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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

अवतरणिका : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 25 Sept 2023

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ओम स्थापा के चढ़ार्मास सर्वधर्म स्वरूप ने अवतार वरिष्ठय रामकृष्ण यत नमः इस किताब में से हम लोग पाठ कर रहे थे श्रीमान शारदा देवी जीवन स्वामी गंभीर रंजीत द्वारा लिखित जैसे की हम करते हैं प्रति सप्ताह 11 टॉपिक लेते हैं तो पिछले सप्ताह हमने ज्ञानियों पे चर्चा किया था और अभी इस सप्ताह हम मां के जीवन के ऊपर में जो चर्चा हमने अधूरा छोड़ था उसको रिज्यूम करते हैं उसको फिर से पुनः प्रारंभ करते हैं अभी तक मां की जीवनी में हमने देखा की किस तरह से स्वामी गंभीरानंद जी ने अवतरण का लिखी है और उसमें उन्होंने रिशय है की जी तरह से अवतार का प्राकट्य होता है पृथ्वी के ऊपर में वैसे ही शक्ति का भी नई देव धरण करके अवतार ओल्ड मिशन जो है उसमें सहायक करने के लिए वो शक्ति का भी पृथ्वी पर आगमन होता है तो यह बात हमने अभी तक अच्छी और साथ में ही हमने यह भी देखा की जी तरह से नई शक्ति अवतार के कार्य में सहायक किस तरह से करती थे वह तो हमने देखा साथ में हमने यह भी देखा की किस तरह से ठाकुर उन्होंने शक्ति के जो विश्व कार्य है वर्ल्ड मिशन है ठाकुर ने किस तरह से सहायक किया था तो गंभीरानंद जी महाराज लिखने हैं कर पॉइंट हमको देते हैं हमारा जी पॉइंट बाय पॉइंट बात करते हैं तो उन्होंने कर पॉइंट हमको दिए थे की इस कर पॉइंट की मदद से अकुर ने सहायता की सर्वप्रथम रामकृष्ण अवतारी स्त्री गुरु ग्रहण हमने देखा था की किस तरह से उसे जमाने में स्त्रियों को तो घर से बाहर भी जाना मुश्किल था उसे समय भैरवी ब्राह्मणी ने पूरे कहां कहां पर भ्रमण करके यह शक्ति साधना सखी होगी और सीखने के बाद में वो ठाकुर को शिक्षा देने के लिए दक्षिणी चोर आई थी तो वह स्त्री गुरु ग्रहण करने से स्त्रियों का महात्मा बड़ा फिर महाराज जी लिखने हैं नई भाव साधना अभी नई भाव साधना अर्थात की यह मधुर भाव की साधना हम लोग इसके बड़े में लीला प्रसंग में शरद महाराज क्या लिखने हैं उसके बड़े में हमने देखा की किस तरह से मधुर भाव साधन का इतिहास क्या है मधुर भाव साधन की क्या फिलासफी है किस तरह से चैतन्य महाप्रभु ने इस साधन को इस साधन पद्धति का पुनः उदाहरण किया और किस तरह से मधुर भाव साधना के समय ठाकुर ने क्या-क्या अनुभूति की थी वह हमने लीला प्रसंग में से पाठ करके देखा तीसरा पॉइंट है अर्थात की श्रीमान शारदा देवी की शिक्षा और दीक्षा का भारत ग्रहण इसीलिए ठाकुर ने किया था तो यह भी हमने इस किताब में मां की जीवनी में हम देखेंगे की मां खुद कहती है की किस तरह से प्रदीप और शोलते अर्थात की दिए की वत है वो किस तरह से बनाना वहां से लेकर के वो नौका में प्रथम जब नवका में यात्रा करते हैं तो किस तरह से प्रथम उसमें प्रवेश करना सबसे आखिर में उतारना वो सब बातें अकुर ने मां को सिखाई थी तो मां ठाकुर ने सिर्फ यह नहीं शिखा है की जब ध्यान कैसे करना है या तो फिर खाना वगैरा कैसे बनाना है किंतु जीवन के जितने भी पहलू है जो किस स्त्रियों को स्त्रियों के साथ में संलग्न है वह सभी पहलुओं के बड़े में ठाकुर ने मां को शिक्षा दी थी ठाकुर ने मां को सिखाया था इसीलिए महाराज ने लिखा है अपनी सहदारनी की शिक्षा और दीक्षा का भर ग्रहण और आखिर का पॉइंट उन्होंने कहा है प्रचार और इसीलिए यह जगत में मातृ भाव का प्रचार किया है एक तो मधुर भाव साधन जिसका की उन्होंने पुनरुद्धार किया दूसरा की मातृभाव साधन जो भी उन्होंने पुनर्धार किया पुनरुद्धार तो शायद नहीं कहेंगे चैतन्य महाप्रभु के जीवन में सभी भाव महाभारत के बाद एक खेलने हुए हमने देखें हैं किंतु आज के जमाने में खासकर के जो लोग बंगाली नहीं है हम जैसे लोगों के लिए हम लोग जो की पूरे ही डिफरेंट टाइप की धार्मिक ट्रेडीशन में बड़े हुए हैं हम लोगों के लिए भाव एक आध्यात्मिक साधना का कोई मध्य हो सकता है यह बात ही हमारे लिए आश्चर्य जनक है मैं खासकर के मेरी बात कहूं तो मैं यह सोचता था की मेडिटेशन है त्याग है वैराग्य है तपस्या है एकांत में भ्रमण है या तो फिर स्वाध्याय है पुराने का स्वाध्याय पुराने का अध्ययन की लोगों का अध्ययन एन किया फिलोसॉफिकल टेक्स्ट का स्वाद दिया यही धार्मिक जीवन है एक इमोशन हमारे धार्मिक जीवन में आध्यात्मिक जीवन में कोई एक फैक्टर हो सकता है वो तो मैंने खुद ने कभी सोचा ही नहीं था हम लोग तो ऐसा सोचते आए हैं की किसी भी तरह की इमोशन का त्याग करना है बिकॉज़ इमोशंस आर वीकनेस यदि इमोशन रहेगी तो किसी वास्तु के प्रति वह हैबिट होगी किसी भी चीज का हमको अट्रैक्शंस होगा किसी भी चीज की माया में हम लोग पद जाएंगे तो माया का मूल ही है यह इमोशन को कैट दो तो माया हमको स्पर्श ही नहीं करेगी इसीलिए एक बुद्ध की कहानी मुझे पर्सनली बहुत अच्छी लगती थी किसी भी तरह के माया के बंधन के पैर शांत चित हो करके बुद्धि वृक्ष के नीचे तले में वह ध्यान में मैग्ना है या तो फिर शांत चित्र से पुरी एक संसार का अवलोकन कर रहा है संसार में रहते हैं किंतु संसार के नहीं है कहानी वन में जाकर के वहां पर जाकर के वो रहते हैं तो इस तरह का आध्यात्मिक जीवन में खुद सोच रहा था की इस तरह से उसको सही सही आध्यात्मिक जीवन कहा जाए फिर जब मैंने कथामृत पढ़ना शुरू किया और ठाकुर नाचते हैं एक गेट हैं मां के साथ बातें करते हैं रोटी हैं मां के साथ में झगड़ा करते हैं और यह तो ठीक है फिर तो लीला प्रसंग पढ़ा लीला प्रसंग में तो ठाकुर के भाव की शुरुआत कहां से हुई किस तरह से भाव का एक के बाद एक विकास हुआ खासकर के यह मधुर भाव साधन यह पढ़कर के मुझे इतना आश्चर्य हुआ था की अरे इस तरह की कोई भी प्रकार का थिंकिंग मैंने यहां पर आने से पहले किया ही नहीं तो यह मेरे लिए जो लोग की बंगाल चैतन्य महाप्रभु की भावधारा के साथ में फैमिलियर नहीं है इससे ज्यादातर लोगों के लिए ठाकुर का बिहेवियर एक आश्चर्य एक शोक समाज हो सकता है की अरे ये ये ठाकुर क्या कर रहा है कहां वो एकदम निर्लेप्ट हो करके मां पे शांति का भाव है वो बैठना है कोई भी कुछ भी आकर के का दे कोई फर्क नहीं पड़ता और यहां पे ठाकुर है वो नरेंद्र बोल दिया की ये तो जातक पक्षी नहीं है ये तो चमगादड़ है तो ये सुनकर के ठाकुर बेचारे को इतना आघात हुआ होते-रोते मां के पास गए मंदिर में मां तुमने अभी जो अभी तक जो दर्शन दिए क्या वह सब गलत हो गए तब मैन उनको दर्शन दे के दिखा दिया की नहीं नरेंद्र तो अभी बालक है उसको यह सब चीज समझ में नहीं आई है तो फिर ठाकुर जा करके नरेंद्र के साथ में झगड़ा करते हैं जा अभी तुम्हारी बात में नहीं सुनूंगा तो अरे ये किस तरह का बिहेवियर है भगवान बुद्ध के साथ में ऐसा होता तो भगवान बुद्ध क्या करते हैं जल्दी आनंद बोलना की भंते मतलब जो पाली लैंग्वेज में को जैसे हम लोग ठाकुर कहते हैं श्री राम कृष्णा को तो यह लोग कहते थे भंते तो आप जो बोल रहे हैं आपने जो उपदेश दिए हैं वह सब गलत गलत है तो भगवान बुद्ध किस तरह से रिएक्ट करते हैं वो अपने चेहरे पे एक स्मिथ हास्य प्रकट करके कहते की देखो की इस जगत संसार तो पूरा माया का बना हुआ है इसमें तुम कोई चीज को स्वीकार करते हो नहीं स्वीकार करते हो उससे मुझे क्या आता जाता है मैं तो महानिर्वाण की सुख समुद्र में लहरिया में डूबा हुआ हूं तुम जो सोचना है वह सोचो उससे मुझे क्या फर्क पड़ता है तो ऐसा कुछ भगवान बुद्ध है किंतु ठाकुर का बिहेवियर एकदम छोटे बच्चे की तरह खुश हो जाएंगे नाराज हो जाएंगे गुस्सा हो जाएंगे का रहे थे एक वो पत्र में जलेबी लेकर के बैठा है 5 साल का एक लड़का ए गया अभी वो एकदम ठाकुर का स्वभाव एकदम बच्चे जैसा हो गया एक बच्चा जैसे दूसरे बच्चे को कोई अच्छी चीज शेर नहीं करना चाहता वह सोचता है की मैं अकेला इसको का लूंगा वैसे ही बालक भाव में आकर के वो जलेबी का पत्र अपने पीछे में जाकर के छुपा दिया और छुपाते छुपाते समाधि में मगन हो गए तो ये किस तरह का आध्यात्मिक जीवन है जो की पूरा इमोशन के ऊपर में डिपेंड करता है और मतलब ये कटिक लगता है हमको जिन लोगों ने ये चाइनीस हम या बुद्धिस्म यह तो इस तरह की कोई योग है या तो वेदांत है यह सब चीजों का जिन्होंने अभ्यास किया है हम लोगों को तो यह बड़ा ही विचित्र लगता है यहां तक की स्वामी विवेकानंद का भी जीवन देखेंगे स्वामी जी वैसे तो बड़े ही कभी-कभी जब खुश हो जाते हैं तो इतना हंसी मजाक करते हैं जब क्रोधित हो जाते हैं तो जैसे की वो टिकट चेक करके ऊपर में क्रोधित हो गए थे वह उनके शिष्य ने उनको फर्स्ट क्लास का टिकट दे दिया तो फर्स्ट क्लास के टिकट में बैठे वो कमरे में बैठे थे वही राजस्थान से कहानी गुजरात जान के इस एरिया समय और टिकट चेक कर वह गोरे आदमी ने जाकर के वह बोल दिया की अरे मेरे कमरे में तो एक को फकीर बैठा हुआ है तो वो टिकट चेक कराया बोलना है की आप यहां से निकाल जाइए तो स्वामी जी कहते हैं ना मेरे पास तो टिकट है देखो ये फर्स्ट क्लास का टिकट है मैं मुफ्त में नहीं आई नहीं बैठा हूं और तुम लोगों का नियम है टिकट लेने से मुझे बिठाना ही पड़ेगा तो वो टीसीआरजीयूमेंट करने लगा तो ये देख करके फिर स्वामी जी का क्रोध एकदम प्रगति हुआ और रुद्रा भाव में आकर के उसको जो झगड़ा है वो बेचारा वहां से भाग और वो जो सामने वो अंग्रेज बैठा हुआ था वो भी चुप हो गया तो स्वामी जी इस तरह से क्रोध करते हैं किंतु क्या है वो तो धर्म की स्थापना करने के लिए आपको क्रोध करना पड़ेगा भगवान कृष्णा ने जब महाभारत का युद्ध होने वाला था तो जाकर के कौरवों को बोला था की सी की एक सी जितनी जमीन पर स्वीट खड़ी रहती है वह जितनी जमीन है मैंने सी जितनी जमीन पर खड़ी रहेगी तो कितनी जमीन वह रोकेगी इतनी तो तिल्मात्र तो सी जितनी जमीन रुकते है सी जमीन जितनी जमीन पे खड़ी रहती है उतनी जमीन भी यदि आप पांडवों को दे दें तो ये युद्ध नहीं होगा तो कौरवों ने कहा की हम इतनी जमीन भी नहीं देंगे तब कहानी जाकर के धर्म की स्थापना करने के लिए नीति की स्थापना करने के लिए भगवान कृष्णा को युद्ध का आह्वान करना पड़ा तो वो तो धर्म की स्थापना करने इन जो करना है वो तो अपने हिंदू धर्म में बड़ा ही क्लियर है की धर्म के यदि हम धर्म के डर में जाकर के रहने लगेंगे तो यह पुरी 1000 साल की जो गुलामी हमने भुक्ति है वही हम फिर से एक के बार एक भुगतते रहेंगे यह तो सुभाष चंद्र बस है स्वामी विवेकानंद है यह जो क्रांतिवीर है हमारे स्वतंत्र सेनानी है उन्होंने क्रोध प्रकट करके यह ब्रिटिश सरकार को भारत में से भगाया तभी तो हमने अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की है और यदि आजकल जी तरह से चल रहा रहा है विदेशी सत्ताए हमारे ऊपर किस-किस तरह के अक्षय के बाद में अक्षय दाल रही है हम सब भारतीय एक साथ में खड़े हैं हम लोग इस अक्षय को ना ही स्वीकार करेंगे ना ही हम हमारे राष्ट्रीय हिट के अगेंस्ट में जाएंगे तो यह क्रोध प्रदर्शित करना शक्ति का प्रदर्शन करना यह तो स्वतंत्रता के लिए जीवन धरण करने के लिए अत्यावश्यक है उसमें गलत तो कुछ नहीं है किंतु वह एक चीज हो गया जो की भगवान कृष्णा के वह महाभारत के युद्ध से लेकर के भगवान राम मां सीता का बचाने के लिए मां सीता को मुक्त करने के लिए लंका पे उन्होंने आक्रमण किया तो यह तो धर्म की स्थापना करने के लिए जो करना है वह करना है किंतु ठाकुर का भाव तो बिल्कुल ही अलग है जो की धर्म के इतिहास में मैंने कभी पढ़ा ही नहीं था बच्चे की तरह का को मां की तरह का भाव एक गोपी या तो राधा रानी का भाव यह भाव क्या हमको आध्यात्मिक जीवन में जो सर्वोच्च उपलब्धि कहीं जाति है निर्विकल्प समाधि उसमें स्थित करवाने के लिए क्या यह पर्याप्त है की नहीं तो ये सब ठाकुर ने अपने जीवन में इसका प्रतिपादन किया है और देखिए की तपस्या और त्याग और मां की एकाग्रता और ध्यान जो की ट्रेडिशनल रास्ते हैं धार्मिक जीवन में आगे बढ़ाने के लिए समाधि प्राप्त करने के लिए वो बहुत ही अल्फा लोगों के लिए संभव है जिन लोगों का मां बिल्कुल शिशु अवस्था से ही संयम में रखा गया और डिसिप्लिन में रखा हो या तो जन्म जन्मांतर की साधना की हो उन लोगों के लिए मां की एकाग्रता सहज है किंतु ज्यादातर लोगों के लिए जिन्होंने अपने मां को कभी भी ट्रेन नहीं किया जो की निकम जो बिना कम की बातें हैं उसको मां में से हटा देना सिर्फ कम की बटन के ऊपर में मां को अपनी चेतन को फॉक्स करना इस तरह का ट्रेनिंग ज्यादातर लोगों को तो मिला ही नहीं है और जब अवतार जन्म ग्रहण करते हैं तो उनका मिशन उनका कार्य उनके आशीर्वाद तो पृथ्वी के सभी लोगों के ऊपर में होना चाहिए सभी लोगों के लिए धर्म और आध्यात्मिकता का रास्ता उनको सहज सरल कर देना है तो ठाकुर ने जी इमोशन के ऊपर में मनुष्य मंत्र चला है इस इमोशन को इस भाव को उन्होंने कहा की ईश्वर की और मोड दे दो ईश्वर की और घुमा दो यदि आप योगसूत्र या तो फिर गीता पढ़ेंगे अब अर्जुन पूछता है की यह तो धर्म का रास्ता बड़ा ही कठिन है योग कठिन है ध्यान कठिन है तो उत्तर क्या मिलता अभ्यास वैराग्य अभ्यास वैराग्य व्यायाम ताननिरोधक योगेश चित वृत्ति निरोध अभ्यास वैराग्य अभ्यारण निरोध मैन योग क्या है चित की वृत्तियों का निरोध और यह निरोध कैसे होगा अभ्यास और वैराग्य से तो यह अभ्यास और वैराग्य हमारे योग्य शास्त्र में और गीता में दोनों जगह पे कहा गया है की इसका अनुष्ठान करना है किंतु अभ्यास और वैराग्य का अनुष्ठान कौन कर पाएगा जो की बहुत ही छोटी उम्र में या तो फिर जन्म जन्मांतर से यह सब कर रहा है वो करेगा ज्यादातर लोगों के लिए जो की रिटायर होने के बाद में एक सोचते हैं की चलो भाई इस जीवन की समस्याओं से रिस्पांसिबिलिटी से मुक्त हुए अभी थोड़ा बहुत साधन भजन करते हैं वो कहां अभ्यास वैराग्य करने वाले हैं उन लोगों के लिए तो इस रास्ते पर चलना बड़ा ही कठिन है हां लगे रहेंगे तो अवश्य होगा इसीलिए तो इसको अभ्यास कहा है अभ्यास करते करते सब कुछ हो जाएगा उसमें कोई प्रश्न ही नहीं है किंतु शुरू में तो एक सहज एक चाहिए आपको यह जी तरह से आजकल हमारे मंदिर में रैंप बनाना शुरू कर दिया है स्टेप्स की जगह रैंप है और फिर रैंप से भी आगे जाए तो ये लिफ्ट है और लिफ्ट से भी ज्यादा अच्छा आजकल स्केलेटन है तो एस्केलेटर होने से आपको क्या है की वो यदि वह बैंड भी हो जाता है तो भी आप वो सीधी चढ़कर के ऊपर चढ़ सकते हैं तो मैंने ये एक के बाद एक सही मां है वो सहज सरल बनाए गए हैं रास्ते वो ऊपर चढ़ना के लिए हमारे लिए और साइंस और टेक्नोलॉजी ने तो यह भी स्पिरिचुअल साइंस और टेक्नोलॉजी है जहां पर हमारे लिए एक के बाद एक आसन रास्ते खोजें गए हैं और सबसे आसन जो है की मनुष्य रागिनियो से भाव से चलित है तो भाव ही मनुष्य की चेतन का एक लंबा समय वो या तो फिर एक बहुत बड़ा भाग जो है पोर्शन जो है वो ऑक्युपी करता है तो इसी भाव को यदि ईश्वर की और मोड दे तो फिर बाकी अभ्यास वैराग्य धीरे-धीरे आता रहेगा तो इसीलिए यहां पर ठाकुर ने मातृ भाव का प्रचार किया और मधुर भाव का प्रचार किया अभी मधुर भाव की साधन यदि सभी के लिए नबी हो वो थोड़ा सा उसमें फिर भी तो थोड़ा सा उसको केयरफुल करना पड़ता है किंतु मंत्र भाव का साधन है वो तो सहज सरल है और कथामृत में हमने देखा की मशरूम हश्र से ठाकुर को पूछते हैं की वो ठाकुर कहते हैं की सरकार और निराकार दोनों पे विश्वास रखो ऐसा मत सोचो की तुम नीरा कर तुमको ज्यादा अच्छा लगता है बोल के सरकार गलत है एक चीज और दूसरी बात की देखो शुरू शुरू में तुम सरकार के ऊपर में मां को केंद्रित करोगे तो तुम्हारे लिए ज्यादा आसन होगा तो यह बार-बार ठाकुर ऐसा कहते हैं तो अब यह ब्रह्म समाज की शिक्षा प्राप्त हुए मास्टर महाशय सोचते अभी इस सा समाज यह मां काली को तो मैं कैसे मां लूं किस तरह उनका स्वरूप है आजकल के वो जो मॉडर्न अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त किया हुए लोगों को मां काली किस तरह से वो हजम होगी वो मां काली को किस तरह से स्वीकार करेंगे तो वो बोलते हैं की अच्छा मैं अपनी मां को क्या देवी के रूप में इमेजिन कर सकता हूं तो मैन कहा ठाकुर कहता है इमीडीएटली कहते हैं अरे हां मां तो गुरु स्वरूप है मां तो शक्ति स्वरूप है तो यह बालक भाव का साधन या तो मातृभाव का साधन हम लोगों के लिए और युनिवर्सिटी वह इजी भी है और सहज भी है तो नई शक्ति के जगत में कार्य प्रसारण के लिए ठाकुर का क्या उड़ान है तो यह कर अवध हमको गंभीरानंद जी महाराज ने जिन के बताए जिसके की बड़े में हमने पिछले सप्ताह देखा था अभी हम आगे पढ़ने हैं थोड़ा सा की महाराज जी क्या कहता है गंभीर नदी महाराज कहते हैं मातृशताब्दीर मध्य अर्थात की 19थ सेंचुरी के मध्य भाग में एक जटिल समस्या उपस्थित हुई थी वो जटिल समस्या क्या थी अंग्रेज भी जीत भारत अंग्रेजन के द्वारा विजयित हुआ भारत उसे समय पाश्चात्य भावधारा में वह प्लॉडिट हो गया था पाश्चात्य भावधाराओं की यह एक के बाद की इस पूनिया भूमि पे भारत की इस धर्म भूमि पर आकर के टकराने लगे थे और इस जो आक्रमण है सत्य संस्कृति का आक्रमण उसने हमारे ही लोगों के मां में संदेह प्रकट कर दिया एक बार ट्रेन जा करके ठाकुर के सामने गीता की प्रशंसा करता है तो ठाकुर हंसते-हंसते कहते हैं की लगता है किसी यूरोपियन पंडित ने गीता की प्रशंसा की है इसलिए उसका अनुकरण करके आज नरेंद्र भी गीता के प्रशंसा कर रहा है तो जतिन नरेंद्र जैसे महामेधावी शिक्षक बुद्धि लड़के के मां में भी भारतीय संस्कृति के ऊपर में संदेह हो जाए तो हम लोगों की तो बात की क्या है आजकल के ज्यादातर वो एक जेनरेशन पूरा देखा है की मंदिर में जान से भगवान को स्वीकार करने से पूरा इन लोगों को एक तरह का एक प्रेज्यूडिश हो गया था और चलो भगवान और अवतार तो ठीक है यह गुरु को क्यों स्वीकार करना है गुरु का क्या प्रयोजन है मनुष्य को आप गुरु बना देंगे और उसके ऊपर मैं अपना वह श्रद्धा भक्ति प्रकट करते रहेंगे तो वह तो मनुष्य तो करप्ट हो जाएगा क्या उसे पागलपन करेगा न्यूज़ पेपर तो भरे पड़े हैं यह सब चीजों से जो की धर्म का नाम लेकर के अनाचार करते हैं लोगों की तो अपने न्यूज़पेपर में प्रतिदिन कुछ एन कुछ आता राहत है तो पूरा अभी इन लोगों की गलती की वजह से पूरा धर्म ही गलत है यह जो एक सोच एक खास एक एजुकेटेड इंडियन मिडिल क्लास के मन में प्रकट हो गई थी उसका एक निराकरण यही है की धर्म का सही सही अनुभूति मैं सिर्फ धर्म के बड़े में सुनूंगा मैं सिर्फ धर्म को एक्सेप्ट करूंगा शब्दों से शाब्दिक में उसको मैं मान्य कर लेट हूं अच्छा ठीक है समाज में रहना है बच्चों की शादी वगैरा तो करनी है तो क्या करें मंदिर में तो जाना होगा एक व्यवहार रखना होगा बोल करके एक सामाजिक प्रथम के रूप में हम शायद धर्म को स्वीकार करते हैं किंतु ईश्वर सही सही है यह कितने लोग स्वीकार करेंगे यदि ईश्वर सही है तो बोल तो उसका पूरा बिहेवियर ही चेंज हो जाएगा ठाकुर कहते हैं की यह बगल वाले कमरे में खजाना पड़ा हुआ है तो सामने जो चोर बैठा है वो क्या शांति से र पाएगा वो अभी ताला तोड़ने का बंदोबस्त करने की शुरुआत करेगा वह ताला नहीं तोड़ रहा है शांति से बैठा है मैन की चोर को विश्वास नहीं हो रहा है की बैंड कमरे में अभी खजाना पड़ा हुआ है तो वैसे ही ज्यादातर लोग जो भी एक वर्बल कहते हैं भगवान है हम तो मंदिर में जाते हैं पूजा पाठ करते हैं घर में वह पंडितो को बुलाकर के विधि वगैरा करवाते हैं तो उनका बिहेवियर अदर वाइस देखेंगे तो पता चलेगा की वो सब शाब्दिक वो सब सामाजिक व्यवहार के रूप में ही है धर्म उनके जीवन को धर्म ने परिवर्तित नहीं किया है वरना जो जगत नियंत्रण ईश्वर स्वयं वो यदि हमारे सामने इस मूर्ति के रूप में या तो फिर मंदिर के रूप में या तो फिर इस पूरे जगत में विश्वव्यापी हो और हम झूठ बोले अब प्रमाणिक व्यवहार करें दूसरों को तक करके धन एकत्र करें यह क्या संभव हो सकता है आजकल यह जो बड़े-बड़े पेंडल लगता हैं बड़े-बड़े उत्सव होते हैं वहां पर तो अब देखिए की मैं तो देख करके मुझे थोड़ा सा मैं खुद नास्तिक था मैं जब स्कूल में पढ़ाई कर रहा था आज भी मैं उसे अर्थ में अपने को नास्तिक कहता हूं की मुझे ये मंदिर बड़े देखना या तो फिर कोई बड़ी धार्मिक पूजा वगैरा देखना ये सब चीजों पर मुझे विश्वास ही नहीं होता जो लोग ये सब करते हैं उनका बिहेवियर तो देखो वो आचरण करते हैं जैसे की वो चाहे कितने बड़े धार्मिक है किंतु उन लोगों में ये जो सत्य अहिंसा असते परिग्रह ब्रह्मचर्य तप शूज संतोष स्वाध्याय ईश्वर परिधान या तो फिर मैत्री करुणा मुदिता अपेक्षा यह जो सदगुण राशि उन लोगों में हनी चाहिए वो तो दिखती ही नहीं है यह मंदिर में जाकर के बड़ी सेरेमनी करेंगे और इतने अच्छे-अच्छे कपड़े पहनेगी फोटो खींच आएंगे लगता है की जैसे वह नाम और फैमिली भगवान कोई ईश्वर में खास करके मैंने दो-तीन जगह पर देखा है आलम बाजार मत एन की हां आलम बाजार वो हमारे पास में नहीं था शायद मैं एग्जैक्ट भूल गया लंब बाजार एन की र नगर तो वो हमारे पास में नहीं था उसे समय हम लोग वो हम टच से हमको दूर करवाने के लिए ले गए थे तो वहां पर मैंने देखा की ठाकुरमार स्वामी जी की छवि छोटी-छोटी करके राखी हुई है और उसके पीछे उसका जो उसे समय का वो जो होगा बड़ा साधु वहां के महंत ना की जिसका की वो देहांत हो गया था उसे समय उतनी पुरी लाइफ साइंस करके उसका फोटो उसका रखा हुआ है पेंटिंग मैंने कहा ठीक ही है की ये लोगों के यहां पर ऐसा होता है इतना करके रखा है और अपना खुद का फोटो इनके पीछे में पूरा लाइफ साइंस करके रखा है क्या नौटंकी है तो यह सब चीज मुझे सही में मुझे लगता है की मैं अभी भी उसे हिसाब से नास्तिक हूं की बड़ी-बड़ी सेरेमनी बड़े-बड़े मंदिर या बड़ी-बड़ी पूजा है यह सब में जान को मुझे इच्छा ही नहीं करती मुझे क्या अच्छा लगता है सबसे ज्यादा पुराना मंदिर है वह टूट-फूट गया है खंडहर जैसा है नहीं वहां पर कोई क्लीनिंग होता है पेट वो मकड़ी का दाल वो धूल वगैरा चारों और बिखरा पड़ा है कोई नहीं आता है प्राकृतिक सौंदर्य है तो इस तरह के मंदिर में वो जाकर के वहां पे बैठना है और आंख बैंड करके देखना है की कितने कितने साधु संतो ने यहां पे एकदम निरहू के निरहू होकर के शांत होकर के चुपचाप साधना करके चले गए तो यह मैं याद करता हूं तो एकदम रोमांस हो जाता है की अरे हां इसको सही सही धर्म कहते हैं इसको सही सही साधना कहते हैं की जिसको किसी को पता ना चले की आप यहां पर छोटा सा मंदिर बना करके एक ऐसे निर्धन जगह पर बैठे हैं और कोई आपको मिलने के लिए नहीं ए रहा और बस आपका मां आंख बैंड करके ही हूं करके वह ऊपर समीप चला जाता है तो इस तरह के मंदिर में जाना मुझे अच्छा लगता है मैं कनखल गया था 45 साल पहले तो वैसे कनखल में तो आपको पता है की कनखल यानी की हरित द्वारा कितने सारे मंदिर वगैरा वहां पर है किंतु जो भी फेमस मंदिर है मैंने एक भी किसी की भी मुलाकात नहीं ले| वहां पे वो नील गंगा वो उसका तट है उसके किनारे पे मैं टहलता राहत था वहां पे कोई पुराना मंदिर मिल गया तो वहां पर जाकर के बैठता था मुझे एक जगह बहुत अच्छा एक लोकेशन मिल गया था वहां पर वह नदी का किनारा था और एकदम निर्धन था कोई रेयरली कोई वहां पर आता था और शायद ऐसा हो सकता है की वहां पर रात से ट्रक वगैरा प्रसाद होती होगी तो वहां के सामने ही वह यह था छोटा सा वो लारी तो मैं वहां से वह अपने लिए चाय के दो-तीन कप ले जाकर के वहां वो नदी के किनारे अकेले बैठा राहत था सामने एक दो पहाड़ और गंगा का पोट इतना चौड़ा था और दोनों और वह रेती का वह तट था तत्पुरा रितिका बना हुआ था यानी की वह दोनों सफेद उसके तट और बीच में से ये नीलगंगा वो प्रवाहित हो रही है और इतना निर्मल पानी क्योंकि वो तो गंगोत्री से अभी-अभी आया है वो इंडस्ट्रियल केमिकल को जान का भी उसको भीतर में वो चेस नहीं मिला है तो स्वच्छ निर्मल पानी और उसके भीतर में ये कल कल बाटी हुई गंगा तो इस तरह की जगह जल्दी होती है तो मुझे सबसे अच्छा लगता है तो यहां पर देखिए की धर्म को सहज सरल बनाने के लिए भगवान का प्रचार किया मातृ भाव का प्रचार किया और साथ में ही महाराज ने कहा की उन नवीन शताब्दी 19th सेंचुरी के मिडिल में भारत में एक बड़ी समस्या उत्पन्न हुई पश्चिम संस्कृति का आघात पश्चिम संस्कृति का एक असर भारत के ऊपर में दिखने लगा और भारत में सभी लोग यह सूचना शुरू कर दिए की यह जो सनातन हिंदू धर्म है यह कहां तक किस हद तक सही है या तो किस हद तक गलत है अच्छा आज यही तक और फिर कल ओम शांति शांति