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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः अच्छा तो कल हम जो देख रहे थे गंभीरानंद जी महाराज कह रहे हैं कि अवतार जब पृथ्वी पर जन्म धारण करते हैं या पृथ्वी पर देह धारण करते हैं तो सिर्फ वो नहीं कि लोक कल्याण के लिए जो कुछ कार्य करेंगे इसके अलावा भी उनका बहुत सारा कार्य रहता है एक सेंटेंस हमने कल देखा था दूसरा कौन सा कार्य है वह हम पढ़ने वाले थे मीनवाइल मैंने सोचा कि यह जो अवतार का जो लोगों को आकर्षित करके उनके मन को मोहित करके उनको धर्म के रास्ते पर लेना जैसे कि चैतन्य महाप्रभु का था कि मागर मा छेर झोल जुबत मेयर कोल अर्थात मागर मछली उसका झोल अर्थात की उसका एक पकवान उसका जूस ना कि उसकी सब्जी तरकारी वो और फिर जुबत मेयर कोल कोई यंग लड़की है तो उसके बारे में तो यह दोनों बोल कर के लोगों को इकट्ठा करेंगे और जैसे ही लोग इकट्ठा हो जाएंगे बोलेंगे बोल हरि बोल मागर मा छर जोल जुबत मेर कोल बोल हरि बोल मने पहले तो लोभ देकर के प्रलोभन देकर के लोगों को इकट्ठा करना है फिर हरि बोल हरि नाम दिलवा देना है तो यह अवतार का एक जनरल स्ट्रेटेजी रहता है कृष्ण अवतार में भी देखिए कि बालकृष्ण की लीला मन को इस तरह से मोहित कर देने वाले थी कि वृंदावन के जितने भी नर नारी बालक बालिकाएं थे सब कृष्ण के साथ में एक अत स्नेह के बंधन में बंधे हुए थे और इसीलिए जब ठाकुर को कैंसर हुआ तो कुछ कुछ लोगों ने ठाकुर के पास आना बंद कर दिया यह सोच कर के ठाकुर अपने को कुछ ठीक नहीं कर पा रहे हैं तो हमारा क्या उद्धार करेंगे बोलक के हमको तो लीला प्रसंग में शरत महाराज कहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ तो ऐसा हुआ लोक बाछा येर जन् ठाकुर लो टू फिल्टर द पीपल लोक यानी कि पीपल और बादशाही अर्थात की फिल्टर लोगों को फिल्टर करने के लिए जो अंतरंग है वो रह जाएंगे और जो बहिरंग है जो यह सोचते थे ठाकुर हमारे लिए कुछ कर देंगे ऐसा सोच कर के आने वालों की संख्या कम हो जाएगी या बंद हो जाएगी और जिनके हृदय में सही सही ठाकुर के प्रति श्रद्धा भक्ति है प्रेम है वे लोग सिर्फ रह जाएंगे तो हमने देखा कि ये ठाकुर का स्ट्रेटेजी अवतार का स्ट्रेटेजी हमेशा रहता है कि लोगों का मन आकर्षित करके उनको बुलाना फिर उनको हरि नाम दिलवा देना ना किसी भी तरह से तो मैं कल सोच रहा था कि ठाकुर का यह तो है एक कि लोगों का मन आकर्षित करना किंतु रामकृष्ण मिशन की कुछ कुछ स्मृति कथाएं पढ़ेंगे तो हमको आश्चर्य होगा कि यह किस तरह का व्यवहार है इन लोगों का लोगों के मन को आकर्षित करने का जहां पर शशि महाराज है स्वामी जी है इन लोगों का बड़ा ही उग्र स्वभाव था और यदि ठाकुर की सेवा में या किसी भी में यदि थोड़ा सा भी त्रुटि रह जाए तो यह लोग रुद्र स्वरूप धारण करके ऐसा डांटते थे कि सामने वाला बेचारा क्या उसका होगा कच्चा पोचा होगा तो उसका तो हार्ट फेल हो जाएगा तो इस तरह से ये लोग बिहेव करते हैं ऐसा क्यों करते हैं ऐसा करने से क्या कोई लोग आकर्षित होकर के आएगा किंतु देखिए कि इन लोगों की यह जो रुद्र स्वभाव कहो या कि इन लोगों की जो डांट कहो इसके पीछे में भी किस तरह की एक मधुरता है एक केयर है एक लव है तो मैंने इस तरह से कुछ स्मृति कथाएं मैंने खोजी है हम थोड़ा सा देखते हैं आज कि मैंने जद एक ट्रेडिशनल जद एक हमारे माइंड में हो जाए कि ठाकुर हां सबको बड़ा ही प्रेम करते हैं डायरेक्ट डिसाइल लोगों को बड़ा ही प्रेम करते हैं तो य उनका एक लविंग नेचर एक सुमधुर स्वरूप जैसा है वैसे ही उनका एक रुद्र स्वरूप भी है रुद स्वरूप के बारे में विरजानंद जी महाराज लिखते हैं स्वामी जी खन आलम बजार मोठे थकते स्वामी जी अमेरिका से आ चुके थे वापस आलम बाजार मठ में रह रहे थे शोकाल आटा नोटा अंदाज घोल घरे बा भीतर दिके बारां दई गीता उपनिषद बा प्रश्नोत्तरे क्लास कोते सुबह को 89 बजे के आसपास वहां का जो होल है वहां पर गीता या उपनिषद के क्लास कर करते थे ब्रह्मचारी और साधुरा उपस्थित थकते ब्रह्मचारी और साधु उपस्थित रहते थे स्वामी जीर गुरु भैया गुरु