प्रार्थना
ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय रामकृष्णाायते नमः
पल भर का जीवन: आश्रम के रसोइये की अचानक मृत्यु और एक गहरी सीख: जब तक साँस है, नाम-स्मरण कर ले
हमारे यहां पे किचन में दो कुक है। तो एक है उड़िया और एक है यहां का लोकल तेलुगु। तो यह जो तेलुगु कुक वो हिंदी अच्छा आता नहीं माने हिंदी के अलावा और कोई लैंग्वेज नहीं जिसमें हम बात कर पाए तो उसका टूटा फूटा हिंदी और फिर मेरा हिंदी तो ऐसा करके कैसे भी करके बातें करते थे और सेवा भी काफी अच्छे से करता था। अभी कल रात को मैं गया किचन में मैंने कहा कि वो कुक क्यों नहीं आया। उसका नाम श्रीनिवास। मैंने कहा श्रीनिवास कहां गया? वह अभी आया नहीं। रात को खाने का टाइम हो गया है। तो वह जो दूसरा कुक है उड़िया उसने कहा वो तो मर गया। मैंने कहा क्या बात कर रहे हो? मर गया मतलब अभी क्या है? हिंदी तो इनका यह नहीं है ना। बोला ज्यादा सुसंस्कृत तो मैंने कहा क्या बात कर रहे हो? मर गया। मैंने कहा हां उसका तो डेथ हो गया। वो शाम को अपने भाई के घर गया था। वहां पर गिर गया। सर पर चोट लगाना कि ऐसा कुछ हुआ। उस साथ में ही उसका डेथ हो गया। तो मैंने कहा क्या बात कर रहे हो? मतलब मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है। वह मुझे पूरा बता रहा है। वह सुबह को उसके साथ में बात किया था। दोपहर को किया था। अभी रात को जाकर देखता हूं कि वो पूरा डेथ हो गया। उसका ये देखिए कि ह्यूमन नेचर किस तरह का क्षणभंगुर है। हमारा यह देह है पंचमहाभूत का। कैसा क्षणभंगुर देह है। उसकी उम्र मुश्किल से 50 55 थी और कोई फिजिकली फिट ही था। वह कोई उसको ऐसा बीमारी वगैरह कुछ नहीं था। और यहां पे तो क्या है कि उत्सव होता है, गेस्ट आते रहते हैं बोल के आपको तो कंटीन्यूअस काम में लगा रहना पड़ेगा। यदि फिजिकल फिटनेस नहीं है तो आप इतना जो डिमांडिंग वर्क है किचन का वो आप कर ही नहीं पाएंगे। चूल्हा जलता है तो उसका गर्मी आता है और फिर गेस्ट के लिए अभी कोई गेस्ट आ गया तो उनके लिए कुछ बनाना है। इट्स अ वेरी डिमांडिंग जॉब। तो फट करके गिरा और साथ में ही देह त्याग भी हो गया। सच अ सरप्राइजिंग थिंग। मैं मुझे अभी भी विश्वास नहीं आ रहा है। अभी गया था किचन में सुबह को मैं जाता हूं थोड़ा कॉफी पीता हूं। तो जाके देखा अभी और एक लड़के को लगाया है उसकी जगह दो कुक तो चाहिए ही सब समय। तो एक लड़के को लगाया है। किंतु देखिए कि कैसे मनुष्य का जन्म होता है। वो जो ठाकुर की वो कहानी है ना कि वो कैलाश में ना कि कहां पे भगवान बैठे थे। तो धूम करके आवाज हुआ। तो मां ने पूछा भगवान को कि क्या हुआ यह इतना बड़ा जोर से आवाज हुआ तो उन्होंने कहा कि देखो रावण का जन्म हुआ है महक्षस है तो इसलिए इतना जोरों से आवाज हुआ उसके जन्म के साथ तो मां कहती है देवी कहती है अच्छा ठीक है फिर थोड़ी देर के बाद में फिर से भूम करके आवाज हुआ तो बोला अब क्या हुआ तो बोला उसका मृत्यु हो गया तो देखिए कि यह अभी जन्म होता है अभी मृत्यु होता है यह दो दिन का यह जीवन कब कहां पे क्या हो जाए कुछ ठीक नहीं तो यह जीवन में जितना ईश्वर प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए जितना मौका मिलता है उसका उतना उठा लेना चाहिए फिर बाद में कहेंगे अभी नहीं रिटायर हो के रिटायर होकर कहेंगे कि अभी नहीं अभी और मेरे बच्चों को सेटल होने दो फिर बच्चों के बच्चों को सेटल होने दो बाद में यह सब करेंगे ऐसा टालते ही जाएंगे टालते ही जाएंगे एक दिन मृत्यु सन्मुख आ जाएगा और फिर बस फिर जो इस जन्म में नहीं हुआ उसको करने के लिए नेक्स्ट जन्म में फिर से आपको प्रारंभ करना पड़ेगा। तो
तारकेश्वर महादेव के सामने हत्या देने की कहानी: श्रीरामकृष्ण की रोगमुक्ति के लिए माँ सारदा का जीवन-दाँव
देखिए मां का जीवन हम पाठ कर रहे थे और देखा कि किस तरह से मां गई है तारकेश्वर हत्या देने के लिए। ठाकुर का जो प्रकट लीला है उसका अवसान हो रहा है। ठाकुर की अंत्य लीला प्रारंभ हो चुकी है। तो इसी मां ने सोचा कि क्या एक शरणागत एक भक्त की पुकार क्या भगवान नहीं सुनेंगे क्या? मां ने तो सिद्धेश्वरी सिंह वाहिनी वहां पर जाकर के हत्या दी थी। तो उनको तो देवी की करुणा का परिचय प्राप्त हुआ था। तो मां ने सब कुछ सोच करके ठीक किया कि वह तारकेश्वर जाएगी और सर्व जीव के सर्व प्रकार कामना पूर्णकारी तारककेश्वर महादेव के मंदिर में हत्या देगी। तो ऐसा सोच कर के मां जा रही है। आगे थोड़ा सा पढ़ते हैं गंभीरानंद जी क्या कहते हैं? गंभीरानंद जी कहते हैं कि श्री मां तारकेश्वर गले श्री मां तारककेश्वर गई ठाकुर आपत्ति को लेना ठाकुर ने किसी भी तरह का आपत्ति नहीं किया आर्गुममेंट नहीं किया विरोध नहीं किया ऐसा नहीं कहा कि ठीक है तुम मत जाना अभी तो यह जो लीला है उसका तो प्रकट लीला जो है उसका अवसान होना ही है जन्म मृत्यु जरा व्याधि का चक्र है। वह तो चलते ही रहने वाला है। इस चक्र के परे जो शाश्वत अनंत सत्ता है उसको प्राप्त करना। वह तो मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। वगैरह वगैरह कोई भी उपदेश ठाकुर ने मां को दिए नहीं। कोई भी किसी भी तरह का विरोध किया नहीं। तो मां गई शंगे कहाारा छिलेन जाना नहीं। साथ में कौन थे वो पता नहीं। होए तो लखी दीदी छलेन एवं एक जो जी हो सकता है कि लक्ष्मी दीदी थी और साथ में एक काम एक काम करने वाली कोई बाई भी होगी कोई स्त्री भी होगी शेखा ने श्री मां दुई दिन निरांबू निरंबू उपवासे काटा लेन वहां पे तारकेश्वर मंदिर में हत्या देते मां ने दो दिन इवन बिना पानी के निरंबू उपवास निर्जला उपवास करके निकाल डाला देवतार कृपाए आभास मिल लोना देवतार कृपार आभास मिल लोना किंतु दो दिन माने बिताए पानी भी नहीं पिया यानी कि देखिए ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य बिना अन्न के 20 दिन ना कि इतने दिन जी सकता है किंतु बिना पानी के आप दो-तीन दिन से ज्यादा नहीं जी सकते। यानी कि आपको ऐसा लगेगा कि दो ही दिन मां ने उपवास किए तो क्या है? बहुत सारे जो अभी जैन मुनि लोग जो होते हैं वे लोग तो 20 20 दिन 30 दिन 40 दिन ऐसा उपवास करते हैं। किंतु यह सब उपवास में क्या है? आपको पानी पीना है और कभी-कभी हो सकते हैं। माने पानी पी के आप लंबा टाइम रह सकते हैं उपवास करके। किंतु बिना पानी का उपवास वह बड़ा ही भयानक है। बड़ा ही इमीडिएटली डिहाइड्रेशन लग जाएगा और एक बार डिहाइड्रेशन प्रारंभ हुआ तो फिर बॉडी को रिकवर होना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। बिना अन्न का उपवास आपने किया और सिर्फ पानी पी के रहे तो फिर क्या है आपका वेट तो डाउन हो जाएगा किंतु थोड़ा बहुत पौष्टिक आहार करने से वह फिर से वेट गेन भी हो जाएगा और शरीर के ऊपर में ऐसा कोई लंबे टाइम का नेगेटिव इंपैक्ट भी नहीं होगा। कोई लास्टिंग इफेक्ट नहीं होगा। किंतु बिना पानी का उपवास बड़ा ही डेंजरस होता है। डिहाइड्रेशन यदि लग जाता है तो फिर उसको निकालना वो बड़ा मुश्किल है। म पानी पी के वो तो मिटा लेंगे किंतु बॉडी के ऊपर में जो फिर साइड इफेक्ट्स जो सब होना शुरू होगा व्हिच आर वेरी डेंजरस। सो यहां पे भले ही चाहे मां ने दो ही दिन उपवास किए किंतु निर्जला उपवास किया था और निर्जला उपवास वेरी डेंजरस होता है। किंतु देवतार कृपार आभास मिल लोना। इतना कठिन तपस्या करने के बावजूद देवता की कृपा का कोई भी आभास नहीं मिला। अंदाजा अंदेशा नहीं मिला। परवर्ती निशथे श्री मां ठीक एक भाबे महादेव करुणा भिखारिणी होया पड़िया आन और एक रात श्री मां बस इसी तरह से महादेव की करुणा भिखारिणी होकर के पड़ी हुई है एम शमो एकटा शब्द सुनी ते पायले उस समय एक आवाज सुनने को मिला शाहजहानो अनेक गोली हांडीर एकटा ऊपर आघात करिया उहा भांग्या दिल जेन आवाज होई ए जेनु से रकम यह जो हांडी होती है मटकी होती है मिट्टी की ये बहुत सारी मिट्टी की ये मटकियां हां एक के ऊपर में एक आप रख दीजिए वो जो राजस्थान के कई कई फोटो आपने देखे होंगे दूर से पानी लाना है तो वह स्त्रियां क्या करती है सर के ऊपर में मटकी लेके पानी लेने को जाती है किंतु एक मटकी मटकी से तो होगा नहीं तो मटकियों के ऊपर में मटकियां सजाई होती है। हांडी के ऊपर में हांडी सजाई है। चार पांच ऐसा वो एक रो में सजा करके वे लोग सर के ऊपर में लेकर के जाते हैं। तो वह भी एक स्किल है कि इस तरह से एक के बाद एक मटकियां सजाई है। उसको आप ले चल रहे हैं। वह सभी की सभी पानी से भरी है। तो क्या है कि यहां पे भी एक के ऊपर में एक बहुत सारी मिट्टी की यह मटकियां सजाई हुई है। उसको आप लाठी मार के तोड़ेंगे तो कैसा आवाज होगा? माने आप अनुमान करके सोच ही सकते हैं कि मिट्टी की ये मटकी है। बहुत सारी उसको तोड़ेंगे लाठी से तो कैसा आवाज होगा? इस तरह का आवाज हुआ। ये इस जैसे कि इसी तरह का एक आवाज हुआ। वही शब्द जाग्या उठियाई शहोशा श्री माय मने होइलो ए जगत के कार स्वामी इस तरह का जो आवाज हुआ वो तो मां को थोड़ा बहुत तंदरा आ गया होगा नींद आ गई होंगी किंतु इस तरह की आवाज सुनकर के मां की नींद जो है एकाएक टूट गई और एकाएक मां के मन में हुआ इस जगत में कौन किसका स्वामी है कौन किसका पति है ए संसार के कार इस संसार में कौन किसका है कार जन प्राण हत्या करते बोशे छ किसके लिए मैं यहां पे प्राण हत्या करने को बैठी हूं देखिए मैंने कहां मां का ठाकुर के श्री चरणों में संपूर्ण रूप से अर्पित मन प्राण और जीवन ठाकुर के लिए मां अपना जीवन पर्यंत अपना जो प्राण से भी प्रिय अपना जो देह है उसको भी त्याग करने के लिए मां वहां पर हत्या देने के लिए बैठी है। एक
कहानी: माँ सारदा के एक त्यागी संतान माँ की बीमारी अपने पे ले लेना चाहते है
इंटरेस्टिंग स्टोरी माने इसी रिलेटेड इसी के रिलेटेड नहीं किंतु मां वहां पे जयराम बाटी में है और मां तो वृद्धा हो चुकी है और पैरों में जो अर्थराइटिस है उसकी वजह से मां चलने में बड़ी तकलीफ होती है और बैठेगी भी तो पैरों को मोड़ करके बैठना बड़ा मुश्किल होता है। मां के वो जो दोनों पैर खोल जो सीधे रख के बैठने वाला जो पिक्चर है वह तो हमने देखा ही होगा। वो सभी रामकृष्ण मिशन के जितने भी किचन है डाइनिंग हॉल है वहां पर वो मां की वो स्टैंडर्ड छवि है। तो मां को इस तरह से पैरों को मोड़ करके बैठना सुखासन में वो थोड़ा मुश्किल होता था। तो बहुत बार मां इस तरह से पैरों को सीधा करके ही बैठती थी। तो मां को पैरों में वह एक तेल आता है जो कि इस अर्थराइटिस में हेल्प करता है। तो वह तेल मालिश एक त्यागी संतान कर रहा था। तो उसने सोचा कि मां के पैरों का यह जो दर्द है तो मां को तो इतना वृद्धावस्था में इतना कष्ट हो रहा है और मैं तो युवान हूं। फिजिकली फिट हूं। तो यह दर्द मैं ही ले लेता हूं। मां को मुक्ति मिलेगी। मां को इतना यह माने रिलीफ मिलेगा इतना। ऐसा सोच के वह क्या करता है कि मां के पैरों का जो अंगूठा था वह अपने कपाल के ऊपर में ऐसा करके घिसता है। तो वो मुंह से तो कुछ बोला नहीं किंतु मां इमीडिएटली समझ गई कि वो करना क्या चाहता है। मेरी बीमारी वो ले लेना चाहता है जिससे कि मुझे थोड़ा सा रिलीफ मिले। मां यह बात समझ गई। तो मां ने इमीडिएटली कहा कि अरे बेटा यह क्या कर रहे हो? मैं मैं बूढ़ी हुई हूं। मुझे ही यह सब भुगतने दो। तुम लोग सब स्वस्थ होकर के बचे रहो। आपको तो और भी कितना सब कुछ करना है। फिर वह जो बंगाल में गांव की स्त्रियां होती है वैसा चिबुक स्पर्श करके वह चूमा खाती है। तो मां ने ऐसा करके उसको स्नेह करके कहा कि मैं बूढ़ी हूं। मेरे मुझे ही यह सब भुगतने दो। तो देखिए कि यह दूसरों का कष्ट अपने पर ले लेना यह आध्यात्मिक जीवन में संपूर्ण रूप से संभव है ही है। ठाकुर की वह जो कहानी है कि जब अद्वैत वेदांत की साधना समाप्त हुई। ठाकुर जब निर्विकल्प समाधि में छ महीने थे वहां से नीचे जब आए सामान्य भूमि पर तो उस समय मथुर बाबू ने ठाकुर को विनती की कि उनकी जो पत्नी है वह पत्नी अभी बहुत ही बीमार है और पत्नी के मरने का ऐसा कोई बहुत ज्यादा गम नहीं है। ठाकुर के साथ में रहकर के थोड़ा बहुत तो वैराग्य मथुर बाबू के मन में संचारित हुआ ही होगा। किंतु उनको डर इस बात का है कि काली मंदिर की जो प्रॉपर्टी है उसके मालिक तो वह नहीं है। मालिक तो उनकी पत्नी ही है। रानी रासमणि के निधन के बाद में उनकी लड़कियों के हाथ में ही तो सब प्रॉपर्टी वगैरह आएगा। तो उनकी लड़की के साथ में विवाह है बोलकर के मथुर बाबू के हाथ में यह एडमिनिस्ट्रेशन है काली मंदिर का। यदि उनकी पत्नी का देहांत हो गया तो काली मंदिर का एडमिनिस्ट्रेशन उनके हाथ से चला जाएगा। तो मथुर बाबू आकर के ठाकुर को रिक्वेस्ट करते हैं पत्नी मरे उसका इतना गम नहीं है किंतु आपकी सेवा नहीं कर पाऊंगा इस बात का गम है। तो आप कैसे भी करके आप कुछ भी कीजिए इसके बारे में। तो ठाकुर ने क्या किया था कि उनकी पत्नी की जो बीमारी है अपने सर पर ले ली थी और प्राय 6 महीने बहुत ही उनको भुगतना पड़ा था। तो उनकी पत्नी बच गई। मथुर बाबू की सेवा बच गई और मथुर बाबू आजीवन ठाकुर की सेवा करते रहे। तो यह आध्यात्मिक जीवन में रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में इस तरह से दूसरों की प्राणघातक बीमारी अपने ऊपर में ले लेना और उनको बचाना। यह तो एक तरह से देखें तो संभव है। इस तरह के उदाहरण भी है। तो यहां
माया के इस जगत में कौन किसका है? -- माँ सारदा में मन में प्रगट हुई महा-प्रलय-रूपी वैराग्य की प्रज्वलित दीप्ती
पर देखिए कि मां इस तरह से हत्या देकर के पड़ी है। यहां पर मां ने शायद ऐसा कहा हो ना कहा हो कि ठाकुर की बीमारी मुझे आ जाए। ऐसा ऐसा शायद मां ने नहीं कहा। किंतु यह जो हत्या देना उसका अर्थ आखिर में वही है कि यदि मेरे जो प्राण के प्रिय है उनका जीवन यदि बच जाता है तो फिर उसके लिए मैं अपना जीवन न्योछावर करने के लिए संपूर्ण रूप से तैयार हूं। किंतु देखिए कि किस तरह से एकाएक यह वैराग्य का एक ऐसा प्रवेश मां के हृदय में हुआ। एकाएक इस तरह का वैराग्य का विस्फोट हुआ। यह जो हांडिया एक के ऊपर एक सजा के रखी है उसको तोड़ने से जिस तरह का आवाज और साथ में ही यह वैराग्य का विस्फोट मां के हृदय में हुआ और साथ में ही मां के मन में इस तरह की बात प्रकट भी हो ठाकुर के प्रति कितना बड़ा आश्चर्य है कि इस जगत में कौन किसका स्वामी इस संसार में कौन किसका है किसके लिए मैं यहां पर प्राण हत्या करने को बैठी हूं देखिए यह किसके लिए माने जिन जिन ठाकुर के लिए मां ने जीवन मन प्राण सब समर्पण किया है। उसी ठाकुर के लिए मां बोलती है किसके लिए मैं यहां पर प्राण हत्या करने को बैठी हूं। वहां पर देखिए हम लोग जब नहबत के दिनों की चर्चा कर रहे थे तो ठाकुर ने और कुछ पहले तो कुछ समय देखिए कि ठाकुर ने मां को तो अपने ही कक्ष में अपने ही कमरे में शयन करवाने के लिए साथ में रखा था। साथ में ही शयन करते थे। उस समय ठाकुर ने कहा था कि यदि देखो कि मेरा जो मन के ऊपर में संयम का बांध है बंध है जो डैम जो है मैंने बांधा है यह जो जो नेचुरल जब अर्जिस होती है शरीर की काम के प्रति जो भाव होता है उसको तो मैंने बंध बांध बांध करके रखा है किंतु यदि मां मेरे ऊपर आक्रमण करती है तो पता नहीं मेरे यह संयम का बांध जो है बंध जो है वह टूट भी जाता कि नहीं। ठाकुर ने स्पष्ट इस तरह से अपने मुंह से यह बात कही है। गंभीरानंद जी किंतु इसकी व्याख्या करके कहते हैं कि ये तो ठाकुर तो नारायण स्वयं है। उनके मन का संयम तो कभी टूटने वाला नहीं है। उन्होंने भले ही चाहे अपने मुंह से ऐसा कहा हो किंतु नारायणी कभी भी ठाकुर का अहित नहीं करने वाली ना ही कभी ठाकुर के मन के संयम का बंद जो है बांध जो है वो टूटने वाला है। तो वो अभी वो एजोटेरिक एक्सप्लेनेशन थोड़ा सा एक साइड पर रख दें तो सहज रूप से हम सोच सकते हैं कि यदि ऐसा कुछ हुआ होता तो कितना बड़ा एक दुर्घटना हो जाती। तो यहां पर देखिए कि ठाकुर जब मां पहली बार आई थी ठाकुर ने पूछा कि तुम यहां पर क्या मेरा जो आध्यात्मिक जीवन है उसमें हानि पहुंचाने के लिए आई हो? तो मां ने कहा नहीं नहीं मैं तो आपको इस रास्ते में सहाय करने के लिए आई हूं। संसार की ओर खींचने के लिए आपको नहीं आई। ईश्वर की ओर आपकी जो जर्नी है, यात्रा है, उसी में सहाय करने के लिए आई हूं। और वही ठाकुर के लिए मां ने वही छोटे से नहबत में दिन प्रतिदिन रह के कितने कष्ट में जीवन बिताया है। ठाकुर को जब कैंसर हो गया तो वो श्याम पुकुर के दिनों की तो बात हमको पता है। एक ही बाथरूम है। वहां पे ही सभी को जाना है। मां रात को 11:00 बजे के आसपास तो सोती थी और 2:00 बजे रात के मध्य रात्रि ही तो कहेंगे 2:00 बजे उठकर के बाथरूम बाथरूम वगैरह सब समाप्त करके फिर वहां पे छोटा सा एक टेरेस जैसा है वहां पर बैठकर के ठाकुर के लिए जो पथ्य रंधना है जो डाइट बनाना है उसकी व्यवस्था प्रारंभ कर देती थी। मुश्किल से दो-ती घंटे की नींद मां को रात को होती थी। किंतु फिर भी हृदय में इस आशा को जागृत रख के कि इसी तपस्या करके ठाकुर का यदि जो यह रोग है वह ठीक हो जाए ठाकुर फिर से वही दक्षिणेश्वर चले आए फिर से वही आनंद की हाट बैठे फिर से वही राखाल नरेन मास्टर महाशय वगैरह फिर से वही दक्षिणेश्वर में आए इकट्ठा हो और कितना आनंद आए हास्य गीत नृत्य उपदेश इसका प्रवाह बहे है। इस आशा में तो मां ने इतना कष्ट किया। तो ठाकुर के लिए कोई भी कष्ट स्वीकार करना मां के लिए असंभव नहीं था। यह कब संभव है? जबकि आपका मन प्राण सब कुछ आपने किसी को न्योछावर कर दिया हो। किसी के चरणों में श्री चरणों में समर्पित कर दिया हो। और यही मां यही मां यह जो वैराग्य का विस्फोट होता है उसी समय मां के मन में आता है कि इस जगत में कौन किसका पति है इस संसार में कौन किसका है किसके लिए कारजन किसके लिए मैं यहां पर प्राण हत्या करने को बैठी हूं यह जनो ए जेनो रुद्रे प्रलय विषाण अशफूटनी नाद यह जैसे कि रुद्र का प्रलय विषाण प्रलय विषाण ये विषाण अर्थात कि वो जो एक सिंह जैसा आता है ना इंग्लिश में उसको कहते हैं होन एच ओ आर एन होन वो एक वाद्य है उसको बजाया जाता है और बड़ा ही भयानक उसका आवाज होता है युद्ध जब होता है तब इस तरह का यह सिंह जो है इसको बजाया जाता है यह होन बजाया जाता है जैसे कि सैनिकों के हृदय में उत्साह यह ड्रम है यह होन है जो युद्ध चालू चालू होने के समय ऐसा जोरजोर से बजाते हैं। तो सैनिक लोग उत्साह से आकर के युद्ध करें। वरना तो जब सामने इतने सारे शत्रु तलवार और ये लेकर के खड़े हैं तो सामकर सामने जाकर के फाइट करना उसमें तो साहस चाहिए। तो क्या है अभी रुद्र यानी महादेव। महादेव है प्रलय के देवता। सृष्टि स्थिति प्रलय। तो सृष्टि के देवता है ब्रह्मा स्थिति अर्थात कि यह जो पोषण है उसके देवता है विष्णु और प्रलय के देवता है महादेव अथवा तो रुद्र तो यह जब प्रलय प्रारंभ होता है और उस समय यह जो प्रलय विषाण यह माने यह प्रलय रूपी यह होन जो है सिंह जो है उसका यह जो विकट निनाद होता है तो यहां पे जैसे कि रुद्र के प्रलय विषाण का अस्फूट निनाद किस तरह का निनाद असफूट निनाद यह इस तरह का निनाद नहीं है या तो इस तरह का यह जो गर्जन तर्जन नहीं है जो कि कानों से सुनाई दे किंतु हृदय में अनुभूति होगी यह जब अर्थक्वेक आता है मुझे याद है 2001 जो भयानक अर्थक्वेक गुजरात में हुआ था मैं अपने घर में ही था और हमारा पूरा बिल्डिंग जो है ऐसा ऐसा ऐसा करके वह हिल रहा था हमारा हमारा घर था थर्ड फ्लोर सेकंड फ्लोर पे ग्राउंड फ्लोर फर्स्ट फ्लोर सेकंड फ्लोर तो ये सेकंड फ्लोर पे पूरा बिल्डिंग ऐसा ऐसा करके हिल रहा है और पूरा अनुभव होता है और इससे जो डर लगता है ना बाप रे भयानक डर लगता है और अभी आप सोच लीजिए कि आपको बिजली गिरने की जो आवाज है बम फटने की आवाज है तो इस तरह की आवाज से हमको डर लगेगा। मैंने बहुत बार बड़ा भयानक आवाज होते हुए सुना है बिजली गिरने का और डर भी लगा है। तो क्या है कि वह तो प्रस्फुट आवाज है। कानों से सुनाई देता है और डर लगता है। किंतु यह जो अर्थक्वेक जो है वो उसकी जो आवाज कोई कानों से नहीं सुनाई देती। किंतु पूरे देह में उसका जो ध्रुजन है, कंपन है, वह अनुभव होता है और इतना ही डर लगता है जितना कि डर जोरों से बिजली गिरती है उससे लगता है। मैं रांची में था उस समय ट्राइबल एरिया में काम करने के लिए जाता था तो वहां पे हमारा एक बहुत बड़ा फार्म है गेथलसुद बोल के। दो फार्म है 75 एकड़ के। एक महेशपुर और गेथलसुद। तो अभी यह जो गतलसुद फार्म जो है वहां पर एक बड़ा सा एक मैदान जैसा है। वहां पर एक बहुत बड़ा पेड़ है। बहुत पुराना पूरा विराट पेड़ है। उसकी यह जो आप उसका यह जो ट्रंक जो है उसको आप तीन चार लोग एक साथ में खड़े रहेंगे हाथ फैला करके तब आप उसको कवर कर पाएंगे। इतना विशाल पेड़ और बहुत सालों से था। तो एक दिन वहां पर ऐसा एक तूफान आया बिजली गरजी और बिजली गिरी पेड़ के ऊपर में इतना पुराना इतना पावरफुल दिखने वाला पेड़ माने स्ट्रेट वो स्प्लिट कर दिया बीच में से स्प्लिट करके उसको पूरा जला दिया और जब मैं तो दूसरे दिन गया उस यह जो बिजली गिरी थी उस समय तो मैं नहीं था दूसरे तीसरे दिन जाकर के देखा कोई जमीन के ऊपर में मुश्किल से दो-ती फीट बचा है ऊपर वाला सीधा पूरा जला दिया है। चारों ओर उसकी शाखा प्रशाखाएं गिरी हुई है। तो देखिए कि यह जो प्राकृतिक जो भयावह शक्तियां है वह जब काम करनी चालू हो जाए वैसे तो प्राकृतिक नजारा बारिश जब होती है तो मेघ जब आकाश में भर जाता है तो यह देखकर के हमको आनंद कितना आता है। ठाकुर की वह फेमस कहानी कि वो खेत में जा रहे हैं। वो मूड़ी खाते खाते और देखा कि आकाश में नवीन मेघ से आकाश ढक गया है और इस श्याम वर्ण मेघ के नीचे में यह सफेद कलर के शुभ्र रंग के ये बतख जो है हंस जो है वो उड़कर के जा रहे हैं। तो ये श्याम मेघ और यह शुभ्र यह पंखी ये इतना सुंदर शोभा वो देखकर के बालक गदाधर को पहली उनकी भाव समाधि हुई थी। तो प्रकृति का जो सौंदर्य है यह श्याम मेघ वह हमको भाव समाधि तक ले जाता है अपने सौंदर्य से और जब वह सौंदर्य विकट होता है तो वही यह श्याम मेघ इस तरह का वो बिजली फेंकेंगे कि ऐसा पुराना पेड़ को सीधा स्प्लिट कर देगा बीच में उसको पूरा जला देगा तो देखिए कि यह जब प्रलय प्रारंभ होगा उस समय यह जो प्रलय विषाण है यह भगवान रुद्र प्रलय विषाण का निनाद करेंगे और उसको सुनकर के सभी के हृदय कंपित हो जाएंगे। किसके हृदय? पता है सभी के नहीं। जिन लोगों ने अपना जीवन यह काम कांचन के पीछे में ही दौड़ के बिताया है उन लोगों का हृदय। देखिए मृत्यु समय जब आता है हम सबके लिए जब मृत्यु आता है तो हम लोग सब सोचते हैं कि वैसे जो थोड़ा बहुत जिन लोगों में करेज होता है सा ये कुछ होता है वे लोग सोचते हैं अच्छा मरेंगे तो मरेंगे क्या है मृत्यु होना है तो होना है उसमें कौन सी बड़ी बात है किंतु जब मृत्यु सही में सामने आ जाता है तब एक भयानक भय जो है अपने सर पे सवार हो जाता है क्यों क्योंकि जीवन में मृत्यु के लिए कभी तैयारी की ही नहीं है। वो जो फेमस दक्ष प्रश्न युधिष्ठिर को दक्ष पूछता है कि जीवन का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है? तो युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि सबको पता है कि मृत्यु अवश्य संभावी है। सबको पता है आज नहीं ना कल, कल नहीं ना परसों, परसों नहीं ना नरसों, मृत्यु तो होने ही वाला है। किंतु जीवन इस तरह से सुख और उपभोग की पीछे में दौड़ के बिताते हैं। कि जैसे कि मृत्यु होने ही नहीं वाला है। जैसे कि मैं अमर रहने वाला हूं। जैसे कि यह पैसा है, यह नेम एंड फेम है, प्रेस्टीज है, सोशल कैपिटल है, नेटवर्किंग है। यही सब मुझे करना है। इसके अलावा जीवन में जैसे कि कुछ है ही नहीं। ऐसा करके जो लोग जीवन बिताते हैं, इससे बड़ा और कोई आश्चर्य नहीं है। और फिर ऐसे लोगों के सामने मृत्यु आ जाता है, तो भय के मारे यह लोग पागल हो जाते हैं। तो देखिए कि और दूसरे तरह के जो लोग हैं अभी ऐसा तो नहीं कि मृत्यु के लिए यह लोग प्रिपरेशन कर रहे हैं। किंतु उनको तो यह तो पता है कि चलो भाई कि जीवन में एक हायर पर्पस है। यह जो दैहिक सुख उपभोग के परे भी एक जीवन है और इस जीवन के लिए पर जन्म के लिए भातू ये भातू गुजराती शब्द है। अर्थात कि ये जब आप घर के बाहर जाते हैं तो क्या है? अभी आजकल तो रेस्टोरेंट रेस्टोरेंट बहुत हो गया है। पहले तो ऐसा कुछ था नहीं। तो क्या है? रोटी है। फिर यह एक प्याज का एक एक प्याज है। थोड़ा सा गुड़ है। वगैरह जो है वह किसान जो है वह साथ में लेके जाता था। खेत में जब जाएगा और फिर वहां पे बैठकर के फिर यह रोटी के साथ में यह गुड़ और प्याज वगैरह मिला के वो खाएगा और पौष्टिक भी इतना होता था। तो देखिए कि वो इसको कहते थे भातू यानी कि टिफिन लंच बॉक्स। तो यह भातु जो है पर जन्म के लिए परजन्म के लिए लंच बॉक्स ले जाना पर जन्म में क्या ले जाता है पैसा वैसा तो आने वाला नहीं साथ में जो पुण्य कर्म किया है जो साधन भजन किया है ईश्वर को प्रार्थना जो की है वही तो परजन्म में साथ में जाने वाली है तो यह परजन्म के लिए भाथू बांध के जाना यह लंच बॉक्स ले जाना ऐसा भी तो कोई-कोई लोग करते हैं तो जब उनके सामने मृत्यु रूपी यह जो प्रलय या विषाण है। उसकी जब आवाज सुनाई देगी उनको इतना डर नहीं लगेगा। किंतु यह संसार के सुख उपभोग ही सर्वस्व है। ऐसा मानने वाले लोग जब अपना मृत्यु समीप आ जाता है तो ऑलमोस्ट पागल जैसे हो जाते हैं। तो देखिए कि यहां पर रुद्र का प्रलय विषाण यह प्रलय विषाण हम कब सुनेंगे? बात सिर्फ यह नहीं है कि सृष्टि का प्रलय होगा तब सुनने में आएगा। अपना भी जब मृत्यु समीप आता है तब यह प्रलय विषाण सुनने में आता है। आप बैटल फील्ड में जाते हैं युद्ध के मैदान में और सामने शत्रु जो है जोर-जोर से यह ड्रम बजाते हैं। यह होन बजाते हैं। तो इसका एक पर्पज यह भी होता है कि अपने सैनिकों को उत्साह देना तो सामने एक दूसरा पर्पस होता है कि सामने वाले सैनिकों को डरा देना। जो डर गया सो मर गया। कहते हैं ना मूवी में तो वैसे ही पहले से उनको ऐसा डरा दें कि फिर जब हम आक्रमण करें तो फिर वे लोग इतना जोरों से मुकाबला ना करें। डकैत जो होते हैं डकैत जब डकैती डालते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते हैं काटो मारो ऐसा करके लूटो काटो मारो ऐसा करके इसका अर्थ क्या है? एक तो आपके खुद का एक उत्साह बढ़ता है और दूसरा कि ये जो यात्रालु जो होते हैं ऐसी भयावह चिल्ला विकट यह सब चिल्लाहट सुनकर के ऐसा स्क्रीम्स जिसको कहते हैं वो सुनकर के ना यात्रा लोग जो होते हैं यात्री जो होते हैं वो डर जाते हैं। उन लोगों की अकल ही काम करनी बंद कर देती है। जैसे कि एक शेर है दहाड़ करके एक जो जो बकरी है उसके पीछे दौड़ता है। तो कभी-कभी होता क्या है कि इसकी दहाड़ सुनकर के ही बकरी का जो हृदय है ऐसा यह हो जाता है कि वह दौड़कर के अपने को डिफेंड ही बेचारी नहीं कर पाएगी। तो यहां पे भी पहले ही डरा देना है। ऐसा भयानक चित्कार करके भयानक इस तरह की आवाज करके तो देखिए कि मृत्यु के समय रुद्र का प्रलय विषाण वह तो बजने ही वाला है। उसकी गर्जन सुनाई ही देने वाली है। उस समय उसके सामने खड़े रहना और यह कहना कि मुझे मृत्यु भय नहीं है। आना आकर के ले जाना है। ले जाओ। यह पंचमहाभूत का देह है। आज है, कल नहीं है। यह तो जाना ही जाना है। तो कल जाए, उसकी बजाय आज जाए तो क्या फर्क पड़ता है? तो देखिए कि यह साहस होना यह तो वैराग्य से प्रकट होता है। यहां पे भी जैसे कि इस रुद्र के प्रलय विषाण की असफुट निनाद से मौन होते माया अपश्रुत होया। मन में से माया अपश्रुत हो गई। यानी कि मन के भीतर में से माया भाग गई। शेखाने फुटिया उठिलो असीम वैराग्य भाष दीप्ति और माया का अवसान हुआ। माया अपसुत हुई और वहां पे प्रस्फुटित हुई असीम वैराग्य की भास्वर दीप्ति। दीप्ति यानी कि उजाला प्रकाश पास यानी कि बहुत ही प्रचंड हो जिसका कि अंत ना आने वाला हो। असीम वैराग्य की भास्व दीप्ति देखिए यह सेंटेंस कितना सुंदर है ए जनो रुद्रे प्रलय बिाण अशफूट निनादे मौन होइते माया अपश्रुत होइया शेखाने फुटिया उठिलो असीम वैराग्य भाश्वर दीप्ति यह जो मां के मन में हुआ जे हांडी एक के ऊपर एक सजा करके रखी है एक ऐसी आवाज हुई कि लाठी मार के सब तोड़ दी है और साथ-साथ में ही मां के मन में हुआ इस जगत में कौन किसका स्वामी है इस संसार में कौन किसका है? किसके लिए मैं यहां पर प्राण हत्या करने को बैठी हूं। ऐसा जैसे ही मां के मन में यह वैराग्य का विस्फोट हुआ। साथ-साथ में ही यह जैसे कि रुद्र के प्रलय विषाण की अस्स्फुट निनाद से मन में से माया अपश्रुत हो गई और वहां पर प्रस्फुटित हो उठी। असीम वैराग्य की भास्व दीप्ति अभी यह कहना कि मां के मन में माया थी वह भी किस तरह का कंट्राडिक्शन है जो माया स्वयं है उसको माया कैसे ग्रस कर सकती है ठाकुर कहते हैं ना सांप के मन में विष रहता है सांप सबको दसता है जिसको दसेगा उसका विष से मृत्यु होगा किंतु सांप खुद अपने विष से कभी मरेगा नहीं तो जो मायामई स्वयं है शक्ति स्वयं स्वयं है माया जो स्वयं उसको माया किस तरह से ग्रसित कर सकती है किंतु देखिए कि यही तो सब कंट्राडिक्शन यही तो सब मधुर लीला लीला का मधुर आस्वाद इसी से तो आता है कि यह जो आप जो चीज इंपॉसिबल दिखती है वही इंपॉसिबल दिखने वाली चीजें यहां पर हमको देखने को मिलती है और इसके ऊपर में जितना चिंतन करेंगे यह पैराडॉक्स का कोई उत्तर नहीं है कि मायामई माया जो स्वयं है उसके मन में माया कहां से आई? उसके मन में यह रुद्र का प्रलय विषाण सुनकर के असीम वैराग्य की भास्वर दीप्ति कैसे प्रकट होने वाली है? जिनका हृदय हमेशा के लिए असीम वैराग्य की भास्वर दीप्ति से प्रज्वलित हो उसको माया ग्रस कैसे कर सकती है? तो इसका कोई उत्तर नहीं है। आप उत्तर देना चाहे तो हजार उत्तर दे भी सकते हैं और नहीं चाहे तो उसका सिर्फ आनंद भी उठा सकते हैं। यह सब इस तरह के पैराडॉक्स है कि जिसके बारे में आप जितना सोचेंगे, उतना उत्तर तो नहीं मिलने वाला है, किंतु अपने हृदय का जो कचरा है, वो कचरा सब दूर होना शुरू होगा। हृदय के भीतर में जो सब जन्म जन्मांतर के कुसंस्कार पड़े हैं, कुकर्म के फल पड़े हैं, वह सब धीरे-धीरे करके अपसुत होना शुरू होंगे। ये गंभीरानंद जी का शब्द माया अपश्रुत होकर के तो यह संस्कार है वह भी अपश्रुत होकर के हृदय जो है स्वच्छ और निर्मल होना शुरू होगा। श्री मां शजजा छाड़िया उठिया अंधकार मंदिर पश्चाते हाथड़ाईते स्नान झले कुंडो पायलेन अभी यह जो पूरा हो गया असीम वैराग्य की भास्वर दीप्ति से जिनका हृदय भर गया वही मां फिर धीरे-धीरे करके शैया छोड़ कर के वहां तो रात को सोई हुई थी छोड़ कर के अंधकार में ही उस समय तो आज की तरह इलेक्ट्रिक लाइट वगैरह नहीं थी कि फटा करके स्विच ऑन करो लाइट हो गया वही अंधेरे में अंधेरे में ही मंदिर के पीछे में हाथड़ाई हाथड़ाई अर्थात आप जब बिल्कुल घना अंधेरा होता है आंखों से आपको कुछ नहीं दिखता तो आप हाथ आगे करके करके वैसा करके करके आप जाते हैं क्या सामने आता हाथ किसको स्पर्श करता है दीवार को टच होता है तो थोड़ा सा ऐसा थोड़ा और दाई ओर जाए तो फिर वहां पर दरवाजा आएगा। दरवाजे को स्पर्श हुआ तो फिर उस दरवाजे में प्रवेश करके बाहर निकलेंगे। इसको हाथड़ाई कहते हैं। हाथ से फील करके करके स्पर्श करके करके वो स्नान जल का कुंड प्राप्त हुआ। मंदिर के बाहर में मंदिर के पीछे में स्नान जल का कुंड प्राप्त हुआ। एवं शेखान होइते एक गंडू जो लैया दुई द पिपाशाय शुष्क कंठो शिक कोले और स्नान जल का जो कुंड है उसमें से एक गंडूष एक गंडूष अर्थात कि एक अंजलि वो पान करके दो दिन की यह जो पिपासा से उनका जो शुष्क कंठ हो गया था उसको सिक्त किया सिक्त किया अर्थात कि उसको भगाया माने उसमें जब आप एक अंजली पानी जब ग्रहण करेंगे और ज्यादा पानी पी भी नहीं सकते हैं फटाक करके वरना तो फिर यह जो भीतर का यह जो है डैमेज हो जाएगा। वह तो सूख गया है ना। धीरे-धीरे करके आपको फिर से जलपान करना है। निर्जला उपवास के बाद में सीधा वह दो गिलास भर के पानी पी लिया तो भीतर में बड़ा ही डैमेज हो होने की संभावना है। एक-एक घूंट करके आपको पानी फिर से पीना है। तो वैसे ही जैसे ही मां के हृदय में असीम वैराग्य की भास दीप्ति का उदय हुआ। शैया छोड़कर के अंधकार में ही मंदिर के पीछे में जाकर के स्नान जल का जो कुंड था उसमें से एक अंजली जल लेकर के दो दिन की पिपासा से जो शुष्क कंठ था उसको सिक्त किया सिक्त भी संस्कृत वर्ड है उसको भिगोया दखन प्राण एक शुष् हो ले तब प्राण जो है थोड़ा जान में प्राण में प्राण जान में जान आई हिंदी में जैसा कहते हैं ना जान में जान आई तो प्राण एक सुस्त हो प्राण थोड़ा सा सुस्त हुआ भक्त भग्न मनोरथ होया त पोर दी तारकेश्वर छाड़िया चली लेन भग्न मनोरथ ये संस्कृत मनोरथ अर्थात कि मन की जो इच्छा थी कि ठाकुर की ठाकुर के स्वास्थ्य को भगवान की कृपा से वापस लौटाए यह जो मनोरथ था वह भग्न हो गया टूट गया तो भग्न मनोरथ होकर के मां दूसरे ही दिन तारकेश्वर छोड़कर के चल निकली खंड मानव मन कोनो कोनो विशेष समय
वैराग्य क्या है? — जब सीमित मन विराट चेतना में विलीन हो जाता है
श्री भगवान अचिंतनीय प्रेरणाए जागतिक शशिार उध्व अवस्थितो विराट मनेर शहीो एकीभूत होया एमोन एक अखंड दृष्टि प्राप्त होए जाहार प्रभावे से मर जगत संबंधाद शहीद अभिच्छेद भावे ग्रथित तो समस्त अष्ट पूर्व संकल्प अजौतिकता दर्शने उहा स्वेच्छाए वर्णन वर्जन करे क्लासिक गंभीरानंद जी [हंसी] ये क्लासिक शरद महाराज शारदानंद जी ये लीला प्रसंग भी पढ़ेंगे बीच-बीच में ऐसे पूरा पैराग्राफ डाल देंगे एक सेंटेंस एक पैराग्राफ की तरह क्या कहना चाहते हैं महाराज जी खंड मानव मन कोई कोई विशेष समय श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा से जागतिक ससीमता के उर्ध्व अवस्थित विराट मन के साथ में एकीभूत होकर के एक ऐसी अखंड दृष्टि प्राप्त होता है जिसके प्रभाव से वह मर जगत के संबंध आदि के साथ में अविछेद्य भाव से ग्रथित समस्त पूर्व संकल्प की अयोक्तिकता दर्शन करके उसको स्वेच्छाय वर्जन करता है। जब खंड मानव मन अर्थात कि हमारा जो मन है वो खंडित हो चुका है। इसका अर्थ क्या है? देखिए जब हम ईश्वर ज्ञान या आत्म साक्षात्कार या तो ब्रह्म साक्षात्कार की ओर ब्रह्म ज्ञान की ओर जब जाना शुरू करते हैं तब हम देखते हैं कि यह जो समस्त रियलिटी जो है यह मैटर एनर्जी स्पेस टाइम यह जो कुछ भी है मनुष्य पेड़ पौधे पशु पंखी समुंदर नदी तालाब ये श्याम मेघ और यह श्याम मेघ के नीचे में उड़ने वाले यह शुभ्र हंस ये जो कुछ भी आप देखते हैं और इसके नीचे में यह जो खेतर खेत और खेत में खड़ा भाव समाधि में मग्न यह बालक गदाधर और यह मुड़ी जो कि उसके हाथ से गिर गई थी जो कुछ भी आप देखते हैं ब्राह्मण ही है। ब्रह्मण के अलावा और कुछ नहीं है। बस नाम रूप का मुखौटा पहन करके यह जगत हमको भ्रमित करने को आया है। तब जब हम इस जगत को इस तरह से देखेंगे कि हां वह श्याम मेघ है। हां यह शुभ्र हंस है। हां यह मुड़ी है। यहां यह खेत है। हां ये खेती की हरियाली है। जब हम इस सब अलग-अलग फिनोमिना को अलग-अलग रूप से देखेंगे तब होगा कि हमारा मन खंडित हो गया है। अखंड मानव मन अर्थात कि इस वैविध्यपूर्ण जगत को प्रत्येक विविधता को हम अकेली यह जो विविधता वैविध्य को अपना एक इंडिपेंडेंट अस्तित्व के रूप में मान लेते हैं। तो यह हो गया खंड मानव मन। अब यह खंड मानव मन कोई कोई विशेष समय अब जब ऐसा होता है ना भगवान बुद्ध का फेमस उदाहरण कि रास्ते से जा रहे हैं उसके पिताजी ने उसको बहुत ही लग्जरी में रखा है पहले से ही अंदा अंदाजा हो गया था अंदेशा हो गया था कि भगवान यह जो उनका राजकुमार है हो सकता है बहुत बड़ा राजा भी बने और हो सकता है बहुत बड़ा ऋषि भी बने तो अब राजा ही तो राजा को तो अपना राजकुमार अपना राज्य चलाने के ये तो तैयार करना है। ऋषि मुनि बोलकर बन करके भाग गया। मुझे क्या काम में लगने वाला है? तो राजा उसके पिताजी ने सब तरह की लग्जरी में सब तरह के सुख वैभव में बांध के रखा था। यही राजकुमार जब रास्ते में निकलता है एक दिन तो क्या देखता है? एक वृद्ध व्यक्ति को देखता है। तो पूछता है अपने सारथी को कि अरे मैं तो इतना युवान हूं। सौंदर्य से भरपूर हूं। ये ये किस तरह का एक वृद्ध व्यक्ति ये व्यक्ति को क्या हो गया है? तो फिर वह सारथी समझाता है यह वृद्ध हो गया है। तो यह राजकुमार सिद्धार्थ पूछता है गौतम कि क्या मैं भी वृद्ध होऊंगा? तो सारथी कहता है आप भी वृद्ध होंगे। अच्छा फिर थोड़ा सा आगे गए तो बीमार व्यक्ति मिला तो इसको क्या हुआ? तो यह बीमार हो गया है। तो पूछते हैं राजकुमार मैं भी बीमार होऊंगा। तो हां आप भी बीमार होंगे। फिर थोड़ा सा आगे गए तो फिर वो डेड बॉडी मिला। चिता लेकर के वह जा रहे थे। वो म उसकी शब्द देह को लेकर के जा रहे थे शशान में वो प्रज्वलित करने के लिए तो इसको क्या हुआ यह मर गया मर गया तो मैं भी मरूंगा क्या आपका भी मृत्यु अवश्यभवी है जिसका जन्म है उसके साथ में ही जरा व्याधि और मृत्यु यह तीन जुड़े ही हुए हैं। जन्म हो और जरा व्याधि मृत्यु ना हो ऐसा इस संसार में संभव ही नहीं। तो राजकुमार बेचारा बड़ा ही टेंशन में आ गया। सोच रहा है। उस समय फिर श्रमण को देखा। श्रमण के मन के चेहरे पे इस तरह का एक आनंद भीतर है जो हृदय में से प्रसूट हो रहा है। तो पूछता है कि अरे ये क्या है? यह पता है इसको कि जन्म मृत्यु जरा व्याधि जीवन के सामने लगा ही है। फिर भी इतना खुश क्यों है? तब उनके मन में हुआ कि नहीं यह श्रवण का जो जीवन है वो मुझे जीना है। मृत्यु अवश्यभावी है इस मर जगत में। फिर भी मुझे हृदय में आनंद प्राप्त करना है और वह आनंद वो आंख बंद करने वाला आनंद नहीं कि बद्ध मछली जो बद्ध जीव की जो उपमा हमने देखी थी मछुआरे के जाल में फंसी है आंख बंद करके बैठी है आनंद कर रही है यह सोच के कि यदि मैं मछुआरे को नहीं देखूंगी तो मछुआरा मुझे भी नहीं देखेगा। यह कभी-कभी ना एक छोटे बच्चों के वीडियो आते हैं। छोटे बच्चे होते हैं तो उनको तो पता नहीं यह है। हाइड एंड सीक मां के साथ में खेलते हैं। तो कैसा वो छुप जाते हैं पता है कि वो मां की ही गोद में जाकर छुप जाएंगे। वो सोचते हैं कि मैं मां को नहीं देख पा रहा हूं यानी कि मां मुझे नहीं देख पा रही है। तो ये छोटे बच्चे का लॉजिक होता है। तो यहां पे भी ये छोटे बच्चे का लॉजिक मैं यदि यह जो मृत्यु रूपी जो विराट वास्तविकता है उससे मुंह छुपा करके मैं बैठूंगा तो मृत्यु भी मुझे भूल जाएगा। तो ऐसा तो होने वाला नहीं। तो जब किंतु यह सिद्धार्थ गौतम जैसे किसी के सामने यह जो फिनोमिना आ जाता है और फिर एकाएक हृदय में वैराग्य का भाव प्रज्वलित होता है। तो यहां पे भी यह खंड मानव मन है। कभी-कभी विशेष समय में श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा से अभी यह जो देखिए कि मृत देह बीमारी और वृद्धावस्था हम सभी ने देखी है। सब ये पृथ्वी के 7 बिलियन पपुलेशन है। शायद ही कोई होगा कि जिनमें से किसी ने यह तीनों का दर्शन ना किया हो। ज्यादातर लोग ने किया ही है। मृत्यु नहीं देखा तो एटलीस्ट बीमारी देखी है। एटलीस्ट वृद्धावस्था देखी है। किंतु यह 700 करोड़ लोगों में से किसके हृदय में वैराग्य का संचार हुआ है। जो कुछ चंद चुनिंदा लोग हैं उन्हीं के तो हृदय में। तो सिर्फ यह दर्शन करने से नहीं होगा। साथ में ही श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा प्राप्त होनी होगी। तो देखिए कि खंड मानव मन विशेष समय पर श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा से जागतिक शशिमता जागतिक ससीम अर्थात कि जो लिमिटेड है असीम जो कि अनलिमिटेड है तो यह ससीम और असीम जो लिमिटेड है और जो अनलिमिटेड है तो यह जो जागतिक लिमिटेशंस जो है यह संसार की यह जो सीमा के बद्ध यह जो चार कॉर्नर के भीतर में बद्ध जन्म मृत्यु जरा व्याधि सृष्टि स्थिति प्रलय की यह जो फोर कॉर्नर में बद्ध यह जो जागतिक जगत है उससे उध्व अवस्थित जो विराट मन है उसके साथ में एकीभूत होकर के ऐसी एक अखंड दृष्टि प्राप्त करता है। देखिए यह जो संसार हमने कहा जैसे कि कि मैं जब इस मेघ को मेघ के रूप में ही देखता हूं। यह मुड़ी को मुड़ी के ही रूप में देखता हूं। बालक गदाधर को बालक गदाधर के ही रूप में देखता हूं। जिस शष्य शामला धरती जिसके ऊपर में बालक गदाधर यह भाव समाधि में गिरा हुआ है उसको धरती के रूप में ही देखता हूं। तब मेरा यह मन जो है खंडित हुआ है। किंतु जब यह ईश्वर की श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा मेरे पर होगी और विशेष समय ऐसा भी नहीं कि हर चलते फिरते यह प्रेरणाएं मिलती रहे। ठाकुर के खुद के साथ में पिताजी का मृत्यु होना उनके जीवन में एक बहुत बड़ी घटना है। उनके मन को जैसे कि वह बालक अपने बंधुओं के साथ में खेलता हुआ हंसी मजाक करता हुआ घूम रहा था। एकाएक आप लीला प्रसंग में देखेंगे कि उसका मन अंतर्मुख हो गया और यह जो ईश्वर क्या है? यह जगत क्या है? जीव क्या है? यह सब सोचना शुरू कर दिया था। और साथ-साथ में ही यह तो एक दुर्घटना बालक के साथ में हुई। दूसरा क्या है? उनके जो बड़े भाई थे रामकुमार वो उनके उनसे उम्र में काफी बड़े थे। ऑलमोस्ट 20 इयर्स ना कि ऐसा कुछ एग्जैक्ट मैं भूल गया। किंतु काफी बड़े थे उम्र में। तो क्या है कि पिताजी की देहांत के बाद में जो रामकुमार थे उनके बड़े भाई उन्हीं की ओर उनका यह जो पितृ स्नेह या पितृ भक्ति जो पिता की ओर होने वाली थी वो अपने बड़े भाई के ऊपर में हुई थी कि हां चलो मेरे बड़े भाई है पिता तुल्य है ज्येष्ठ भ्राता समपिता जब स्वामी जी अमेरिका से वापस आए राजा महाराज के साथ में प्रथम मुलाकात हुई एक दूसरे की तो राजा महाराज स्वामी जी को प्रणाम करके कहते हैं जेष्ठ भ्राता समप पिता अर्थात कि ये जो बड़ा भाई है पिता के समान है अर्थात कि राजा महाराज का ठाकुर के प्रति जो श्रद्धा भक्ति था वो अपने बड़े भाई स्वामी जी के ऊपर में आया है तो स्वामी जी भी तो कम नहीं है स्वामी जी सामने प्रणाम करते हैं गुरुवत गुरु पुत्रेशु अर्थात कि गुरु पुत्र जो है राजा महाराज तो ठाकुर के मानस पुत्र हैं तो गुरुवत वो ठाकुर के मानस पुत्र होने के वजह से राजा महाराज भी ठाकुर के समकक्ष है। तो देखिए कि जेष्ठ भ्राता भ्राता समपिता तो पिता के प्रति जो ठाकुर की श्रद्धा थी वो अपने बड़े भाई के ऊपर में आई थी। तो अभी हुआ ऐसा अनफॉर्चूनेटली कि जैसे ही वो काली मंदिर का यह क्सक्रेशन हुआ उसके कुछ ही समय के बाद में रामकुमार का भी निधन हो गया। तो यह दूसरा एक माने एक दुख पूर्ण दुर्घटना बालक गदाधर के ऊपर में यह आकर के आ गई। तो यह जो इससे फिर से एक उनको एक बल मिला। वैसे ही तो हृदय में वैराग्य का संचार हो ही चुका था। वैसे ही नारायण है। उनको बाह्य घटनाओं की क्या जरूरत है। किंतु पता है लीला प्रसंग में हमने तो स्पष्ट रूप से पढ़ा ही है कि तमस और रजस का एक अंश तो देह धारण करने के लिए चाहिए ही। उनको भी मनुष्य देह धारण किया है तो मनुष्यवत जो सुख दुख और मन का जो यह संताप है वह भी उनको ग्रहण करना होगा वरना मनुष्य लीला का कोई अर्थ नहीं वरना नारायण वैुंठ में बैठकर के ही लीला करें हम लोग यहां से दर्शन करेंगे क्यों पंचमहाभूत का देह धारण करके पृथ्वी पर आए हैं तो यह पृथ्वी पर आए हैं बोलकर के पृथ्वी के जो पृथ्वी के निवासी है मनुष्य के हृदय का जो संताप है वह भी तो उनको ग्रहण करना बोल के ही तो उनसे हम प्रेरणा प्राप्त करेंगे। तो ठाकुर ने जब रामकुमार का निधन देखा तो यह वैराग्य की ज्वाला जैसे कि और भी हजार गुना होकर के प्रज्वलित हुई और फिर ठाकुर ने जो साधन भजन प्रारंभ किया वह तो इतिहास गवाह है। तो यहां पे भी महाराज लिखते हैं कि खंड मानव मन कोई विशेष समय यह विशेष समय अर्थात कि प्रियजन का मृत्यु या तो महा बीमारी स्वामी जी का सेम पिताजी के मृत्यु के बाद में एकाएक जो सब दुर्घटनावली जो है उनके सामने प्रारंभ हुई तो उनका भी हृदय वैराग्य से भरपूर हो गया। कोई कोई विशेष समय श्री और विशेष समय भी चाहिए और श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा भी चाहिए। वरना मृत्यु कितने लोगों ने देखा है? किंतु किसके हृदय में वैराग्य का उदय उदय हुआ है उस समय में तो दोनों चाहिए। इस तरह की कोई दुर्घटना भी होनी चाहिए और साथ में ही श्री भगवान की अचिंतनीय प्रेरणा भी मिलनी चाहिए। तब क्या होगा? यह जागतिक ससीमता से उर्ध्व जो अवस्थित विराट मन है, उसके साथ में हम एकीभूत होकर के एक ऐसी अखंड दृष्टिभंगी प्राप्त करेंगे। देखिए पहले तो खंडित दृष्टिभंगी यह मेघ को मैं मेघ के रूप में ही देख रहा हूं। बिजली को बिजली के रूप में ही देख रहा हूं। शुभ्र हंस को शुभ्र हंस के रूप में ही देख रहा हूं। किंतु जब इस जागतिक ससीमता से उर्ध्व एक विराट मन के साथ में हम एकीभूत होंगे तब एक इस तरह की अखंड दृष्टि प्राप्त होगी कि वही गदाधर के भीतर में जो ब्राह्मण है वही ब्राह्मण मुड़ी के भीतर में है जो बिखरी पड़ी है जमीन के ऊपर में यही धरातल जिसके ऊपर में मुड़ी और गदाधर पड़े हुए हैं वही धरातल भी ब्राह्मण है मुड़ी भी ब्राह्मण है मेघ भी ब्राह्मण है यह बिजली जो गिर रही है वही ब्रह ब्रह्मण है। यह जो शुभ्र हंस उड़ रहे हैं, वह भी ब्राह्मण है। यह जो हवा बह रही है, वह भी ब्रह्मन है। एक अखंड दृष्टि प्राप्त होती है। जिसके प्रभाव से वह मर जगत के यह जगत कैसा है? मर जगत है। यहां पे मृत्यु का राज्य चलता है। तो इस मर जगत के संबंध आदि के साथ में अविछेद्य भावे जो ग्रथित समस्त पूर्व संकल्प है मर जगत अर्थात कि मर जगत में जितने भी संबंध है हमारे वो तो क्या है कि अयक्तिक है। इसका कोई रैशनलिटी नहीं है। तो इररेशनल यह जो सब हमारे संबंध है पूर्व संकल्प यह पूर्व संकल्प यह मेरे पिताजी है पिताजी के लिए मुझे यह करना है यह मेरा लड़का है लड़के के लिए मुझे यह उसकी कैरियर बनाने के लिए मुझे यह यह सब कुछ करना है मित्र है वह जब मुश्किल में आ जाएगा तो इस तरह से हेल्प करना है वह जो जितना भी यह पूर्व संकल्प है अयक्तिकता उसका स्वेच्छाय वर्जन करें माने वंटियरीली उसका यह त्याग करता हे बहुत बड़ा सेंटेंस अभी इसके बाद में और भी एक सेंटेंस बचा है किंतु अभी इसको अभी हम कल देखते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: मृत्यु अवश्यंभावी है—फिर भी हम उसे इतनी आसानी से क्यों भूल जाते हैं?
ये जो बेलूर मठ है तो मैं जब बिल्कुल पहली बार गया था पीपीटीसी ज्वाइन करने के लिए तो एक साधु का मृत्यु हो गया। तो अब साधु का मृत्यु होता है तो क्या होता है? दैट्स मैं पहली बार जो देखा इट वास सो सरप्राइजिंग कि अगर घर में होते हैं किसी का मृत्यु होता है तो लोग रोते हैं। यह सब होता है। रोना धोना वगैरह वगैरह दुख कष्ट यहां पे साधु जब रात होती है। रात को उनकी अंतिम वो जो यात्रा होती है तो वहां पर एक आरोग्य भवन है। तो आरोग्य भवन से अंतिम यात्रा प्रारंभ होगी। सभी जितने भी साधु है वह चिता ले उनकी जो शब्द देह है उसको लेकर के चलेंगे। पहले तो ठाकुर के श्री मंदिर के सामने दर्शन करवाएंगे। उसके बाद में जितने भी साइड टेंपल है राजा महाराज का मंदिर फिर मां का मंदिर दर्शन करवा के मां के मंदिर के सामने जो गंगा घाट है वहां पे गंगा के पानी से उनके देह को पूरा धोएंगे। फिर नए वस्त्र पहनाएंगे। फिर वहां से वह चलेंगे। जहां वह समाधि घाट है साधुओं का जहां पे चिता दाह होता है और वहां पर वह पहले से ही सजा के रखा हुआ है और यह पूरा जो है ना वह पूरा साधुओं के लिए है कोई वर्कर नहीं पूरा साधु लोग ही करेंगे तो फिर वहां पर शब्द देह को रख के लकड़ियों के ऊपर में उसको जलाया जाता है और फिर सामने सब साधु लोग बैठते हैं और फिर जो सबसे पहला जो गीत प्रारंभ करते हैं वह है ओई जे देखा जाए आनंद धाम माने वह जो देखा जाता है आनंद धाम तो देखिए कि मृत्यु है एक साधु के लिए उत्सव कि यह जो मर जगत जो है उसको छोड़कर के ठाकुर के पास में गए हैं। सो मैंने और वो जो एक यह होता है ना एक ऐसा एक फीलिंग आता है ना म विज अवर्णनीय मैं पहली बार जो मैंने वही जो देखा जाए आनंद धाम वो जो सुना था मतलब बहुत अच्छा लगा था सच ए इंस्पायरिंग फीलिंग कि देखो कि यह है साधु का जीवन कि माया के जगत में है छोड़ के जाते हैं ठाकुर के पास तो यह तो उत्सव है यह थोड़ी ना कोई रोना धोना है सो दैट इज वेरी इंस्पायरिंग फीलिंग
प्रश्न: दक्ष युधिष्ठिर को कहता है की कितनी आश्चर्य की बात है - मृत्यु अवश्यम्भावी होने से भी हम उसकी तयारी नहीं करते। उसके उत्तर में कोई कहता है की हम तो अमर है. हमारी मृत्यु है ही नहीं
यह यह जो आपने कहा ना यह पंजाबी वेदांत हो गया। वो पंजाबी वेदांत की कहानी सुनी है ना? मैंने नो डिसरिस्पेक्ट टुवर्ड्स पंजाबी किंतु यह पंजाबी वेदांत बोलकर के यह कहानी प्रसिद्ध है। एक साधु को कोर्ट में ले जाया गया। वो जज ने पूछा क्यों रे साधु होकर के इतना बुरा काम क्यों किया? तो साधु कहता है मैंने थोड़ी ना किया। मेरे शरीर ने किया। तो वह जज भी वेदांती था। बोला तुम्हारे शरीर को फांसी दे देते हैं। तुमको छोड़ देते हैं। [हंसी] तो आप जो यह कह रहे हैं कि आत्मा अमर है इज अ पॉजिटिव स्पिन वेरी गुड। तो फिर आप देह को पोषण करते क्यों हैं? माने देह की वासनाओं को पोषण क्यों करते हैं? आत्मा अमर है मुंह से बोलकर के फिर जितनी भी कामना वासनाओं का पोषण करके जाना व्हिच इज अ कंट्राडिक्शन। फिर तो वो तोते की तरह रटी हुई बात ही हो गई। माने दूसरा इंटरप्रिटेशन नहीं आप कीजिए कि मैं अमर हूं। किंतु फिर उसको फिर उसका जो लॉजिकल क्सकुएंस है उसको भी आप एक्सेप्ट कीजिए कि फिर कामना वासनाओं का पोषण करना छोड़ दीजिए। हां उसी को पकड़ के रहिए कि हां मैं अमर हूं। वेरी गुड। तो मैं यदि अमर हूं तो मैं तो आत्मा अमर है ना। देह तो अमर नहीं है। महापुरुष महाराज अस्थमा का अटैक हुआ था रात को तो बहुत कष्ट हुआ। दूसरे दिन सुबह मठ में बात फैल गई। तो सब साधु आकर के पूछते हैं महाराज कैसे हैं? तो महाराज मैं बड़े मजे में हूं। तो बोला साधु ने पूछा महाराज सुना कि अस्थमक का अटैक हुआ था। बहुत कष्ट हुआ। तो महाराज पूछते हैं कि अच्छा तुम देह की बात कर रहे हो। देह तो बिल्कुल सुस्त नहीं [हंसी] है। अभी वो जो ऐसा कहते हैं तो वो जचता है क्योंकि देह के जितने भी सुख उपभोग है जीवन भर उसका त्याग किया है तो वो ऐसा बात करेंगे तो उनको जचेगा। माने और ये कब होगा? जब आप देखिए देह को भूलना वो बात नहीं है। आप देह को कभी नहीं भूल पाएंगे। महाराज कहते हैं कि देह कभी साधु नहीं होगा। आत्म नहीं साधु होगी। माने इसके भीतरते का जो चेतन है वही साधु होगा। देह साधु नहीं होगा। किंतु यहां पर बात क्या है कि देह का जो गुणधर्म है इंद्रियों के सुख के पीछे दौड़ना उसको त्याग करना है। वो जब तक आप त्याग नहीं करेंगे तब तक ये मुंह से बोलना कि मैं तो अमर हूं। फिर मुझे मृत्यु के क्या डर है वो तो किसी काम का नहीं है ना। माने देखिए अब प्रारंभिक अवस्था में आप बोलिए दिक्कत कुछ नहीं है माने गलत भी कुछ नहीं है विद दैट अवेयरनेस कि इवेंचुअली देह के सुख का त्याग करना
प्रश्न: आज स्वामी गम्भीरानन्दजी की भाषा और भाव—दोनों ने मन को तृप्त कर दिया
और सब्जेक्ट भी तो ऐसा है ना देखिए ठाकुर और मां का ये ये होने वाला है मिलन जो है वो विच्छेद होने वाला है उसमें सो मां के जीवन के ये तो सबसे इंपॉर्टेंट घटना है शोडशी पूजा ये ठाकुर की महासमाधि यह सब तो मां के जीवन की ऐसी ऐसी घटनाएं हैं जो कि म हमेशा के लिए अपने संघ का यह जो लिटरेचर जब तक रहेगा तब तक यह घटनाएं अमर होकर रहेगी।
प्रश्न: तारकेश्वर के अनुभव के उपरांत माँ के भीतर यह बोध स्पष्ट हो गया होगा कि अब उन्हें अकेले चलना है और संघ की आध्यात्मिक धुरी स्वयं बननी है।
मां की जब महासमाधि हुई थी ना तो राजा महाराज ने कहा था एतो दिन पहाड़े आलेले छिलम माने इतने दिन पहाड़ के पीछे में था सुरक्षित था जितना भी तूफान झंझवात आना है पहाड़ के ऊपर में ही गिरेगा हम पहाड़ के पीछे में सुरक्षित है तो आज वो पहाड़ चला गया अर्थात कि संघ का जिम्मा सीधा राजा महाराज के डायरेक्ट सर पे अभी कोई नहीं है बीच में तो वैसे ही यह संघ का जिम्मा तो मां को लेना ही था किंतु अब तक ठाकुर की शरण माने शरण में थी छुप करके थी तो यह नेचुरली लज्जा पटावता है ना तो बाहर में प्रकाश करने में वह संकोच जो था वो संकोच अभी रहने वो कोई एक्सक्यूज नहीं है अभी माने अभी छुप के रहने का कोई एक्सक्यूज नहीं है [हंसी]
हमारी कथाओं में निहित आध्यात्मिक वैभव
माने ऐसे पापी तापियों की तो बात छोड़ दीजिए स्वामी जी जैसे स्वामी जी मां को प्रणाम करने को जाते हैं तो गंगाजल से बार-बार अपने पर छिटक रहे हैं स्वामी जी यदि अपने को अशुद्ध मन करते हैं मां के सामने तो फिर क्या बात रह गई माने मां की पवित्रता इतनी यह है कि म स्वामी जी जैसे स्वामी जी उनके सामने अशुद्ध हो जाते हैं। काशी की घटना है। मां आई है वो किरण दत्त के लक्ष्मी निवास में रह रही है और वो सेवा आश्रम अद्वैत आश्रम में राजा महाराज रह रहा है। तो राजा महाराज प्रतिदिन वो मंदिर में जाएंगे। प्रणाम करने से पहले मां के घर के सामने से जाएंगे। मां को प्रणाम करने को ऊपर में नहीं जाएंगे। क्यों? क्योंकि वो भाव से इतने विवल हो जाएंगे कि फिर वो वीरेश्वर दर्शन वगैरह सब भूल जाएंगे। काशी विश्वनाथ दर्शन तो क्या करेंगे? रास्ते से ही चिल्लाएंगे पुकारेंगे कि भूदेव तो भूदेव मां के भाई का लड़का तो माने राजा महाराज ने भूदेव करके पुकारा है माने मां को पुकारा है तो [हंसी] तो मां ऊपर में बैठी-बैठी वो जो मां की संगिनिया है उस सबके साथ में मां बोलती है देखो देखो राजा आया है राजा आया है मुझे प्रणाम बता रहा है ऐसा बोले मां आनंद करती है या देखिए म ना ही मां बाहर आकर के राजा महाराज के साथ बात करती है ना ही राजा महाराज मां का नाम तक लेते हैं माने प्रणाम करना तो छोड़ ही दीजिए मां का नाम तक नहीं लेते। भूदेव करके पुकारते हैं। म इसी में दोनों का संपर्क हो जाता है। फिर राजा महाराज चले जाते हैं। [हंसी] और यह सब क्या है? देखिए हमको वार्तालाप करने के लिए मसाला देता है ना। वरना सब कुछ स्ट्रेट फॉरवर्ड होता। अभी ये विवेक चूड़ामणि को लेके हम यह सब कहां डिस्कस करने वाले? जहां से हंसी मजाक आनंद आने वाला है। ऐसा विवेक चूड़ामणि वगैरह में तो होने वाला नहीं है। उसके लिए तो आपको लीला ही चाहिए। [हंसी] सही बात है।
प्रश्न: ठाकुर ने केशव के लिए नारियल और चीनी की मिन्नत मानी थी, माँ ने ठाकुर के लिए तारकेश्वर में हत्या दी. किन्तु दोनों प्रार्थनाए तो विफल हो गयी. क्या हमें प्रार्थना करनी चाहिए?
ना किंतु देखिए प्रार्थना करना तो हमारा धर्म है ना यह बात देखिए ठाकुर प्रार्थना किए क्यों यह अखंड प्राप्ति हो चुकी है ठाकुर तो कोई खंडित मन नहीं है ना ही मां का खंडित मन था दोनों तो अखंड प्राप्ति करके एक्चुअली दे आर अखंड देमसेल्फ माने जो लेटर में लिखा था ठाकुर अद्वैत है तुम लोग भी अद्वैतवादी हो म ठाकुर अद्वैतवादी नहीं है कितवादी हां ठाकुर अद्वैत स्वयं है तो यहां पर आपको खंड से अखंड वो सब तो भूल ही जाइए। अखंड स्वयं जो है वो प्रार्थना करते हैं। सो यानी ये तो ठाकुर ने ठाकुर को प्रार्थना की। मां ने मां को प्रार्थना की। आप अपने को प्रार्थना कर रहे हैं। वही बात हुई ना? और प्रार्थना पूर्ण करने की शक्ति आप ही के पास में है। फिर भी आप नहीं पूर्ण कर रहे हैं। दिस इज द चक्र। [हंसी] किंतु फिर भी प्रार्थना कर रहा है। सो क्यों कर रहा है? क्योंकि हम लोग भी तो सीखे। देखिए पता है कि जो सात्विक कामनाएं हैं ईश्वर पूरी करेंगे। यदि कहेंगे ज्ञान दो, भक्ति दो, वैराग्य दो तो ईश्वर पूर्ण करेंगे। किंतु कहेंगे रोटी दो, कपड़ा दो, मकान दो। वही स्वामी जी का फेमस मां काली के पास में गए थे मांगने के लिए। मांग ही नहीं पाए। तो अभी देखिए कि आप यदि मांगते भी हैं ना उसमें गलत कुछ नहीं है। मांगना अपना धर्म है। क्या देना, क्या नहीं देना उनका धर्म है। सो वो शरणागति दिखाता है। बहुत बार देखिए मेरा खुद का एक ऐसा एटीट्यूड है कि सांसारिक चीजें भगवान के पास में नहीं मांगनी। मैंने खुद तो अपने लिए तो मांगी ही नहीं। कोई कोई कहता है कि महाराज आप प्रार्थना कीजिए हमारे लिए तो मैं ऐसा कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देता क्योंकि मुझे पता है मैं इस तरह की प्रार्थना किसी के लिए नहीं करने वाला हूं। प्रार्थना करूंगा आप सबको मेरी प्रार्थना मेरी क्या है आप सबके लिए कि ठाकुर मां स्वामी जी के साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हो। यह मेरी प्रार्थना है सबके लिए एक स्टैंडर्ड प्रार्थना है। बाकी का वही लोग देख लेंगे। तो मुझे पता है कि आप और कोई बोलेंगे तो मैं हां तो बोल दूंगा किंतु कोई ठाकुर से मैं मांगने वाला नहीं। बट क्या है कि देखिए मैं सन्यासी हूं। अभी एटलीस्ट फिजिकली कोई प्रॉब्लम नहीं है बोल के लाइफ भी कंफर्टेबल है। रामकृष्ण मिशन का तो आपको पता ही है स्टैंडर्ड। तो बोल के मुझे ऐसा कोई आवश्यकता नहीं आ पड़ा कि मैं भगवान के पास मांगू। किंतु अभी देखिए यहां पे मैं रास्ते से बाहर निकलता हूं तो एक फैमिली रहता है फुटपाथ के ऊपर में ही। अभी एक बच्चे का जन्म हुआ है। जो बच्चा पांच छ महीने का है वो फुटपाथ पे उसका जन्म हुआ है। अभी वह बच्चा क्या नहीं मांगेगा क्या? कि मैं बचपन से ही मुझे फुटपाथ पे ही मुझे जन्म दिया। ये कैसे भगवान हो तुम? तुम मेरे लिए कुछ अच्छा करो। क्या बच्चा नहीं मांगेगा क्या? सो वो मांगना गलत नहीं है। सो दैट इज अ थिंग। हां। देखिए आप वो लड़का क्रिमिनल हो जाए व्हिच इज एंटायरली पॉसिबल। इस तरह का जो लाइफ है वो क्रिमिनल हो जाए। बेटर है कि भगवान से मांगे। माने गुस्सा करना है तो समाज पे ना करें कि समाज ने मुझे इस तरह से तरछोड़ दिया है। मैं चोरी लूटफाट करूंगा तो कोई फर्क नहीं पड़ता। यह समाज उसके लायक ही है। ऐसा नहीं करके जो भी गुस्सा करना है, मान अभिमान करना है, भगवान के साथ करो। जहां तक मुझे याद है स्वामी जी कहते हैं वो शशधर पंडित ठाकुर को कहते हैं आप प्रार्थना करेंगे तो पूर्ण होगा। तो स्वामी जी कहते हैं कि आप मांगिए तो ठाकुर बोलते हैं अरे नहीं यह सब नहीं। स्वामी जी कहते हैं आप अपने लिए मत मांगिए। हमारे लिए मांगिए।
प्रश्न: आख़िर ईश्वर से नहीं माँगेंगे, तो किससे माँगेंगे!
और दूसरा सबसे इंपॉर्टेंट है मनुष्य पर क्रोध करने से कोई लाभ नहीं है। किसी ने मेरा अहित किया। अब मैं उसके ऊपर में नाराज होके मैं उसके साथ दुश्मनावट करके अपने पूरे जीवन को जहर से भर दूं। रिवेंज ये देखिए रिवेंज का कांसेप्ट जो है बहुत स्ट्रांग होता है। ये पाकिस्तान पाकिस्तान जैसे देश अपना पूरा जो प्राणशक्ति है उसी में डाल देते हैं कि रिवेंज लेना है। तो क्या है कि आपका तो जीवन जहर हो ही गया। बदला ही लेना है। मान अभिमान ही करना है। ईश्वर के साथ में करो।
प्रार्थना तो करनी ही है. जब तक वो अवस्था नहीं आती की देह के प्रॉब्लम प्रॉब्लम लगे ही नहीं। पर वह अवस्था अभी थोड़ी सी डिस्टेंट (दूर) है.
सम डिस्टेंस क्या है? जन्म जन्मांतर का डिस्टेंस। [हंसी] देखिए दिस इज अनदर कंट्राडिक्शन। जिस क्षण मैंने मान लिया कि कोई डिस्टेंस नहीं है तो साथ में ही ब्रह्म ज्ञान हो गया। इंस्टेंट माने माया कोई ठाकुर ने कहा हजार साल का अंधेरा कमरा जैसे ही लाइट ऑन कर दिया वैसे ही अंधेरा भाग गया। सो दैट इंस्टेंट एनलाइटनमेंट जो जैन बुद्धिज्म का है और ठाकुर भी कहते हैं इंस्टेंट एनलाइटनमेंट पॉसिबल आपको दृढ़ रूप से मान लेना है। तो अभी यात्रा यह नहीं है कि अंधेरा दूर करना है। यात्रा यह बात की है कि यह स्वीकार करना है कि अंधेरा था ही नहीं। यह जो राजयोग का जो प्राण चैप्टर हमने देखा था उसमें स्वामी जी इसको पूरे साइंस के बेस पर कहते हैं कि यह प्राण का विज्ञान है जिससे यह रिमोट हीलिंग पॉसिबल है कि प्राण के साथ में तो पूरा जगत कनेक्टेड है और प्राण मेरे साथ में कनेक्टेड है। वही प्राण आपके साथ में कनेक्टेड है। तो वही यह प्राण रूपी जो वेवलेंथ है। मैं यदि आपको हीलिंग थॉट्स भेजता हूं तो वही प्राण रूपी वेवलेंथ पे ट्रैवल करके आपके शरीर में प्रवेश करेंगे और आपको हील करेंगे। ये रिमोट हीलिंग स्वामी जी कहते हैं दिस इज़ एंटायरली पॉसिबल एंड दिस इज प्योर साइंस। ये प्राण का विज्ञान है। तो ओम