नारायण नमोस्तुते विमान ब्रह्माणी कौशल देवी नारायण नमोस्तुते त्रिशूल चंद्रासी धरे महा भवािनी माहेश्वरी स्वरूप नारायण नमोस्तुते मयूर पुट प्रते महाशक्ति हरे कौमारी रूप संस्थारे नारायण नमोस्तुते शंख चक्र गदारिता परमा प्रद वैष्णवी रूप नारायण नमोस्तुते महा्रे वसुंधरे परा स्वरूप नारायण नमोस्तुते रूप अंतुमे त्र्य प्राण सहितते नारायण नमोस्तुते जी महा्रे सहस नरे प्राण हरे चंद्री नारायण नमोस्तुते श्री स्वरूप हत्य महाबली रूप मह नारायण नमोस्तुतेल बदने माला भूषण मुंडे मुंड मने नारायण नमोस्तुते लक्ष्मी लहा सत्य पुष्टिवे महामाए नारायण नमोस्तुते सरस्वती भरे भूति पामसी नियते नारायण नमोस्तुते सर्व शक्ति समते देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते प्रसम देवी विश्वहार प्रक्तिना लोकम वरदा प्रधानम प्रदमम देवी विश्वहारना वाह खूब भो वेरी गुड लाली दी
दुर्गा पूजा का पवित्र माहौल
बेलूर मठ में आपको शायद पता ही होगा कि जो भी भजन गीत चलते हैं वो मेन टेंपल के भीतर में चलते हैं। बाहर में माइक लगा के आप हम लोग कुछ भी ब्रॉडकास्ट नहीं करते। अर्थात कि यदि आप मंदिर के बाहर में खड़े रहेंगे तो रेयरली आपको सुनाई देगा कि भीतर में यह भजन वगैरह चल रहा है। किंतु यह दुर्गा पूजा के जो चंद दिन है कि वहां पर वो नहबत लगाया जाता है। माने वो मंडप बना करके टावर जैसा एक मंडप बना करके उसमें माइक रखी जाती है और सुबह को शहनाई का सुमधुर सुर उसमें से प्रसारित होता है और जब दुर्गा मंडप में अर्ली मॉर्निंग को जब इस तरह से देवी स्तुति का पाठ होता है तो वह भी वह माइक पे होता है और वह माइक का जो आवाज है आप जो गंगा के किनारे पर कहां पे भी होंगे ना आपको बड़ा ही सुस्पष्ट स्वर से सुनाई देगा। तो मैं जब बेलूर मठ में था और उस समय दुर्गा पूजा का समय था। वह एक सुबह से ही लेकर के यह मंत्रोचार है, देवी स्तुति है, यह संस्कृत चटिंग है। एकदम अर्ली मॉर्निंग से ऐसा सुंदर रूप से प्रारंभ हो जाता था कि आप कैंपस में कहां पर भी रहे ना आपको पता चलता था कि हां मां का आगमन हो चुका है अपने इस पवित्र धरातल पर। बेलूर मठ की भूमि तो पवित्र ही है। वो महापुरुष महाराज ने इतना सुंदर रूप से कहा है। कि सती के देह का एक-एक अंग जहां पर गिरा 51 51 शक्तिपीठ वहां पर हो गए। अभी आप सोच के देखिए कि मां का मां शारदा देवी का समग्र देह यहां पे बेलूर मठ की भूमि पे उसको अग्निदाह दिया गया है। तो यह कितना बड़ा शक्तिपीठ है। तो यह शक्तिपीठ ऑलरेडी है बेलूर मठ। उसमें शक्ति का आगमन होता है। तो जब सुबह को आप इस तरह से मंत्रोार सुनते हैं और मेरा ड्यूटी था वो दुर्गा पूजा के समय में यह फूल कलेक्ट करने का। तो अर्ली मॉर्निंग यह फूलों का चयन करके मैं मेन टेंपल में जाकर दे देता था। फिर गंगा के किनारे बैठा रहता था। तो उस समय यह मंत्रोार की सुमधुर ध्वनि यहां पर गंगा का कुल कुल करके नाद जो है और मां का आगमन हुआ है इस शक्तिपीठ में माने बेलूर मठ दुर्गा पूजा के दौरान स्वर्ग बन जाता है तो यहां पे भी अपने यहां पे अपने क्लास में भी यह मंत्रोार करके हम मां का यह जो कुछ विषय है उसका पाठ करते हैं। देखिए अ
हे शंकरि, तूने प्रेमवश इस भिखारी भोलेनाथ को गृहस्थ जीवन में बाँध लिया
ठाकुर और मां इन दोनों का जो दिव्य संबंध था उसके बारे में चिंतन करना एक उसके लिए ना एक बड़ा ही पवित्र मनोभाव चाहिए क्योंकि हमको तो पता है कि देह संबंध विरहित इनका संबंध था। अर्थात कि दैहिक किसी भी तरह का उसमें संबंध नहीं था। एकदम आत्म संस्थ ठाकुर आत्मसस्थ मां आत्मज्ञान के राज्य पर उनका यह शिव और शक्ति का वो उनकी लीला थी। तो अब जब यह लीला का प्रारंभ कहां से होता है? जैसे हमने अभी कुछ दिनों पहले ही डिस्कस किया था। बहुत बार हम लोग सोचते हैं कि ठाकुर ने कहा कि वह पात्री जयराम बाटी में कुटो बांधा है। अर्थात कि ठाकुर के लिए पात्री को विवाह के लिए उपयुक्त कन्या को जयराम भाटी गांव में संरक्षित करके रखा गया है। किंतु हमने देखा गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं और यह रामकृष्ण पंथी में यह उसमें से उन्होंने यह बात ली है कि मां शारदा देवी जब बिल्कुल बच्ची थी तब सिहोड़ ग्राम में गई थी। वहां पर श्री रामकृष्ण देव भी थे। कोई यह यात्रा या पौराणिक नाटक का अभिनय हो रहा था। अपनी एक स्त्री भक्त अपनी एक स्त्री रिलेटिव के संबंधी के गोद में मां बैठी हुई थी और यह उनकी जो रिलेटिव है पूछती है कि अच्छा इतने सारे लड़के हैं तुम्हारे सामने उसमें से किसके साथ में तुम विवाह करोगी तो मां शारदा ने बालिका तो है बेचारी छोटी सी तो फिर भी अपने दोनों छोटे-छोटे हाथ उठाकर के श्री रामकृष्ण देव की ओर इशारा करके कह दिया कि मैं इनके साथ में विवाह करूंगी। अर्थात कि पहले तो हम लोग यह समझते थे कि ठाकुर ने कहा है कि पात्री मेरे