Transcript
ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय नमः कल हमने बड़ा ही सुंदर इंसिडेंट पड़ा बड़ी ही सुंदर घटना कि विवाह के बाद में मां शारदा अपने पति के घर कमार पुकुर श्री रामकृष्ण देव के साथ में निवास कर रही है अभी उन दिनों की प्रथा के अनुसार वर पक्ष से कन्या पक्ष को दहेज दिया जाता था 300 रुपया दहेज दिया है और यह तो दरिद्र का गृह शिव का संसार कहां से कोई पैसा आया गहने जवा रात होने वाले हैं तो वहां के जो जमींदार है लाहा बाबू उनसे गहने ले करके मां शारदा को सजाया गया था तो अभी ये तो वैसे तो है छोटी बालिका किंतु उनको तो गहने देखिए सरस्वती और लक्ष्मी का रूप है मां शारदा वैसे तो मां काली मां बगला जितने भी देवी के स्वरूप है उन सबके गुण उन सबकी कैरेक्टरिस्टिक मां के भीतर में है तो लक्ष्मी का भी एक अंश लक्ष्मी का भी स्वरूप मां के भीतर में है तो इसीलिए मां के आशीर्वाद से कल जैसे हमारी बात हो रही थी कि मैंने किसी किसी से सुना है गुजरात में कि यहां पर कोई कोई ऐसा करते हैं कि देव को भागीदार बनाएंगे अपने बिजनेस में तो मान लीजिए कि देवता का अंश है जैसे कि सोमनाथ या द्वारकानाथ द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्णा उनको यदि अपनी पीढ़ी यहां पर पीढ़ी बोलते हैं उसको जो गुजराती बिजनेस होता है उसमें 1 परट परट का हिस्सेदार यदि बनाया है तो उतना जो प्रॉफिट होगा वह उन मंदिर में देंगे तो ऐसा कोई कोई करते हैं तो मैंने सुना है ऐसा कि जब ठाकुर को इस तरह से बिजनेस में पार्टनर बनाते हैं तो ऐसा कोई ज्यादा प्रॉफिट होता हुआ नहीं दिखा किंतु मां शारदा को इस तरह से बिजनेस में पार्टनर बनाने से बहुत सारा प्रॉफिट हुआ है अभी इस बात की सत्य असत्य मुझे नहीं पता मैंने बहुत साल पहले इसको सुना था किंतु सुन कर के मुझे लॉजिकल भी लगता है तो लक्ष्मी का स्वरूप है तो मां को गहने तो पसंद होने ही वाले हैं क्यों नहीं होंगे तो मां को मां जब अभी छोटी बच्ची है गहने पहन के घर आई है और अभी चंद्रमणि देवी बेचारी बड़ी ही परेशान है कि छोटी बच्ची के पास से गहने किस तरह से वापस मांगे वो तो लाहा बाबू ने दिए थे जमींदार ने दिए थे तो ठाकुर ने क्या कहा कि मां चिंता करो मत मैं किसी मा जब यह सोई होंगी शारदा तब मैं इनके अंग से गहने चुप करके छुप करके मैं ले लूंगा तो सही में ऐसा हुआ मां जब सोई हुई थी छोटी बच्ची तब ठाकुर ने धीरे से गहने इस तरह से ले लिए कि मां को पता भी नहीं चला अभी मां जब जगी तो मां ने मा इनको पूछा चंद्रा मणि देवी को भी गहने के नाम भी शायद उनको नहीं पता होगा 5 साल की थी बेचारी तो अभी यह चूड़ी यह हार ये नाम भी शायद नहीं पता होगा तो मां अपनी कलाइयां अपनी हथेली अपनी गर्दन यह सब दिखा करके पूछती है कि यहां यहां पर जो गहने मैंने पहने थे आपने मुझे पहनने के लिए दिए थे वो कहां गए तो यह सुनकर के चंद्रा मणि देवी की आंखों में आंसू आ गए मां ने कहा बिटिया मैं राम कृष्णा एक समय आएगा तुमको जितने चाहिए इतने गहने बना करके देगा और सही में देखिए कि वो कहानी है ना वो काली मंदिर में राधाकांत के गहने चोरी हो गए तो मथुर बाबू जाकर के राधाकांत अर्थात की भगवान कृष्ण और मां राधा तो इन दोनों की मूर्ति थी मूर्ति से गहने चोरी हो गए तो मथुर बाबू जाकर के कृष्ण के सामने क्या कहता है कि भगवान आप किस तरह के ईश्वर है कि आप अपने खुद के गहनों की रक्षा नहीं कर पाए तो हमारी रक्षा तो क्या करेंगे तो ठाकुर वहां पर खड़े थे तो उन्होंने तुरंत कहा मथुर बाबू को अरे यह तुम्हारी क्या हीन बुद्धि है जिनके लिए यह गहने यह पत्थर और मिट्टी के समान है स्वयं लक्ष्मी जिनकी दासी है त्रिभुवन के जो मालिक है त्रिभुवन के जो ईश्वर है परमेश्वर है तुम्हारे गहन की इतनी तुच्छ कीमत इतना बड़ा विश्व ब्रह्मांड