Invocation
हमने देखा कि किस तरह से मां ठाकुर को भुला कर के फुसला करके पटा करके वह ज्यादा दूध पिलाती थी और अभी हमने यह भी देखा कि किस तरह से गंभीरानंद जी महाराज मां का यह जो भाव है ठाकुर के प्रति उसका किस तरह से एनालिसिस करते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं कि श्री मां संभव तो सरल विश्वासी परेर ऊपर निर्भर शल और बे हिसाबी ठाकुर के निजर जुक्ति तेही परास्त कोरिया दुग्ध पाने प्रोच तो करी ते चाहिया लन ठाकुर थे सरल विश्वासी मां के ऊपर में निर्भर शल और दूसरे थे बे हिसाबी बे हिसाबी क्यों एक बार जब उनकी सैलरी कम हो गई कैलकुलेशन करने में कुछ गलती हो गई होगी उनको तो थोड़ा सा कम उनको मिला रुपया उस महीने तो माने कहा कि जाइए आप खजांची को जाकर बोलिए
Dakshineshwar Kali Temple
कि इस महीने की जो सैलरी है वह थोड़ी कम है तो ठाकुर ने क्या कहा छी छी मैं क्या हिसाब करूंगा हिसाब करने के लिए तो ठाकुर का क्या था कि वो एक बार टाका माटी माटी टाका करके वो पैसा गंगा में फेंक दिया है तो फिर अभी वोह टाका का अर्थात कि रुपया टाका अर्थात रुपया या पैसा तो फिर वो रुपए का हिसाब करने की क्या आवश्यकता है ठाकुर का यह भाव था तो माने उसी युक्ति देकर के के ठाकुर को कहा कि यदि वह पैसों का हिसाब नहीं करते हैं तो फिर यह दूध पीते हैं उसका क्यों हिसाब करने की जरूरत है हालांकि मां ने यह शब्द यूज नहीं किए थे यह मैं कह रहा हूं तो देखिए कि ठाकुर मां ठाकुर और मां य दोनों का कैसा यह सुमधुर संबंध था और इसी संबंध के बारे में गंभीरानंद जी महाराज अभी आगे क्या कहते हैं श्री मायर उद्देश्य जहाई होक ना केनो मां का उद्देश्य भले चाहे कुछ भी हो श्री रामकृष्ण अनुपम त्याग और सत्य निष्ठा एवं श्री मायर अनब पति सेवा आग्रह म कखन कखन जागतिक नियम विरोध उपस्थित होया लोको शिखा थे एक अपूर्व रोशर संचार करीतो देखिए एक तो है कि जब ठाकुर का त्याग अनुपम त्याग और सत्य निष्ठा एक और है ठाकुर का अनु अनुपम त्याग और सत्य निष्ठा दूसरा दूसरी ओर है कि मां का स्नेह पति स्ने पति सेवा के प्रति उनका आग्रह इन दोनों के बीच में कभी-कभी कुछ तरह का क्लेश हो जाता था विरोध हो जाता था और यह जब विरोध खड़ा होता था तब लोक शिक्षा के लिए एक अपूर्व रस का संचार होता था लोक शिक्षा के लिए एक बड़ा ही सुमधुर प्रसंग उपस्थित होता था यहां पे है ठाकुर जगत त्यागी उनका एक ही लक्ष्य है जीवन में कि विभिन्न पंथ के माध्यम से विभिन्न रास्तों के आध्यात्मिक पथ पर चलकर उस पथ के ऊपर में जो अंतिम लक्ष्य निर्देशित किया गया है उसको प्राप्त करना और एक बार एक उन्होंने जो मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर लिया आत्मज्ञान या ब्रह्म ज्ञान तो फिर वह ठाकुर इस जगत में रह रहे हैं क्योंकि उनके माध्यम से लोक कल्याण का कार्य हो रहा है यह गुलाम भारत देश और यहां पर धर्म के नाम पर उस समय जो अनाचार चल रहा था उसमें ठाकुर सनातन धर्म का प्रकाश डालेंगे तो यह था ठाकुर के इस लोक में रहने का रहस्य और यहां पर मां है मां का था कि मातृ प्रेम और स्नेह से उनका हृदय भरपूर था और उनकी प्रति पति सेवा के प्रति एक बड़ा ही आग्रह था बड़े ही स्नेह से अपने पति की सेवा करती थी तो यहां पे मां का है सेवा भाव और ठाकुर का है अलगारी भाव या तो कहेंगे कि ईश्वर भाव तो यह सेवा भाव और ईश्वर भाव इन दोनों के बीच में कभी-कभी एक तरह का विरोधाभास खड़ा होता था क्योंकि ठाकुर चाहते थे कि उनका जीवन 100% जो आदर्श है वैल्यूज है आध्यात्मिक जीवन की उसके ऊपर में गठित हो रचित हो यहां पर मां का पूरा जीवन ही था कि पति की सेवा को समर्पित वह एक कहानी ठाकुर कहते हैं ना कि ककी बकी भसम करा नाई अर्थात कि एक साधु था तो साधु वन में से जा रहा था फिर वहां विश्राम के लिए कुछ रुका और वहां पर पेड़ के ऊपर में एक दो पंखी है व दो पखी बड़े कलरव कर रहे थे तो अभी उसके कलरव से यह साधु के विश्राम में थोड़ा सा यह विघ्न उपस्थित हुआ तो यह साधु ने क्रोध के क्रोध से उसने इस पंखी के सामने देखा अभी क्रोध भरे नयनों से जैसे पंखियो के सामने देखा एक वैसे ही अग्नि की एक ज्वाला उनकी आंखों में से प्रकट हुई और दोनों पंखियो को भस्मी भूत कर दिया तो अच्छा ठीक है अभी यह साधु खुश हो गया कि देखिए मेरे तपस का इतना फल है कि जो भी मेरे रास्ते में बाधा उत्पन्न करेगा उसको मैं भस्मी भूत कर सकता हूं तो ऐसा एक गर्व उसके मन में हो गया फिर वह शहर में गांव में भिक्षा करने के लिए जाता है अभी एक घर के सामने जाकर के खड़ा रहा वहां पर भिक्षा न देही बोलकर के खड़ा है और वहां भीतर में से कोई आ नहीं रहा है एक स्त्री ने कहा कि अच्छा आप ठीक है थोड़ा सा ठहर मैं अपने पति की सेवा कर रही हूं तो यह साधु बड़ा ही क्रोधित हो गया कि अरे मैं साधु हूं और तुम गृहस्थ हो मेरी सेवा करना तुम्हारा धर्म है और मैं मुझे भिक्षा नहीं देकर के अपने पति की सेवा करती हो ऐसा करके क्रोध किया उसको लगा कि यह जो स्त्री है यह वह भी भस्मी भूत हो जाएगी तो स्त्री ने घर के भीतर में से ही कहा ठाकुर यह काकी और बकी अर्थात कि कौवा और यह एक एक तरह का हंस जो दो पंखी को जला दिया था उसको भस्मी भूत करने वाली बात नहीं है अर्थात कि उनके क्रोध से पंखी जल जाएंगे किंतु जो पतिव्रता स्त्री है जो कि अपना पूरा मन प्राण देकर के अपने पति की सेवा करती है उनके ऊपर में यह साधु का क्रोध भी कार्य नहीं करेगा तो यहां पर भी देखिए कि मां की साधना क्या थी मां की तपस्या क्या थी तो ठाकुर की सेवा करना सर्वप्रथम तो उनके जीवन में यह पर्व उपस्थित हुआ और फिर ठाकुर की महासमाधि हुई तो मां का जो स्नेह है वह हम संतानों के ऊपर में आके बरसा तो मां के जीवन की तपस्या कहो ना कि साधना कहो कि मां के जीवन का उद्देश्य कहो वो यही था अनंत प्रेम इनफाइनों भी जिसको मिल जाए उसका भी जीवन धन्य हो जाए तो यहां पर मां का है स्नेह भाव पति सेवा का भाव और ठाकुर का है कि इस जगत के साथ में उन को कोई लेना देना नहीं है वह कभी वह उनके वस्त्र भी उनके शरीर पर नहीं रहते कभी दिगंबर होकर के नृत्य कीर्तन करते हैं कभी भाव में चले जाते हैं उनकी सेवा करने के लिए सब समय किसी ना किसी को उनके साथ में रहना पड़ता है इतने वह दुनिया से एक दूसरे राज्य में रहते थे हां ऐसा नहीं है कि हम लोग जब दूसरे राज्य में रहते हैं बोलकर के हम लोगों के सामने कभी-कभी एक एब्सेंट माइंडेड प्रोफेसर की एक एक पिक्चर खड़ा होता है वह अपने वह जूता कहां है वह भूल जाता है छाता कहां है वह भूल जाता है इस तरह का ठाकुर का नहीं था ठाकुर जब अलग जगत में दूसरे जगत में रहते थे इसका अर्थ नहीं यह कि वह एब्सेंट माइंडेड थे वह है कि वह ईश्वर के सानिध्य में सब समय रहते थे और यह जगत को पूरे ईश्वर मय देखते थे तो इन दोनों भाव के बीच में कभी-कभी किसी तरह का विरोधाभास उपस्थित होता और इस विरोधाभास से एक अपूर्व मधुमय रस संचित प्रसंग उपस्थित होता हमारी लो हमारी शिक्षा के लिए हमको उपदेश देने के लिए अधिक दुध पान चलते छे इहा जाना मात्र सत्त संध श्री रामकृष्ण की रूप अस्ति बोध करिया लेन एवं तहर फले की रूप अजीनता उदय होया छलो ताहा अमरा लोख करिया च ठाकुर को जब पता चला कि वो परिमाण से ज्यादा दूध पी रहे हैं तो साथ-साथ में ही उनके पेट में अजीर्ण का उदय हुआ अजीर्ण रोग का बार-बार उनको सौज के लिए जाना पड़ा तो ठाकुर क्या थे कि ठाकुर थे सत्य संध एक बार उन्होंने अपने मन में ठान लिया कि हां मुझे यह करना है तो जगत पूरा उनके साथ में परिवर्तित होता था हमको पता है कि ठाकुर जब महावीर भाव की साधना करते थे तो वह पूंछ निकलना शुरू हो गया था जो यह उनकी स्पाइनल कॉर्ड है स्पाइनल कॉर्ड के आखिर का यह जो हड्डी है वह बढ़ना शुरू हो गया था जैसे कि बंदर की पूंछ होती है उस तरह से जब ठाकुर सखी भाव से साधना कर रहे थे मधुर भाव से साधना कर रहे थे तब उनके शरीर में से वो जो खून निकलता है महीने में एक बार स्त्रियों को इस तरह से उनके देह में भी इस तरह का एक प्रक्रिया शुरू हो गया था तो देखिए कि प्रकृति जो है प्रकृति स्वयं ठाकुर को ठाकुर का जो मन है उसको अनुसरण करती है ठाकुर के मन में एक बात यदि उदय हुई तो उसको तो होना ही होना है इसी इसी के अगले वाले चैप्टर में हमने देखा था कि ठाकुर एक बार किसी को कह रहे हैं हृदय को ना कि रामलाल को कि हां देखो मैंने तो सोचा था मां जब यहां पर पहली बार आई थी तो कहां पर वो इधर उधर वो घूमती रहेगी कहां पर किस समय शौच के लिए जाएगी कोई कुछ कहेगा तो मुझे सुनना पड़ेगा तो किंतु देखो कि मैंने उसको कभी नबत के बाहर में देखा नहीं है ऐसा करके ठाकुर तो प्रशंसा ही कर
Nahabat
रहे हैं किंतु साथ-साथ में मां ने जब यह सुन लिया तो मां को बड़ा ही भय हुआ उन्होंने कहा मां उन्होंने फिर मां भवता आरणी को प्रार्थना की कि ठाकुर को तो मां काली जो है भवता जो है जो देखना चाहते हैं वह दिखा देती है तो फिर अभी ठाकुर के मन में यह बात जद खड़ी उदय हुई है इस बात का उदय हुआ है ठाकुर के मन में जद यह बात आई है कि क्यों मां शारदा को नबत के बाहर कभी नहीं देखा अभी यह बात आने से हो सकता है कि मां भवता सही सही में मां शारदा को नबत के बाहर जाते हुए ठाकुर को दिखा दे तो फिर
Thakur and Ma's rooms in Dakshineswar Kali Temple
मां ने मां शारदा ने मां भवता आरणी को प्रार्थना की थी कि मां तुम मेरी लाज की रक्षा करना तो यहां पर मां को भी पता है कि ठाकुर जब जो देखना चाहते हैं ठाकुर जब किसी चीज का संकल्प करते हैं तो सही में मां काली या तो फिर प्रकृति स्वयं उनके आधीन होकर के उस बात को उस प्रसंग को उनके सामने खड़े कर देते हैं तो यहां पर जैसे ही ठाकुर ने ठाकुर के मन में यह बात जब तक देखिए ठाकुर जब तक ज्यादा दूध पान कर रहे थे उस समय उनको कोई तकलीफ नहीं हो रही थी किंतु जब यह बात उनके मन में आई कि मैं ज्यादा दूध पी रहा हूं तब उनके पेट में समस्या हुई यह बड़ा ही इंटरेस्टिंग है देखिए माइंड ओवर मैटर अब लॉजिकली तो हमको ऐसा लगेगा ना कि जिसका डाइजेशन कमजोर है वह यदि ज्यादा आहार करेगा तो साथ-साथ में ही उसके डाइजेशन में कुछ ना कुछ प्रॉब्लम होगा भले ही चाहे उस व्यक्ति को पता हो ना कि ना हो कि उसने गलती से कुछ खा लिया है अभी जैसे कि देखिए बहुत बार हम लोग बाहर में खाने के लिए जाते हैं होटल में है ना कि कहीं लारी के बाहर में रास्ते के ऊपर में बहुत सारी चीजें विक्रय होती है वह लोग बेचते हैं तो बाहर में जाकर के हम लोग समोसा है ना ढो सा है ऐसा कुछ खा लेते हैं अभी हमको उस समय खाने के समय तो टेस्ट बड़ा अच्छा लगता है किंतु क्या हुआ कि घर आकर के देखा कि खाने में कुछ गड़बड़ हो गया था जिस लोगों ने वह खाना बनाया था वह हाइजीन कहो सैनिटेशन कहो उसका ठीक से ख्याल नहीं रखा था बोलकर के ही घर आ करके अभी पेट में कुछ ना कुछ पीड़ा होने लगी अभी खाने के समय तो पता नहीं है कि हम कुछ गड़बड़ खा रहे हैं उस समय तो टेस्ट बड़ा ही अच्छा लगता है किंतु खाने में जैसे ही गड़बड़ पता चली मतलब पता नहीं भी है किंतु खाना अच्छा नहीं होने से पेट तो रिएक्ट करेगा ही करेगा अपना देह अपना शरीर तो रिएक्ट करेगा ही करेगा ठाकुर का किंतु कैसा है जब ज्यादा दूध पान कर रहे थे उनके मन में ऐसा था कि मैं नॉर्मल परिमाण जितना है उतना ही दूध पान कर रहा हूं तो उनका शरीर भी उनके मन को अनुसरण करता है शरीर भी यही सोचता है कि यह सामान्य परिमाण से जो नॉर्मल क्वांटिटी ठाकुर जिसको गिनते हैं उतना ही दूध पान कर रहा है किंतु जैसे ही ठाकुर के मन में आया कि मैं ज्यादा दूध पान कर रहा हूं वैसे ही शरीर ने भी सोच लिया कि मुझे ज्यादा दूध मिल रहा है और बोल कर के उनके पेट में गड़बड़ होना शुरू हो गई तो देखिए कि ठाकुर का जो मन है वह उनके शरीर को चालित करता है हमारे साथ में होता है कि थोड़े से ही बीमार हुए तो मन में हमारा मन बिल्कुल अशांत हो जाता है कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती नहीं जब ध्यान करने की नहीं स्वाध्याय करने की नहीं पूजा करने की ऐसा लगता है दिन भर लेटे रहे या तो फिर कुछ ना कुछ इस तरह का कार्य करें जिससे कि अपना मन जो है वो उस कार्य में लग कर के देह की पीड़ा को भूल जाए हमारा देह हमारे मन को चालित करता है यहां पर ठाकुर के साथ में था कि ठाकुर का मन उनके देह को चालित करता था ए रूप आर एकटी घटना उल्लेख कोरिले बिषय टी सुगम होई बे यह जो ज्यादा दूध पिला दिया था मां ने ठाकुर को तो किंतु मां किंतु यह जो एक बार घटना हुई कि ठाकुर के मन में यह बात आ गई कि मैंने ज्यादा दूध पी लिया है बोलकर के अभी उनके पेट में गड़बड़ हो गई यह बात देख कर के किंतु मां ने अपना काम नहीं छोड़ा ठाकुर की सेवा करने का देखिए दूसरा एक प्रसंग है छोटा सा है किंतु बड़ा ही सुंदर है एक दिन आहारा आंते श्री रामकृष्ण देखिले ज बेटु आते मोसला नाई एक बार ठाकुर ने आहार के बाद में देखा कि उनका यह जो एक छोटा सा यह होगा डिब्बा जैसा उसके भीतर में मसाला नहीं है अभी यह जो पता है ना यह जो मौरी है फिर ये सौत है वगैरह हम लोग खाते हैं वो बलियारी बोलते हैं जिसको गुजराती में खाने के नानी दाल गुजराती में और एक आता है कभी-कभी यह जीरा जो है जीरे को उसको हल्का सा सेक करके हम लोग अपने पास मुखवास जिसको कहते हैं हम आजकल की लैंग्वेज में तो यह कोईकोई पान खाता है खाने के बाद में यह सब खाया जाता है जिससे कि क्या है कि डाइजेशन में सुविधा रहती है तो कोईकोई खाने के बाद में आहार के बाद में भोजन के बाद में पान खाएगा कोई कभी ऐसा य मौरी है या बलियारी है ना कि ऐसा कुछ खाएगा तो ठाकुर के पास में भी एक छोटा सा एक डब्बा था उसके भीतर में यह सब रहा करता था एक बार ठाकुर ने देखा आहार करने के बाद में उनके डिब्बे में यह सब चीजें मसाला या तो मुखवास नहीं है तरान मुख शुद्धि जन्नो मोसला आनी ते नबत गैलन इसलिए ठाकुर मुख शुद्धि के लिए मसाला लाने के लिए नबत में गए नबत अर्थात की जहां पर मां शारदा रहती थी वहां पे श्री मां तहा के एकट जवान मौरी खाते दिलन एवं कागजर मोड़ के आर किछु दिया बोली ले निए जाओ माने उनको थोड़ा सा यह मौरी वगैरह खाने के लिए दिया और फिर और थोड़ा सा एक पेपर में मुड़ कर के उनको दे दिया यह पता है ना अभी आजकल तो पता नहीं आजकल प्लास्टिक की ये सब बैग आ गई है छोटी-छोटी जब मैं छोटा था और जद बाहर में कुछ छोटी-मोटी चीजें खरीदने के लिए जाते थे इवन डॉक्टर के वहां पर जाते थे तो वह जो दवाई की जो टेबलेट देते थे वह क्या करते थे एक पेपर का टुकड़ा होता था पेपर के टुकड़े में वह सब रख देंगे फिर उसको अच्छे से फोल्ड कर देंगे वो फोल्ड किया हुआ पेपर फिर वह हमको देते थे तो यहां पे भी फिर बाद में यह प्लास्टिक की वो बैग का बड़ा ही ये चला अभी कहते हैं कि प्लास्टिक को भी छोड़ देना है माने अभी ये पेपर बैग बनाते हैं देखिए ये वही पेपर से चालू किया था पेपर में वो फोल्ड करके वो यह सब देते थे ये टेबलेट वगैरह फिर यह प्लास्टिक की बैग अभी वो फिर से किंतु अभी आजकल क्या है पता है रेडीमेड पेपर का बैग चाहिए तभी उसमें आप रख सकते हैं आप अपने हाथों से फोल्ड करना लोग भूल ही गए हैं जापान में वो एक कला है आर्ट है उसको कहते हैं ओरिगामी अर्थात कि पेपर को फोल्ड करके विभिन्न शेप देना उसको वो वो बड़ा ही सुंदर है वो इतनी सुंदर-सुंदर सब आर्ट फॉर्म डिजाइन करते हैं यह जो स्पेस मिशन होते हैं वहां पर क्या होता है रॉकेट को पृथ्वी के ऊपर में से सब सामान स्पेस में ले जाना होता है तो अभी क्या है कि यदि थोड़ा सा भी वेट बढ़ गया तो प्रत्येक 1 ग्राम वेट पे आपको कितना सारा ईंधन जलाना पड़ेगा क्योंकि रॉकेट को आकाश में भेजना उसके लिए जो फ्यूल अर्थात कि जो यह जो ऑक्सीजन वगैरह जो उसका खर्च होता है बड़ा ही भयानक होता है इसलिए आकाश में भेजने के लिए जो कुछ भी आपको करना है यदि सैटेलाइट बनाना है या स्पेस स्टेशन बनाना है या एस्ट्रोनॉट को भेजना है जो भी चीज चीजें साथ में जाएगी उसका साइज बड़ा ही छोटा होना चाहिए बड़ा ही हल्का होना चाहिए तो यह जापान की जो यह आर्ट है ओरिगामी उसके ऊपर में से उसको सीख सख करके उन्होंने सब इंस्ट्रूमेंट बनाए हैं तो जब इंस्ट्रूमेंट की जरूरत होती है जब जरूरत नहीं होती है उसको फोल्ड कर दी एकदम छोटा हो जाएगा और जब इंस्ट्रूमेंट की जरूरत होती है उसको अनफोल्ड कीजिए तो उसकी प्रॉपर साइज का हो जाएगा तो यह ओरिगामी जापान का यहां पर भी मां ने क्या किया ठाकुर के लिए थोड़ा सा मौरी वगैरह एक पेपर में रख कर के पेपर को अच्छे से फोल्ड करके ठाकुर के हाथ में दिया और कहा ले जाइए अभी आपको प्रतिदिन यहां पर आने की जरूरत नहीं पड़ेगी थोड़ा सा अपने पास में रखिए कल जरूर होगी तब खाइए किंतु देखिए ठाकुर का था कि अपरिग्रह कुछ भी अपने पास में नहीं रखना है वह जो एक फेमस कहानी है कि वह पास में ही शंभू मलिक का बागान है बगीचा है गार्डन हाउस वहां पर ठाकुर एक बार गए थे और ठाकुर ने
Shambhu Mallik
उसको कहा कि मुझे पेट में दर्द होता है बीच-बीच में तो यह शंभू मलिक के वहां पर एक चिकित्सालय था एक छोटा सा डिस्पेंसरी था तो इसने ठाकुर को कहा कि आप एक काम कीजिएगा आप जाने के समय थोड़ा सा अ साथ में ले जाइएगा अब यह जो अफीम होता है वह खाने से यदि आप प्रॉपर मात्रा में खाते हैं हैबिट बना देंगे तो दूसरी बात है किंतु प्रॉपर मात्रा में यदि आप उसको थोड़ा-थोड़ा करके खाएंगे तो वह दवाई का काम करेगा तो ठाकुर ने कहा अच्छा ठीक है इसके बाद में जब ठाकुर जाने लगे तो जाने के समय शंभू मलिक खड़ा होकर के भीतर में चला गया ठाकुर भी आ गए बाहर में विदाई
Shambhu Mallick Garden House
लेकर के थोड़ा सा रास्ता आगे गए फिर उनको याद आया कि अरे अफीम लेना तो भूल गया हूं तो फिर वो वापस गए अभी वापस जब गए तो देखा कि शंभू मलिक तो भीतर में चला गया है अपने कमरे में और वह अभी बाहर आएगा नहीं किंतु जो आदमी यह चिकित्सालय चला रहा था वह ठाकुर को बड़े अच्छे से पहचानता था और ठाकुर की बड़ी भक्ति भी करता था तो इसने कहा कि अच्छा ठीक है वो तो चले गए हैं किंतु मैं तो आपको अच्छे से पहचानता हूं आपको अफीम चाहिए तो मैं ये दे देता हूं ऐसा ही बोल कर के छोटे से कागज के टुकड़े में वो वो फोल्ड करके अफीम थोड़ा सा ठाकुर को दिया अभी ठाकुर लेकर के जा रहे हैं एकाएक देखिए कि उनके मन उनके जो उनकी आंखों में अंधेरा सा आने लगा पैर इधर-उधर जाने लगे चल ही नहीं पा रहे हैं जैसे कि और किंतु जैसे ही वापस आने को प्रयास किया शंभू मलिक के घर तक तो आराम से उनको रास्ता दिखाई देता है आराम से चल पा रहे हैं और फिर वापस जाने का प्रयास किया काली मंदिर तो फिर से आंखों में अंधेरा आने लगा तब ठाकुर को समझ में आया कि देखिए शंभू मलिक ने वैसे कहा तो था कि जाने के समय अ अफीम लेकर जाइएगा किंतु एक्चुअली उसको पूछ करके तो लिया नहीं है वह जब चला गया था तो उसका वह जो व्यक्ति जहां पे उसका जो कर्मचारी था उसके पास में से लिया है यानी कि एक तरह की चोरी ही हो गई तो जैसे ही अभी देखिए कि यहां पे उल्टा है वहां पे ऐसा था कि ठाकुर को जब पता चला कि मैं ज्यादा दूध पान कर रहा हूं तब उनके शरीर ने रिएक्ट करना शुरू किया यहां पर ठाकुर के मन में कुछ भी नहीं था उनको वो आराम से वोह काली मंदिर जा रहे थे किंतु फिर जो सत्य संधान जिनका मन सत्य के लिए सब समय सत्य के रास्ते को फॉलो करता है व गलती से भी गलती नहीं कर सकता देखिए यह कितना इंटरेस्टिंग है कितने सारे शेड है यहां पर आप कोई भी एक नियम लगा कर के ठाकुर के जीवन को डिस्क्राइब नहीं कर पाएंगे और यह जो पूरा प्रकृति है पूरी जगन माता स्वयं ठाकुर की जैसे कि असत्य से रक्षा कर रही है तो ठाकुर ने फिर वापस गए शंभू मलिक के घर देखा कि वह कर्मचारी भी चला गया था तब उन्होंने जोर से कहा यह शंभू यह लो तुम्हारा अफीम बोलक के व गेट के भीतर में फेंक दिया और तब कहीं जाकर के वापस आने लगे तो एकदम स्पष्ट रास्ता दिखाई दे रहा है तो यहां पर भी देखिए कि पास में कुछ भी रखना नहीं है या किसी को बिना पूछे लेना यानी कि चोरी हो गया यह जो ठाकुर के जो जिसको कहते हैं यम और नियम सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय ईश्वर प्रि दन यह जो पांच यम और नियम है वो इतने दृढ़ भूत रूप से अपने हृदय में बैठ जाने चाहिए तभी जब हम योग शस्त्र के जो उच्च से उच्चतर आयाम है जैसे कि यह धारणा ध्यान और समाधि तभी हम वहां तक जा पाएंगे बहुत बार हमारे मन में संदेह होता है कि मैं इतनी साधना करता हूं इतना जप ध्यान करता हूं फिर भी मेरे आध्यात्मिक जीवन में विकास क्यों नहीं हो रहा है तो विकास नहीं होने का यह जो एथिकल एंड मोरल फाउंडेशन है आध्यात्मिक जीवन का उसको कभी-कभी हम छोड़ देते हैं या कभी-कभी उसके साथ में कंप्रोमाइज कर देते हैं यह एक कारण है तो यहां पर ठाकुर के जीवन में यह एथिकल और मोरल फाउंडेशन इतना गहन था जिसको कहते हैं ना पाताल फोड़ा शिव अर्थात कि ऐसा शिवलिंग जो कि धरती की बिल्कुल यह जो पृथ्वी का जो केंद्र है वहां तक उसकी जड़ जाएगी तो यहां पर भी ठाकुर का यह जो यम और नियम एथिकल एंड मोरल फाउंडेशन जैसे कि पृथ्वी के केंद्र तक इसकी जड़ जाती थी इतना स्ट्रांग था कुछ भी किसी भी तरह का झंझावात इसको हिला नहीं पाएगा तो यहां पे भी जैसे ही मां ने उनको दिया कि यह जो मसाला है मुख शुद्धि है लेक जाइए साथ में ही ठाकुर वह जो अपरिग्रह किसी भी चित का परिग्रह नहीं करना है कोई भी चीज अननेसेसरी अपने पास में नहीं रखनी है तो इस तरह के ठाकुर के साथ में क्या हुआ उहा लैया ठाकुर निजर घरे चोली लेन यह लेकर के ठाकुर अपने घर की ओर अपने कमरे की ओर चले किंतु अज्ञात शक्ति बले असच परमहंस देवेर प पद श कोखे नाग सोजा दक्षिण दिके नबत काछ गंगार धरेर पोस्ता है उपस्थित होलो किंतु जैसे ही यह असंचौरन केट भी जब उनके हाथ में आया तो उनके भीतर में जो जगदंबा या तो फिर यम और नियम से जो दृढ भूत हुआ जो उनका चरित्र है उसने जैसे कि एक तरह से रिबेलियंस में ही जो गंगा है गंगा की ओर जाना शुरू हो गए ठाकुर तखन पथ देख ते पाते छ ना होश ओ नाई ठाकुर को ना ही रास्ता दिख रहा है ना ही उनको किसी भी चीज की होश है और बोली दे छन मां डूबी मां डूबी और बोल रहे हैं मां डूबू मां डूबू अर्थात की क्या वह सही सही में गंगा में जाकर के गिरेंगे देखिए एक छोटा सा एक पैकेट उनके हाथ में दिया उसी से ठाकुर के पैर सीधे उनको गंगा की ओर ले जा रहे हैं मैंने ठाकुर ठाकुर जद ठाकुर कॉन्शियस होते कि यह ग्रहण करना यह मुख शुद्धि का एक छोटा सा पैकेट वो अस संचय हो गया या परिग्रह हो गया तो साथ-साथ में ही ठाकुर उसको मां को दे देते या तो फिर वो अपने हाथ में लेते भी नहीं कि नहीं चाहिए मुझे मैं कल फिर से यहां पर आ जाऊंगा किंतु देखिए कि ठाकुर को खुद को यह पता नहीं है कि वह संचय कर रहे हैं किंतु जो जीवन भर उन्होंने साधना की है साधना से जो तप प्रकट हुआ है तप की शक्ति वो शक्ति अभी उनके मन के ऊपर में हावी हो गई है उनके पैरों को सीधे गंगा की ओर ले जा रही है ना ही उनको कुछ दिख रहा है और वह मां के साथ में मां जगतारिणी जगदंबा के साथ में भव तारिणी के साथ में बात कर रहे हैं कह रहे हैं मां मैं क्या डूबू मैं क्या डूबू गंगा में जाकर के तखन श्री माय दक्षिणेश्वर अबो स्थाने आरंभ मात्र यह घटना जब हुई थी यह घटना उस समय हुई थी जबकि मां दक्षिणेश्वर में सर्वप्रथम रहने के लिए आई थी तीनी शोब देखीते छिले किंतु नव बधु न्याय लज्जा शलाला ताहर पखे अग्रसर होया ठाकुर के रक्षा कोरा संभव होते छलो ना किंतु नववधू की तरह लज्जा शीला मां कमरे और नबत में से बाहर आकर के ठाकुर की रक्षा करें ठाकुर को वहां से बचाए गंगा में डूबते हुए वो उनसे संभव नहीं हो पा रहा था देखिए ऑलरेडी ठाकुर ने कहा था कि मैंने तो उनको नबत के बाहर जाते कभी देखा नहीं है तो यह ऑलरेडी ठाकुर की भी एक वाणी थी और मां का खुद का एक लज्जा शल स्वभाव था कि किस तरह से वो नबत के बाहर में आए शुद्धू उत्कंठा छट फट करी ते छिले सिर्फ उत्कंठा की वजह से भय के मारे छट फट कर रही है एमन समय कालीबाड़ी जनक ब्राह्मण अकस्मात शदी के आशि मां ताहर द्वारा हदय के डाका इया आशु बपो ईते रक्खा पाइ लेन उस समय एकाएक कालीवाड़ा ह्मण वहां पर आकर के उपस्थित हुआ वैसे ही मां ने कहा जाओ हृदय को बुला कर के लाओ और हृदय ने आकर के फिर ठाकुर को
Hriday
बचाया देखिए यहां पर एक प्रश्न होता है कि ब्राह्मण को मां ने क्यों नहीं कहा कि जाओ ठाकुर को बचाओ क्योंकि मां को भी पता था ठाकुर जब भाव में आते हैं जब उनका मन ऊर्ध्वगामी होना शुरू होता है तो सब किसी के हाथों का स्पर्श वह सहन नहीं कर पाते हैं सब किसी का स्पर्श वह नहीं सहन कर पाते इसीलिए मां ने ऐसा कहा होगा कि जाओ पहले हृदय को बुला के लाओ फिर ठाकुर की रक्षा करना देखिए भविया देखा आवश्यक ई देव मानवे सेवा करा कतो दुसाध छलो सोच कर के देखिए कि इस तरह के देव मानव की सेवा करना कितना दु साध्य था कितना मुश्किल था एक बार ऐसी ही एक दूसरी घटना है काशीपुर की काशीपुर में ठाकुर के लिए शशि महाराज ना कि कोई उनका त्यागी संतान एक बागान में से कुछ फल वगैरह तोड़ कर के लाते थे अभी एक दिन ठाकुर ने जैसे ही उसको खाने का प्रयास किया एकाएक देखा कि वह उसको खा नहीं पा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि अरे मैं इसको खान क्यों नहीं पा रहा हूं क्या ये चोरी का फल है ना कि क्या है तो उन्होंने कहा जो ये लेके आया था कि नहीं नहीं हमने तो जो बागान का जो मालिक है बगीचे का जो जिसका बगीचा है उसके साथ में ऑलरेडी बात कर लिया है कि हां हम परमहंस महाशय के लिए यहां से फल वगैरह तोड़ कर के जाएंगे उन्होंने सहमति दे दी है तो फिर यह चोरी का माल कैसे हुआ किंतु फिर भी अब जब ठाकुर नहीं खा पा रहे हैं तब उनको लगा कि नहीं जाकर के फिर से अनुसंधान करना चाहिए देखना चाहिए कि बगीचे में कुछ कुछ परिवर्तन तो नहीं हुआ है उन्होंने उसका जो मालिक था उसके पास में जाकर के उसको पूछा तो मालिक ने कहा कि हां अभी कल ही मैंने बगीचा और किसी को बेच दिया है बगीचे का जो मालिक है वो नया मालिक है अभी नए मालिक के पास में तो परमिशन ली नहीं थी अर्थात कि अब जब बिना परमिशन के वहां से फल तोड़े तो तो चोरी हो गई तो देखिए कि यहां पे ठाकुर को कुछ भी नहीं पता है किंतु फिर भी उस बगीचे के फल ठाकुर नहीं खा पा रहे हैं स्वामी जी भी एक तरह इसी तरह की एक दूसरी घटना का थोड़ी सी डिफरेंट तरह की घटना का वर्णन करते हैं देखा कि एक बार ठाकुर कलकाता गए थे किसी के घर पे तो फिर उनको प्यास लगी तो कहा पानी लेके आई है अभी जो घर मालिक था जिन्होंने बड़ी भक्ति पूर्वक ठाकुर को आमंत्रण दिया था उनका बड़ा भाई ठाकुर के लिए पानी लेकर के आकर के उपस्थित हुआ अब ठाकुर ने जैसे ही गिलास हाथ में लिया पानी पीने का प्रयास किया देखा कि पानी नहीं पी पा रहे हैं तो उन्होंने गिलास वापस रख दिया फिर और कोई जाकर के पानी लेकर आया तब ठाकुर ने फिर से पानी पिया अभी देखिए कि जो प्रथम व्यक्ति जो घर मालिक था जो यजमान था जिन्होंने ठाकुर को आमंत्रित किया था उनका बड़ा भाई जो प्रथम बार पानी लेकर आया था उसने यह जो कंठी सर के ऊपर में तिलक यह सब लगाया हुआ था यह जो धार्मिक व्यक्ति यसा सब करते हैं ना कि सर कपाल के ऊपर में तिलक लगाते हैं गले में माला पहनते हैं हाथों में उंगलियों में अंगूठियां पहनते हैं फिर यह पीतांबरी पहन ते हैं अपने देह के ऊपर में तो ऐसा सब धार्मिक चन्नों वाला व्यक्ति यह पानी लेकर आया था सर्वप्रथम जिसको कि ठाकुर नहीं पी पा रहे थे तो अभी जितने बाकी लोग जो सब थे उन्होंने यह सोच लिया कि अच्छा उस पानी में कुछ गिरा होगा उसकी वजह से ठाकुर ने नहीं पिया होगा किंतु नरेंद जो था स्वामी विवेकानंद भविष्य के वह नरेंद वहीं पे ठाकुर के पास में ही बैठा हुआ था और उसने एकदम स्पष्ट
Naren, Swami VIvekananda
देखा कि पहली बार जो पानी लाया गया था उसमें किसी भी तरह की अशुद्धि नहीं थी तो फिर ठाकुर ने क्यों उसको रिजेक्ट कर दिया अभी नरेद को तो ठाकुर का स्वभाव पता है तो फिर नरेंद्र ने जो घर मालिक था वह उसका मित्र था उसको जाकर के पूछा तुम्हारा जो बड़ा भाई है उसके बारे में कुछ बताओ तो ऐसा नहीं कहा कि ठाकुर ने उसका हाथ का लाया हुआ पानी नहीं पिया इसलिए मैं तुमको पूछ रहा हूं ऐसा कुछ नहीं करके सिर्फ उसके चरित्र के बारे में कुछ प्रश्न किया तो घर मालिक नरेंद्र का मित्र उसने कहा अरे देखो वह तो मेरा बड़ा भाई है उस उसके चरित्र के बारे में मैं कैसे निंदा करूं ऐसा करके एक दो बात ऐसी कही कि जिससे नरेंद्र समझ गया कि हां उसके चरित्र में कुछ ना कुछ गड़बड़ है फिर उसी घर के एक दूसरे व्यक्ति को भी नरेंद्र ने पूछा अभी देखिए नरेंद्र पूरा इन्वेस्टिगेशन कर रहा है तो कि क्यों ठाकुर ने पानी नहीं पिया पहले घर मालिक को पूछा उसने कह दिया कि बड़े भाई की निंदा मैं क्यों करूं कैसे करूं किस मुंह से करूं तो नरेंद्र समझ गया कि गड़बड़ तो है कुछ ना कुछ फिर अभी क्या है सभी घर में बोलने वाले लोगों की तो कमी नहीं होती तो एक दूसरे व्यक्ति को पूछा उसने पूरा चरित्र इस व्यक्ति का बता दिया भले ही चाहे बाहर में यह धार्मिक चिन्ह धारण करता है किंतु उसका चरित्र अच्छा नहीं है तो देखिए कि कु चरित्र व्यक्ति था ठाकुर को तो कुछ भी पता नहीं उसके बारे में फिर भी उसके हाथ के लाया हुआ पानी ठाकुर नहीं पी पाए थे तो देखिए कि यह ठाकुर के भीतर में जो तप की शक्ति थी सत्य की शक्ति थी आध्यात्मिकता की शक्ति थी वो किसी भी तरह से जा मतलब गलती से भी ठाकुर के पास में ठाकुर के भीतर में किसी भी तरह की अशुद्धि या इंप्योरिटी आप पास में भी नहीं आने देगी तो यहां पर भी ठाकुर ने भले ही चाहे मां के हाथ में से ले लिया हो मुख शुद्धि और मां ने भी ऐसा ज्यादा सोच बिना सोचे ठाकुर को दे दिया होगा उनको लगा होगा कि अरे यह तो छोटी मोटी चीज है उसमें क्या संचय हो गया उसमें क्या परिग्रह हो गया किंतु देखिए यहां पर मां का स्नेह है मां चाहती है कि ठ ठाकुर को अगले दिन फिर से यहां पर आना ना पड़े अपने कमरे में ही बैठ कर के वह मुख शुद्धि खा पाए तो इसलिए मां ने यह दिया और ठाकुर किंतु उनके पैर सीधे गंगा की ओर ले गए उनको यहां पे मातृ स्नेह है यहां पे ईश्वर का यहां पे सत्य संधि है या तो फिर कहेंगे कि ईश्वर मयत है ईश्वर संपूर्ण रूप से ठाकुर के भीतर में है किसी भी चीज का संग्रह नहीं करने देंगे किसी भी झूठ किसी भी तरह का अन्याय का आश्र नहीं लेने देंगे किसी भी तरह के अपवित्र व्यक्ति को उनके पास में नहीं आने देंगे यह दो जब ये दो जो भाव जब इकट्ठा होते हैं वैसे तो जनरली बराबर ही चलते हैं साथ-साथ किंतु कभी-कभी इस तरह की इंटरेस्टिंग रसपी को मिले देखिए ठाकुर ने जब इतना कठोरता की यम और नियम का इतना पालन किया तब कहीं जाकर के उस आसन पे वो आसित हो पाए थे तो हम उसमें से इतना तो सीखे कि 1 पर ठाकुर के जितना तो नहीं ठाकुर का 1 पर 2 पर इतना तो यम और नियम का हम अपने जीवन में पालन करें जिससे कि हमारा मन भी ठाकुर की तरह शुद्ध हो जाए और साथ-साथ में ही मां का जो दिव्य स्नेह है वह भी हमारे हृदय में आए जिससे कि हम इस जगत को ईश्वर मय देख सके यह यह व्यक्ति के साथ में मेरा अच्छा नहीं पट रहा है यह व्यक्ति ऐसा है यह दोष देखने का मेरा खुद का ऐसा था अभी भी है वैसे बहुत ही ज्यादा मैं जजमेंटल हूं लोगों के दोष बहुत देखता हूं किंतु जितना मैं मां को पढ़ता हूं उतना मुझे समय समझ में आता है कि देखिए कि जगत जैसा है ऐसा है अब दूसरे लोगों के दोष देखने से क्या लाभ है हां दूसरे लोगों के दोष से क्या हमको कभी हानि होती है तो उसका प्रतिकार हमको दृढ़ता पूर्वक करना है किंतु जब तक हमको हानि नहीं होती तब तक अननेसेसरी जजमेंटल होकर के हम इस जगत में क्यों रहे और सिर्फ जजमेंटल नहीं होना दोष नहीं देखना इतना नहीं यह तो एक नेगेटिव हो गया नेगेटिव गुण हो गया एक सकारात्मक एक पॉजिटिव गुण हो कि सबके प्रति अपनी मित्रता हो सबके प्रति अपनी करुणा हो सबको प्रे सबको किसी ना किसी तरह से हाय करने का हमारा स्वभाव हो मानवे से बार एकटा धारा आचे देवता रो पुजार विधि आचे किंतु देवता जखन मानव देह आगमन करेन तखन संभवत श्री माय न्याय देवी मानवी ार सर्व प्रकार प्रयोजन उपलब्ध करिया तद अनुरूप व्यवस्था करते समर्थ हो देखिए बड़ा ही इंपोर्टेंट स्टेटमेंट गंभीरानंद जी कहते हैं कि मनुष्य की सेवा किस तरह से की जाए उसका एक नियम है उसका एक एक कन्वेंशन है देवता की पूजा किस तरह से की जाए उसकी भी एक विधि है किंतु देवता जब मनुष्य देह का धार आसरा लेकर के मनुष्य देह धारण करके इस पृथ्वी लोक पर आते हैं तब मां की तरह देवी मनुष्य देवी मनुष्य ही देवी ही उनके सर्व तरह से सर्व प्रकार से आयोजन करके उनकी सेवा कर सकती है एक तो मनुष्य की सेवा करना वह भी एक नियम है देवता की कैसे सेवा करें उसकी भी एक विधि है किंतु मनुष्य का देह आश्रय करके जब देवता पृथ्वी पर आए तो उनकी कैसे सेवा करें तो वह तो देवी मानवी जैसे कि मां शारदा देवी वही कर पाएगी और साथ-साथ में कर पाएंगे ठाकुर के ये जो सन्यासी संतान थे जब ठाकुर को कैंसर हो गया था ठाकुर को काशीपुर ले जाया गया था तब इन्हीं लोगों ने जी जान से ठाकुर की सेवा की थी एक एक दिन ऐसा आ गया कि ठाकुर को कहना पड़ा कि अभी शौच जाने के लिए मैं बाथरूम तक नहीं जा पाऊंगा अर्थात कि उनका देह इतना दुर्बल हो गया था तो साथ-साथ में ही लाटू महाराज बोल उठे कि आमी तो आच्छी अपनार मेथर मैं
Latu Maharaj
तो हूं आपका मेथर मेथर अर्थात कि वो एक तरह की काष्ट जो कि ये जो विष्ठा है वो क्लीन करते हैं तो अभी खैर आज के जमय आज के जमाने में आज के समय में तो इस तरह का कास्ट और यह सब डिवीजन होता नहीं है लाटू महाराज ने उस अर्थ से नहीं कहा कि किसी की निंदा कर रहे हैं उन्होंने इस अर्थ से कहा कि ठाकुर की विष्ठा को साफ करने के लिए क्लीन करने के लिए वह खुद तो सेवक के रूप में उपस्थित है देखिए गिरीश घोष ने एक बार कहा था कि जब मैं उनको अवतार के रूप में या स्वयं ईश्वर के रूप में देखता हूं ता हले और गु की गु बोध होए अर्थात कि उनकी विष्ठा जो है वो मुझे क्या विष्ठा के रूप में दिखेगी माने ठाकुर जद ईश्वर स्वयं है तो उनकी विष्ठा भी तो इतनी ही पवित्र होगी तो यह देखिए कि ठाकुर की सेवा करने हालांकि गिरीश कोष का सेवा करने का स्वभाव नहीं था किंतु यह त्यागी संतानों का तो था देखिए यह लोग समझते थे किसके पास में से किस तरह की सेवा ग्रहण की जाए ठाकुर स्वामी जी को इस तरह का किसी भी तरह का मैनुअल जो कार्य है जो दैहिक सेवा है वो नहीं करने देते थे मां के साथ में भी देखिए कि मां जब वहां प थी जयराम बाटी में तो किसी ने कहा कि चलो कलकाता चलते हैं तो मां ने कहा कलकाता में तो शरत है नहीं शरत अर्थात स्वामी शारदानंद शरद महाराज तो जो जो कि
Swami Saradananda
कोलकात्ता में मां की सेवा करते थे तो मां ने कहा कि शरद तो है नहीं कोलकाता फिर कहां जाएंगे किस तरह से रहेंगे तो जो प्रश्न कर रहा था मां को उसने कहा कि क्यों वहां पर तो राजा महाराज है तो स्वामी ब्रह्मानंद वो है सेवा करने के लिए
Swami Brahmananda
तो मां ने कहा नहीं देखो राजा सेवा नहीं कर पाएगा या तो फिर क्या है कि किसी के किसी को देकर के सेवा कर पाएगा या तो दूर से दूर रह कर के वह सेवा कर पाएगा यानी कि राजा महाराज का स्वभाव था कि यदि सेवा करने की बारी आए तो किसी और को दे दिया जो उनके शिष्य है इतने सारे कि जाओ मां की सेवा करो या तो फिर वोह दूर से वोह गाइड करते हैं इस इस तरह से सेवा करना तो देखिए कि मां को भी पता था कि शरत महाराज का स्वभाव कैसा है राजा महाराज का स्वभाव कैसा है राजा महाराज के बारे में ठाकुर ने कहा था कि वह एक राज्य चला सकता है यानी कि जो राजा है वह इस तरह की सेवा क्यों नहीं करेगा अभी ऐसा नहीं है कि नहीं कर सकते हैं किंतु यह लोग उनके स्वभाव को रिस्पेक्ट देते हैं जिसका जो स्वभाव है उसके पास में से उस तरह का कार्य करवाना है यदि वह चाहते तो निश्चय करवा पाते हैं और यह लोग करते भी सही किंतु ये लोग उनके स्वभाव को उनकी पद की जो गरिमा है उसको यह लोग इस तरह से रिस्पेक्ट देते हैं तो यहां पर भी देखिए कि जिसकी सेवा करनी है ठाकुर जैसे देवता मनुष्य की वह सिर्फ मां जैसी देवी ही ठीक-ठीक कर पाएगी क्योंकि देखिए कि इवन जब ठाकुर को काशीपुर ले गया
Kashipur
श्यामपुकुर ले गया गया था उस समय त्यागी संतान तो सब थे किंतु फिर भी उन्होंने महसूस किया कि जब तक मां यहां पर नहीं आएगी तब तक फिर ठाकुर के लिए आहार प्रस्तुत करना फिर ठाकुर को आहार करवाना यह जो सब एसेंशियल कार्य मां किया करती थी वो इन लोगों से नहीं होगा तो फिर मां को फिर श्याम पुकुर लाया गया सर्वप्रथम तो
Shyam Pukur
ठाकुर श्याम पुकुर रहे थे उसके बाद में काशीपुर गए थे तो जब ठाकुर को कहा गया कि मां को क्या हम लाए यहां पर आपकी सेवा के लिए तो ठाकुर ने कहा देखो वह तो बड़ी ही लज्जा शलाला है किंतु जाओ तुम लोग जाकर के उनको पूछ कर के देखो यदि उसकी इच्छा है तो सकती यदि वो आना चाहे तो आ सकती है तो फिर वो जब मां को बताया गया मां ने इमीडिएट हां कह दिया गया और फिर मां वहां पर आकर के रही थी और श्याम पुकुर में तो ऐसा था कि सिर्फ एक ही बाथरूम था सभी जितने भी लोग रहते थे सभी के लिए तो अभी मां क्या करती थी सुबह को 3:00 बजे से पहले उठ कर के शौच स्नान वगैरह सब कुछ समाप्त करके फिर वो वहां से चली जाती थी ठाकुर के लिए सुबह का आहार प्रस्तुत करने के लिए जब ध्यान वगैरह करने के लिए ऐसा पूरा और फिर रात को उनको सोना था 11:00 बजे से पहले तो सोने को नहीं मिलता था क्योंकि ठाकुर की सेवा चलती रहती है कुछ ना कुछ उनके लिए आवश्यक होता रहता है तो देखिए मैं जब यह पढ़ रहा था प्रसंग तो मैंने कैलकुलेट करके देखा कि कितना घंटा सोने को मिलता है मां को तो फिर 11:00 बजे सोती है तो 11 से 12 1 दो तीन घंटा सोने को मिलता था मां को तीन से साढ़े घंटा मुश्किल से और फिर ईती बजे तो मां उठी 3:00 बजे से पहले शोच और स्नान समाप्त कर देना है इसका अर्थ है कि रात को 2 बजे उठना है तो दिन के तीन घंटे सो कर के मां अपने हृदय में यह आशा लेकर के रहती थी कि हां ठाकुर कभी ना कभी ठीक हो ही जाएंगे तो यह जो इतना कठोर करना तपस्या करके ठाकुर की सेवा करना यह मां के अलावा और कौन कर सकता है ईश्वर स्वयं मनुष्य देह धारण करके जब पृथ्वी पर आए तो देवी ही उनकी सेवा करने के लिए देवी को ही फिर से मनुष्य देह धारण करके साथ-साथ में उनके साथ में पृथ्वी पर आना होगा तो आज यही तक कल फिर से में ओम शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु
जैसे महावीर भाव की साधना के समय ठाकुर की पूंछ बढ़ाना शुरू हुई थी, क्या इस तरह के शारीरिक परिवर्तन के और कोई उदहारण है?00
नहीं मुझे भी याद नहीं आ रहा स्वामी जी की लाइफ यदि हो सकता है तो स्वामी जी की लाइफ में हो सकता है नहीं याद नहीं आ रहा मने आप बाकी डायरेक्ट डिसाइल के जीवन में तो छोड़ ही दीजिए और किसी अवतार के जीवन में भी इस तरह का लिपिबद्ध नहीं है मेरे ख्याल से या तो फिर क्या है कि उनके लाइफ में ना सब कुछ मिरेकल बोल कर के लिखा गया है ये अभी राइट तो यहां पर तो वी डोंट ट्रीट दिस एस मिरेकल ये हम लोग तो तो इसको प्रॉपर एक साइंस के रूप में देखते हैं तो इस तर मतलब दिस इज यूनिक ठाकुर के जीवन में मिरेकल नहीं है जो कि आपको दूसरे अवतार के जीवन में मिल जाएंगे किंतु ठाकुर के जीवन में साइंस इट सेल्फ साइंटिफिकली हम जिस तरह से वे कर सकते हैं वैसा हम और किसी के साथ में नहीं कर पाएंगे सो यू आर राइट इन दैट वे ये जो देखिए य ईश्वर पे
माँ जगदम्बा कैसे ठाकुर की सब तरह रक्षा करती थी, उनकी साधना में सहाय करती थी.
विश्वास नहीं होना यह है ना हमारे मॉडर्न एज का एक बहुत बड़ा एक पडेम है एंडेमिक है इवन पिछली सदी तक ऐसा था 19वीं सदी तक कि हम लोगों का अज्ञान इतना घन था इस जगत के बारे में कि क्यों सूरज उकता है क्यों सूरज अस्त होता है क्यों एक्लिप्स होता है क्यों यह सब होता है क्यों बीमारी होती है क्यों मनुष्य मर जाता है एक्सीडेंटली यह सब तो ये जगत के बारे में अपना अज्ञान इतना गहरा था कि ईश्वर के ऊपर में भरोसा करने के अलावा और कोई उपाय नहीं था तो उस समय ईश्वर के ऊपर में डिपेंडेंस ऑटोमेटिक बहुत सारे लोगों का होता था अभी मॉडर्न एज ने जिस तरह से हमारे लिए दो चीज एक तो नॉलेज हमको दिया है ये कॉस्मोलॉजी एस्ट्रो फिजिक्स ये बायोटेक्नोलॉजी उस सब ने हमारे जीवन को जिस तरह से आसान किया है वैसे ही जगत किस तरह से चल रहा है इसके बारे में हमको काफी कुछ बताया है किंतु इसका साइड इफेक्ट यह है कि अभी हमको ईश्वर की जरूरत नहीं लग रही है पहले ऐसा था कि यह सूरज का सूरज उठता है अस्त होता है तो सूर्य देवता अपने रथ प आते हैं फिर यह राहु केतु आ कर के उनको ग्रस कर जाएंगे खा जाएंगे तो फिर यह सूर्य ग्रहण होगा तो यह सूर्य देवता राहु केतु यह सब हम मानते थे अभी हमको पता है कि यह सब ग्रेविटी है यह सब है तो नहीं देवता की जरूरत है ना राहु केतु की जरूरत है तो ये नॉलेज एंड सम हाउ एक तरह से जगत में सुविधा का बड़ा ही बढ़ जाना हमारे हमको ना एक तरह से जिसको कहते हैं ना कि हिडन नास्तिक बना दिया एक हिडन अनइंप्लॉयमेंट होता है इकोनॉमिक्स में यह तो अन एंप्लॉय है और ये हिडन अन एंप्लॉय है यहां पर बहुत सारे आस्तिक है किंतु आस्तिक के भीतर में बहुत सारे हिडन नास्तिक है किस अर्थ में कि मंदिर में जाते हैं वह सब करते हैं फॉर्म जो होता है विधि होता है फॉलो करते हैं किंतु भीतर में से सही सही विश्वास नहीं आ रहा है सो ठाकुर को जब देखते हैं तब हमको लगता है कि नहीं सही वि विश्वास कैसा होना चाहिए कि मुझे जिस बात का पालन करना है वह यदि मैं नहीं करूंगा तो ईश्वर आकर मेरे पास में करवाएंगे ऐसा क्या हम देखा है कभी कि मैंने सोच लिया कि परीक्षा के लिए मुझे पढ़ाई करनी है मैं पढ़ाई छोड़ कर के खड़ा हो गया बोलने वाला कुछ नहीं कोई नहीं है मां बाप की बातें सुनना तो कबका बंद कर दिया है किंतु फिर और ऐसा त्रिशूल लेकर के कोई आके बैठ जाएगा स्टडी करो वरना मार दूंगा तुमको य त्रिश इवन हम लोग भी साधु हुए हैं इतना सब हम तपस्या करने का प्रयास कर रहे हैं किंतु भीतर में से सही विश् विश्वास आना कि ईश्वर है ईश्वर करेंगे ये यह हमारे लिए भी बड़ा मुश्किल है यह पूरा युग ही है अविश्वास का तो डोंट नो कि इसका सलूशन क्या है नरेण के बारे में पता है ना कि वह जो
नरेन ने ठाकुर की बार-बार परीक्षा ली। ठाकुर की मृत्युशैया पर उन्होंने सोचा कि क्या वाकई राम और कृष्ण फिर से आ पधारे हैं? लेकिन अन्य भक्त बिना किसी सवाल के ठाकुर की सारी शिक्षाओं को स्वीकार कर लेते थे।
मारवाड़ी भक्त थे जो कुछ भी लाते थे ठाकुर किसी को खाने नहीं देते थे बोला नरेंद्र को खिलाओ जो मेवा है मिठाई है ड्राई फ्रूट है क्यों उसके भीतर में ज्ञाना अग्नि प्रज्वलित है वो यह सब खाएगा तो सब भस्मी भूत हो जाएगा कोई चिंता की बात नहीं है और कोई खाएगा तो उनके जो फल है कर्म के वह उनके सर पर आकर बैठ जाएंगे हाजरा है ठाकुर हजरा के पास में किसी जाने नहीं देंगे राखल वगैरह ठाकुर ने कहा ये राखल हजरा के साथ में बात कर रहा था तो उसका मन कितना नीचे आ गया जबकि हाजरा ठाकुर का बेस्ट फ्रेंड ठाकुर कहते हैं कि हाजरा हो नरेन फेरेंड इंग्लिश शब्द फेरेंड अर्थात कि हाजरा है नरेंद्र का फ्रेंड और नरेंद्र का भी था कि हाजरा महाशय क्या है कि सभी चीजों पर संदेह करते थे संशय करते थे सहज किसी चीज को स्वीकार नहीं करते थे तो इसी बात से नरेंद्र को हाजरा महाशय के ऊपर में थोड़ा सा एक क्या कहे एफिनिटी था और फिर निवेदिता का है निवेदिता जब नरेद्र को सब समय डाउट कर रही है स्वामी जी को डाउट कर रही है वो विदेशी शिष्य ही कहते हैं कि इतना डाउट क्यों करती हो तब नर ने कहा कि आई हैव फाउट माय टीचर एवरी स्टेप ऑफ द वे मैंने प्रत्येक स्टेप पर मेरे ठाकुर के के साथ में फाइट की है सो आई नो माय वे वेरी वेल निवेदिता जो प्रश्न करेगी उसका मैं उत्तर दे पाऊंगा देखिए ये नरेंद जो है ही रिप्रेजेंट्स अस इन अ वे ये जो पूरी डाउटिंग जनरेशन है यदि देखिए ठाकुर के पास आना सहज क्यों नहीं है हम लोगों के लिए क्योंकि ठाकुर के पास आने के लिए आपको सहज सरल विश्वास चाहिए किंतु अपने में तो वो सहज सरल विश्वास है नहीं है तो अभी कि जैसे सॉफ्टवेयर में होता है ना कि आपका सॉफ्टवेयर एक तरह का कार्य करता है फिर दूसरा कुछ करना होगा आपके प्लगइन डालना पड़ेगा तो ये प्लगइन डालेंगे तो डिफरेंट टाइप की फाइल उसमें आप रन कर पाएंगे तो स्वामी जी ऐ सॉर्ट ऑफ ए प्लगइन कि ठाकुर के पास आप डायरेक्ट तो नहीं जा पाएंगे किंतु देखा नरेंद्र को देखा कि नरेंद्र भी अविश्वास था और फिर आखिर में नरेंद्र ने भी ठाकुर की शरणागति को स्वीकार किया एंड नरन की जो पूरी जर्नी है अविश्वास से विश्वास की ओर तमसो मा ज्योतिर्गमय वो जर्नी जब हम फॉलो करते हैं अब जैसे मैंने मैं अपनी खुद की बात करता हूं मैंने मैं जब छोटा था स्कूल में पढ़ता था तो मैंने यह सोचा था कि गरीब लोगों की सेवा करनी है यहां तक तो मैं आ गया किंतु मने क्या है कि एकदम टोटली सेल्फ सेंटर्ड लाइफ से एक स्टेप तो हमको बाहर आना पड़ेगा इतना तो हमें चाहिए बिल्कुल फिर असार होगा हृदय बिल्कुल पत्थर का बना होगा तो फिर ठाकुर भी कुछ नहीं कर पाएंगे तो इतना तो एक स्टेप मैं आगे आया कि लोगों के लिए कुछ करना है किंतु फिर वहां से ठाकुर की यात्रा यह तो स्वामी जी के माध्यम से ही संभव हुई देखा कि स्वामी जी के हृदय में लोगों के प्रति इतनी विराट उनका हृदय है लोगों के प्रति इतनी करुणा है तो फिर अच्छा तो अभी स्वामी जी क्या कहते हैं व्हाट इज द सोल्यूशन क्योंकि आपको एक बार प्रॉब्लम दिखता है कि हां इतने गरीब लड़के हैं जो कि बेचारे फुट पाट पे जीते हैं तो उनके लिए कुछ तो करना पड़ेगा तो पहले तो हमको यह समझना पड़ेगा कि व्हाट इज पॉवर्टी व्हाट इज द रीजन बिहाइंड पॉवर्टी व्हाट इज द सोल्यूशन तो स्वामी जी को पढ़ना जब शुरू किया स्वामी जी ने पूरा रास्ता हमको दिखाया है कि हाउ द सिविलाइजेशन राइज हाउ सिविलाइजेशन फॉल हाउ दिस एंटायस जब ये पूरा पृथ्वी घूम कर के हम लोग आ गए तब कहीं जाकर के हमको ठाकुर दिखाई दिए यह जो ठाकुर की कहानी है ना कार्तिकेय और गणेश की न मां ने कहा कि जो सबसे पहले पृथ्वी घम संसार को विश्व को घूम के आएगा उसको मैं यह हार दूंगी तो अच्छा ठीक है वो कार्तिकेय अपने मोर के ऊपर में सवार होकर के पूरा विश्व ब्रह्मांड घूम के आए तो यहां पर देखा गणेश ने अपने से मां के गोद में बैठे हुए हार पहन के क्यों क्योंकि उन्होंने मां की परिक्रमा कर ली थी तो मां के पास में आने का दो तरीका है एक तो सहज सरल विश्वास है कि मां ही जगत है मां ही सब कुछ है तो मां की परिक्रमा की तो उसमें बात खत्म हो गई फिर हम जैसे लोग कार्तिकेय की तरह हम लोगों को पूरे जगत घूमना पड़ेगा तब कहीं जाकर हम मां के पास में आ पाएंगे तो जगत जब घूमेंगे वी नीड अ गाइड सम राइट जद मैं मां की परिक्रमा करनी है तो राजा महाराज है लाटू महाराज है है ठाकुर स्वयं है मां स्वयं है कि जिनको देख कर के मैं सीधा उनके पास में आ सकता हूं किंतु यदि मेरा मन में अविश्वास है पता नहीं है कि मां ही जगत है तो जगत घूमना पड़ेगा एट दैट टाइम स्वामी जी एज ए गाइड हेल्प्स अस आपको एक स्टेप अपने से आगे आना पड़ेगा इतना तो करना पड़ेगा बिल्कुल पत्थर होगा तो पानी डालने से कोई लाभ नहीं किंतु यदि आपने एक स्टेप आगे आ गए तो फिर स्वामी जी आपका हाथ पकड़ने के लिए तैयार है फिर