लिए सुरक्षित रखी हुई है। किंतु अभी हमको यह पता है कि पात्र जो है वो सुयुक्त जो माने जो उपयुक्त पात्र जो है मां शारदा देवी के लिए उनको मां काली ने सुरक्षित रखा हुआ है। यही बात हमको उस घटना के समय में भी पता चलती है कि जब मां पहली बार दक्षिणेश्वर जा रही है। गांव के कुछ गांववासी हैं। वह वहां पर तीर्थ यात्रा के लिए गंगा में स्नान करने के लिए कोलकाता जा रहे हैं। मां शारदा भी साथ में है। पिताजी भी साथ में है। पहली बार दक्षिणेश्वर की यात्रा कर रही है। किंतु रास्ते में आ गया बुखार और बुखार में ही प्राय बेहोश होकर के ही मां पड़ी हुई थी। उस समय एक श्यामल रंग की एक स्त्री श्यामल वर्ण की एक स्त्री ने आकर के अपने जो शीतल हाथ है श्री मां शारदा देवी के अंग पर रखे और मां का श्री अंग भी इससे शीतल हो गया। फिर मां पूछती है कि तुम कौन हो? तो यह श्यामल स्त्री वह कहती है कि मैं दक्षिणेश्वर से आई हूं। तो मां कहती है कि अरे मैं भी तो वहां पर जा रही हूं। मैंने सोचा था कि अपनी नजरों से उनका दर्शन करूंगी। अपने हाथों से उनकी सेवा करूंगी। किंतु कहां यहां तो मैं बुखार में पड़ी हुई हूं। तो फिर यह श्यामल वर्णा स्त्री अर्थात कि मां काली स्वयं वो क्या उत्तर देती है कि तुम वहां पर जाओगी? अवश्य जाओगी और तुम्हारे लिए ही मैंने उनको वहां पर अटका करके रखा है। वहां पर रोक करके रखा है मैंने। तो देखिए कि वह ठाकुर क्या कहां मां का चयन करेंगे ना कि मां ठाकुर का चयन करती है। यह स्वयंवर की तरह हो गया कि मां सीता सीता के लिए मां सीता के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ है और मां ने स्वयं भगवान राम को अपने पति के रूप में सिलेलेक्ट किया है। तो यहां पे भी देखिए कि यह जिस तरह से अह मां ने स्वयंवर मां स्वयं वरा हुई थी। मां ने ही स्वयं श्री रामकृष्ण देव का सिलेक्शन किया था। अपने पति के रूप में उनको वरण किया था। तो यह जो भाव है एक बड़ा ही सुंदर रूप में एक गीत में प्रस्फुटित होता है कि दिए प्रेम डूरी केनो रे शंकोरी बांधिली भिखारी भोला रे गोरे अर्थात कि यह प्रेम की डोर बांध करके हे शंकरी तुमने इस भिखारी भोला को अपने घर में बांध करके रखा है। मुदी त्रिनयन समाधि मगन ब्रह्मानंदे बेश छिनु गिरी शरे मैं अपने तीनों नयन बंद करके ब्रह्मानंद में समाधि गिरी शिखर पे समाधि में मग्न था। देखिए कितना सुंदर यह पोएटिक एक्सप्रेशन है। मुदित्री नयन तीनों नयनों को बंद करके समाधि मगन समाधि में मग्न होकर के ब्रह्मानंदे ब्रह्मंद में बेश छिनु गिरी शिरे बड़े ही आनंद में था गिरी शिखर पे। तो यह जो गान है पहले तो गान हम सुनते हैं और उसके बाद में इसके ऊपर में थोड़ा सा चर्चा करते हैं। तो लाली दी प्रिय प्रेम कहो रे शरी माखारी प्रेम डुरी गो रे शरी बाारी भोला रे ह्री नयन समाधि पाय समाधि हे मग ब्रह्मानंद जी गिरी श्री मु ब्रह गिरी रे प्रेम डुरी करो रे शो बाला रे जानी रे चंचल चो जान चाको ओ लाो प्राइया जुगो जुगो जाए हमरो जुगो जुगो जाए जुगता को नारी फोर हरिया जुगो जुग जाए जो नारी धो डुरी गो रे शं बाला रे हवा हराई शश मो चमो की जाए दुख जो आज भूली नहीं दुख जो आज भूली नहीं दाई बाजी व्या मोरो मो जावे ना मना के बिना जा नहीं मार साहू इच्छा तेरा जा नहीं आना यही आदत पागल फूल ना सर्वगी सु तो यही आलो ना सर्वो सु तो रे प्रेमो रे शं बाय शो नो शो ब्रह्मंद जिनु गिरी रे डुरी कैनो रे श्याम गोरी बाखारी हो वाह खूब भो वेरी गुड देखिए इस गान का जो अर्थ है कितना सुंदर है। सबसे पहली बात तो कि ये बैकग्राउंड क्या है कि भगवान शिव है वैसे तो भोलेनाथ और उनके जीवन में है क्या तो बस आंख बंद करके अपने जो त्रिनयन है त्रिनो नयनों को बंद करके गिरि शिखर पे कैलाश पर्वत पे समाधि में मग्न होकर के बैठे हैं। किंतु मां पार्वती का जो तप है, मां पार्वती की इनके प्रति जो प्रेम और श्रद्धा है, वह इतना धीरे-धीरे करके उनके मन पर आकर्षण करने लगा कि इस समाधि में भी वो उनका जो मां पार्वती का स्मरण उनको होने लगा और वह समाधि में से नीचे आकर के मां का दर्शन करने के लिए मां के साथ में वार्तालाप करने के लिए स्वयं पधारे। एक ब्राह्मण का स्वरूप धारण करके और पहले तो शिव जी अपनी ही निंदा करने लगे ब्राह्मण के रूप में कि अरे कहां वह जटाजट धारी शिव के पल्ले में पड़ोगी तुम्हारा जो जीवन है पता नहीं इसके साथ में क्या होगा तो ऐसा कुछ बोलने तो लगे उल्टा पुल्टा कि जैसे कि मां पार्वती अपना तप भंग करके और किसी जगह पर और किसी पात्र का चयन करें किंतु फिर मां का जो उनके प्रति प्रेम था अनंत प्रेम था इतना इतना मतलब इस तरह का प्रेम था कि इवन भगवान शिव स्वयं उनको डिटर करने के लिए आए अर्थात कि यह कहने के लिए आए कि मेरे साथ में विवाह करके तुम यदि पछताओगी तो नहीं तो ऐसा किंतु मां पार्वती का जो प्रेम इतना