भाई राव क्लास क्लासे बोसते और सुनते तो सिर्फ स्वामी जी के सिर्फ शिष्य या नए आए हुए डिवोटा ही नहीं स्वामी जी के जो गुरु भाई थे वे लोग भी वहां पर बैठते थे क्लास सुनते थे मैं अनुमान करके कह सकता हूं कि राजा महाराज तो थे शायद उस समय महापुरुष महाराज भी होंगे त्रिगुणा रयान जी महाराज भी होंगे शायद व बाबूराम महाराज भी होंगे ऐसे हम कुछ अनुमान करके नाम दे सकते हैं यहां पर लिखा नहीं आमी बेशर भाग दिन उपस्थित थकते पार तुम ना मैं ज्यादातर उस क्लास में उपस्थित नहीं रह पाता था देखिए स्वामी जी क्लास कर रहे हैं स्वामी जी गीता और उपनिषद ले रहे हैं यह सुनने के लिए भक्तो लोग तो ठीक है स्वामी जी के गुरु भाई स्वयं जिन्होंने इतनी उपलब्धि आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त की है वे लोग खुद स्वामी जी के मुंह से अपने शास्त्रों की सनातन वाणी को सुनने के लिए बैठे हैं इस तरह के पवित्र एक शास्त्रज्ञ वातावरण में विरजानंद जी महाराज कहते हैं मैं नहीं उपस्थित रह पा रहा था यह तो बड़ी ही आश्चर्य की बात है स्वामी जी ता लोखो कोरे लेन स्वामी जी ने यह नोट किया एक दिन क्लास समय तीनी आमार खोज कर लेन एक दिन क्लास का समय था उन्होंने पूछा कि काली कृष्ण कहां है काली कृष्ण कोथा है काली कृष्ण कहां है केनो से आसे ना वह क्यों नहीं आ रहा ताके डेके आनो ग उसको बुला कर के ले आओ एक जन ऐसे आमाई खबर दिलन किसी ने आकर के मुझे खबर दिया बोला कि स्वामी जी तुमको खोज रहे हैं तुम्हारे बारे में पूछ रहे हैं क्लास चल रहा है क्यों नहीं आ रहे हो आमी खना तार काछ गेल स्वामी जी स्वयं उनकी खोज कर रहे हैं देखिए मैं दौड़ कर के इमीडिएट उनके पास में गया आमा के देखे ही रेगे गलन मुझे देख कर के ही गुस्सा हो गया रागत शो बोलले गुस्से से बड़े ही नाराज होकर के बोले तू आशीष ना केनो तुम क्यों नहीं आते हो क्लास में की कोर छली क्या कर रहे थे बांगला में तुम आपनी तुम और तई तीन तरह के संबोधन होते हैं जिस तरह से हिंदी में आप और तुम तो वहां पर तुमसे भी मतलब जो हमसे छोटे जो होता है उम्र में भी और बुद्धि में भी तो उनको हम तुई करके बुलाते हैं तो कीको छिली क्या कर रहे थे ठाकुरे जन्नो भीजे छोला मोटा एकटा एकटी को काट छिली बुझी ठाकुर के लिए जो चना या उसको जो अंकुरित किए हैं उसमें से अंकुरित जो चना होता है उसको एक एक करके वह जो अंकुर जो बाहर निकलता है सफेद कलर का उसको क्या काट रहे थे क्या देखिए शशि महाराज का ऐसा था कि ठाकुर की सेवा करनी है तो यह अंकुरित जो चना है या जो कुछ भी है उसको वैसे ही नहीं दे देना है शशि महाराज की सेवा यानी कि 100% परफेक्शन उसके आगे भी उदाहरण देखेंगे ये स्वामी जी के गुस्से का उदाहरण है बाद में शशि महाराज के गुस्से का उदाहरण देखेंगे तो वो जो चना जो अंकुरित किया है उसमें से जो अंकुर प्रकट होता है उसको भी काटना है वैसे ही नहीं दे देना है ठाकुर को ठाकुर को जो कुछ भी अर्पण करना है संपूर्ण रूप शुद्ध होना चाहिए पवित्र होना चाहिए परफेक्ट होना चाहिए ये परफेक्शन का आग्रह इतना था शशि महाराज का तो स्वामी जी को सब पता है तो स्वामी जी ने गुस्सा करके बोला क्या कर रहे थे तुम ये जो भिजा हुआ जो चना है उसके में से अंकुर एक एक करके काट रहे थे क्या डाको शशि के बुलाओ शशि को शशि महाराज एले स्वामी जी उत्तेजितो भावे ताके बोलले शशि महाराज आकर के स्वामी जी उनको बड़े ही उत्तेजित भाव से बोले की है शश क्या रे शश यश छले रा बाड़ी घोर दोर छेड़े तोमार ठाकुरे छोला बोटा काटर जन्नो एखाने छ ना की यह सब लड़के अपने घर वगैरह छोड़ कर के माता-पिता को छोड़ कर के यहां पर आकर के ठाकुर को तो जो ऑफर कर रहे हो यह जो अंकुरित चने वगैरह उसमें से क्या अंकुर काटने के लिए यहां पर आए हैं ई शब चोल बेना ई चलबे टोल बेना वह सब चलेगा फलेगांव होवे जब ध्यान और पाठ अर्थात की स्वाध्याय सबको उस समय पर करना ही होगा निश्चित समय पर करना ही होगा सुनते पाछो सुन रहे हो क्या ओहो स्वामी जी ने इतना तो कहा फिर जो कहा वो फिर लिखने के लिए वह संभव नहीं है इसलिए उसका शॉर्ट वर्णन विरजानंद जी महाराज