प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित
माँ सारदा के जीवन की रूपरेखा
ऑलरेडी हम काफी आगे बढ़ आए हैं हमारी कहानी में मां शारदा देवी का पृथ्वी पर आगमन हुआ जयराम भाटी में उसकी कहानी उसके बाद में मां के बचपन के दिनों की कहानियां किस तरह से मां वहां पर दुष्काल हुआ था फेमिन हुआ था उस समय जब उनके पिताजी ये गरीब बच्चों के लिए गरीब लोगों के लिए खिचड़ी बनाते थे तो मां अपने छोटे हाथों से खिचड़ी को ठंडा करके इनको खिलाती थी| वो सब कहानियां देख ली ठाकुर के साथ में विवाह हुआ। कामार पुकुर में ठाकुर के साथ कुछ दिनों रहने का सौभाग्य मिला। उसके बाद में ठाकुर तो चले आए दक्षिणेश्वर वापस किंतु मां को रहना पड़ा जयराम भाटी में। उनकी उम्र भी तो बड़ी छोटी थी। किंतु जय राम भाटी में और कामार पुकुर में एक तरह की बातें वह पहले से ही जिस तरह से ठाकुर के बारे में फैलना शुरू हो गई थी कि वो श्यामार मेयर खेपा जमायर शंगे बे हुए होए छ श्यामा अर्थात कि श्यामा सुंदरी देवी मां शारदा की मां श्यामा की लड़की का एक पागल जमाई के साथ में विवाह हुआ है। इस तरह की बातें जयराम बाटी में चल रही है। इसलिए मां ना तो किसी के घर जाती है ना तो किसी के साथ बहुत ज्यादा वार्तालाप करती है। बस एक वहां पर भानुपीसी है। उनके घर वो जाती थी क्योंकि उनकी मां के ऊपर में बड़ी हमदर्दी थी। बड़ी सिंपथी थी। तो उसके यह सब दिनों की कहानियां ठाकुर एक बार कामार पुकुर वापस आए थे। 1868 के आसपास में जब उनकी साधना की परिसमाप्ति हुई तो भैरवी ब्राह्मणी और हृदय को लेकर के तो उस समय मां को भी जयराम भाटी से बुलाया गया मां भी कामार पुकुर आई ठाकुर का पूत संग पूर्ण पवित्र संग प्राप्त करने का फिर से सौभाग्य मिला ठाकुर ने मां को धीरे-धीरे करके आध्यात्मिक जीवन और सांसारिक जीवन दोनों की शिक्षा देना प्रारंभ किया। किंतु वह सुख के आनंद के निर्मल आनंद के दिनों का भी अंत आया। ठाकुर दक्षिणेश्वर वापस चले आए। यहां पर मां रह गई। वहीं पर जय राम बाटी में किंतु भगवान और भगवती ईश्वर और ईश्वरी नारायण और नारायणी इन दोनों का विरह लंबे समय तक तो रहता नहीं है। मिलन तो होना ही है। आध्यात्मिक मिलन 1872 के आसपास में मां ने ठीक किया कि वह खुद दक्षिणेश्वर आएगी। अपनी नजरों से देखेगी कि ठाकुर के बारे में यह सब अफवाहएं रूमर्स चल रही है। उसमें कितना सत्य है। बोलकर के मां दक्षिणेश्वर आई। ठाकुर ने वही प्रेम, वही आदर, यत्न और स्नेह जो कि उन्होंने मां के प्रति जयराम भाटी और कामार पुुर में प्रदर्शित किया था। उसी आदर और स्नेह के साथ मां को दक्षिणेश्वर में भी वेलकम किया। अपने ही साथ में अपने ही कमरे में रहने का उनको आवाहन दिया। मां वहां पर रह भी रही है। किंतु ठाकुर की जो सब आध्यात्मिक अवस्थाएं होती थी एक के बाद एक। कभी वह रात में सोना तो ठाकुर का होता ही नहीं था। कभी वह मां का नाम लेते रहेंगे। कभी मां के साथ में जगदंबा के साथ में वार्तालाप करते रहेंगे। यहां पर मां शारदा बेचारी उस समय तो छोटी ही तो थी। बहुत ज्यादा उम्र भी नहीं थी। तो फिर 14 साल के आसपास की होगी। मां का जन्म हुआ है 1863 और यह सब कहानी है 18 मां का जन्म है 1853 और यह कहानी है 1872 19 साल के आसपास की। तो उस समय मां की वैसे तो उम्र छोटी ही कही जाएगी और यहां पर ठाकुर के यह सब मां काली के साथ में वार्तालाप बार-बार भाव समाधि में जाना यह सब देखकर के मां थोड़ी डर जाती थी और रात को सो नहीं पाती थी। बोलकर के ठाकुर ने मां को नौबत में रहने के लिए भेजा। नहबत में ऑलरेडी उस समय उनकी मां चंद्रामणि देवी रह रही थी। तो मां ने भी वहां पर मां के साथ में मां शारदा और मां चंद्रामणि वह दोनों वहां पर रह रहे हैं। वह सुख और आनंद निर्मल आनंद के दिनों की कहानियां हमने बहुत देखी है। मां किस तरह से कहती है कि मेरे हृदय में आनंद का एक पूर्ण घट हमेशा विराजित रहता था। हमेशा ऐसा लगता था कि मां का मन एक अनंत भाव राज्य में विचरण कर रहा है। ठाकुर भी यहां पे भाव साधना अभी ठाकुर की साधना की तो परिसमाप्ति हो गई थी। किंतु उनका मन हमेशा साधना के आध्यात्मिक उपलब्धि के सर्वोच्च शिखर के ओर ही आकर्षित रहता था। किंतु फिर देखिए कि एक युग प्रवर्तक घटना उस समय वहां पर आकार लेती है। जैसे ही मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ ठाकुर समझ गए कि युग धर्म प्रवर्तन का समय आ चुका है। भारतवासी जो 1000 साल लंबी निद्रा में वो सोए हुए थे उसमें से फिर से उनको जगाने का समय आ चुका है। अभी क्या है कि यह हम कहते रहते हैं वैसे 1000 साल लंबी निद्रा किंतु यह सब पॉलिटिकल दृष्टिकोण से है। यदि आध्यात्मिक इतिहास का थोड़ा सा भी हम पाठ करें भारत के आध्यात्मिक संत महापुरुष साहित्य का थोड़ा सा भी हम अवलोकन करें तो एक के बाद एक नए-नए संप्रदाय एक के बाद एक आचार्य एक के बाद एक साधन पद्धतियां उनका आविष्कार भारत में हमेशा से होता ही आ रहा है। शंकराचार्य है, मधवाचार्य है, रामानुजाचार्य है, नबारकाचार्य है, चैतन्य महाप्रभु है, हरिदासी संप्रदाय है। पुष्टि मार्ग है। यह तंत्र साधनाएं, शक्ति साधनाएं हैं। वेदांत की एक के बाद एक शाखा प्रशाखाएं हैं। श्री वैष्णव पथ है। ऐसे कितने ही संप्रदाय, कितनी ही साधन पद्धतियां, कितना ही सब भारत में उस समय विकसित हो रहा था। बस वही बात है कि उन सबको एकत्रित करके उन सबको एक ऐसी महाशक्ति के रूप में यूनिफाई करना जो कि सिर्फ भारत को ही नहीं पूरे विश्व को एक नया आध्यात्मिक जीवन बख्शेगा। एक नया आध्यात्मिक जीवन प्रदान करेगा। यह एक फोकस लेंस की जरूरत थी। जैसे हमको पता है सूरज का प्रकाश पृथ्वी पर गिरता है। तो वैसे तो हमको सुकून के अलावा और कुछ मिलता नहीं है। गर्मी जब होती है गर्मी के माध्यम से ही तो यह सब पेड़पधे वगैरह उनको न्यूट्रिशन मिलता है फोटोसिंथेसिस क्रिया की परिणाम से। किंतु यह सूरज के जो किरण है वह सब स्कैटर्ड है। अभी आप एक मैग्नीिफाइंग ग्लास लगाइए सूरज के किरणों के ऊपर में और मैग्नीिफाइंग ग्लास के नीचे में आप देखिए कि एक पेपर को रखिए तो पेपर कैसे जलना प्रारंभ हो जाता है। यानी कि सूरज की गर्मी जो पूरी धरती पे इस पूरी धरा पे फैली हुई है उसको एकत्रित करेंगे तभी तो उसमें से महाशक्ति जन्म लेगी। अर्थात कि भारत के यह सैकड़ों संप्रदाय हजारों संत यह हजारों हजारों में धार्मिक साहित्य धार्मिक साधन पद्धतियां जो विकसित हुई थी शंकराचार्य के आगमन के बाद में उन सबको एक फोकस की आवश्यकता थी। एक मैग्नीिफाइंग लेंस की आवश्यकता थी। जो साधन पद्धतियां, जो संप्रदाय, जो साधन मंडलियां पूरे भारत में फैली हुई थी, भक्त मंडलियां जो पूरे भारत में फैली हुई थी, उन सब की आध्यात्मिक शक्ति को एक एसेंस के रूप में डिस्टिल करके उस एसेंस को पूरी पृथ्वी पर छोड़ दे। यह शक्ति की आवश्यकता थी। वह फोकल पॉइंट की आवश्यकता थी जो कि श्री रामकृष्ण में भारत में आविर्भूत हुआ था। श्री रामकृष्ण की साधना तो उनके जीवन का साधना और सिद्धि यह तो उनके जीवन का प्रथम पर्याय मात्र था। इसके बाद में अति महत्वपूर्ण द्वितीय पर्याय प्रारंभ हुआ। जबकि मां शारदा का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। मां की शोशी के रूप में भगवान श्री रामकृष्ण ने आराधना की। अपनी सर्व सिद्धियां मां शारदा के श्री चरणों को समर्पित की और मां की शक्ति से शक्तिमान होकर के ठाकुर ने कोलकाता में जहांजहां पर भी साधक किसी का नाम सुनते हैं उनके घरघर जाकर के ठाकुर ने यह जो हजार साल की जो आध्यात्मिक हमारी उपलब्धियां थी और भी लंबी 10,000 साल का जो भारतीय आध्यात्मिक इतिहास है वो घरघर घर जाकर के ठाकुर ने प्रचार करना शुरू किया। सहज सरल भाषा में कथामृत का अध्ययन करेंगे। तो देखिए ठाकुर की बात करने की स्टाइल कैसी है। पहले तो एक प्रपजीशन खड़ा करते हैं। उसके बाद में उपमा आफ्टर उपमा सिमाइल आफ्टर सिमाइल एक के बाद एक उपमा देकर के उस प्रपजीिशन को सहज सरल रूप से कोलकाता के लोग समझ पाए। एकदम गृहिणी से लेकर के विद्वान पंडित लोग केशव सेन जैसे यह गोलापमा और केशवसेन या तो फिर कहेंगे गोपाल मां और केशवसेन किस तरह से यह स्पेक्ट्रम है या तो फिर कहेंगे गोपाल मां और यहां पे स्वामी विवेकानंद अघोरमणि देवी जिनको कि बाल गोपाल का दर्शन होता था उनकी बिल्कुल सहज सरल भक्ति थी ऑन दी अदर हैंड एंड यहां पे थे स्वामी विवेकानंद, केशव सेन, विद्यासागर, बंकिम जिस तरह से उस समय के कोलकाता के सर्वोच्च ब्रेन, सर्वोच्च फिलॉसोफिकल एटमेंट इंटेलेक्चुअल जॉइंट्स उस समय के उनको भी ठाकुर को कंविंस करना है। यहां पे जिनका सहज सरल विश्वास है गोलाप मां, गोपाल मां और योगेन मां इनको भी ठाकुर को वही आध्यात्मिक संदेश देना है। तो यह एक सिमिंगली इंपॉसिबल कार्य है। वह ठाकुर ने किया और अभी धीरे-धीरे करके
ठाकुर माँ को रामकृष्ण संघ की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं
कहानी ठाकुर के जीवन के अस्ताचल की ओर आन बढ़ आगे बढ़ रही है। ठाकुर के जीवन अर्थात कि पंचमहाभूत के गटित देह का अस्ताचल नहीं कि उनकी आध्यात्मिक जो शक्ति इस जगत में जो कार्य कर रही है वह तो दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाएगी। दिन प्रतिदिन उसका प्रभाव सिर्फ कोलकाता में ही नहीं सिर्फ बंगाल में ही नहीं भारत और पूरी पृथ्वी पर फैलता ही जाएगा। तो यह प्रचंड कार्य ठाकुर ने ऑलरेडी गति में ला ही दिया है। ऑलरेडी उसको प्रारंभ कर ही दिया है। बस वही बात है कि ठाकुर के द्वारा गठित यह गुरु भाइयों का जो एक मंडली है स्नेह के रस से सिंचित यह रामकृष्ण संघ है। वह धीरे-धीरे आकार ले रहा है काशीपुर में। तो यहां तक अपनी कहानी आई है और जो एक क्रिटिकल पॉइंट अपना चल रहा है ठाकुर अभी मां को तैयार कर रहे हैं। यह जो भक्त मंडली है त्यागी और गृहस्थ संतानों की उसकी आगेवानी ग्रहण करने के लिए उसकी लीडरशिप लेने के लिए ठाकुर मां को तैयार कर रहे हैं। हमको जहां मतलब एक पॉपुलर इमेजिनेशन में मां का जीवन हमको कैसा लगता है कि वही नहबत में रहती है मां वो अपने पति की सेवा करना ही जैसे कि उनका जीवन धर्म है और एक के बाद एक जब यह त्यागी संतानों का और यह गृहस्थ स्त्री भक्तों का जब आगमन होना शुरू हुआ तो फिर मां का जीवन मां का स्नेह उनकी ओर भी धावित होने लगा। किस तरह से मां ठाकुर को चैलेंज करके कहती है कि मैं अपने बच्चों को जितनी भी रोटी खिलाऊं, यह सब चीजों से तुमको कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। मैं देखूंगी और मेरे बच्चे देखेंगे। तो धीरे-धीरे करके और फिर स्त्रियों के बारे में भी हमको पता है कि किस तरह से कभी-कभी ठाकुर नाराज भी हो जाते थे। फिर भी मां अपने स्त्री भक्तों की रक्षा करती थी। यही अघोरमणि देवी की एक
कहानी: ठाकुर का त्याग और माँ की व्यावहारिकता
कहानी गोपाल मां की कहानी हमने देखी जय बलराम भवन गई थी वह तो बलराम भवन बलराम बलराम बाबू की घर की जो स्त्रियां थी उन्होंने सोचा यह तो गरीब ब्राह्मणी है थोड़े से कपड़े थोड़े से वस्त्र थोड़ा सा अनाज वगैरह एक पोटली में बांध करके उनको दिया जीवन निर्वाह करने में सहजता हो तो यह पोटली लेकर के मां अघोरमणि देवी गोपाल की मां वह नौका में बैठी है ठाकुर के साथ में दक्षिणेश्वर आने के लिए। अभी ठाकुर ने जैसे ही उनके हाथ में यह पोटली देखी ठाकुर समझ गए कि बलराम भवन से इनको यह सब चीजें उपहार के रूप में दी गई है। यहां पे तो ठाकुर है वह त्याग त्याग के राजा कामिनी कांचन त्याग तो ठीक किंतु संसार में किसी भी तरह का प्रलोभन उनसे सहा नहीं जाता था। किसी भी सांसारिक चीजों के प्रति प्रलोभन तो ठाकुर बड़े ही कतराते हुए बार-बार इस पोटली के सामने देख रहे हैं। मुंह से कुछ बोल नहीं रहे हैं। किंतु उनके चेहरे का भाव देखकर के अघोरमणि देवी को समझ में आ गया कि यह जो उपहार उन्होंने ग्रहण किया है बलराम मंदिर से वह ठाकुर को पसंद नहीं आया। तो बेचारी यह गोपाल की मां भी बड़ी दुखित हो गई। जैसे ही नौका दक्षिणेश्वर में आई मां वो सीधी गई नहबत में मां शारदा के पास में और बड़ी ही दुखी होकर के रोती-रोती कहने लगी कि मां मैं तो यह ले आई वहां से ठाकुर को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई तो मैं अभी इसको गंगा में फेंक देती हूं। तो मां ने उनको बड़ा आश्वासन देकर के कहा कि देखो यह ठाकुर को तो पता नहीं है संसार कैसे चलता है। वो तो ठाकुर कहते हैं ना मां कहती है ना कि ठाकुर पायसेर बाटी और माथेर मुंडा एटा माथेर मुंडी एटा तो मथुर जुगा तो अर्थात कि यह पायसेर बाटी खीर की कटोरी और मछली का माथा खाने के लिए यह तो मथुर बाबू जुगाड़ करता था। ठाकुर को क्या पता यह सब कि संसार कैसे चलता है। यहां पर मां बैठी है नबत में जभी भी कुछ भी चाहिए तो ठाकुर आदेश करेंगे मां उसको प्रस्तुत कर देगी। उनको थोड़ी ना पता है कि संसार में किस तरह का दुख कष्ट अभाव है। तो बेटा तुम इसको अपने ही पास में रखो। तुम ऐसी कोई चिंता मत करो कि ठाकुर नाराज हो जाएंगे तुमसे। तो अघोरमणि देवी के मन में थोड़ा सा विश्वास सांत्वना प्राप्त हुई। सध्यारा प्राप्त हुआ और उन्होंने वह उपहार जो था अपने पास में रख दिया। देखिए ठाकुर ऑर्डर करके जैसे
कहानी: श्री रामकृष्ण का हास्य-रस
ही सब चीजें ठाकुर के पास में आ जाती थी। उसका एक उदाहरण है एक फनी स्टोरी वही जय राम भाटी की हमने उस जय राम भाटी वाले चैप्टर में इसका पाठ भी किया था। गंभीरानंद जी की पुस्तक में एक बार खाने के लिए बैठे हैं। यह ठाकुर और हृदय जय राम भाटी की ना कामरार पुकुर की बात है। उस समय ये ये लोग दक्षिणेश्वर से लोग जब कामार पुकुर गए थे उस समय की बात है और उस समय मां को भी जयराम भाटी से बुलाया गया था। तो मां भी खाना बना रही थी। उस समय ठाकुर के लिए तो वो रामलाल दादा की जो पत्नी जो है रामलाल की मां जो है अर्थात कि रामेश्वर की पत्नी रामेश्वर थे ठाकुर के मध्यम भ्राता ठाकुर सबसे छोटे थे रामकुमार रामेश्वर रामकृष्ण तीन भाई थे तो उसमें जो रामेश्वर थे उनकी पत्नी उस समय थी तो वो और मां शारदा देवी यह दोनों खाना बना रही थी तो ठाकुर ने खाते-खाते कहा कि यह जो एक पकवान है वह जिसने बनाया है वह है रामदास बद्दी और यह जो पकवान है वह जिसने बनाया है वह है छिनाथ सेन छिनाथ हाथुड़े अर्थात कि क्या कि रामदास बोलकर के एक वैद्य था इसका एक स्टैंडर्ड था जो कि एक क्रेडिबिलिटी थी वो जब ट्रीटमेंट करेगा तो ट्रीटमेंट का अच्छा फल भी आता था और वहां पर एक श्रीनाथ सेन बोल के एक हाथूड़े था अब यह हाथूड़े क्या है कि वह कोई एक सिस्टमेटिक ट्रेनिंग लिए बिना यह लोग सब ट्रेनिंग ट्रीटमेंट करते हैं। वो रोगी का यदि कल्याण होना है। रोग दूर होना है तो हो भी सकता है। नहीं होने से यह बेचारों की अवनति भी होती है। यह बेचारों का मृत्यु भी होता है। यह कुछ कह नहीं सकते। यह हथौड़े की ट्रीटमेंट किस तरह की होगी। तो ठाकुर ने अभी ये रामलाल की जो मां जो थी वो अच्छा खाना पकाती थी। तो ठाकुर ने कहा कि रामलाल की मां के द्वारा जो खाना बनाया गया है पकवान वो है रामदास वैद्य गांव की लैंग्वेज में बद्दी तो यह रामदास वैद्य का यह पकवान है और यह जो मां ने जो ये बनाया है पकवान वो है छनाथ सेन छनाथ हातुड़े श्रीनाथ को बोलते हैं छनाथ ये जो गांव की लैंग्वेज में जिस तरह से अपभ्रंश होता है तो मां यह बात को कहती है बाद में कि वो देखिए कि रामलाल की मां हुई वो रामदास वैद्य और मैं हो गई यह श्रीनाथ अथूड़े। तो इस तरह से ठाकुर मुझे कहते थे। कि देखिए कि जैसे ही ठाकुर ने कहा हृदय हंसने लगा और फिर हंसते-हंसते क्या कहता है कि यह तो बात सही है कि ये रामलाल की मां है। वो राम रामदास वैद्य की तरह अच्छा पकवान बनाती है। किंतु यह जो रामदास वैद्य जो है उसको आप यदि बुलाएंगे तो विजिट का बहुत सारा रुपया देना होगा। महंगा है। सब समय अवेलेबल नहीं रहेगा। जबकि यह हाथ है। हथौड़े को कभी भी आप बुलाएंगे वह इमीडिएटली हाजिर हो जाएगा। आपका जो भी काम कहेंगे कर देगा। और माने गा पा टेपा परजंतो अर्थात कि यदि वह पैर दबाने है वो देह की जो मसाज करना है वह सब करने के लिए भी यह उपलब्ध है तो ठाकुर हंसते-हंसते कहते हैं कि हां यह बात तो सही है। अर्थात कि देखिए कि मां सब समय अवेलेबल है। ठाकुर का कोई भी काम करना है उसके लिए। जबकि यह जो रामलाल की मां है वह तो दक्षिणेश्वर में ही आने वाली है। उनके हाथ का अच्छा पकवान है। वह तो आपको कामार पुकुर में ही खाने को मिलने वाला है। तो यह ठाकुर का एक ह्यूमरस वे है यह कहने का कि मां सब समय अवेलेबल है। ठाकुर को जो चाहिए सब प्रस्तुत कर देती है। अभी मां को पता है कि ठाकुर इस तरह से जो जगत से कट ऑफ होकर के रहते हैं। यह अघोरमणि देवी को मां कहती है। ठाकुर को कैसे पता कि संसार का अभाव क्या है? तो देखिए कि इस तरह से मां सबकी रक्षा करती थी। मां का प्रेम जो था बहुत बार ऐसा हुआ है। देखा है कि ठाकुर के मना करने पर भी हालांकि मां थी राम कृष्ण गत प्राणा ठाकुर के श्री चरणों में ही ठाकुर के ऊपर में ही मां का संपूर्ण शरणागति था। इसके बावजूद जहां पर वह मातृत्व का इलाका प्रारंभ होता है, मातृत्व का एरिया जब प्रारंभ होता है, वहां पर मां ठाकुर की सत्ता को भी जैसे कि स्वीकार नहीं करती है। तो यह जो है कि मां का जो मातृत्व है, वह सिर्फ एक चंद चुनिंदा भक्तों तक सीमित ना रह जाए। मां का अपना मां का मातृत्व अपने यह जो स्नेह पाश है उसमें पूरे विश्व को धीरे-धीरे करके आवृत कर ले इसके लिए ठाकुर मां को तैयार कर रहे थे। तो किस तरह से ठाकुर मां को यह अपना यह जो भविष्य का दायित्व है, रिस्पांसिबिलिटी है, वह ग्रहण करने के लिए उपदेश भी दे रहे हैं। बातों में मां को विनती भी कर रहे हैं। और जब मां यह संदेह प्रकट करती है, ऑब्जेक्शन खड़ा करती है कि मैं तो स्त्री हूं। मैं क्या कर पाऊंगी? तब ठाकुर कहते हैं बड़ा ही स्टार्टलिंग स्टेटमेंट कि मैंने और क्या किया है? तुमको तो इससे कहीं अधिक करना है। तो यह सब बातें हमारी चल रही थी।
ठाकुर ने लाटू महाराज को माँ की सेवा में नियुक्त किया
यह भारत समर्पण चैप्टर है। उसमें हमने आखिरी एक प्रसंग देखा था लाटू महाराज का कि मां को जैसे भक्तों की संख्या बढ़ने लगी। खाना बनाने में मां का कष्ट भी बढ़ने लगा। मां का कार्य भी बढ़ने लगा। उसी समय लाटू वहां पर दक्षिणेश्वर आकर के रह रहा था। वो लाटू महाराज भविष्य के स्वामी अद्भुतानंद ठाकुर ने देखा कि यहां गंगा के किनारे एक ओर तो लाटू महाराज ध्यान कर रहे हैं। दूसरी ओर मां नहबत में बैठकर के यह रोटी बनाने के लिए आटा प्रस्तुत कर रही है। तो ठाकुर ने जाकर के लाटू को कहा कि अरे ओरे लेटो तू एक खाने बोश आिश और उननी जे नोबते रोटी बेलार लोग पा ना ओरे लेटो तुम यहां पर बैठे हो और वो उनको नहबत में रोटी बेलने के लिए लोग नहीं मिल रहे हैं ऐसा बोल के ठाकुर लाटू को लेकर के लाटू महाराज को लेकर के नहबत में आए मां के साथ में इंट्रोड्यूस करवा दिया कहा छलेटी बेश शुद्ध शुद्ध यह लड़का बड़ा ही शुद्ध शुद्ध सात्विक है। तुम्हार जोखन जा प्रयोजन हबे एक के बोलो एक कोरे देबे तुमको जब जो प्रयोजन होगा इसको कहना यह कर देगा तो बोधी लाटू श्री माय परिवार भुक्त होले तब से लेकर के लाटू मां के परिवार का सदस्य
प्रारंभिक रामकृष्ण संघ के 3 चरण
बना उस समय मां इस तरह से लज्जा पटावृत्ता थी कि बहुत कम लोग ही मां के बारे में जानते थे मां की महिमा से परिचित थे किंतु इसके बावजूद और मां की महिमा का जो जाहिर पब्लिक में जो प्रचार होना शुरू हुआ वह तो बाद में ही हुआ। स्वामी जी की महासमाधि के बाद में ही हुआ था। और यह भी हमने देखा था कि किस तरह से रामकृष्ण संघ की टाइमलाइन इसको आप तीन मेजर डिवीजन में डिवाइड कर सकते हैं। तीन चैप्टर्स में मेजर फेजेस में बांट सकते हैं। एक तो है कि श्री रामकृष्ण देव की बाल्य लीला उनकी साधना और फिर कोलकाता में धर्मचक्र प्रवर्तन वो एक फेज हो गया। अभी दूसरा फेज स्टार्ट होता है। ठाकुर की महासमाधि से स्वामी जी के कंधे पर यह जो रामकृष्ण संघ का जिम्मा आन पड़ा था। उस समय वही एक आधे दर्जन एक दर्जन लड़के थे। एक टूटी फूटी एक घर में भूत म भूत बंगलों में रहते थे। म ह्टेड हाउस में रहते थे। किंतु सपने थे बहुत बड़े। खानेपीने के लिए क्या भी अभाव था। किंतु सपना था कि भारतीय आध्यात्मिकता से पूरे जगत पर जय करेंगे। तो वहां से लेकर के रामकृष्ण संघ की स्थापना, रामकृष्ण मिशन एसोसिएशन की स्थापना, बेलूर मठ की स्थापना, रामकृष्ण मठ की स्थापना, एक चार्टर बनाना, गुरु भाइयों को ट्रस्टी बनाना, एक कॉरपोरेट स्ट्रक्चर देना, प्रॉपर फाइनेंसिंग खड़ा करना और फिर सिस्टमेटिक रूप से शिव ज्ञाने जीव सेवा और आत्मनो मोक्षार्थम जगत हिताय च इस सब कार्य गति का कार्य विधि ियों का प्रारंभ करना। यह कमर परिश्रम स्वामी जी ने कुछ ही सालों में करके दिखाया। 1886 अगस्त में ठाकुर की महासमाधि के बाद से लेकर के यह फोर्थ जुलाई 192 यह स्वामी जी का कार्यकाल था। और जैसे ही स्वामी जी की महासमाधि हुई मां शारदा देवी धीरे-धीरे करके सभी की नजर यह जो स्वामी जी ने वर्ल्ड वाइड रामकृष्ण संघ खड़ा किया था कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर दिया था सिस्टमेटाइज उसको जो किया था उसकी पूरी आध्यात्मिक जवाबदारी मां शारदा के ऊपर में आन पड़ी तो मां भी बाय दैट टाइम तैयार हो गई थी मां को भी अभी पता चल गया था कि रामकृष्ण कृष्ण संघ की जितनी भी क्राइसिस आती है भविष्य में तो यह उनके जितने संतान है उन्हीं के पास में आएंगे इसका सॉल्यूशन खोजने के लिए यहां पे स्वामी ब्रह्मानंद जी है रामकृष्ण संघ के रामकृष्ण ऑर्डर के प्रेसिडेंट यहां पे स्वामी शारदा जी है रामकृष्ण संघ के सेक्रेटरी यहां पे पूरे वर्ल्ड वाइड रामकृष्ण संघ के साधुओं का नेटवर्क फैला हुआ है वहां अमेरिका में यहां पे थे अमेरिका अमेरिका में थे त्रिगुणातीतानंद जी साउथ इंडिया में थे शशि महाराज रामकृष्णानंद जी यह रिलीफ वगैरह एक्टिविटी करने वाले थे अपने अखंडानंद जी तो देखिए कि यह तो ठाकुर के ही शिष्य थे उसके बाद में बेलूर मठ में थे महापुरुष महाराज और यह स्वामी प्रेमानंद जी महाराज इन लोगों का जो नेटवर्क था ये तो डायरेक्ट डिसाइपल के अंडर में ये सेकंड जनरेशन ऑफ साधुस का आना प्रारंभ हुआ वीजांद जी है, शुद्धानंद जी है। एक के बाद एक साधु आते गए। यंग लड़के आते गए। यह क्वालपाला क्वालपाड़ा के लड़के थे। सब आकर के मां के पास में आध्यात्मिक मार्गदर्शन की अपेक्षा रखकर के उनके श्री चरणों के पास में उपस्थित हुए थे। तो मां को पता था कि उनके आध्यात्मिक कल्याण की जवाबदारी अभी उन्हीं की है। तो 1902 से लेकर के मां की खुद की महासमाधि 1920 तक का मां का मिनिस्ट्री चला है। इससे पहले मां ने आध्यात्मिक उपदेश नहीं दिए हैं। ऐसा नहीं है। ठाकुर के रहते-रते ही और ठाकुर के रहते-रहते कहां ठाकुर के साथ में प्रथम मुलाकात होने से पहले भी जयराम बाटी में से ही हम देख रहे हैं कि मां का मातृत्व जैसे कि प्रस्फुटित हो रहा है। किंतु वह क्या था कि बहुत ही चुनिंदा गिनेचुने लोगों तक वह सीमित था। यह पूरे विश्व में मां का मातृत्व प्रचारित होना। यह तो स्वामी जी के अमेरिका से लौटने के बाद में ही धीरे-धीरे करके प्रारंभ हुआ था। एक बड़ी सिग्निफिकेंट घटना है। जबकि मां अपना फोटोग्राफ लेने के लिए वो तैयार हो गई थी। जब यह सारा ओलीबुल ने मां को कहा कि मां मैं आपका फोटो लेना चाहती हूं। मैं अपने पास में अमेरिका जाकर के रखूंगी। आपका फोटो देखकर के मेरे हृदय को शांति मिलेगी। तो पहले तो मां मना ही कर रही है। फोटोग्राफर होता है पुरुष और मां ने तो कभी किसी पर पुरुष के सामने घुमटा खोला नहीं है। किंतु फिर जब सारा ओली बुल ने इतनी रिक्वेस्ट की तो मां सम्मत हो गई। मां का फोटो लिया गया। दो फोटो हैं मां के और उसकी भी कहानी पता है कि एक फोटो में तो मां बड़ी ही लज्जत लज्जित होकर के चेहरा अपना थोड़ा सा झुका करके बैठी है और उनका पूरा देह उनकी वस्त्र से आवृत है। तो फिर सारा ओलीबुल ने कहा कि मां कैमरे के सामने थोड़ा सा देखिए और मां के श्री चरण पे थोड़ा सा उन्होंने अनावृत कर दिया। क्यों? क्योंकि भक्तों की इच्छा होती है वही श्री चरण का दर्शन करें। तो फिर वो मां के श्री चरणों को उनके पैरों के अंगूठे हैं, पैरों की उंगलियां है कुछ उसको अनावृत किया और फिर मां पहली बार कैमरे के सामने देखती है अर्थात कि हमारे सामने देखती है। तो वो एक सिग्निफिकेंट स्टेप था। इस तरह से एक के बाद एक स्टेप्स लेकर के फिर मां का मातृत्व धीरे-धीरे करके उसकी जो सुवास है प्रस्फुटित होते गई। रामकृष्ण संघ की प्रत्येक कार्य पद्धति में प्रत्येक कार्य प्रणाली में प्रत्येक कार्य में जैसे कि मां का आशीर्वाद था। रामकृष्ण संघ के साधु एक भी महत कार्य मां की आज्ञा और मां के आशीर्वाद बिना नहीं करते थे। तो यह मां के जीवन का जो संपूर्ण आर्क है, रामकृष्ण संघ का जो संपूर्ण ट्रेजजेक्टरी है, इस ट्रेजेक्टरी में हम लोग पहुंचे हैं। पहले तो गंभीरानंद जी ने हमको ठाकुर को कैंसर हुआ। वो कहानी कहना प्रारंभ कर दिया। काशीपुर, श्यामपुकुर और काशीपुर तक ले आए। किंतु फिर बैक ट्रैक करके फिर से वही दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर चले गए। सर्वप्रथम जो फेस था मां का दक्षिणेश्वर के वृतांत का निरूपण करने का गंभीरानंद जी का उसमें उन्होंने यही बात पर ज्यादा ध्यान दिया था कि किस तरह से मां ठाकुर के आज्ञावर्ती होकर के ठाकुर के पास में से अपने खुद के आध्यात्मिक जीवन का गठन करती है। किंतु यह जब गंभीरानंद जी महाराज बैक ट्रैक करके फिर से जब दक्षिणेश्वर जाते हैं तो अभी दूसरी कहानी कहते हैं। एक और मां मां का दो फेजेस पैरेलल चल रहा था। एक और तो थी कि मां ठाकुर से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करती है। दूसरा था कि मां का खुद का जो मातृत्व है वो किस तरह से प्रस्फुटित हो रहा था। ब्लूम हो रहा था। तो यह बैक ट्रैक करके गंभीरानंद जी फिर से दक्षिणेश्वर के दिनों की ओर गए हैं। और इस बार गंभीरानंद जी हमको मां के मातृत्व के बारे में मां की गुरु शक्ति है उसके बारे में बता रहे हैं। तो यह भार समर्पण चैप्टर में हम यहां तक पहुंचे। इसके आगे महाराज जी क्या लिखते हैं? श्री श्री ठाकुर मानस पुत्र श्रीजुक्त तो राखाल स्वामी ब्रह्मानंद जी जोखन दक्षिणेश्वर आशेन ठाकुर ताहा के तो श्री माय निकट लया गया छिलेन श्री श्री ठाकुर के मानस पुत्र श्रीक्त तो राखाल अर्थात स्वामी ब्रह्मानंद जी भविष्य के स्वामी ब्रह्मानंद जी विजा होम वराह नगर मठ में हुआ था उसके बाद के ब्रह्मानंद जी सर्वप्रथम जब दक्ष सर्वप्रथम तो नहीं किंतु जब दक्षिणेश्वर में आए थे तब ठाकुर ही उनको उस समय मां के पास में ले ले गए थे। श्री जुग तो राखाले पत्नी आिले ताहा के श्री माय निकट पाठाया दिया त बोलिया छिलेन टाका दिया जेनो बोवेर मुख देखे जब राखाल की पत्नी आई थी दक्षिणेश्वर में तो ठाकुर ने उनको भी मां के पास में भेज दिया था और कहा था पैसा देखकर के टाका दिया पैसा देकर के बहू का मुख देखना है यह उस समय की प्रथा थी कि बहू का नई दुल्हन आई है तो पैसा वह तो घुमटाना तो पैसा देकर के उसका घुमटा खोल के उसके श्री मुख का दर्शन करना। तो यह बात भी ठाकुर ने उनको मां के पास में भेज के कहा था। यह उनका नाम विश्वेश्वरी और विश्वेश्वरी की कहानी भी बड़ी ट्रेजिक है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में राजा महाराज राखाल जब यह प्रवृज्या के लिए चले गए थे तो विश्वेश्वरी ने भी गृहस्थ संसार के सभी जो सुख है उसका त्याग किया था। बड़े ही सामान्य आहार ग्रहण करती थी और जैसे जमीन पर ही सोती थी। बिस्तर के ऊपर में नहीं वह भी तपस्या करती थी। वह भी सतत जप करती रहती थी। एक दिन एकाएक हुआ ऐसा कि सपने में उसने देखा कि राजा महाराज का देह त्याग हो गया है। तो अभी क्या है कि देखिए इसका भी एक सिंबॉलिक सिग्निफिकेंस है। राजा महाराज का देहत्याग तो हुआ नहीं था। यह तो हमको सबको पता है। किंतु जब उनकी पत्नी ने यह देखा सपने में कि उनका देह त्याग हुआ है। इसका अर्थ क्या है? उस समय मोस्ट प्रोबेबबली राजा महाराज वृंदावन में कुसुम सरोवर के किनारे तपस्या कर रहे थे। मोस्ट प्रोबेबबली जहां पर भी हो वह प्रवज्जा में ही थे और तपस्या ही कर रहे थे। अभी मेरा थरी ऐसा है कि राजा महाराज के मन की यह जो त्याग, तपस्या और आध्यात्मिक सिद्धि उस समय उस दिन एक क्रिटिकल पॉइंट, एक क्रिटिकल मास को पहुंच गई होगी और उनको कोई ना कोई आध्यात्मिक प्रचंड सिद्धि प्राप्त हुई होगी। यह जो राखाल में से स्वामी ब्रह्मानंद का जो रियल ट्रांसफॉर्मेशन हुआ वह शायद हो सकता है उस दिन हुआ होगा। यह बाद के हम लोग डिस्क्रिप्शन भी पढ़ते हैं कि राजा महाराज प्रवज्जा के लिए जब वराह नगर मठ से जब निकले थे और फिर वह जो प्रवज्जा से तपस्या करके सिद्धि प्राप्त करके वापस आए आलम बाजार मठ में तो बहुत सारे लोगों ने उनका यह ट्रांसफॉर्मेशन देखा था कि अभी यह जो धीर गंभीर राजा की तरह ठाकुर के मानस पुत्र की तरह जो राजा महाराज दिख रहे हैं वह पहले के राजा महाराज से बहुत भिन्न है तो यह जो स्पिरिचुअल ट्रांसफॉर्मेशन है मुझे ऐसा लग रहा है कि जिस दिन विश्वेश्वरी को यह सपना आया होगा उस दिन इसका एक क्रिटिकल फेस हुआ होगा फेस ट्रांजिशन हुआ होगा तो जो भी है उस जैसे ही उसने यह सपना देखा दूसरे ही दिन उसने आत्महत्या कर ली तो दिस इज हर ट्रेजिक स्टोरी तो यहां पे महाराज लिखते हैं कि राखाल की पत्नी भी जब दक्षिणेश्वर आई थी तो ठाकुर ने उसको मां के पास में भेज दिया था। ठाकुर निर्देश श्रीक्त गोपाल दादा
बूड़ो गोपाल और योगेन महाराज माँ की सेवा करते है
भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद जी मायर बाजार करते एवं श्रीजुक्त जोगेन स्वामी जोगानंद जी नाना कार्यजे तहा के शजो करतेन ठाकुर के ही निर्देश अनुसार यह गोपाल दादा बूढ़ो गोपाल जैसे हमारी भाषा में स्वामी जी की भाषा में स्वामी अद्वैतानंद जी भविष्य के मां के लिए बाजार में से परचेस जो कुछ भी करना था यह तेल होते हैं मसाले होते आटा होता है जो कुछ भी वह बाजार में से परचेस करना होता था वह करते थे एवं श्रीजुक्त तो जोगेन अर्थात भविष्य के योगानंद जी विभिन्न कार्यों में उनको सहाय करते थे। योगानंद जी का हमको पता है कि बाद में मां के प्रथम सेवक के रूप में उन्हीं का नाम आता है। योगानंद जी महाराज उसके बाद में त्रिगुणातीतानंद जी महाराज और फिर आखिर में स्वामी शारदानंद जी महाराज ठाकुर के यह तीन डिसाइपल थे जिन्होंने मां की सेवक के रूप में मां की सेवा में अपना पूरा जीवन जैसे कि समर्पित किया था।
माँ सारदा बालक-भक्त पूर्ण की बाल-गोपाल भाव से सेवा करती है
श्रीजुक्त पूर्ण दक्षिणेश्वरे आशिले ठाकुर ताहा के आहारे जन नोते पाठाईले जब पूर्ण दक्षिणेश्वर में आया था ठाकुर ने उसको आहार करने के लिए नहबत में भेजा था यही पूर्ण जो कि ठाकुर कहते थे ईश्वर कोटि है ठाकुर के छह ईश्वर कोटि संतानों में यह एक अनफॉर्चूनेटली उसकी मां का उनके प्रति जो आकर्षण था जो इतना ज्यादा था। इतना ज्यादा मोह था इनके ऊपर में कि इनको त्याग करने नहीं दिया। सन्यास का रास्ता साधना का रास्ता अपनाने नहीं दिया। उनकी शादी करवा दी। उस समय ठाकुर ने भी चेतावनी दी थी और बादबाद में जब यह बहुत बीमार हो गए थे। उस समय मां उद्बोधन में ही थी। ठाकुर की और स्वामी जी की महासमाधि के बाद की बात है। वह यह पूर्ण की मां बार-बार मां शारदा के पास आती है। विनती करती है कि मां आप मेरे बेटे को बचा लीजिए। तो मां भी थोड़ी सी नाराज हो जाती थी और उसकी मां के मुंह पर तो नहीं कहा किंतु बाद में कह रही है मां शारदा कि देखिए ठाकुर ने तो कहा ही था कि उसकी शादी मत करवाओ। शादी करवाने से उसका देह ज्यादा टिकेगा नहीं। तो आखिर में वही हुआ बीमारी में उनका यंग एज में ही युवावस्था में ही मृत्यु हो गया था। हालांकि उन्होंने रामकृष्ण संघ के कार्य में काफी योगदान दिया था। तो वही पूर्ण तो उस पूर्ण को ठाकुर ने मां के पास में नौबत में आहार करने के लिए भेजा था। श्री मां तहार अभिप्राय अनुसारे से दिन पूर्ण के मालो चंद ने भूषितो कोरिया ओ शने पारश्व बोसया विविध व्यंजना आदि द्वारा भोजन कराइलेन एवं भोजनते आचमनेर जनो तहार हस्ते जल ढालिया दिलन माने ठाकुर के अनु अभिप्राय अनुसार उस दिन पूर्ण को माला और चंदन से आभूषित करके सस्नेह अपने पास में बिठाकर करके विभिन्न व्यंजनों के द्वारा उनको भोजन करवाया और भोजन के आखिर में आचमन के लिए उनके हाथ में उन्होंने पानी डाल दिया। देखिए ठाकुर ने मां को कहा कि इस तरह से बाल गोपाल की सेवा की जाती है। ठाकुर मध्यम नोबते पारश्व आशिया की भाबे की कोते होबे बोलियाते छिलेन ठाकुर बीच-बीच में नबत के पास में आकर के किस तरह से क्या करना है बोल दे रहे थे अर्थात कि मां ने जिस तरह से यह पूर्ण को माला और चंदन से आभूषित किया किस तरह स्नेह पूर्ण अपने पास में बिठा के आहार करवा रही है। आहार के बाद में उसका हाथ धुलवा रही है। यह सब ठाकुर के निर्देश अनुसार मां कर रही थी और ठाकुर भी वो जैसे उनका एक एशियस नेचर था ना एक बच्चे की तरह मां को बोला तो है कुछ किंतु मां उसके अनुसार कर रही है कि नहीं कर रही है। वो थोड़ा सा उनको टेंशन हो जाता था। तो नौबत के सामने आकर के बाहर खड़े-खड़े मां को बोलते थे कि ऐसा करो ऐसा करो। फिर बोल के वो अपने कमरे की ओर चले जाते हैं। किंतु फिर से वह मन में होता कि नहीं इस तरह से करना चाहिए। मां फिर उसको फॉलो कर भी नहीं रही है कि नहीं। तो फिर वापस जाकर के फिर से दूसरा इंस्ट्रक्शन देते। तो इस तरह से ठाकुर बीच-बीच में नबत के सामने आकर के किस तरह से क्या करना चाहिए बोल दे रहे थे। एवं तहात्य तृप्त ना होइया और इससे भी तृप्त नहीं होकर के श कोखे जाते पुनः फिरिया आशिया नूतन नूतन निर्देश देते छिलेन और इससे भी तृप्त नहीं होकर के अपने कमरे की ओर जा रहे हैं किंतु जातेजाते ही फिर से वापस आए मन में कोई नई बात वो प्रकट हुई कि ना इस तरह से इसकी सेवा करनी चाहिए बोल के फिर से नहबत में आकर के नए-नए निर्देश देते हैं देखिए कि यह सुंदर कितना अपना आलेखन है। भारत में यह जो भक्ति मूवमेंट का प्रारंभ हुआ था। यह पुष्टि मार्ग संप्रदाय या तो श्री वैष्णविज्म है। यह विभिन्न चैतन्य महाप्रभु के यह सब संप्रदाय उस समय के भक्ति संप्रदाय बाल कृष्ण की भगवान कृष्ण की राम लल्ला की आराधना के आसपास में प्रकट हुए थे। यह मातृ भाव और यह बालक भाव संतान भाव मधुर भाव के साथ में ही यह जो कुछ भाव थे उस समय के भारत की उस समय की आध्यात्मिक मूवमेंट की भारत को सबसे बड़ी विश्व को सबसे बड़ी यह गिफ्ट है। तो यहां पर भी ठाकुर चाहते थे कि मां के भीतर में भी अपने संतानों के प्रति यह जननी का भाव प्रकट हो। अपने संतानों को मां सिर्फ एक संतान के रूप में ही नहीं किंतु एक बाल गोपाल के रूप में राम लल्ला के रूप में देखे यह बात ठाकुर चाहते थे। इसलिए महाराज यहां पर लिखते हैं श्री मां होए तो से दिन मातृत्व परिपूर्ति सहित बालक नारायण पूजाओ शिखिया छले श्री मां हो सकता है कि होए तो हो सकता है कि उस दिन मातृत्व की परिपूर्ति के साथ-साथ में बालक नारायण की पूजा करना भी सीखी थी। सीखे थे। देखिए हो तो इस शब्द का बड़ाेंस है। मां अपना मातृत्व की परिपूर्ति करना न जानती हो अपने संतानों को नारायण ज्ञान से देखने की उनमें यह एक इनेट इनबोर्न एबिलिटी ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। किंतु क्या है? यह तो लीला है ना। लीला में सभी चीजों को आपको एक पब्लिक एक दिखाना पड़ता है कि इस तरह से यह सब कुछ होता है। यह जो सब घटनाएं हैं, यह घटनाओं का आलेखन क्यों किया गया है? ठाकुर और ठाकुर को मां की एक वैदिक पूजा आराधना करने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? इस शोशी पूजा के माध्यम से क्यों यही ठाकुर मां को नारायण को इस तरह से पूर्ण को एक नारायण ज्ञान से देखकर के पूजा करना सिखाते हैं क्योंकि यह सब घटनाएं वह एक पब्लिक जन समाज में इसकी बड़ी ही गहरी असर छूटती है। यह अन्नकूट महोत्सव ठाकुर ने जब उनकी तंत्र साधना शक्ति साधना की परिसमाप्ति हुई तो उस समय भैरवी ब्राह्मणी ने दक्षिणेश्वर में उत्सव वगैरह किया था अन्नकूट महोत्सव वगैरह जो हुआ था तो यह सब महोत्सव उत्सव यह सब वैदिक पूजा पद्धतियां अपने मन में सब तरह के भाव उपस्थित होने के बावजूद यह वैदिक पूजा या तो वैदिक पद्धति के हम क्यों आशरा लेते कहते हैं क्योंकि दो होता है एक तो होता है रियलाइजेशन दूसरा होता है उसका मैनिफेस्टेशन या तो फिर कहेंगे कि जन समाज के सामने उसका प्रगटीकरण यह भाव का प्रगटीकरण जब तक नहीं होता है हम लोग तो कुछ सीखेंगे ही नहीं हमारे गंभीरानंद जी को यह सब घटनाएं लिखने के लिए मिलेगी ही नहीं जो भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन जिस तरह से श्रीमद् भागवत में किया गया है। जिस तरह से एक के बाद एक आचार्य और संत प्रकट होकर के उन्होंने पदावलियों के माध्यम से राधा कृष्ण उनका अभिनय उनकी लीला जो है उसका जो वर्णन किया है वो वर्णन ही हमको बताता है कि भगवान कृष्ण का यह मां राधा का क्या भाव था? भगवान राम का मां सीता का क्या भाव था? यह सब घटनाएं यदि हमको नजर के सामने नहीं दिखेगी। यदि मां सीता को लेकर के भगवान राम अयोध्या में ही रहते तो मां सीता के प्रति उनका जो प्रेम था उनका ये जो पुरुषोत्तम के रूप में जितने भी गुण थे मां सीता का सित्व जो था यह सब हमको समझ में ही नहीं आता। यह सब उनके मन में ही मन में रह जाता। इसीलिए मां का अपहरण हुआ। इसीलिए भगवान राम ने लंका पे आक्रमण किया और रावण का वध किया। यह सब बाह्य घटनाएं, बाह्य विधि यह हमारे मन में एक गहरी छाप छोड़ने के लिए की जाती है। तो यहां पर यह जो महाराज ने वैसे लिखा तो है कि मां हो सकती है कि उस दिन मातृत्व की परिपूर्ति के साथ में बालक नारायण की पूजा भी सीखी थी। किंतु गंभीरानंद जी ने होए तो शब्द यहां पर इसीलिए यूज किया है कि हो सकता है और हो सकता है ही नहीं। मेरा पर्सनल ओपिनियन तो यही है कि मां के भीतर में भाव के रूप में यह बात हमेशा से विराजमान होंगी ही होंगी। वही बालिका शारदा जयराम बाटी में अपने छोटे हाथों से यह हवा करती हुई यह खिचड़ी को ठंडी करती है। तभी से तो मां के मन में यह मातृत्व का भाव अपने संतानों को नारायण ज्ञान से देखने का भाव राम लल्ला या बाल कृष्ण के रूप में देखने का भाव वहां से ही विद्यमान था। वहां से ही प्रस्फुटित था। बस यही है कि एक एक्सटर्नल मैनिफेस्टेशन एक बाह्य प्रगटीकरण के माध्यम से हमको भी पता चले कि मां के मन का क्या भाव है। मां और संतान का क्या रिलेशन है। देखिए कि बहुत बार हम अपने को अधम मानते हैं। कहते हैं कि मेरा कोई अस्तित्व नहीं। मैं दीन हीन हूं। मां के पास में मैं आया हूं। मां काली, मां जगदंबा, मां दुर्गा, मां शारदा के पास में आया हूं। उनकी कृपा की भिक्षा करने के लिए। किंतु यह घटना हमको यह भी कहती है कि हम सबके भीतर में वही नारायण एक पोटेंशियल फॉर्म में विद्यमान अवश्य है। हम लोग मां के पास में बिल्कुल ही शून्य होकर के उनका आशीर्वाद ग्रहण करने के लिए नहीं आते। वो शून्यवाद नहीं किंतु दिव्य भाव दिव्यवाद अद्वैतवाद हमारे भीतर में भी वह नारायण है। अपना घमंड त्याग करके शरणागति के माध्यम से इस दिव्यता को प्रकट करना है। हमारे भीतर में भी यह नारायण का दर्शन करना है और फिर मां के पास में शरणागति की भिक्षा करनी है। तो, हमारे भीतर में यह नारायण भाव मां के भीतर में यह जननी भाव यह दोनों का जब यह कॉम्बिनेशन होगा, फ्यूजन होगा, तभी तो कहीं जाकर के रामकृष्ण संघ की जो भावधारा है, उसके साथ में हम लोग सही-सही परिचित होते हैं। हमारी भावधारा में सही-सही प्रवेश करते हैं। इसीलिए यह कितना सिग्निफिकेंट स्टेटमेंट कि मां मातृत्व की परिपूर्ति के साथ में बालक नारायण की पूजा भी उस दिन मां ने की थी।
ठाकुर आदर्श सिखाते हैं, माँ उसे व्यवहार में लाना सिखाती हैं
एक और मां कहती है कि ठाकुर को यह सब क्या पता अधोरमणि देवी को कहती है कि संसार का क्या कष्ट है। दूसरी ओर ठाकुर ही जैसे कि मां को संसार में किस तरह से रहना वो सिखाते हैं। देखिए इसमें क्या है कि ठाकुर जो सिखाते थे वह आदर्श व्यवहार सिखाते थे कि एक आइडियल जगत में रहने का जो आइडियल है जैसे कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम उनका यह जो आदर्श था आदर्श स्थापित करने के लिए उनको पृथ्वी पर आगमन हुआ किंतु आदर्श स्थापित करके क्या फिर वह जगत के कष्ट से मुक्त होकर के नहीं रह पाए क्या नहीं हुआ एक्चुअली वही आदर्श ही उनको इतना सारा कष्ट सामने से वरण करने की ओर ले गया है। वनवास में जाने का अल्टीमेटली तो उनका ही डिसीजन था। वो कहते कि मैं नहीं जाऊंगा तो फिर कोई क्या करने देने वाला है? ज्यष्ठ पुत्र थे। राज्य पे तो अधिकार था किंतु नहीं कि रघुकुल नीति सत चली आई। प्राण जाए पर वचन ना जाए। तो पिता के वचन की रक्षा करने के लिए वह वन में गए। मां सीता को जब मां ने आग्रह किया। लक्ष्मण ने आग्रह किया तो उनको भी साथ में ले गए। मां का जब अपहरण हुआ तो दुखी होकर के रोए भी वो लंका पर आक्रमण भी किया। तो एक और है अपना आदर्श जिसके अनुसार हमको रहना है। दूसरा है कि यह समाज या तो यह संसार या तो यह विश्व जो कि हमको कष्ट के बाद कष्ट देता ही रहेगा। तो ठाकुर ने जो मां को सिखाया था वह था आदर्श कि इस आदर्श के अनुसार रहना है। किंतु फिर इस आदर्श को जगत में वास्तव में कैसे परिणत करना है वो मां का खुद का एक उपलब्धि था जो कि मां हमको सिखाती है। इसीलिए देखिए कि हम लोग जब एनालिसिस करते हैं तो ठाकुर को हम रखते हैं आध्यात्मिक उपलब्धि की कैटेगरी में। स्वामी जी को रखते हैं सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग की कैटेगरी में और मां को रखते हैं कम्युनिटी। यह फैमिली लाइफ की कैटेगरी में। क्यों? क्योंकि ये कम्युनिटी में फैमिली लाइफ में कैसे रहा जाए उसका आदर्श मां ही हमको दिखाती है। अभी ठाकुर सत्य वचन का पालन मां ठाकुर ने कहा कि मैंने मां काली को सब दे दिया। यह लो तुम्हारा धर्म, यह लो तुम्हारा अधर्म, यह लो तुम्हारी भक्ति, यह लो तुम्हारी अभक्ति। किंतु मैं मां को यह नहीं कह पाया कि यह लो तुम्हारा सत्य और यह लो तुम्हारा मिथ्या। तो ठाकुर कहते हैं कि सत्य मैं मां को नहीं दे पाया। तो सत्य वचन के इतने आग्रही ठाकुर और यही मां है झूठ बोलकर के ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाती है। तो आदर्श सिखाया है ठाकुर ने। किंतु आदर्श को संसार में किस तरह से परिणत करना है वह सिखाया है मां ने। ओम