प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित भार स्वीकार यह चैप्टर जो हम देख रहे थे इसमें ही देखिए कि किस तरह से गंभीरानंद जी हमको भार समर्पण अह इसमें गंभीरानंद जी आगे क्या कहते हैं। अभी तक जो देखा हमने एक्चुअली यह जो पूरा अह चैप्टर है उसका थीम यह है कि ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं कि किस तरह से भविष्य का रामकृष्ण संघ और भविष्य का कहां मां शारदा देवी जब दक्षिणेश्वर आई ठाकुर ने शोडशी पूजा की मां की तभी से तो ठाकुर ने धर्म चक्र प्रवर्तन प्रारंभ किया कोलकाता में और तभी से तो ठाकुर के पास में कितने सारे भक्त स्त्री और पुरुष और बालक यह तीनों ठाकुर के पास आ रहे थे और ठाकुर उनमें से जो चुनिंदा जो भक्त थे स्त्री भक्त में से भी और यह जो बालक भक्त थे उन सबको मां के पास में भेजते थे जिससे कि उनको मां का भी आशीर्वाद प्राप्त हो। मां उनके लिए खाना पका दिया करती थी। किसी को कोलकाता आने जाने के लिए गाड़ी भाड़ा वगैरह चाहिए। नौ का भाड़ा तो वह मां दिया करती थी। तो इस तरह से ठाकुर उसी समय से मां को तैयार कर रहे थे कि अपने संघ की आध्यात्मिक उन्नति की पूरी जवाबदारी वह अपने सर पर ले और हमने जो कुछ दिनों पहले देखा भी सही कि किस तरह से पूरा 100 साल का इतिहास पढ़ेंगे ठाकुर मां और 16 डायरेक्ट डिसाइपल यह जो 18 लोगों का पूरा जीवन चरित्र है एक साथ में जब स्टडी करते है ठाकुर के जन्म से लेकर के 1836 से लेकर के 1936 ठाकुर का श्री मंदिर बेलूर मठ में स्थापित हुआ। उस पहली एक शतक का जब हम अभ्यास करते हैं तो हमको स्पष्ट दिखाई देता है कि किस तरह से ठाकुर और स्वामी जी दोनों का जो मुख्य कार्य था उनका जो अपना खुद का तो कंट्रीब्यूशन था ही ठाकुर का आध्यात्मिक जगत में जो हमको शिक्षा दी वह उनका कंट्रीब्यूशन था। स्वामी जी का दर्शन और इतिहास और संघ निर्माण में जो उनका कंट्रीब्यूशन था। राष्ट्र के जागरण में जो उनका कंट्रीब्यूशन था वह तो था ही था। किंतु इन दोनों ने मिलकर के जो सर्वश्रेष्ठ कार्य किया है यदि हम पूछे कि ठाकुर ने इतना जो सब कुछ किया उसमें ठाकुर की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि क्या थी तो उन्होंने मां शारदा देवी के लिए संघ स्थापित करके संघ की देवी के रूप में आसन जो उनके लिए तैयार किया जिस आसन पर मां विराजिता हुई वह ठाकुर के जीवन का सर्वश्रेष्ठ कार्य था। स्वामी जी के जीवन का भी हमने इसी तरह से एनालिसिस करके पता चलता है कि स्वामी जी ने संघ की स्थापना करने के बाद में अपने से खुद से उन्होंने इस पृथ्वी पे से विदाई ले ली। छोटी सी ही उम्र में 40 भी पूरे नहीं हुए थे। उस पृथ्वी से चल बसे क्योंकि स्वामी जी को पता था कि संघ की स्थापना करने तक ही उनका कार्य है। एक बार संघ की स्थापना हुई तो फिर उसको चलाने का उसको नियंत्रण करने का कार्य मां शारदा देवी का है। तो मातृ पर्व स्वामी जी की महासमाधि के बाद में जो प्रारंभ होता है 1902 से लेकर के 1920 यानी ऑलमोस्ट 20 साल मां शारदा देवी ने रामकृष्ण संघ को चालित किया नियंत्रित किया आशीर्वाद दिए शिक्षा दीक्षा दी मार्गदर्शन दिया और जब भी हमको कहीं पर डर लगा है कि यह ब्रिटिश गवर्नमेंट आकर के हमारे साथ में क्या से क्या ना कर दे तो हमको को भरोसा भी दिलवाया है। हमको साहस प्रदान भी किया है। तो यह 20 साल यह सबसे सर्वश्रेष्ठ जो मां को भविष्य में रामकृष्ण संघ की आगेवानी लेनी थी। उसके बीज जो है उसका जो प्रारंभ है वह प्रारंभ यहां पर श्री रामकृष्ण दक्षिणेश्वर में ही कर दे रहे हैं। तो देखिए कि संघ की आगेवाणी फॉर्मली मां ने तब से लेना शुरू किया जब भी ठाकुर वहां पर श्यामपुकुर और काशीपुर में थे। कैंसर से ग्रस्त थे और उनकी वाणी ऑलमोस्ट नीरव हो गई थी। रुक गई थी। उस समय और देह का कष्ट तो था ही। उस समय यह त्यागी संतान किनसे मार्गदर्शन प्राप्त करें किन के नियंत्रण के नीचे चले तो उस समय मां ने यह फॉर्मल यह लीडरशिप थी वो ग्रहण की थी किंतु उसके जो बीज है उसके जो मूल है वही दक्षिणेश्वर के दिनों में डाले गए थे। तो उसी दिनों के बारे में यहां पर गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं और
माँ की जीवनी के विभिन्न अध्यायों की रचना
देखिए कि गंभीरानंद जी ने ये चैप्टरों की रचना भी किस तरह से की है। सर्वप्रथम तो उन्होंने मां के दक्षिणेश्वर आने के बाद में मां ने दक्षिणेश्वर में जो नीरव साधना की उसका तो हमको पूरा डिस्क्रिप्शन दे दिया है कि साइलेंटली मां लोगों की नजर से अलग होकर के लोगों की नजर के बाहर में लोगों की नजर के अंतराल में मां ने जो साधना की वो तो डिस्क्रिप्शन दे दिया। फिर ठाकुर को कैंसर हुआ। फिर ठाकुर फिर वह पानीहाटी वाली घटना फिर ठाकुर को वहां पर जाना हुआ कोलकाता। तो यहां तक पहले तो गंभीरानंद जी महाराज स्टोरी को ले आए हैं। फिर जब ठाकुर काशीपुर में आए हैं उस समय फिर से उन्होंने बैक ट्रैक किया है। फिर से वह दक्षिणेश्वर के दिनों में वापस गए हैं। और अभी दक्षिणेश्वर के दिनों की एक दूसरी कहानी बता रहे हैं। यानी कि सबसे पहले दक्षिणेश्वर के दिनों की एक दृष्टि से उन्होंने कहानी बताई थी। वो दृष्टि थी मां की साधना मां ने ठाकुर के पास में जो सीखा एज ए विद्यार्थी मां शारदा या तो फिर ठाकुर की शिष्या मां शारदा वो एक कहानी बताई किंतु अभी जब बैक ट्रैक करके फिर से दक्षिणेश्वर में गंभीरानंद जी वापस आए हैं तो एक दूसरे दृष्टिकोण से मां की कहानी बता रहे हैं कि मां तभी से जगतगुरु का जगदंबा का अपना जो कार्य है अपना जो रोल है उसके बारे में सजाग हो गई थी। उसको निभाना उन्होंने प्रारंभ कर दिया था। तो किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज ये चैप्टरों को डिजाइन करते हैं? किस तरह से कहानी कहते हैं वो भी एक देखने लायक है। हम कह सकते हैं कि उन्होंने इस तरह से क्यों नहीं कहा। क्रोनोलॉजिकली क्यों नहीं समझाया कि दक्षिणेश्वर में तो एक्चुअली पीरियड तो एक ही है। आपको दो अलग विभाग में उसको बांटने की क्या जरूरत है कि पहले जब आप मां जब ठाकुर के पास में शिक्षा ग्रहण शिक्षा दीक्षा उद्दीपना जिस तरह से गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं जिन तीन तरीकों से ठाकुर मां को उपदेश देते थे उनको आध्यात्मिक जीवन गठन करने के बारे में समझाते थे वो एक यदि एक पहलू है मां के दक्षिणेश्वर के जीवन का तो उसी के साथ में अभिन्न रूप से बना हुआ यह भी तो पहलू है मां क्या है देवी और मानवी दोनों भाव मां के भीतर में एक साथ में विद्यमान है। तो मानवी के रूप में ठाकुर के पास में शिक्षा ग्रहण कर रही है। देवी के रूप में ठाकुर को स्वयं वो जैसे कि भवतारिणी का रूप में ठाकुर को आशीर्वाद दे रही है। ठाकुर की आध्यात्मिक जीवन के ऊपर में वो एक तरह से अपना एक सुरक्षा रूपी आंचल पाथरे हुए हैं। तो मां के तो दोनों पहलू थे। तो मानवीय पहलू को पहले बता दिया और देवी पहलू को बाद में बताया। इस तरह से उन्होंने क्यों किया? तो अभी जैसे मेरा स्पेककुलेशन इस तरह से है कि जब जिस पहलू के बारे में जिस एस्पेक्ट के बारे में गंभीरानंद जी डिस्कस करना चाहते हैं उसको एक्सक्लूसिवली इसलिए डिस्कस किया है कि जिससे कि मनुष्य मानवी रूपी मां शारदा उसके ऊपर में पूरा फोकस कर पाए। सभी कहानियां घटनाएं जितने भी इंसिडेंट है उसको अच्छे से सजा करके हमारे सामने प्रस्तुत कर पाए और फिर उनका जो देवित्व है देवी स्वरूप है उसके बारे में फिर अलग से डिस्कस करें जिससे कि उसके रिलेटेड जो घटनाएं कहानियां है उनको स्पष्ट रूप से समझा पाए। तो खैर अभी यह गंभीरानंद जी महाराज का यह डिसीजन है कि किस तरह से चैप्टरों की रचना करनी है। जिस तरह से मां के जीवन को उनको कहना है। तो कि हम तो इस तरह से सिर्फ अपना स्पेकुलेशन कर सकते हैं। तो यहां पे भी देखिए कि धीरे-धीरे
श्रीरामकृष्ण माँ शारदा के बारे में क्या कहते हैं
करके अभी गंभीरानंद जी महाराज एक के बाद एक उसी प्रसंगों का वर्णन करेंगे। सबसे पहले तो उन्होंने ठाकुर की उन उक्तियों को ठाकुर के जो वह कोट है उन्होंने जो मां के बारे में जो कहा है उसी के बारे में उन्होंने कह दिया कि पहले तो ठाकुर ने गोलाप मां को कहा था कि वह शारदा है सरस्वती है। ज्ञान देने के लिए आई है। रूप रहता यदि तो फिर अशुद्ध लोक के अशुद्ध मन वाले लोग देख करके यदि देखेंगे तो उनका अकल्याण होता। इसीलिए इस बार अपने रूप को ढक करके आई है। और एक समय ठाकुर ने कहा था मां के बारे में ज्ञानदायिनी महा बुद्धिमती ओ की जैसे वो अमार शक्ति वो ज्ञानदायिनी है। महाबुद्धिमती है। वह क्या ऐसी वैसी थोड़ी ना है। वह तो मेरी शक्ति है। और फिर हृदय को कहा था कि वह शारदा है, सरस्वती है। इसलिए उसको सजना अच्छा लगता है। गहने पहनकर के श्रृंगार करना अच्छा लगता है। तो देखिए कि इसकी तरह से एक के बाद एक ठाकुर के वचनों को लेकर के सब घटनाओं को फिर महाराज बता रहे हैं कि किस तरह से ठाकुर ने मां के लिए गहने बना दिए थे। तावीज बनवा दिया था। हाथ में पहनने के लिए चूड़ियां बनवा दी थी। और फिर आगे में महाराज क्या लिखते हैं? सरला आधुनिक शिक्षा विहीना ओ अभिजात्यादि शून्य श्री मां के चिनीते पारा सहज न सरल आधुनिक शिक्षा विहीन अभिजात्यादि शून्य यानी कि बड़े घर का होने का एक घमंड जिसको कहते हैं उस घमंड के बिना मां का बाहर का जीवन इतना सहज सरल था एक जैसे कि गांव की एक स्त्री ही जैसे कि वहां पर वह दक्षिणेश्वर में आकर के रह रही है तो इस तरह की मां को समझना सहज नहीं था। इसीलिए श्री रामकृष्ण स्वयं ताहार स्वरूप प्रकटित करते अग्रसर होइया छिले मां का सही स्वरूप क्या है जगत के सामने उसको दिखाने के लिए आगे बढ़े थे तन जान ते भोगेश्वर्य पूर्ण वर्तमान जुगे शुद्ध शत पवित्रता परिपूर्ण ए चरित्र खानी सम्यक उपलब्धि करा आमादे शक्ति बा उनको पता था कि भोग और ऐश्वर्य पूर्ण वर्तमान युग में शुद्ध सत पवित्रता से परिपूर्ण मां के चरित्र को ठीक-ठीक समझना हमारी शक्ति के बाहर है। ताई तनी श्री मां संबंधे रहस्य छोले बोलते इसीलिए वह मां के बारे में रहस्य करके कहते छाई चापा बेडाल अर्थात कि भस्मावृत्त बिल्ली एक तरह की इस तरह की बिल्ली जिसने कि यह एशिस भस्म यानी कि एशिस यह जो भस्म लगाते हैं ना भगवान शिव के अंग पे आपने भस्म देखी होगी चिता की भस्म या तो कोई भी लकड़ी जलती है तो उससे जो भस्म प्रकट होती है। तो यह भस्म से यदि कोई बिल्ली भस्म में जंप लगाए तो उसका पूरा देह उससे आवृत्त हो जाएगा और उसका सही कलर क्या है? रंग क्या है? आप नहीं पहचान पाएंगे। तो इस तरह की बिल्ली जो कि भस्म से आवृत्त है और इसका रंग आप नहीं देख पाएंगे। तो मां भी बाहर से जैसे कि भस्म से आवृत्त है। भीतर में ब्रह्म ज्ञान ज्वलजल कर रहा है। देखिए एक तरह से यहां पे ठाकुर ने मां की कंपैरिजन भगवान शिव के साथ में कर दी है। वही जो शशान के देवता वही भस्म से चिता की भस्म से आवृत्त वही भूत और पिशाच से घिरे हुए भोना उनकी उनकी उपासना करना उनको समझना उनके सही स्वरूप को वो महा भाग्यवान जो भक्त होते हैं वही इस शशान के देवता को समझ पाते हैं। रहते हैं शशान में किंतु इनके नाम का अर्थ है मंगलमय। तो इसी तरह से बेचारी मां भी देखिए कि किस तरह से यह दक्षिणेश्वर की छोटी सी वो जो नहबत थी उसमें रहती थी। उनके जो संगिनियां थी मां खुद कहती थी। अभी यह जो कोलकाता से भक्त तो बादबाद में आना शुरू हुए और वह भी तो सब समय आते नहीं थे। तो जो मछुआारी थी जो सब वो मछली पकड़ने के लिए जो स्त्रियां आया करती थी तो वह सब थी मां की संगिनियां कभी-कभी मां वही दक्षिणेश्वर जो गांव था वहां पर किसी किसी के घर जाकर के वो उनके साथ में बात करती थी। तो इसी सब लोगों से घिरी हुई मां शारदा को ठीक-ठीक पहचानना वह असंभव था। इसीलिए ठाकुर कहते हैं भस्मावृत्त बिल्ली की तरह उनका चरित्र लोगों की नजर से ढका हुआ लोगों की नजर के सामने ढका हुआ है तो मां का अंतर सौंदर्य ओ तेमनी साधारण अज्ञात मां के अंतर का जो सौंदर्य है वह साधारण लोगों की नजर से अज्ञात है पूज्य
स्वामी प्रेमानन्द माँ सारदा के बारे में क्या कहते हैं
पात श्रीमद स्वामी प्रेमानंद जी एक पत्र लिखिया छिलेन पूज्य पूज्य पात श्रीमद स्वामी प्रेमानंद जी महाराज ने एक पत्र में लिखा था श्री मां के के बुझे छ श्री मां को कौन समझ पाया है ऐश्वर्य लेेश नाई ऐश्वर्य का तिनक तनिक भर भी हिस्सा उनके जीवन में नहीं है देखिए यहां पर ऐश्वर्य का क्या अर्थ है जैसे कि ठाकुर का विद्या का ऐश्वर्य था या तो फिर साधना का ऐश्वर्य समाधि का ऐश्वर्य दर्शन का ऐश्वर्य स्वामी जी का भी विद्या का ऐश्वर्य था। उन्होंने पूरे जगत पर जय प्राप्त की थी विद्या की सहाय से। तो मां के पास में ना ही इस तरह की विद्या का ऐश्वर्य ना ही समाधि का ऐश्वर्य ना ही दर्शन का ऐश्वर्य। अभी जैसे ये अपनी योगिन मां योगिन मां इतने
कहानी: योगीन माँ को माँ सारदा के वैराग्य पर संदेह होता है
दिनों तक मां की सेवा की उन्होंने अभी किंतु फिर भी उनके मन में एक दिन संदेह आ गया कि मां को तो अभी ठाकुर को तो मैं देखती हूं उनका त्याग का ऐश्वर्य कितना प्रचंड था। अभी मां को देखिए कि अपने परिवारजनों के साथ में दिन भर बिताती है समय राधुराधु बोलकर के पागल हो गई है तो क्या सही में मां के भीतर में दिव्यता और आध्यात्मिकता है जितनी कि ठाकुर में थी तो ऐसा सोच कर के वो अभी उत्साह ये उद्बोधन के दिनों की बात है देखिए जिस तरह से स्वामी जी के मन में भी ठाकुर के प्रति जो आखिर तक एक तरह का ठाकुर की जैसे परीक्षा करते थे ना संदेह नहीं उनके मन में सतत एक रहता था कि ठाकुर की परीक्षा करनी चाहिए। तो जिस तरह से स्वामी जी ने आखिर तक ठाकुर की परीक्षा की तो वैसे ही मां की संगिनियां वही उद्बोधन के दिन जब उस समय तो मां का जो गुरुत्व गुरु भाव था वो तो मध्याहन सूर्य की तरह प्रखर रूप से वो तेज प्रकाशित हो रहा था। जो भी मां के पास में आता है सबको मां दीक्षा देती है। सबको मां आशीर्वाद देती है। सबको जप ध्यान साधन भजन आध्यात्मिक जीवन के बारे में उपदेश देती है। उस समय की बात है। उस समय योग योगिन मां के मन में यह विचार आया और इसी संदेह को लेकर के वह गंगा स्नान करने को गई। गंगा में देखा कि एक छोटा सा शिशु अभी जैसे अभी उस समय तो मेडिकल फैसिलिटी इतनी थी नहीं। तो अभी प्रसव के लिए डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल डॉक्टर वगैरह इतने इजीली अवेलेबल हो तो किसी ने बच्चे को प्रसव किया होगा। किसी तरह से बच्चे का मृत्यु हो गया होगा और वही अभी सधियो जात अभी जन्मा हुआ वो शिशु उसको किसी ने वह मर गया है तो गंगा में फेंक दिया। तो वह जो नाड़ी भुंडी जो सब होता है उसी को लेकर के वो जो मृत शिशु देह वो गंगा में तैर रहा था। अभी यह योगिन मां जैसे ही गंगा में स्नान करने को गई वैसे ही वह मृत देह को देखा एक बच्चे के मृत देह को तो उन्होंने देख के देख रही थी एकाएक ठाकुर प्रकट हुए उनकी नजर के सामने और क्या कहते हैं कि देखो गंगा में यह मृतदेह तैर रहा है किंतु इससे गंगा अपने से कभी अशुद्ध या अपवित्र नहीं होगी। गंगा हमेशा निर्मल शुद्ध पवित्र ही रहेगी। उसके जल में भले ही चाहे हजार मृत देह तैरते रहे वैसे ही मां शारदा देवी को सदा पवित्र समझना वो भले ही चाहे संसार में हो संसार तो उनकी सतह पे जो विशाल महासागर की तरह अमृत का महासागर मां के हृदय में है उस महासागर में कितने ही यह संसार तैरते रहेंगे इससे मां को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला तो जैसे ही योगिन मां को यह दर्शन हुआ सीधी योगिन मां उद्बोधन मायरवाड़ी मातृ मंदिर में वापस आई और मां के श्री चरण को पकड़ कर के कहने लगी कि मां मुझे क्षमा कर दो तो मां पूछती है अरे योगेन क्या हुआ तो फिर योगेन मां कहती है देखिए मां आपके ऊपर में संदेह हुआ सोचा कि आप घोर संसारी की तरह आप रह रही है किंतु देखिए कि जैसे ही संदेह हुआ वैसे ही ठाकुर ने मुझे यह दर्शन करवा दिया तो आपके ऊपर में संदेह किया इसके लिए मुझे क्षमा कर दो तो देखिए देखिए कि यह प्रेमानंद जी बाबूराम महाराज वही लिख रहे हैं कि ठाकुर का यह विद्या का ऐश्वर्य था। वैराग्य का ऐश्वर्य था। सन्यास का ऐश्वर्य था। स्वामी जी का तो पूछना ही नहीं। विदेश में देश में राजा महाराजा धनी विद्वान कितने लोग उनको पूजते थे। किंतु यह मां है। मां तो उद्बोधन में थी तो राधुराधु करके पागल थी। और जब यहां पर वह नहबत में थी तो ठाकुर की सेवा को लेकर के दिन रात बिताती थी। तो इस तरह की मां को कौन समझ पाया है? ऐश्वर्य लेेश नहीं ऐश्वर्य का एक तनिक लेश मात्र उनमें नहीं है। ठाकुर बरम विद्या ऐश्वर्य छिलो ठाकुर का किंतु विद्या का ऐश्वर्य था किंतु मार तार ऐश्वर्य परंत लुप्त किंतु मां का उनका ऐश्वर्य स्वयं लुप्त था। देखिए कि जो लक्ष्मी होकर के नारायण के साथ में विराज करती है जो कि पूरा विश्व ब्रह्मांड इस शक्ति के इलाके में आता है। यही शक्ति रूपणी मां उन्होंने अपनी शक्ति को कितनी बखूबी कितना सुंदर रूप से ढक करके रखा था। आवृत्त करके रखा था। एक ही महाशक्ति यह किस तरह की महाशक्ति है? जय मां। जय मां जय शक्तिमई मां। जय मां जय मां जय शक्ति महिमा मां जे बी निजेरा हजम करते पाछी ने सब मार निकट ढाला दी जो विष में हम लोग नहीं पचा डाइजेस्ट कर पाते वह सब विष हम लोग मां के सामने फेंक देते हैं। मां सब कोले तुले नीचे मां सब जितने भी पापी तापी हैं सबको अपनी गोद में उठा लेती है। अनंत शक्ति अपार करुणा। देखिए यह
कहानी: माँ शारदा ने एक बहुत ही अशुद्ध भक्त को दीक्षा दी
जो बाबूराम महाराज कहते हैं कि जो विष हम लोग नहीं हजम कर पाएंगे वह सब विष जैसे कि मां के पास में भेज देते हैं और मां सबको जैसे कि स्वीकार कर लेती है। इसके बारे में कहानी भी हमने कुछ दिनों पहले देखा था कि एक किसी को राजा महाराज ने मां के पास में एक भक्त को भेजा जयराम भाटी। तो वो फिर भक्त कहता है कि मुझे दीक्षा दीजिए। राजा महाराज ने देने को इंकार कर दिया है। आपके पास में भेजा है। तो फिर मां अपने मन में ही मन में बोलती है जो कि वहां पर सेवक जो थे उन्होंने सुना मां को यह बोलते हुए कि जब अपना पुत्र विदेश में जाता है तो कितनी अच्छी-अच्छी चीजें मां के लिए भेजता है और मेरे पुत्र ने ऐसे लोगों को भेजा। इस तरह का जो कि असार व्यक्ति है उसको मेरे पास में भेजा दीक्षा लेने के लिए। यदि मैं इसको दीक्षा दूंगी तो पता नहीं मेरे साथ में क्या हो जाएगा। किंतु ऐसे व्यक्ति को भी मां ने आखिर में दीक्षा दी और यह पूरा जो वर्णन है कि मां अपने आप के साथ में इस तरह की बात कर रही है और इसके बावजूद कि उनको हानि होगी इस भक्त के पाप ग्रहण करके उन्होंने भक्त को दीक्षा दी। यह पूरा विवरण जब बेलूर मठ में राजा महाराज बाबूराम महाराज यह सब त्यागी संतान ठाकुर के उनके सामने यह वर्णन वर्णित हो रहा था। इसी संतान के द्वारा जिन्होंने वो जो कि वहां पर जय राम भाटी में उपस्थित थे उसी समय राजा महाराज तो एकदम नीरव होकर के चुपचाप बैठे रहे यह समझ के देखिए कि मां की अपार करुणा और यही बाबूराम महाराज वहां पर उपस्थित थे। यही बोल रहे हैं कि करुणामई शांत मतलब यह मां यही मां वही इस तरह का जहर पचा सकती है। हम लोग तो इस तरह से कुछ भी नहीं कर पाएंगे। तो यह जो कहानी मुझे लगता है कि उसी के बारे में शायद बाबूराम महाराज ने यहां पर कहा होगा। मां सब कोले तुले नीचे जितने भी पापी तापी है सबको की मां जैसे कि अपने गोद में उठा लेती है अनंत शक्ति अपार करुणा जय मां आमा देर कथा की बोलची स्वयं ठाकुर के एटी को करते देखे छची तीनों कतो बाजिए बाछाई करे लोक नितन वही वो भी तो ठाकुर भी तो कितनी बाजिए बाछाई कोरे अर्थात कितनी बाजिए अर्थात कि देखिए अह जब कोई भी चीज आपको लेनी होती है बाजार में से तो अभी जैसे कि ये जैसे मट मटकी लेनी है तो मटकी को आप उसको आप उसके ऊपर में आप इस तरह से नॉकिंग करेंगे देखेंगे कि किस तरह की आवाज आ रही है तभी तो पता चलेगा कि यह मटकी जो है यह जो वो ठीक-ठीक है कि नहीं उसको बोलते हैं बाजना और बाछाई करें यानी कि अच्छे से सिलेलेक्ट करके सब्जी वगैरह आप खरीदने को जाते हैं तो जो वो जो जो लहरी वाला जो जो सब्जी हमको दे देगा सब्जी वाला वही तो हम नहीं लेंगे ना। हम तो देख के सब्जी लेंगे। यानी कि बाजिए बाछाई करें। अर्थात कि वह टकोरा मार करके और सिलेलेक्ट करके करके लोगों को लेते थे। ठाकुर भी कितने टकोरा मार करके और सिलेलेक्ट करके लोगों को लेते थे। आर एक खाने और यहां पे मार एकने की देखिश मां के यहां पे क्या देख रहे हो? अद्भुत अद्भुत शकल के आश्रय दी छे शकले द्रव्य खाजम होए जाे सबको आश्रय देती है सबका द्रव्य यानी कि जो जो कुछ भी नहीं लेकर के आता है मां को निवेदन करने के लिए सब खाती है और सब हजम हो जाता है। यह हमने स्वामी जी के बारे में देखा था। ठाकुर क्या करते थे? वह जो मारवाड़ी भक्त जिनका कि धन अशुद्ध था। वह यह किशमिश, काजू, बादाम वगैरह लेकर के आते थे। तो ठाकुर इनको किसी को खाने नहीं देते थे। बस एक नरन को खाने को देते थे। कहते थे इसके भीतर में ज्ञाना अग्नि है। इसके भीतर में जो डालेंगे सब हजम हो जाएगा। तो वैसे ही नरेंद्र के भीतर में स्वामी विवेकानंद के भीतर में जो ज्ञान अग्नि था उससे एक कोटि गुना ज्यादा ज्ञान अग्नि मां के भीतर में था। सबको आश्रय दे रही है। सबके द्रव्य खा रही है और सब हजम हो जाता है। मां मां जय मां। तो यह बाबूराम महाराज एक पत्र में लिखते हैं। आगे महाराज लिखते हैं गंभीरानंद जी
स्वामी विवेकानंद माँ शारदा के बारे में क्या कहते हैं
महाराज आर विश्वविजय आचार्य जो स्वामी विवेकानंदो लिखिया छिलेन और विश्वविजय आचार्य स्वामी विवेकानंद ने लिखा था दादा जानंत दुर्गा पूजा दिखाबो तबे अमार नाम दादा जीवंत दुर्गा पूजा दिखाऊंगा तब मेरा नाम विवेकानंद होगा देखिए वह जो वही बात कि बाबूराम महाराज की मां वहां पर दुर्गा पूजा कर रही है आठपुर में सबको निमंत्रण दिया है। यह बात सुनकर के स्वामी जी ने पत्र में लिखा है बाबू रामर माय बूढ़ो बो बुद्धि हानि होए छ बाबूराम महाराज की मां को बुढ़ापे में उनकी बुद्धि में हानि हुई है। बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। जान तो दुर्गा छेड़े माटी दुर्गा प्रतिमा पूजो कर छ जीवंत दुर्गा छोड़कर के मिट्टी की दुर्गा प्रतिमा की पूजा कर रही है। वो उसी संदर्भ में यह दो सेंटेंस यहां पर गंभीरानंद जी ने नहीं कोट किए किंतु इसके बाद के जो सेंटेंस है उसको कोट करके कहते हैं स्वामी जी लिखते हैं कि जीवंत दुर्गा पूजा दिखाऊंगा तब मेरा नाम स्वामी विवेकानंद यानी कि जीवंत मां शारदा देवी की पूजा करूंगा तब मेरा नाम कहीं होगा स्वामी विवेकानंद मेरा नाम सार्थक होगा देखिए कि जब बेलूर मठ में सर्वप्रथम पूजा हुई थी दुर्गा पूजा उस समय मां भी वहां पर उपस्थित थी और उसके बारे में वह एक बड़ी फनी स्टोरी भी हमने शायद मैंने कही थी कि वहां पे स्वामी जी जाकर के मां को कहते हैं कि मां मुझे बुखार कर दो जिससे कि मैं लेटा रहूं चुपचाप तो मां आश्चर्यचकित होकर कहती है कि अरे तुम ऐसी बात क्यों करते हो? मैं क्यों तुमको बुखार होने का आशीर्वाद दूं? तो फिर स्वामी जी कहते हैं कि तो यह लड़के जो है मठ के जितने साधु सन्यासी स्वामी जी के गुरु भाई प्राण पण मेहनत कर रहे हैं। प्राण जाए इस तरह की मेहनत कर रहे हैं। प्राण ढाल के मेहनत कर रहे हैं। किंतु क्या है कि मेरा स्वभाव है अभी बड़ा इंपेशेंट हो गया है। बात बातबात में मैं लोगों को डांटना शुरू कर देता हूं और हो सकता है कि मैं उनकी पिटाई भी कर दूं यदि मुझे कोई चीज अच्छी ना लगी तो यह मुझे भी बुरा लगेगा। बच्चों को भी बुरा लगेगा। इसलिए बेटर है कि मैं बुखार लेकर के पड़ा रहूं तो फिर यह बच्चे लोग ठीक-ठीक शांति से काम करेंगे। तो अभी मां ने उसके बारे में क्या कहा वो तो पता नहीं किंतु उसी दिन से स्वामी जी को बुखार हो गया। दुर्गा पूजा समाप्त हो गई। उस समय फिर मां जाकर के स्वामी जी को कहते हैं कि अरे नरेंद्र अब दुर्गा पूजा तो समाप्त हो गई है। अभी तुम खड़े हो जाओ। तो नरेंद्र ने मां की बात सुनकर के फटाक के खड़े हो गए। बुखार-बुखार सब फेंक दिया। कहा कि हां मां अभी मैं ठीक हो गया हूं। तो वह दुर्गा पूजा के समय मां को वहां मां वहां पर उपस्थित थी और देखिए कि साधु ब्रह्मचारियों के मन में यह बात बड़ी स्पष्ट थी कि जो दुर्गा प्रतिमा की वे लोग पूजा कर रहे हैं वही दुर्गा जीवंत होकर के मां शारदा के रूप में मठ में विद्यमान है। तो इसीलिए साधुओं की भक्ति मां के प्रति उतनी ही थी जितनी कि मां दुर्गा के प्रति। ये और स्वामी जी यह बात यदि कोई नहीं समझता तो ठीक-ठीक समझा भी देते। वही विज्ञान महाराज विज्ञानानंद जी महाराज वहां पे मां आई हुई है नीलांबर मुखर्जी गार्डन में मोस्ट प्रोबेबबली वहीं की यह घटना है। तो स्वामी जी ने कहा कि अरे पैशन वो तो पैशन करके बुलाते थे विज्ञान महाराज को तो जाओ मां आई है। तुम प्रणाम करके आए कि नहीं? तो विज्ञान महाराज उस समय विज्ञानानंद जी का क्या है? वो इंजीनियर थे ना एक टेक्निकल माइंडसेट था और बड़े ही इंट्रोवर्ट थे ईजीली लोगों के साथ में मिक्स नहीं होते थे तो उन्होंने सोचा अच्छा ठीक है वो अभी स्वामी जी कहते हैं तो मां को प्रणाम करके आते हैं बोल के मां को प्रणाम करने के लिए गए ऐसा खड़े-खड़े ही ना कि ऐसा आधा झुक करके ऐसा कुछ प्रणाम करके जैसे ही वो फटाफट प्रणाम करके वापस आ रहे थे देखा पीछे में स्वामी जी खड़े हैं स्वामी जी को पता था कि इसके मन में क्या भाव है इसलिए स्वामी जी पीछे पीछे गए और जैसे ही वह वापस आने के लिए उन्होंने पीछे कदम किया तो विज्ञान महाराज एकदम चौंक गए। पीछे में ही स्वामी जी खड़े हैं। तो स्वामी जी डांट के कहते हैं शेकी पेश साष्टांगो प्रणाम करो। यह क्या कर रहे हो पेश? मां को साष्टांग प्रणाम करो। तब कहीं जाकर के विज्ञानानंद जी महाराज ने मां को साष्टांग प्रणाम किया। तो इस तरह से स्वामी जी यह निवेदिता है। फिर यह ओलीबुल है। जोसेफाइन मैक्लाउड है। अपने खुद के गुरु भाई है। अपने शिष्य है। मठ के जितने साधु सन्यासी ये भक्त सबके सामने मां की महिमा का गुणगान गाते थे। तो यह जो मा स्वामी जी ने कहा कि मैं जीवंत दुर्गा की पूजा करके दिखाऊंगा तब मेरा नाम सार्थक होगा। वह जो स्वामी जी कहते हैं को रामः राम कौन है? सीता का चरित्र ही देखिए कि रामायण में सर्वश्रेष्ठ रूप से प्रज्वलित होकर के हमको दिखता है। तो यहां पे भी अभी यह स्वामी जी ने जो कहा, इसका यदि अर्थ घटन इस तरह से करें कि कौन है ठाकुर यह मां का पवित्रता मां की आध्यात्मिकता यही जैसे कि 100 साल की हमारी जो परंपरा है हमारे जो फाउंडेशनल डेज है रामकृष्ण संघ के सर्वश्रेष्ठ चरित्र यदि हमको देखना है तो वह मां शारदा का ही होगा। इसीलिए कहते हैं कि जीवंत दुर्गा पूजा दिखाऊंगा तब मेरा नाम सार्थक होगा। माय कथा मने पढ़ले समयसमय बोली को रामः मां की बात मन में आते ही समय-समय लगता है कि राम कौन थे दादा ओई जे बोलची उखाने अमर गोंडामी दादा यह जो मैं कह रहा हूं यही है मेरी गोंडामी यानी कि रूढ़ चुस्तता या तो फिर कहेंगे फेनेटिसिज्म देखिए स्वामी जी के साथ में फनेटिसिज्म शब्द ऐड करना थोड़ा सा विचित्र लगता है क्योंकि स्वामी जी के जितना उदार हृदय और कौन हो सकता है? किंतु यहां पर स्वामी जी कहते हैं कि देखिए मेरा यदि फनेटिसिज्म है मुझ में तो एक ही जगह पर है और वह है श्री मां को लेकर के रामकृष्ण परमहंसो ईश्वर छिलेन कि मानुष छिलेन जा होए बोलो दादा रामकृष्ण परमहंस ईश्वर थे कि मनुष्य थे जो बोलना हो बोल दो जो कहना हो वह कह दो किंतु जार माय ऊपर भक्ति नहीं ताके धिक्कार दियो किंतु जिसकी मां के ऊपर में भक्ति भक्ति नहीं है। उसको धिक्कार दो। देखिए यह कितना बड़ा स्टेटमेंट कि स्वामी जी ने देखिए स्ट्रेंजली दक्षिणेश्वर में जब स्वामी जी जाते थे तो उन्होंने तो अपनी शिक्षा दीक्षा जो भी अनुभूति है सभी उन्होंने भगवान रामकृष्ण के पास में से ही तो ग्रहण किया। श्री रामकृष्ण ही तो थे। उनके गुरु, उनके मार्गदर्शक सभी कुछ मां के साथ में स्वामी जी का कोई वार्तालाप हुआ है दक्षिणेश्वर में बड़ा ही रेयरली कभी कोई देखने को मिलेगा। मुझे तो याद नहीं आ रहा है। वही था कि एक बार ठाकुर ने स्वामी जी को पूछा कि अच्छा कैसा खाना खाया? यानी कि जब स्वामी जी आते थे तो मां उनके लिए खाना पकाती थी। तो एक बार ठाकुर ने स्वामी जी को पूछा खाना खाने के बाद में कि तुमको कैसा लगा खाना? तो स्वामी जी कहते बहुत अच्छा लगा जेमन रोगीर पथो जिस तरह से कि रोगी का पथ्य हो रोगी का डाइट हो उस तरह से मुझे खाना लगा तब कहीं जाकर के ठाकुर मां को कहती है कहते हैं कि अरे वो जब नरन आता है तो मोटा-मोटा रोटी और चने का दाल उसकी दाल बनाना वो चने का ना कि मटर का मैं भूल गया एक्सैक्टली किंतु इसकी गाढ़ी-गाढ़ी दाल बनाना तब वो नरेंद्र ठीक से खाएगा तब फिर जब भी नरेंद्र आता था तो उसी तरह से मां उनके लिए खाना पकाती थी तो इस तरह तरह के एक दो वर्णन है। किंतु इसके अलावा ऐसा तो मुझे बहुत ज्यादा कहीं पर दिखा नहीं है कि स्वामी जी मां के साथ में कोई वार्तालाप करते हैं या तो फिर मां के पास में से कोई शिक्षा ग्रहण करते हैं। बस जो भी इंटरेक्शन यदि हुआ होगा वो वही आखिरी आखिरी दिनों में काशीपुर में हुआ होगा। उसके बाद में तो फिर मां तीर्थ यात्रा के लिए चली गई। स्वामी जी रह गए वराह नगर मठ में और फिर स्वामी जी आखिर में तो निकल ही गए अपनी प्रवृजजा के लिए। बस वही एक वर्णन है कि प्रवरज्या के लिए
कहानी: प्रव्रज्या प्रारम्भ करने से पहले स्वामी विवेकानन्द माँ सारदा का आशीर्वाद प्राप्त करते है
निकलने से पहले अखंडानंद जी और स्वामी जी दोनों मां का दर्शन करने के लिए मां के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गए थे। उस समय मां कोलकाता में थी। घुसुड़ी बोलकर के एक जगह है। वहां पे एक भाड़ा एक भाड़ा की भाड़े ली हुई एक घर में रह रही थी। तो वहां पे जाकर के स्वामी जी ने प्रणाम किया। कहा कि मां इस तरह से मैं प्रवरज्या के लिए निकल रहा हूं। बस अभी ठीक कर लिया है कि यदि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं होगा या तो फिर जीवन का लक्ष्य पूर्ति नहीं होगा जब तक तब तक मैं वापस नहीं आऊंगा। तो मां ने जी भर के आशीर्वाद तो दिया किंतु साथ में अखंडानंद जी को एक बड़ा ही सिग्निफिकेंट स्टेटमेंट दिया। क्या कहा कि मैं अपना सर्वस्व तुम्हारे हाथों में अर्पण कर रही हूं। देखो कि स्वामी जी को नरेंद्र को किसी भी तरह का कष्ट ना हो। क्यों कहा ऐसा अखंडानंद जी को गंगाधर महाराज को? क्योंकि अखंडानंद जी उन्होंने सबसे पहले वराह नगर मठ छोड़कर के प्रवरज्या उन्होंने ही की थी और यह हिमालय वगैरह बहुत घूम कर के वो वापस आए थे बेलूर मठ में इसलिए एक्चुअली वो वहीं पर थे वो हिमालय वगैरह में ही थे और उनका प्लान ऐसा था कि तिबेट तो घूम लिया अभी सेंट्रल एशिया घूमना है वहां का भ्रमण करना है तो यह सब प्लान ले बैठे थे तो स्वामी जी ने उनको पत्र लिखा कि देखो मेरी भी इच्छा है कि मैं बीबी नॉर्थ इंडिया यह हिमालय वगैरह का भ्रमण करूं तो तुम वापस आ जाओ। तुमने तो वहां पर बहुत कुछ देखा है। तुम मुझे गाइड करना। तो स्वामी जी के पत्र को पढ़कर के गंगाधर महाराज वापस आए थे। और जब स्वामी जी जब मां को प्रणाम करने के लिए गए तो मां को पता था कि गंगाधर महाराज को स्वामी जी ने इसलिए वापस बुलाया है उनको ऑलरेडी पता है कि हिमालय में कहां पर भिक्षा मिलती है। कहां पर क्लाइमेट को कैसे मैनेज करना है वगैरह-वगैरह काफी भ्रमण करके सब देख लिया है। इसलिए मां ने उनको यह बात कही कि मैं अपना सर्वस्व तुम्हारे हाथ में देती हूं। सर्वस्व क्या वो नरन नरन उनका संतान वही मां का सर्वस्व था। तो मैं मेरा सर्वस्व तुम्हारे हाथ में देखती हूं। देखो नरेंद्र की अच्छे से संभाल रखना। उसको भिक्षा का कष्ट ना हो, रहने खाने का कष्ट ना हो वो देखना। तब कहीं जाकर के अखंडानंद जी महाराज ने मां को प्रॉमिस किया था कि मां मैं नरेंद्र की अच्छे से वो मैं यह करूंगा। ठीक-ठीक उनको गाइड करूंगा। खाने पीने का कष्ट नहीं होने दूंगा। तब कहीं जाकर के मां ने दोनों को आशीर्वाद दिया था। तो वो एक घटना है और इसके बाद में कि स्वामी जी जब अमेरिका जा रहे थे उसके पहले उन्होंने मां को पत्र लिख के मां के आशीर्वाद मांगे थे और मां ने यह आशीर्वाद दिए थे। तो जो कुछ-कुछ घटनाएं हैं कि वो वो फिर वो जो स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए मां को प्रणाम करने के लिए गए वो क्या था कश्मीर से एक्चुअली वापस आए थे और मां को प्रणाम करते-करते कह रहे हैं कि देखिए मां यह ठाकुर भाकुर कुछ नहीं है। मैं वहां पर कश्मीर गया था। एक तांत्रिक के चेला मेरे पास में आता था तो तांत्रिक नाराज हो गया। पता नहीं उसने मेरे पर कौन सा जादू टोना किया। आमी हाकते हाकते पा लिए एलाम अर्थात कि शोच करते-करते मुझे भाग करके आना पड़ा। डायरिया वगैरह कुछ हो गया होगा स्वामी जी को। तो स्वामी जी इस तरह की कंप्लेन करते हैं। तब मां स्वामी जी को क्या कहती हैं? बाशा शक्ति मानते हो। फिर ठाकुर तो भांगते ऐसे नहीं गढ़ते ऐसे छ शक्ति माननी होगी और ठाकुर यह सब जो पुरानी प्रथाएं जादू टोना ये सब को तोड़ने के लिए नहीं आए थे नए विश्व का निर्माण करने के लिए आए थे तो यह कुछ-कुछ इंटरेक्शन है स्वामी जी के मां के साथ में किंतु यह देखकर के हमको आश्चर्य होता है कि ये मौन वार्तालाप या तो निरव ये जो वो होगा जो जो कहते हैं ना गुरु तरु मुरवर तले गुरुर युवा वृद्ध शिष्या गुरुस्तु मौन व्याख्यानम शिष्यस्तु छिन्न संशया अर्थात कि यह वृक्ष के नीचे में युवा गुरु वृद्ध शिष्य बैठा है और जब गुरु मौन वार्तालाप करते हैं मौन व्याख्यान करते हैं और शिष्य के सभी संशय छिन्न हो जाते हैं। वही यहां पर पूरा हम यह 100 साल का हिस्ट्री पढ़ेंगे देखेंगे। मां और स्वामी जी के बीच में यही मौन वार्तालाप होता था। मौन व्याख्यान मां देती थी और स्वामी जी के जितने भी संशय है सब छिन्न हो जाते थे। इसीलिए यहां पे वह स्वामी जी इतना बड़ा स्टेटमेंट देते हैं। कहते हैं राम कृष्ण परमहंसो ईश्वर छिलेन कि मानुष छिलेन जा होए बोलो दादा किंतु जार माय ऊपर भक्ति नहीं ताके धिक्कार दियो रामकृष्ण परमहंस मनुष्य थे कि ईश्वर थे जो कहना है वह कहो किंतु जिसकी मां के ऊपर में भक्ति नहीं है उसको धिक्कार दो ये मां और स्वामी जी के बीच का यह संबंध ए शकल मूल्य कथा
स्वामी गम्भीरानन्द की माँ सारदा के प्रति भक्ति
पढ़ते पढ़ते चौकीते लेखनी रुद्ध होइया किया जाए मने भय आशे अभी गंभीरानंद जी महाराज अपने बारे में क्या कहते देखिए बाबूराम महाराज ने जो कहा मां के बारे में स्वामी जी ने जो कहा मां के बारे में अभी गंभीरानंद जी महाराज अपना खुद का वो जो कथामृत पढ़ेंगे ना वो लिखते हैं मास्टर महाशय बीच-बीच में सेवक हृदय अर्थात कि सेवक हृदय में तो इसी तरह से यह महाराज जी कभी-कभी इस तरह से लिखते हैं। गंभीरानंद जी महाराज अपना जो खुद का जो वक्तव्य है इस तरह से वह कहते हैं। कि ए शकल अमूल्य कथा पढ़ते पढ़ते चौकीते लेखनी रुद्ध होया जाए मने भय आशे यह सब अमूल्य कथा पढ़तेपढ़ते चकित होकर के लेखनी यानी कि लेखनी रुक जाती है वृद्ध हो जाती है मन में भय होता है एक ही असाध्य साधने अग्रशोल कोरिले मां यह किस असाध्य साधन करने के लिए मां तुमने मुझे नियुक्त युक्त किया है। तुमने मुझे आगे किया है। असाध्य साधन असाध्य साधन अर्थात कि कोई भी कार्य करना और सामने असाध्य रूपी एडजेक्टिव इस तरह का कार्य जिसको साधित करना असंभव है। माय चरित्रांकन की आमादे मतो अकृति भक्त श्रद्धायतो क्या मां के चरित्र का अंकन करना चरित्रांकन मां के चरित्र का लेखन करनांकन करना क्या हमारी तरह हमारे तरह अकृति भक्त इस तरह का भक्त जो कि इस कार्य करने को लायक नहीं है क्या उसके साध्या है क्या उसके बस की बात है तथापि ताहारे श्री पादो पदो स्मरण कर या आरबद्ध कारजो समाप्त करा भिन्नो गत्यांतर नाय इसके बावजूद उन्हीं ही के पाद पद्म को स्मरण करके आरंभ किया हुआ कार्य समाप्त करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। यह जब बाबूराम महाराज मां के बारे में इस तरह से कहते हैं, जब स्वामी जी मां के बारे में यह कहते हैं तो फिर यह गंभीरानंद जी महाराज खुद कहते हैं कि इस तरह का असाध्य कार्य यह कार्य करने के लिए मां तुमने मुझे नियुक्त किया है तो क्या यह मेरे बस की बात है कि मैं इसको कर पाऊंगा किंतु फिर भी कहते हैं ताई श्री पादो पदो स्मरण करिया उन्हीं के श्री पाद पद्म को स्मरण करके प्रारंभ किया हुआ कार्य समाप्त करने के अलावा हमारे पास में और कोई उपाय नहीं है। इसके बाद का पैराग्राफ थोड़ा लंबा है। इसको अभी हम कल देखेंगे। आज यही ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु।
प्रश्न: यह आश्चर्य की बात है कि स्वामी विवेकानंद ने बिना किसी प्रश्न के मा शारदा को स्वीकार कर लिया था। उन्होंने जीवन के अंत तक ठाकुर की परीक्षा ली थी।
एक्चुअली जब आप इन तीनों का लाइफ एक साथ में स्टडी करेंगे ना तब ये सब कुछ मिस्ट्रीज हमारी नजर के सामने आना शुरू होगी कि हां कि इस तरह से क्योंकि यदि सिर्फ स्वामी जी को अकेले स्टडी करेंगे या तो फिर मां को अकेले स्टडी करेंगे तो बहुत सारी चीजें ना जो कि कंट्रास्ट है या तो फिर पैराडॉक्स है या तो फिर यह टर्निंग पॉइंट है वह नजर के सामने से चले जाते हैं। एक आश्चर्य की बात मैं बताऊं कि गंभीरानंद जी का मां का जीवन आप पढ़ेंगे तो स्वामी जी जो भारत में आए उससे जो मां का जीवन जो संपूर्ण रूप से जो एक परफ एक परिवर्तित हुआ वो इतना स्पष्ट रूप से नहीं दिखता है। हालांकि वो माने मां की जो को जो एक के बाद एक घटनावली जो है घटनावली पढ़ के पता चल जाता है कि मां जब आती है बेलूर मठ में उस समय या तो फिर कोलकाता तो फिर अभी तो पूरा एक संघ है एक कॉरपोरेट बॉडी है मां को हेल्प करने के लिए उससे पहले मां जब आती थी तो कहीं वह भाड़े के घर में रहती थी कहां पे रहती थी यही एक दो ठाकुर के संतान है उनकी सेवा करने के लिए रहते थे तो वो एक इंडिविजुअलिस्टिक फैमिली लेवल पर लगता था कि हां सब लोग मां की सेवा कर रहे हैं। किंतु एक फैमिली और एक कॉरपोरेशन ये दोनों में तो डिफरेंस है ना। वेनने एक पूरा एक कॉरपोरेशन एक कॉर्पोरेट बॉडी रामकृष्ण संघ वो जब मां की सेवा करता है तो उसकी क्वालिटी अलग हो जाती है। भक्तों को किस तरह से मैनेज करना किस तरह से भक्तों माने एक पूरा एक सिस्टम अलग हो जाता है। तो वो जो एक सी चेंज एक एक बहुत बड़ा चेंज जो मां के जीवन में आया है इसके बारे में गंभीरानंद जी ने इतना डिस्कस नहीं किया है जितना कि मुझे लगता है कि उनको करना चाहिए और यही गंभीरानंद जी है कि जिन्होंने स्वामी जी का भी लाइफ लिखा है। यानी कि ही इज वेरी वेल अवेयर कि स्वामी जी के भारत में आने से भारतवर्ष में भारत में कितना बड़ा परिवर्तन आया है। तो इस घटना का मां के जीवन के साथ में क्या एक हुआ कनेक्शन वो नहीं दिखता है मुझे। सो दैट इज समथिंग टू थिंक ऑफ। ये
प्रश्न: ठाकुर के पांच ईश्वरकोटि शिष्य थे। उन्होंने सबसे पहले मां शारदा को स्वीकार किया था।
बड़ा इंटरेस्टिंग थॉट है। मैंने इस तरह से कभी नहीं सोचा था कि ठाकुर के ईश्वर कोटि भक्त हैं। उन्होंने मां को सबसे पहले पहचाना। इट्स अ वेरी इंटरेस्टिंग थॉट। इसको इन्वेस्टिगेशन करना चाहिए और एक्चुअली छह ईश्वर कोटि भक्त थे। पूर्ण चंद्र को आपने छोड़ दिया और देखिए कि पूर्ण के साथ में मां का इंटरेक्शन बड़ा ही इंटरेस्टिंग है कि जब पूर्ण दक्षिणेश्वर आया था तब ठाकुर ही उसको मां के पास में ले गए थे और कहा था कि किस तरह से बाल गोपाल रूप में पूर्ण की पूर्ण को आहार करवाना है। उसको माने उसको बिठा करके किस तरह से उसको प्रेम करना है। और यही बात देखिए कि गंभीरानंद जी महाराज स्वयं लिखते हैं। उस दिन मां ने बाल गोपाल ये जो भक्त संतान के भीतर में बाल गोपाल का दर्शन करना सीखा। ये गंभीरानंद जी महाराज का स्टेटमेंट है और बाद में भी जब पूर्ण को ठाकुर ने कहा था कि पूर्ण जो है संसार में नहीं रहेगा। उसका विवाह मत देना। तो पूर्ण की मां ने जोर जबरदस्ती विवाह करवा दिया इस डर से कि यदि वह सन्यासी हो जाए तो घर छोड़कर चला जाएगा। अभी किंतु अभी पूर्ण का विवाह हुआ। पूर्ण बीमार हो गया और उसका मृत्यु समय नजदीक आ गया है। तो पूर्ण की मां बार-बार मां शारदा देवी उस समय कोलकाता थी तो उनके पास में जाकर के रोती थी। कहती थी मेरे बच्चे को ठीक कर दो। अभी मां इतनी नाराज हो गई थी उसकी पूर्ण की मां के ऊपर में। जब भी वह आती थी वह दूर से मां देखती थी तो कहती थी नाराजगी भरे स्वर में कि देखो वह आ रही है। और फिर कहती थी कि ठाकुर ने मना किया था फिर भी बच्चे की शादी करवाई। तो देखिए कि उन्हें सिर्फ पांच नहीं छह ईश्वर कोटि भक्त इट्स अ वेरी गुड आईडिया कि सभी लोग मां की महिमा को पहले से ही पहचान पाए
प्रश्न: माँ सारदा असाधारण रूप से साधारण हैं। वह हमें बौद्धिक रूप से समझाने की बजाय हमारे ह्रदय को वशीभूत कर लेती है।
थे। ये शिवानी ने लिखा है कि वो ग्रुप में कुछ शेयर कर सकते हैं कि नहीं? हां कर सकते हो। इट्स अ वेरी गुड आईडिया। अच्छा अभी ये मां के बारे में देखिए कि ऐसा नहीं है कि मां की इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी नहीं थी। वेरी सरप्राइजिंगली मां के ही एक त्यागी संतान एक रेमिनेशंस में लिखते हैं कि कोलकाता से बड़े-बड़े भक्त मां को प्रणाम करने के लिए मां की मां के पास में से दीक्षा लेने के लिए मां के पास में जीवन का समाधान प्राप्त करने के लिए आते हैं। तो वो आते हैं तो यह महाराज जी डर जाते हैं। सोचते हैं कि अरे इतने पढ़े लिखे लोग हैं। इतने एजुकेटेड है। इतने ऑफिसर लेवल के सब लोग हैं। मां तो सरला पल्ली बाला है। माने सरला गांव की लड़की है। स्त्री है। तो उनके पास में से यह सब सीखने के लिए क्यों आते हैं? तो किंतु महाराज जी खुद लिखते हैं कि जब मां उनके संदेह का प्रश्नों का जब समाधान करती है तो वही लोग खुश-ख होकर के चले जाते हैं। सो व्हिच इज अ ग्रेट सरप्राइजिंग थिंग। अदरवाइज महाराज कहते हैं कि आप जाइए ना कोलकाता जाइए ना वहां पे महापुरुष महाराज हैं, शरद महाराज हैं, राजा महाराज है। उनके पास में जाकर के इतने बड़े-बड़े प्रश्न पूछिए। मां को क्यों पूछते हैं? किंतु इनवेरिएबली हमेशा ऐसा देखा है कि मां जो प्रश्न का उत्तर देगी उससे संतुष्ट होकर के यह सब लोग जाते हैं। सो दैट इज वेरी इंटरेस्टिंग थिंग के बौद्धिक शक्ति भी मां में उतनी थी। बस वही बात है कि किंतु जो एक मेन चीज है कि अब जैसे कि साइंटिस्ट लोग कहते हैं ना कि ब्रेन के दो पार्ट होते हैं। अभी ये सब प्रूवन साइंस नहीं है। ये सब हवाहवाई बातें हैं। किंतु फिर भी चलती है कि जो हाफ ब्रेन है जो लेफ्ट ना कि राइट में वो वाला भूल गया। किंतु जो आधा ब्रेन है वह एनालिटिकल ब्रेन है और जो बाकी का आधा ब्रेन है क्रिएटिव इमोशनल ब्रेन है। तो वह ठाकुर और स्वामी जी एक तरह से अपना जो एनालिटिकल ब्रेन है उसको अपील करते हैं और मां जो है वो अपना जो सेंटीमेंटल इमोशनल ब्रेन है उसको अपील करती है। इसलिए वो डायरेक्ट अपने हृदय तक जा पाती है।
प्रश्न: जब हम स्वामी और माँ की अलग-अलग जीवनी पढ़ते हैं, तो हम यह नहीं समझ पाते कि उनका एक-दूसरे पर क्या प्रभाव पड़ता है।
और बाहर से ऐसा लगता है कि जैसे मां जय राम बाटी में है स्वामी जी अमेरिका में है। बट वी हैव टू अंडरस्टैंड कि इनका लाइफ इतना इंटरवाइन है कि बोथ आर अफेक्टिंग ईच अदर। मां के देखिए सरप्राइजिंगली ये सब जो इंसिडेंट है मां के जीवन में ना प्रॉपर्ली रिकॉर्डेड नहीं है। वरना वराह नगर मठ में क्या हुआ था वो हमको पता है कि एक दिन एकाएक देखा कि मास्टर महाशय एक न्यूज़ पेपर लेकर के आए हैं मठ में और सबको दिखा रहे हैं कि देखिए देखिए यह विवेकानंद बोलकर के किसी ने विश्वधर्म सम्मेलन में बड़ा भाषण दिया है। बड़ा फेमस हो गया है। तो सभी लोग सोचते हैं स्पेकुलेट करते हैं ये नरन ही होना चाहिए। तो वो जो पहलाप न्यूज़ आया था वरा नगर मठ में उसके बारे में हमको पता है। किंतु मां उस समय कहां थी? मां के पास में न्यूज़ आया होगा तो मां ने क्या रिएक्ट किया होगा? क्या कहा होगा? मुझे पढ़ने में नहीं आया कभी। या तो फिर उस समय उसको इतना इंपॉर्टेंट माना नहीं जाता होगा। यह यह 18 लोगों का लाइफ को एक साथ में स्टडी करेंगे ना देन वह आपको एक बिल्कुल ही नया एक दृश्य मिलेगा क्योंकि किसी का लाइफ आइसोलेटेड नहीं है। सभी का लाइफ एक दूसरे के साथ में इंटरनइन है। सभी का लाइफ एक दूसरे को इंपैक्ट कर रहा है। बट हाउ दैट इंपैक्ट हैपंस? यह मैंने इतना प्रॉपर एनालिसिस या डिटेल एनालिसिस अभी तक नहीं पढ़ा है। इंडिविजुअल बहुत सारे लोगों का लाइफ लिखा गया है। किंतु एक ओवरऑल एक लाइफ कि सभी एलिमेंट सभी इंटरेक्शन को वहां पर स्थान दिया जाए। उसका प्रॉपर उसका प्लेस में उसको एनालिस एनालाइज किया जाए। मैंने उस तरह से पढ़ा नहीं है अभी तक।