करते हैं लिखते हैं ओहो स्वामी जीर की बक अरे बाप रे स्वामी जी की क्या डांट साघा दिक प्रचंड भयानक थामती ही चाइना रुकती ही नहीं है शशि महाराज घाड़ हेट कोरे चुप करे दाढ चोले गलन शशि महाराज ने अपना सर झुका करके सब कुछ सुन लिया और चुपचाप वहां से चले गए एकटी कथाओ बोल लेना सामने एक बात भी उसकी उच्चारित नहीं की कथा का सामने एक भी उत्तर नहीं दिया सेही थके तिनी अर काज निजे ही अनेक टा कर तेन जाते हम समय क्लासे जते पारी स्वामी जी ने इस तरह से जो डांटा था उस दिन के बाद से शशि महाराज ये चने को जो काटना है जो कुछ भी करना है ठाकुर को देना है सुबह को वह काम अपने से ही कर लेते थे विरजानंद जी महाराज को छुट्टी देती थी तुम जाओ और स्वामी जी का क्लास अटेंड करो आयो अर काज गुली जथा शीघ्र शरे ने बार चेष्टा करतु ने भी अपना काम जितना हो सके इतना जल्दी समाप्त कर लेने का प्रयत्न करता था देखिए घटना छोटी सी है किंतु जो नया आया हुआ व्यक्ति है या तो फिर शशि महाराज स्वयं ये लोग किस तरह से वहां पर रह रहे हैं स्वामी जी का लिखा है शेकी बकुनीं साघा दिक प्रचंड भयानक थामती ही चाइना रुकते रुकती ही नहीं है और स्वामी जी डांट ही रहे डांट ही रहे शिव स्वयं अवतार ग्रहण करके शरीर ग्रहण करके पृथ्वी पर आए हैं रुद्र स्वरूप धारण किया है और डांट रहे हैं सामने तो शशि महाराज थे तो ठीक थे यदि विरजानंद जी को इस तरह से डांटा होता तो विरजानंद जी का बेचारे का हार्ट फेल हो जाता तो देखिए कि इस तरह से डांट सुनना ये किस तरह का लोगों का मन आकर्षित करना हुआ माने इस तरह से क्या आप शशि महाराज विरजानंद जी को रखेंगे अच्छा अभी यह तो शशि महाराज की बारी आई अभी शशि महाराज दूसरों को किस तरह से डांटते हैं सच्चिदानंद जी महाराज जो कि हमारे बड़े ही सीनियर साधु थे वो लिखते हैं वो आलम बाजार मठ की ही कुछ घटनाएं हैं वह लिखते हैं सकाल बेला घोर परिष्कार करर समय अर सहीद तहर एक बार बच सा होए सुबह को ठाकुर का घर में साफ कर रहा था उस समय शशि महाराज के साथ में मेरा एक बार झगड़ा हुआ ताहर विरक्ति कारण आ बुझीते ना पराय जिज्ञासा कोरे लाम उनके गुस्से का कारण उनके नाराजगी का कारण मैं ना समझ पाया इसलिए मैंने उनको पूछा वो तीनी बोलिया लेन उन्होंने उत्तर दिया घर झाड़ू दीवार समय जोल छिया ना लोया धुलो ठाकुरे शरीरे लागया जाए तुम जो झाड़ू लगा रहे हो तो वहां पर तो धूल गिरी है धूल मिट्टी है वोह तो यदि तुम वैसे ही झाड़ू लगाओगे तो धूल हवा में उड़ेगी ठाकुर के श्री अंग को शरीर को स्पर्श करेगी यह किस तरह का तुम झाड़ू दे रहे हो पहले पले वहां पर पानी छाट फिर धुल ये जो झाड़ू लगाओ जिससे कि क्या होगा ये जो धूल वगैरह है पानी की वजह से जमीन को सट करके रहेगी और जब झाड़ू लगाएंगे तो सीधी सधी धूल निकल जाएगी हवा में उड़ेगी नहीं देखिए शशि महाराज का क्या परफेक्शन है कि ठाकुर के शरीर को झाड़ू लगा रहे हैं धूल उड़ रही है ठाकुर को लग रही है यह भी उनको दिखता है और इसको भी वो केयर करते हैं मुझे पता नहीं मैं आजकल ऐसा हमारे में नहीं होता राजकोट में नहीं होता मैंने भी तो श्राइन घर क्लीन किया है मैंने कभी पानी छट के के नहीं किया किंतु हम लोग आज सम आज के समय ऐसा कह सकते हैं कि वैसे ही मंदिर इतना क्लीन रहता है जनरली दो तीन बार झाड़ू लगता है कि इतनी धूल नहीं होती कि आप झाड़ू लगाएंगे और धूल उड़ना शुरू हो जाएगा तो जो भी है किंतु देखिए सेवा का परफेक्शन उनका कितना था एक दिन तीनी आमा के मुख धु बार दात थेतो करिया दते बोली लेन इस समय तो यह नीम का पेड़ का वो दात वो करते थे ना तो दात की वो जो डाल होती है वो काट कर के दात करना होता है तो ठाकुर को दात ऑफर करेंगे तो उन्होंने कहा कि दतन की जो ये है एक ओर से अच्छे से चिबा करके यानी अपने मुंह में तो नहीं डाल कर के किंतु पत्थर या किसी चीज से उसको बड़े ही अच्छे से उसको ये करके वो ठाकुर को देना है जिससे कि ठाकुर मुंह में डाले तो इतना नरम और सॉफ्ट हो गया हो कि जिससे कि ठाकुर के ये जो दांत या गम है उनको इजा ना पहुंचे तो मैंने आमी थेतो करिया दिले तिनी तहा हाथे लिया आमा के फेरत देन एवं बोलेन यह जो हाथ से उन्होंने दतन को ये कूटा था एक एक धर से तो शशि महाराज ने अपने हाथ में लेकर देखा कि देखा कि वह जिस साइड में कूटा हुआ है जिस साइड में पत्थर से उसको मारा है जिससे कि वह नरम हो जाए सॉफ्ट हो जाए एक धार वो देखा कि वह इतना सॉफ्ट या नरम नहीं हुआ है तो शशि महाराज ने वही चीज वही दतन उनके हाथ में वापस दे दिया और क्या कहा दात खूब नरम होआ चाहि यह दात जो बनाया है बहुत ही नरम होना चाहिए ना होले तहर माड़ी ते लागी बेन यदि तुम इतना नरम ना करोगे तो ठाकुर के गम पेड़ों में लगेगा सेवा का परफेक्शन कितना है आर एक दिन आमी श्री श्री ठाकुर पुजार भाषण मा जीते छिला तहते भासने भासने लागया शब्द होते छलो एक दिन मैं यानी सचिदानंद जी महाराज लिखते हैं कि ठाकुर घर के सामने बैठ कर के बर्तन धो रहा था तो बर्तन धोते धोते दो बर्तन एक साथ में लगते हैं तो उसकी आवाज हो रही थी तीनी तहा सुनी ते पाइया अमा के बोली लेन ठाकुरे घरे सम्मुख रूप शब्द जेनो ना होए ठाकुर के घर के सामने इस तरह से बर्तन का आवाज ना हो ओ सबब शब्दो तिनी पसंद कोरीते ना इस तरह से वो जो बर्तन से बर्तन लगने की आवाज है वो वो पसंद नहीं करते थे यहां पर ऐसा नहीं लिखा है कि डांट कर के बोले कि नहीं किंतु शशि महाराज का जो नेचर है हमको पता है कि वह डांट कर के ही बोलते होंगे आर एक दिन सकाले ठाकुरर हलवा तैयारी करते गया लेन एक दिन सुबह को शशि महाराज ठाकुर को ऑफर करने के लिए बाल भोग देने के लिए हलवा तैयार करने के लिए गए थे जाकर के देखा जायला जाया देखी लेन कोड़ा और परिष्कार जाकर के देखा जिस बर्तन में हलवा बनाते हैं वो अरिष्ट है गंदा है इसमें ऑलरेडी किसी ने कुछ बनाया हुआ है बिना धोए रख दिया है कोड़ते लाटू महाराज लंका फड़न दिया छोला सिद्ध खाया लेन उसी तवे में लाटू महाराज ने वो मिर्च है मिर्च का वगार करके वगार बोलते हैं फड़न का हिंदी गुजराती शब्द है वगार मैंने पता नहीं हिंदी शब्द क्या है तो उसको फ्राई करके मिर्च को फ्राई करके वो छोला सिद्ध किया है अर्थात कि चना का वगार किया है तहते तहर मने विशिष्ट कष्ट होवा ते क्रुद्ध होया लाटू महाराज के बापान तो करेन अभी देखा कि बाल भोग करना तड़का तड़का अच्छा अच्छा अच्छा हिंदी शब्द अच्छा तो अभी देखा कि बाल भोग देने के लिए बर्तन धोया धुला हुआ होना चाहिए जिसमें कि हलवा बनाना है देखा कि लाटू महाराज ने उसमें ऑलरेडी कुछ बनाया है बर्तन धोया नहीं है इससे गुस्सा होकर के उन्होंने बापा बंगाली शब्द है यानी मां बाप तक उन्होंने लाटू महाराज को गाली दे दी तखन लाटू महाराज तहर काछ आशिया बोले जब इतनी सारी गाली दी लाटू महाराज ने उनके पास जाकर के बोला शशी आमी श्री श्री माता ठाकुर रानी के चिट्ठी लिखी मैं मां को चिट्ठी लिखता हूं जयराम बाटी में तोर मां बाप और अर मां बाप की अलाद तुम रे माता-पिता और मेरे माता-पिता क्या अलग अलग है मने शशि महाराज का गुस्सा इतना कि तुम्हारे मां बाप तक जाकर के गाली दे दी और इससे महाराज लाटू महाराज नाराज हो गए बोला कि मैं मां को चिट्ठी लिखता हूं जयराम बाटी में क्यों क्योंकि क्या तुम्हारे माताजी और पिताजी और मेरे माता-पिता क्या अलग है वो तो एक ही है ठाकुर और मां तो उनको गाली देना यानी कि एक ही माता-पिता को गाली देना हुआ अभी यह घटना से किंतु शशि महाराज के मन में इतना त हुआ था इ तो दूर कष्ट होया छलो ज साम्यावस्था लाभ करते को एक दिन समय लागया लो माने इतना आघात हुआ था इनके मन को कि साम्यावस्था अर्थात उनके मन को ठीक होने के लिए बहुत सारे दिन चले गए थे देखिए कि सेवा का परफेक्शन यहां पर इतना रखते हैं और सेवा करते करते यदि थोड़ी सी भी त्रुटि हो जाए तो मां-बाप तक जाकर के गाली दे देते हैं वो शरत महाराज का बड़ा ही फेमस किस्सा है कि स्वामी जी और शरद महाराज कोई बात को लेकर के नाराज हो गए स्वामी जी और शरद महाराज को बुलाया अपने कमरे में और फिर जो डांटना शुरू किया है जिसने यह स्मृति कथा लिखा है वह लिखता है कि वो इस इस तरह की डांट कि जैसे कि वो कच्चा पुचा आदमी होगा तो उसका हृदय फेल हो जाएगा इस तरह