अड़क था अटल था कि आखिर में भगवान शिव को उनके सामने झुक के उनके साथ में विवाह करना पड़ा। तो यह भजन जो है यह भगवान शिव स्वयं इसका गान करते हैं और क्या कहते हैं दिए प्रेमो डूरी केनो रे शंकरी अपने प्रेम पाश से हे शंकरी इस भिखारी भोला को बांधने के लिए क्यों आई हो मैं तो अपने त्रि नयन बंध करके समाधि में मग्न होकर के ब्रह्मंद में गिरी शिखर पर बहुत ही तो आनंद में था मुदि त्रिनयन समाधि मगन ब्रह्मदे बेश छिनो गिरीश रे जानी रे चंचोले चोपलार प्राय भालो बेशे ऐसे कांदात ते आमाए हमको सबको पता है कि तेरा चंचल और अस्थिर स्वभाव है इसके बावजूद तुम मुझे प्रेम में बांधने के लिए आई हो अमर होइया जुगो जुगो जाए जोगे तपो ध्याने नारी धरी बारे मैं तो अमर होकर युगों युगों तक तप में लीन था। फिर भी तुम स्त्री रूप धारण करके मुझे पति बनाने के लिए आई हो। देखिए भगवान शिव और मां पार्वती या तो शिव और शक्ति ठाकुर कहते हैं ना कि यदि स्थिर है तो मैं ब्रह्मा कहता हूं। यदि कार्य करता है तो मैं शक्ति कहता हूं। यथागनेर दाहिका शक्ति ही राम कृष्ण स्थिता अग्नि और अग्नि की दाहिका शक्ति इन दोनों को आप कभी भी सेपरेट नहीं कर पाएंगे तो एक और है आत्म तत्व दूसरी ओर है आत्म तत्व का जो कार्य है जो कार्य करता हुआ सा जो है वो है शक्ति तत्व ठाकुर क्या कहते हैं ये जो सर्प जो है वो एक सर्कल में पड़ा हुआ है तो भी वह सर्प है और तिर्यक गति से गति करता है तो भी सर्प है। किंतु जब स्थिर पड़ा हुआ है कुंडली मार के तब वह ब्राह्मण है और तिर्यक गति से जब चलता है तो शक्ति है। तो शिव और शक्ति इन दोनों के स्वभाव में आप यह कंट्रास्ट देखिए। शिव का स्वभाव है हमेशा से समाधि में मग्न रहने का और मां का स्वभाव है। शक्ति का स्वभाव है। इस ब्राह्मण के प्रति अपना प्रेम तो प्रगटित करना ही किंतु साथ में ही इस संसार में जो कुछ भी कार्य हो रहा है शक्ति की आज्ञा से ही शक्ति के आशीर्वाद से ही हो रहा है। वह फेमस कहानी कि स्वामी जी जब यह खीर भवानी गए मां का भग्न मंदिर देखा तो कहा कि मां मैं जब यहां पर होता यदि उस समय जबकि यह लुटेरे मंदिर तोड़ने के लिए आए थे तो मैं अपना जान की भी बाजी लगाकर के मंदिर की रक्षा करता तो मां ने क्या दर्शन देकर के कहा कि बेटा तुम मेरी रक्षा करोगे कि मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी। यह मंदिर भी बना है मेरी इच्छा से और मंदिर भग्न भी हुआ है मेरी इच्छा से और यदि मंदिर भविष्य में पुनर्निर्माण भी होगा तो वह भी मेरी इच्छा से ही होगा। तो यह है शक्ति का स्वभाव। चंचल और चपला अर्थात कि चंचल और एक तरह से अस्थिर अर्थात कि कार्यक्षम। तो यह शक्ति है और वह जो तीन नयन बंध करके समाधि में मग्न होकर के ब्रह्मंद में जो स्थित होते हैं वह शिव है। इन दोनों का विवाह या तो फिर इन दोनों का मिलन नयन मुदिले भाभी बा हाराई शशंको अमनी चमकी या चाई आगे भगवान शिव क्या कहते हैं जब मैं नयन बंद करके चिंतन थोड़ा सा भी करता हूं तो मैं डर जाता हूं कि फिर से तो मैं कहीं तुमको ना खो दूं फिर से क्यों एक बार तो सती को खोया है एक बार तो अपनी पत्नी को खोया है फिर से हालांकि वही सती पुनः देह धारण करके के पार्वती के रूप में प्रकट हुई है। किंतु फिर भी जो प्रथम बार जो वियोग हुआ था वह जो डर था उसकी जो व्यथा थी अभी भी उनके अंतर में जीवित है। नयन मुदि भाभी बाह नयन बंद करके मैं डर में आ जाता हूं। सशंको अमनी चमकिया चाय सशंकित होकर के चमत्कृत चमत्कृत हो जाता हूं। चमक करके मैं चारों ओर देखता रहता हूं। क्या दुख योग्य कथा आजो भूली नाई ताई बाजे व्यथा मोरोम माज रे दक्ष यज्ञ की बात आज भी मैं भला नहीं हूं और इसीलिए मेरे हृदय में उसी बात का आघात होता रहता है जाबे पितृ गरुहे ना ताहे माना यह दक्ष यज्ञ की बात तो हम सबको पता ही है। मां सती अपने उनके पिताजी दक्ष ने यज्ञ किया था। भगवान शिव ने मना किया मां को कि तुम वहां पर मत जाओ। तुम्हारा सम्मान यह लोग रखेंगे नहीं। किंतु फिर भी मां सती ने सोचा कि क्यों वो तो मेरे ही तो पिताजी है। मैं क्यों उनके घर नहीं जाऊंगी बोलकर के पिताजी के घर तो आई। किंतु देखा कि पिताजी सबके सामने ही अपने पतिदेव का अपमान कर रहे हैं। तो सती लक्ष्मी किस तरह से इस अपमान को सहन कर पाए। उन्होंने अग्नि में अपने देह की आहुति दे दी। जब यह समाचार भगवान शिव को मिला तो इतने क्रोधित हो गए। अपनी जटा पटक करके जटा में से अपनी जटा में से एक वो निकाल करके लट बालों की जमीन पर पटका और उसमें से प्रकट हुए वीरभद्र और भद्रकाली और उन्होंने जाकर के दक्ष यज्ञ में जो तांडव मचाया है। देखिए मैं जब छोटा था तो यह सब कहानियां चित्र कहानियां में पढ़ा करता था। अभी यह अमर चित्रकथा ही थी कि नहीं वह मुझे अभी याद नहीं है। अमर चित्रकथा का आज काफी नाम हो गया है कि किस तरह से उन्होंने