यूनिवर्स का स्केल कितना है 15 बिलियन लाइट इयर्स इधर 15 बिलियन लाइट यर्स उधर यह तो विजिबल यूनिवर्स उसमें करोड़ों करोड़ों तारे करोड़ों करोड़ों गैलेक्सी एक गैलेक्सी के भीतर में करोड़ों करोड़ों तारे और ऐसे कितनी ही लाखों करोड़ों प्लेनेट अभी एक प्लेनेट पे जमीन में खुदाई करके आपने कुछ हीरे जवारा डायमंड निकाले तो उ विश्व मने यूनिवर्सल स्केल पे एक डायमंड या कितना ढग बना दो डायमंड्स का क्या उसकी वैल्यू है कुछ नहीं है तो इनके लिए ईश्वर के लिए यह सब चीजों की कोई कीमत नहीं है हालांकि कि वो यदि चाहे तो आपका मन भर कर के हीरा जवाहरात दे सकते हैं तो ठाकुर यदि चाहे ठाकुर ने एक बार कहा था कि मैं यदि चाहूं तो कमार पुकुर को सोने से पूरा मढ करके जा सकता हूं पूरा सोने का वर्ख उसके ऊपर लगा के जा सकता हूं उतनी ठाकुर में कैपेसिटी है किंतु इतना सब सोना कामर पुकुर में डाल देने से क्या होगा यदि चरित्र नहीं बनेगा यदि संस्कार का परिवर्तन नहीं होगा तो सिर्फ धन और लक्ष्मी प्राप्त करके तो मनुष्य को कुछ मिलने वाला नहीं है इसीलिए ठाकुर ने कहा था कि मुझे सिद्धाई नहीं चाहिए सिद्धाई अर्थात की मैजिकल पावर बंगोली वर्ड है हिंदी में कहेंगे सिद्धि तो ऐसे ही कोई मैजिकल पावर आ गया तो ठाकुर कहते हैं दक्षिणेश्वर डिस्पेंसरी या हस्पताल जैसा कुछ बन जाएगा लोग आकर के लाइन लगा कर के खड़े रहेंगे कहेंगे ठाकुर हमारा यह असु दूर कर दो यह बीमारी ठीक कर दो यह सांसारिक समस्या का निवारण ला दो जितनी भी समस्या है लाकर के ठाकुर के पास डालेंगे कहेंगे इसका निवारण करो एक्चुअली समस्या का निवारण यह जगत में समस्या जो आती है वह हमको इनकरेज करने के लिए चरित्र निर्माण करने के लिए साधन पथ पर अग्रसर होने के लिए यह सब कठिनाई और बाधा हमारे ये इंद्रियों के विषय के भोग की प्रति अपना जीवन जो दौड़ रहा है तो इस जीवन में बाधा इसलिए खड़ी करते हैं कि यह जो जीवन है वो उसके परे भी कुछ है उसका संधान जानो तो इसके लिए यह जितने भी ट्रायल्स और ट्राइबेन यदि इंग्लिश में कहे अपने जीवन में जितनी भी समस्याए जितनी भी चैलेंज आती है वी शुड कन्वर्ट दोस चैलेंज इनटू अपॉर्चुनिटी चैलेंज को सीधा अपॉर्चुनिटी में ईश्वर की ओर जाने का एक संकेत के रूप में स्वीकार करके ईश्वर की प्रति हमारा दिन प्रतिदिन मन जाना चाहिए ऐसा नहीं है कि घर बार सब छोड़ दो पति पत्नी या तो परिवार इसका केयर करना बंद कर दो ठाकुर के पास हो ठाकुर खुद कहते है ना मास्टर महाशय गए थे तब कि प्रताप का भाई आया था उसके परिवार वालों को छोड़ कर के तो मैंने डांट कर के कहा कि अपने परिवार का ख्याल तुम नहीं रखोगे कि तो क्या तुम्हारे पड़ोसी रखेंगे तो इस तरह तरह से ठाकुर भी इनकरेज नहीं करते थे कि यदि फैमिली के रिस्पांसिबिलिटी है तो उसको नेगलेक्ट करो रिस्पांसिबिलिटी के भीतर में रह कर के भी धर्म हो सकता है हिंदू धर्म कोई भी धर्म हो यह सबसे बड़ा उदाहरण है इस बात का क्रिश्चियनिटी कहो ने बुद्धिज्म कहो हिंदू धर्म कहो कोई भी धर्म इस तरह से एपल अपॉर्चुनिटी प्रदान करता है इनफ अपॉर्चुनिटी देता है कि संसार में रह कर के घर में रह कर के भी हम साधन पथ के ऊपर में बड़ा ही सीरियसली सोच सकते हैं बड़ा ही सीरियसली अग्रसर हो सकते हैं तो यह चैलेंज इज एन अपॉर्चुनिटी फॉर अस अभी यदि मान लीजिए कि ठाकुर के पास में इस तरह का मैजिकल पावर आ गया कि दरिद्रता जद अपने खुद के घर में है ऐसा बोला कि चलो धन और संपत आ जाओ यहां पर और सही सही वो हीरा सोना जवाहरात सोना महर से सब भर जाएगा तो फिर कोई कोई अपना चरित्र निर्माण करने के बारे में सोचेगा ही नहीं कोई यह नहीं कहेगा कि अच्छा अच्छे कर्म करके साधन भजन करके जीवन का गठन किया जाए सभी लोग आकर के मिन्नत मानेंगे और कहेंगे ठाकुर के पास में यह ले लो अभी मेरे पास में से इतना धन है मैं आपको इतना दक्षिणा देता हूं इतना दान देता हूं मैं यह व्रत करूंगा आप यह लेकर के हमको सामने में यह चीज दे दो एक दुकानदारी जैसा हो जाएगा एक दुकान बन जाएगा माने जो लक्ष्मी खुद जिनकी धर्म पत्नी है सहधर्मिणी है उनको आप क्या हिरा जवाहरा देकर के उनको यह कहेंगे कि प्रलोभन देंगे तो इसके लिए ठाकुर जितने भी अवतार आते हैं दरिद्र के घर में जन्म लेते हैं ठाकुर ने कहा था जब कैंसर की बीमारी हुई थी कोई कोई पूछता है कि ये हाथ जब हाथ में फ्रैक्चर हुआ था उस समय भी ठाकुर ने कहा था कि ये हाथ टूटा है या इस तरह से कैंसर हुआ है क्यों हुआ है तो ठाकुर कहते हैं लोक बाछा यर जन्ना लोगों को फिल्टर करने के लिए ऐसे लोग जो ठाकुर के पास में कोई आशा रख के आते थे कि हां अपना कुछ अच्छा हो जाएगा सांसारिक जीवन में तो वे लोग यह सोच कर के आना बंद कर दिए कि अरे ठाकुर अपनी खुद की हाथ की अपने खुद के कैंसर की ट्रीटमेंट नहीं कर सकते तो मेरा तो क्या अच्छा करेंगे बोलकर के बहुत सारे लोग ने आना बंद कर दिया था उस समय ये ब्राह्मण समाज वाले भी उस समय केशव सेन के डेथ के बाद में मृत्यु के बाद में उन लोगों के साथ में भी थोड़ा सा यह हो गया था तो देखिए कि धीरे-धीरे करके लोगों का दो ब्रांचेस हो गई दो क्लासेस बन गए एक लोग है एक तरह के कि हम ठाकुर के पास आते हैं क्योंकि वी लव ठाकुर ठाकुर के प्रति हमारी श्रद्धा है ठाकुर के प्रति हमारी निष्ठा है उनके ऊपर हमारा भरोसा है हमको पता है कि हां वह ईश्वर के अवतार है किंतु अवतार के पृथ्वी पर आने का प्रयोजन यह नहीं है कि वह ऐसी जादुई छड़ी घुमा कर के हमारे जितने भी दुख दर्द है उसको मिटा दे उनके आने का प्रयोजन है हमको साधन पथ के ऊपर में बढ़ने के लिए गाइडेंस देना मार्गदर्शन देना सही सही साधना किसको बोलते हैं और साधना के नाम पर जो दुराचार जो प्रवेश कर गए हैं उस समय धर्म में उसको किस तरह से समझना यह समझाने के लिए उनका आगमन हुआ है और इवन ठाकुर के जो भक्त यह समझ कर के ठाकुर के पास आते थे कि हां साधना करने के लिए साधना सिखाने के लिए ठाकुर आए हैं उनमें भी ठाकुर की महासमाधि के बाद में दो ब्रांचेस हो गई दो मार्ग बन गए एक तो थे कि रामचंद्र दत्त उन्होंने कहा कि हां आध्यात्मिक उन्नति ही जीवन का सर्वस्व है हमको यह सांसारिक उपलब्धियां नहीं चाहिए किंतु फिर उनका क्या कहना था कि ठाकुर ने हमको स्पर्श किया है 1 जनवरी को कल्पतरु दिन के रूप में रामचंद्र दत्त उसका सेलिब्रेशन करते थे कहते थे कि हां ठाकुर ने हमको स्पर्श किया है जन्म जन्मांतर के कुकर्म हमारे मिट गए हैं तो अभी नाचो गाओ कीर्तन करो यह सब करो हसी खुशी से ठाकुर का नाम लो ऐसा करके वो नगर की तन वगैरह किया करते थे काकड़ गाछी में ठाकुर के अस्थि को रखा था ठाकुर की पूजा करते थे और नगर कीर्तन किया करते थे जैसे कि गौरांग महाप्रभु किया करते थे उनके शिष्य तो दूसरी ओर था कि ये स्वामी जी थे यह राजा महाराज थे लाटू महाराज थे काली महाराज थे इन लोगों का दल उन्होंने कहा कि ना ठाकुर ने तो हमको साधना करने के लिए बोला है सिर्फ यह नहीं कि सांसारिक सुख नहीं चाहिए हां आध्यात्मिक सुख ही सर्वोपरि है किंतु सिर्फ इतना नहीं उससे भी एक स्टेप आगे जाकर के साधना करनी है माने दो मने यह तो और भी आश्चर्यजनक लगता है यदि ठाकुर का आध्यात्मिक संदेश यदि हम समझे कि आध्यात्मिक सुख के भी परे जाना है यह जीवन तपस्या को अर्पित करना है यदि मुक्ति मिले ना मिले तपस्या ही जीवन का रहस्य है यह तो और भी एक स्टेप आगे है मैंने सांसारिक सुख तो नहीं ही चाहिए आध्यात्मिक सुख चाहिए किंतु बाद में कहते हैं कि आध्यात्मिक आनंद है उससे भी परे एक ग्रेटर रिस्पांसिबिलिटी है स्वामी जी ने जब ठाकुर को कहा कि मैं निर्विकल्प समाधि में डूब के रहना चाहता हूं बीच-बीच में थोड़ा सा आऊंगा अपने होश में आऊंगा थोड़ा सा अन्न ग्रहण करूंगा और फिर से समाधि में चला जाऊंगा तब ठाकुर ने क्या कहा था कैसी हीन बुद्धि है तेरी रे मैंने सोचा था तुम एक बड़े वटवृक्ष की तरह होंगे जिसके तले में लाखों लोग आश्र पाएंगे छाव पाएंगे शांति पाएंगे उसकी वजह ना कि अपने खुद के लिए समाधि चाहते हो ये कौन सा सेल्फिश ये तुम्हारा थिंकिंग हैने अद्वैत वेदांत की दृष्टि से मैं यदि यह कहता हूं कि यह शरीर मेरा है और उसकी आध्यात्मिक उन्नति तो यह भी एक स्टेप आप अभी तक नीचे हैं इसके परे भी एक स्टेप है यह पूरा जगत संसार इसके भीतर में एक ही आत्मन है माय रियल आइडेंटिटी मेरा सही स्वरूप यह शरीर नहीं यह मन बुद्धि चित्त अहंकार नहीं सब कुछ मिलकर के यह विश्व ब्रह्मांड बनाता है सबके साथ में मेरा तादात में है सबके साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन है और अल्टीमेटली माय ट्रू नेचर गोज बियोंड एवरीथिंग दैट इज इन दिस यूनिवर्स यह शरीर या हजारों लाखों करोड़ों शरीर यह वृक्ष यह पेड़ यह फूल यह पशु यह पक्षी जो कुछ भी है सबके साथ में मेरा आइडेंटिफिकेशन तो है ही है किंतु मेरा सही नेचर तो इससे भी परे है अहम ब्रह्मास्मि यह ब्राह्मण चेतन जीवन जो कि पूरे यूनिवर्स को पूरे कॉस्मस को ये ये एनिमेट करता है यह प्राण प्रदान करता है यह मेरा सही नेचर है यानी कि देखिए कि एक तो है कि सांसारिक सुख की ओर जाने की वासना दूसरी है आध्यात्मिक सुख की वासना किंतु यह आध्यात्मिक सुख की वासना हमको द्वैत वेदांत की ओर ले जाती है द्वैत मार्ग का यह रास्ता है या थिंकिंग है अद्वैत इससे भी परे है य थर्ड ग्रुप कि अद्वैत कहता है कि मेरा खुद का आध्यात्मिक सिद्धि मेरे खुद की आध्यात्मिक सिद्धि इससे भी परे एक अनंत रास्ता है जो कि मेरा सही गोल है तो ठाकुर तो हमको यहां पर धीरे-धीरे करके एक के बाद एक स्टेजेस चल कर के हमको अद्वैत की ओर ले जाने के लिए आए हैं तो यही ठाकुर यदि जादू चमत्कार करना शुरू कर देते ठाकुर यदि कहते कि हां मां शारदा तो लक्ष्मी का अवतार है सरस्वती का अवतार है तो उनको तो गहने पहने ही चाहिए अरे ऐसा करके किसी को बोल देते अरे धर्मदास लाह को ही बोल देते जिनके ये गहने थे कहते कि तुम हम ही को दे दो अभी यह तुमको वापस लेने की जरूरत नहीं है तो वह खुशी खुशी दे देते ठाकुर जद ये मथुर बाबू को कहते हैं कि मां के लिए गहने बनवा दो तो इमीडिएट मथुर बाबू तो ठाकुर के इतने बड़े भक्त थे जो चाहे वो ठाकुर करने को तैयार थे ठाकुर के पास में इवन जादू चमत्कार करने की जरूरत नहीं थी इतने धनी उनके डिवोटा थे उनके भक्त थे ऐसा चुटकी बजाते जो चाहे वो मां को दे सकते थे किंतु ठाकुर को पता है कि इस तरह से धन और वैभव का यदि एक दिखावा करेंगे तो यह अद्वैत जो कि इवन द्वत के परे है जो कि हमको ट्रेडिशनल स्पिरिचुअलिटी ट्रेडिशनल धर्म जिनको हम समझते हैं उससे भी परे एक गढ़ रहस्यमय अद्वैत पंथ है उसकी ओर जाने की बजाय लोगों का लोग चकाच हो जाएंगे लोगों की आंखें ये ठाकुर वो उदाहरण देते हैं ना यदि भंडार ग्रह में बहुत सारे अ अन्न जब खेत में से आता है बड़े-बड़े भंडार गृह में रखा जाता है अभी चूहे जदी जाकर के सब उसके ऊपर में अपना मुंह डाले और उसको खराब करें उसकी वजह क्या करते हैं थोड़ा सा शक्कर वगैरह वहीं दरवाजे के ऊपर में रख देते हैं तो चूहा जब आता है वो अच्छी मीठी चीज देखता है तो उसी को खा कर के वो मत्त हो जाता है भीतर में इतना बड़ा अन्न का भंडार है वहां पर जाने की वो तसदी भी नहीं लेता वहां जाने के बारे में वह सोचता भी नहीं तो वैसे ही ठाकुर कहते हैं मां लाल चुशी दिए भूले रेखे माने वो रेड कलर की लॉलीपॉप देकर के लाल कलर की लॉलीपॉप देकर के मां हमको भुला कर के रखती है इवन जद हम लोग बहुत सारे लोग सोचते हैं कि हां मैं तो धार्मिक हूं मैं तो मंदिर में जाता हूं मैं तो भगवान पर आस्था रखता हूं सब कुछ है मेरे जीवन में तो फिर क्या कमी है तो ठाकुर कहते हैं कि इसके भी परे एक रास्ता है अद्वैत वेदांत का रास्ता वो इतना समझने में कठिन है कि तो प्रैक्टिस करने में इतना कठिन नहीं है यदि उसको हम सही सही समझ पाए तो एक हायर लेवल ऑफ स्पिरिचुअलिटी विल अनलॉक फॉर अस एक उच्च कक्षा की स्पिरिचुअलिटी का रास्ता हमारे लिए उन्मुक्त हो जाता है हमारे लिए उसका दरवाजा खुल जाता है तो यह अद्वैद वेदांत की ओर ले जाने के लिए ठाकुर का मां का आगमन हुआ है तो जद वे लोग इस तरह की कोई चीप गिमिक में चले जाते तो फिर हमको यह उच्च रास्ते पर जाने की हमको यह भीतर से एक उत्कंठा हो वो नहीं होगी इसके साथ में वह दूसरा भी एक सुंदर एक घटना है वो ठाकुर मां चंद्रा मणि श्यामा सुंदरी देवी मां की मां एक बार कहती थी कि अरे मेरी बिटिया शारदा ने मां डाक की पुकार भी नहीं सुनी बच्चे लोग मां मां करके पुकारते हैं तो मां के हृदय में कितना आनंद आता है तो मेरी बटिया शारदा उसको यह मां होने का आनंद नहीं मिलेगा तो ठाकुर ने उस समय मां की वो श्यामा सुंदरी देवी की बात सुन ली थी तो ठाकुर ने क्या कहा कि मां तुम चिंता मत करो एक दिन ऐसा आएगा कि मां शारदा के इतने सारे बच्चे हो जाएंगे कच्चे बच्चे कि सबकी मां मां पुकार सुनकर के मां बेचारी परेशान हो जाएगी तो हुआ भी सही दोनों चीज हुई चंद्रमणि देवी ने जो कहा कि हां मेरा बेटा तुमको जितना हीरा जवाहरा धन गहने चाहिए वो दे देगा आज मैंने देखिए बहुत सारी तरह से इस बात को आप एनालाइज कर सकते हैं बहुत सारे रास्ते से आप इसको देख सकते हैं एक तो है कि हां अद्वैत वेदांत का प्रचार करने के लिए ठाकुर ने ऐसा कोई चीप गिमिक कोई मिरेकल या मैजिक नहीं किया था किंतु आज दूसरी दृष्टि से देखिए थोड़ा सा एक मैंने थोड़ा सा जमीन प आकर के जद देखे रामकृष्ण संघ के पास में रामकृष्ण संघ के डिवोटा के पास में आज इतना धन वैभव है कि हम चाहे तो मां के सामने लाखों करोड़ों जवाहरात उनके सामने लाकर के उनके चरणों में अर्पित कर सकते हैं तो इस तरह से तो चंद्रा मणि देवी की भविष्यवाणी सही सही सही हुई है और ठाकुर ने जो कहा था कि इतने सारे कच्चे बच्चे आएंगे मां के सामने कि मां बेचारी मां मां करके आवाज सुन कर के परेशान हो जाएगी आज वही चीज है हम लोग सुबह से सुबह को उठ कर के मां का नाम देते हैं सोने के समय मां का नाम लेते हैं मां का पता नहीं क्या अवस्था होती होगी सब समय वो एक सुंदर घटना है ना एक बार जयराम बाटी में एक त्यागी संतान मां के साथ में रह रहा था तो व त्यागी सन्यासी महाराज तो एक दिन मध्यरात्रि को पता नहीं कोई ऐसा अर्जेंट काम आ गया कि मां के साथ में वह मशवरा करना मां की एडवाइस लेना वह आवश्यक हो गया था तो आधी रात को उन्होंने बिल्कुल हल्के आवाज में पुकारा मां जद मां है तो मां के साथ में बात करेंगे तो इमीडिएट मां ने कहा हां बेटा क्या कर क्या कह रहे हो अभी अंधेरा है वहां तो आज की तरह इलेक्ट्रिसिटी वगैरह नहीं है कि फट कर के स्विच ऑन किया और सब दिखने लगे तो अंधेरे में मां ने इमीडिएट कहा हां बेटा तो ये सन्यासी महाराज थोड़े से आश्चर्य चकित हो गए तो उन्होंने कहा मां क्या नींद नहीं आ रही थी तो मां ने क्या कहा कि देखो बेटा कि मैं कैसे सोऊ ये सब लड़के आकर के मेरे पास में से दीक्षा लेकर के जाते हैं और फिर जप करने का तो इनको समय भी नहीं मिलता तो मैं पूरी रात जग करके उनके लिए जप करती हूं देखिए मां ने ऐसा कहा था तो मां मां अभी भी हमारे लिए जप कर रही है देखिए स्वामी जी का एक सुंदर इंसिडेंट है अ अमेरिका गए थे और ये मिसेस हेंस ब्रो एलिस हेंब्रो उनकी बहुत अच्छी डिवोटा हो गई थी उस समय ये पसडी लामे वगैरह जब गए थे स्वामी जी तो वहां पे तो सन फ्रांसिस्को में सन फ्रांसिस्को वो ईस्ट कोस्ट का सिटी है वेस्ट कोस्ट का सिटी है सॉरी ईस्ट कोस्ट में यह न्यूयॉर्क आता है और वेस्ट कोस्ट में यह सान फ्रांसिस्को आता है तो पहली मुलाकात के दरमियान स्वामी जी गए थे ईस्ट कोस्ट और यह सेंट्रल अमेरिका और मिड ईस्ट जिनको जिसको कहते हैं और सेकंड मुलाकात में गए थे वेस्ट कोस्ट सान फ्रांसिस्को तो सन फ्रांसिस्को में मिसेस एलिस हेंस ब्रो उनकी बहुत ही अच्छी डिवोटा हो गई थी बड़ी ही प्रभावित हो गई थी स्वामी जी से तो स्वामी जी जब सन सॉरी कैलिफोर्निया शहर सान फ्रांसिस्को तो सिटी है कैलिफोर्निया स्टेट है तो कैलिफोर्निया स्टेट के सान फ्रांसिस्को सिटी में जब स्वामी जी प्रवचन देने के लिए गए थे तो ये मिसेस हेंस ब्रो उनके साथ में टर्क स्ट्रीट बोलकर के एक जगह है वहां पर एक फ्लेट में उनके साथ में रह रही थी अभी हुआ ऐसा कि स्वामी जी सुबह-सुबह अपना क्लास करते थे राजयोग के ऊपर में और मिसेस हेंस ब्रो अभी क्या है कि स्वामी जी के लिए सुबह से ही खाना पकाना पड़ेगा तो उनको क्या है खाना पकाते पकाते बड़ी देर हो जाती थी कभी-कभी तो जब क्लास शुरू होने का समय हो गया है तो स्वामी जी आकर के किचन में उनको पुकारते थे कि अरे चलो क्लास का समय हो गया है तो बेचारी मिसेस हेंस ब्रो वो कहेगी कि स्वामी जी अभी तो आपका खाना में पका रही हूं हूं तो मैं खाना पकाऊ कि मैं आपका खाना छोड़ कर के आपका क्लास अटेंड करूं तो स्वामी जी कहते हैं ठीक है ठीक है डोंट वरी अभी वो राज्य के क्लास चल रहे थे तो मेडिटेशन स्वामी जी सिखा रहे थे तो स्वामी जी कहते थे कि ठीक है डरो चिंता मत करो मैं तुम्हारे लिए मेडिटेशन करूंगा आई विल मेडिटेटर यू तो मिसेस हेंस ब्रो उस तो बड़ी निश्चिंत होकर के स्वामी जी का खाना पकाया करती थी अभी इस घटना को बहुत साल बीत गए हैं स्वामी अशोकानंद जी जी महाराज उस समय कैलिफोर्निया में है और उनको पता चला कि मिसेस हेंस ब्रो अभी भी जीवित है तो उन्होंने वेदांत सोसाइटी में मिसेस हेंस ब्रो को बुलाया और कहा कि अच्छा स्वामी जी के साथ में आपके वो जो दिन आपने बिताए वो रेमसंस हमको बताइए स्मृति हमको बताइए तो हम उसको लिपिबद्ध कर लेते हैं भविष्य की जनरेशन को स्वामी जी के बारे में बहुत नई-नई चीज जानने की उनको मौका मिलेगा तो मिसेस हेंस प्रो जब यह घटना का का वर्णन करती है फिर आखिर में क्या कहती है कि आई फील दैट स्वामी जी इज स्टिल मेडिटेटिंग फॉर मी मुझे लगता है कि स्वामी जी अभी भी मेरे लिए ध्यान कर रहे हैं देखिए कि कितना सुंदर भक्त और भगवान का ये रिलेशन है यदि दो मार्ग है जैसे हमारा कल डिस्कशन हो रहा था एक साधन मार्ग है एक शरणागति का मार्ग है साधन मार्ग में हम क्या करते हैं कि हम अपना पुरुषार्थ लगा करके अपनी इंद्रियों का निग्रह कर कर के अपने जीवन को डिसिप्लिन करके तपस्या के जितने भी रास्ते दिखाए गए हैं जो मेथड्स दिखाई गई है उसका अनुष्ठान करते हैं जैसे कि सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठकर के ब्रह्म मुहूर्त में जप ध्यान करना या तो फिर बाद में पूजा पाठ करना स्वाध्याय करना अपने मन को डिसिप्लिन करना जितने भी नेगेटिव थ आते हैं अपने विल पावर को इतना स्ट्रांग करना कि कोई भी नेगेटिव थॉट जैसा अपने सामने आए उसको सीधा सधी काट दे यह साधना का मार्ग है पुरुषार्थ का मार्ग है दूसरा मार्ग है शरणागति का मार्ग यह शरणागति का रास्ता अर्थात की संपूर्ण रूप से अपने अहंकार है अपना अहंकार संपूर्ण रूप से ईश्वर को बलिदान स्वरूप दे देना जिससे क्या हो कि ईश्वर जो कहे वो सही इनका खुदीराम का था रघुवीर के वो तो पूजक थे तो बीच-बीच में कहा करते थे जहा कोरेन रघुवीर जो करे रघुवीर सो सही तो वैसे ही ये शरणागति का रास्ता है जो ईश्वर हमारे लिए करे वो ठीक है ऐसा करके संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाना और यह कभी-कभी हमको लगता है कि अरे ये साधना करना मन को डिसिप्लिन करना ये तो कितनी कठिन चीजें है चलो शरणागति हम स्वीकार कर लेते हैं किंतु गिरीश घोष का जो उदाहरण हमको बताता है कि शरणागति का रास्ता इतना आसान नहीं है जब उनके घर में कोई बहुत बड़ी दुर्घटना हो गई गिरीश घोष कहते हैं रोने के लिए भी मेरे पास अधिकार नहीं है वो अधिकार भी मुझे ठाकुर देंगे तो यह शरणागति का रास्ता इससे भी कठिन रास्ता है मने साधना के रास्ते से आइडियल स्पीकिंग रामकृष्ण संघ का जो रिकमेंड करता है सबको कि सभी मार्ग का एक साथ में अनुष्ठान करो मैं यदि प्योर साधना के रास्ते में जाऊंगा प्योर पुरुषार्थ के रास्ते में वह मेरे लिए बहुत ही कठिन हो जाएगा और प्योर शरणागति संपूर्ण रूप से शरणागत ये एक रास्ते पर जाऊंगा वो भी कठिन होगा किंतु यथा शक्ति साधना यथाशक्ति पुरुषार्थ और यथाशक्ति शरणागति तो ये दोनों का कॉमिनेशन करके और यहां पर तो चार योग की बात है कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान चारों का यथाशक्ति समन्वय कर करके हम आसानी से यह धर्म का रास्ते पर हम यात्रा कर सकते हैं तो यह एक पूरा बैकग्राउंड है यह एक घटना हमको कितना सब कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है कि ईश्वर के प्रति शरणागत होंगे तो सबसे पहले तो आध्यात्मिकता जो उसके जो हमको सहज सहज रूप से जो हम जानते हैं जनरली किताबें पढ़कर द्वैत का जो एक पूरा थिंकिंग है इससे भी परे वैद का एक रास्ता है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं और यदि जानते भी होंगे आजकल जिस तरह से शंकराचार्य को सभी लोग प्रमोट कर रहे हैं इंडियन गवर्नमेंट भी प्रमोट कर रही है तो इस तरह से शंकराचार्य कौन थे उन्होंने क्या कहा था थोड़ा-थोड़ा अवेयरनेस समाज में फैल रहा है किंतु जो इसका जो हार्ट है अद्वैत वेदांत का वह थोड़ा सा जैसे क्वांटम डायनेमिक्स के बारे में वो नेल्स बोर कहा कहता है कि यदि आप क्वांटम डायनेमिक्स को ठीक ठीक पढ़े हैं वो उसका टेस्ट क्या है आपको क्वांटम डायनेमिक्स में सब कुछ पागलपन जैसा दिखेगा ऐसा आपको यदि आपको यह एहसास होता है तब लगता है कि आपने ठीक ठीक क्वांटम डायनेमिक्स को पढ़ा है क्योंकि इतनी सारी कंट्रक्शन है अद्वैत वेदांत भी यदि थोड़ा सा देखेंगे पैराडॉक्स ही पैराडॉक्स दिखेंगे शुरू में किंतु वो कंट्रक्शन है ये समझ में आना दैट इज द टेस्ट ट इज द साइन दैट यू आर स्टडिंग क्वांटम डायनेमिक्स आप क्वांटम डायम आप अद्वैत विदान स्टडी कर रहे हैं ये उसकी साइन है कि आपको विरोधाभास विचित्र काए पागलपन देखना शुरू हो जाएगा किंतु धीरे-धीरे करके अद्वैत वेदांत के हृदय को जब हम वहां तक पहुंचेंगे तब इतना सब कुछ आसान लगने लगेगा ठाकुर ने कितना सरल शब्दों में अद्वैत वेदांत समझाते हैं कि जब नेती नेती करके हम सीढ़ी चढ़ते हैं तब हम सोचते हैं कि यह ये ये देह मन बुद्धि चित्त अहंकार सब कुछ आत्मन नहीं है जड़ है चेतन नहीं इसका त्याग करो किंतु नेति नेति करके जब आपको अनुभूति होती है अद्वैत अनुभूति तब जगत इति इति में परिणत हो जाता है यह देह मन बुद्धि चित्त अहंकार यह भी ईश्वर मय ही है तो यह जड़ को चेतन में कन्वर्ट कर देता है अद्वैत अनुभूति यह जो जो कुछ हम देखते हैं मैं यह देह यह मेरे बंधु बांधव यह मनुष्य जाति यह पृथ्वी पेड़ पौधे पशु पक्षी जो कुछ भी दिखता है सब कुछ चैतन्य मय हो जाता है इनके प्रति अपना एटीट्यूड कंपलीटली चेंज हो जाता है जब तक मैं यह मैं जब साधना करता हूं मैं कहूंगा कि अरे यह विषय के भोग है इससे संपूर्ण रूप से दूर चले जाओ किंतु जब अद्वैत अनुभूति होती है तब यह विषय के भोग के भीतर में भी आप रहेंगे आपको कोई यह भोग नहीं दिखेगा देखिए कि रामकृष्ण मिशन मठ की जब बेलूर मठ में स्थापना हुई थी तब इस तरह का मिसअंडरस्टैंडिंग बहुत लोगों का हो गया था य एक के बाद एक ऐसी घटनाएं हुई है वहां के बाली म्युनिसिपालिटी ने हमारे ऊपर में टेक्स्ट डाल दिया था क कि कररी यह तो कोई ट्रेडिशनल मठ तो दिखता नहीं है यह लोग तो बड़े ही भोगवा में रहते हैं वो जो वहां के ब्राह्मण लोग थे लोकल वे लोग मठ में आते नहीं थे कहते थे कि साधु लोग तो ये बड़े-बड़े अच्छे से जो खाट लेकर के आए हैं बेड उसके ऊपर में ये लोग सोते हैं फिर वो एक एक डिवटी ने पहली बार महापुरुष महाराज को बारे में सुन रही थी लेडी डिवटी तो उन्होंने कहा कि अरे महापुरुष तो महापुरुष तो गाछ थाके इनी की रकम महापुरुष अर्थात कि हमने तो सुना है कि महापुरुष तो पेड़ पर रहते कते हैं म महापुरुष ऐसे शब्द है जैसे कि परमहंस एक पदवी है तो एक महापुरुष भी एक पदवी है तो महापुरुष किनको बोलेंगे तो जो कि पेड़ के ऊपर रहते हैं त्यागी है उनको महापुरुष बोलेंगे और ये अपने महापुरुष महाराज मठ में रहते हैं बढ़िया मजे से लग्जरी के से घिरे हुए ये किस तरह के महापुरुष है तो देखिए कि ये मिसअंडरस्टैंडिंग होना बहुत सारे लोगों के मन में था राजा महाराज खास करके राजा महाराज को अपने भक्त इतना सब कुछ उनको अच्छी-अच्छी चीजें खाने के लिए पहनने के लिए वगैरह देते थे राजा महाराज का एक चित्र है फोटोग्राफ है उनकी बर्थडे प उनको राजा की तरह सजाया गया है सर के ऊपर में मुकुट पहना है और बहुत अच्छे वस्त्र पहने फोटोग्राफ भी है तो ऐसा फोटोग्राफ देखेंगे तो लोगों को लगेगा अरे ये लोग त्यागी है ना कि क्या त्याग के नाम पर लोगों को ठग रहे हैं भोग कर रहे हैं अभी बाहर से देखेंगे तो जो एक ऐसा धार्मिक व्यक्ति जो कि झूठ मूठ का गेरवा पहन कर के धर्म का का नाम लेकर के लोगों को लूटता है और पैसा इकट्ठा करता है और ऐसे सही सही त्यागी जिनके लिए धन संपत्ति ऐसी कोई मैटर करना ही बंद हो गया है मैं त्यागी हूं मुझे त्याग करना है बात ही चली गई है अद्वैत वेदांत की अनुभूति प ये लोग बैठे हैं पैसा आए जाए कोई फर्क नहीं पड़ता तो लो ऐसे लोगों को दोनों बाहर से समान दिखते हैं वह एक प्रोफेसर की बात है कि एक बार आया था प्रोफेसर ने कि कोई ऑफिसर बड़ा एकने जिसको कि भद लोग भले बांगला ते माने एक प्रतिष्ठित लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्ति बेलूरमठ में बोला कि प्रेसिडेंट से बात करनी है तो प्रेसिडेंट कहां है तो बोला वो तालाब के किनारे बैठ कर के मछली पकड़ रहा है तो वो जा कर के देखा बोला मछली पकड़ने वाले साधु को मुझे नहीं मिलना है क्या है ये साधू ऐसा बोल कर के वापस चला गया ठाकुर की कृपा से कुछ दिनों के बाद अकलाई और वापस आया सोचा कि नहीं नहीं बाहर से जो दिखता है उसका तो ठीक-ठीक अनुमान करना उसका चरित्र के बारे में तो ठीक नहीं है फिर जब राजा महाराज से साथ बात करना शुरू किया तब लगा कि अरे मैं तो कितना बड़ा गलती करने को जा रहा था तो जब अद्वैत वेदांत की अनुभूति होती है तब होता है इति इति इति सब कुछ इवन ये मन बुद्धि चित्त अहंकार ये पैसा ये जवाहरात ये सब कुछ ये ईश्वर मय है इसका त्याग नहीं करना है इसके साथ में किसी भी तरह की लिप्सा या स्पृहा नहीं रखनी है जीवन होना चाहिए जगत कल्याण के लिए तो ये पूरा जर्नी है अद्वैत वेदांत का जो ठाकुर हमको समझाने के लिए आए थे यदि वह जादू चमत्कार करते तो आध्यात्मिक जगत के बारे में अपनी अंडरस्टैंडिंग इतनी स्थूल लेवल पर रह जाती कि वह जो हायर सब्लाइम लेवल्स जो स्पिरिचुअलिटी के है वहां पर जाने की अपनी स्पृहा ही नहीं होती उत्कंठा ही नहीं होती इसके लिए ठाकुर का यह पूरा लीला बढ़ कर के हमको अद्वैत वेदांत की ओर जाना है यह इसका आखिरी कंक्लूजन है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा