मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च [संगीत] धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिने अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णायते नमः
Meditation : part 1
अखंडानंद जी महाराज एक बार एक जमींदार के वहां पर गए थे तो उन्होंने तो यह काम सब स्टार्ट कर दिया है तो एक गांव का जमींदार था। उसके घर गए और रात्रि का समय है। वहां पे उस समय दुष्काल पड़ रहा था। इतना दुष्काल, इतना दुष्काल तो नहीं खेती हो रही। गांव वाले बेचारे परेशान है। यह जमींदार बेचारा सर के ऊपर में हाथ रख के बैठा हुआ है। तो उस समय रात का समय अखंडानंद जी को एक घर में सोने को दिया है। किंतु देखिए चारों ओर यह परिस्थिति है। सभी लोग परेशान घर में बच्चों को खाने को नहीं मिल रहा। वे लोग रो रहे हैं। तो अखंडानंद जी कहते हैं कि मैं रात में वहां पर तो उस समय गांव का माहौल है। तो घर के चारों ओर विशाल जमीन होती है। तो खुला मैदान होता है। तो वहां पर मैदान में एक टूटी हुई खाट के ऊपर में जाकर के अखंडानंद जी बैठ गए। ऊपर में घनघोर काला आकाश। उस समय तो आज की तरह ना ही एयर पोल्यूशन ना ही लाइट पोल्यूशन ना ही कुछ। तो चांदनी रात है, तारे टिमटिमा रहे हैं और मध्य रात्रि है। इमेजिन कर सकते हैं कितना सुंदर वातावरण होगा। वहां पर बैठकर के अखंडानंद जी ने ओमकार का जप प्रारंभ कर दिया। ओमकार करते ही जा रहे। करते ही जा रहे हैं। इतना ओंकार किया कि फिर जैसे ही सुबह हुई प्रचंड बारिश चालू हो गई और बारिश इतनी हुई इतनी हुई कि उसी दिन से जो किसान लोग हैं उन्होंने खेती करना प्रारंभ कर दिया। देखिए यहां पे इस तरह की कहानी में से ऐसा कुछ नहीं है कि हमको सीखना है कुछ। ऐसा कुछ नहीं है कि हमको मिरेकल पर विश्वास करना है। इस तरह की कहानियां हमारे हृदय को परिपुष्ट करती है। इस तरह की कहानियां हमको साहस दिलवाती है। क्योंकि यह ध्यान का रास्ता है। बड़ा कठिन रास्ता है। बाकी जितनी भी साधन पद्धति है, प्रार्थना है, स्वाध्याय है, तीर्थ यात्रा है, जप है। अब जो भी आप कह लीजिए वह सब आप प्रारंभ करें। अंत लाइए फिर दूसरे दिन फिर से प्रारंभ कीजिए। किंतु ध्यान में ऐसा नहीं है। आपको अपना जो पूरा माइंड है उसको रिइजीनियर करना है। ध्यान में जैसे ही प्रवेश करें सबसे पहले उन सभी लोगों को याद कीजिए जिनके प्रति आपके मन में द्वेष है। जिनके प्रति आपके मन में इरिटेशन है। और फिर ठाकुर को प्रार्थना कीजिए कि आज का जो मेरा ध्यान का फल है मैं उनको अर्पण कर दे रहा हूं। क्यों? क्योंकि ध्यान के फल से भी ज्यादा हमको जो चाहिए वह है अपने मन को रिइजीनियर करना। अपने मन में से लज्जा, घृणा, भय, जाति, कूल, शील, मान, अभिमान यह जो अष्टपाश है उससे हमको संपूर्ण रूप से मुक्ति प्राप्त करनी है। ध्यान दोनों कार्य करता है। ध्यान ईश्वर के पास में हमको सीधा ले जाता है। इसीलिए तो इसको राजमार्ग कहा गया है योगों का और यही ध्यान के माध्यम से हम अपने मन को रिइजीनियर कर सकते हैं और इस तरह से जो शक्ति चाहिए शक्ति एक तो हमको आत्मश्रद्धा से आती है। अब जैसे यहां पर फैन है मेरे कमरे में लाइट भी है। तो यह लाइट और फैन दोनों को चलाने के लिए तो मुझे बिजली चाहिए। बिना बिजली के ना ही लाइट चलेगी ना ही फैन चलेगा। किंतु एक बार यह बिजली का कनेक्शन हो गया तो फिर मैं बिजली के कनेक्शन के साथ में जो भी अप्लायंस को ऐड करूंगा वह चाहे लाइट हो चाहे फैन हो ना कि चाहे यह फिर यह इंडक्शन कुकर हो आजकल तो गैस की वजह से सभी लोग वो इलेक्ट्रिक कुकर वो परचेस कर रहे हैं। कुछ भी है मोबाइल चार्जर है आपका बाइक का चार्जर है। सो कुछ भी आप ऐड कीजिए इसके साथ में वो चलने लगेगा। तो यह जो बिजली है जो पावर हाउस जो है जो जनरेटर है अपने हृदय में वो क्या है तो यह सब कहानियां है ये अखंडानंद जी की ही एक और कहानी कि महला में उन्होंने अभी काम प्रारंभ किया है और उस समय अखंडानंद जी गायत्री मंत्र का बहुत ही जप कर रहे थे तो उनको अभी ये गायत्री मंत्र का जप करने से दूरदर्शन की शक्ति प्राप्त हो गई। अभी एक दिन की बात है। किसी एक व्यक्ति को उन्होंने दूसरे गांव में काम के लिए भेजा। अभी रात हो गई है घनघोर रात्रि। गांव की रात्रि आज की तरह स्ट्रीट लाइट ये स्ट्रीट लैंप वगैरह तो नहीं वो तो घनघोर अंधकार ऊपर से बीच में है एक विराट मैदान वन है वन्य पशु है विराट मैदान है यदि कोई आदमी मध्य रात्रि में यहां पर खो जाए तो बेचारे को प्राण का संशय हो जाएगा। तो यहां पर बेचारे अखंडानंद जी अपने कमरे में बैठकर के सोच रहे हैं कि इसको जो भेजा वह वापस कब आएगा? कर क्या रहा है? क्या रास्ता खो गया? ना कि फिर रास्ता भूल बैठा ना कि वो सिंह या शेर आकर के उसको खा गया। क्या हुआ? उस समय अखंडानंद जी कहते हैं मुझे स्पष्ट दिखने लगा। जिसको मैंने भेजा था वह एक दुकान में बैठा है। वहां पर एक काम करवा रहा है। मेटल का एक हुक बना रहा है। तो अखंडानंद जी ने सोचा कि कुछ ही दिन पहले मेरे मन में यह विचार आया था कि इस तरह का एक हुक अपने आश्रम में हो तो यह बिजली की यह जो लटन है लटन को टांगने में सुविधा रहेगी। तो इस आदमी ने शायद अखंडानंद जी के मुंह से सुन लिया होगा। तो वह आधी रात को बैठकर के दुकान में हुक बना रहा है। तब अखंडानंद जी कहते हैं मुझे थोड़ी सा मिली। देखिए यह कहानी आपने सुनी। यह कहानी सुनकर के देखेंगे कि हमारे मन के भीतर में जो आत्मश्रद्धा है, ठाकुर मां स्वामी जी के प्रति श्रद्धा है, वह जागृत हो जा रही है। ऐसी ही एक कहानी है। अखंडानंद जी कहते हैं अभी महला में तो क्या है कि सब तरह के लोगों को रखना पड़ता था। एक अफीमखोर बूढ़े को रखा था। बूढ़ा है ऊपर से अफीम का सेवन कर रहा है। अभी जो भी हाथ में आया उससे काम करवाना है। तो अखंडानंद जी ने उसको कहा भाई तुम जाओ यह काम करके आओ दूसरे गांव गया है अभी फिरने में देरी हो गई है रात को और भयानक वृष ये बारिश और बिजली और यह तूफान चालू हो गया तो अखंडानंद जी बेचारे घबरा गए सोचा कि वैसे ही तो बूढ़ा है ऊपर से अफीम खाता है और यह बारिश में यदि फंस गया तो बेचारे के साथ में क्या होगा पता नहीं तो उस समय उनके पास में ठाकुर का एक फोटोग्राफ था। तो ठाकुर के फोटोग्राफ के सामने देखकर के ठाकुर को प्रार्थना कर रहे हैं। उस समय स्पष्ट देखने को उनको मिला कि यह जो बूढ़ा था वो एक दुकान में बैठकर के उसने वहां पर आश्रय लिया है। तब कहीं जाकर के अखंडानंद जी को सांत्वना मिली और उन्होंने देखिए सिंपल सिंपल कहानियां है। इसके भीतर में से ये मिरेकुलस या इस तरह से कुछ नहीं लेना है। बस यही लेना है कि यह कहानियां सुनकर के अपना हृदय जो है वह परिपुष्ट होता है। अच्छा अभी गाइडेड मेडिटेशन के बारे में हमको पता ही है हमारा मेथड क्या है। सर्वप्रथम गीता पाठ करेंगे। 15वा अध्याय मैंने लिखा था उस मैसेज में तो आई होप कि 15वां अध्याय श्रीमद् भगवत गीता का आपके पास में होगा ओपन और फिर [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं दो बार प्रत्येक मंत्र का पाठ करूंगा। आपको यदि आता है तो मेरे साथ में दोहरा सकते हैं और यदि नहीं आता है तो मुझे सुनिए और फिर सेकंड टाइम मेरे साथ में दोहराइए। तो यह हो गया फर्स्ट पार्ट हमारी ध्यान की जर्नी का। सेकंड पार्ट है। जैसे ही 10 श्लोक समाप्त हो जाए। [गला साफ़ करने की आवाज़] इसके बाद में हम क्या करेंगे? गीता की पुस्तक को साइड में रख के सबसे पहले तो आंखों को पूरा बंद करेंगे। इसके बाद में उसको हल्का सा ओपन करेंगे। और फिर यह हो गया सेकंड स्टेज। और थर्ड स्टेज है वही चिर परिचित कमरा ठाकुर का। उस चिर परिचित कमरे को अपने हृदय के भीतर में हमको विजुअलाइज करना है। ठाकुर अपनी खाट के ऊपर में बैठे हुए हैं। उनके सामने ठाकुर के पास में ही मां बैठी हुई है। और जमीन के ऊपर में सभी गुरु भाई बैठे हुए हैं। और मैं भी उन्हीं गुरु भाइयों की तरह ही ठाकुर का स्नेह का पात्र हूं। ठाकुर और मां का ही संतान हूं। उनकी पुत्री हूं। इस तरह से सोच करके मैं भी उनके सामने बैठा हूं। यह मुझे विजुअलाइज करना है। और यदि आपको ऐसा दूसरा भी कोई सीन आपको लगे कि आपको बेटर लगता है तो आप वह भी विजुअलाइज कर सकते हैं। किंतु मैं कहता हूं कि चिर परिचित कमरा हमारे लिए सबसे बेस्ट बेट है। आज की लैंग्वेज में कहे तो। सो हम प्रारंभ करते हैं सर्वप्रथम श्रीमद् भगवत गीता के 10 श्लोक [गला साफ़ करने की आवाज़] श्री भगवान वाच उर्ध्व मूल मदः शाखम अश्वत्थम प्राहुरव्ययंम उर्ध्व मूल मदः शाखम अश्वत्थम प्राहुरव्ययंम छंद यस्य पणानी छंद यस्य पण यस्तम वेदस वेदवी अधोधम प्रसुतास शाखा अधस चोधम प्रसुता तस्य शाखा गुण प्रवद्धा विषय प्रवाला गुण प्रव विषय प्रवाला अध च मूल्यनुसंततानी अध मूल्यनुसंततानी कर्मानुबंध बंध मनुष्य लोके कर्मानुबिनी मनुष्य लोके न रूपमस्य तथो पलभ्यते न रूपमस्य तथो पलभ्यते नंतो न चाद न चस प्रतिष्ठा नंतो नचादी नचसम प्रतिष्ठा अश्वत थमेनम सुविरू मूलम अश्वत्थमेनम सुविरू मूलम असंग शस्त्रे दृढ़ न छित्वा असंग शस्त्रे दृढ़ चित्वा ततः पदम त परमारितव्यम ततः पदम त परिमारितव्यम यस्मिन गतान निवर्त भयः यस्मिन गतान निवर्त भयः तमेचा चाध्यम पुरुषम प्रपध्य तमे वचाध्यम पुरुषम प्रपद्य यतः प्रवत्ति ही प्रसुता पुराण यतः प्रवत्ति ही प्रसुता पुरण निर्माण मोहा जित संग दोष निर्मा जित संग दोष अध्यात्म नित्या विनिवत्तमा अध्यात्म नित्या विनिवत्तमा द्वंद्व विमुक्त सुख दुख संग ध्व विमुक्त सुख दुख संगै गच्छंत्य मूढा पदमव्ययंम तत गच्छंत मूढ़ा पदमव्ययंम तत न तभासयते सूर्य न तभासयते सूर्य न शशांको न पावक यदगत्वा निवर्तते यदगत्वा निवर्तते तधाम परम मम तधाम परम मम ममवाशो जीव लोक ममशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः मनः षष्ठाण मनः षष्ठा इंद्रियण प्रकृति स्थान कर्षति प्रकृति स्थानिक कर्षति शरीरम यदवापनोति यच्चापत्राश्वर गहित्वतानी सया गहित्वतानी सया वायुर गंध गंधा निवासयात वायुर गंधा निवासयात श्रोत्रम चक्षु स्पर्शम च श्रोत्रम चक्षु स्पर्शम च रसनम घणमेव च रसम घ्राणमेव च अधिष्ठाय मन चायम अधय मनचायम विषयानुपसेवते विषयापसेवते उत्क्रामंतम स्थितम वापी उत्रामंतम स्थितम वापी भंजानम वा गुणान्वितम भंजानम वा गुण्वितम विमूढ़ाना पश्यती विमूढ़ाना पश्यती चक्षुष पश्यतीन चक्षुष वेरी गुड अभी अपनी नजरों को झुका कहेंगे पहले बंद करके हल्का सा ओपन कीजिए ठाकुर को प्रार्थना कीजिए ठाकुर मेरे मन में जितना भी द्वेष भाव जितना भी कटु भाव किसी के भी प्रति हो मेरा आज का ध्यान का फल उसको समर्पित कर दीजिए। ध्यान का अर्थ है अपने मन को रिइजीनियर करना। यदि अपना मन उसमें परिवर्तन ना आए तो ध्यान करने का कोई फायदा नहीं। इस प्रार्थना के बाद में हृदय में वही चीर परिचित कमरा ठाकुर का उसको विजुअलाइज कीजिए। आंखें हल्की सी खुली है। इस बात का ध्यान रखिए। ठाकुर और मां खाट के ऊपर में बैठे हैं। हम सभी गुरु भाई जमीन पर बैठे हैं। अंधकार रात्रि है। चांद का प्रकाश है। गंगा का कुलकुल ध्वनि कलकल ध्वनि सुनाई दे रहा है। ठाकुर के कमरे के सामने जो गार्डन है उसमें से जुई जासमीन वगैरह फूलों की सुंदर खुशबू हवा में फैल रही है। इसी विजुअलाइजेशन को अभी हृदय में स्थिर करके अपनी पूरी प्राण शक्ति उसके ऊपर में लगा दीजिए। आपका मन संपूर्ण रूप से ब्रेन संपूर्ण रूप से ब्लैंक कर दीजिए। गले के ऊपर में सर है ही नहीं। जैसे कि ओम ्म आ हरि ओम धीरे से ध्यान से बाहर आइए।
Meditation : part 2
मां ने जैसे कहा था किसी को फल दिया मां ने और क्या कहा कि फल तो मैंने आपको दिया फल का फल भी मैंने आपको दिया। क्या अर्थ हुआ? कि फल देने से जो पुण्य कर्म अर्जित होता है, वह पुण्य भी मां ने इनको दे दिया। तो वैसे ही अपने हृदय को संपूर्ण रूप से शरणागत कर देना है। कुछ भी आकांक्षा नहीं रखनी ठाकुर से। ध्यान करते हैं अर्थात कि ठाकुरमय हो गए हैं। ठाकुर है त्यागी। त्यागियों के राजा कुछ भी उन्होंने अपने जीवन में नहीं चाहा। संपूर्ण रूप से ईश्वर पर भरोसा करके जिए हैं। तो हमारा जीवन भी हमारा ध्यान भी यह ध्यान है त्याग की ओर हमारी यात्रा शरणागति की ओर हमारी यात्रा आकांक्षा त्याग करने की ओर हमारी यात्रा यह यात्रा जितनी आगे बढ़ती जाएगी आप आंख झुका करके हृदय में जैसे ही ठाकुर का आप ध्यान करेंगे। देखेंगे कि सतत मन के भीतर में से शरणागति का भाव प्रकट हो रहा है। सतत शरणागति सतत शरणागति। शरणागति के अलावा और कुछ नहीं है। जैसे ही मैं चला गया वैसे ही आकर के ठाकुर विराजमान हो गए। यह है ध्यान का सीक्रेट। और इसीलिए दो शक्तियां है। गीता पाठ है हमको आत्मश्रद्धा देता है ध्यान में आगे बढ़ने के लिए। और यह जो कहानियां है ठाकुर मास्वामी जी की छोटी-छोटी कहानियां वह हमको देती है शरणागति। अखंडानंद जी ब्रह्मचर्य के बारे में बता रहे हैं। कहते हैं कि देखिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन कीजिए। कैसी शक्ति प्रकट होती है। वो कहते हैं अपने से कहते हैं मैं जब तिबेट गया था तो वहां के जो तिबेटन लैंग्वेज है दो-तीन दिन सुना उसमें तो मैंने उस लैंग्वेज में बात करना प्रारंभ कर दिया। 15 दिन मैंने सुना वहां के लामाओं के साथ में मैं फिलॉसोफिकल डिस्कशन करना प्रारंभ कर दिया था। सोचिए मैंने भी एक नई लैंग्वेज सीखी है। संपूर्ण स्क्रैच से बेंगली लैंग्वेज। बेंगली तो मुझे कभी आती नहीं थी। यहां बेलूर मठ में आकर के ही मैंने सीखना प्रारंभ किया। मुझे एटलीस्ट एक साल लगा है कि उसके ऊपर में मास्टरी प्राप्त करने में। किंतु 365 दिन यहां पर अखंडानंद जी क्या कहते हैं? 15 दिन में तो फिलॉसोफिकल डिस्कशन करना प्रारंभ कर दिया था। तो यह त्याग की शक्ति है हमारे मन को ऐसा एक वह जो तैल धारावत जो कहते हैं ऐसा एक मन को एकाग्र कर देती है कि देखेंगे कि बाकी सब डिस्ट्रक्शन बाकी सब डिप्रेशन बाकी सब फ्रस्ट्रेशन कहां अदृश्य हो जाएंगे ठाकुरमय हो जाएगा अपना हृदय है श्री राम कृष्ण रूपी सौरभ से सुवास से प्रफुल्लित हो जाएगा। तो अभी सेकंड स्टेज फिर से वही सेम मेथड यूज करेंगे। पहले गीता पाठ करेंगे और फिर ध्यान करेंगे। श्लोक नंबर 11 यतंतो योगिन चैनम यतंतो योगिन चैनम पश्यंतात्मन्यवस्थितम यतंतोप्य कृतात्मानो यतप्य कृता त्मानो नैनम पश्यंत चेतस यदादिित गतम तेजो यदादित्यगत गतम तेजो जगत भाषयते खिलम य चंद्रमसी यग्नो य चंद्र मसी यच्चाग्नो तत्तेजो विमाकम तत्तेज जो विमाकम गामा विष भूतानी धारयाम्य मोजसा धारयाम्य मोजसा पुष्णाम चौषधि सर्वा पुष्णाम चौषधि सर्वा सोमो भूत्वा रसात्मक अहम वैश्वा नरो भूत्वा अहम वैश्वा नरो भूत्वा प्राणी नाम देह माश्रितः प्राणापान समायुक्त प्राणापान समायुक्त पचामयनं चतुरविध पचाम यनं चतुरविम सर्वस्य चाहम रिद सनविष्टो सर्वस्य चाहम रिद सनविष्टो मत्त स्मृति ज्ञान मपोम च मत्त स्मृति ज्ञान मपोम च वेद च सर्व रहमेव वेदो वेदै सर्व रहमेव वेदो वेदांत कृत वेद विदेव चाहम वेदांत कृत विद चाहम्वि पुरुषो लोके धमो पुरुषो लोके क्षर चाक्षर एवच क्षर सर्वाण भूतानी कूटस्तोक्षर उच्चते कूटस्तोक्षर उच्च ते उत्तम पुरुष त्वन्य उत्तम पुरुष त्वन्य परमात्मदा यो लोकत्रयमा विषय यो लोकत्रयमा विषभव्य य ईश्वर बी भरतव्यय ईश्वर यस्मातर मती तोहम यस्मातर मती तोहम अक्षरादपिचोत्तमः अक्षरादपचोत्तमः अतोस्म लोके वेद च अतो लोके वेद [गाना गाने की आवाज़] च प्रथ पुरुषोत्तम प्रथ पुरुषोत्तमः यो मामेव समूढो यो मामेव समूढो जाना पुरुषोत्तम जा पुरुषोत्तम स सर्ववि भजती माम स सर्ववि भजती माम सर्वभावे भारत सर्वभावे भारत इति गुमम शास्त्रम इति गुह तमम शास्त्रम इद मुक्तम मयाघ इद मुक्तम यघ एत बुद्ध बुद्धिमानस्यात एतद बुद्ध बुद्धिमान्यात कृत कृत्य भारत कृत कृत्य भारत अभी लास्ट लाइन साथ में ओम तत्सद इति श्रीमद् भगवत गीता सु उपनिषद सु ब्रह्म विद्यायाम योग शास्त्रे श्री कृष्ण संवादे पुरुषोत्तम योगो नाम पंचदशोध्याय वेरी गुड अभी फिर सेम ध्यान की मेथड सेम मेथड पहले आंखों को बंद करके हल्का सा खोलिए। हृदय में श्री राम कृष्ण देव को स्थापित कीजिए। वही चीर परिचित कमरा वही चीर परिचित श्री राम कृष्ण और पार्षद गण ठाकुर के प्रति श्रद्धा, ठाकुर के प्रति शरणागति, और गुरु भाइयों के प्रति स्नेह, मां के प्रति संतान भाव। यह जैसे कि सौरभ बनकर के हमारे मन मंदिर को हृदय मंदिर को सुवासित कर रहा है। ्म आ [संगीत]
Kathamrita path
मैं कथा अमृत में से पाठ करता हूं। आप ध्यान करते रहिए। श्री रामकृष्ण कहते हैं दक्षिणेश्वरे राम मंत्र लोए छिलाम दक्षिणेश्वर में राम मंत्र लिया था। दीर्घ फटा लंबा तिलक गलाए हीरा गले में माला आ को दिन पर सब दूर करे दिलम किंतु कुछ दिनों के बाद में सब दूर कर दिया कनो व्याकुल होए मां मां बोले डाकताम कभी व्या व्याकुल होकर के मां मां बोलकर के पुकारता बा राम राम कोताम या राम राम करता जोख राम राम कोता तोखन हनुमान भाबे हो तो एकटा लेच पर बश यदि राम राम करता तब हनुमान की तरह हो सकता है कि एक पूछ पहन करके बैठा हूं। उन्मादस्था उन्माद की अवस्था आमी सीता मूर्ति दर्शन करे छिलाम मैंने सीता मूर्ति का दर्शन किया था। देखलाम शोभ मोंटा रामेती रोए छ देखा पूरा मन श्री राम की ओर है हाथ पाव बशन भूषण की छूते दृष्टि नहीं हाथ पैर गहने वस्त्र किसी की ओर नजर नहीं है जेनो जीवन राममय जैसे कि जीवन राममय राम ना थाकले राम के ना पेले प्राण बांचबे ना राम ना रहे राम ना मिले तो प्राण बचेंगे नहीं रामलीला देखते गूं मैं राम लीला देखने को गया था एक बार देख लूं साक्षात सीता राम लक्ष्मण हनुमान विभीषण देखा कि साक्षात सीता राम लक्ष्मण हनुमान और विभीषण तो जारा सेजे छिलो तादेर श पूजा करते लाो तब जिन्होंने यह साज सजे थे उन सबकी पूजा करने लगा एक दिन बकुल तलाए देख लूं एक दिन बकुल तला में देखा नील बशन पर एकटी में दांडिए बेश्या नील वस्त्र पहन करके एक स्त्री खड़ी है वेश्या दप करे एक बार शितारुद्दीपन दप करके एक ही साथ में सीता का उद्दीपन हुआ ओ मैं के भूले गूम उस स्त्री को भूल गया किंतु देख लूं किंतु देखा साक्षात सीता लंका थेके उद्धार होए रामेर काछे जा छे साक्षात सीता लंका से मुक्ति प्राप्त करके राम के पास जा रही है अनेक क्षण बा शून्य होए समाधि अवस्था होए रहो बहुत समय तक बाह्य ज्ञान शून्य होकर के समाधि अवस्था में पड़ा रहा पंचवटी तलाय एक दिन बोशयाची पंचवटी के नीचे एक दिन बैठा हूं ध्यान चिंता किु जे कोर छिलाम तान अमनी बोिलाम ध्यान चिंता या इस तरह का कुछ कर रहा था ऐसा नहीं वैसे ही बैठा था एमोन शमय ज्योतिर्मई नारी मूर्ति आविर्भूत होए स्थान टी के आलोकित कोरे तुलो उस समय ज्योतिर मई स्त्री मूर्ति आविर्भूत होकर के पूरे स्थान को प्रकाशित कर दिया। ओ मूर्ति टिक तखन जे देखते पािलाम ता सिर्फ इस मूर्ति को ही मैं देख पा रहा था ऐसा नहीं पंचवटी गाज पाला गंगा सबई देखते पालाम पंचवटी के पेड़ पौधे गंगा सब देख पा रहा था देखलाम मूर्ति टी मानु शेर देखा कि यह मूर्ति मनुष्य की है। कारण ता देवी देर म तो त्रि नयना नोए कारण वो देवियों की तरह त्रि नयना नहीं थी किंतु प्रेम दुख दया सहिष्णुता पूर्ण से मुखेर म तो अपूर्वो ओजससी गंभीर भाव देवी मूर्ति केो शचराचर देखा जाए ना किंतु प्रेम दुख दया सहिष्णुता पूर्ण उस चेहरे की तरह का अपूर्व ओजस्वी गंभीर भाव देवी मूर्ति में भी सब समय देखने में नहीं मिलता प्रसन्न दृष्टि ते मुग्ध हुए देवी मानवी धीर पाए उत्तर थेके दक्षिण आार दिखे अग्रसर हो प्रसन्न दृष्टि से मुग्ध करके वह देवी मानवी धीरेधीरे उत्तर से दक्षिण की ओर मेरी ओर आ रही है। अबक होए भाची अवाक होकर के सोच रहा हूं के इनी कौन है यह एमोन समय एक्ट हनुमान कोथा थे के हठात करे हु शब्द करे तार पायर का छे लुटिए पड़ लो उस समय एक हनुमान कहां से आकर के हुप शब्द करके उनके पैरों में लूट पड़ा आर अमर मने उठ लो सीता सीता जन्म दुखिनी सीता और मेरे मन मेरा मन बोल उठा सीता जन्म दुखिनी सीता जनक राज नंदिनी सीता राम मय जीविता सीता तखन मां मां बोले अधीर होए पाए लुटिए पड़ते जा समय त हठात ऐसे निज शरीर भीतर प्रवेश कर ले उस समय मां मां बोलकर के अधीर होकर के उनके पैरों में शरणागत होने को जा रहा था। उसी समय एकाएक मां सीता ने आकर के ठाकुर अपना शरीर दिखा के कहते हैं इसके भीतर में प्रवेश किया। आनंदे विस्मय अभिभूत होए जो ज्ञान हारिए पड़े ग आनंद विस्मय से अभिभूत हो बा्य ज्ञान हारकर मैं गिर गया ध्यान चिंता ना कोरे इमोन भावे कोनो दर्शन आगे आर हो नहीं ध्यान चिंता ना कर इस तरह का कोई दर्शन आगे कभी हुआ नहीं था। तो इसके साथ में ही आज का ध्यान का पर्व समाप्त करते हैं। यदि आपके पास समय है तो और थोड़ा सा आप ध्यान कीजिए। यदि कोई प्रश्न है तो हमारा सुबह का क्लास के अंत में आप प्रश्न कर सकते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु ओम