की डांट लगा रहे हैं सडन क्या हुआ एक डिवोटा आ गया अभी डिवोटा के सामने तो गुरु भाई लोग आपस में झगड़ा नहीं करेंगे तो जैसे ही डिवटी आया तो स्वामी जी ने उसको बिठाया किसी को बोला कि जाओ जाकर के चाय लेकर के आओ यहां पर शरत महाराज सब कुछ चुपचाप सुन रहे थे स्वामी जी की डांट जो थी चुपचाप वो ग उनको मन में कोई विकार नहीं चेहरे पर कोई नाराजगी नहीं कोई गुस्सा नहीं चुपचाप बैठ के सुन रहे थे डिवोटा के साथ अभी चाय आया तो बढ़िया मजे से शरद महाराज ने बैठ कर के चाय पिया दोनों के साथ में स्वामी जी भी चाय पी रहे हैं हंसी मजाक गप लगा रहे हैं भक्त के साथ में हां ठाकुर थे तब वो सब ठाकुर के समय की घटना है दक्षिणेश्वर की घटना है वो सब याद करके गप लगा रहे हैं अब जैसे ही वो डिवोटा चला गया फिर से स्वामी जी ने वो सेकंड एपिसोड उसका सेकंड फेस चालू किया डांटने का तो अभी शरत महाराज भी चाय को कब साइड में रख कर के चुपचाप सुन रहे हैं तो ये देख कर के स्वामी जी नाराज हो गए अरे र तो माछ रोक तो र किछु होवे ना माने इसका रक्त इसका जो खून है मछली का खून है मछली का खून ठंडा होता है कभी घलता नहीं है कभी गर्म नहीं होता तो स्वामी जी कहते हैं कि इसका रग इसका जो खून है मछली का खून है ठंडा रग खून है इसको कुछ होने वाला नहीं तो ये गुरु भाई जब स्वामी जी का रुद्र स्वरूप था तो सब किस तरह से चुपचाप सुनते थे एक बार ऐसा हुआ कि बाबूराम महाराज के साथ में उस समय राजा महाराज थे राजा महाराज और बाबूराम महाराज के बीच में किसी बात को लेकर के इस तरह से डिफरेंस ऑफ ओपिनियन हो गया अभी राजा महाराज तो किसी को डांटते नहीं थे उनका तो बेचारे का बड़ा ही शांत और स्वस्थ नेचर था उनका नॉर्मल जैसे हमारी लैंग्वेज में कहे तो नॉर्मल नेचर था किंतु बाबूराम महाराज को थोड़ा सा लग गया वो थोड़े से उनको अपमान जनक लगा उनको उन्होंने क्या किया कि जाकर के वो क्या किया वो बोले कि मैं मठ से जा रहा हूं मुझे मठ में नहीं रहना है ऐसा करके निकल जा रहे बेलूर मठ में से तो वो गेट था बेलूरमठ का वहां तक पहुंचे सडन देखा कि उनका जो उत्तरी था वो उत्तरीय पकड़ा है किसी ने पीछे से किसी ने पकड़ लिया है तो एकदम व रुक गए और पीछे देखा तो ठाकुर स्वयं खड़े हैं उनका उत्तरीय पकड़ कर के बोला जाबी को थाई चांद मैंने बेटा तुम कहां जाओगे ये बेलर मट छोड़ कर के इस तरह से ठाकुर का दर्शन होने से उनके मन में लगा कि अरे नहीं इस तरह से नाराज हो कर के बिलग मट से जाना यह तो ठीक बात नहीं है ठाकुर के अस्थि स्वयं यहां पे यहां पर पूजित होते हैं यहां पर पूजा होता है तो थोड़ा बहुत अपमान सहन करके हमको य यहां पे रहना पड़ेगा तो ये देख कर के वो वापस आ गए तो यह जो लोगों के मन को आकर्षित करने वाली बात है हमको कभी-कभी लगता है कि यह लोग बड़ा ही प्रेम से बड़ा ही स्नेह पूर्वक वो भजन कीर्तन करके ही सब समय लोगों को पटा करके बुझा करके समझा करके रखते होंगे किंतु ऐसा नहीं है इन लोगों का एक रुद्र स्वरूप भी था और रुद्र स्वरूप ऐसा था कि कोई भी हम जैसे लोगों के सामने यदि इस तरह की डांट सुननी पड़े हमको या तो हम दूसरों को तरह की डांट देते हुए सुने हम लोग वहां पर कभी नहीं रह पाएंगे इसलिए देखो कि आजकल अपने ऑर्डर में धीरे-धीरे करके यह सब डांटना गुस्सा करना चिल्लाना यह सब धीरे-धीरे कम हो जा रहा है पता नहीं यह अच्छी बात है कि बुरी बात है इस तरह के डांट सुनने से जितने हमारे पूर्व जन्म के जितने संस्कार हैं वह सब कट हो जाते हैं मैंने यह अपने सीनियर साधुओं से सुना है हालांकि सीनियर साधु ये कहेंगे कि डांट सुनना अच्छा है इससे तुम्हारे चित्त शुद्धि होंगी कि किंतु इस तरह से कोई किसी को डांटता नहीं है यदि नाराज हो जाते हैं तो फिर दूसरे जो एडमिनिस्ट्रेटिव स्टेप्स है वो लिए जाते हैं किंतु मुंह से किसी को इस तरह से नहीं बोला जाता तो पता नहीं इसको हम इवोल्यूशन कहेंगे कि डिवोशन कहेंगे कि शुरू में ऐसा होता था कि उनकी डांट के पीछे प्रेम भी इतना स्ट्रांग था कि जो सुनता है ये डांट उसको पता है कि हां यह क्या जो कह रहे हैं ये हमारे ही अच्छे के लिए