प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध भार समर्पण इस चैप्टर चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं। आज जो टॉपिक हम देखने वाले हैं कि किस तरह से मां ठाकुर का मन समझ करके पहले से ही इस तरह से प्रस्तुति तैयार कर देती कि ठाकुर जब यह सोचे कि हां इस तरह की कोई सिचुएशन खड़ी होने वाली है। इस तरह की कोई परिस्थिति आने वाली है तो वह जाकर के मां को बताएं। तो जाकर के देखते हैं कि मां अब पहले से ही प्रस्तुत होकर के बैठी है। वह जो शोडशी पूजा के समय गंभीरानंद जी का वर्णन है कि जब ठाकुर ने मां की आराधना पूजा करतेकरते जब आखिर में अपनी जपमाला भी उनको समर्पित कर दी। उनको शरणागत हो गए। तो फिर देखिए कि मां और ठाकुर है देह अलग दो देह किंतु दोनों के मन जो है समाधि की उच्च भूमि में एकाकार हो गए हैं। विलीन हो गए हैं। एक ही संगम में दोनों मिश्रित हो गए हैं। तो वही जो एक दो देह परंतु एक प्राण तो यह जिस तरह से मां ठाकुर का मन समझती थी वैसे ही ठाकुर मां का मन समझते थे यहां पर गंभीरानंद जी महाराज ने मां की दृष्टि से ही बात कही है। किंतु हम जब यह पढ़ेंगे तो ठाकुर की दृष्टि से भी हम देखेंगे कि ठाकुर भी मां का मन समझते थे और मां को बिना मतलब कष्ट ना हो मां को कारण बिना कारण ज्यादा काम ना करना पड़े परिश्रम ना करना पड़े यह सब चीजों के प्रति भी ठाकुर का उतना ही ख्याल था तो
माँ सारदा का अद्भुत मनःसंयोग — ठाकुर की इच्छा बिना कहे जान लेने की शक्ति
गंभीरानंद जी क्या कहते हैं भक्तो देर गमनागमन और भजन कीर्तना आदि तो कौन लाई आ उस समय अर्थात कि एक बार जब ठाकुर ने केशव सेन के साथ में मुलाकात की उसके बाद में जब केशव ने कोलकाता के न्यूज़ पेपर में मैगजीन में कोलकाता के नहीं ब्राह्म समाज के किंतु ब्राह्म समाज उस समय काफी प्रख्यात था तो बोलकर के जब यह ब्राह्म समाज के न्यूज़ेपर मैगजीन आर्टिकल वगैरह लिखना शुरू कर दिया टाउन हॉल में वक्त शत्रुता देना ठाकुर के ऊपर में शुरू किया। तब यह एक एजुकेटेड मिडिल क्लास जो है वह ठाकुर के पास में आने लगा। ठाकुर के पास में देखिए कि जब ठाकुर साधना करते थे उस समय सब तरह के साधक या साधिकाएं ठाकुर के पास में आते थे। उस समय और वह भी क्यों पता है? क्योंकि साधना के समय में ठाकुर को यह जो भारतीय जो ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी है हिंदू सनातन धर्म है और उसकी जितनी भी शाखा प्रशाखाएं हैं उसके साथ में ठाकुर को अपने को एक्वेंट करना है। उसके साथ में ठाकुर को परिचित होना है और वह जितनी भी साधनाएं हैं यथाशक्ति सबका अनुष्ठान करके उसमें सिद्धि प्राप्त करनी है। अभी कुछ-कछ जो वहां पर साधक या सिद्ध पुरुष आए थे दक्षिणेश्वर में किसी किसी के नाम तो काफी प्रख्यात है। जटाधारी है, तोतापुरी है, भैरवी ब्राह्मणी है, गोविंद राय है जिसके पास में से ठाकुर ने इस्लाम साधना की थी वगैरह वगैरह किंतु इसके बावजूद हमको पता है कि ठाकुर ने मथुर बाबू को कहा था कि यहां पर दक्षिणेश्वर में जितने भी लोग आए जितने भी साधक आए वैसे तो काली मंदिर में इन सबके लिए भिक्षा की व्यवस्था थी ही थी। किंतु इसके अलावा ठाकुर ने मथुर बाबू को रिक्वेस्ट किया था कि एक पूरा कमरा भर्ती साधुओं को जो गिफ्ट में देने की आइटम्स है जो कि साधुओं की नेसेसिटीज है। दंड है, कमंडलु है, रुद्राक्ष की माला है, वस्त्र वगैरह है जो कि साधुओं को आवश्यक होता है। इस सब तरह की सामग्री से ठाकुर ने जब मथुर बाबू को रिक्वेस्ट किया मथुर बाबू ने एक पूरा कमरा भर के इस तरह की सामग्री का जुगाड़ किया और जो भी वहां पर साधक साधिकाएं आते थे साधु संत आते थे ठाकुर उनको मुक्त हस्त से दान करते थे बोलकर के उस समय कालीवाड़ी जब यह जितने भी यह परिव्राजक सन्यासी साधक थे उसमें काफी लोकप्रिय हो चुकी थी। जो लोग उत्तर भारत से या पश्चिम भारत से यह जगन्नाथ पुरी का दर्शन करने के लिए आते थे। उन सब में यह बात फैल गई थी कि वहां पर कोलकाता में काली मंदिर है। दक्षिणेश्वर के जगह दक्षिणेश्वर में वहां पे साधुओं की साधकों की बड़ी अच्छे से उनकी मेहमान गति होती है। उनके लिए बड़े अच्छे से यह लोग सब व्यवस्थाएं करते हैं। तो यह जब बातें फैलना शुरू हो गई तो फिर देखा कि एक के बाद एक इतने सारे साधक साधिकाएं वहां पे आने लगे। तो उस दिनों की बात है कि बहुत सारे लोग आते तो थे दक्षिणेश्वर में किंतु क्या है कि वे लोग ट्रेडिशनल हिंदू धर्म के साथ में ट्रेडिशनल साधनाओं के साथ में जुड़े होते थे। और इनके साथ में यह ईश्वरीय वार्तालाप करके साधन पद्धतियों के बारे में वार्तालाप करके विभिन्न तरह के साधन मार्ग के बारे में वार्तालाप करके ठाकुर उनसे सीखते भी थे और उनको सिखाते भी थे। ये सीखना सिखाना यह भी हमको पता है कि ठाकुर का यह स्टैंडर्ड ये टेंपलेट था कि किस तरह से भैरवी ब्राह्मणी है। दो सबसे प्रख्यात उदाहरण भैरवी ब्राह्मणी और तोतापुरी दोनों का दोनों से ठाकुर ने सीखा भी सही और इन दोनों की साधना पूर्ण हो उसके लिए ठाकुर ने उनको सहाय भी की। तो यह सीखना सिखाना का यह जो लंबा सिलसिला है वह एक फेस हुआ कि वह ठाकुर के जीवन का मां के आने के साथ में शोडशी पूजा के साथ में वो फेस समाप्त हुआ। जैसे ही शोडशी पूजा संपन्न हुई उसके बाद में एक बिल्कुल नए तरह का साधक वर्ग ठाकुर के पास में आना शुरू हुआ। और वह थे कोलकाता के एजुकेटेड मिडिल क्लास लड़के। उन लोगों को अभी यह सिर्फ लड़के नहीं एजुकेटेड मिडिल क्लास माने वो मिडिल एज हो वृद्ध हो ना कि यह लड़के हो जो भी है किंतु वे लोग म फाइनेंशियली वो स्टेबल सिचुएशन में थे और यह जो फॉरेन एजुकेशन सिस्टम है 1836 में जो भारत में इंट्रोड्यूस की गई थी यह मैकोले के द्वारा तो उस एजुकेशन सिस्टम में यह लोग पढ़ लिख करके वो उसमें एजुकेटेड होकर के एक तरह का स्केप्टिसिज्म हिंदू धर्म के प्रति अपनी सनातन भावधारा के प्रति इनके मन में जागृत हो चुका था। तो देखिए कि यहां पे है पहले तो जो फेस था वहां पे उस तरह के लोग आते थे जो कि हिंदू सनातन धर्म को संपूर्ण रूप से अपना चुके थे। हिंदू सनातन भाव गंगा में संपूर्ण रूप से वह डुबकी मारकर के शरणागत हो चुके थे। तो वह है एक पूरा एक उन लोगों का आने का और यहां पर है नरन है ना कि म नरन इज अ रिप्रेजेंटेटिव बाकी सब देखिए हमको ऐसा लगेगा वैसे कि रामचंद्र दत्त या बलराम बाबू ना कि मास्टर महाशय ना कि यह खोका महाराज ना कि लाटू महाराज ना कि फिर यह बाबूराम महाराज इन सबको देखकर के हमको ऐसा नहीं लगता कि नरेंद्र की तरह पूरे स्केप्टिक हो किंतु जैसे आज के युग में हमको जो कि स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है हिडन नास्तिकता हिडन स्केप्टिसिज्म यह छुपी हुई नास्तिकता सबके भीतर में एक तरह का संशय संदेह तो था ही था कि जिस हिंदू धर्म ने हमको 1000 साल तक गुलाम बनाए रखा उस हिंदू धर्म में कुछ सत्व जैसा कुछ बचा भी है कि नहीं बचा यह संदेह ऑलमोस्ट सभी के मन में अप टू एन एक्सटेंट था ही था और ऊपर में से यह विदेशी शिक्षा प्राप्त की है और यह विदेशी शिक्षा यह विदेशी एजुकेशन सिस्टम वो तो कोई अपनी भारतीय सिस्टम की महिमा गाथा गाने के लिए तो नहीं बनाई गई वो तो हमको एक ग्लोरिफाइड क्लार्क बनाने में मदद करती है। आज का भी एजुकेशन सिस्टम वही है। वो मेकोले जो एस्टैब्लिश करके गया है हमको क्लार्क बनाने का सिस्टम बना करके वो इवन माने अप टू अ लार्ज एक्सटेंट आज भी हम भारतीयों को देखेंगे कि बहुत अच्छे क्लार्क बन सकते हैं। बहुत अच्छे वर्कर बन सकते हैं। किंतु यह लीडरशिप ट्रेनिंग है। एक विज़न है। एक करेज है। एक स्टेमिना है भीतर से कुछ एब्सोलुटली नया करने का। एक एक्सप्लोरेशन की कैपेसिटी है। वह सब कुछ हमको इतना ज्यादा नहीं देखने को मिलता है। तो वही है कि जब यह ठाकुर के पास में यह कोलकाता के पढ़े लिखे लोगों का आगमन हुआ। एक तो है हृदय में छुपा संदेह और जैसे कि नरेंद्र जो है इज अ सिम्टोमेटिक ऑफ एवरीवन ऑफ देम। जिसमें साहस था कि ठाकुर के मुंह पर प्रश्न कर सके। तो देखिए कि दो हिस्से दो कहेंगे कि फेजेस है ठाकुर के पास में आने वाले लोगों के तो यहां पे जब गंभीरानंद जी कहते हैं भक्तों देर गमनागमन और भजन कीर्तन आदि तो खोन लाग आज भक्तों का आना जाना और भजन कीर्तन वहां पर लगा ही रहता है। सतत भक्त लोग आते रहते हैं। सतत ठाकुर अपने कमरे में बैठकर के उनके साथ में वार्तालाप करते ही रहते हैं। सतत ठाकुर भजन, कीर्तन, नृत्य, आनंद, समाधि वह सब लगा ही रहता है। उस समय की यह बात है। किंतु यह कौन सा समय? मां के आने के शोडशी पूजा के बाद का यह कोलकाता के यह एजुकेटेड मिडिल क्लास का यह पूरा ग्रुप अभी ठाकुर के पास में रेगुलर आने लगा है। उस समय का श्री रामकृष्ण संतुष्टि विधाने उत्कृष्ट जीना भक्त जननी श्री माय ताई अब नाय श्री रामकृष्ण की संतुष्टि विधान के लिए उत्कृष्ट जीवना उत्कृष्ट नहीं उत्सृष्ट उत्सृष्ट अर्थात कि जिन्होंने अपने को आत्मसमर्पण कर दिया है जिन्होंने अपने को उत्कृष्ट कर दिया है तो श्री रामकृष्ण की संतुष्टि विधान के लिए उत्सृष्ट जीवना भक्त जननी कैसी मां है भक्त जननी मां को इसीलिए अवसर नहीं है इसीलिए मां के पास में फ्री टाइम नहीं है थोड़ा सा भी समय नहीं है दीबा रात्रों रानना रान चलीते छे कतो दिन रात कितना खाना बनाना चल ही रहा है ये तो काजे मध्य ताहार मौन शर्बदा ठाकुर श्री चरणी पिया था की तो किंतु अभी देखिए कि भक्तों का आना जाना लगा ही है। इसलिए ठाकुर की संतुष्टि विधान के लिए जिन्होंने अपना जीवन उत्सृष्ट कर दिया है। समर्पित कर दिया है। इस तरह की भक्त जननी श्री मां उनका कार्य जो है वह चलता ही रहता है। खाना बनाना चलता ही रहता है। किंतु इतने सारे काम के बीच में भी ताहार मन शर्बदा ठाकुर श्री चरण पिया था कि तो इतना सारा काम चल रहा है उसके बीच में भी मां का मन ठाकुर के श्री चरणों के पास में ही पड़ा रहता से अलौकिक मनः संयोग फले त ठाकुर मुख खुलिया किछु बलि बार पुरबे जेनो समस्त सुनते पते एवं तद तदनुजाई व्यवस्था कोरिया राखी तेन इसी अलौकिक मनः संयोग के परिणाम मनः संयोग अर्थात कि मन का जो मिलन है मन का जो संगम है यह अलौकिक मनः संयम अलौकिक मन का संगम होने के परिणाम फल स्वरूप ठाकुर मुंह खोलकर के कुछ बोले उससे पहले ही जैसे कि मां सब कुछ सुन पाती और उसके उसके अनुसार व्यवस्था करके रख देती। दो तन एक प्राण। ठाकुर यदि मुंह खोल के कुछ बोले उससे पहले ही जैसे कि मां को टेलीपथी के माध्यम से सब कुछ सुनने में आ जाता और वह ठाकुर के इच्छा के अनुसार व्यवस्था करके रख देती। श्रीजुक्तो शारदा प्रवृत्ति अनेक अल्पवयस्को बालक भक्त निकट तखन दरिद्र निबंधन बा अभी अभिभावके विरोध बोश तो दक्षिणेश्वर हते गहे फिर बार उपजुक्त पैसा थाकी तो नाम अच्छा किंतु यह जो इससे पहले यह सेंटेंस का ट्रांसलेशन करें यह जो ठाकुर मुंह खोल के कुछ बोले
भारत की प्रगति का असली रास्ता: योग और वेदांत का पुनर्जागरण
उससे पहले ही जैसे कि मां उसको समझ ले यहां पर हमको को वैसे अलौकिक लगता है। यहां पे गंभीरानंद जी ने लिखा भी है अलौकिक मनः संयोग अद्भुत या तो अलौकिक मन का जो संयोग है इसके परिणाम यह उन्होंने लिखा तो है किंतु अगेन हम लोग वो राजयोग के क्लास याद करेंगे और हमको पता है कि स्वामी जी कहते हैं कि प्राण रूपी यह जो पूरा जगत है वह प्राण के माध्यम से बंधा हुआ है और यह विचार है अपने यह सब भी उसी एक कॉस्मिक प्राण प्राण का ही एक हिस्सा है। और यह प्राण को यदि हम नियमन करना सीख ले तो हम अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचा सकते हैं। यह रिमोट हीलिंग यह भी हम कर सकते हैं कि यदि कहां पर मेरा मित्र बीमार है। मेरा प्रियजन बीमार है। कहीं दूसरे शहर में, दूसरे गांव में, दूसरे घर में तुम्हें अपने घर में बैठकर के यह हीलिंग के विचार जो है, सुस्थता के विचार जो है, आरोग्य की कामना जो है, आरोग्य की इच्छा जो है, वह यदि मैं उनको भेजूंगा तो फिर वे लोग भी स्वस्थ हो जाएंगे। यानी कि स्वामी जी यहां पर जो कुछ भी हम लोग देख रहे हैं ठाकुर के जीवन में भी मां के जीवन में भी जिस तरह की अलौकिक घटना देख रहे हैं इन सबकी व्याख्या वैसे स्वामी जी ने साइंटिफिक बेसिस पर कर ही दी है और इसीलिए मेरा पर्सनली जो मानना है कि आज की जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन है उसकी यह जो प्रगति है या तो फिर उसकी उन्नति है वो क्यों हुई क्योंकि यह ग्रीक जो क्लासिकल लिटरेचर था उसका रहनेसा हुआ इसलिए उसका फिर से पुनर्जन्म रहनेसा अर्थात पुनर्जन्म या तो फिर पुनः जागरण तो ये जो लुप्त विद्याएं थी उस क्लासिकल ग्रीक लिटरेचर रोमन की खास करके ग्रीक लोगों की तो उसका पुनः उसका जो प्रचार प्रसार यूरोप में हुआ वहां से ये स्पार्क ऑफ लर्निंग जन्मा और वहां से ही या फिर ये मॉडर्न साइंस, मॉडर्न टेक्नोलॉजी, मॉडर्न थिंकिंग, मॉडर्न फिलॉसोफी, मॉडर्न गवर्नेंस ये वगैरह सब वेस्ट ने डेवलप किया और इसीलिए कि हमको पता है कि आज वेस्टर्न कंट्रीज जो है वो इतनी ऊंचाई पर बैठे हुए हैं। तो यह हो गया कि वेस्टर्न कंट्रीज के बारे में। मेरा पर्सनल यह मानना है कि यदि हम यह भारतीय आध्यात्मिकता है, भारतीय संस्कृत साहित्य है, भारतीय स्पिरिचुअलिटी या तो फिर यह योग और वेदांत इसका भी रहनेसा यदि भारत में हो तो फिर भारत में भी वो एक स्पार्क जागृत होगा। एक स्पार्क एक रिकिंडलिंग होगा। क्यूरियोसिटी का, आत्मश्रद्धा का, एडवेंचर का, एक करेज का, एक विज़न का और फिर भारत भी अपने वेस्टर्न सिविलाइजेशन की तरह उन्नति के रास्ते पर चलेगा। और ये प्रारंभ तो हो ही गया है। देखिए आज हमको कभी-कभी थोड़ा सा दुख होता है भारत को हम जब चाइना के साथ में या अमेरिका के साथ में कंपेयर करते हैं तो वो देखकर के कि अब अभी भी हम कितने पिछड़े हुए हैं। किंतु आज आप इंडिपेंडेंस के समय जो भारत की परिस्थिति थी या इवन ठाकुर या स्वामी जी के समय भारत की जो परिस्थिति थी देखिए कि ये 70 ईयर 100 ईयर 150 ईयर इसमें हम कितना आगे ऑलरेडी बढ़ चुके हैं। यानी कि हमारा रेट ऑफ प्रोग्रेस जो है वो कोई इतना बुरा नहीं है। बस वही है कि डेमोक्रेसी होने की वजह से या अपने जो एडवांटेजेस या जितने भी ये बेनिफिट प्राप्त होते हैं वो सब डिस्ट्रीब्यूट हो जाते हैं। ऑथॉरिटेरियन सिस्टम यदि होती है डिक्टेटरशिप यदि होती है तो वह क्या करती है कि जितना भी प्रॉफिट होता है सबको बड़े-बड़े प्रोजेक्ट में लगा सकती है। अपने यहां पे अभी भी है कि इलेक्शन आए तो इसको इतना बांट दो, इसको यह बांट दो। बोल के अपना यह जो यह हो रहा है विंड फॉल प्रॉफिट अपनी सिविलाइजेशन का उसको इस तरह से ये डिसीिपेट हो जा रहा है। किंतु एनीवे मुझे ऐसा लग रहा है पर्सनली कि यदि हम अपना जो रामकृष्ण विवेकानंद या तो फिर इन जनरल जो लोग स्पिरिचुअल है यदि ये रमण महर्षि के साथ में जुड़े हो ना कि और कोई भी संस्था के साथ में गुजरात में जैसे स्वामी नारायण है ऐसे बहुत सारी अच्छी-अच्छी संस्थाएं हैं। उनके उनके साथ में जुड़े हुए जो अल्पसंख्यक लोगों के बीच में जो यह योग और वेदांत प्रसरित हो रहा है। उसको यदि एक वाइडर स्वरूप दिया जाए अपने स्कूल के सिलेबस में यदि उसको यह एंटर करवाया जाए तो मुझे लगता है कि इसके बाद में जो आने वाली पीढ़ियां हैं उनका भविष्य बहुत ही अच्छा होगा। तो यहां पे यह अलौकिक मनः संयोग है। तो अच्छा इसके बाद
लज्जाशीला माँ सारदा—जो बिना माँगे ही ठाकुर के बालभक्तों को घर लौटने का पैसा दे देती थीं
में फिर गंभीरानंद जी ने जो पूरा एक लंबा सेंटेंस कहा क्या उसका अर्थ है? शारदा ये अर्थात कि ये शारदा प्रसन्न महाराज त्रिगुणातीतानंद जी महाराज शारदा वगैरह जो छोटी उम्र के बालक भक्त थे उनके पास में दरिद्र्य की वजह यानी कि पैसा नहीं है उसकी वजह या तो फिर उनके यह जो अभिभावक थे उनके जो गार्डियंस वगैरह थे उनके जो वाली मां-पिताजी थे उनके विरोध की वजह से विरोध वशत दक्षिणेश्वर से घर वापस जाने के लिए पैसे रहते नहीं थे। बहुत सारे देखिए लड़के जो कि ठाकुर के पास में आते थे तो मां पिताजी पिताजी है वह क्यों पैसे देंगे कि वो दक्षिणेश्वर के पागल ब्राह्मण के पास में जा रहे हो। उसने कोलकाता के कितने सारे लड़कों का दिमाग खराब करके रखा है। वही जो विज्ञान महाराज की बहन वो जो बता रही है कोलकाता के ना कि सो ना कि इतने सारे लड़कों का दिमाग उन्होंने खा गए हैं। उन्हें दिमाग खराब करके रख दिया है। तो फिर वो पिताजी अवश्य क्यों उनको पैसे देंगे और दक्षिणेश्वर था भी तो कोलकाता से काफी दूर तो फिर वहां आने जाने के लिए आपको नौका से जाना है या घोड़ा गाड़ी में बैठ के जाना है तो पैसा तो लगेगा ही। घोड़ा गाड़ी थोड़ी महंगी होगी। नौका जो है वो थोड़ी सस्ती होगी तो वो नौका नौका में बैठकर के कोलकाता वापस जाए बोल के उनको जो पैसा चाहिए वो पैसा उनके पास में नहीं था। काली महाराज की एक रेमिनेशंस है। वो कहते हैं कि मैंने सुना था कि मुझे योग साधना करनी थी और योग साधना करने के लिए मैंने सुना कि दक्षिणेश्वर के जो परमहंस है उनके पास में से मैं सीख सकता हूं। बोलकर के मैं दक्षिणेश्वर आया। किंतु मैं जितना चलता गया चलता गया। एक बार तो मैं रास्ता ही भूल गया। फिर किसी ने मुझे रास्ता फिर से बताया। फिर से मैंने चलना शुरू किया। रास्ता जैसे खत्म ही नहीं होता है। मुझे यह अंदाज ही नहीं था कि कोलकाता से दक्षिणेश्वर इतना दूर है। अभी शायद वह पहले एकद बार आए होंगे। उनके रिलेटिव्स भी शायद वहां पर रहते होंगे। किंतु क्या है कि सब समय यह लड़के लोग जो है खास करके वह यदि आएंगे तो किसी किसी के साथ में आएंगे। किसी के साथ में यह शेर की घोड़ा गाड़ी है उसमें बैठ के आएंगे। या तो फिर यह शेर की नौका है उसमें आएंगे। पैदल यदि आना होता है तो इतना लंबा समय लगेगा। इतना लंबा रास्ता है इसका तो मैंने अंदाज ही नहीं किया था। तो काली महाराज इस तरह की बातें करते हैं और काली महाराज तो थे फिजिकली और मेंटली फिट वो यदि उनको इस तरह का परिश्रम हो जाए तो फिर सोच लीजिए कि आपको नियमित यदि कोलकाता से दक्षिणेश्वर आना जाना करना है तो फिर किस तरह से आप हर बार पैदल आके जाएंगे। तो इसलिए अभी आते थे तो किसी के अब अभी क्या है कि वो कोलकाता में तो बात फैलती थी कोई भक्त कहेगा कि हां मैं आज दक्षिणेश्वर जा रहा हूं जिसको आना हो वो आ जाए मेरे पास घोड़ा गाड़ी है या तो फिर इस समय हम नौका में बैठकर निकलेंगे बोलकर के तीनचार लोग ना कि जो भी है वो ग्रुप ही वहां से आते थे ग्रुप में किंतु फिर एक बार ठाकुर के पास में आएंगे फिर ठाकुर का ये फिल्टरिंग प्रोसेस स्टार्ट हो जाएगा ये गृहस्थ भक्त है उनको वो जैसे ही संध्या वगैरह होती ठाकुर कहते हैं ठीक है अभी तुम लोग निकलो और फिर यह जो लड़के भक्त हैं उनको भी ठाकुर रख देते थे रात को वहां पे रहने के लिए क्यों क्योंकि उनको साधन भजन की शिक्षा देंगे रात भर जप ध्यान करवाएंगे सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठा के उनके पास में से साधन भजन करवाएंगे बोल के फिर यह लड़के भक्तों को रख देते थे और फिर इनको यदि वापस जाना है तो निश्चय उस समय और तो कोई जो व्यवस्था होती नहीं थी इसलिए उनको को पैसों की जरूरत होती थी। काजे ठाकुर तहा दिग के श्री माय निकट होते पोशाइते बोलले इसीलिए ठाकुर उनको यह खास करके शारदा महाराज की बात हो रही है अपने त्रिगुणातीत महाराज की तो इसीलिए ठाकुर उनको श्री मां के पास में से पैसा लेने को कहते बराह नगर बाजार हो ते बडन स्क्वायर परजन तो शर गाड़ी ते एक आना भाड़ा लागी तो वराह नगर बाजार से बडन स्क्वायर तक जब शेर की आप गाड़ी लेंगे गाड़ी यानी आजकल की गाड़ी नहीं उस समय की घोड़ा गाड़ी तो एक आना भाड़ा लगता पितार भय कातर शारदा आशीले लज्जाशीला श्री मां तहार बाड़ी जाब मुहूर्ते चारटी पैसा नौबते दरजाए गए राखिया श्वर्या जते पिता के भय से कातर शारदा महाराज शारदा आने से ही लज्जाशीला श्री मां क्या करती उनके घर जाने का समय आने के जा बार मुहूर्त घर जाने के मुहूर्त अर्थात कि समय से समय पे चार पैसा नबत के दरवाजे का यह जो चौखट है वहां पर रख के अपने से वह कमरे में जाकर के घर में जाकर छुप जाती है। यानी कि देखिए कि ठाकुर ने एक बार तो कह दिया है कि जाओ वहां पर नौबत में मां है। उनके पास में से पैसा ले लो। अभी देखिए कि शारदा महाराज जितनी भी बार आते हैं मां को पता है कि जब वह घर वापस जाएंगे तो उनको फिर यह पैसा इतना चाहिए होगा। तो मां की नजर देखिए यह ऊपर में लिखा है ना कि इतना सारा काज जो काम जो मां करती है खाना बनाना है यह घर का सब संभाल रखना है ये ठाकुर की ये जो स्त्री भक्त आती है उनको संभाल रखना है सब कुछ जो मां करती थी किंतु उनका मन जो है ठाकुर के श्री चरण पर पड़ा रहता था तो यहां पे मां सब कुछ सुन रही है सब काम करते-करते और जैसे ही ठाकुर के कमरे में शारदा महाराज ने अभी विदाई लेने के लिए जब बात की होगी ठाकुर ने उनको आशीर्वाद दिया होगा वह जब ठाकुर को प्रणाम करके विदाई लेते होंगे वही पूरी बात जैसे वो संजय को कुरुक्षेत्र में जो कुछ हो रहा था रिमोट वो जो दूरदर्शन तो वैसे ही दूर श्रवण यह दूर श्रवण के माध्यम से मां को सब सुनने में आता था और जैसे ही पता चला कि शारदा महाराज अभी जाने के लिए तैयार हो रहे हैं साथ-साथ में ही यह चार आना जो है वह कमरे के दरवाजा जो है नबत का दरवाजा उसकी चौखट के पास में रख देती और फिर अपने से वहां से चली जाती। लिखा क्या है? लज्जा शीला श्री मां अर्थात कि इवन जो ये लड़के भी है लड़के के सामने भी श्री मां इस तरह से लज्जा करती थी। जथाकाले ठाकुर आदेश शारदा तथा आशीबा मात्र बिना प्रार्थनाए पैसा पते जब समय आया जाने
माँ सारदा: बिना प्रार्थना के भी हमारा कल्याण
का तब ठाकुर ने जब आदेश किया कि जाओ नबत से पैसा ले लो उस समय शारदा जब नहबत में आया तो देखा कि मां को बिना प्रार्थना के पैसा वहीं पर रखा है। अर्थात कि देखिए ये भी एक बहुत बड़ी बात है कि नहबत में आकर के फिर पैसा मांगना नहीं पड़ता कि मां पैसा दीजिए ठाकुर ने भेजा है आपके पास में बिना प्रार्थना के पैसा मिलता था। देखिए इसका अब जैसे इस प्रसंग के रिलेटेड इसका जो अर्थ है इसका एक फिलॉसोफिकल अर्थ भी हम निकाल सकते हैं कि मां देखिए एक दिन की बात है जयराम भाटी की ही बात है एक त्यागी संतान वो मध्य रात्रि को एकाएक कुछ काम आ गया तो उसने सोचा कि मां को तो यह बात बतानी ही पड़ेगी किंतु साथ में यह संकोच भी है मध्य रात्रि हो गई है पूरा जगत भगत सोया हुआ है। मां भी अपने कमरे में सोई हुई है। इस समय मां को कैसे जगाए? किंतु काम कुछ जरूरी था बोलकर के उसने मां को हल्के से पुकारा। मृदु स्वर से पुकारा। मां मां ऐसा करके अब जिससे कि क्या है कि और कोई जग ना जाए। तो बोलकर के अभी यह त्यागी संतान जैसे ही मृदु स्वर से मां को पुकारता है। साथ में ही मां उठकर के बैठ गई अपने बिस्तर में और पूछती है कि बेटा क्या हुआ? तो अब दूसरा कुछ काम जो कि महत्व का था उसको बोलने से पहले तो त्यागी संतान ने पूछा कि मां इतना मृदु स्वर से मैंने आपको पुकारा फिर भी आप इमीडिएटली जग गई क्या आप सोई नहीं थी क्या तो मां क्या कहती है कि देखो बेटा कितने ही लोग आकर के इतने सारे भक्त संतान आकर के मेरे पास में से दीक्षा लेकर जाते हैं। किंतु फिर मैं जिस तरह से उनको जप करने को कहती हूं, इस तरह से यह लोग जप तो कर ही नहीं सकते। थोड़ा बहुत तो क्या बहुत सारे लोग हैं बिल्कुल ही जप नहीं कर सकते हैं। इसलिए मैं रात को जग करके इनके लिए जप करती रहती हूं। देखिए यह कितना बड़ा स्टेटमेंट है कि मां स्वयं हम सबको सिर्फ दीक्षा ही नहीं देती। हमारे लिए जप भी कर लेती है। तो यहां पे जिस तरह से कहा गया है बिना प्रार्थना के पैसा मिलता है तो यहां पर भी बिना प्रार्थना के हमारे लिए मां जप भी कर लेती है। मैं जब पीपीटीसी ज्वाइन करने को गया था तो क्या था? बेलूर मठ में जो लोग नए लड़के आए हैं जॉइ करने के लिए उन लोगों का एक ट्रेनिंग सेंटर था। बेलूर मठ में दो ट्रेनिंग सेंटर है। एक तो है कि मेन ट्रेनिंग सेंटर कि जब आप जॉइ करने के 3 साल के बाद में वहां पे जाते हैं दो साल आपको रखते हैं और सिस्टमेटिकली योग वेदांत रामकृष्ण विवेकानंद लिटरेचर उसका स्टडी होता है। तो वह तो एक मेन ट्रेनिंग सेंटर है। फिर एक दूसरा है छोटा ट्रेनिंग सेंटर। वहां पर क्या है कि जॉइ करने के लिए यदि कोई बेलूर मठ जाता है तो उनको वहां पर रखा जाता है। इन लोगों को भी वैसे प्राइमरी सब कुछ सिखाया ही जाता है। तो वो जो उसको पीपीटीसी कहते हैं प्री प्रोबेशनर्स ट्रेनिंग सेंटर। तो यह प्री प्रोबेशनर्स जो होते हैं उन लोगों को एक बहुत बड़ा बेनिफिट है कि मिशन ऑफिस में जहां पर जनरल सेक्रेटरी महाराज स्वयं रहते हैं उनका ऑफिस है वहां पे रात को नाइट क्लास होता है तो यह प्री प्रोबेशनर ब्रह्मचारी को वहां पर उपस्थित रहने का एक सौभाग्य मिलता है। तो हम लोगों को क्या है कि रात को 9:30 के आसपास में 9:15 के आसपास में जब रात्रि का भोजन समाप्त होगा हम सबको वहां पर मिशन ऑफिस जाना है फर्स्ट फ्लोर पे वहां पे एक बड़ा सा वरांडा है वहां पे ये नाइट क्लास होगा तो हमको सबसे पहले जाकर के चटाई है शतरंज वगैरह है वह बिछा के रेडी हो जाना है और एक कोने में चुपचाप जाकर के बैठ जाना है। हम लोग तो सब बिल्कुल नए लड़के जॉइ करने को ही आए हैं। और यहां पे तो सब मिशन ऑफिस में जनरल सेक्रेटरी महाराज, असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी महाराज और फिर यह सब सीनियर साधु वह तो सब अपने ऑर्डर के माने बड़े-बड़े सब विद्वान और सीनियर सब तो वे लोग एक के बाद एक आकर के बैठेंगे अपने समय के अनुसार। आखिर में जीएस महाराज आएंगे। तो स्मरणानंद जी थे उस समय जीएस। तो वो आकर के कुर्सी पर बैठेंगे। स्मरणानंद जी और हम लोग बाकी सब लोग जमीन पर बैठेंगे। एक और हमारे असिस्टेंट जीएस महाराज बैठेंगे शिवमयानंद जी है श्रीकरानंद जी थे उस समय सुहितानंद जी थे किंतु सुहितानंद जी नाइट क्लास में नहीं आते थे भजनानंद जी थे तो वह भी नाइट क्लास में नहीं आते थे तो इन दोनों को छोड़ के जो बाकी दो असिस्टेंट सेक्रेटरी महाराज थे श्रीकरानंद जी और शिवमयानंद जी वे दो वहां पर रहते थे और बाकी जो सीनियर साधु होंगे तो एक बार जब स्मरणानंद जी आएंगे तो फिर वहां पे एक ब्रह्मचारी या साधु पाठ करेगा कोई भी प्रतिदिन एक-एक अलग अलग से किताब लेते थे। ऑलमोस्ट 15 मिनट का पाठ होता था किताब में से और उसके बाद में गप लगाना चलता था। पाठ होता है 15 मिनट और गप लगता था एक घंटा। तो शुरू-शुर में तो मुझे कुछ समझ में नहीं आता था। सब बेंगली में बात हो रही थी होती है। किंतु एक बार जब मुझे बेंगली आना समझ में आने लगा बें तो फिर मुझे बड़ा इंटरेस्ट होने लगा था। क्योंकि दिन भर जो पीपीटीसी में जो क्लास चलते हैं उसमें जो सीखते हैं उससे कहीं ज्यादा हम लोग ये सब सीनियर साधुओं के वार्तालाप से सीख लेते हैं। तो उस समय एक बार स्मरणानंद जी ने कहा था कि वह कंप्यूटर अभी उस समय सब नया-नया सब चल रहा था तो यह मोबाइल कंप्यूटर वगैरह-वगैरह वैसे तो कंप्यूटर काफी पुराना है वो किंतु क्या है कि अपने ऑर्डर में इतना उसका वाइड प्रचार नहीं था और मैं जब जॉइ करने को गया था उसी समय धीरे-धीरे करके सभी सेंटर में यह कंप्यूटर है फिर यह ईमेल है यह मोबाइल है वो सब आना शुरू हुआ था तो उस दिनों की बात है स्मरणानंद जी कहते हैं कि देखो देखो अभी आजकल हम आदमियों की जरूरत हमको वर्कर की जरूरत ही नहीं है। कंप्यूटर ही सब कुछ करता है। बोल करके वो चल रहा है। हंसी मजाक चल रहा है। तो स्मरणानंद जी कहते हैं कि एक दिन ऐसा आएगा कि यह कंप्यूटर जो है ना वो हमारे लिए जप करेगा। तो उसमें आप वो प्रोग्राम बना दीजिए जप करने का तो वो बैठे-बैठे वो जप करता रहेगा। जय श्री राम जय श्री राम जय श्री राम। उसका रिपीट होता रहेगा। तो हम लोग को बड़ी हंसी आई थी। देखिए कि ये जो जो स्मरणानंद जी जिस कंप्यूटर प्रोग्राम की बात करते हैं हमारे लिए जब कर दे मां ठीक ऐसा ही हमारे लिए करती है। बिना प्रार्थना के हमको फल प्राप्ति होती है। तो यहां पे भी सिर्फ पैसा ही नहीं किंतु आध्यात्मिक जगत में भी यह आध्यात्मिक प्राप्ति है। वह भी मां के शरणों में जाने से होगी।
ठाकुर कुछ कहें उससे पहले ही—माँ नरेन्द्र की थाली सजा देती हैं
श्रीजुक्त तो नरेंद्र आते ठाकुर के ज बोली ते सुनाो तू आज एकने थाकबी ओमनी श्री मा छोलार ताल छुड़ाइया दिया मोदा ठाशीते बोशी लेन नरेंद्र के आने से ही जैसे ही ठाकुर को यह बोलते सुना गया कि तू आज यहां पर रहना साथ-साथ में ही श्री मां छोले की दाल चूल्हे में उठाकर के मैदा जो है मैदा उसको उसको ठासने उसको मैदे की वो जो मोटी-मोटी रोटी बनती है ना तो उसके लिए मैदे का आटा बनाने के लिए मां बैठ जाती है। मां की पूरा वो अटेंशन वहीं पर रहता है। आप यदि गए होंगे दक्षिणेश्वर में तो आपने देखा होगा कि वैसे तो ठाकुर का कमरा और मां का नहबत वैसे पासपास में ही है किंतु इतना भी पास नहीं है कि आप इजीली सुन पाए कि ठाकुर के कमरे में क्या हो रहा है। दूसरा कि हल्लागुल्ला भी तो 10 तरह का होता है ना कि वो आज कुछ ना कुछ लोग कुछ बातें करते रहते हैं। मां के नौबत में भी तो सब ये स्त्री भक्त रहती थी। उन लोगों के बातचीत वगैरह कार्यक्रम सब चलता रहता होगा। ठाकुर के कमरे में के आसपास भी लोग बातें करते होंगे। तो यानी कि एक डेसीबल लेवल भी है, नॉइज़ लेवल भी है और उसके साथ में यह डिस्टेंस तो कोई इतना कम नहीं है कि आप फटाक करके बगल वाले कमरे में यदि बैठे हैं तो सुन रहे हैं। ऐसा नहीं। किंतु इसके बावजूद मां की यह जो श्रवण शक्ति है वह ठाकुर की यह जो वाणी है उसके साथ में यह फ्रीक्वेंसी इस तरह से सेट हो गई है कि जैसे ही नरेंद्र ने जाकर के ठाकुर को प्रणाम किया और ठाकुर ने जैसे ही नरेंद्र को कहा कि आज रात तुम यहां पर रह जाना साथ-साथ में ही मां को पता है कि नरेंद्र यह छोले की यह गाढ़ी छोले की दाल और फिर यह मोटी-मोटी रोटी उसको खाना पसंद करता है। एक दिन की बात है। पहली बार जब ठाकुर ने नरेंद्र को कहा होगा कि तुम आज नहबत में मां बनाती है खाना। तुम यहां पर खाना तो नरेंद्र ने खाया तो सही। किंतु फिर जब ठाकुर कहते हैं कि कैसा लगा तुमको खाना? तो नरेंद्र कहता है बहुत अच्छा। ऐसा लगा कि जैसे मैं कि जैसे कि मैं रोगी का डाइट खा रहा हूं। रोगी का पथ्य खा रहा हूं। तो फिर ठाकुर समझ गए कि उनके लिए ठाकुर के लिए जो मां पतली दाल है, पतली रोटी है वगैरह जो बनाती है वही मां ने नरेंद्र के लिए बनाई होगी। तो ठाकुर जाकर के मां को कहते हैं अरे उसके लिए गाढ़ी दाल बनाओ और मोटी-मोटी रोटी बनाओ। तो उस समय से मां को तो एक बार इंस्ट्रक्शन दे दिया। फिर वो कंप्यूटर में पूरा फेड हो जाएगा। मां कभी भूलेगी नहीं। इसलिए जब भी नरेंद्र आता है छोले की दाल है उसको गर्म करने के लिए रख दिया। उबालने के लिए साथ-साथ में ही मैदे का आटा जो है तैयार करने के लिए मां रख बैठ गई। कारण क्यों नरेंद्र मोटा-मोटा रोटी और छोलार दाल पछंदों को रेन नरेंद्र को मोटी-मोटी रोटी अर्थात कि मोटी यानी कि थिक इस तरह की रोटी और छोले की दाल पसंद थी। ठाकुर झाऊ तलारदी के जाब पथे श्री मां के नरेंद्र जन राब कथा बोली ते गिया देखले समस्त आयोजन आरंभ होया गया छे ठाकुर जब झाऊतला की ओर जाते उस समय तो यह इंडोर प्लंबिंग था नहीं झाऊला अर्थात कि यह जो गंगा का किनारा है यहां से आप प्रारंभ करेंगे कि वहां पे चांदनी है चांदनी के पीछे में ही यह जो द्वादश शिव मंदिर है उसके के पीछे में यह काली मंदिर है। तो फिर किनारे से गंगा के किनारे वो जो उद्यान पथ है उद्यान पथ में जैसे-जैसे आप आगे बढ़ना शुरू करेंगे ठाकुर का कमरा आएगा। इससे थोड़ा सा आगे जाएंगे तो नहबत आएगा मां का। इससे थोड़ा सा आगे जाएंगे तो यह पंचवटी आएगा। उससे थोड़ा सा आगे जाएंगे तो फिर यह झाऊ तला आता था। उसके पीछे में यदि आप देखेंगे तो बेलतला था। ये नौबत के पीछे की साइड देखेंगे तो यह हंसपुकुर था। तो यह दक्षिणेश्वर का नक्शा एक बार अपने माइंड में फिट हो गया कि कौन सी चीज कहां पे है। तो जब भी हम कोई भी डिस्क्रिप्शन पढ़ते हैं तो साथ-साथ में ही वह विजुअलाइज हो जाना चाहिए कि अच्छा यह घटना यहां पर हुई है। यह घटना यहां पर हुई है वगैरह। तो यहां पे भी ठाकुर शौच करने के लिए झाऊला जाएंगे। क्योंकि वहां पे एक थोड़ा सा वीरान जगह था गंगा के किनारे और वहां पे ही शौच करने के लिए जाना होता था। तो झाऊला जाते-जाते वह सोचे कि मैं नहबत में रुक के नहबत के सामने रुक के मां को बता दूं कि हां नरेंद्र आया है। खाना खाएगा किंतु जाकर के देखते क्या है कि पहले से ही मां ने सब प्रस्तुति तैयार कर दी है। खाना बनाने का प्रारंभ हो चुका है। समस्त आयोजन आरंभ हो गया है।
स्त्रीभक्तों के लिए माँ सारदा का स्नेहपूर्ण आश्रय : जहाँ जगह कम थी, वहाँ माँ ने हृदय खोल दिया
महिला भक्तगण दीबाशाने दक्षिणेश्वर आिले तहा दे रात्रि बा स्थान ठीक करा एकटा समस्या होइया दड़ाई तो महिला भक्तगण दिन के अंत में दिवा बोशाने दिन के अवसान में अर्थात कि दिन के अंत में दक्षिणेश्वर में आने से उनके लिए रात्रि वास का स्थान ठीक करना एक समस्या बन जाती थी। स्वल्पयतन नबते थाना भाव जानिया ठाकुर ताहा दग के निजे घरे रोया के सुते बोलते स्वल्प आयतन स्वल्पयतन अर्थात कि नबत जो था वो स्वल्प आयतन था छोटा सा था उसका जो उसका जो यह एरिया था स्क्वायर फुट वो बड़ा ही अल्प था इसलिए स्वल्पायतन नहबत में स्थानाभाव स्थान का अभाव जानकर के ठाकुर उनको को अपने घर की चौखाट पे सोने को बोलते। यानी कि अब देखा ही होगा यदि आपने नौबत आप समझ ही सकते हैं कि कितना छोटा सा है। वैसे ही तो वहां पर मां के सोने की जगह होगी। फिर यह लक्ष्मी दीदी वहां पर सोती है। फिर यह पूरा घर का सब सामान है। ठाकुर के लिए जो खाना बनता है, वह सब व्यवस्थाएं वहां पे है। चूल्हा वैसे बाहर था। किंतु बाकी सब जो चीज वगैरह स्टोर करके रखनी है वह सब तो भीतर में ही था। तो इतनी छोटी सी जगह में और किसी स्त्री भक्त को सोने में तकलीफ होगी। यह समझ कर के ठाकुर जब दिन के अंत में संध्या के बाद में जो स्त्री भक्त आती उनको कहते कि उनके घर की जो दरवाजे की चौखट है उसके पास में आप सो जाइए। किंतु मां ताहा दग के बोलिया राखी ते जे नबते स्थान होइया ज किंतु मां ये सब स्त्री भक्तों को बोल के रखती कि नबत में ही स्थान हो जाएगा शेखाने रात्रे आहार शारिया स्त्री भक्तरा ठाकुर घरे एकू आलाप करते आशते नबत में रात को आहार समाप्त करके स्त्री भक्त ठाकुर के घर में थोड़ा सा आलाप अर्थात की वार्तालाप करने के लिए आती ता नबते फरीब पूर्वे श्रीमा श परिष्कार कोरिया शकलेर मतो स्थान कोरिया राखते उन लोगों के नहबत में फिर वापस आने के फिरने के पहले ही श्री मां सब परिष्कार करके क्लीन करके सबके लिए सोने के लिए जगह बना करके रखती आती शकल के काछे टानिया शोते और सब ऐसा नहीं कि सोने की व्यवस्था हो गई है। जब यह स्त्री भक्त सो जाती है तो मां उनको अपने पास में खींच करके सोवाती थी। सुतरान काहारो अन्नत्र जा इच्छा बा प्रयोजन हो तो ना इसी वजह से किसी का और कहीं पर सोने के लिए जाने की इच्छा भी नहीं होती और आवश्यकता भी नहीं होती। जस्ट इमेजिन कि यह कितने सुंदर दिन है यह सब कि आप दक्षिणेश्वर से कोलकाता से दक्षिणेश्वर आए हैं। स्त्री भक्त है तो फिर मां के पास में ही जाकर के वार्तालाप किया। मां के पास में ही बैठकर के आहार किया। संध्या का समय हो चुका है और संध्या का दक्षिणेश्वर का समय इतना सुमधुर पवित्र समय कि यहां पर गंगा है। गंगा का कुल खुल करके वो जो सुंदर आ जो संगीत जो बहता है गंगा का जो पानी के बहने का वो आवाज ये जो पंखी है पंखी के वो जो सब आवाज है उसके बाद में जब मंदिर में आरती वगैरह प्रारंभ होगी तो शंख है कांसर है घंटा है या जो शहनाई है उस सब का आवाज और फिर एक बार जब आरती समाप्त हो जाती है उसके बाद में दक्षिणेश्वर ऑलमोस्ट संपूर्ण रूप से वीरान हो जाता था। यह जितने भी ब्राह्मण वगैरह पंडित वगैरह जो लोग पूजा वगैरह करने के लिए वहां पर रहते थे दिन के समय ऑलमोस्ट सभी दक्षिणेश्वर गांव में अपने घर चले जाते थे। मंदिर प्रांगण में वह जो पुजारी मोस्ट प्रोबेबबली ठाकुर है और कोई पुजारी है या तो फिर यह चौकीदार है। ऐसे ही कुछ ही लोग वहां पर रहते होंगे। उस समय इतने पवित्र वातावरण में यहां पर मां है नहबत में वहां पर ठाकुर है अपने कमरे में मां के पास में आहार करना है और आहार करने के बाद में ठाकुर के पास में जाकर के बैठकर के गप लगाने हैं तो देखिए कि अपना भी यदि यह सद्भाग्य होता कि आरती के बाद आहार के बाद जबकि संपूर्ण जगत निस्तब्ध हो जाता है। जैसे कि प्रकृति स्वयं ध्यान करती है। उस समय चांद सितारों से आसमान भरा हुआ है और आजकल की तरह कहीं पे यह मोबाइल चल रहा है तो कहीं पे यह धुआ ये व्हीकल का पोल्यूशन ना कि कहां पे यह डीजे चल रहा है। यह सब तो था नहीं। उस समय निस्तब्ध यानी कि संपूर्ण निस्तब्ध। यह जो रात के यह जो ये क्रिकेट्स जो कहते हैं ये क्रिकेट्स की आवाज होगी ना कि यह फ्रॉग है जो मेंढक उनकी आवाज होगी ना कि यह जो पेड़ में से यह जो हवा पसार हो रही है तो पत्तों की जो आवाज होगी या तो फिर यह नदी जो बह रही है भागीरथी गंगा उसकी यह जो कुलकुल जो मधुर ध्वनि है इसके अलावा और कुछ शब्द वहां पर नहीं है। आजकल आपको इस तरह का जो प्रकृति का प्रकृति की ध्वनि यदि आपको सुननी है, प्रकृति का संगीत सुनना है तो आपको यह वाइट नॉइज़ बोलकर के ऐप आती है। वो इंस्टॉल करना पड़ेगा। यह वाइट नॉइस क्या है? एक तरह का मन को शांत करने वाला शब्द या तो संगीत। आप यदि इंस्टॉल करेंगे तो उसमें आपको सब ऑप्शंस दिए जाएंगे। यह रेन साउंड है। तो रेन साउंड पे आप क्लिक करेंगे और फिर आप यह इयरफोन से सुनेंगे तो आपको यह बारिश गिर रही है। उसकी आवाज सुनाई देगी। यह क्रिकेट का साउंड है। यह फ्रॉग का साउंड है। यह नाइट साउंड है वगैरह-वगैरह। मैं काफी एक समय था कि मैं इसको इस्तेमाल करता था। यह रेन साउंड है। यह क्रिकेट साउंड है, नाइट साउंड है। यह सब सुनता था कभी-कभी। तो क्या है कि आजकल हमारे लिए सब कुछ आर्टिफिशियल हो गया है। किंतु उस समय आपको असली क्रिकेट है, असली फ्रॉग है, असली ओल है, असली नाइट साउंड है। वह सब सुनाई देते थे। तो समुंदर के ये ये जो होते हैं ना वेव्स उसकी आवाज ये जो वाइट एप वाइट नॉइज़ एप होती है। अभी लकीली मैं समुंदर के किनारे ही रह रहा हूं। तो जब मैं शाम को टहलने को जाता हूं वहां पे या सुबह को तो समुंदर के वह जो लहरें हैं उसका रियल साउंड सुन पाता हूं। सो दैट वे देखिए कि सभी लोग इतने लकी होते नहीं, सब समय लकी होते नहीं तो बोलकर के हमको यह सब आर्टिफिशियल सब करना पड़ता है। किंतु उस समय का जो नौबत था सब कुछ नेचुरल उसमें भी नारायण स्वयं चतुर्भुज नारायण द्विभुज धारी श्री रामकृष्ण के रूप में अवतरित हुए हैं। वह अपने सामने में एक छोटी खाट है। उसके ऊपर में बैठे हैं। हम उनके सामने जमीन पर बैठे हैं और मंत्रमुग्ध होकर के उनकी बात सुन रहे हैं। यह जिनका होगा नसीब यह सब कुछ सुनने का गोलाप मां है, योगिन मां है या तो फिर यह गौर दासी थी या तो फिर यह गोपाल की मां थी। इतने स्त्री भक्तों को तो हम पहचानते हैं। और भी कितनी सारी लेडी डिवोटीज वहां पर आती थी। उन लोगों का यह नसीब देखिए कि हमको सही में ईर्ष्या होती है। तो फिर जब यह लोग खाना खा के ठाकुर के कमरे में जाएंगे गप लगाने के लिए और बाय द टाइम वे लोग वापस आएंगे देखेंगे कि मां ने नौबत में ही उनके लिए सोने की व्यवस्था कर दी है। अभी रात्रि का शयन करना है। इतनी छोटी सी नहबत में श्री मां के साथ में ही वह भी कितना बड़ा सौभाग्य है। यह पुरुष भक्त जितने भी थे या तो इवन लड़के भक्त भी जो थे उनको सिर्फ ठाकुर का ही सानिध्य ठाकुर के ही एक तरह से वार्तालाप सुनने का सौभाग्य होता था। किंतु स्त्री भक्त थी उन लोगों को ठाकुर और मां दोनों का यह जो सानिध्य और उनके साथ में वार्तालाप करने का उनको यह बेनिफिट मिलता था। अपॉर्चुनिटी मिलता था।
जहाँ ठाकुर के युगधर्म-प्रवर्तन और माँ के मातृत्व का संगम होता है
ए रूप एक दिके ठाकुर जुग धर्म प्रचारोपयोगी परिवेश गठने आकांक्षा एवं अपर दिके श्री माय संतान वात्सल्य इसी तरह से ए रूपे इस इस तरह से इस रूप से एक और तो है ठाकुर का युग धर्म प्रचार उपयोगी परिवेशन गठन करने की आकांक्षा पूरा संस्कृत युग धर्म प्रचार उपयोगी परिवेशन अर्थात कि एक परिवेश एक इस तरह का माहौल खड़ा करना एक इस तरह का क्लाइमेट या तो एंबियंस खड़ा करना जो कि युग धर्म प्रचार के लिए वह मैक्सिमाइज हुआ है। युग धर्म प्रचार के लिए वह तैयार हुआ है। तो अब अब जैसे आश्रम है अपने अपने आश्रम में आप देखेंगे कि सब समय एक पवित्र वातावरण बनाने का प्रयास किया जाता है। मंदिर में देखेंगे कि सभी साधु जो है वह नियमित रूप से मंगल आरती है, संध्या आरती है या तो और भी कोई भी उत्सव वगैरह है उसमें पार्टिसिपेट करते हैं। जो कुछ भी यहां की एक्टिविटी है यह साधु भक्त वलंटियर सभी लोग मिलकर के सिंसियरली पार्टिसिपेट करते हैं। तो यहां पे युग धर्म प्रचार उपयोगी एक एंबियंस बनाने का प्रयास किया जाता है। जैसे ही आप अपने आश्रम में प्रवेश किए, आपको लगना ही चाहिए कि मैं कहां इस जगत से एक अलग से एक दूसरे जगत में आकर के मैंने प्रवेश किया है। तो यहां पे भी यदि रामकृष्ण मिशन के आज के आश्रमों में इस तरह का अनुभव आपको यदि होता होगा तो इससे कहीं ज्यादा फार मोर कंसंट्रेटेड अनुभव आपको दक्षिणेश्वर में होता होगा। नारायण और नारायण ही स्वयं जहां पर विराजमान है। तो इसलिए यहां पर ठाकुर कहते हैं एक और तो है युग धर्म प्रचार उपयोगी परिवेशन गठन करने की आकांक्षा ठाकुर की और दूसरी और है श्री मां का संतान वात्सल्य यह दोनों आप देखिए एक जगह पे आकर के मिलते हैं। ए दु मिलिया श्री मां के क्रम ताहार भावी कर्मतरे टानिया आते छिलो यह दोनों मिलकर के श्री मां को क्रमशः इवेंचुअली उनका जो भावी कर्म क्षेत्र है वहां पर खींच करके ले आ रहा था टानिया आते छिलो हाथ पकड़ करके जैसे कि मां का यह कर्म क्षेत्र की ओर ले जा रहा था क्या एक और ठाकुर का युग धर्म जो प्रचार है वह उनकी इच्छा दूसरा की मां का संतान वात्सल्य दोनों जब इकट्ठा होता है तो धीरे-धीरे करके मां का मां तो थी वैसे ही नेचुरली लज्जाशला नेचुरली ही थी मां इंट्रोवर्ट नेचुरली ही थी कि ठाकुर के प्रति ही संपूर्ण रूप से समर्पित अभी यह मां क्यों बाकी लोगों का जिम्मा अपने सर पर ले तो नेचुरली कि एक और तो है कि ठाकुर जो दक्ष कोलकाता जाकर के जो घर-घर जाकर के यह ईश्वर प्रेम यह ईश्वर भाव यह भक्ति वगैरह जो प्रचार करते थे ज्ञान भक्ति वगैरह का बोलकर के कोलकाता से बहुत सारे लोग साधक जिज्ञासु गृहस्थ संतान त्यागी वगैरह सब ठाकुर के पास आना शुरू हुए थे। यानी कि ठाकुर ने जैसे कि सबको प्रचार करके दक्षिणेश्वर बुलाया और जैसे ही यह लोग दक्षिणेश्वर आए इन सबको मां के पास में भेज दिया। अभी मां के हृदय में जो नेचुरल मातृत्व जो है वह अभी एक्टिवेट हो गया है। वह अभी अवेकंड हो गया है। तो जब यह लोग आते थे तो फिर ठाकुर को यह बोलने की जरूरत नहीं है कि हां गोलाप मां है, नरन है या तो यह शारदा है। इन सब के लिए तुम अच्छे से उनको खाना खिलाओ, पैसों की व्यवस्था करके रखो। सोने की व्यवस्था करो। तो वह सब फिर ठाकुर को बहुत ज्यादा डिटेल में बोलना नहीं पड़ता था। एक बार हिंट दे दिया कि बस नरेंद्र को गाढ़ी छोले की दाल और यह साथ में मोटी-मोटी रोटी खिलाना है। साथ-साथ में ही जीवन भर के लिए मां नरेंद्र को वही खिलाएंगी। यानी कि ठाकुर सबको बुलाते हैं और बुला करके जैसे कि श्री मां के श्री चरणों में अर्पण कर देते हैं। और उससे आगे फिर मां का मातृत्व है। इट टेक्स ओवर। वह फिर वह अपने से ही फिर एक्टिवेट होकर के इन सबको अपने स्नेह पास से आबद्ध कर लेता है। उभयर ए सम्मिलित चेष्टा फले ए समय श्री माय अंतरंग मनोनयनो होइया गया छिलो इन दोनों की यह सम्मिलित चेष्टा इन दोनों के सहकारी प्रयास से इस समय मां का अंतरंग जो है मनोनयन हो गया था। तो अभी आज यहीं तक इसके बाद में गोलाप मां का जो पूरा प्रसंग है वह अभी हम कल देखते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: यह विस्मयकारी है कि माँ सारदा ठाकुर की इच्छा उनके कहने से पहले ही जान लेती थीं—और जब ठाकुर अपने कक्ष में रहते, तब भी वे मानो उनकी मन:वाणी को ग्रहण कर लेती थीं। नहबत था भी कितना छोटा-सा
इसीलिए गंभीरानंद जी कहते हैं ना कि एक बार ठाकुर को लाकर के उन लोगों को मां के पैरों में पटक देना है। फिर मां का मातृत्व ही बाकी का काम कर लेगा। [हंसी] और और लिटरली मैं जब ये दक्षिणेश्वर जाता था तो मैंने इनिशियली सोचा था नबत और ठाकुर का कमरा पास बिल्कुल पासपास में होंगे किंतु ऐसा नहीं है। मतलब सही में ये इमेजिन करना मुश्किल है कि आप यह सोचेंगे कि ठाकुर बोल रहे हैं वहां पे वहां मां को सुनाई देगा। हाउ इज इट पॉसिबल कि मतलब रियली डिफिकल्ट लगता है। आप अपने घर में जो कुछ भी है उसका एक डाउन साइज करके आप इमेजिन कीजिए कि स्वामी जी कहते हैं ना कि वेस्टर्न सिविलाइजेशन है वो यह फिगर आउट कर रहा है कि हाउ कैन वी व्हाट आर द मैक्सिमम थिंग्स दैट वी कैन लिव अपॉन। इंडियन सिविलाइजेशन इज़ ट्राइंग टू फिगर आउट द मिनिमम थिंग्स टू लिव अपॉन। तो अपने घर में जो कुछ भी है उसका एक मिनिमम एक आप कर लीजिए कि इतना तो मुझे एसेंशियल ही है ही है। कपड़े तो चाहिए ही खाने बनाने की चीजें भी चाहिए। खाने के बर्तन भी है। सोने के लिए जो चटाई वगैरह है वो जस्ट इमेजिन उसको फिर आप उसमें रख के देखिए। [हंसी] नहीं एक्चुअली उसका पर्पस क्या था? वह तो शहनाई वगैरह जो वाद्य यंत्र है वह बजाने के लिए जब उत्सव होगा तो वहां पर एक दो लोग बैठकर के शहनाई बजाएंगे। वही तो उसका पर्पस है ना रहने के लिए पूरा उसको रिकन्फिग्यूर करना [हंसी]
प्रश्न: माँ ने स्वयं को श्रीरामकृष्ण के श्रीचरणों में विलीन कर दिया था; इसी कारण वे इतनी निःस्वार्थ भाव से सेवा कर पाती थीं।
ठाकुर एक बार कहते हैं कि मैं कभी-कभी सोचता हूं तुम ही आर आमी माने ईश्वरी और भक्त ईश्वरी का भक्त और कभी-कभी सोचता हूं यह तुम ही तुम ही हो जाता है वो आमी खोजने से भी नहीं मिलता [हंसी] ये जब आमी और तुम्ही से परे जाकर के तुम ही तुम ही हो जाए तुम ही तुम हो जाए फिर ये सब होता है जय राम भाटी की एक कहानी है एक त्यागी संतान वो वहां पर बैठ के काम कर रहा है मां वहां पर झाड़ू लगा रही है तो बाहर में एक भिखारी आया वो पुकार रहा है मां पैसा दो मां पैसा दो करके तो मां अब अभी ये त्यागी संतान जो है उसकी नजर मां के ऊपर नहीं थी वो थोड़ा नीचे झुक करके कुछ लिख रहा होगा कि व्हाटएवर तो एकाएक उसने इतना सुंदर स्वर से इतना सुमधुर स्वर से एक वाणी सुनी कि देखो तो मेरे अनंत हाथ है फिर भी मैं यह सारा काम समाप्त नहीं कर पा रही हूं। तो यह अब मां के गले का स्वर तो उसने सुना है। सुमधुर ही है। किंतु यह तो जैसे कि एक दूसरे लेवल पर है। तो उसने फटाक करके चमकित होकर के मां की ओर देखा। कहा मां क्या कहा तुमने? तो मां ने फिर से वो एकदम अति सुमधुर स्वर है और फिर से वह सामान्य स्वर हो गया। मां ने कहा अरे बेटा क्या कहूंगी मैं और तो क्या कहूंगी? ये देखो मैं एक झाड़ू लगा रही हूं। वहां पे वो पैसों के लिए चिल्ला रहा है। कैसे मैं ये सब कुछ एक साथ में करूंगी। तो त्यागी संतान कहता है ना मां मैंने सुन लिया तुमने जब [हंसी] वो क्षण भर के लिए सीक्रेट बाहर आ गया।
प्रश्न: प्राण और आकाश के विषय में थोड़ा और विस्तार से बताइए।
स्वामी जी राजयोग में कहते हैं ना कि आकाश और प्राण बेसिकली टू एलिमेंट्स है। अब तो अभी क्या है? सृष्टि के प्रारंभ में आकाश जो है महासागर की तरह है। प्राण उसके भीतर में रहता है। और जब प्राण जो है आकाश पर आघात करेगा तो आकाश में से फिर यह मटेरियल वर्ल्ड की रचना प्रारंभ होगी। और यह प्राण जो है वह जितनी भी एनर्जी है, फोर्सेस है, यहां तक कि हमारे विचार है वह सब में परिणत होगा। यानी कि एक ओर मटेरियल वर्ल्ड है, दूसरी ओर है मटेरियल वर्ल्ड पे इफेक्ट करने वाली एनर्जी, फोर्सेस और यह मेंटल प्रोसेससेस। तो यह दोनों से सृष्टि होती है। अभी स्वामी जी कहते हैं कि देखिए कि यह प्राण का विज्ञान है। यदि हम समझ लेते हैं, प्राणायाम समझ लेते हैं तो हमारे देह के भीतर में जो प्राण है उसके माध्यम से हम जो कॉस्मिक प्राण है जो ये व्यष्टि प्राण है उससे समष्टि प्राण को कंट्रोल कर सकते हैं। जैसे रिमोट कंट्रोल है। रिमोट कंट्रोल से हम को टीवी को जैसे को कंट्रोल करते हैं। तो वैसे ही यह रिमोट कंट्रोल है अपने बॉडी के भीतर में व्यष्टि प्राण और यह जो चारों ओर है समष्टि प्राण तो प्राणायाम के माध्यम से यदि हम दोनों को कनेक्ट कर दें तो फिर अपने मन की जो इच्छा है उसके माध्यम से हम कॉस्मिक प्राण को भी कंट्रोल कर सकते हैं। अभी प्राण कंट्रोल करता है आकाश को। यानी कि पूरा चैन हो गया। एक है मेरा व्यष्टि प्राण दूसरा है समष्टि प्राण और फिर है यह आकाश। यानी कि जितने भी पदार्थ हैं तो इसके बहुत सारे उदाहरण स्वामी जी देते हैं। अब जैसे एक पॉलिटिशियन है या बहुत बड़ा नेता है या तो फिर जैसे कोई रिलीजियस लीडर है वो लोगों को इतने सारे लोगों को किस तरह से प्रभावित कर सकता है। दैट इज अ पावर ऑफ प्राण। अभी उसको पता नहीं है किंतु इसी शक्ति से वह यह कर रहा है। अब और बहुत सारी बातें स्वामी जी बताते हैं। प्राण को कंट्रोल कर लेंगे तो फिर आप रिमोट हीलिंग कर सकते हैं। सूर्य चंद्र नक्षत्र की गति को परिवर्तित कर सकते हैं। यहां तक स्वामी जी कहते हैं। क्यों? सूर्य चंद्र नक्ष जो भी है कॉस्मोस यूनिवर्स में जितनी भी ये एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल बॉडीज है बनी तो है मैटर की। मैटर के ऊपर में प्राण असर कर रहा है। वो कॉस्मिक प्राण को हम ये करेंगे कंट्रोल करेंगे। सो अब चंद्र जिस गति जिस ऑर्बिट में पृथ्वी के आसपास घूम रहा है उसको हम चेंज कर सकते हैं। दिस मच पावर वी कैन एक्वायर अभी भी अपने जब भी ये महामृत्युंजय मंत्र है, गायत्री मंत्र है, गीता चटिंग है, यह स्तोत्र वगैरह है। उसका पाठ सुनेंगे ना साथ-साथ में ही अपना हृदय जो है ऑटोमेटिक शांत होना शुरू हो जाएगा। यह संध्या आरती है। रामकृष्ण संघ की ही नहीं। कोई भी मंदिर में जाइए। आप आरती वगैरह सुनिए। उसमें आप आप भी साथ-साथ में गाना शुरू कर दीजिए। देखिए कि कितना सुंदर लगता है। यह भजन है, गीत है, स्तोत्र है। उन लोगों का देखिए एक इंट्रिंसिक फिलॉसोफिकल उसका एक पावर रहता है। अभी जैसे आगमनी के गीत हमने देखे। अभी उसका एक फिलॉसोफिकल उसका एक अपील है। किंतु गोइंग बियों्ड दैट वो जो मंत्र शक्ति जो है वो वो भी तो उसका एक पावर है। बहुत बार अब जैसे मैंने ही कहा था ना शुरू शुरू में तो काली कीर्तन आगमनी बिना समझे ही गाना पड़ता था। किंतु उस गाने में भी इतना आनंद आता था। बाद में तो उसके पीछे की फिलॉसोफी समझे। ओम