Skip to transcript
ClassesSaradakosh

Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

देवीत्‍व का जागरण : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 6 May 2024

Class

ओम स्थापक च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतर षय कयते नम हम लोगों के साथ में कभी-कभी ऐसा होता है ना कि सबके साथ में रहते हैं तो किसी को कुछ कहना भी पड़ता है किसी के साथ में कोई मान लीजिए कि कभी-कभी किसी को डांटना भी पड़ता है खास करके यह जो एडमिनिस्ट्रेशन यह एडमिनिस्ट्रेशन एक ऐसा चीज है कि आपको लगता है कि आप सबके साथ में सद व्यवहार करेंगे और बिल्कुल अपने अंदर से प्रयास करेंगे किंतु यहां पर तो हमको बहुत सारी चीजों को लेकर के रहना है बात यहां पर सिर्फ यह नहीं है जैसे मैं मेरे ही पब्लिकेशन डिपार्टमेंट की ही बात करूं बात सिर्फ ऐसा नहीं है कि मुझे सबके साथ में रिलेशन अच्छ अच्छा रखना है मुझे लोगों से काम भी निकालना है दोनों चीजें होनी चाहिए किसी भी तरह का एक एडमिनिस्ट्रेशन किसी भी तरह का एक सोशल सेटअप हो जहां पर 10 लोग मिलकर के काम करते हैं दो चीजें होती है एक तो है कि वहां पे सबको काम भी ठीक-ठीक करना है और रिलेशन भी ठीक-ठीक रखने है दो में से एक गड़बड़ हुआ तो वह संस्था कहो कि वह जो सेटअप कहो वह काम नहीं करेगा तो कभी-कभी हमारी ऐसी आवश्यकता हो जाती है कि किसी को कुछ बोले कि भाई तुम्हारा बिहेवियर है वह ठीक नहीं है या तो तुम अपना काम इंप्रूव करो या तो तुम्हारा लोगों के साथ में जो इंटरेक्शन है बिहेवियर है इसको ठीक करो दोनों को यदि ठीक नहीं रखोगे तो तुम इस सेटअप में काम के नहीं हो फिर सेटअप के ऊपर में तुम भार स्वरूप हो जाओगे बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो कि लोगों के दोनों तरह से होता है कोई कोई किसी के साथ में रिलेशन अच्छा रखता है तो काम नहीं करेगा और जो काम करेगा तो रिलेशन अच्छा नहीं रखेंगे ऐसा भी देखने में आता है और ऐसा भी कि काम भी नहीं करता रिलेशन भी अच्छा नहीं रखता तो उस समय कभी-कभी डांटने की जरूरत पड़ जाती है किंतु बहुत सारे लोग हैं ना इनको कंफ्रे अच्छा नहीं लगता मुझे भी खास करके मेरे साथ में ऐसा हमेशा मैंने देखा है किसी भी तरह का कंफ्रे अच्छा नहीं लगेगा मुझे यदि कोई गड़बड़ कर रहा है तो बहुत लंबे टाइम तक मैं कुछ उसको बोल नहीं पाऊंगा और यदि बोलने की बारी आएगी भी तो कब जबकि बहुत सर के ऊपर में से पानी बह गया है तब कहीं जाकर के मैं कभी उसको बोलूंगा अरे भाई यह क्या कर रहे हो तो यह एक ह्यूमन नेचर है कभी-कभी खास करके साथ में मिलकर के काम करने के समय तो इसके बारे में मैं सोच ही रहा था और कल ही सडन स्वामी जी का एक किताब है रेमन सेंसेस ऑफ स्वामी विवेकानंद उसमें एक बड़ा ही सुंदर प्रसंग मुझे पढ़ने को मिला और वहां पर स्वामी जी एक बात बार-बार दोहराते हैं सिरदार तो सरदार जो अपना सीर काट कर के दे सकता है सबसे पहले वही अच्छा वही ठीक-ठीक सरदार हो सकता है वही ठीक-ठीक लीडर हो सकता है स्वामी जी ने एक बार कहा था ना कि 1857 में हम लोग हार क्यों गए क्योंकि यह जब फर्स्ट रिबेलियस गवर्नमेंट के सामने कि सभी तरह के इंडियन साथ में मिलकर के ब्रिटिश लोगों के सामने लड़े थे तो उस समय स्वामी जी कहते थे हमारे कुछ-कुछ लीडर्स ऐसे थे कि जब सैन्य युद्ध कर रहा है सैनिक जब रण मैदान में अपना जीवन न्योछावर कर दे रहे तब यह लीडर ना कि ये सेनापति क्या करेंगे पीछे खड़े रहकर जोर-जोर से चिल्लाए शाबाश बहादुर लड़ो बहादुर किंतु खुद वो फ्रंट लाइन में आकर के वो खुद प्रथम पंक्ति में आकर के दुश्मनों का सामना नहीं करेंगे इससे क्या होता है डिमोला इजेशन हो जाता है और सैनिकों ने देखा कि हम लोग तो अपनी जान गवा रहे हैं किंतु यह सेनापति जो पीछे खड़ा है वह बढ़िया मजे से जी रहा है बढ़िया मजे से वो आनंद कर रहा है तो फिर मैं क्यों अपनी जान गवा ह इन लोगों के लिए बोलकर के हम लोग हार गए तो ये स्वामी जी का बार-बार कहना था कि सिरदार तो सरदार अर्थात कि आपका यह जो सैन्य है सैन्य के प्रति आपका इतना सहानुभूति होना चाहिए उनके साथ में इतना सुंदर मैत्री और प्रेम का रिश्ता होना चाहिए कि उनके लिए आप अपने जान भी न्योछावर कर दे तब कहीं जाकर के लीडरशिप की क्वालिटी आप में प्रकट होगी और सभी लोगों के साथ में मिलकर आप टीम वर्क कर पाएंगे तो अभी जब स्वामी जी यह सब कहते हैं बार-बार तो स्वामी जी का ही एक सन्यासी शिष्य व वहां पर खड़ा था तो स्वामी जी ने फिर उसके सामने पॉइंट करके कहा कि देखो तुम्हारे बारे में मुझे एक बात पता है कि यह यहां पर बेलूरमठ की उसी समय स्थापना हुई थी ऐसा तो है नहीं कि सभी का साधु और ब्रह्मचारी या तो डिवटी वॉलंटस स्टाफ को भी रखने की आवश्यकता हो जाती है कि जैसे कि गार्डन में काम करने के लिए या तो फिर किचन में काम करने के लिए तो यह जो साधु था उसका काम था कि इस तरह से स्टाफ के साथ में काम करके उनसे काम निकलवाना तो स्वामी जी ने उस साधु को लक्ष्य करके कहा कि देखो मुझे पता है कि तुम किसी स्टाफ को डांट नहीं सकते तो तुमको क्या लगता है तुम उनको डाटो ग नहीं इसका यह अर्थ है कि उनके प्रति तुम्हारे मन में बहुत प्रेम है इसलिए तुम उनको नहीं डाटो ग जैसे यह सरदार वही सरदार उस बात का क्या तुम इस तरह से इंटरप्रिटेशन करते हो नहीं तुम इनको डांटते नहीं हो क्योंकि इसलिए नहीं कि तुम उनको प्रेम करते हो तुम उनको प्रेम नहीं करते यदि मैं कहूं कि उनके लिए जान यो छावर कर दो तो तुम करोगे नहीं कर पाओगे ये तुम उनको नहीं डांट सकते हो इसका कारण होता है जनरली स्वामी जी ने उस समय यह बात नहीं कही किंतु मेरा इंटरवू टेशन है एक तरह का डर एक तरह का एक कंफ्रे की परिस्थिति में नहीं जाने का एक नेचुरल तमस इसकी वजह से हम लोग नहीं डांटते हैं उसके बाद में स्वामी जी क्या कहते हैं पता है कि देखो मैं इन लोगों के लिए अपने जान भी न्योछावर कर सकता हूं मैं इन लोगों के लिए मर भी सकता हूं किंतु साथ-साथ में ही आई कैन हैंड देम मैं जैसे मैं इन लोगों के लिए मरने के लिए तैयार हूं मैं इन लोगों को शूली पे भी चढ़ा सकता हूं ये दोनों क्वालिटी होनी चाहिए तब कहीं जाकर के होगा कि आपका सही सही प्रेम है इनके प्रति जदी आप इन लोगों को डांट नहीं पाओगे जैसे कि मां का मां कोई भी मां होती है अपने बच्चे को मां का प्रेम मां मां ही तो होती है सबसे ज्यादा अपने बच्चे को प्रेम करती है किंतु यही मां अपने बच्चे को डिसिप्लिन भी करती है मारेगी भी सही डांटे गी भी सही उसको कहेगी भी सही कि अच्छा ये बुरे रास्ते पर मत जाओ टीचर के पास बच्चा थोड़ा सा बड़ा हो जाएगा टीचर के पास जाएगा अभी कोई बुरी हरकत करेगा तो पहले के टीचर तो सोटी मारते थे सोटी बागे चमचम विद्या आवे दमदम गुजराती में ऐसी कहावत है अर्थात कि जोरों से सोटी पड़ेगी और फटाफट करके विद्या आएगी किंतु आज यह जमाना चला गया है आजकल के टीचर क्या करेंगे ज्यादा से ज्यादा प्रिंसिपल को बोल देंगे और या तो फिर पेरेंट्स को कंप्लेन करेंगे कि आपका बच्चा ऐसी हरकतें करता है किंतु डांटे या मारेगा कोई नहीं सबको डर लगता है दूसरे को बच्चे को डांटने से अभी कुछ गड़बड़ हो गया तो अपने सर पे आ जाएगा बेटर है कि उसको मुंह से बोल दो तो यह एक डर है कंफ्रे में नहीं जाने का दूसरों को डिसिप्लिन नहीं करने का यह इसलिए नहीं होता है कि मैं उनको इतना प्रेम करता हूं कि मैं इनको डांट नहीं सकता हूं यह मिस इंटरप्रिटेशन है जो प्रेम करता है वह डांट भी सकता है स्वामी जी का कितना पावरफुल स्टेटमेंट है आई लव देम आई एम रेडी टू डाई फॉर देम एज वेल एज आई एम रेडी टू हैंग देम मैं उनके लिए मरने को भी तैयार हूं और इनको शूली पर भी चढ़ाने को तैयार हो यह दोनों क्वालिटी जब होगी तब कहीं होगा कि आप दूसरों के साथ में ठीक ठीक सिरदार तो सरदार जो अपना सिर काट के दे सकते हैं वही सरदार है वो कहावत आपके बारे में सार्थक होगी और जैसे स्वामी जी ने उसी समय कहा वज्रा अपी कठो राण मृदु नी कुसुमा अपी जो वज्र से भी ज्यादा कठोर है और कुसुम अर्थात फूल से भी ज्यादा वो नम्र है मृदु है तब कहीं जाकर के आपके भीतर में यह दोनों क्वालिटी आएगी कि आप दूसरों को डिसिप्लिन भी कर सकते हैं और आप दूसरों को प्रेम भी कर सकते हैं तो मैं क्योंकि यह सब चीजें हम लोग प्रैक्टिकली सब समय कंफ्रे सामने चलती रहती है तो कल य जब ये इंसिडेंट पढ़ा तो एकदम मेरे माइंड में क्लेरिटी हो गई ये पढ़ने का क्या एक अर्थ है हम लोग बहुत बार पढ़ते हैं तो ऊपर ऊपर से ही चला जाता है किंतु हमेशा पढ़ने के समय में एक बात याद रखनी है कि अपने जो प्रैक्टिकल समस्या है उसके साथ में इसका कहां पर कनेक्शन हो सकता है यदि ऐसा करके पढ़ेंगे तो यह हमारा पढ़ना भी सार्थक होगा अभी इस सप्ताह मां का जीवनी गंभीरानंद जी का जैसे अपना यह है कि एक सप्ताह प्रत्येक सप्ताह हम अलग-अलग टॉपिक लेते हैं तो इस समय मां का जीवन और मां के जीवन में जो हमने अभी तक जो कुछ डिस्कस किया अभी वह तो हमको पता ही है कि किस तरह से मां ने जयराम बाटी में थी फिर ठाकुर के साथ में विवाह हुआ था ठाकुर तो दक्षिणेश्वर आ गए मां के मन में विरह की वह यातना और फिर मां खुद वहां पर दक्षिणेश्वर चल कर के आई ठाकुर के साथ में मिलन हुआ और वही सब घटनाएं ठाकुर का जो ठाकुर ने जो तोतापुरी ने कहा था कि तुम विवाहित हो तो क्या हुआ तुम सही सही सन्यासी हो उसका यह टेस्ट है कि तुम अपनी पत्नी के साथ में अ रहो उसके साथ में शयन करो और देखो कि तुम्हारे मन में कोई काम भाव जागृत होता है कि नहीं यदि नहीं होता है तो वही एक रियल आपकी यह टेस्टामेंट है कि आपने सही सही निर्विकल्प समाधि प्राप्त की है आपने सही सही आध्यात्मिक जीवन के सर्वोच्च सोपान है उसके ऊपर में आप आरूढ़ हुए हैं तो ठाकुर ने वह सब परीक्षाएं की ठाकुर के बगल में ही सात में ही मां सोती थी रात को शयन करती थी ठाकुर ने अपने मन को कहा कि मन यही है स्त्री शरीर जिसको लोग परम उपाद जिनिश बोले जाने बांगला में ठाकुर अपने मन को समझाते हैं कि यही स्त्री शरीर है जिसको कि लोग एक बड़े ही भोग की वस्तु के रूप में पहचानते जानते हैं यदि तुम्हारे मन में कोई भी कामना है वासना है तो यह रहा यह मा यह रही मां यह रहा मां का शरीर तुम इसको ग्रहण करो मन में एक बात और मुंह पर दूसरी बात ऐसा कभी मत करो भाबे और घोरे चूरी कोरा ठाकुर कहते हैं कि भाव के घर में चोरी करना मन में तो है कि हां मेरा मन कामना की ओर वासना की ओर बह रहा है किंतु मुंह से या तो बाहर से मैं कोई भी एक साधक का भेट धारण करके एक साधक का एक भान करके घूमता हूं तो ऐसा मत करो मन में जो है उसी को तुम उसका ही आचरण करो तो जैसे ही ठाकुर का हाथ मां के शरीर की ओर आगे बढ़ा इमीडिएट ठाकुर समाधि में जो चले गए वो उस रात को तो समाधि में से बाहर आए ही नहीं दूसरे दिन ऐसा हुआ कि कितना ही नाम स्मरण करवाया गया तब कहीं जाकर के ठाकुर को बाह्य ज्ञान फिर से आया तो यह सब घटनाएं एक के बाद एक हुई है है आखिर में गंभीरानंद जी जैसे कि पूर्व भूमिका बांधते हैं सबसे इंपॉर्टेंट घटना रामकृष्ण संघ की राम कृष्ण भावधारानी अपना इंटरप्रिटेशन होता है मेरी दृष्टि से सबसे इंपोर्टेंट घटना कौन सी है क्या ठाकुर को निर्विकल्प समाधि प्राप्त हुई वह सबसे इंपोर्टेंट घटना है ठाकुर और स्वामी जी का मिलन हुआ स्वामी जी स प्रथम दक्षिणेश्वर आए और ठाकुर के साथ में मिलित हुए वह सबसे इंपोर्टेंट घटना है कौन सी सबसे पपो बहुत सारी घटनाओं के बारे में हम कह सकते हैं मेरी दृष्टि से सबसे इंपॉर्टेंट घटना है रामकृष्ण संघ की रामकृष्ण भावधारानी लीजिए हिस्टोरियन आर्नोल्ड टोयन बी आर्नोल्ड नवी एक बहुत बड़ा हिस्टोरियन है बड़ा ही ख्यात नाम है उसने बहुत ही रिस सर्च करके एक बहुत बड़ी किताब लिखी है क्या 10 12 वॉल्यूम में होगी स्टडी ऑफ हिस्ट्री उस स्टडी ऑफ हिस्ट्री में वो पूरा डिस्कस करता है कि अच्छा यह हिस्ट्री को हम किस तरह से प्रॉपर्ली समझेंगे या ऐसा है कि यह घटना हुई वो घटना हुई यह घटना हुई सब घटनाओं को लिपिबद्ध कर देना क्रोनोलॉजिकल वही हिस्ट्री हो गई नहीं हिस्ट्री के पीछे कोई लॉजिक होना चाहिए कोई एक साइंस होना चाहिए जिस साइंस की मदद से आप हमारे मानव इतिहास को समझेंगे मानव सभ्यता को समझेंगे मानव मन को समझेंगे हवाहवा में बात करने से तो कोई एक तो हुआ नहीं कि हम कि हां पहले यह राजा हुआ उसके बाद में यह राजा हुआ फिर इस राजा और उस राजा का युद्ध हुआ यह राजा जीत गया अभी उसका राज्य चलेगा ऐसी घटना परंपरा से तो हम अपनी सभ्यता को हमारे भूतकाल वर्तमान भविष्य को नहीं समझ पाएंगे तो आर्नोल्ड ओ एनबी ने क्या किया कि जितना भी ह्यूमन हिस्ट्री है उस ह्यूमन हिस्ट्री को सिविलाइजेशन रूपी यूनिट्स में बांट दिया कि यह अपना इंडियन सिविलाइजेशन है यह वेस्टर्न सिविलाइजेशन यूरोपियन सिविलाइजेशन है यूरोपियन सिविलाइजेशन में भी आप कहेंगे कि वेस्टर्न यूरोपियन सिविलाइजेशन और ईस्टर्न यूरोपियन सिविलाइजेशन यह चाइनीज सिविलाइजेशन है यह अरेबिक सिविलाइजेशन है ऐसा बोलकर के सिविलाइजेशन या तो फिर मानव सभ्यता को एक यूनिट में बांट दिया फिर वह क्या कहता है कि हां यह सिविलाइजेशन रूपी यूनिट है तो राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन जैसे कि एक अपनी भारतीय सिविल इंडियन सिविलाइजेशन एक समय था वैदिक युग था कि हम लोग एक बड़े ही जाह जलाली के समृद्धि के शिखर पे थे फिर पता नहीं एक ऐसा हजार साल का एक गहरा एक गहरे गड्ढे में हम डूब गए हजार साल तक और फिर बाद में फिर से हमारी आजादी की ये जो लड़ाई थी हमारी खास करके ठाकुर महा स्वामी जी के आने से ये हमारा पुनरुत्थान हुआ तो ये राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन है इसके पीछे कौन सा परिब कार्यरत है कौन सा फैक्टर है जिसकी मदद से सिविलाइजेशन वो डेवलप होती है और ऐसा कौन सा फैक्टर है कि सिविलाइजेशन डिसइंटीग्रेट हो जाती है तो उसने कहा कि रिलीजन इज द फंडामेंटल फैक्टर यदि रिलीजन पावरफुल होता है रिलीजन लाइव होता है तो वो सिविलाइजेशन डेवलप करती है जैसे कि क्रिश्चियनिटी के आने से वेस्टर्न यूरोपियन सिविलाइजेशन का डेवलपमेंट हुआ इस्लाम के आने की वजह से अरेबिक सिविलाइजेशन का डेवलपमेंट हुआ बुद्धिज्म आने की वजह से ये जो उस समय का जो भारत था उसका उत्थान हुआ था तो एक के बाद एक जब रिलीजन आता है तो वह सिविलाइजेशन का डेवलपमेंट स्टार्ट होता है और जब रिलीजन में कोई करप्शन प्रवेश करता है तो सिविलाइजेशन का डाउनफॉल होता है ऐसा उसका एक थिरी है उसके बाद में व ठीक करता है कि रिलीजन का क्या अर्थ है रिलीजन को आप किस तरह से समझेंगे तो वह कहता है कि एक तरह से एक महापुरुष आते हैं एक अवतार शब्द तो खैर हमारा है उसकी दृष्टि से कहेंगे तो एक फाउंडर ऑफ द रिलीजन ये जो धर्म के जो स्थापक होते हैं उन लोगों के जीवन में क्या होता है पता है रिट्रीट एंड रिटर्न दो फेज होते हैं जैसे कि जीसस जीसस ने वो बचपन से ही वो धर्म का वो उनके प्रति एक आकर्षण था जीसस के मन में और फिर आखिर में यह जो चिंतन की धर्म क्या है ईश्वर क्या है आध्यात्मिकता क्या है आदर्श जीवन क्या है आदर्श समाज क्या है वो सब चिंतन करते-करते एक ऐसे समय पर पहुंच गया कि उसको यह समाज से दूर जाकर के एक रिट्रीट अर्थात कि सबसे दूर जाकर के एकांत में चिंतन करना है कि मैं क्या करना चाहता हूं मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है तो जीसस गए डेजर्ट में अर्थात कि रण प्रदेश में मरुभूमि में वहां पर वह शैतान उसने आकर के जीसस को प्रलोभन दिखाया कि हां तुम मेरी शरण स्वीकार करो मैं तुमको दुनिया का राजा बना दूंगा वैभव दूंगा यह करूंगा वो करूंगा किंतु जीसस इससे भावित नहीं हुए और उन्होंने इनलाइटनमेंट प्राप्त किया एंड देन ही रिटर्न रिटर्न बैक टू द सिटीज एंड विलेजेस वापस आए शहरों में गांव में घूम-घूम करके उन्होंने जो प्राप्त किया था उस बात को उन्होंने बटोरा तो यह रिट्रीट एंड रिटर्न पहले तो एकांतवास में चले जाना है वहां पर निर्विकल्प समाधि कहो कि यह मुक्ति कहो कि निर्वाण कहो कि एनलाइन मेंट कहो उसको प्राप्त करना है फिर वापिस आकर के समाज में शहर में गांव-गांव में लोगों के घर-घर में धर्म का संदेश को प्रसार करना है यदि जो प्रोफेट या तो जो महापुरुष ऐसा कर पाएगा वही धर्म टैक्टिक चलेगा सिर्फ रिट्रीट अर्थात कि एकांतवास में चले जाकर के साधना करते ही रहे करते ही रहे और रिटर्न नहीं आए समाज में वापस नहीं आए तो आपकी साधना का कोई जनरल पब्लिक को कोई अर्थ उसको मिलने वाला नहीं है बेनिफिट आपको जो मिले सो मिले तो ये आर्नोल्ड टोन बी का विश्लेषण है कि कोई भी धर्म है उसके फाउंडर का यह भूमिका होता है पहले वह रिट्रीट करें फिर वह रिटर्न में आए पहले एकांतवास में जाकर के साधना करें सिद्धि प्राप्त करें फिर समाज में वापस आकर के उसी सिद्धि को उसी आशीर्वाद को लोगों में बटोरे तो बुद्ध का भी भगवान बुद्ध का भी राजमहल छोड़ कर के वन में चले गए साधना की साधना करके निर्माण प्राप्त हुआ फिर निर्वाण प्राप्त करके बुधि वृक्ष के आसपास में टहल रहे हैं सोच रहे हैं कि शरीर धारण कर के रखने का क्या प्रयोजन है किंतु प्रयोजन है ऐसे कितने ही लोग होंगे जो कि आध्यात्मिक रास्ते पर सफर तो कर रहे हैं किंतु फिर उनको अंतिम मार्गदर्शन नहीं मिल रहा अंतिम फाइनली कुछ छूट जा रहा है जो यदि कोई उनको मार्गदर्शन कर दे तो उनको भी निर्वाण प्राप्त हो जाए तो ऐसे लोगों को मार्गदर्शन देने के लिए भगवान बुद्ध फिर से इस पृथ्वी पर फिर से समाज में अवती ण हुए अपने स्वामी विवेकानंद का भी कहां वो अल्मोड़ा की गुफा में बैठे हुए हैं सोच रहे हैं कि सभी में समाधि में वही देह त्याग कर दूंगा किंतु फिर जब उनकी बहन की मृत्यु अपमृथ्यू पे इस धरा पे अवती ण हुए तो यह पहले तो रिट्रीट एकांतवास में जाकर के प्रचंड साधना करना साधना करके सिद्धि प्राप्त करना और फिर रिटर्न वापस आना सिद्धि को बटोर यह महापुरुष लोगों का जीवन चक्र है तो यही जीवन चक्र ठाकुर के जीवन में भी है ठाकुर दक्षिणेश्वर में एकांत में कितनी साधना की है एक के बाद एक यह त शक्ति साधना अद्वैत साधना वेदांत साधना भाव साधना यहां तक कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की भी साधना कर दी सब तरह की साधना कर दी फिर वह समाज में वापस आए सोसाइटी में वापस आए किंतु यह वापस आने का यह जो यह है उनका आने का तरीका उसमें देखिए कि सर्वप्रथम उन्होंने शक्ति की आराधना की क्यों क्योंकि यदि आपको इस समाज में धर्म को बटोर है माया के इस राज्य में रहना है तो माया के राज्य में शक्ति के आशीर्वाद के बिना आप यह नहीं कर सकते क्योंकि शक्ति या तो फिर माया यह माया का इलाका है हम चाहे कित नी ही सिद्धि प्राप्त कर ले हम चाहे कितने ही वो निर्विकल्प समाधि में चले जाए कुछ भी हो जाए माया का जगत ऐसा है कि थोड़ा सा भी ये ठाकुर ने कहा ना कि वो पेड़ को कितना भी काटते रहेंगे भीतर में से एक ने एक बार वोह अंकुरित तो होता ही रहेगा नई नई डालियां तो वैसे ही ये जगत ही ऐसा है कि आप जगत में कुछ शुभ कार्य करने को आए हैं ऐसा कुछ अशुभ हो गया कि ठोकर लग कर के गिर गए तो जगत में यदि कुछ माया के जगत में शुभ कार्य करना है है तो सबसे पहले शक्ति की स्थापना करनी होगी शक्ति की आराधना करनी होगी इसके बाद में ही यह शुभारंभ हो सकता है धर्म चक्र प्रवर्तन का तो यह कार्य कि ठाकुर की रिट्रीट दक्षिणेश्वर में जो साधना हुई उसके बाद में यह रिटर्न वापस आना जैसे ठाकुर कहते हैं ना कि नेती नेती करके आपको साधना करनी है साधना में सिद्धि प्राप्त करनी है अर्थात कि मैं यह पंच ज्ञानेंद्रिय नहीं हूं पंच कर्मेंद्रिय नहीं हूं पंच महाभूत का बना हुआ यह देह नहीं हूं यह अहंकार नहीं हूं मन नहीं हूं चित्त नहीं हूं बुद्धि नहीं हूं कुछ नहीं मैं हूं अनंत ज्ञान स्वरूप आत्मन सत चित आनंदमय आत्मन ये जब ज्ञान हुआ इसके बाद में ये यह पंच महाभूत का देह जो बना हुआ है वो भी ईश्वर का देह है यह जो पंच प्राण पंच ये जो पूरा जगत है वह भी ईश्वर का ही एक अन्य स्वरूप है ऐसा करके इति इति करके वह फिर से नीचे आना और लोक कल्याण के लिए लोक शिक्षा के लिए जीवन को धारण करना तो यह हो गया पूरा चक्र एक साधक के एक अवतार के जीवन का तो यह चक्र में जो दूसरा फेज है सेकंड स्टेप है कि समाज में वापस आकर के समाज के कल्याण के लिए कार्य करना उसका सबसे मूलभूत तत्व है शक्ति की आराधना बिना शक्ति की आराधना के यह कार्य कभी भी सफल नहीं हो होगा अभी यह पढ़ कर के हमको आश्चर्य तो म प्रश्न तो होगा ही ये तो हम हिंदू परंपरा के माध्यम से यह सब कह रहे हैं अ भगवान बुद्ध या भगवान जीसस का जीवन जब पढ़ेंगे तो उसमें तो इस तरह की कोई बात दिखती नहीं है किंतु बहुत बार क्या होता है ठाकुर ने जो आचरण किया है ना व स्थूल देह से बहुत सारा कुछ आचरण करके दिखाया है जब आप यह सब मानसिक भी कर सकते हैं मन सी मन ही मन में ही आप माया को आप प्रणाम करके शक्ति की आराधना करके यह कार्य आरंभ कर सकते हैं किंतु ठाकुर बहुत सारा कार्य स्थूल रूप में इसलिए करते थे क्योंकि जिससे कि लोग नजरों से देख सके एकदम स्पष्ट रूप से इसको समझ सके जैसे कि एक बार ठाकुर भाव में आकर के बार-बार अपनी हथेली में थूकते थूकते बंगाली कथामृत में लिखा है मुखा मृत फेंकते फेंकते अर्थात कि थूकते थूकते बोलते हैं कि तुम माया तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी मैं तो ऐसा करके माया मेरा हित करने के लिए आई है तुम क्या बिगाड़ लोगी ऐसा करके बार-बार नाराजगी जाहिर करते हुए ऐसा होगा शायद होगा कि कोई टेंप्टेशन सडन उनके सामने आ गया होगा मां ने उनकी परीक्षा करने के लिए दिखाया होगा तो उ उस टेंप्टेशन को काटने के लिए उस माया को माया को भगा देने के लिए ऐसा बार-बार अपनी हथौरी में थूकते थूकते वो माया के बारे में बोलते हैं कि तुम मेरा क्या बिगाड़ लेने वाली हो तो अभी प्रश्न होगा कि ठाकुर जो कि निर्विकल्प समाधि में स्थित है मा मां शारदा की उन्होंने शक्ति के रूप में पूजा की है उनको यह सब क्या है किंतु यह स्थूल बहिर प्रकाश है लोगों को शिक्षा देने के लिए इसलिए थरी तो सभी अवतार में काम करेगी वही है कि ठाकुर के जीवन में थिरी बहुत ही ज्यादा स्थूल रूप में उन्होंने हमारे सामने प्रकट की है जिससे कि हमारे सामने दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए वह जो हिंदी में कहावत है कोई भी कंफ्यूजन ना रहे कोई भी एमगी ना रहे एकदम क्लियर हो जाए कि हां यही थिरी और इसकी ऐसी ही प्रैक्टिस होनी चाहिए तो ऐसे ही यह सबसे इंपोर्टेंट घटना कि समाज में फिर से वेदांत का शंखनाद वो फिर से फैले ये वेदांत रूपी गान फिर से समाज में फैले इसके लिए यह शक्ति साधना देवी का बोधन तो बहुत ही सुंदर यह प्रसंग है और गंभीरानंद जी महाराज ने बड़ा ही सुंदर रूप से आलेख भी किया है हम पढ़ते हैं इसको थोड़ा सा गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं चैप्टर का नाम है देवीर बोधन या तो फिर देवी का जागरण गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं अन्य बहु बावे ओ बहु कथा छले श्री मायर सही ठाकुरे संबंधो प्रगट तो होया थाकी ले ओ बहुत विभिन्न तरीकों से बहुत अलग-अलग बातों में ठाकुर और मां का चरित्र संबंध प्रगट हुआ था किंतु इसके बावजूद कोई अभिव्यक्ति धारा परिपूर्णता लाभ करिया छलो सड़सी पूजा ठाकुर और मां के यह दिव्य संबंध रूपी जो अभिव्यक्ति है वह परिपूर्णता पूर्णता लाभ की थी शशी पूजा के माध्यम से से पजार तात्पर्य जो ठाकुरर दिख ईते आलोचना स्थान यहान है सड़सी पूजा का तात्पर्य क्या है उसका अनुसंधान उसका विष लेण ठाकुर की दृष्टि से करने का स्थान यह नहीं है वह स्थान है शरत महाराज के द्वारा लिखित श्री श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग में बहुत ही सुंदर वर्णन है उसको भी हम कभी समय मिलेगा तो पाठ करेंगे यहां पर मां के दृष्टिकोण से सड़सी पूजा का आलेखन किया गया है मायर दिख ईते आमरा इहा बुझीते चेष्टा करीबो मां के ही दृष्टिकोण से छड़ स पूजा को समझने का हम प्रयास करेंगे खुद्रो बालिका के ठाकुर पत्नी रूपे ग्रहण कोरिया छिले छोटी बालिका को ठाकुर अपनी पत्नी के रूप में ग्रहण किए थे कमार पुकुरे अबो स्थाने सु जोगे तहा के दिवो प्रेमेर आस्वाद प्रदान कोरिया लेन कमार पुकुर में रहने के समय बालिका को दिव्य प्रेम का आस्वादन कर करवाया था एवं कामर पुकुर और दक्षिणेश्वर तहा के लौकिक और देव जीवनो चित अपूर्व संपद राशते भूषित कोरिया लेन कामर पुकुर में और दक्षिणेश्वर में यह जागतिक जीवन और दिव्य लीलाम जीवन को किस तरह से जिया जाए किस तरह से लोगों के साथ में व्यवहार किया जाए किस तरह से संसार का सारा कार्य निपटाया जाए यह सब ठाकुर ने मां को बड़ा ही विस्तृत रूप से समझाया था अधुना नारीर देवी त्वे उद्बोधन समय समाग तो अभी नारी के देवी का देवी के उद्बोधन का समय आ गया है समीप आ गया है मां के भीतर में जो देवत्व था उसको आवाहन करने का उसको जागृत करने का समय आ गया है जहां के ठाक अतः पर शय लीला संपूर्ण जन्नो राख्या जाय बेन जिनको ठाकुर महा समा ठाकुर जब खुद महासमाधि ग्रहण करेंगे उस समय जिनको अपनी लीला यह जो यह जो धर्म चक्र प्रवर्तन है उसको आगे बढ़ाने के लिए इस जगत में रख कर के जाएंगे तहा के अंतरेर पूजा प्रदान पूर्वक निज सका से ओ जन समाजे मातो महिम मंडित एवं श देवी के श शय शक्ति विषय अबाही तो करार प्रयोजन छीन उन देवी का सन्मान करने का उसको जन समाज में सन्मान करने का और महिमा मंडित करने का और उसी देवी को अपनी खुद के देवत्व के बारे में जागृत करवाने का याद करवाने का यह समय आ गया है ए जन्नई सड़सी पुजार आयोजन और इसलिए शोशी पूजा का आयोजन है वह जब राम सेतु बनाने के समय वह जब वहां पर भगवान राम पहुंच तो गए वह दरिया के किनारे समुंदर के किनारे अभी वहां पर किंतु जाकर के देखना है कि मां सीता लंका में है कि नहीं मां सीता के पास में मैसेज पहुंचाना है तो मैसेज कैसे पहुंचाए तो यह पवन पुत्र हनुमान स्वयं वहां पर उपस्थित है किंतु जब तक हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण नहीं करवा दिया जाएगा तब तक हनुमान समुंदर लांगें नहीं तो वैसे ही यहां पे मां को उनकी शक्ति का स्मरण करवाने का समय आ गया है जब तक उनकी शक्ति का स्मरण नहीं होगा तब तक इस जीवन में मातृत्व का प्रचार करने के लिए वह अग्रसर नहीं होगी प्रश्न हो सकता है कि उनकी शक्ति का स्मरण सब समय इनको क्यों नहीं रहता है किंतु यदि रहता तो यह मानव लीला नहीं होती फिर वो तो जैसे कि हम लोग ये मैं छोटा था तो छोटे वो जो अमर चित्र कथा वगैरह जो सब कॉमिक्स आता है ना तो उसमें वो जगदंबा का आख्यान की वह शुंभ और निशुंभ का व वध करती है फिर तो क्या है कि देवी को जागृत ही किया जाता है राक्षसों का वध करने के लिए अपने पुराणों में यह सब कहानियां है तो पढ़ कर के मुझे और उसमें चित्र भी ऐसे थे मेरे ख्याल से वो अमर चित्र कथा ही होगी मुझे वो अभी भी सब चित्र याद है इतने सुंदर-सुंदर कलरफुल चित्र और मां का जो चेहरे का स्वरूप कभी सौम्य कभी हास्यम कभी क क्रुद्ध क्रोधित और ने बहुत ही सुंदर वो चित्रों के माध्यम से सब बनाया गया है किंतु वो पुराण का युग था पुराण के युग युग में देवी के रूप में वो अष्ट बाहु चतुर बाहु में और प्रत्येक बाहु में एक-एक अस्त्र लेकर के वह देवी का आगमन होता था अभी क्या है ये एक सेकुलरिज्म और ये स्केप्टिसिजम का युग है एक साइंस का युग है यहां पर आपको यदि चार बाहु चतुर्भुज ना किय अष्टभुज मां का जद अवतरण होगा तो हमको लगेगा कि अरे यह तो जद उनके लिए ही यह सब साधना वगैरह संभव है और फ हृदय के भीतर में जिस राक्षसों को मारना है वो तो फिर वोह देवी इस तरह से कधी तो भीतर के राक्षस तो हत्या उनकी नहीं होने वाली है हमको खुद को ही यह देवी या तो फिर यह देवत्व का आरोप अपने मन में करना होगा हमी को मानना होगा कि मेरे हृदय में यह जदी अज्ञान काम क्रोध मद लोभ मोह मत्सर रूपी राक्षस वह जो मने वह तूफान मचा रहे हैं अपने हृदय में तो इसी हृदय में मैं वही अष्टभुज या तो चतुर्भुज देवी को भी वह निमंत्रण कर सकता हूं उनको आवाहन कर सकता हूं और उसी देवी के माध्यम से इन राक्षसों को मैं मार सकता हूं तो यह पूरा आंतर युद्ध है और अंतर युद्ध में आंतर जगत में हम मां को स्वीकार करें इसलिए मानव लीला है ये मानव लीला क्यों इसके बारे में ठाकुर भी बहुत बार बातें करते हैं जैसे ठाकुर ने एक बहुत सुंदर एक उदाहरण दिया है ये इस बार राजा जो नगर भ्रमण करता है ना छद्म वेश में अर्थात कि वो स्वरूप बदल कर के अभी राज सिंहासन पर वो बैठा हुआ है राज महल में और 10 अभी लोग राजा के सामने क्या है वो सब चमचे लोग होते हैं ना वो आकर के राजा को गिर लेते हैं और सब समय राजा की प्रशंसा करते हैं राजा तुम आपका राज्य कितना सुंदर चल रहा है आपकी प्रजा कितनी खुश खुश है तो राजा वोह बुद्धिशाली राजा होगा वह समझ जाएगा कि चमचो को पैसा चाहिए इसलिए मेरी प्रशंसा कर रहा है फिर वो क्या करेगा वेश बदल कर के रात को अपने शहर में घूमने को निकलेगा और प्रजा की क्या अवस्था है अपने नजरों से देखेगा तो जब नजरों से उसको संतुष्टि होगी तब वह स्वीकार करेगा और नजरों से उसको दुख दिखाई देगा तो फिर राजमहल में वापस आकर के कहेंगे अरे वो गरीब की कुटिया है जाओ वहां पे अपने वजीर को आदेश देंगे और यह सोना महो और यह आहार खाना खाद्य पदार्थ लेकर जाओ और उनको अर्पण करके आओ भिक्षा में देकर के आओ तो यह सही राजा है तो यहां इस बार भी ठाकुर ये छद्म वेश में वेष बदल कर के आए हैं इसलिए मानव लीला किंतु मानव लीला में भी एक समय आता है जब देवत्व का या देवी का बोधन होता है उनका आवाहन होता है तो यह मां के भीतर में जो अंतर निहित छुपा हुआ देवी था उसको आवाहन करने का यह समय आ गया है और यही आवाहन से ठाकुर जगत के सामने घोषणा कर रहे हैं जन समाज के सामने मां का यह जो प्रतिष्ठा महिमा वह स्थापित कर रहे हैं यह प्रश्न होगा कि अरे मां ठाकुर की ही धर्म पत्नी है ठाकुर यदि अवतार है तो मां तो जगदंबा ही होगी यह समझने में आपको कितना बुद्धि चाहिए कोई भी एक बच्चा भी समझ सकता है किंतु ऐसा नहीं था हमने यह मां का और ठाकुर का भी जीवन पढ़ कर के देखा है यह रामलाल वगैरा जो लोग ठाकुर के भतीजे थे ठाकुर के परिवार जन थे वो लोग भी मां की अवहेलना करते थे मां का अपमान करते थे जब ठाकुर काशीपुर में थे ठाकुर ने वोह रामलाल को बुला कर के कहा तोर खोड़ी देख वे अर्थात तुम्हारी काकी तो मां तो उनकी काकी होगी ना हिंदी में शब्द पता नहीं गुजराती में काकी कहते हैं तो उनको देखना तुम तुम तो फिर रामलाल क्या उत्तर देखता है कि अच्छा उनकी जहां पर इच्छा है रहे ठाकुर ने कहा था कमार कुकुर में जाकर उनको रखना और संभाल रखना तो रामलाल ने उत्तर दिया उनकी जहां पर इच्छाएं रहे तो इमीडिएट ठाकुर नाराज हो गए अरे तुम मर्द हो मन के भाव मन का भाव समझ गए कि उनकी चिंता करने की उनकी केयर करने की उसकी इच्छा नहीं है तो म ठाकुर ने इमीडिएट नाराज होकर के कहा अरे तुम मरद किस चीज के हो यदि तुम अपने घरों की औरतों की संभाल नहीं रख सकते तो ऑलरेडी पता था कि ये कुछ-कुछ लोग तो मां का अपमान करेंगे ही किंतु फिर स्वामी जी बाकी जो डायरेक्ट डिसाइल है जिनके हाथ में इस राम कृष्ण भावधान हाथ में जाने वाली है उनको किंतु उनकी नजर के सामने दिए की तरह स्पष्ट हो जाए कि मां का स्थान इस भाव धारा में कहां पर है तो वह करने के लिए वह जागृत करने के लिए उसका प्रदर्शन करने के लिए यह सड़सी पूजा का आयोजन तो इस सड़सी पूजा के बारे में फिर गंभीरानंद जी महाराज क्या कहते हैं इसका स विस्तृत वर्णन हम पढ़ेंगे और विश्लेषण भी करेंगे वो अभी कल आज ही तक ओम शांति शांति शांति हरि तस्त श्री राम कृष्णा अर्पण

Questions & Answers

मस्तु व कंपेयर में अभी ठाकुर का विजडम देखिए देखिए एक इंसिडेंट है बेलूर मठ में एक बार क्या हुआ एक एक महाराज ने ये इंसिडेंट लिखा है अपनी स्मृति कथा लिखी है एक दिन शाम को कुछ गृहस्थ लोग आए वो कुछ उसमें में यंग लड़कियां थी कुछ औरतें थी और वहां के जो उस समय इंचार्ज स्वामी जी थे उन्होंने इस महाराज को बुला कर के बोला कि अरे ये मेहमान आए हैं कुछ जाकर के उनको कुछ प्रसाद वगैरह दे दो तो ये महाराज जी ये सब गृहस्थ लोगों को लेकर के वो गए वो भंडार ग्रह में जहां पर उनको प्रसाद देना है अभी वो जो औरतें थी उसमें से किसी ने पता नहीं कुछ गलती वगैरह ऐसा कुछ कर दिया होगा जो कुछ भी है मैं एगजैक्टली डिटेल भूल गया किंतु ये महाराज बड़े ही नाराज हो गए उस औरत के ऊपर में और उनको डाट ना शुरू कर दिया तो अभी अभी क्या है ना कि वो साधुओं का तो रहता है कि पवित्रता तो मेंटेन करनी है ना आप गृहस्थ है भक्त है कोई भी है पवित्रता मेंटेन करनी है और यदि आप नहीं मेंटेन कर पाएंगे तो आप क्यों आते हैं मठ में ऐसा करके कुछ भी उलट पुलट बोल देंगे उस समय लोगों का टेंपर बहुत ज्यादा होता था आजकल सभी लोग सौम्य हो गए हैं उस समय टेंपर बहुत ज्यादा होता था सभी का तो ऐसा कुछ भी उल्टा पुल्टा बोल के डांट दिया अभी वो तो जब जो गृहस्थ लोग आए थे भक्त वो चले गए उसके कुछ समय के बाद में इस महाराज जी को बुलाया गया मैनेजर महाराज की ऑफिस में तो यह महाराज गए भंडारी महाराज जाकर के देखा तो मैनेजर महाराज के सामने वो जो भक्त लोग थे वो सब बैठे हुए थे जाकर के उन्होंने कंप्लेन किया होगा तो ये महाराज भी सोचे कंप्लेन किया है तो क्या है वो तो जो सही बोला मैं सही चीज के बारे में ही बोला हूं झूठ मूत का तो डाटा नहीं हूं तो ये महाराज जी जो मैनेजर महाराज थे वो उनको पूछते हैं कि तुमको पता है ये लोग कौन है तो भंडारी महाराज बोलते नहीं मुझे नहीं पता तो बोला कि ये तो ठाकुर के वंशज है ये रामलाल दादा की कन्या वगैरह ये सब है तो तुमने इनको डांटा तुमको शर्म नहीं आती ये तो ठाकुर के वंशज को तो ये भंडारी महाराज बेचारे इतने टेंशन में पड़ गए वो सबके सामने उनको क्षमा मांगनी पड़ी माफी मांगनी पड़ी और कहीं जाकर के इस मामले का अंत हुआ क्योंकि मैनेजर महाराज बड़े ही नाराज हो गए थे तो ये घटना पड़ कर के मुझे लगा कि देखिए ठाकुर की ये जो विजन है फ्यूचर का कितना बड़ा है कि ये स्वामी जी है राजा महाराज इन सबके हाथ में ये संघ दे कर के गए हैं इतना छोटा इंसिडेंट का भी जद एक साधु को जद माफी मांगनी पड़े तो यदि इनके हाथ में आ गया होता रामलाल दादा है ना लक्ष्मी दीदी उनके वंशज में तो हमारी आज क्या परिस्थिति होती ट्रेडिशनल स्पीकिंग हम कहते हैं कि ज्ञान मार्ग और भक्ति मार्ग तो ट्रेडिशनल स्पीकिंग ज्ञान मार्ग का एलिजिबल कौन है अधिकारी कौन है कि जिसके भीतर में एक त्याग का भाव ऑलरेडी थोड़ा बहुत दृढ़ हो गया है क्योंकि ज्ञान मार्ग है विचार का मार्ग कि मैं यह इंद्रिय नहीं मैं इंद्रिय के भोग नहीं तो ऐसा इंद्रियों के भोग को जो कंट्रोल कर सकता है जिसका विल पावर स्ट्रांग है वह ज्ञान मार्ग पर विचार मार्ग पर चलेगा और जिसका कि इंद्रियों पर कंट्रोल इतना स्ट्रांग नहीं है उसके लिए शरणागति का भाव है कि मैं ईश्वर का संतान ईश्वर का दास ना कि ईश्वर का पुत्र ना कि उनकी पुत्री और ये ईश्वर के साथ में संबंध रखने का किंतु फंडामेंटल डिफरेंस है त्याग विल पावर कि मैं अपने जब वासना मेरे सामने टेंप्टेशन खड़ा हो जाएगा मैं उसको कंट्रोल कर पाऊंगा कि नहीं यदि कर पाता हूं आई एम एलिजिबल फॉर ज्ञान और नहीं कर पाता हूं आई एम एलिजिबल फॉर भक्ति ये ट्रेडिशनल ऐसा चलता आ रहा है किंतु स्वामी जी ने जो अभी देखा कि अपने संग में कि ज्ञान भक्ति कर्मा और राज योग अर्थात कि एकाग्रता योग एक चारों योग का समन्वय हमारे सामने रख दिया है कि आप सुबह और शाम थोड़ा बहुत स्वाध्याय भी करें यह सत्संग भी करें चिंतन भी करें साथ-साथ में ही ठाकुर को प्रार्थना भी करें और दिन के दौरान यह निष्काम कर्म भी करें और यथाशक्ति अपने गुरु के दिया हुआ मंत्र का जप भी करें ऐसा कोई हार्ड एंड फास्ट कंपार्टमेंटलाइज नहीं करना है सभी पाथ को एक दूसरे के साथ में बुन दो जैसे कि एक सुंदर ये फूलों की माला होती है ना सप्तर पांच फुलेर साजी ऐसा ठाकुर बार-बार क आमार पांच फुलेर साजी अर्थात कि ये जो फ्लावर वाज है पांच तरह के फूलों का ये फ्लावर वाज है सुंदर तो ऐसा सभी तरह की साधना हों को एक साथ में बुन दो और यथाशक्ति उसका पालन करो भले ही मेरा मन के ऊपर में कंट्रोल है कि नहीं यदि मेरा मन के ऊपर में कंट्रोल है मेरा त्याग मेरा विल पावर स्ट्रांग है तो मैं सन्यास के रास्ते जा सकता हूं और नहीं लगता है तो मैं गृहस्थ मार्ग पे गृहस्थ आश्रम के मार्ग पर चलूंगा किंतु बोथ आर एलिजिबल फॉर ऑल फोर टाइप ऑफ साधना चारों साधना हों के लिए दोनों एलिजिबल है सन्यासी हो ना कि गृहस्थ बस उसका पालन यथाशक्ति करना है यह सन्यासी हो सकता है कि स्वाध्याय करने के लिए जप करने के लिए मंदिर में जाकर बैठने के लिए ज्यादा समय हो गुरुह के पास में हो सकता है कि इतना समय ना हो किंतु जितना समय मिलता है यथाशक्ति चारों का वह अनुष्ठान कर सकता है दोनों सभी साथ में चल सकते हैं आज का जो रामकृष्ण मिशन का जो यह है स्टैंडर्ड कि आप सभी साथ में कर सकते हैं कि आप स्वाध्याय भी कर सकते हैं अहम ब्रह्मास्मि यह चिंतन भी कर सकते हैं मैंने अभी सुबह को अहम ब्रह्मास्मि किया तो अहम दासो में किया दास स्मी किया शाम को यह दोनों कर सकते हैं वो ठाकुर कहते हैं ना वो शना का प बजाए अर्थात कि सहनाई में एक ही सूर बजाता है मैं सहनाई में सातों सूर बजाता हूं व एक ही मिठाई खाता है मैं सब मिठाई खाता हूं कोई मुझे बोलेगा तुम जलेबी खाओगे कि समोसा खाओगे मैं कहूंगा दोनों खाऊंगा भाई