हमारे ही भले के लिए ये कह रहे हैं और ऐसा करने से हमारा ही कल्याण है तो ये एक कल वाला जो पॉइंट था मैंने सोचा इसका थोड़ा सा विस्तृत हम स्वरूप करेंगे आगे पढ़ते हैं गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं अभी कल देखा कि भाव गंभीर संपादन नवीन आदर्श संपादन या मानव चित्त के आकर्षण मात्र से ठाकुर का काम संपूर्ण नहीं होता वस्तुत भावो घन मूर्ति ईश्वर अवतारे उप उद्देश आदि मानव बुद्धि सहज परिपूर्ण संपूर्ण रूपे परिमाप करा बा वाक्य प्रकाश करा संभवन है सही कहा जाए तो भाव घन मूर्ति ईश्वर अवतार ईश्वर का जो अवतार है वह भाव घन स्वरूप है इनका उद्देश्य वह जिस कार्य को पृथ्वी पर अमल करने के लिए उसको प्रैक्टिकल करने के लिए पृथ्वी पर आए हैं वह क्या करने को आए हैं यह मनुष्य की बुद्धि से हम लोग संपूर्ण रूप से समझ नहीं पाएंगे या तो फिर वाक्य में प्रकाश भी नहीं कर पाएंगे लोग कोई कोई बोलेगा कि हां हम तो ठाकुर को बहुत ही अच्छे से समझे हैं तो ठाकुर जो करना चाहते हैं कहना चाहते हैं व हम ही लोग ठीक जैसे कि हमने कल देखा कि रामचंद्र दत्त और यह त्यागी शिष्य इन दोनों के बीच में एक फिलोसॉफिकल डिफरेंस ऑफ ओपिनियन हमेशा रहता था उसमें गिरीश घोष का एक बड़ा एक उसमें पोजीशन था सुंदर पोजीशन था वो कहता था यह दत्त दत्त का झगड़ा है इसमें हमको नहीं पढ़ना है अर्थात कि ये गिरीश रामचंद्र दत्त महाशय वो जब छोटे थे तब स्वामी जी के घर में रहे थे क्योंकि उनके पिताजी का शायद छोटी उम्र में मृत्यु हो गया था क्या रीजन है वो मैं भूल गया किंतु बचपन उन्होंने स्वामी जी के घर में बिताया था और स्वामी जी के कोई डिस्टेंट रिलेटिव भी होते थे तो स्वामी जी नरेंद्रनाथ दत्त और यह रामचंद्र दत्त तो रिलेटिव भी है और ठाकुर के शिष्य भी है दोनों एक घर में साथ में रहे भी थे तो गिरीश घोष कहा करते थे कि ये दत्त और दत्त का झगड़ा है उसमें मुझे नहीं पढ़ना है तो रामचंद्र दत्त कहते थे मैंने ही ठाकुर को समझा है काली कृष्ण महाराज को कहते हैं कि मैं और ठाकुर बस दो ही है फिर तो काली कृष्ण महाराज गिरजानंद जी महाराज वरा नगर मठ आए तब उनको पता चला कि नहीं त्यागी शिष्यों की इसमें ठाकुर के जीवन को समझने में ठाकुर के उपदेश को जीवन में अमल करने में कितना बड़ा उनका महत्व है इसके बाद में त्यागी शिष्यों में भी देखिए बाबूराम महाराज ठाकुर को स्वामी जी के अगेंस्ट में बार-बार बोल अगेंस्ट शब्द ठीक नहीं है स्वामी जी की जो पोजीशन है उसको लेकर के वो आर्गुमेंट करते हैं स्वामी जी जब अमेरिका में थे और उप वेदांत के बारे में उपनिषद के बारे में आत्मन और ब्रह्मण के बारे में वो उपदेश दे रहे थे प्रवचन दे रहे थे तब बाबूराम महाराज बोलते हैं कि अरे यह नरेद क्या कर रहा है य ठाकुर के बारे में नहीं बोल कर के यह सब नई-नई चीजें बोल रहा है ठाकुर ने तो कहा यह वेदांत वगैरह तो कहा नहीं इसके बारे में फिर जब स्वामी जी अमेरिका से भारत लौटे और वो फर्स्ट में को रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई उसी दिन की यह घटना है जिस दिन बलराम भवन में बैठकर के स्वामी जी ने कहा कि जिन गुरु महाराज के नाम पर जिन भगवान राम कृष्ण के नाम पर हमने संन्यास ग्रहण किया है उसी श्री राम कृष्ण के नाम पर हम रामकृष्ण मिशन की स्थापना करेंगे आत्मन मोक्षार्थम जगत हिताय च के उद्देश्य के लिए यह संस्था कार्यरत रहेगी ऐसा करके सभी भक्तों के सामने डिवोटा के सामने स्वामी जी ने ये घोषणा की सभी ने ये एक्सेप्ट कर लिया फिर स्वामी जी बाहर आक कर के बैठे हैं तो यही बाबूराम महाराज जाकर के बोलते हैं नरेंद्र तुम ये जो सब विदेशी भाव लेकर के आए हो क्या ये ठाकुर के मत के अनुरूप है कि नहीं है यह तो मुझे संदेह हो रहा है जैसे ही स्वामी जी ने सुना यह बात वो बड़े ही वो दुखित हो गए और दुख करके सीधे वह छत के ऊपर में वो चले गए अभी स्वामी जी का तो हेल्थ भी उस समय बिगड़ा हुआ था और स्वामी जी को इस तरह से दुखित होना वो तो कितना बुरा होगा मतलब सभी गुरु भाई राजा महाराज वगैरह तो बड़े ही व विचलित होकर के स्वामी जी के पीछे दौड़े अरे स्वामी जी आप क्या है उसकी बात सुनते हो वो भी जो भी उलट पुलट बोलता है ये मैं बोल रहा हूं वो उन्होंने जिस तरह से भी समझाया हो वो समझा बुझा करके स्वामी जी को फिर से वो लेकर आए तो और बाबूराम महाराज ने भी कहा कि अरे स्वामी जी तुम रे नरेण इम इतना कोई ये मत लो इसको सीरियसली ये तो वैसे ही मेरे मन में आया ये बाबूराम महाराज खुद कहते हैं 1911 में वो काशी में थे महाराज खुद कहते हैं कि तब मैंने स्वामी जी का कंप्लीट वर्क्स बड़े ही ध्यान से पढ़ा तब कहीं जाकर के स्वामी जी क्या कहना चाहते हैं स्वामी जी का जो ठाकुर के भाव को पृथ्वी पर प्रचारित करने का जो महत् उद्देश्य क्या है वह मैं तब समझ पाया और जब यह गुरु भाई जब इस तरह से कोई नाराजगी व्यक्त करते थे या डिफरेंस ऑफ ओपिनियन व्यक्त करते थे स्वामी जी क्या कहते थे कि तो मादर भाब थके छोड़िए बेर कर ठाकुर के पूरे पृथ्वी ते छाड़ देवा अर्थात की तुम लोग जो ठाकुर को समझे हो अपने संकुचित मन से जो कुछ भी समझे हो उस संकुचित में से ठाकुर को निकाल करके मैं पूरी पृथ्वी पर उनको प्रसारित कर दूंगा अभी स्वामी जी गुरु भाइयों को बोलते हैं कि तुम लोगों की ठाकुर की समझ बड़ी ही संकुचित है तो गुरु भाई स्वयं जिन लोगों ने ब्रह्मज्ञान ठाकुर की ट्रेनिंग अंदर मने ठाकुर तो किसी को छोड़ने वाले नहीं थे रात को बोलते थे चलो अभी यहां पर क्या सोने के लिए आए हो जाओ जाकर के वो किसी को चांदनी घाट प भेज देते थे किसी को पंचवटी में भेज देते थे जाओ जाकर के ध्यान करो तो ठाकुर ने स्वयं उनके जीवन का मन का गणतर किया है उनको किसी ना किसी तरह की उच्च आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त करवाई है ऐसे महापुरुष अवतार के लीला संगी इन लोगों को स्वामी जी कहते हैं कि तुम्हारी ठाकुर की जो समझ है वो संकुचित है और इसमें से ठाकुर को निकाल कर के मैं पूरी पृथ्वी पर प्रसारित कर दूंगा स्वामी जी ने क्या कहा है ठाकुर के आने से इस बार ब्रह्म कुंडलिनी स्वयं जाग्रता हो गई है माने किसी व्यक्ति को स्पर्श करेंगे साधक को उपदेश देंगे तो साधक की कुंडलिनी जागृत हो जाएगी यह तो एक बात हुई ब्रह्म कुंडलिनी स्वयं यह जो पूरी सृष्टि स्थिति प्रलय की एक साइकिल है हम लोग ज्ञान योग में देख रहे थे स्वामी जी क्या कहते हैं एक सृष्टि स्थिति और प्रलय की साइकिल को कल्प कहते हैं और कल्प के परे ये है ब्रह्मण ब्रह्मण में से ये सृष्टि स्थिति प्रलय की साइकिल चलती ही रहती है चलती ही रहती है यदि ये इवोल्यूशन वाले यह कहते हैं कि हां सृष्टि के प्रारंभ में एक सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिस्ट सम या तो बिग बैंग या जो भी कहो वहां वो एक घटना थी उसके दूसरे छोर पे यदि भगवान रामकृष्ण स्वयं एक परफेक्ट मैन एक पुरुषोत्तम यदि दूसरे छोर पे है ये इवोल्यूशन की साइकल के तो ब्रह्मण में से यह बिग बैंग या तो फिर सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिस्ट म आया है वो आपको स्वीकार करना होगा तो यह ब्रह्मण या तो सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिस्ट म से लेकर के भगवान राम कृष्ण तक जाने वाली इवोल्यूशन का संपूर्ण प्रवाह है स्वामी जी कहते हैं ट्रीट इट एज वन लाइफ उसके पूरे प्रवाह को एक सिंगल जीवन के रूप में देखिए तो यह वन लाइफ है सिंगल सेल्यूलर ऑर्गेनिस्ट म से लेकर के परफेक्ट मैन तक उसकी ब्रह्म कुंडली ने जागृत कर दी है ठाकुर ने आकर के माने सिर्फ एक व्यक्ति दो व्यक्ति के ठाकुर के शिष्य ना कि भारतवासी इतने ही नहीं पूरे पृथ्वी पे पूरे विश्व ब्रह्मांड में जितने भी ऑर्गेनिस्ट म है सबको मुक्ति का रास्ता ठाकुर ने खोल करके रख दिया है तो यह यहां पर गंभीरानंद जी महाराज जो कहना चाहते हैं कि हमारी नजरों से जो हमको दिखता है कि हां अवतार इतना कार्य कर रहे हैं ठाकुर कहते हैं कि लाटू लाटू खता तो मने लाटू काउंट करता था कि कितने घोड़ा गाड़ी ठाकुर के घर के सामने पड़ी है जो ठाकुर की वो कोई उत्सव वगैरह होता था तो डि वोटी आएंगे कोलकाता से तो घोड़ा गाड़ी में बैठ कर के आएंगे तो किसी भी उत्सव की सक्सेस का किस तरह से देखना है कि कितनी घोड़ा गाड़ी पड़ी है यानी कितने लोग आए हैं तो घोड़ा गाड़ी गिन लो तो पता चलेगा आजकल हम लोग अपने कोई ठाकुर का उत्सव होता है तो कोई गिनता है कितनी कार्य यहां पर पड़ी है या तो फिर बेटर आजकल का है कि कितने वो प्रसाद के वो गए आजकल प्रसाद आकर के जो कोई मंदिर में जाएगा नहीं जाएगा प्रसाद का वो जो है वो अवश्य लेगा वो प्रसाद तो अवश्य लेगा तो प्रका प्रसाद क्या है पैक करके किया जाता है तो प्रसाद के कितने पैकेट गए ये आज का मानदंड है देखने का कि कितने डिवोटा आए थे तो मैं कभी-कभी पूछूंगा कि अच्छा कितने प्रसाद के पैकेट डिस्ट्रीब्यूशन हुए तो बोलेगा कि 2000 3000 तो अच्छा तो उस समय का था कि ये कितनी घोड़ा गाड़ी है वहां पे वो गार्डन में वो देखो तो ठाकुर कहते हैं कि लाटू गिन रहा है कि यहां पे कितनी घोड़ा गाड़ी है फिर बोल रहा है कि अरे ब्राह्मण समाज में तो इतने सारे लोग आते हैं तो ब्राह्मण समाज में इतने सारे लोग आते ठाकुर के पास नहीं इतने कम आते हैं किंतु फिर वो ठाकुर की और केशव चंद्र सेन की बात है ना केशव के पास से वो यह दो तीन लोग शिवनाथ शास्त्री और ये दो तीन लोग निकल कर के चले गए और साधारण ब्राह्मण समाज की स्थापना की प्रॉब्लम क्या था कि ब्राह्मण समाज का था कि लड़की की शादी व मिनिमम एज होने के बाद में ही करनी है जो सोशल रिफॉर्मेशन की बात थी ठाकुर ने कहा था सोशल रिफॉर्मेशन को अलग रखो धर्मों को अलग रखो लोग सोशल रिफॉर्मेशन और रिलीजन दोनों को मिक्स कर रहे हैं तो लड़की की मिनिमम एज ठीक की है 11 12 ना कि 15 जो भी उस समय होगी आज आई थिंक गवर्नमेंट की ना कि 1819 जो भी है मिनिमम एज इसके पहले यदि आप लड़की की शादी करेंगे तो वो एक क्राइम कहा जाएगा तो उस समय ब्रह्म समाज के जितने भी वो फॉलोअर्स थे उन्होंने आपस में ठीक किया हम अपनी लड़की की शादी मिनिमम इतनी एज ना हो जाए तब तक हम नहीं करवाएंगे अभी उसमें क्या हुआ केशव ने देखा कि वोह कुछ बिहार के वो राजा है उसका लड़का वो तो राज राजकुमार है भविष्य में राजा बनेगा तो उसका वह आया उसके सामने ऑफर तो बड़ा ही खुश हो गया केशव सोचा कि मेरी लड़की रानी बनेगी तो मैंने राजकुमारी बनेगी तो उसने फट करके शादी कर ली किंतु वो अभी वो मिनिमम मैरिज एज की उम्र से उसकी उम्र कम थी तो यह देख कर के शिवनाथ शास्त्री और दो-तीन लोग बड़े-बड़े वो महत्व के इंपोर्टेंट लोग थे उसके फॉलोवर उन्होंने ब्राह्मण समाज में से निकल कर के साधारण ब्राह्मण समाज की रचना की अब ये बात से दुखित होकर के केशव सेन ठाकुर के पास आया ठाकुर के पास आकर के कंप्लेन कर रहा है कि महाशय उन्होंने सिर्फ ये नहीं कि मेरे सामने जाकर के दूसरे ब्राह्मण समाज की रचना की स्थापना की मेरे जो फॉलोवर थे उसको भी वे लोग लेकर के चले गए ये स्वामी जी स्वयं स्वामी जी साधारण ब्राह्मण समाज में जाते थे शिवनाथ शास्त्री के वो केशव के वो ब्र नव विधान ब्राह्मण समाज में नहीं जाते थे तो नहीं कि इतना ही नहीं कि वो ब्रह्म समाज अलग बनाया उनका किंतु मेरे यहां के मेरे खुद के फॉलोवर लेकर के चले गए तो ठाकुर ने क्या कहा तुम देख सुन कर के शिष्य नहीं बनाते हो इसलिए तुम्हारे साथ में ऐसा होता है अभी ठाकुर के खुद के देखिए कि ठाकुर के जितने भी शिष्य है हमने देखा कि उन लोगों के भीतर में डिफरेंस ऑफ ओपिनियन रहता होगा किंतु इस तरह से संघ छोड़ के चले जाना नया संघ चालू करना यह सब नहीं होता है हुआ है वैसे काली महाराज की अभदा नं जीी की बात है किंतु वो पूरा एक डिफरेंट टॉपिक है कभी थोड़ा सा उसमें डिटेल में जाकर के देखेंगे बात ये है कि ठाकुर का भाव किसी ने नहीं छोड़ा ऑर्गेनाइजेशन शायद अभेदानंद जी ने अलग किया हो ठाकुर का भाव उन्होंने नहीं छोड़ा तो अवतार या तो आध्या शक्ति जगदंबा जब पृथ्वी पर आते हैं शरीर धारण करते हैं तो हमारी नजरों से जो दिखता है कि यह लोग यह कार्य कर रहे हैं इसके अलावा भी पूरे जगत संसार की ब्रह्म कुंडलिनी को वह जागृत करके जाते हैं तो आज यहीं तक कल फिर से मिते ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु