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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

प्राणों की पुकार || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 20 Dec 2024

Invocation

ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री रामकृष्ण संघ जो हमारी भावधारानी 18864 होता है तो हमारी जो हिस्ट्री कही जाएगी वह कौन सी है ठाकुर की भूमि पर अवतरण होने से प्रारंभ होकर के इस 18 1938 में रामकृष्ण श्री राम कृष्ण देव के मुख्य मंदिर बेलूर मठ में उसका कंसेक्रेट हुआ तो यह नियर 102 इयर्स जो है

Belur Math Main Temple

नियर 100 इयर्स यह अपनी ऑथेंटिक हिस्ट्री है जबकि इस समय वह घटनाएं घटी थी जिस घटनाओं के दौरान हम आज निश्चय करते हैं और सिर्फ आज ही नहीं आने वाले 1500 साल 2000 साल तक अपना संघ जो चलता रहेगा तो कौन से आदर्श पर चलेगा कौन सी घटनाओं को मान्य गिना जाएगा कौन सी घटनाओं कौन से उपदेश और किन व्यक्तियों को ऑथेंटिक गिना जाएगा सबसे ज्यादा जिससे कि हम अपने भविष्य में अपनी रोहर को बजाए रखें तो वह 100 इयर्स का यह हिस्ट्री है इसी हिस्ट्री में से ही हमको जो भी उपदेश प्राप्त करने हैं जो घटनाएं जो कि हमारे जीवन पथ को परिचालित करेगी उन घटनाओं का जद हमको चाहिए हमको पढ़ना है सुनना है तो इसी 100 इयर्स में से ही उसको ग्रहण करेंगे उसमें भी हमने डिस्कस किया था कि यह जो नियर 100 इयर्स की जो हिस्ट्री है अपनी उसमें भी एक सुवर्ण युग है वह सुवर्ण युग कौन सा है कौन सा समय जबकि सबसे ज्यादा आनंद बहा है सबसे ज्यादा जैसे कि भगवत भाव का मुहूर मुह आविर्भाव हुआ है सबसे आनंदमय वह समय जब जहां पर यदि हमको टाइम मशीन दे दिया जाए और हम कहेंगे कि मुझे इस समय जाना है इस टाइम पीरियड में मुझे जाना है भूतकाल में जहां पर जाकर के मैं सबसे ज्यादा आध्यात्मिक दिव्य आनंद और शांति प्राप्त कर पाऊंगा तो वह समय है वही समय कि श्री मां शारदा देवी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ और वहां से लेकर के ठाकुर को कैंसर हुआ तो यह जो मां का आगमन हुआ अ 18725 के अंत में ठाकुर के गले का रोग जो है उसका प्रादुर्भाव हुआ ठाकुर को गले में धीरे-धीरे करके वेदना दर्द होने लगा तो ये ऑलमोस्ट 13 ईयर है 12 साल ऑलमोस्ट जो कि हमारे संघ का सुवर्ण युग है इस सुवर्ण युग में देखिए कि मां है दक्षिणेश्वर में ठाकुर है और धीरे-धीरे करके सर्वप्रथम यह केशव सेन से प्रारंभ करके एक के बाद एक अंतरंग शिष्य ठाकुर के पास में आते गए वह चाहे सन्यासी हो ना कि चाहे गृही हो तो इन शिष्यों को लेकर के ठाकुर जिस तरह से आनंद की हाट बिठाई थी ठाकुर ने दक्षिणेश्वर में वो है हमारा हमारा सुवर्ण युग तो अभी जो मां का जीवन हम पढ़ रहे हैं उसमें हमने इस सुवर्ण युग की बहुत ही सुंदर संक्षिप्त में आलोचना की यदि देखा जाए तो 12 साल में इतनी सारी घटनाएं हैं किंतु गंभीरानंद जी को तो एक लिमिटेड टाइम में पुस्तक समाप्त करनी है तो फिर उसमें से जो सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाएं जिसमें से हम सबसे ज्यादा से ज्यादा सीख भी प्राप्त कर सके और हमको आध्यात्मिक आनंद भी आए इस तरह की कुछ घटनाओं को सिलेक्ट करके गंभीरानंद जी महाराज ने यह प्राण टान अर्थात कि प्राणों की पुकार अंतरात्मा का आह्वान ये चैप्टर की रचना की थी और इस चैप्टर में हमने देखा कि कितने सुंदर एक के बाद एक प्रसंग है किंतु जैसे होता है कि ये सुवर्ण युग का भी जैसे यह काल का जो चक्र है ये काल का चक्र तो बहता ही जाता है कोई भी एक समय वह स्थिर होकर के तो रहता नहीं है हम लोग क्या काल को यह कह पाएंगे कि हां मिथिला में भगवान राम और मां जानकी थी उस समय को हमेशा के लिए फ्रिज करके रख दीजिए वह जो राम राज्य था उसी रामराज्य को हमेशा चलते रहने दीजिए जैसे सब चीजों के साथ में होता है यह सुवर्ण युग का भी अभी अंत आना शुरू हुआ है इस सूरज भी हमारा श्री रामकृष्ण के जीवन का अस्ताचल की ओर जाना शुरू हुआ है किंतु देखिए कि हमने जैसे देखा कि सुवर्ण युग का प्रारंभ हुआ था मां शारदा के दक्षिणेश्वर के आगमन के साथ में ही किंतु मोर स्पेसिफिकली ठाकुर ने जब मां की सड़सी के रूप में पूजा की थी उस दिन से तो यहां पर भी देखिए और वो जो शोशी पूजा का जो हमने बड़े ही विस्तृत रूप से बड़े ही सुंदर रूप से उसका जैसे गंभीरानंद जी महाराज ने आलोचना की है हमने भी उसके ऊपर में काफी चिंतन किया था तो अभी यह सुवर्ण युग की जो अंतिम घटना है उस अंतिम घटना के बारे में भी हम थोड़ा सा विस्तृत रूप से देखेंगे और देखिए कि यह जो युग प्रवर्तन कारी घटनाएं होती है उसके बहुत सारे लेयर्स होते हैं एक के बाद एक इस तरह के स्तर होते हैं इस तरह की इसके भीतर में टीचिंग्स यानी कि देशों का इतना सारा डेप्थ रहता है कि हम जब पहली बार पढ़ेंगे तो पहली बार हमको इतना समझ में नहीं आएगा दूसरी बार पढ़ेंगे तीसरी बार पढ़ेंगे तब हमको पता चलता जाएगा कि इस उपदेशों में कितना र गभीर है कितना कितनी गंभीरता है कितना इसके भीतर में डेप्थ है तो ऐसा ही एक प्रसंग अभी आज हम आलोचना करेंगे अच्छा हमको पता है कि सुवर्ण युग का अंत आया ठाकुर को गले में जब कैंसर हो गया था उस दिन से मैंने ठाकुर को जैसे-जैसे अभी गले में दर्द बढ़ता गया वैसे-वैसे ही ठाकुर का मन भी जैसे ठाकुर के मन में एक था ना कि भक्ति भक्त को लेकर के रहना है तो यह भक्ति भक्त को लेकर के रहने की वासना तो वैसे मिटना लगी मिटने लगी उनकी किंतु लोगों को आशीर्वाद देने की वासना जो है या तो फिर लोगों को आशीर्वाद देने का जो उनके भीतर में सामर्थ्य है वो कम नहीं हुआ था क्योंकि हमने काशीपुर में ही देखा कि ठाकुर का आखिरी समय चल रहा है जनवरी महीने में फर्स्ट जनवारी को उस समय भी ठाकुर सबको स्पर्श करके कह रहे हैं कि तो मादर चैतन्य होक तुम लोगों को चैतन्य प्राप्ति हो तो वह तो हमने देखा किंतु जो एक पहले सब जगह पर जाकर के कलकाता में भक्तो के घर जाकर के उनके घर पर रहना उन सब भक्तों को निमंत्रण देकर के उत्सव करना वो जो एक था उनका वह धीरे-धीरे अभी अंतर्मुखी के दिनों में ठाकुर को ज्यादा गर्मी लगना शुरू हो गया था अभी जैसे कि हमको तो पता है कि ठाकुर साधना करते-करते ठाकुर का देह जो है बड़ा ही अवसन होने लगा था उनके देह में दुर्बलता आना शुरू हो गई थी छोटे-छोटे कार्य में ही वह बड़े थक जाते थे बहुत ज्यादा दूर तक चल भी नहीं पाते थे हालांकि यही ठाकुर है जब नृत्य कीर्तन करेंगे तो सिंह विक्रम से नृत्य करेंगे यह वर्णन भी उनको पढ़ने में आएगा तो जब दिव्य भाव का आविर्भव होता है दिव्य भाव का जब उनके ऊपर में आवेश होता है तो वोह एक ठाकुर किंतु अभी जैसे अन्य समय है जब सामान्य भूमि में वो रहते हैं तब वो एक दूसरे ठाकुर तो तो देखिए कि जब यह सामान्य भूमि पर रह रहे थे उस समय में अर्थात कि जब नॉर्मल भाव में रहते हैं नॉर्मल लेयर ऑफ कॉन्शसनेस पर रहते हैं उस समय 1885 के ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के दिनों में ठाकुर को विशेष रूप से कष्ट होने लगा था इसको देख कर के पहले पहले किसी ने ठाकुर को बर्फ लाकर के दिया कि ठाकुर यदि बर्फ के पानी का पान करते हैं तो उनको शायद इस गर्मी से थोड़ा सा राहत मिलेगी तो ठाकुर ने यह बर्फ वाला पानी पिया तो बिल्कुल बालक की तरह ठाकुर तो सामान्य अवस्था में बालक वत हो जाते थे जब वह दिव्य भाव में आते थे तो वह सीधे वो जगत गुरु हो जाते थे तब यदि कोई किसी को यह नौटंकी करते देखते या धर्म के नाम पर किसी को मूर्ख बनाते देखते तो इमीडिएट ठाकुर उसको डांटना शुरू कर देते थे तो वो किंतु दिव्य भाव में वो जो जगत शिक्षक विश्व गुरु की जो भूमिका थी उनकी वो थी दिव्य भाव में सामान्य भाव में ठाकुर बिल्कुल बच्चे की तरह रहते थे तो यह बचपन में आकर के ही उन्होंने देखा एक बार कि हां यह बर्फ वाला ठंडा पानी पीना अच्छा लगता है तो उन्होंने अभी अभी ठाकुर तो जो अनुभव करेंगे सीधा बोल भी देंगे और भक्तों ने भी देखा कि ठाकुर कहते हैं कि उनको ऐसा ठंडा पानी पीना अच्छा लगता है तो कलकत्ता से बहुत सारे डिवोटा जब क दक्षिणेश्वर आते थे तो इस तरह से बर्फ लेकर के आते थे और ठाकुर भी इस तरह से बर्फ वाला पानी बार-बार पीते थे उसी के दरमियान ही धीरे-धीरे करके सर्वप्रथम उनको गले में दर्द होना शुरू हुआ सर्वप्रथम तो सबने सोचा कि हां यह बारबार ठंडा पानी पी रहे हैं इसलिए शायद ऐसा हुआ होगा और ठाकुर को अनुरोध किया गया कि यह बर्फ वाला पानी अभी आप मत पीजिए किंतु यह दर्द जो है उसका तो उपशम नहीं हो रहा था वो कम नहीं हो रहा था तो क्या किया जाए तो फिर धीरे-धीरे करके एक के बाद एक कविराज है डॉक्टर है उन सबको ठाकुर के पास में लाया गया किसी ने निदान किया डायग्नोज किया कि क्लर्जीमैन सोर थ्रोट अर्थात कि यह जो क्लर्जीमैन होते हैं धार्मिक शिक्षक उनको बहुत ज्यादा बातें करनी पड़ती है उपदेश देने पड़ते हैं उनको क्लासेस कंडक्ट करने पड़ते हैं तो इसकी वजह से उनके गले में दर्द होना शुरू होता है उनका गला उन का थ्रोट जो है सोर हो जाता है वो मने थोड़ा सा इंफ्लेमेशन जैसा होता है तो ठाकुर भी पूरा दिन भर भक्तों के साथ में बातें करते हैं कभी-कभी भजन गाते हैं तो घंटों के घंटों चलता रहता है तो और फिर समाधि में चले जाते हैं तो ये जो सब मिलकर के ठाकुर को यह गले में इ इंफ्लेमेशन ज जैसा कुछ हुआ है और ठाकुर को कुछ औषध दिया गया गले प लगाने के लिए एक लेप दिया गया बाम जैसा कुछ और और फिर ठाकुर को कहा गया कि बार-बार समाधि और उसमें जाना आप भाव में जाना बंद कीजिए तो यह सब चल रहा था उसी समय एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटना हमारे समक्ष उपस्थित हुई और ये जो सुवर्ण युग का जो अंत है मुझे लगता है कि इसी घटना के साथ में आएगा जैसे कि मां दक्षिणेश्वर में तो पहले ही आ गई थी किंतु शशी पूजा उसके कुछ समय के बाद हुई और हम शशी पूजा को की सुवर्ण युग का यदि प्रारंभ कहेंगे तो ठाकुर का ठाकुर की महासमाधि वैसे हुई 18864 युग की अंतिम घटना और सबसे महत्त्वपूर्ण घटना या तो फिर कहेंगे कि सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं कहके अति महत्त्वपूर्ण घटना इस सुवर्ण युग की और पाणी हाटी उत्सव में जो हुआ उसके बाद में से ही धीरे-धीरे करके ठाकुर का स्वास्थ्य जो है बहुत ही सीरियस रूप से वो डिटेरिटोरियलाइजेशन

Panihati mahotsav

को पता है कि ठाकुर ने पहले तो ठाकुर काफी कई बार पाणी हाटी उत्सव में जा चुके थे और फिर किंतु जब से यह ठाकुर के अंतरंग शिष्यों का आना प्रारंभ हुआ यह नरेण है राखल है राम बाबू है बलराम बसु है मास्टर महाशय वगैरह तो तब से ठाकुर का किसी ना किसी कारण से पानी हटी जाना नहीं हुआ था तो अभी जब ये एक दिन ऐसा आया बस वही 1885 में ही 1885 में ही ठाकुर ने इन सबको कहा कि देखो तुम लोग तो सब यंग बंगोल हो आजकल के युवा बंगाली हो युवा युवा बंगाल जो है उसके रिप्रेजेंटेटिव हो तुम लोगों को तो ये ट्रेडिशनल उत्सव किस तरह से होते हैं इसके बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है तो आओ चलो हम लोग वहां पर चलते हैं पाणी हाटी और बहुत आनंद होगा अभी ठाकुर के मन में तो वहां पर जाने की इच्छा थी ही किंतु साथ में ये रामचंद्र दत्त जो थे वो बड़े ही वैष्णव भावा पन्न थे वो बड़े ही वैष्णव

ram chandra dutta

भाव के थे तो उनके मन में भी ऐसा था कि ठाकुर यदि वहां पर आते हैं तो बहुत आनंद सबको आएगा तो उन्होंने भी ठाकुर को विशेष रूप से अनुरोध किया कि चलिए हम सभी लोग पाणी हाटी चलते हैं तो अभी देखिए भक्तों का पहले से ही ऐसा था कि गिरीश घोष वगैरह थे वे लोग सोचते थे कि ठाकुर ये गले में

Girish Ghosh

जो दर्द हो रहा है है या कोई भी एक किसी भी तरह की ये बीमारी है लौकिक घटनाएं जो भी ठाकुर के साथ में होती है वो तो भी ठाकुर तो अवतार स्वयं है ईश्वर स्वयं पृथ्वी पर अवतरित होक के आए हैं तो उनको यह सब क्या है वो सिर्फ एक नाटक कर रहे हैं एक दिखावा कर रहे हैं जैसे कि और यह दिखावा जैसे ही समाप्त हो जाएगा किसी भी कारण वश तः हो सकता है भक्तों को इकट्ठा करने के लिए हो ना कि भक्तों को किसी तरह की शिक्षा देने के लिए हो उपदेश देने के लिए हो कोई भी कारण वसत किसी भी कारण से ठाकुर इस तरह का दिखावा कर रहे हैं कि हां अभी उनको गले में दर्द हो रहा है वगैरा वगैरह तो अभी ये जो गृहस्थ भक्त थे वो ठाकुर को अनुरोध करना शुरू कर दिए कि चलिए हम लोग पाणी हाटी चलते हैं उनका मन उनके मन की इच्छा है कि वहां पर नृत्य कीर्तन होगा जैसे दिव्य आनंद का जैसे एक प्रवाह बहेगा ठाकुर बार-बार समाधि में जाएंगे तो ठाकुर का वो जो अपरूप रूप जो है उस का दर्शन करेंगे किंतु सामने ही ये जो त्यागी संतान थे उनके मन में थोड़ा सा संदेह प्रकट हुआ और उन्होंने ठाकुर को ऐसा कहना

Monastic Disciples of Sri Ramakrishna

शुरू किया कि आप उस अभी जैसे डॉक्टर ने तो आपको कहा है कि बार-बार यदि भाव होगा समाधि होगी तो आपके गले का जो दर्द है वो बढ़ जाएगा तो इसके लिए आप पानी हटी मत जाइए तो अभी ठाकुर भी थोड़ा सा अभी देखिए ठाकुर तो बालक स्वभाव था ना सामान्य भूमि में सामान्य भाव में वो बालक स्वभाव रहते थे तो बालक स्वभाव उनको जो भी कोई भी कुछ भी आ कर के कहेगा तो वो उसको थोड़ा सा सीरियसली ले लेते थे तो जब ये कुछ भक्तों ने उनको ऐसा कहा कि आप मत जाइए क्योंकि डॉक्टर ने कहा है कि आपको गले का दर्द वरना बढ़ जाएगा यदि भाव होगा समाधि होगा तो ठाकुर ने फिर बाकी भक्तों को भी कहा रामचंद्र दत्त वगैरह को तो अभी इन लोगों ने काउंटर आर्गुमेंट देना शुरू किया कि नहीं नहीं सुबह को जाएंगे दोपहर को लौटा आएंगे एक दो घंटे में यह सब पूरा समाप्त हो जाएगा और ज्यादा दूर देर तक वहां पर रुकने की जरूरत नहीं है तो अभी ठाकुर भी देखिए ऐसा नहीं है कि ठाकुर को पता नहीं है कि उनकी लीला का अंतिम पर्व प्रारंभ हो गया है किंतु अभी ठाकुर तो जैसे मां ने कहा ना कि आमरा तो ठाकुर रसगुल्ला खते आशनी अर्थात कि ठाकुर क्या सिर्फ बैठे-बैठे रसगुल्ला खाने के लिए जलेबी खाने के लिए आए हैं नहीं लोक कल्याण के लिए आए हैं तो उनके मन में भी एक तरफ जो एक बालक भाव था वह थोड़ा सा डरता था कि अरे गले का दर्द बढ़ जाएगा तो क्या होगा दूसरी ओर जो जगत गुरु विश्व गुरु वाला जो भाव था उनको पता था कि नहीं इस तरह से उत्सव में जाएंगे तो बहुत सारे लोगों को कल्याण होगा बहुत सारे लोग ठाकुर की यह जो अनुपम भाव मूर्ति का दर्शन करके चैतन्य प्राप्त करेंगे आध्यात्मिक उल्लास प्राप्त करेंगे तो आख आखिर में ठाकुर ने मान ही लिया कि चलो चलते हैं पानी हाटी किंतु फिर सबको कह रहे हैं देखो इस तरह से कुछ नहीं करना है कि जिस तरह से भाव हो या समाधि हो या तो फिर नृत्य कीर्तन हो चुपचाप जाएंगे दर्शन करेंगे एक दो जगह पे और फिर वहां से लौट आएंगे तो भक्त लोग भी सहमत हो गए एक दो घंटे का कार्यक्रम रखेंगे जाएंगे दर्शन वगैरह करेंगे थोड़ा सा वो उत्सव क्षेत्र है एक बार चक्कर काट लेंगे और वापस आ जाएंगे दोपहर तक तो ये सब सोच कर के दो तीन नौ का करके कलकाता के भक्त लोग बहुत ही अर्ली मॉर्निंग को ठाकुर के वहां पर दक्षिणेश्वर में आकर के उपस्थित हुए देखा कि ठाकुर के जाने के लिए एक नौका ऑलरेडी वहां पर घाट प बंदी हुई है अभी ये जो सब

Dakshineshwar

स्त्री भक्त है वो जाकर के मां के पास में नबत में गई अभी मां कहती है कि देखिए मां भी सोचेगी यह जो घटना तो हमको सबको पता है मां के बारे में मां सोच रही है कि अरे

Nahabat

इतने सारे लोग जा रहे हैं तो फिर मैं क्यों ना आऊं तो फिर उन्होंने किसी स्त्री भक्त को कहा कि जाकर के उनको पूछो कि क्या मैं सबके साथ में आऊं कि नहीं और आप मां की दृष्टि से देखिए गंगा के किनारे इस तरह से दो तीन चार नौका लगी है सब भक्त लोग मिलकर के दक्षिणेश्वर में अर्ली मॉर्निंग में आनंद मना रहे हैं सोच रहे हैं बातें कर रहे हैं कि जब उत्सव के क्षेत्र में जाएंगे तो और भी कितना आनंद आएगा तो यह देख कर के क्या मां के मन में ऐसा नहीं होगा कि मैं भी जाऊं मैं भी थोड़ा सा दिव्य आनंद का लाभ उठाऊं तो फिर ये जो

Ma Sarada

स्त्री भक्त है ठाकुर के पास में गई उसने ठाकुर को कहा कि मां की भी इच्छा है वो आए तो क्या वो आ सकती है तो ठाकुर ने क्या उत्तर दिया हम सबको पता है कि यदि उसकी इच्छा है तो वो आए अभी ये स्त्री भक्त ने जाकर के जैसे ही मां को मैसेज दिया मां ने साथ-साथ में ही कहा कि तो फिर रहने दो वहां पे भीड़भाड़ बहुत होगी तकलीफ होगी मैं नहीं जाना चाहती अभी देखिए कि ठाकुर ने उस समय ने तो कुछ नहीं कहा किंतु रात को जब वापस आ गए थे उस समय ठाकुर ने एक स्त्री भक्त को कहा था मां शारदा के बारे में कि देखो वह कितनी बुद्धिमता है कितनी बुद्धिशाली है उसको पता था कि यहां पर वहां पर जाकर के मुझे बार-बार भाव होने वाला है और फिर ऐसी अवस्था में वो भी यदि मेरे साथ में होती तो लोग क्या कहते निंदा करते कि हंस हंसी ऐसे है अंशो हंसी ऐसे छ अर्थात कि हंस और हंसी ये दोनों एक कपल या तो जोड़ी एक साथ में आई है ऐसा बोल कर के लोग निंदा करते हैं तो अभी ठाकुर ने जैसे ही कहा कि उसकी इच्छा है तो आए यहां पे मां भी कहती है तो उसी स्त्री भक्त को जब ये स्त्री भक्त ने कहा मां को कि ठाकुर ने ऐसा कहा है कि आप कितनी बुद्धिमता है कि आपने जान अपने वो सामने से मना कर दिया जाना तब मां ने उसको कहा कि देखो ठाकुर जब चाहते सही सही चाहते कि मैं जाऊं तो ऐसा कहते कि हां वो आए क्यों नहीं आएगी बहुत अच्छा चाहो का आना अर्थात कि वो बड़ा पॉजिटिवली कहते किंतु जब जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा कि उसकी इच्छा है तो आए तब मैं भी समझ गई कि ठाकुर की इच्छा नहीं है कि मैं जाऊं तो देखिए कि यह घटना तो हमको पता ही है बड़ी सुंदर घटना है मां के जीवन में मां और ठाकुर का क्या संबंध है परस्पर बड़ा ही सुंदर रूप से यह घटना हमारे सामने यह स्थापित करती है अच्छा किंतु अभी तो सुबह की बात है अभी सब लोग जाने को तैयार हो गए हैं नौका में बैठ कर के वहां उत्सव क्षेत्र में जाया गया वहां पर एक मंदिर अभी देखिए जहां पे उत्सव चल रहा है जहां पर नृत्य गीत चल रहा है उन्होंने पहले से ही ठीक किया कि ठाकुर को वहां पर नहीं ले जाना है क्योंकि ये जो नृत्य के जो दल होते हैं ना कीर्तन के दल वो एक जैसे उनको पता लगेगा कि अरे ये तो ठाकुर है इनको तो बार-बार भाव होता है तो ये कीर्तन के दल ठाकुर को घिर कर के कीर्तन करना शुरू कर देंगे और फिर ठाकुर अपने को संभाल नहीं पाएंगे तो ठाकुर को उत्सव क्षेत्र पर नहीं ले जाते हैं पास में ही जो मंदिर है वहां पर जाकर के ठाकुर को दर्शन करवाते हैं तो ऐसा सोच कर के सब भक्तगण ठाकुर को घेर लिए जिससे कि भीड़ में ठाकुर को कोई धक्का ना लगा दे या ठाकुर को कहीं कोई इंजरी ना हो जाए तो बोलक के ठाकुर को घिर कर के यह सब भक्तगण एक मंदिर में गए अभी ऐसा था ये जो मुख्य मंदिर इस तरह का था था कि अभी ठाकुर प्रणाम करके तो खड़े तो है वहां पर थोड़ी देर के लिए किंतु देखिए जो विधि की ये जो सब विचित्र होती है विधि की जो विधि का जो विधान होता है ईश्वर की जो इच्छा होती है सब भक्त लोग कह रहे हैं कि ठाकुर को कीर्तन के दल के पास में नहीं ले जाना ठाकुर भी बड़े ही सोच समझ करके बड़े ही सावधान पूर्वक कहते हैं कि वहां तो मुझे नहीं ही जाना किंतु ये जिस मंदिर में ये लोग प्रणाम करने को गए थे वो ऐसा मंदिर था कि कीर्तन के जितने भी नए दल वहां पर आएंगे उत्सव क्षेत्र में वह सभी दल सबसे पहले इस मंदिर में आकर के श्री विग्रह के सामने कीर्तन करें उसके बाद में वो उत्सव क्षेत्र में जाकर के कीर्तन को आगे बढ़ाएंगे तो अभी ठाकुर तो बेचारे चुपचाप खड़े हैं उनके मन में है कि वहां नहीं कीर्तन करना है नहीं यह सब देखना है किंतु विधि का विधान ऐसा कि उसी क्षण उसी समय एक कीर्तन का नया दल उस मंदिर में आकर के उपस्थित हुआ और कीर्तन करना शुरू कर दिया अभी यहां पर देखिए ठाकुर के मन में जिस तरह से चलता होगा कशमकश एक और है कि जब सभी भक्तों ने उनको रिक्वेस्ट किया है अनुरोध किया है कि कीर्तन में मत जाइए कीर्तन में जाएंगे तो भाव होगा भाव होगा तो फिर गले का दर्द और बढ़ जाएगा एक तो यह है और दूसरा जो अपोजिट उनका जो एक है टेंडेंसी कि जैसे ही कीर्तन देखा तो शेर की तरह सिंह की तरह उसमें कूद गए और कीर्तन में योगदान दे देना आरंभ किया तो ये दोनों ठाकुर के मन में चल रहा है द्वंद किंतु फिर भी ठाकुर अपने को संभाले हुए हैं किसी भी तरह से कीर्तन में नहीं जा रहा है उसी समय एक वैष्णव बाबा जी वहां पर आकर के उपस्थित हुए अभी कुछ कुछ सभी नहीं कुछ कुछ बाबा जी ऐसे होते हैं कि उन्होंने जैसे ही देखा कि चलो कोई उत्सव हो रहा है वैष्णव उत्सव कीर्तन हो रहा है तो चलो वहां पर चलते हैं फिर ये सर के ऊपर में तिलक लगाए गले में माला पहनेंगे फिर अपने वो एक पितांबरी ना की ऐसा कुछ शरीर पर पहनेंगे और जिस तरह से धार्मिक व्यक्ति व दाढ़ी वगैरह बना कर के कैसे वो अपना एक दिखाते हैं कि हां मैं बड़ा धार्मिक हूं तो इस तरह से धार्मिक व्यक्ति का स्वांग रच करके कुछ कुछ वैष्णव बाबा जी लोग वहां पर आकर के उपस्थित होंगे बड़े ही सुंदर सुंदर वस्त्र धारण किए होंगे और जैसे उनको देख करर के ही लोग समझ जाए अरे ये तो बड़े ही धार्मिक व्यक्ति है अभी उत्सव में वैष्णव उत्सव में इस तरह का वैष्णव बाबा जी का आगमन देख करर के बहुत सारे भक्त है उनको कुछ ना कुछ दक्षिणा देंगे तो इस तरह से दक्षिणा के लोभ से इस तरह का एक वैष्णव बाबा जी वहां पर आकर के उपस्थित हुए और देखा कि कीर्तन चल रहा है मंदिर में तो बड़े ही नाटकीय अंदाज से उन्होंने कीर्तन करना शुरू किया कभी हुंकार देंगे ना तो कभी इधर-उधर नृत्य करेंगे जैसे पूरा लिखा हुआ माने अभी भक्त के ऊपर में है अपनी यदि आपकी भक्ति बहुत ही गहरी है बड़ी ही सरल है तो आप कहेंगे कि ये बाबा जी बड़े ही कितने भक्ति शली है कितने भक्तिमार्ग है किसी भी तरह का दिखावा है किसी भी तरह का छल है उसको एक सेकंड में ठाकुर समझ जाते थे तो जैसे ही इस बाबा जी को देखा इस तरह से हुंकार करते हुए इस तरह से ढंग नाटक करते हुए नाटकीय अंदाज से नृत्य करते हुए तो ठाकुर ने उनके पास में जो भक्त खड़े थे उनको कहा बड़े ही मृदु स्वर से इसका ढंग देखो तो मैंने किस तरह का नाटक कर रहा है तो सभी भक्त लोग भी हंसना शुरू कर दिए तो कि हां ठाकुर ने इसको अच्छे से पहचान लिया है अभी सब लोग इस तरह से हंस रहे थे चुपचाप खड़े थे एकाएक पता नहीं ठाकुर के ऊपर में किस तरह के भाव का आवेश हुआ अभी तक अपने को संभाले हुए थे किंतु ये जैसे ही ये ढोंगी बाबा जी को देखा तब उनको लगा कि यदि इस तरह का ढंग हम यदि समाज में प्रचलित होने देते हैं तो फिर यह सही सही आध्यात्मिकता है जो कि अपने अंतर के अंतः स्थल से आती है उस आध्यात्मिकता का कोई स्थान नहीं रहेगा इस समाज में सभी लोग इस तरह के ढोंगी लोगों को ही सबसे ज्यादा प्राधान्य देंगे सम्मान देंगे तो जो भी है यह तो अभी मेरा एनालिसिस है ठाकुर के मन में पता नहीं क्या चल रहा था पता नहीं ये ढोंगी बाबा जी को देख कर के क्या ट्रिगर हुआ ठाकुर शेर की तरह वो एकदम हुंकार देकर के इस कीर्तन के दल में आकर के आविर्भव क्रम के साथ में नृत्य कर रहा है वो नृत्य इस तरह का नृत्य जिसको देख कर के

Panihati

सभी लोग अभिभूत हो गए और फिर किंतु अभी देखिए भक्त लोग अभिभूत तो हो गए इस तरह का नृत्य किंतु उनको फिर ये जो सीरियसली डर लग गया कि ठाकुर इस तरह से नृत्य करेंगे तो बाप रे उनके गले के दर्द का क्या होगा तो उन्होंने कैसे भी करके धक्का मुख करके ये कीर्तन का जो दल था वो भी समझ गया कि कौन ढोंगी है कौन असली है वे लोग भी वो ढोंगी बाबा जी को छोड़ कर के ठाकुर को गिर कर के नृत्य कर रहा है किंतु भक्त लोग अभी बड़े ही चिंतित हो गए उन्होंने ये धक्का मुखी करते कीर्तन के दल में प्रवेश किया कैसे भी तरह से ठाकुर को कॉर्नर किया और उनके हाथ पकड़ कर के बड़े ही संतपोर्न वहां से ले जाने का प्रयास या कहा कि यहां से निकलते हैं यदि यहां पर और ज्यादा खड़ा रहेंगे खड़े रहेंगे तो पता नहीं ठाकुर के साथ में क्या होगा तो ऐसा करके करके बाहर तो निकल रहे हैं किंतु देखिए कि जैसे ही ये अभी क्या है कि आध्यात्मिक ये जो पावर है य जैसे कैसे वो बिजली गिरती है और पूरा जगत जो है वो चकमक हो जाता है एक क्षण के लिए तो वैसे ही ये ठाकुर के आध्यात्मिक भाव का जो एक बार आई तो वैसे ही उत्सव क्षेत्र में जैसे कि बिजली की तरह यह बात फैल गई कि एक परमहंस यहां पर आए हैं जो कि इस तरह से भाव में आकर के नृत्य करते हैं तो अभी इतना बड़ा उत्सव क्षेत्र इसमें इतने सारे लोग और एक बात एक बात इस तरह की बात फैलती है तो थोड़ी ना कोई रुकने वाला है सब जगह से कीर्तन के दल एक के बाद एक आकर के ठाकुर को घेर कर के नृत्य करना शुरू कर दिया और ठाकुर के मन के में भी मन में भी इस तरह का दिव्य भाव का आविर्भाव हुआ स्पू हुआ कि ठाकुर भी जैसे कि उद्दा भाव में आकर के तांडव की तरह तांडव नृत्य शिव का कैसे तांडव नृत्य होता है उस तरह से नृत्य करना शुरू किया देखिए यह जो नृत्य है उसका बड़ा ही सुंदर एक आलेखन स्वामी शारदानंद जी महाराज ने लीला प्रसन्न पुस्तक में किया है वो मैं थोड़ा सा यहां पर पढ़ता हूं भावा बगे नृत्य करते करते जखन तिनी ुत पदे ताले ताले कखन अग्रसर एवं कखन पश्चात फिराया आशीते लागले तखन मने होते लागलो तिनी जेन सुखमय शायरे मनेर न्याय महानंद संतरण और छूटा छूटी कोरीते छ भाव के आवेश में नृत्य करते करते ठाकुर कभी द्रुत पद से बड़े ही जल्द झड़प से ताल से के ताल के साथ ताल मिलाते मिलाते कभी आगे बढ़ेंगे और कभी पीछे जाएंगे तब उनको देख कर के ऐसा लगने लेगा जैसे कि यह क्षीर सागर है क्षीर सागर में एक मछली किस तरह से आनंद से वो तैर रही है और महानंद से इधर-उधर दौड़ रही है वैसे ही ठाकुर को देख कर के हमको लगने लगा प्रति अंगे गति उ चालना ते ओई भाव परिस फुट होया तहा ते ज अ भूत पूर्व अ दृष्ट पूर्व कोमलता माधुर्य मिश्रित उ दम उल्लासम शक्ति प्रकाश उथल तो उपस्थित होलो तहा वर्णना कोरा असंभव प्रत्येक अंग की के साथ में नृत्य के प्रत्येक ताल के साथ में यह जो महानंद जो है ठाकुर के शरीर में इस तरह से परिसू होना शुरू हुआ और जिस तरह की कोमलता और मधुरता उनके श्री देह में दिखाना शुरू कोई उसका वाणी में शब्दों में वर्णन करना असंभव है स्त्री पुरुषेर हाव भाव मय मनो मुक्त कारी नृत्य अनेक देखिया च स्त्री और पुरुषों का हाव भाव से भरा हुआ नृत्य बहुत देखे है किंतु दिव्य भवा वे से आत्मा हारा हुया तांडव वृत्य करि बार काले ठाकुरे देहे ज रूप रुद्र मधुर सौंदर्य फुटिया उठी तो तहर आंशिक छाया पा तो ई सकले आमा गर नयन गोचर कोई नाए देखिए स्त्रियां स्त्री भाव से नृत्य करती है और पुरुष जो है वो पुरुष भाव से नृत्य करते हैं वो तो हमने देखे हैं किंतु यहां पे स्त्री और पुरुष रुद्र और मधुर इन दोनों के भाव का जो अद्भुत समिश्रा ठाकुर के देह में जो दिख रहा है और रुद्र मधुर सौंदर्य ये जो शारदानंद जी महाराज लिखते हैं ये तांडव नृत्य दिव्य भावा वेश में आकर के जब ठाकुर यह तांडव नृत्य करते हैं और स्त्री और पुरुष दोनों का जो यह भाव का जो मिलन है रुद्र मधुर सौंदर्य उनके देह में जिस तरह से फूट करके उठता है जिस तरह से प्रकाशित होता है उसका आंशिक छाया मात्र भी हमने किसी और किसी के नृत्य में देखा नहीं है प्रबल भावो ला से उथली तो होया तहर देहो जोखन एली दली तो छुटी ते थाकी तो तखन भ्रम होई तो उहा बुझी कठिन जड़ उपादान निर्मितो नहे प्रबल भाव के उल्लास से उद्वेलित होकर के उनका देह जब नृत्य करता कीर्तन करता हलत दुलता और ताल के साथ में वह अपना एक लय प्रकट करता तब ऐसा लगता कि ये जड़ पदार्थ का ठाकुर का देह नहीं बना है क्या जड़ पदार्थ इतना सुंदर रूप से ताल के साथ में ताल मिला कर के इतने लयबद्ध तरीके से नृत्य कर सकता है हो ही नहीं सकता है बुझी आनंद सागरे ताल तरंग उठिया प्रचंड बेगे सम्मुख स्त शकल पदार्थ के भाष इया अग्रसर होते से ऐसा नहीं लगता था कि ये जड़ पदार्थ का ठाकुर का देह बना है पंचमहाभूत का ऐसा लगता था कि आनंद सागर में एक महा तरंग उठी है और प्रचंड वेग से उसके सामने जितने भी पदार्थ है जितनी भी चीजें हैं उसको ले जाकर के बहा करके आनंद सागर में अग्रसर हो रही है आगे बढ़ रही है एक नोई आबार गोलिया तरल होया उहर ई आकार लोक दृष्ट अगोचर होई ब आनंद सागर की यह प्रचंड लहर जो कि आनंद से के आनंद के ताल में ताल मिलाती लयबद्ध नृत्य करती जो हमको दिखाई दे रही है अभी दूसरी ही क्षण में फिर से इसी आनंद सागर में वह प्रवाहित होकर के बह जाएगी तरल स्वरूप धारण करके उसी आनंद सागर में मिल जाएगी क्योंकि जड़ देह जद होगा तो जड़ देह तो जड़ ही रहेगा हमेशा के लिए वही आकार धारण किया हुआ सा दिखेगा किंतु आनंद सागर की जो लहर है अभी लहर दिख रही है लहर के आकार में किंतु पर क्ण ही पर उसके कुछ ही क्षण के बाद में ही फिर से वो तरंगित होकर के पानी में मिल जाएगी वो थोड़ी ना वो लहर का आकार सब समय धारण करने वाली है तो ठाकुर जिस तरह से लयबद्ध नृत्य करते थे ऐसा लगता था कि आनंद सागर की तरंग की तरह तरंग की तरंग से उनका देह बना है और अभी आनंद सागर में विलीन हो जाएगा उनका ये जो जड़ आकार दिख रहा है अभी वह आनंद सागर में फिर से वह एक एक साथ में प्रवाहित हो जाएगा इस तरह से उनको ल रहा था आसल और नकल पदार्थ मध्य कतो प्रभेद कहा केव बुझाते होई लो ना क्या असल है क्या नकल है इन दोनों में क्या फर्क है और किसी को समझाने की जरूरत नहीं रही वो ढोंगी बाबा जी कहां उनका नृत्य वो नाटकीय अंदाज से नृत्य और यह कहां जैसे कि आनंद सागर की तरंग ताल के साथ ताल मिलाती लय के साथ लय मिलाती रुद्र मधुर भाव का संगम करती यह कहा ये आनंद सागर की लहर य कहा क्या असली है क्या नकली है किसी को समझाने की जरूरत भी नहीं रही कीर्तन संप्रदाय गोस्वामी जी दिके आर दृष्टिपात ना कोरिया ठाकुर के बेटन पूर्वक सतोगुण उत्साह आनंदे गान करते लागी लो ये जो कीर्तन संप्रदाय है उन्होंने वो ढोंगी बाबा जी को छोड़ कर के शिव ठाकुर के ही आसपास में नृत्य कीर्तन करना शुरू किया देखिए अभी ये भक्तगण तो बेचारे बड़े ही डर गए अभी दो चीज है भक्तगण जो है सही सही भक्त होंगे देखिए हमने पहले भी यह जो डिस्कस किया था मां के जीवन में भी यह जो मां का जो प्रसंग है ठाकुर को खाना खिलाने के समय में आहार करवाने के समय में मां को जो दिव्य आनंद प्राप्त होता था किंतु इससे भी ज्यादा मां का जो सेंस ऑफ ड्यूटी था जो दूसरों के प्रति करुणा और सहानुभूति थी जब भी गोलाप मां को लगा कि मुझे लेकर के जाना है खाने का थाला ठाकुर के पास में माने वैसे ही ये दिव्य आनंद का भी परित्याग करके गुलाप मां के हाथ में खाने का थाला दे दिया तो हमको बहुत बार लगता है कि यह जो आध्यात्मिक जीवन का जो सर्वोच्च आनंद है वो ये दिव्य आनंद को प्राप्त करना किंतु देखिए भी इससे भी बड़ा एक और भी उच्च मुकाम है और वो है संपूर्ण रूप से निस्वार्थ होना और यहां पर भी ठाकुर के दो तरह के भक्त यहीं पर हमको दिखाई देते हैं जो बाद बाद में जो डिवीजन जो होना शुरू हुआ वह डिवीजन यहीं पर ही हमको दिखाई देता है कि बहुत सारे भक्त तो ठाकुर का यह आनंद स्वरूप देख कर के उन्होंने भी नृत्य करना शुरू कर दिया उन्होंने भी यह दिव्य आनंद का लाभ लेना शुरू किया किंतु ठाकुर के जो अति अंतरंग भक्त थे वे लोग बेचारे बड़े ही चिंतित हो गए यह ठकर का दिव्य स्वरूप का दर्शन करना आनंद तो देता है किंतु इसके बाद में जब ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस जाएंगे और गले में क्या होगा उनके साथ में यह अभी बताना मुश्किल है तो कैसे भी करके ठाकुर को इस भीड़ में से रक्षा करके उनको और एक मंदिर की ओर ले जाना शुरू किया सोचा कि ठाकुर वहां पर जाकर के थोड़ा सा विश्राम करेंगे किंतु देखिए यह जो विधि की विचित्र होता है कैसे भी करके ठाकुर को धीरे धीरे करके ठाकुर तो भाव में थे एकदम वो समाधि मतलब समाधि और ये जो नॉर्मल अवस्था है उसकी बॉर्डर लाइन प थे क्या कर रहे हैं कहां जा रहे कोई होश नहीं है भक्तगण जैसा उनको चालित करते हैं जहां ले जाते हैं वहां धीरे-धीरे करके चलते हैं तो बहुत समय के बाद में जब ठाकुर को इस मंदिर के पास में ले आया गया वहां पर एक बड़ी ही भयानक घटना हुई वहां पर क्या हुआ कि कुछ स्त्री भक्त ठाकुर की ऑलरेडी वहां पर उपस्थित थी और वहां पर मंदिर में उन्होंने मालसा भोग दिया था अभी मालसा भोग अर्थात की एक तरह का यह होता है पैकेट उसमें ये थोड़ा सा फल है मिठाई है वगैरह रखा जाता है तो इस तरह से एक भोग तैयार करके वह अर्पण कर रही थी उसी समय एक दूसरे ढोंगी बाबा जी का वहां पर आविर्भाव हुआ तो पहले ढोंगी बाबा जी ने ठाकुर को ट्रिगर किया नृत्य करने के लिए और ये दूसरा जो ढोंगी बाबा जी है उसने भयानक कांड कर दिया उसने क्या किया ये बाबा जी ने ये जो मानसा भोग का ये जो पैकेट था उसको लिया और ठाकुर जो भाव में खड़े थे भक्तों के घिर कर के भक्त लोग बड़े ही ये थे सतर्क थे कि कोई आ कर के उनको धक्का मुखी करके ठाकुर को हानी ना पहुंचाए बोलक के बड़े सतर्क थे कोई ठाकुर को स्पर्श ना कर दे इसके बारे में भी बड़े सतर्क थे किंतु जो विधि की जो होनी है वो तो होना ही है ये बाबा जी कैसे भी करके भक्तों का ये जो सर्कल था वो ब्रेक करके ठाकुर के पास आकर के खड़े हुए मालसा भोग में से थोड़ा सा लेकर के ठाकुर के मुंह में रख दिया जैसे ही ठाकुर के मुंह में रखा ठाकुर का पूरा शरीर जैसे कि धुज शुरू हुआ उनका एक म इंस्टेंट तत क्षणात भाव भंग हुआ और थू थू करके जो उनके मुंह में रखा था फेंकना शुरू किया तभी सभी भक्त लोग अलर्ट हो गए अरे ये बाबा जी ने ऐसा कर दिया है तो लोग सब बड़े ही नाराज हो गए बाबा जी के ऊपर में किंतु क्या करें जो होना तो हो गया यहां पर ठाकुर की जो अवस्था बेचारे कैसे कि बड़े ही अशुद्ध व्यक्ति ने बड़ा ही अशुद्ध चीज उनके मुंह में रखती हो इस तरह से जो ठाकुर का भाव भंग हुआ है देखिए ये जो उच्च भाव की अवस्था में होते हैं और वहां से एकाएक पृथ्वी पर आकर के पटक पटका दिया जाएगा आपको तो क्या भयानक असर होगी अपने शरीर के ऊपर में 100 मंजिली ये जो इमारत है उसके ऊपर में से जंप लगा कर के पृथ्वी पर आके टकराएंगे तो वो जो अपनी अवस्था होगी शारीरिक और मानसिक वही अवस्था जैसे कि ठाकुर की हुई बड़े ही बेचारे कष्ट में आ गए कैसे भी तरह से मुंह साफ किया और फिर जो भाव भंग हो गया उनका तो सभी भक्त लोग बड़े ही चौकन हो गए सोचा कि चलो कैसे भी करके ठाकुर को अभी यहां से लेकर के दक्षिणेश्वर वापस जाते हैं तो भी बड़े ही संतर पण से बड़े ही केयरफुली ठाकुर को नौका में बिठाया गया ठाकुर नौका में बैठे और दक्षिणेश्वर आया गया किंतु यह जो विधि की जो विचित्र होता है यह जो ठाकुर के साथ में यह जो अपशकुन दक्षिणेश्वर आक के भी नहीं हुआ और वहां पर एकाएक एक ऐसी स्त्री भक्त का आगमन हुआ जिसने ठाकुर के सामने बैठ कर के ठाकुर को यह कह कर के जीत करना शुरू किया कि उसकी ये जो धन संपत्ति है उसके बारे में कुछ झगड़ा चल रहा है उसको ठाकुर मिटा दे अभी ये स्त्री भक्त कौन है इसका नाम तो नहीं दिया गया कहीं पे किंतु यह भी ऐसी एक मूढ़ मति थी यह स्त्री कि अभी ठाकुर बड़े ही नाराज हो गए अभी क्या था उस दिन फिर दूसरे दिन थी स्नान यात्रा अभी स्नान यात्रा अर्थात कि काली मंदिर का प्रतिष्ठा महोत्सव इसी दिन को काली मंदिर की प्रतिष्ठा हुई थी तो उस दिन बड़ा ही उत्साह पूर्वक वहां पे फिर वही एक दूसरा उत्सव होने वाला था और प्रति साल प्रत्येक वर्ष ऐसा होता था की स्नान यात्रा के दिन ठाकुर बड़े ही आध्यात्मिक आनंद में रहते थे बहुत सारे भक्त आते थे और बहुत आनंद करते थे किंतु इस स्नान यात्रा में ऐसा हुआ कि ये स्त्री भक्त की उपस्थिति की वजह से और उसकी बार-बार जीत करने की वजह से ठाकुर को थोड़ा सा भी भाव नहीं हुआ थोड़ा सा भी आध्यात्मिक आनंद नहीं आया और उनका जो मन है बड़ा ही अस्थिर हो उठा और फिर आखिर में उन्होंने सभी स्त्रियों को बुला करके कहा कि देखो तुम लोग यहां पर नबत में रह रही हो यहां पर त्रैलोक्य बाबू भी है तो वह अभी यानी कि मथुर बाबू के पुत्र और उनकी तो ठाकुर के ऊपर इतनी भक्ति नहीं थी तो वो क्या सोचेंगे कि इतनी स्त्रियां यहां पर रह रही है कभी-कभी आया करो एक दो लोग यहां पर रहा करो सब मिलकर के यहां पर रहती है और बात ऐसी हुई थी कि अगले दिन सब गए थे पाणी हाटी और फिर उसी दिन रात को वहां पर रुक गए दूसरे दिन स्नान यात्रा है तो उस उस उत्सव में पार्टिसिपेट करेंगे तो इतनी स्त्री भक्त है सब मिलकर के हल्लागुल्ला कर रही है त्रैलोक्य बाबू नाराज हो जाएंगे ऐसा जैसे ही ठाकुर ने कहा सभी स्त्री भक्त बड़ी ही दुखी हो गई और सोचा कि चलो अभी यहां से चला जाए देखिए एक भक्त की वजह से सबको इस तरह से ठाकुर की डांट सुननी पड़ी और वहां से जाना पड़ा किंतु वो पूरा दिन ठाकुर का इतना खराब गया था शारदानंद जी महाराज लिखते हैं कि ठाकुर को थोड़ा सा भी आनंद उस उत्सव को उस स्नान यात्रा को नहीं आया स्त्री भक्त की जिद की वजह से बार-बार जाकर के ठाकुर को कह रही है मेरी धन है संपत्ति है उसका किसी ना किसी तरह का निराकरण आप कर दीजिए तो यह हुआ पाणी हाटी के उत्सव का समापन और देखिए कि इसी उत्सव के बाद में ही दूसरे ही दिन से ठाकुर के गले का दर्द इतना बढ़ गया कि सभी भक्त बड़े ही चिंतित हो गए और यहां पे देखिए अभी ठाकुर भी तो है बालक स्वभाव जो उनके सामने जाकर के जो कुछ भी कहेगा वो बिल्कुल ठाकुर सीरियसली उसको स्वीकार कर लेंगे तो पता नहीं यह बात ठाकुर के मन में आई ना कि और किसी ने जाकर के ठाकुर को कहा जो भी है ठाकुर ने अपने मन में ऐसा मान लिया कि ये रामचंद्र दत्त वगैरह जो प्रवीण भक्त है उन्होंने ही वहां पर जाने का आग्रह किया था पाणी हाटी और उनके आग्रह की वजह से ही वो वहां पर गए थे और अभी इसी वजह से उनको गले का दर्द इतना बढ़ गया है तो भी जो भी आएगा उसके सामने ठाकुर कहेंगे और ये जो प्रवीण भक्त थे उसमें सबसे आगेवा उनके थे राम बाबू तो अभी ठाकुर का जितनी भी नाराजगी है सब राम बाबू के ऊपर में निकालना शुरू की जो भी आएगा कहेगा कि राम ने मुझे ऐसा कहा कि तुम आप चलिए वहां पे इसलिए मैं गया और इसके लिए मुझे यह सब हो रहा है यदि राम तो डॉक्टर है अर्थात राम थे राम बाबू थे वैसे वो केमिकल एग्जामिनर ने ऐसा कुछ किंतु उन्होंने मेडिकल की परीक्षा पास की थी हालांकि वो मेडिकल प्रैक्टिस नहीं करते थे तो ठाकुर कहते थे राम तो डॉक्टर है उसने यदि मुझे थोड़ा सा भी जोर दे कर के कहा होता कि महाशय आप मत जाइए तो मैं नहीं जाता राम की वजह से ही मैं मेरा जाना हुआ और उसी की वजह से मेरे गले का दर्द बढ़ गया अभी जब ठाकुर इस तरह से कंप्लेन करते हैं तो हमको भी थोड़ा सा आश्चर्य होता है आजकल के जमाने में हम लोग देखते हैं कि लोग अपने सर पे ये जिम्मा लेने की वजह झूठ मुठ का दूसरों के सर पे डाल देते हैं तो ठाकुर का भी क्या ऐसा था ठाकुर भी झूठ मूठ का और किसी के सर पर डाल देते थे येय अभी ऐसा हो ही नहीं सकता कि ठाकुर को जाने की इच्छा ना हो और आप उनको जाने के लिए तैयार करें ये तो हो ही नहीं सकता और यदि ठाकुर के जाने की इच्छा है और आप ठाकुर को मना करें और ठाकुर सुने ये हो ही नहीं सकता उनको तो परिचालित करने वाली थी जगन माता तो ये राम बाबू बेचारे कौन है तो देखिए ठाकुर इस तरह से कंप्लेन तो करते हैं किंतु सभी भक्तों को पता था राम बाबू को भी पता था कि ठाकुर जब सामान भूमि पर रहते हैं तो वो बालक स्वभाव होते हैं और बालक भाव में आकर के वो यह सब बातें करते रहते हैं तो इसको कोई बड़ा सीरियसली नहीं लेना है ऐसा वो राम बाबू बड़े ही दुखित हो गए पश्चाताप करने लगे ऐसा भी नहीं है और बाकी भक्त जिन्होंने ठाकुर के मुंह से इस तरह की कंप्लेन सुनी उन्होंने राम बाबू को कोसना शुरू किया उनके साथ में जाकर के झगड़ा करना शुरू किया ऐसा भी नहीं है सबको पता है कि ठाकुर का ठाकुर के दो भाव है एक तो उच्च भाव में जब चले जाते हैं तो जगन माता ही उनके के मुंह से बातें करती है और इवन जब सामान्य भूमि पर रहते हैं बालक स्वभाव में भी रहते हैं तो जगन माता ही उनको परिचालित करती है तो जो भी है किंतु ठाकुर के बालक भाव का एक सुंदर उदाहरण सब जो भी आ रहा है सबको बोल र है कि ठ ये जो राम बाबू ने ही मुझे वहां पर जाने के लिए कहा और मैं गया और इसी वजह से मेरे गले का दर्द बढ़ गया अभी उसी समय में एक बार एक वही त्यागी संतान वहां पर आए थे तो अभी त्यागी सं का नाम तो नहीं पता है हमको किंतु उन्होंने इस तरह से बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है क्या कहते हैं कि ठाकुर बैठे हैं अपने खाट के ऊपर में और अभी क्या है कि गले के ऊपर में कुछ वो बाम वगैरह लगाया होगा जहां पे उनको दर्द हो रहा है और यह डॉक्टर ने कहा होगा बिल्कुल बात नहीं करनी है गले पे लगाया है बिल्कुल अभी चुपचाप बैठे रहिए अभी ठाकुर बात ना करें चुपचाप बैठे रहे तो कैसा तो बिल्कुल बच्चे की तरह बच्चा जबी बहुत ही तूफान करता है मस्ती करता है तो उसकी मां उसको क्या कहती है एक जगह पर चुपचाप बैठे रहो वरना पिटाई होगी तुम्हारी तो बच्चा बैठा तो है किंतु मां के ऊपर में नाराज भी है और उसकी एक नजर बाहर में है घर के बाहर में जहां प उसके मित्र खेल रहे हैं और उसका मन अंतरात्मा सब पुकार पुकार के कह रहे हैं चलो दौड़ कर के बाहर जाए चलो अपने मित्रों के साथ में खेले तो ये बच्चे को जद मां ऐसा डांट करके बिठाए गी तो कैसा उसके मन का भाव रहेगा नाराजगी और साथ में ही ये एक लोंगिंग कि कहां वो अपने मित्रों के साथ में खेले तो ये कितना सुंदर भाव बच्चे के चेहरे पर रहेगा तो वैसा ही त्यागी संतान एक सन्यासी महाराज वहां पर गए देखा कि ठाकुर के चेहरे पर इसी तरह का भाव है क्या उन्होंने वर्णन किया है बालक के शासन करि बार जनन कोन कार्ज करते निषेध करिया एक स्थाने आबद्ध करिया राखिले से जेवन विसन होया थाके ठाकुरे मुखे अभिक शी भाव देखीते पलाम छोटे बच्चे को शासन करने के लिए पनिशमेंट करने के लिए कोई भी काम करने से उसको मना कर दिया जाएगा और एक जगह पर बिठा करके रख दिया जाएगा तो वो किस तरह से विषण हो जाता है नाराज और दुखी हो जाता है वैसा ही बिल्कुल ऐसा ही भाव मैंने ठाकुर के चेहरे पे देखा तो ये थी ठाकुर की वो पाणी हाटी की यात्रा और इस यात्रा के साथ में ही ठाकुर के यह जो सुवर्ण युग है उसका यहां पे आता है अंत इसके बाद से ही कैंसर का प्रभाव बढ़ने लगा और फिर उनको श्यामपुर और काशीपुर लाया गया और फिर जो अंतिम लीला है ठाकुर की वो प्रारंभ हुई अंतिम पर्व प्रारंभ हुआ इस अंतिम पर्व में मां की क्या भूमिका थी उसके बारे में अभी हमारा जब नेक्स्ट क्लास होगा तब हम देखना शुरू करेंगे आज देख ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत

क्या नरेन भी पानीहाटी गया था?

श्री स्वामी जी भी स्वामी जी भी मैं बोलना भूल गया उनका नाम वो भी उनका वही व्यू था कि ठाकुर को कैसे भी तरह से बचा के रखना है और जो मैंने कहा ना कि दो ग्रुप होना शुरू हो गए थे उसी समय कि एक ग्रुप है कि यह दिव्य आनंद का जो लाभ मिलता है ले लो ठाकुर कितने दिन रहेंगे किसको पता और दूसरा है कि अभी ठाकुर की अंतिम लीला शुरू हो गई है ऐसा एक अंदाजा उनको आ गया और कैसे भी तरह से ठाकुर को प्रिजर्व करके रखो तो नरेंद्र था जो कि वो ठाकुर को प्रोटेक्ट कर रहा था इधर से उधर ले जा रहा था वो सब नर का काम था हमको पढ़ने का मन

हम ठाकुर के कैंसर के बारे में पढ़ ही नहीं पते. उनकी पीड़ा का वर्णन सहा नहीं जाता.

नहीं होता मास्टर महाशय और शरत महाराज को लिखने का मन नहीं था मास्टर महाशय की बहुत सारी नोट्स है उन्होंने उसमें से लीला प्रसंग कथामृत तो लिखा ही नहीं किंतु फिर प्रभ नंद जी ने उस नोट्स में से श्री राम कृष्ण देव की अंतिम लीला अंत्य लीला करके पुस्तक है वो बनाया है और शरद महाराज का देखिए दो तरह से एक तो उनकी लिखने की भी इतनी इच्छा नहीं थी दूसरा योगायोग देखिए कि जब तक वो काशीपुर तक आए तब मां का देहत हो गया तो फिर वोह दोनों तरह से उनका मन टूट गया वैसे भी कष्टदायक पीरियड कैसे लिखे और यहां पर मां का प्रयाण तो फिर वो चैप्टर भी वहा प हो गया अधूरा वेरी पेनफुल वेरी पेनफुल और हम लोग अंदाज भी नहीं कर सकते भक्तगण के हृदय पर जो बीता होगा उस समय मां के हदय पर जो बीता होगा अंदाज भी नहीं कर सकता उसके बाद में रा नगर मठ और रा नगर मट के आनंद के दिन फिर से चालू होते हैं इंटरेस्टिंग ठाकुर खुद यह बात कहते हैं ठाकुर जब कामर पुकर के दिनों की बात करते हैं ठाकुर कहते हैं सुखेर पायरा ला पायरा यानी कबूतर पंखी तो ठाकुर कहते हैं मैं सुख का कबूतर था अर्थात कि मैं ऐसा एक पंखी था जिस घर में आनंद है सुख है शांति है उस घर में जाता था और जिस घर में क्लेश देखता था कष्ट देखता था उस घर में मैं नहीं जाता था तो हमने ठाकुर से ही सीखा है सो नो नीड टू [हंसी]

काशीपुर में कल्पतरु उत्सव

वरी मैं तो बिल्कुल नया था बेलूर मठ में पहली बार गया था तो बोला कि चलो काशीपुर चलते हैं फर्स्ट जनुअरी को तो अभी फर्स्ट जनवरी तो और कहीं पर सेलिब्रेट ऐसा होता नहीं है आजकल थोड़ा सा होना शुरू हुआ है उस समय तो कुछ नहीं था तो मैंने सोचा होगा चलो चलते हैं 1015 लोग होंगे क्या है वहां पे जाकर के देखा अभी प अभी नौका नदी के किनारे छोड़ दी है वहां से पैदल चलना है तो चल रहे हैं चल रहे लंबा लाइन है जितना चलेंगे उतना लंबा लाइन तो आखिर में मेरे से रहा नहीं गया मैंने बोला कोई नया मूवी का कोई स्टार्ट हो रहा है ना कि क्या हो रहा है क्या इतने ज्यादा लोग कहां पे है बोला ये तो अपने मठ में जाने के लिए काशी जाने के लिए खड़े हैं जैसा गेट खुलेगा वैसे ही सब मैंने कहा क्या बात करते हो आधी मने पूरी रात खड़े हैं वो बिस्तर वगैरह सब लेकर वहीं पर रास्ते पर सोए हुए हैं और जैसे ही गेट खुला सब लोग मैंने कहा अरे बाप रे और उस दिन जो मैंने देखा था ऐसा कभी देखा नहीं निश्चय य महाकुंभ कुंभ मेला वगैरह में मैं गया नहीं कभी कुंभ मेला में