हिंदू पुराणों को चित्रों के माध्यम से बालकों में फैलाने का बड़ा ही अच्छा काम किया है। वरना तो अपना यह सेकुलर जो सिलेबस है, हम तो यह सब कहानियां भूल ही जाते। तो मैंने बचपन में चित्रकथाएं गुजराती में बहुत पढ़ी थी। मुझे पता नहीं। अभी आज मुझे याद नहीं कि वह अमर चित्रकथाएं थी कि और कौन सी थी किंतु उस चित्रकथाओं में बड़ी सी किताब रहती थी और बड़े ही सुंदर कलर में ड्राइंग रहते थे। वो इतने सुंदर ड्राइंग कि वो हमेशा के लिए यदि कहानी भी आप भूल जाएंगे तो ड्राइंग है वो हमेशा आपके हृदय में बैठे रहेंगे। तो मुझे याद है आज भी मुझे याद है वो ड्राइंग वो पिक्चर जिसने आर्टिस्ट ने दोरा था सही में वो आर्टिस्ट अमर हो जाना चाहिए। भगवान शिव ने अपनी जटा में से एक लट निकाल के पत्थर पर पटकी और उसमें से यह वीरभद्र और भद्रकाली प्रकट होते हैं। तो यह चित्र इतना सुंदर रूप से उसने अंकित किया है और फिर यह दोनों जाकर के दक्ष यज्ञ में जो तूफान मचाते हैं सबको मार देते हैं और मां सती के देहांत का बदला तो लेते हैं किंतु भगवान शिव के हृदय में जो व्यथा जो है हृदय के अंतर में वो तो हमेशा के लिए बैठ गई है तो जब मां पार्वती अभी उनको प्राप्त करने के लिए फिर से तप करती है तो वही सब घटनाएं भगवान शिव के मन में फिर से प्रकट हो जाती है और वह मां पार्वती फिर अपने पिताजी के घर भी तो जाएगी और फिर वही कहानी आरंभ होगी। ऑलरेडी देखिए कि यह आगमनी गीतों का जो सार है कि जो मेना है मां की मां और उनके पिताजी जो है वो इतने दुखित रहते हैं बेचारे इतने यह कष्ट में रहते हैं कि कहां वो एक पागल के घर पे अपनी जो लाडली बिटियां है उनका विवाह किया है। कल जो हमने गीत देखा था वह क्या देखा उसमें माए जीए करबो झगड़ा जामाई एले माने फिर से उसके घर पे मैं नहीं जाने दूंगी जोदी एे मृत्युंजय अर्थात कि यह मृत्युंजय जो है वो फिर से यदि घर पर आएंगे वो उमा को लेने के लिए जो एे मृत्युंजय उमा नेवार कथा कहे यदि फिर से मृत्युंजय आएंगे माई के मां के घर उमा को अपने वहां पर ले जाने की बात करेंगे तो क्या होगा माए जिए करबो झगड़ा जामाई बोले मानबो ना मां और पत्नी पुत्री कन्या ये दोनों मिलकर के जमाई के साथ में झगड़ा करेंगे और उनको अपनी लाडली उमा को उनके घर नहीं जाने देंगे। शशाने मशाने फिरे घरे भावना भावेना। यह किस तरह का जमाई है कि श्मशान में घूमता रहता है और घर की चिंता नहीं करता है। तो क्या है कि ऑलरेडी यह चल रहा था कि यह मां के उमा के घर में उनके पिताजी के घर में अभी यदि उमा फिर से घर जाएगी। मां पार्वती फिर से घर जाएगी और उनके मां और पिताजी फिर से ऐसा कोई नाटक खड़ा करेंगे तो फिर यदि पार्वती का देह चला गया या तो फिर पार्वती उमा भगवान शिव से रुष्ट हो गई तो फिर भगवान शिव किस तरह से उस व्यथा को भूल पाएंगे। इसलिए कहते हैं पहले तो याद दिला देते हैं कि मैं दक्ष यज्ञ की बात आज भी नहीं भुला हूं कि जबकि मेरी शक्ति अपने पिताजी के घर गई थी और घर से कभी वापस नहीं लौटी जाबे पितृ गहे नाहि ताहे माना यदि तुम अपने पिताजी के घर जाओगी उससे तो तुमको रोक नहीं सकूंगा मैं तुमको मना नहीं करूंगा कार श्राद्ध रोधे तब इच्छा बिना तुम्हारा पथ रोधन करने का साध्य किस में है? साहस किस में है? तुम्हारी इच्छा के बिना यदि तुमको रोक पाए इस तरह का साहस किस में है? ए भिख देखो पागले भूलोना सर्व त्यागी होरो शुधु तोरी हरे पर देखो इस भिखारी को छल मत देना। यह पागल सर्वत्यागी हर तो केवल तेरे लिए ही सब कुछ त्याग चुका है। यह एक पहले तो वह समाधि में मग्न होकर के बैठे थे। फिर मां ने जब तपस्या की तो समाधि में से व्युत्थित होकर के धरातल पर अवतरित होकर के उनके साथ में विवाह किया है। किंतु फिर यदि वह उनको तज करके चली जाएगी। उनको छल देकर के चली जाएगी तो फिर किस तरह से वह रह पाएंगे इस भिखारी को तुम इस भिखारी के साथ में इस तरह का छल मत करना। देखिए कि कैसा कंट्रास्टिंग व्यू पॉइंट है। एक और है कि उमा की मां की व्यथा कि कहां वो एक पागल जमाई के संग में पड़ी है। यहां पे है वही है शिव जी की व्यथा कि यदि उमा अपने घर चली जाएगी तो फिर वापस भी आएगी कि नहीं। तो यह एक कंट्रास्टिंग व्यू पॉइंट यह एग्जैक्टली आप देखिए कि मां और ठाकुर के जीवन में किस तरह से देखने को मिलता है। सर्वप्रथम तो ठाकुर जब समाधि में मग्न रहते थे दक्षिणेश्वर में साधन भजन करते रहते थे। उस समय तो उन्होंने मां की कोई चिंता करने की मां की संभाल रखने के बारे में ज्यादा कुछ सोचा ही नहीं। हालांकि 1858 1859 के आसपास में ठाकुर का विवाह हो चुका था। जब वह दक्षिणेश्वर वापस आए और फिर अप टू 1868 तक वो तपस्या जब करते रहे तो इस तरह से तपस्या अग्नि में डूब गए थे। एक के बाद एक शक्ति साधना, मधुर भाव साधना, अद्वैत वेदांत की साधना, इवन इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की साधना उसमें इस तरह से डूबे हुए थे कि मां वहां पर जयराम बाटी में है। यह बात ही जैसे कि उनके मन से विस्मृत हो गई थी। मां और जयराम भाटी कहां पूरा जगत विस्मृत हो गया था। ब्रह्मदे बेश छिनु गिरी शिरे मुदी त्रिनयन अपने तीन नयन या तो फिर कहेंगे द्विनयन अपने दोनों नयनों को बंद करके मुंद करके वो समाधि में स्थिर होकर के बड़े ही आनंद में बैठे तो थे किंतु फिर जब मां ने यह निर्णय किया कि मैं दक्षिणेश्वर आऊंगी तो फिर उन्होंने जिस क्षण मां का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ उसी क्षण जैसे कि भगवान भगवान श्री रामकृष्ण ने बड़े ही आदर पूर्वक मां का वरण किया। अपने हृदय में भी स्थान दिया। अपने कमरे में भी स्थान दिया। जब मां वहां पर नहबत में जा रही थी तो ठाकुर ने कहा कि मेरे ही कमरे में शयन करो। वहां पर जाओगी। वैसे तो मां बीमार होकर के आई थी। रास्ते में तो बुखार हुआ था। तो अभी वह नौबत में जाओगी तो किस तरह से ट्रीटमेंट ठीक से होगा? मेरे ही कमरे में रहो। ठीक से ट्रीटमेंट मिलेगी तुमको। तो इस तरह से ठाकुर ने अपने हृदय में और अपने कमरे में दोनों जगह मां को स्थान दिया था और मां भी कुछ ही समय में स्वस्थ होकर के ठाकुर की सेवा करने का प्रारंभ किया था। उस समय की एक बात है कि जब ठाकुर मां को पूछते हैं कि तुम यहां पर क्यों आई हो? क्या तुम मुझे संसार में फिर से खींचने के लिए आई हो? तो मां ने एकदम स्पष्ट स्वर में उत्तर दिया था कि मैं तुमको संसार में क्यों खींचने को आऊंगी? मैं तो आपके साधन पथ पे सहाय करने के लिए ही आई हूं। तो यह शिव और शक्ति का पवित्र प्रेम धीरे-धीरे करके मां ने अपने प्रेम डोरी से प्रेम पाश से यह समाधि मग्न शिव स्वरूप श्री रामकृष्ण को बांधना शुरू किया था। अभी देखिए कि एग्जजेक्टली वही बात कि ये मुदि त्रिनयन समाधि मगन ब्रह्मदे बेश छिनु गिरीश रे अपने नयनों को बंद करके समाधि में मग्न होकर के ब्रह्मानंद में मैं आनंद से रहता था। एग्जजेक्टली यही चीज ठाकुर का मां जब ठाकुर के कमरे में शयन कर रही है तो ठाकुर को तो रात को नींद आती नहीं है। पूरी रात वो समाधि भाव मां काली के साथ में जगदंबा के साथ में वार्तालाप कर रहे हैं। यही सतत चल रहा है। यहां पर मां के लिए तो यह भाव समाधि वो जगदंबा के साथ में वार्तालाप यह सब तो एकदम अद्भुत ही दिखता है। वो शायद गांव में जब यह सब बातें सुनी थी कि उसका पति पागल हो गया है तो यह सब देखकर के लगता है क्या सही में पागल हो गया है क्या? तो फिर मां डर के मारे रात को सो नहीं पाती थी। उस समय फिर ठाकुर को लगा कि नहीं मां को इसके बारे में कुछ बताना होगा कि समाधि क्या है वगैरह-वगैरह। तो फिर ठाकुर ने मां को कहा कि देखो इस तरह की समाधि होती है या इस तरह का भाव होता है तो इस मंत्र का पाठ करना है जिससे कि मैं समाधि में से वापस आऊं। मैं जब यह सब विवरण पहली बार पढ़ रहा था तो मुझे आश्चर्य होता था कि कोई समाधि में जाता है उसको वापस लाने का प्रयास क्यों करते हो भाई? हम लोग तो जन्म जन्मांतर तक यह प्रयास करते हैं कि थोड़ा बहुत आध्यात्मिक उन्नति हो जाए। थोड़ी बहुत समाधि वगैरह कुछ मिल जाए। तो हमारे लिए यह है कि कैसे हम समाधि प्राप्त करें और उन लोगों के लिए रिवर्स है कि समाधि हो गई तो कैसे वापस आए क्या जरूरत है वापस आने की इस संसार में किंतु क्या है देखिए भक्तों के कल्याण के लिए देह धारण मां क्या कहती है कि रसगुल्ला कहते कि ऐसा है कि ठाकुर ये ठाकुर जो है क्या रसगुल्ला खाने के लिए आए हैं बिल्कुल नहीं भक्तों के कल्याण के लिए आए हैं तो फिर समाधि से व्युत्थित होकर के इस जगत में उनको वापस लाने की आवश्यकता थी। मां ही एक थी कि जो ठाकुर के स्वास्थ्य की संभाल रख सकती थी। ठाकुर जब खाने के लिए बैठेंगे तो बार-बार समाधि में भाव में चले जाएंगे। उस समय मां दुनिया भर की बातें करके ठाकुर के मन को इस धरातल पर रखती थी जिससे कि वो थोड़ा बहुत आहार करें। उनका देह सुस्थ रहे। ठाकुर जब बीमार हो जाते हैं। उनके सब फोबिया भी 10 तरह के थे कि दूध नहीं खाना है वगैरह-वगैरह। तो फिर मां क्या करती थी? झूठ बोल के दूध को उबालउ उबाल करके गाढ़ा करके ठाकुर को खिलाती थी। ठाकुर जब पूछते थे सशंकी तो चमकिया चाहिए। ये [हंसी] सशंकित होकर के ठाकुर जब चमक करके देखते थे कि दूध तो ज्यादा दिख रहा है। तो मां झूठ बोलती थी। क्या कहती थी? अरे कहां दूध इतना ज्यादा है। इतना सा ही तो है। तो जो गाढ़ा दूध किया हुआ था वही गाढ़ा दूध का ही मेजरमेंट मां ठाकुर को देती थी। फिर ठाकुर पूछते बीच-बीच में ठाकुर को लगता कि मां चालाकी कर रही है तो फिर गोपाल गोला मां को पूछते कि अरे यह कितना दूध है बताओ तो तो गुलाब मां तो इतनी बुद्धि नहीं थी तो वो सब बोल देती थी ठीक-ठाक कि ये जो कालीवाड़ी के जो काली मंदिर का जो किचन है वहां की जो कटोरी है उसी साइज की कटोरी यहां पे है। तो ठाकुर बोलते हैं अच्छा इतनी बड़ी कटोरी भर के मुझे दूध पिला रही है। फिर बोल बोलते हैं कि बुलाओ मां को बुलाओ। फिर मां आती है तो पूछते हैं कि कितनी कटोरी थी कि कितना यह मेजरमेंट था तो मां कहती है कि दूध पीना है तो दूध पियो इतना सब मेजरमेंट करने की क्या जरूरत है तो फिर एक बार तो किंतु ठाकुर को यह हो गया लूज मोशन हो गया जब यह पता चला कि सही में मां उनको गाढ़ा दूध पिलाती है तो फिर मां आकर के पूछती है कि किस तरह का लूज मोशन होता है तो ठाकुर कहते हैं सफेद सफेद और पतलापतला और फिर ठाकुर नारा नाराज होकर के कहते हैं तुम्हारी इस तरह की सेवा मुझे नहीं चाहिए। तो मां किंतु सब निर्विकार चित्त से सब सुन लेती है। गुलाब मां मां को पूछती है कि मां आपको यदि ठाकुर को ज्यादा दूध इस तरह से मिथ्या बात करके पिलाना है तो मुझे तो बता देना चाहिए कि आप इस तरह से करती हैं। तो मां कहती है कि देखो जब किसी के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए हम मिथ्या वचन भी कहते हैं तो उसमें बुराई कुछ नहीं है। तो यह ठाकुर और मां कहां ठाकुर सत्य में प्रतिष्ठित, आदर्श में प्रतिष्ठित। वहां ठाकुर ने सब कुछ मां काली को दे दिया। सत्य नहीं दे पाए। किंतु यहां पर वही मां काली उन्होंने ठाकुर के पास में सत्य नहीं ग्रहण किया तो खींच करके जैसे कि ग्रहण कर लिया है। वह कहेगी कि यदि आपके स्वास्थ्य के लिए मुझे झूठ बोलना होगा तो मुझे उसमें भी एतराज नहीं है। तो देखिए कि शक्ति का कार्य ही है कि ब्राह्मण जो है उसके पास में से यह एनर्जी डिराइव करके आध्यात्मिक शक्ति जो है उसको डिराइव करके यह भक्तगण में बांटे। यह अपने जो त्यागी संतान है, गृहस्थ संतान है, उन सबके भीतर में वही ठाकुर की समाधि का आनंद जो है उसका एक कण भी यदि उनके भीतर में जाए तो भी उससे मां संतुष्ट होगी। देखिए कि भगवान शिव कहते हैं कि तुम यदि अपने मायके चली जाओगी तो फिर वापस भी आओगी कि नहीं इस बात का मुझे टेंशन है। तो यहां पर ठाकुर के जीवन में भी एग्जैक्टली वैसे ही पहले तो मां ने दक्षिणेश्वर आकर के ठाकुर को अपनी प्रेम डोरी से बांध दिया। जब कुछ समय बीता ठाकुर ने मां की शोडशी पूजा की और शोडशी पूजा करके जैसे कि अपनी समग्र आध्यात्मिक उपलब्धि श्री मां को अर्पण कर दी। इतना सुंदर वह सब जो वर्णन है जिसमें कि गंभीरानंद जी कहते हैं कि यह उच्च आध्यात्मिक भूमि पे जब शोडशी पूजा का अंत नजदीक आने लगा। ठाकुर और मां दोनों जब समाधि में मग्न है उस समय आत्मसस्थ पूजक और पूजिता आत्म स्वरूपे पूर्ण भावे एकीभूत होई लेन आत्मसस्थ पूजक और पूजिता जो पूजक थे श्री रामकृष्ण और पूजिता जो थी श्री श्री मां शारदा देवी दोनों आत्मसस्थ थे अर्थात कि आत्मज्ञान में डूब गए थे उन्होंने आत्म स्वरूप रूप में पूर्ण भाव से एकीभूत हुए थे। आत्म स्वरूप में उनका जो सही स्वरूप है उस स्वरूप में इन दोनों का एकीभूत अर्थात कि मिलन हुआ था आध्यात्मिक उच्च भूमि पे मूर्तिमती विद्या रूपणी मानवीर देह आलंबने ईश्वरीय उपासना पूर्वक ठाकुर साधनार परिसमाप्ति होइलो मूर्तिमती विद्या रूपणी मानवी का देह आलंबन करके जो ईश्वरी शक्ति स्वयं जो अवतरित हुई है उनकी उपासना करके ठाकुर की साधना की परिसमाप्ति हुई। श्री माता ठाकुरानी रो देवी मानवत्व पूर्ण विकाश द्वार आर्गल मुक्त होई श्री श्री माता ठाकुरानी का भी देवी मानवत्व का पूर्ण द्वार पूर्ण विकास का द्वार उन्मुक्त हुआ। देखिए कि देत्व का ही नहीं मानवी का भी नहीं देवी मानवीत्व का अर्थात कि मानव के देह में देवी का आगमन हुआ है। जैसे एक जगह पे है कि गंभीरानंद जी ही मोस्ट प्रोबेबबली कहते हैं कि देवता की हां गंभीरानंद जी ही कहते हैं कि मनुष्य की जो सेवा करनी है उसका एक फॉर्मेट ठीक है कि इस तरह से मनुष्य की सेवा की जाए। देवता की यदि सेवा करनी है तो उसका भी विधि विधान अपने शास्त्रों में दिया गया है कि इस तरह से देवता की पूजा की जाए। किंतु देवता यदि मनुष्य के देह में अवतरित होते हैं तो यह देव मानव की पूजा उनकी सेवा किस तरह से की जाए वह मनुष्य यह करने के लिए सक्षम नहीं है। इसलिए यह देवी जो है उनको स्वयं शक्ति को स्वयं देह धारण करके पृथ्वी पे अवतरित होना पड़ता है। तो यह देवित्व और मानवत्व इन दोनों के संगम स्थल पर ठाकुर और मां विराजित थे। देवित्व के रूप में वह अपने भक्तों के ऊपर में कृपा करते थे और मानवी के रूप में इतनी सुंदर मधुर लीलाएं करते थे कि उस लीलाओं का गान उस लीलाओं का श्रवण उस लीलाओं का पाठ करके मनुष्य का हृदय जैसे कि परितृप्त हो जाए मनुष्य का हृदय जैसे कि निर्मल स्वच्छ हो जाए तो देवी मानवत्व इसका जो द्वार है मां के जीवन में विकास का वह उन्मुक्त हो गया। तो एक तो है कि मां का आगमन हुआ। ठाकुर को अपने प्रेम पाश में से बांध भी दिया। किंतु फिर एक दिन ऐसा आया कि जब मां जयराम भाटी से दक्षिणेश्वर आई थी। उस समय यह हृदय का जो अहंकार है वह इस तरह से सर के ऊपर में उठा कि उसने मां का अपमान किया और फिर उस समय चंद्रामणि देवी भी साथ में थी तो उन्होंने ठीक किया कि अपनी लड़की को कहां यहां पर रख के जाए तो बोलकर के अपने जो घर है जयराम बाटी वापस ले गए। उस समय ठाकुर ने हृदय को चेतावनी देकर के कहा था कि हृदय तुम इसको अर्थात कि ठाकुर अपनी ओर इशारा करके कहते हैं तुच्छ ताक्षिल्य करते हो अर्थात कि मेरी मेरा तुम तुच्छता पूर्वक अपमान तो करते हो तो भले करो किंतु जब तुम मां के साथ में इस तरह का व्यवहार करने को जाओगे तो याद रखना कि तीनों लोक में ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएंगे। ेंगे तो वह चेतावनी ठाकुर ने हृदय को दी और सही में जो जिस दिन हृदय ने मां का अपमान किया उसके पाप का घड़ा भर गया। देखिए सोच लीजिए कि हृदय ने यह ईश्वर अवतार ठाकुर की सेवा की थी। ठाकुर ने स्वयं यह बात स्वीकार की है कि हृदय यदि न रहता तो इस देह का धारण होना मुश्किल था। तो ठाकुर की इतनी सेवा करके जो प्रचंड पुण्य हृदय ने अर्जन किया था मां का सिर्फ एक बार अपमान करके पूरा पूरा पुण्य खत्म हो गया हवा में उड़ गया। देखिए कि ठाकुर की सेवा करके ये लाटू महाराज है। शशि महाराज है, राजा महाराज है। उन्होंने किस लेवल की आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त की थी। तो हृदय तो इससे भी कहीं गुना आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त कर सकता था। क्योंकि जिस समय साधना के समय ठाकुर को सहाय की सबसे ज्यादा जरूरत थी। ठाकुर का यदि उस समय देह धारण न होता तो मानवीय लीला का वो पर्व जो है वहीं पर समाप्त हो जाता। तो कितना आध्यात्मिक यह जो यह है बैंक अकाउंट कितना बड़ा यह हृदय ने बनाया था। किंतु मां का कहां एक बार अपमान किया और ईश्वर अवतार की आराधना उनकी सेवा करने का जो इतना बड़ा पुण्य है एक क्षण में जैसे कि रुई के बहुत बड़े ढग में आप आग लगाते हैं तो एक ही क्षण में पूरा ढग जैसे कि जल के राख हो जाता है। तो वैसे ही मां के अपमान रूपी तिनखा जो एक स्पार्क इस पूरे ढग के ऊपर में पड़ा पुण्य के एक ही क्षण में सब स्वाहा हो गया। कुछ ही समय के बाद में वो त्रैलोक्य बाबू की पुत्री की कुमारी पूजा के जो पागलपन उसने किया उसको दक्षिणेश्वर से भगा दिया गया। किंतु अभी देखिए अभी मां दक्षिणेश्वर क्यों आएगी? तो फिर क्योंकि मां का तो अपमान किया है। ठाकुर उस समय चुपचाप थे। कुछ बोले नहीं थे। बोलकर के मां तो जय राम भाटी में है। यहां पर ठाकुर की सेवा की असुविधा होने लगी। वह रामलाल है। वह काली मंदिर का पुजारी बना है। तो फिर अभी उसको सोच उसको लगता है कि अभी तो मैं मां काली का पुजारी हुआ हूं। और अभी क्या जरूरत है ठाकुर की सेवा करने की? तो ठाकुर की सेवा में असुविधा होती है। तो मां को बार-बार पत्र लिखते हैं कि तुम आओ दक्षिणेश्वर में कैसे भी करके हो पालखी करके हो ना कि कैसे भी करके हो। ₹10 लगेगा ₹20 लगेगा। मैं तुमको रुपया दूंगा। किंतु तुम यहां पे आओ। तो देखिए कि एक पहली बार तो कैसा हुआ कि मां ने आकर के स्वयं आकर के ठाकुर को अपनी प्रेम डोरी में बांधा। दूसरी बार अभी जैसे कि ठाकुर स्वयं मां को पुकार रहा है कि तुम आओ और मेरी सेवा करो। जब तक वो समाधि में मग्न थे तब तक तो मां की चिंता नहीं करते थे। किंतु मां ने जब समाधि में से खींच करके पृथ्वी पर ले आई। शक्ति के माध्यम से ठाकुर ने अपना यह धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया। तब अभी ठाकुर को भी मां ठाकुर को ही मां की जरूरत पड़ने लगी। पहले कहां वह मां ठाकुर के लिए आराधना करती थी। अभी ठाकुर मां के लिए प्रार्थना करते हैं कि वह आए तो फिर मेरा यह जो सेवा है ठीक-ठीक चले। तो फिर ठाकुर ने जब इतनी विनती की तो फिर मां आई दक्षिणेश्वर में और फिर से ठाकुर की सेवा का भार ग्रहण किया। तो ये दोनों के जीवन का यह डिलीशियस एक कंट्रास्ट भी दिखता है और शिव और शक्ति के साथ में समानांतर भी हमको कितने दिखते हैं। दूसरा कि अनित्यता ये सांसारिक अनित्यता भगवान शिव इस तरह से समाधि में मग्न रहते हैं और फिर सांसारिक अनित्यता तो उनके जीवन में है ही है। किंतु मां जो है शक्ति जो है वो तो संसार को लेकर के ही है। संसार में जो मंगल यह जो फैले अपने भक्तों का कल्याण हो इसीलिए तो मां का आगमन हुआ है। तो यहां पर ठाकुर जो है वो त्याग की ओर खींचते हैं। मां जो है कि सांसारिक कल्याण की ओर खींचती है। ठाकुर मां को बार-बार कहते रहते हैं कि देखो यह संसार अनित्य है। संसार चंद दिनों का है। आज है कल नहीं है क्षणभंगुर है। कहते हैं कि ये पुत्र संतान ये कन्या संतान इन सब का क्या लाभ है? यह तो आएंगे जाएंगे। आप जन्म लेंगे कल मृत्यु हो जाएगा। फिर ठाकुर मां को कहते हैं तुमने तो देखा है अपनी बहनों की अपने भाइयों की मृत्यु भी तुमने देखी है। तो सही में बात है कि मां की एक बहन का भी जन्म हुआ था। उसका मृत्यु हुआ। मां के जो छोटे भाई थे उनका भी मृत्यु हुआ। ऑलरेडी तो संसार में पिताजी का मृत्यु हुआ था। तो मां ने तो यह मृत्यु वगैरह सब देखा ही था संसार में। तो ठाकुर कहते हैं कि तुमने तो यह मृत्यु वगैरह देख लिया है। अनित्यता देख ली है। तुम संतान हो संतान हो वो सब चिंता अपने सर में से निकाल दो। मां का तो एक रहता है ना मातृत्व हृदय कि मुझे संतान होगा कि नहीं। देखिए देह सुख की इच्छा नहीं। किंतु मातृत्व की तो इच्छा ये सात्विक इच्छा मां के हृदय में अवश्य थी। तो ठाकुर पहचान पाते थे कि हां मां के हृदय में है कि उनका उनके संतान हो। तो फिर ठाकुर कहते हैं इस तरह से मां को सांसारिक अनित्यता बच्चे होंगे तो बच्चे मर जाएंगे। फिर क्या कहते हैं ठाकुर बच्चे का अन्नप्राशन का यदि उत्सव होता है अन्नप्राशन अर्थात कि बच्चे को जब अन्न खिलाया जाता है पहली बार तो यह उस तरह का उत्सव होता है तो जिस कमर में गहनेपन पहन करके तुम यह स्त्रियां नाचती है वही बच्चे का जब मृत्यु होता है तो वही कमर पटक पटक करके रोने का समय आएगा। यानी कि जो है अभी शुभ प्रसंग अभी अशुभ प्रसंग में यह परिणत हो जाएगा। तो फिर बच्चे रखने ही क्यों है? बच्चे नहीं है तो तुम थी मां ठाकुरानी और रहोगी मां ठाकुरानी अर्थात कि अपनी आध्यात्मिक सिद्धि में स्थित रहोगी। बच्चे हैं जितनी संसार की माया के रूप में अभी मां बेचारी देखिए बार-बार बच्चे का मृत्यु होगा, संतान का मृत्यु होगा। यह कौन सी मां है कि यह इस तरह की बातें सुन पाए। तो मां ने जितना सहन होता था उतना तो कर लिया। किंतु फिर एक दिन बड़े ही सहज मृदु स्वर में उन्होंने कह दिया शबुलोई की यार मारा जावे। सभी संतान क्या मर जाएंगे? क्या ऐसा भी होता है कभी? मां ने तो देखा है संतान की मृत्यु होती है। मां ने देखा है। किंतु जो संतान बच जाते हैं वह स्वयं ठाकुर स्वयं वे तो बचे हुए हैं। तो क्या सभी संतान मर जाएंगे? ऐसा बड़े ही मृदु स्वर से मां ने प्रतिकार किया। वैसे मां ठाकुर का प्रतिकार कभी नहीं करती। किंतु जब मां का जीवनी का पाठ करेंगे हम सबको पता है कि किस तरह से मातृत्व के इलाके में मातृत्व के राज्य में बात चली जाती है वहां पर ठाकुर का भी प्रवेश निषेध है तो मां ने बड़े ही मृदु स्वर से कह दिया कि क्या सब मर जाएंगे क्या तो जैसे ही मां ने कहा ठाकुर चिल्ला के बोल उठे ओ रे जात शापेर न्याजे पा पड़े छे रे जात शापेर न्याजे पा पड़े छे अर्थात कि एक बड़ा ही जहरीला जो सांप होता है बड़ा ही जो तेज सांप होता है उसकी पूंछ पे पैर पड़ा है रे उसकी पूंछ पर पैर पड़ा है इस तरह के सांप की पूंछ पर पैर पड़ेगा तो फट करके आपको फिर से वो घूम करके दसने के लिए आएगा वो ठाकुर उदाहरण देते हैं ना दो तरह के बैल होते हैं जो किसान है जो बैल खरीदने के लिए जाता है वो मेले में तो एक तरह के बेल होते हैं उनकी पूंछ के नीचे में हाथ देने से वह लेट जाते हैं अर्थात कि इस तरह के बेल किस-किस किसी काम के नहीं और एक तरह के बेल होते हैं पूछ के नीचे में हाथ देने से फड़ांग करके तड़िंग फडििंग करके वो उन्हें वो जंप लगा देते हैं। तो ठाकुर कहना चाहते थे नरेंद्र के बारे में कि नरन है वो जो तेजी ये जो प्रचंड जिसमें उत्साह है यह जो जीवन जिसके पूर्ण है जीवन से परिपूर्ण है। उत्साह से परिपूर्ण है। इस तरह का लड़का यह नरन है। तो यहां पे भी ठाकुर इसी तरह से मां के बारे में कहते हैं कि जात सांप जो कि प्रचंड तेजी जिसमें होती है प्रचंड तेज और प्रताप जिसमें होता है इस तरह के सांप की पूंछ पे आपका पैर पड़ेगा तो फटाक करके गोल घूम करके आपको दसने के लिए आएगा। तो इसलिए ठाकुर कहते हैं कि ओमा आमी बोली साधा सीधे भालू मानुष किछु जाने ना। अरे बाबा मैं तो सोचता था कि एकदम सीधी सिंपल स्त्री है कुछ समझ में नहीं आता है इसको किंतु देखिए पेट बेहतर सब आ पेट में सब भरा हुआ है बोले कि ना सबको लूं कि यार मरे जावे क्या कहती है सुनो कि क्या सब मर जाएंगे तो जब ठाकुर ऐसा बोल उठे मां छूटे पा लिए गले मां वहां से छूट के दौड़ कर के भाग गई तो देखिए कि यहां पे कि भगवान शिव की सांसारिक सांसारिक ये जो पूरा जगत है। उसके प्रति उनका यह उदासीन भाव और मां का संसार के प्रति आशीर्वादमय भाव। यहां पर यह जितनी भी घटनाएं हम देखते हैं बार-बार इस बात का हमको स्मरण होता है। ठाकुर है जैसे कि अलगारी संसार से कुछ लेना देना ही नहीं किंतु मां का जो मन है हमेशा अपने संतानों के कल्याण की ओर लगा हुआ है। इसके बाद का जो गीत है अभी आज समय समाप्त हो गया है। अभी इसको हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु