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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

नीरव साधना || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 29 Jan 2025

Invocation

ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र लेखक है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज हमने देखा कि किस तरह से अभी हमने नया चैप्टर प्रारंभ किया है उसका नाम है नीरव साधना और कल जैसे कि हमने पढ़ा था और डिस्कस किया था कि अभी तक तो गंभीरानंद जी महाराज एक तरह से अ क्रोनोलॉजिकल सीक्वेंस में सभी घटनाएं मां के जीवन की कहते हैं किंतु फिर अभी कलकाता में ठाकुर को शिफ्ट किया गया है कैंसर ट्रीटमेंट की वजह से अभी यहां के बाद के जो चैप्टर है वह फिर से हमको वही दक्षिणेश्वर में लेकर जाते हैं यह नीरव साधना और इस के बाद का भी चैप्टर और यह दोनों चैप्टर की एक पार्टिकुलर थीम भी है इन दोनों चैप्टर में इस चैप्टर में हम देखेंगे नीरव साधना में कि किस तरह से मां पर्दे के पीछे रहकर के सब कुछ ठाकुर की सेवा भी करती थी और धीरे-धीरे करके उन्होंने ठाकुर का यह जो त्यागी संतानों का जो दल है जो संघ है उनको गाइड करने का उनको प्रेरणा देने का और उनको 4 करने का गुरुत्व मय जवाबदारी रिस्पांसिबिलिटी स्वीकार किया था तो वह अभी हम यह सब घटनाएं इस चैप्टर में देखेंगे हम जो पहला पैराग्राफ पढ़ रहे थे कल उस पैराग्राफ की दो-तीन लाइंस हमने पढ़ी थी एक बार उसको रिपीट कर देते हैं गंभीरानंद जी महाराज कहते हैं प्रयोजन उपस्थित होले श्री श्री माता ठाकुरानी पूर्व संस्कार और अभ्यास समूह होते अपना के मुक्तो करिया निर्भय समयो चित कर्तव्य संपादने कतो दूर समर्थ लेन ताहर बहु दृष्टा तो आमरा पाइया जीी मां का ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ था और एक ब्राह्मण परिवार में उनका विवाह हुआ था और वह काली मंदिर में रह रही थी इसका अर्थ है कि बहुत सारे नियम विधि विधान से बंध करके उनको रहना था किंतु जब ऐसी कोई परिस्थिति आन पड़ती जब कि इन सब नियमों के ऊपर जाकर के उर्ध्व उठ कर के उनको यदि कोई कार्य करना है तो वह कार्य करने में भी मां समर्थ थी रूप अभ्यास आदी परिवर्तन अनेक समय श्री श्री ठाकुरर उपदेश फले होई तो स्थल विशेष श्रीमा स्वत अवस्था अनुरूप व्यवस्था करते इस तरह से विधि निषेध के ऊपर जाकर के कार्य करना कभी-कभी ठाकुर के कहने से मां करती और कभी-कभी भी मां अपने से ही प्रेरित होकर के यह करती और कभी-कभी हालांकि गंभीरानंद जी महाराज ने यहां पर लिखा नहीं है ठाकुर के कहने के बावजूद ठाकुर की आज्ञा का उल्लंघन करके भी मां इस तरह का कार्य करती और इसके बड़े ही दो उदाहरण है कि वह महिला जिसका चरित्र अच्छा नहीं था उसने मां को कहा कि लाइए ठाकुर के खाने का थाली मुझे दे दीजिए मैं उनको जाकर के दूंगी और वह जाकर के ठाकुर को खाने का थाली दिया इमीडिएट ठाकुर ने नाराज होकर के मां को पुकार करके कहा अरे तुमको पता नहीं है इस महिला का चरित्र कैसा है क्यों तुमने इसके हाथों से मेरे खाने की थाली भेजी तब मां ने क्या कहा कि कोई मां बोल कर के आक के मेरे पास में खड़ा रहता है तो फिर वह जो चाहता है मैं दे दूंगी उसमें मैं अपने को रोक नहीं पाओगी तो यहां पर देखिए कि तीन सिचुएशन है कि जबकि मां अपने यह जो ब्राह्मण जन्म ब्राह्मण संस्कार मंदिर में रहकर के ठाकुर जैसे एक निष्ठ कर्तव्य परायण साधक की पत्नी होने के बावजूद यह सब विधि निषेध से ऊपर उठकर के जो कार्य करती थी कभी-कभी ठाकुर कहते थे यह सब करने को क्योंकि पता है कि ठाकुर स्वयं ऐसा नहीं है कि यह सब ब्राह्मण संस्कार को बहुत ज्यादा कोई महत्व देते थे ब्राह्मण परिवार में जन्म होना बड़ा सद् भाग्य की बात है किंतु यदि आपको ईश्वर प्राप्ति करनी है तो जाति अभिमान त्याग करके करना होगा और इसके लिए जैसे हमने माय प्लान ऑफ कैंपेन में भी देखा स्वामी जी इसका विशेष रूप से मेंशन करते हैं जब लोग स्वामी जी पर यह दोषारोपण करते हैं कि आप तो शुद्र है तो स्वामी जी ने क्या कहा यदि मैं शुद्र भी हूं तो भी मुझे कोई चिंता नहीं क्यों क्योंकि अपने स पे में उस गुरु के चरणों को वहन करता हूं जिन्होंने ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के बावजूद एक चंडाल के घर में जाकर के एक नीच जाति के किसी के घर में जाकर के उसका टॉयलेट अपने बालों से साफ किया है वह रसिक रसिक मेहतर उसके घर में जाकर के तो उनका मैं शिष्य हूं तो ठाकुर खुद कोई जाति अभिमान को इतना विशेष प्राधान्य नहीं देते थे जबकि उनकी साधना चल रही थी किंतु जब साधना समाप्त करके फिर वह अब इती इती करके इस जगत में रह रहे हैं तो क्या है कि फिर वही बात है कि जगत के कुछ नियमों का तो पालन करना पड़ेगा वरना यह ऑर्थोडॉक्स हिंदू समाज है उनका एक तरह से रिस्पेक्ट या तो फिर उनका अनुमोदन आप खो बैठेंगे यदि आप बिल्कुल जाति वर्ण निर्वित व्यवहार करते हैं तो इस तरह का व्य वहार समय आने पर कभी-कभी किया जा सकता है किंतु यदि हिंदू समाज को रूट एंड ब्रांच रिफॉर्म करना है तो यह इस तरह का सब समय व्यवहार हिंदू लोग पसंद नहीं करेंगे तो जिस परिस्थिति में रहते हैं उसके अनुसार व्यवहार करना है तो ठाकुर का भी ऐसा था तो यहां पर मां तीन तरह से इस तरह के विधि निषेध का भंग करती थी कभी ठाकुर के कहने से कभी अपने से ही प्रणोद होकर के प्रेरित होकर के और कभी-कभी ठाकुर के कहने के बावजूद ठाकुर की आज्ञा का भंग करके भी मां विधि निषेध से ऊपर होकर के कार्य करती थी कारण श्री श्री ठाकुरे तुष्टि विधान कराई तहर जीवने लख छलो क्यों ऐसा करती थी ठाकुर के तुष्टि विधान अर्थात कि ठाकुर को प्रसन्न करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था हालांकि यह प्रश्न हो सकता है कि ठाकुर के कहने से वह नियम का भंग किया वह तो एक बात है ठाकुर के नहीं कहने के बावजूद कोई कार्य करना इसमें ठाकुर का तुष्टि विधान कैसे हो सकता है तो यह प्रश्न का उत्तर भी है कि देखिए कि ऊपर ऊपर से तो ठाकुर यह सब करते थे किंतु इसके बाद वाला चैप्टर जो है उसमें ठाकुर मां को तैयार करते हैं भक्तों का भार स्वीकार करने के लिए भक्तों की जवाबदारी लेने के लिए उनके आध्यात्मिक राज्य की उसमें में बहुत सारी घटनाएं हैं वो बड़ी ही वर्ल्ड फेमस घटना कि रात को कितनी रोटी किसको खिलानी चाहिए ठाकुर आ कर के कह देते थे कि राखल को इतनी रोटी इसको इतनी रोटी क्यों क्योंकि यदि ज्यादा खाना खाएंगे तो फिर दूसरे दिन सुबह को अर्ली मॉर्निंग उठ कर के जब ध्यान नहीं कर पाएंगे या तो बहुत बार तो ऐसा होता था कि ठाकुर के कहने पर यह लोग पूरी रात रात भर तपस्या करते थे अभी पेट भर के खा लिया है तो पूरी रात तपस्या कौन करेगा तो यहां पर आकर के ठाकुर मां को कहते हैं कि इसको इतनी रोटी खिलाना इसको इतनी इससे ज्यादा नहीं तब मां कहती थी क्या कि मैं मां होकर के आप मुझे कैसे कह सकते हैं कि मैं इसको इतनी रोटी खिलाऊ इसको इतनी रोटी खिलाऊ जिसको जितनी चाहिए उतनी खिलाऊंगी और इसकी जवाबदारी मेरे सर पर है तब ठाकुर खुश होकर के वहां से चले गए कि चलो मां ने इस तरह से जवाबदारी लेने की शुरुआत की है तो यहां पर भी कभी-कभी ना कहने पर भी मां उसका विपरीत आचरण करती थी और ठाकुर खुश ही होते थे क्यों क्योंकि इसके बाद का जो सेंटेंस है बड़ा ही सुंदर सेंटेंस है कि किस तरह से दोनों बाह्य रूप से तो कभी-कभी विरोधाभासी आचरण करते दिखते थे किंतु इन दोनों के हृदय जैसे कि एक ही सुर में बंधे हुए थे यह बात अभी आगे आएगी तबे मने राखी ते होई बेज साधारण लोकाचारा द थोले कथा प्रयोज्य यह सब जो डिस्कस किया कि यह करना है यह नहीं करना है यह सब साधारण लोकाचार के बाबत में ही यह सब बातें हैं मौलिक भाव राज्य उभय तोई ई को छलो ज अधिकांश गुरुत्व पूर्ण व्यापार श्री मायर चेष्टा पूर्वक किछु करते बा ठाकुरे तहा के सिखाते होई तो ना जहां तक लौकिक व्यवहार का प्रश्न है कभी-कभी ऐसा हो होता कि ठाकुर जो कह रहे हैं और मां जो कर रही है इन दोनों में जैसे कि विरोधाभास है किंतु जहां तक उच्च भाव राज्य उसका प्रश्न है देखेंगे कि ठाकुर और मां दोनों एक ही तरह का आचरण करते थे मौलिक भाव राज्य उभय री य तो ऐक्य छलो मौलिक भाव राज्य में दोनों के बीच में इतना ऐक्य था इतना एकात्मता थी इतना यूनिटी था कि ज्यादातर समय जितनी भी महत्त्वपूर्ण बातें थी मां को चेष्टा के साथ में कुछ करने की बजह और ठाकुर को उनको सिखाने की जरूरत नहीं रहती थी एक सूरे बांधा दटी हृदय एक कोई छे अपना दिग के विकास कररिया चलितो कितना कवित्वम लाइन है एक सुर में बंधे हुए दो हृदय एक ही छंद में एक दूसरे का विकास करते-करते चलते थे जहां तक उच्च भाव राज्य का प्रश्न है ठाकुर के हृदय का जो छंद था जो गान था मुक्ति का गान या तो फिर ईश्वर प्राप्ति की आराधना उपासना का गान वही गान मां के हृदय में भी बज रहा था एक ही सुर में एक ही छंद में दोनों के हृदय ईश्वर प्राप्ति मुक्ति की कामना आराधना गा रहे थे और यह यूनिटी जो थी उस भाव राज्य में संपूर्ण थी तब वही बात है कि ठाकुर पुरुष थे मां शक्ति थी और इन दोनों के परिप्रेक्ष्य के अनुसार इन दोनों को व्यवहार करना होता था इ हार दृष्टांत आमरा पूर्वे पाइया छी संप्रति आलो अनाची तो को एकटी विषय आमरा दृष्टि निक्षेप करिब यह देखिए कि हृदय तो एक ही सूर छंद ताल से एक ही लय से वही मुक्ति का मां काली की उपासना का गीत गा रहा है किंतु बाह्य व्यवहार में दोनों के बीच में दोनों की अलग-अलग परिस्थितियों की वजह से जो वैविध्य दिखता है उसके कुछ प्रसंग हमने पहले भी देखे हैं जैसे कि वह उस महिला का ठाकुर के लिए खाना लेकर के जाना या तो फिर मा मां का ठाकुर को ज्यादा करके दूध पिलाना ठाकुर कहते हैं मेरे पेट में में रोग है मैं इना ज्यादा थोड़ा सा खाने से भी मुझे पेट में यह अजीर्ण वगैरह होता है तो फिर भी मां दूध को उबाल करके गाढ़ा करके ठाकुर को खिलाती थी तो जैसे कि ठाकुर की आज्ञा का उल्लंघन करके ठाकुर के सामने जैसे कि झूठ बोल कर के सत्य और ब्रह्मचर्य यह दो नियम ठाकुर ने जैसे कि बनाए हैं और यहां पर भी देखिए कि आप प्रश्न करेंगे कि व्यक्तिगत साधना में स का पालन ठाकुर कितनी कठोरता से करते थे यहां पर किंतु मां बड़े ही शांति से ठाकुर के सामने जाकर के कहती है कि पता नहीं उसमें कितना दूध है आपको दूध पीना है ना कि कितना शेर कितना ग्राम यह सब कैलकुलेशन करना है दूध पीना है दूध पीजिए तो जैसे कि एक मिथ्या वचन बोलती हुई सी मां दिखती है क्यों वही व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म व्यष्टि धर्म अर्थात कि जहां तक मेरी ईश्वर प्राप्ति की आराधना का प्रश्न है मैं सब तरह के नियमों का पालन करूंगा किंतु समष्टि धर्म में मेरा एक रिस्पांसिबिलिटी है और किसी के प्रति यहां पे पत्नी की पति के स्वास्थ्य के प्रति रिस्पांसिबिलिटी है तो उस स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए मां झूठ बोलने पर भी कतराती नहीं थी तो यह सब प्रसंग हमने बहुत देख लिए हैं यहां पे और एक प्रसंग का महाराज कहते हैं कि कुछ हम लोग देखेंगे इसमें सबसे पह पहला प्रसंग है यह पाणी हाटी का अभी पाणी हाटी के प्रसंग के बारे में हमने बड़ा ही विस्तृत आलोचना ऑलरेडी कर चुके हैं ठाकुर के कलकत्ता आने से पूर्व ही पाणी हाटी के प्रसंग से आनंद पर्व जो समाप्त होता है उसका काफी डिस्कशन कर लिए हैं और उसका भी जो हाईलाइट है जो हाईलाइट हमको ऐसा लगता है कि मां का बुद्धि कितना है मां कितनी यह कहेंगे कि उनका विजडम कितना है कि ठाकुर ने कहा कि उसकी इच्छा है तो आए यहां पे मां ने सोच लिया कि नहीं यदि उनकी इच्छा होती तो मुझे भार पूर्वक कहते कि नहीं वो आए ही किंतु ऐसा नहीं करके मेरे पर जब छोड़ दिया है उसका अर्थ है कि वह नहीं चाहते कि मैं आऊं तो यह जो घटना यह जो दोनों के बीच में इंटरेक्शन हुआ फिर यह लोग रात को जब वापस आते हैं पाणी हाटी से तब ठाकुर कहते हैं कि देखो वो कितनी बुद्धिमता है यदि व आती तो सब लोग कहते कि हंसो हंसी आए हैं और फिर लो उनकी बदनामी भी होती यहां पे ठाकुर ऐसा कहते हैं यहां पे मां भी ऐसा कहती है उनकी इच्छा होती तो भर पूर्वक कहते हैं इसलिए वह मेरे पे छोड़ दिया तो मैं समझ गई कि उनकी इच्छा नहीं तो यह घटना और फिर इसके साथ में कलकत्ता आने की बात कि जब श्याम पुकुर में ठाकुर को चिकित्सा के लिए लाया गया छोटा सा घर उसमें रहना है मां को इतना कष्ट करके अभी ठाकुर को पूछा गया कि मां आएगी तो हम क्या उनको बुलाएं आपकी परिचर्या के लिए पथ्य यानी कि आहार प्रस्तुत करने के लिए तब ठाकुर ने कहा कि उसको पूछ के देखो यदि उसकी इच्छा है तो आए और यह दोनों घटनाओं के बीच में जो कंट्रास्ट और कंपैरिजन था यहां पे मां का स्वार्थ था पाणी हाटी जाने का कि वह दिव्य आनंद प्राप्त करती अपने स्वार्थ की पूर्ति ना हो इसलिए मां वहां पर नहीं गई कलकत्ता में ठाकुर का स्वार्थ था कि यदि मां आकर के पथ्य बनाती है तो उनका स्वास्थ्य थोड़ा सा तो ठीक रहेगा तो उनके स्वार्थ की पूर्ति ना हो इसलिए ठाकुर नहीं चाहते थे कि मां को एकदम स्पष्ट रूप से यहां पे आमंत्रण देना चाहिए तो जहां पे भी किसके स्वार्थ की पूर्ति होती है कौन सा निस्वार्थ भाव है उसके अनुसार दोनों ने कार्य किया तो यह डिस्कशन हमने काफी किया था यहां पर सिर्फ हम इसको एक घटना को एक बार पढ़ लेते हैं वह घटना जब हमने पढ़ी थी या तो डिस्कस किया था लीला प्रसंग में से वह किया था यानी कि लीला प्रसंग में बड़ा ही विस्तृत वर्णन था यहां पर टूक में वर्णन है शॉर्ट है डिस्क्रिप्शन और सिर्फ मां का जो हिस्सा है उसी को हाईलाइट किया गया है गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं 1292 1292 बंगा अर्थात की 1885 क्रिस्टा ब्द जेष्ठ माशे शुक्ला त्रयोदशी समाग प्राय 1885 खिताब की ज्येष्ठ महीने की शुक्ला त्रयोदशी ऑलमोस्ट आन पड़ी है ओई दिवस कोलकातार को एक माइल उत्तरे गंगार पूर्व कुले पानी हाटी ते प्रति बर चीड बा दंड महोत्सव होया था के उस दिन कलकत्ता के कुछ माइल दूर गंगा के पूर्व किनारे पर पाणी हाटी में प्रति वसर प्रत्येक साल चीड़ा का महोत्सव होता है ठाकुरे इंग्रेजी शिखी तो भक्तो देर आगम नेर पूर्वे तिनी बहु बार ई उत्सव जगदानंद यानी कि रामचंद्र दत्त मास्टर महाशय फिर यह गिरीश घोष इन सबके आने से पहले बहुत बार ठाकुर पाणी हाटी जाकर के उत्सव में योगदान करके आए हैं किंतु परवर्ती को एक एक बसर थाय जाबा होईना किंतु यह सब त्यागी संतानों का अंतरंग भक्तों का आगमन होने के कुछ साल तक ठाकुर वहां पर जा नहीं पाए थे सेही बर ठाकुर भक्त द के बोलेन सेखाने ई दिन आनंदर मेला हरि नामर हार्ट बाजार बसे तोरा सब यंग बंगोल कखन रकम देखिना चोल देखे आश भी ठाकुर ने कहा उस दिन वहां पर आनंद का मेला है हरि नाम की हाठ बाजार बेचती है तुम लोग तो सब यंग बंगोल हो कभी भी इस तरह का उत्सव देखा नहीं है चलो जाकर के देख के आते हैं तदनुसार प्राय 25 जन भक्तो उत्सव दिन नय घोट का म दई खानी नौका भाड़ा कोरिया दक्षिणेश्वर समबे तो ईले इसके अनुसार ऑलमोस्ट 25 भक्त उत्सव के दिन 9:00 बजे के पहले ही दो नौका को भाड़ा करके दक्षिणेश्वर में आकर के उपस्थित हुए ठाकुरे जनन एक खानी नौका घाटे बांधा झलो ठाकुर के लिए एक नौका ऑलरेडी घाट पर बंधी हुई थी कोई एक जन स्त्री भक्तो प्रत्युष आशिया श्री श्री माता ठाकुरानी शहीद श कोलेर आहारा दि व्यवस्था कोरीते चले कुछ स्त्री भक्त बड़ी ही अर्ली मॉर्निंग को आकर के मां मां शारदा देवी के साथ में भक्तों के आहार की व्यवस्था कर रही थी बेला दार समय सकले जायते प्रस्तुत होई लेन 10 बजे के समय सभी लोग जाने के लिए तैयार हुए श्री श्री ठाकुरे भोजना अते जनई को स्त्री भक्ति द्वारा श्रीमा जिज्ञासा कोरिया पठाई लेन जे तीनी जाय बेन कीना ठ अभी देखिए सभी लोग तो तैयार हो रहे हैं जाने को और उस समय किस तरह का एक आनंद पूर्ण वातावरण दक्षिणेश्वर काली मंदिर में बना होगा उसका भी हम हम अनुमान कर सकते हैं आजकल देखिए कि ठाकुर की तिथि पूजा जब बेलूर मठ में होती है और और भी कई-कई सेंटर में अर्ली मॉर्निंग सुबह को मंगल आरती के बाद में उषा कीर्तन होता है यह जब उषा कीर्तन मैंने पहली बार देखा था बेलूरमठ में मैं जवाइन करने के लिए गया था पीपीटीसी प्री प्रोबेशनर ट्रेनिंग सेंटर मुझे इतना अच्छा लगा था इस तरह का उत्सव मैंने कभी देखा नहीं था देखिए कि आनंद में मत्त होकर के लोग हल्लागुल्ला करें यह सब तो हम लोग अपने घर के आसपास तो देखते ही हैं यह होली का त्यौहार है ना कि यह उत्तरायण है ना कि दीपावली है तो क्या है कि बहुत सारे लड़के इकट्ठा होते थे हमारे मित्र परिवार जन वगैरह आनंद करते-करते उत्सव का पालन करते थे यह सब तो एक देखा है किंतु एक हरि नाम का उत्सव ईश्वर को प्रेरित ईश्वर को संपूर्ण समर्पित उत्सव यह वो भी इतना सुंदर इतना आनंद प्रद कभी हमने देखा नहीं था नहीं कभी इसके बारे में सुना था तो उषा कीर्तन में क्या होता है बेलूरमठ का मंदिर तो देखा ही होगा तो आसपास में बड़ा सा विस्तृत वरांडा है बाहर में चलने के लिए परिक्रमा मार्ग है तो वहां पर इस परिक्रमा मार्ग में अभी यहां पर मंगल आरती समाप्त हो गई है उसका अभी सूर्योदय गंगा के सामने सूर्योदय हो रहा है और फिर अभी जो गाने वाले महाराज जो है हमारे गायक महाराज वह अपने गले में एक वो बांध करके पखावज बांध करके उसके ऊपर में वोह ताल देते देते और एक ब्रह्मचारी महाराज साधु सन्यासी महाराज अपने गले में वो यह बांध देंगे हारमोनियम तो किसी के पास में पखावज है किसी के पास में हार्मोनियम है और फिर यह भजन कीर्तन करते-करते ठाकुर के नाम का वो मंदिर के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और उसमें इतना आनंद आता है इतना आनंद कि मैं पहली बार देखा था मुझे विश्वास नहीं हुआ कि इस तरह की प्रथाएं अपने भारत देश में है अभी भी जीवित है तो यह जो यहां पर पाणी हाटी की बात कर रहे हैं पाणी हाटी तो मैं कभी नहीं गया किंतु अपने संघ में इस तरह से उषा कीर्तन होता है वो मैंने देखा है और बहुत सारे आश्रमों में भी उषा कीर्तन होता है बेलर राजकोट में भी होता था तो इस तरह से एक जो दिव्य आनंद का प्रवाह बहता है जैसे कि अपने मन की सभी मलिन होता है डिप्रेशन है जो भी हमारे दुख है उस कुछ क्षणों के लिए सब कुछ जैसे चला जाएगा अदृश्य हो जाएगा आनंद के इस प्रवाह में बह जाएगा और इतना हमको शांति सुकून मिलेगा उस पूरा दिन तो यह तो मैंने अनुभव किया है अभी देख लीजिए कि जब ठाकुर दक्षिणेश्वर से रवाना हो रहे होंगे मंदिर नौका में बैठने के लिए और यह 202 भक्त वहां पर उपस्थित होंगे तो वह कौन सा कैसा आनंद का क्षण होगा मुहूर मुहू हरि नाम ध्वनि चल रहा है बार-बार अभी यह भजन कीर्तन तो शुरू हो ही गए होंगे ठाकुर है इसलिए तो फिर आनंद के राजाधिराज आनंद के ईश्वर स्वयं उनके भीतर में उपस्थित है तो वह नौका में बैठने का जो समय होगा वो कितना दिव्य आनंद का होगा व कल्पना करके देख लीजिए और यहां पर मां है बेचारी अकेली नबत में रह रही है जितने भी भक्त है सब ठाकुर के साथ में जा रहे हैं मां को जैसे कि अकेला छोड़ कर के तो अभी मां के मन में यह ना हो कि मैं भी वहां पर जाऊं यह हो ही कैसे सकता है तो इमीडिएट मां ने संदेशा पहुंचाया कि क्या मैं भी आपके साथ में आऊं कि नहीं श्री श्री ठाकुरर भोजना आंते जन को स्त्री भक्ते द्वारा श्रीमा जिज्ञासा कोरिया पाठई लेन ज तीनी जाय बेन कीना ठाकुर के सुबह का नाश्ता जैसे ही समाप्त हो गया एक स्त्री भक्त के द्वारा मां ने मैसेज पहुंचाया कि क्या वह भी आ सकते हैं कि नहीं आ सकती है कि नहीं ठाकुर स्त्री भक्तों के बोली लेन तुमरा तो जा छो जद और इच्छा होई तो चलो तो ठाकुर ने उस त्री भक्त को कहा कि तुम लोग तो जा ही रही हो माने स्त्रियां तो है ही है कंपनी के लिए तो यदि उसकी इच्छा है तो वह भी आए श्री मां ई कथा सुनिया बोली लेन अनेक लोग के संगे जा शेखाने अत्यंत भीड़ होवे अतो भीड़ नौका थे के ने में उत्सव देखा अर पखे दुष्कर होवे आमी जावो ना माने जैसे ही ऐसा सुना कि ठाकुर कहते हैं कि उसकी इच्छा है तो जाए तो मां ने क्या उत्तर दिया बहुत सारे लोग साथ में जा रहे हैं और वहां पर भी बहुत भीड़ होगी अभी इतनी भीड़ में नौका में से उतर करके यह उत्सव क्षेत्र का दर्शन करना मेरे लिए बड़ा ही मुश्किल होगा इसलिए मैं जाती नहीं हूं देखिए कि मां ने यहां पर और किसी को कष्ट ना हो इवन ठाकुर को भी कष्ट ना हो इस तरह से अपनी बात को कैसे घुमा दिया मां ने ऐसा नहीं कहा कि अच्छा ठीक है ठाकुर की तो इच्छा नहीं है जो कि उन्होंने रात को कहा था उस स्त्री भक्त को रात को कहा था कि यदि उनकी इच्छा होती तो स्पष्ट रूप से कहते हां हां चलो आओ तो सुबह को किंतु मां ने और किसी के आनंद में भंग नहीं डाला यदि मां की इच्छा है फिर भी मां नहीं आ रही है यह सुनने के बाद में यदि यह स्त्री भक्त वहां प उत्सव में जाती तो उसके मन में हमेशा एक खटका रह जाता कि अरे मां को यह आनंद नहीं मिला ठाकुर की सहधर्मिणी होने के बावजूद ठाकुर की शक्ति होने के बावजूद मां नहीं आ पाई और मुझे यह सब आनंद मिल रहा है तो उसके मन में ना एक रिग्रेट रह जाता कि मैंने जो किया वह सही है कि गलत है मेरा क्या धर्म था क्या मैं भी मां के साथ में नबत में रह जाती कि जिससे कि मां को अकेलापन पूरा दिन भर महसूस ना हो तो यह भी तो एक सोचने की बात है तो उसके मन में यह खटका न रह जाए इसके लिए मां ने उनको समझा दिया कि अच्छा ठीक है कि चलो वहां पे तो इतनी भीड़ होगी नौका में भी इतनी भीड़ तो इतनी भीड़ में अभी वहां पे वह नदी के किनारे से वह वहां पर उत्सव क्षेत्र में जाना मेरे लिए संभव नहीं होगा बड़ा ही मुश्किल होगा मैं नहीं जाती हूं तो अब ये स्त्री भक्त भी मान गई होंगी कि अच्छा ठीक है चलो मां ने अपने से ही मना कर दिया है उस जिससे कि इस स्त्री भक्त के हृदय में कोई रिग्रेट ना रह जाए और यह घटना का विवरण सुनकर के और किसी भक्त के मन में ऐसा ना हो कि क्या ठाकुर के साथ में जाकर के हमने ठीक तो किया है मां को बेचारी को अकेली छोड़ कर के तो यह कितने इसके सा आयाम है इसके भीतर में मां का जो बिहेवियर है कितना मैच्योर है खुद को तो आनंद नहीं मिला बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं कि चलो मुझे जो चीज प्राप्त नहीं हुई है तो दूसरों को यदि हो रही है तो इस तरह से वह चारों ओर रिग्रेट प्रकाशित करते घूमेंगे कि जिसको जो प्राप्त हुआ है वह उसका आनंद भी नहीं उठा पाएगा उसके माइंड में गिल्ट फीलिंग खड़ा कर देंगे यह लोग तो यहां यहां पर देखिए कि सिर्फ यह नहीं कि मां नहीं गई दूसरे लोग जो जा रहे हैं उनके मन में कोई रिग्रेट या गिल्ट फीलिंग ना हो इस बात का भी मां कितना ख्याल रखती है श्री मायर अनुमति क्रम शत्री भक्तगण ठाकुरे नौका उठिया उत्सव दर्शने चलिया गेले मां की अनुमति से मां के आशीर्वाद से यह स्त्री भक्त ठाकुर की नौका में उठे और उत्सव क्षेत्र में चले गए उत्सव और भक्त मिलना आदि क्षमापना अंते रात्रि 8:30 टा ठाकुरे नौका दक्षिणेश्वर कालीबाड़ी ते प्रत्यागमन करिले स्त्री भक्ते शही रात्रे श्री मायर निकट अब स्थान कोरिले जब रात को ठाकुर की नौका वापिस आ गई दक्षिणेश्वर में पाणी हाटी उत्सव को आनंद लेकर के तब कहीं यह स्त्री भक्त मां के पास में उसी दिन रह गई अभी यह जो पाणी हाटी में क्या हुआ वोह पूरा विवरण गंभीर नंद जी महाराज ने यहां पर स्किप कर दिया है क्योंकि वह विवरण बड़े ही विषद रूप से लीला प्रसंग में दिया गया है और हमने उसको डिस्कस भी किया था कि किस तरह से दो ढोंगी बाबा जी की मद वजह से ठाकुर को कितना सफर करना पड़ा था पहले तो बात थी ठाकुर को गले में दर्द ऑलरेडी प्रारंभ हो गया था वैद्य ने कहा था कि यदि भाव समाधि होगा उत्सव क्षेत्र में ले जाएंगे तो पूरा डर है कि यह गले का दर्द बढ़ जाए तो ठाकुर भी बड़े अलर्ट थे भक्त लोग भी बड़े अलर्ट थे कि ठाकुर को किसी तरह की समाधि भावना हो तो वहां पर मंदिर में जाकर के चुपचाप खड़े थे ईश्वर के सामने एकाएक एक ढोंगी बाबा जी आकर के ऐसे एक नाटकीय अंदाज से नृत्य कीर्तन करना शुरू किया कि फिर ठाकुर से रहा नहीं गया क्या ऐसे लोग आदर्श स्थापन करेंगे इस धर्म भूमि में तो बिल्कुल नहीं ठाकुर भी जैसे शेर की तरह धाड़ करके सिंह विक्रम से नृत्य कीर्तन में उन्होंने योगदान दे दिया और वह दिव्य नृत्य कीर्तन पूरे उत्सव क्षेत्र में जैसे कि बिजली की तरह यह समाचार फैल गया कि एक सही सही परमहंस हमारे भीतर में अवती हुए हैं और फिर जो लोगों की भीड़ चारों ओर और उनका उत्साह जैसे कि ठाकुर को और ज्यादा फीडबैक दे रहा है और ज्यादा 10 गुना होकर के ठाकुर के उत्साह को बढ़ा दे रहा है तो भक्तगण तो बेचारे पागल ही हो गए कि क्या करें कैसे भी करके ठाकुर को बड़ी ही मेहनत करके चारों ओर से घिर करके कि जैसे कि ठाकुर को किसी धक्का मुखी का सामना ना करना पड़े कैसे भी करके और एक अलग जगह पे जाकर के ले गए कि जहां पे यह सब स्त्री भक्त वहां पे उपस्थित थी तो अभी देखिए कि अब यह स्त्री भक्त वगैरह किसी मंदिर में यह मालसा भोग वगैरह दे रही थी उसका आयोजन कर रही थी उस उस जगह पे जैसे ठाकुर को ले जाया गया वहां पे एक दूसरे ढोंगी बाबा जी का अवतरण हुआ और इस बाबा जी ने क्या किया ठाकुर समाधि स्त थे चारों ओर भक्तगण खड़े थे ठाकुर को किसी तरह का धक्का ना लगे किसी भी तरह की इजा ना हो तो यह भक्तगण की बैरियर को कैसे भी करके वो तोड़ कर के भीतर में आकर के ठाकुर के मुंह में मालसा प्रसाद का एक अंश रख दिया जैसे ही ऐसा किया ठाकुर का भाव भंग हो गया और जैसे कि बड़ी क्रूरता के साथ में जैसे कि उनको भाव राज्य से इस लौकिक जगत में पटक दिया गया हो वैसे ही ऐसा कष्ट उनके शरीर में फैल गया ध्रु जने लगे और थू थू करके यह भोग का वह जो कण उनके मुंह में डाला था उसको फेंक दिया अभी बाकी भक्त लोग तो इस बाबा जी के ऊपर में बड़े नाराज हो ही गए किंतु बाय दैट टाइम द डैमेज वाज डन अभी क्या करें ठाकुर का भी भाव भंग हो गया है तो अभी सबने ठीक किया कि चलो अभी दक्षिणेश्वर वापस चलते हैं तो यह पूरी घटना उस दिन हुआ था तो यह घटना चक्र समाप्त करके दक्षिणेश्वर जब वापस आए तब क्या हुआ स्त्री भक्ते रा शही रात्रि श्री मायर निकट अस्थान करी लेन एवं पूर्णिमा ते स्नान जात्रा दिवसे देवी प्रतिष्ठा वारिक उपलक्ष काली बाटी ते विशेष समारोह होई बे जानिया ओई पर्व दर्शना अते कोलकाता फिरी बेन स्थिर कोरलेन स्त्री भक्तों ने ठीक किया कि स्नान यात्रा का का दिन है अगले दिन और उसी दिन को काली मंदिर की प्रतिष्ठा हुई थी बहुत बड़ा उत्सव होने वाला है और इस उत्सव में प्रति वसर प्रत्येक साल ठाकुर को बहुत ही भाव समाधि होती है बड़ा ही आनंद कीर्तन भजन में दिन बीतते हैं तो वह दिव्य आनंद जैसे कि कल उनको पानी हाटी में मिला था वही दिव्य आनंद आज उनको स्नान यात्रा के दिन मिलने वाला है अगले दिन यह सोचकर के उस आनंद का आनंद उठाने के लिए बाकी सब स्त्री भक्त वहीं पर मां के पास में नबत में रह गई राते खाते बसिया ठाकुर पानी हाटी कथा प्रसंगे तहा देर एक जन के बोली लेन उस दिन रात को खाने के समय ठाकुर ने इस पानी हाटी के प्रसंग के बारे में एक स्त्री भक्त को बताया अतो भीड़ तार ऊपर भाव समाधि जन् अमा के सकले लख करलो इतनी तो भीड़ थी ऊपर में से मुझे जो भाव समाधि हो रही थी उसकी वजह से सभी लोगों की नजर मेरे ऊपर में थी वो संगे नाग भलो करे छ वो अर्थात की मां हमारे साथ में ना आकर के उसने अच्छा ही किया है ओके संगे देख ले लोके बोल तो हंसो हंसी ऐसे छ वो जद साथ में आती तो लोग कहते कि हंस हंसी आए हैं वो खूब बुद्धिमता वो बड़ी बुद्धिमता है उसका जो मैच्योर स्पिरिचुअल मैच्योरिटी बड़ा ही उच्च कक्षा का है अच्छा ही हुआ वह नहीं आई ठाकुर आहार पर स्त्री भक्तगण श्री मां के ई कोथा सुनाई ले तीनी बोली लेन ठाकुर का आहार हो गया उसके बाद में स्त्री भक्तों ने वही बात जो ठाकुर ने कही थी उसको मां को बताया तब मां ने क्या कहा प्राते उन्नी आमा के जी भाबे जेते बोले पठान ताते बुझते पारलम उनी मन खुले ई विषय अनुमति दिना सुबह को उन्होंने जिस शब्द का प्रयोग करके मुझे जाने के लिए अनुमति दी थी उस शब्दों को सुन कर के ही मैं समझ गई कि उन्होंने मन खोल के अनुमति नहीं दी है ता होले बोलते हैं हां जाबे बोई की यदि मन खोल कर के अनुमति देते तो कहते हां हां क्यों नहीं जाएगी सब लोग जा रहे हैं वो भी आए ता ना करे उन्नी ही विषय मीमांसा भर जख हमार ऊपर फेले बोलेन और इच्छा होई तो चलू तखन स्थिर कर लूम जा बार संकल्प त्याग कराई बालो तो ऐसा भर दे कर के ना बोलने की जगह ठाकुर ने जब इस संकल्प जाने ना जाने का निर्णय जब मेरे पर छोड़ा तब मैंने यही ठीक किया कि न जाना सबसे उचित है देखिए कि एक तो यह जो स्पिरिचुअल मैच्योरिटी है मां की और दूसरा है कि स्वार्थ का जो कैलक लेशन है स्वार्थ निस्वार्थ का कैलकुलेशन व्यष्टि धर्म और समष्टि धर्म यहां पर पाणी हाटी में जाना मां का एक आनंद अपने को आनंद होता अपना व्यष्टि धर्म पालन करने के लिए कि मुझे अध्यात्मिक आनंद हो यह जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मां जा रही थी किंतु वही बात यही शब्द में ठाकुर जब श्याम पुकुर में जाने के लिए कहते हैं वहां पर मां का समष्टि धर्म था निस्वार्थ का का पालन करना था क्योंकि हमने देखा कि श्याम पुकुर में मां के लिए रहना कितना कठिन था सुबह को रात को 11 बजे तो सोना है अर्ली मने सुबह कहां आधी रात को ही 2 बजे उठ जाना है मुश्किल से तीन घंटे की नींद और इस तीन घंटे में ठाकुर के लिए फिर दिन भर ठाकुर के लिए जो सेवा वगैरह करना है कठोर परिश्रम दिन के बाद दिन मां ऐसा करती रही तो वहां पर उनका स्वार्थ नहीं था यहां पर उनका स्वार्थ था तो यह डिस्कशन हमने काफी किया है इसके लिए अभी इसको हम स्किप कर देते हैं यहां पे अभी इसके बाद वाला विषय आगे महाराज जी क्या लिखते हैं ओई दिन श्री मायर बुद्धिमत्ता संबंध ठाकुर स्त्री भक्त दिग के अपर एक उदाहरण दिया लेन उसी दिन मां की बुद्धिमत्ता संबंध है ठाकुर ने अन्य स्त्री भक्तों को और एक उदाहरण दिया था मारवाड़ी भक्तो लक्ष्मी नारायण जखन 100 हज टाका दते चाहिले तखन अर माथाय जेनो करात बश दिले मारवाड़ी भक्त लक्ष्मी नारायण जब मुझे 00 रुपया देना चाहता था तो ऐसा लगा जैसे कि मेरे सर पर किसी ने कुल्हाड़ी मार दी हो मां के बोलू मां मां तु दने परे आभार प्रलोभन देखते ली मैंने मां अर्थात की मां काली को पुकारते हुए कहा मां मां तुम क्या इतने दिनों के बाद में फिर से मुझे प्रलोभन दिखाने के लिए आई हो जितना भी प्रलोभन है सभी प्रलोभन को उन्होंने जीत करके ही तो निर्विकल्प समाधि प्राप्त की थी उनका वह जो साधन पर्व था साधन पर्व में सब समय इस तरह के प्रलोभन के सामने ठाकुर ने संघर्ष किया है एक बार वही पंचवटी के नीचे में ठाकुर कहते हैं कि मेरे मन में काम भाव का उदय हुआ था उस समय मैंने मां को कहा कि यदि मेरे मन में यह भाव उदय होता है अपने गले में मैं छुरी मार दूंगा मैं आत्महत्या कर लूंगा यहां तक जाकर के वह मां को धमकी देते हैं फिर वही पंचवटी के नीचे में उनको जो एक दूसरा दर्शन हुआ था कि एक गोरा खलासी एक बड़े से थाली में सोना महर फिर ये सुंदर सिल्क के वस्त्र और रेशम के वस्त्र और फिर यह संदेश वगैरह धन वगैरह का प्रलोभन दे रहा है और साथ में ही दो सुंदर स्त्रियां खड़ी है तो जैसे कि ठाकुर को पूरे विश्व का प्रलोभन ये लोग देने के लिए उनके समक्ष उपस्थित हुए तब ठाकुर ने मां को पुकारना शुरू किया और मां ने आकर के इन सबको काट दिया तो इस तरह के प्रलोभन की बारिश तो ठाकुर के ऊपर में कितनी हुई है उस समय साधन पर्व में और सब समय वह विजयी हुए हैं और बोलकर के ही उन्होंने सर्वोच्च सिद्धि है आध्यात्मिक जगत में निर्विकल्प समाधि उसको प्राप्त किया था तो वह मामला तो पूरा समाप्त हो गया बाद में तो फिर मां की आराधना करके फिर यह तो शक्ति पर्वत ये आनंद पर्वत चालू हुआ है जिसमें कि वह समाज में नए धर्म का या तो फिर कहेंगे वही पुराना धर्म है आज की भाषा में उसको प्रचार कर रहे हैं तो अभी यह फिर से यह प्रलोभन दिखाने के लिए आ गई मा जब यह मारवाड़ी आकर के कहता है कि आप 00 रुपया ले लीजिए समय और मन बुझ बार जन्नो डाकिए बोलू उस समय किंतु ठाकुर ने क्या किया पहली बार तो सीधा सीधी मना कर दिया था कि नहीं लूंगा ये कुछ भी नहीं लूंगा किंतु यहां पर जब इस पर्व में तो मां भी तो साथ में थी तो यह देखने के लिए कि मां के मन में क्या है उसने ठाकुर ने मां को पुकार करके कहा ओगो टाका दते चाय आमी ते पर्बो ना बोलाई तोमार नाम दते चाछ तुम टा नाव ना केनो की बोलो अरे ओगो अरे यह तो यह जो मारवाड़ी है यह रुपया देना चाहता है तो मैं तो ले नहीं पाऊंगा बोलक के तुम्हारे नाम पर देना चाहता है तो तुम तुम उसको क्यों नहीं लोगी क्या कहती हो सुने बलेन सुन कर के ही मा ने कहा ता के मन कोरे होबे टाका ने बा होबे ना आमी ले ही टाका तुम्हारे ने बा होबे कारण आमी रखले तुम्हार सेवा नानो आवश्यक खर्च ना करे थकते पर्बो ना क्यों मैं लूंगी नहीं वो पैसा तो नहीं लेना चाहिए क्यों क्योंकि यदि मैं लूंगी तो तुम्हारे लिए ही तो वह सब पैसा लेने के बराबर हुआ ना क्योंकि मेरे पास में यदि पैसा होगा तो तुम्हारी ही सेवा के लिए और अन्य आवश्यक चीजों के लिए मैं उसका खर्च करूंगी अर्थात कि वह तुम्हारे ही ले लेना बराबर हुआ मुझे देते हैं तो आप ही की सेवा के लिए खर्च करूंगी तो आप ही के लेने के बराबर हुआ तो मा के लोके श्रद्धा भक्ति कोरे तोमार त्यागे जन्नो काजे टाका किछु नेबा होबेना तुमको लोग श्रद्धा भक्ति करते हैं तुम्हारे त्याग के लिए इसी वजह से पैसा बिल्कुल लेना नहीं चाहिए देखिए वो घटना कि वह जयराम बाटी में केदार बाबू क्वाल पाड़ा आश्रम के स्थापक वो जाकर के मां को पूछते हैं कि मां ठाकुर का आगमन तो इस समय यह सर्वधर्म समन्वय के लिए हुआ था तो तो मां ने क्या उत्तर दिया नहीं बाबा ठाकुर का आगमन हुआ था त्याग का सर्वोच्च आदर्श प्रतिष्ठित करने के लिए और फिर एक के बाद एक विभिन्न पंथ से उन्होंने जो ईश्वर साधना की वह तो बाद में आता है सर्वप्रथम तो त्याग ही ठाकुर के जीवन का सर्वोच्च आदर्श था तो देखिए मां के मन में यह बात उसी समय से क्लियर थी कि मां जद पैसा लेगी तो ठाकुर के लिए ही खर्च करना हुआ और ठाकुर को लोग श्रद्धा भक्ति करते हैं उनके त्याग के लिए उनकी यह जो त्याग के प्रति निष्ठा है इसके लिए यदि आप यह पैसा मेरे पास में दिलवाए तो आप ही की सेवा के लिए खर्च होगा तो फिर यह कैसे चलेगा इसके लिए यह रुपया नहीं लेना उचित है और वही कथा सुने आमी हाफ छेड़ बांची उसकी वो बात सुन कर के मैंने गहरी सांस ली और मैंने सोचा कि चलो अच्छा हुआ वरना यह टेस्ट का क्षण है यह परीक्षा की घड़ी है पता नहीं कौन समय क्या हो जाए हालांकि यह बात है कि मां के मन में इस तरह का विकार कभी प्रकट हो प्रकाशित हो वह तो संभव ही नहीं किंतु फिर भी क्या है कि लोगों को तो यह स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए मां ने कभी ऐसा भी यदि कहा होता कि हां चलो इसका अभी बीमारी किसी के अभी हो जाए कोई बीमार हो जाए तो वैद्य कविराज को देने के लिए थोड़ा बहुत रुपया हम रख लेते हैं ऐसा करके मां जद प्रश्न खड़ा करें तो भी तो वह उच्च आदर्श स्थापित नहीं होगा क्योंकि मां को तो हमने देखा है कि वही ठाकुर को ज्यादा दूध पिलाना है तो अभी कैसे मां दूध का जुगाड़ करेगी वहां कालीवाड़ा था वह मां को मां के पास में आकर के ज्यादा ज्यादा दूध दे जाता था और उसके बदले में मां कहती थी उस समय संदेश मिठाइयां बहुत ज्यादा आती थी बहुत सारी आती थी तो वह सब मिठाई वगैरह वह दूध वाले को मां देती थी और यह दूध वाला भी बात सिर्फ यह नहीं है कि मिठाई के लोभ से मां को दूध ज्यादा देता था वह कहता था कि मैं यदि काली मंदिर में दूंगा तो यह जो पुजारी खजांची वगैरह जो है वह जाकर के उनकी यह जो दुष्ट चरित्र वाली स्त्रियों जो उनको पास में रहती है उनको जाकर के खिलाएंगे तो बेटर है कि मैं यहां पे दूंगा तो उनकी सेवा में अर्थात कि ठाकुर की सेवा में लगेगा तो अभी ठाकुर की सेवा करनी है तो ज्यादा दूध भी खरीदना पड़ेगा वो सब चीजें मां को रखनी पड़ेगी उसके लिए अभी सब चीज तो मुफत में नहीं आती उस समय संदेश से यह दूध वाला तो मान जाता था किसी को तो पैसा भी देना पड़ता तो यह प्रश्न तो एटलीस्ट मां खड़ा कर सकती थी कि अच्छा आपका तो महीने का जो पगार है वो ठाकुर को तो वहां पर वो मिलता था वो मंथली सैलरी तो तो इतना ज्यादा नहीं है चलो थोड़ा सा रुपया रख लेते हैं भविष्य में काम में लगेगा भले ही चाहे मां अपने लिए ना करे ठाकुर के लिए तो यह सोच भी सकती थी और इवन जब ये ज कसौटी की परीक्षा की क्षण आई मां ने ना अपने बारे में सोचा ना ठाकुर के बारे में सोचा त्याग ही सर्वोच्च आदर्श है बोलकर के बात को संपूर्ण रूप से ठुकरा दी तो यह सुन कर के ठाकुर के जीन जान में जैसे कि जी आया तो ठाकुर ने कहा जान में जैसे कि जान आई बचे किसी परीक्षा की घड़ी से उत्तीर्ण हो गए अभी देखिए कि इसी तरह की घटना एगजैक्टली सेम तरह की राधा रानी के साथ में होती है वही राधू पागली राधू जो कि जो कि मा योग माया बोल कर के जिसके सहारे जीवन क काटती थी ठाकुर के अंतर्ध्यान होने के बाद में ठाकुर की महासमाधि के बाद में इस राधु को लेकर के मां दक्षिण में जाती है वह तीर्थक्षेत्र भ्रमण करते-करते तो रामनाथ मोस्ट प्रोबेबली रामनाथ की ही घटना है वो मीनाक्षी टेंपल ना कहीं पर मां दर्शन करने के लिए जाती है तो जो राजा था उसने वहां पर मंदिर के जो उसके व्यवस्थापक थे उनको कहा कि पूरा खजाना खोल दीजिए क्योंकि मेरे गु के गुरु परम गुरु वहां पर आ रहे हैं उनके राजा के गुरु थे स्वामी जी स्वामी जी के गुरु मां शारदा देवी तो तो राजा के तो परम गुरु हुए तो परम गुरु वहां पर आ रहे हैं खजाना खोल दीजिए मां को जो चाहिए जो भी लेना चाहे वो ले सकती है तो वो वहां के व्यवस्थापक मां को लेकर के खजाना दिखाने के लिए गए और कहा कि मां इसमें से जो चाहे ले ले तो मां ने तो कहा कि भ बेटा मुझे तो कुछ नहीं चाहिए किंतु यह राधू है यहां पे देखो यदि उसको कुछ चाहिए तो देखिए कि यहां पे ठाकुर जैसे कि मां की परीक्षा कर रहे थे मां वैसे ही इस राधु की परीक्षा करती है और एक बड़ा आश्चर्य की बात है कि राधू की परीक्षा करने की क्या वैसे जरूरत पड़ गई वैसे तो राधु का तो पागलपन सबको पता है वो उसका जो पति था उसके प्रति उसका मोह भी बहुत ज्यादा था उसका तो संतान भी हुआ था एक तरह से कहे तो भौतिकवादी भी थी वह तो फिर उसकी परीक्षा माने क्यों की क्योंकि बात यह है कि आखिर में तो वह योग माया है ठाकुर ने दर्श दे कर के कहा इस योग माया का आश्रय लेकर के तुम शरीर टिका हो वरना तो ठाकुर की महासमाधि के बाद में विरह अग्नि में मां अपना शरीर त्याग कर देती तो एक मातृ भाव का संपर्क राधु के साथ में था बोलकर के मां का जीवन टका था तो जैसे कि मां इस बात की परीक्षा कर रही है कि राधू सही सही योग माया है ना कि ठाकुर ने मुझे वैसे ही फांकी दे कर के वैसे ही मुझे पटा करके फुसला करके ना शरीर धारण करने के लिए मनाया है तो शायद इस तरह की परीक्षा करने के लिए मां राधू को वही बात कहती है कि देखो इतना सारा खजाना है बताओ तुमको क्या चाहिए जो चाहे वो ले लो तो राधू इमीडिएट कहती है अरे ये सोना मोहर है हीरे जवारा है ये सबका मैं क्या करूंगी मेरे तो लिखने के लिए पेंसिल जो थी मेरी वो च खो गई है मुझे एक पेंसिल ला कर के दो तो वही जैसे ठाकुर ने कहा ना हा छेड़े बांच लाम जैसे जी जान में जान आई बड़े ही श्वास रोक कर के सोच रहे थे क्या उत्तर मिलेगा तो एगजैक्टली वही बात मां वहां पर कहती है जान में जैसे जान आई सांस रोक कर के सोच रही थी कि राधू क्या उत्तर देगी यदि सबके सामने कुछ हीरा जवाहरात मांग ले तो हमारी तो बड़ी ही बेइज्जती होगी तो ऐसा नहीं करके राधू ने सिर्फ इतना कहा मुझे पेंसिल लाकर के दो तब मां बड़ी ही खुश होकर के बाहर में से एक दुकान में से राधू के लिए एक पेंसिल खरीद करके उसको दे दी यही बात देखिए कि ठाकुर की मां के बारे में भी ऐसी ही घटना है अभी मथुर बाबू उस समय तो चंद्रा मणि देवी ठाकुर की मां नबत में थी मथुर बाबू बा तो उनको बड़ा ही श्रद्धा करते थे एक बार उन्होंने नबत में वो चंद्रा मणि देवी भी नबत में ही रहती थी तो मथुर बाबू नबत में जाकर के मां को कहते हैं चंद्रा मणि देवी को कि मां मेरे पास में तो इतना धन है आपको जो चाहिए वो मेरे से मांग लीजिए तो चंद्रा मणि देवी बड़ी ही सोच में पड़ गई देखिए चंद्रा मणि देवी के पास में वैसे तो कुछ नहीं था शिव का संसार था पूरा जीवन गरीबी में बिताया था खुदीराम ठाकुर के पिताजी वो तो इतने आचार निष्ठ ब्राह्मण थे कि हर किसी के घर का वो भिक्षा भी ग्रहण नहीं करते थे जीवन भर जैसे कि उन्होंने अभाव में बिताया है वही चंद्रा मणि देवी के पास में इतना धनी व्यक्ति जमींदार आकर के कहता है कि जो चाहे मांग लीजिए तो चंद्रा मणि देवी भी कहती है कि बेटा मेरे खाने की और रहने की व्यवस्था तो तुमने कर ही दी है इसके अलावा और क्या चाहिए मुझे तो मथुर बाबू तो छोड़ते नहीं है नहीं मां आपको कुछ तो लेना ही पड़ेगा तब चंद्रा मणि देवी कहती हैं कि अच्छा यह तबाकू का ये जो पत्ते हैं जो कि सेवन वो चंद्रा मणि देवी करती थी तो वो तंबाकू खत्म हो गया है वो थोड़ा सा मुझे लाकर के दे दो तब वो मथुर बाबू की आंखों में आंसू आ गए भौतिकवादी आदमी पैसा जमीन जायदाद पावर सत्ता इसी के पीछे में उसका जीवन बीता है वह कहता है कि आपके जैसी पवित्रता स्वरूपिणी त्यागी मां नहीं होती तो आपका संतान ऐसे त्यागियो का राजा कैसे प्रकट होता तो देखिए कि इस तरह की परीक्षा ठाकुर के आसपास में रहने वाले बहुत सारों

प्रश्न: स्वामीजी ने माँ को क्यों स्वीकार किया, इसके बारे में अलग-अलग सिद्धांत

की ली गई है और जिस तरह से ठाकुर सब परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हैं यह लोग भी उसी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हैं अच्छा तो आज यहीं तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु व योग सूत्र का सूत्र है वह अपरिग्रह है ना यम नियम में तो अपरिग्रह सर्वर त्न प्राप्ति ही जो अपरिग्रह अर्थात की चीजों को अपने पास में नहीं रखते नोन पजेशन उनको सब रत्नों की प्राप्ति होती है तो प्रश्न होगा कि कौन से रत्न यह सोना जवाहरात वो नहीं कि गुण रूपी

प्रश्न: मैंने कई साधुओं और भक्तों से बात की है। वे बता सकते हैं कि उन्होंने ठाकुर या स्वामीजी को कैसे स्वीकार किया, लेकिन कोई भी यह नहीं बता सकता कि उन्होंने माँ को कैसे स्वीकार किया

रत्न सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह गुण रूपी रत्नों की प्राप्ति होती है ना सिर्फ आपके पास में नहीं हमारे पास में भी है अभी मैं यहां पर सीपी क्लीनिक है तो कल परसों गया था तो एक डोनर आ कर के बोलता है कि आपको कौन-कौन से इक्विपमेंट चाहिए तो मैंने उनको बोला कि सब लिस्ट बना कर के रखिए कौन-कौन से इक्विपमेंट लेने है तो इस तरह का लिस्ट तो हमारे पास में भी [हंसी] है [हंसी] आपका यहां पर मैं वोह जो कंप्यूटर क्लास चलता है हमारा तो उसमें वह मैं थोड़ा सा उनको उनके साथ में बात करता हूं स्टूडेंट के साथ में तो कल परसों ही मैंने उनको वह स्टोरी बताई ठाकुर की वो जो शमशा कि एक राजा एक पार्टिकुलर समय ही वह पूजा करेगा ही करेगा कुछ भी हो जाए तो शत्रु राजा ने उसी समय उस पर आक्रमण कर दिया तो अभी यह राजा कहता है कि नहीं मेरा धर्म है सबसे पहले मैं पूजा करूंगा राज्य धर्म बाद में तो वो पूजा करता ही रहा किंतु अब जिसकी पूजा करता है उसका कर्तव्य आ जाता है कि अभी राजा की रक्षा कर र है तो श्याम शह स्वयं भगवान कृष्ण स्वयं राजा के घोड़े पर जाकर के मैदान में जाकर शत्रुओं के साथ में युद्ध करके वापस आते हैं तो अभी यह कहानी मैंने कही बताना चाहता था कि देखिए कि अपना जीवन ट्रांसफॉर्म करते हैं भक्ति लाते हैं अपने जीवन में तो भगवान भी हमारी सहाय करेंगे किंतु यह जो व्यष्टि समष्टि वाली बात है ना मैंने उनको कुछ दिनों पहले बताई थी तो एक लड़की मुझे पूछती है कि अच्छा आपको आपने यह जो कहानी बताई वसा तो आपने बताया कि बड़ा भक्ति भाव राजा में था किंतु उसने अपने जो धर्म है राज्य धर्म उसका उल्लंघन नहीं किया तो मैंने कहा बिल्कुल ठीक बात है राज्य धर्म का उसने उल्लंघन किया व्हिच इज रंग किंतु देखिए कि यहां पर भी एक हायरा की ऑफ रिलीजन है धर्म है हाईएस्ट रिलीजन यदि ईश्वर के प्रति आपकी इतनी तीव्र निष्ठा है तो आप अपना समष्टि धर्म है उसको भी आप त्याग कर सकते हैं क्योंकि फिर उस लेवल प जाकर के ईश्वर स्वयं आपके लिए समष्टि धर्म का पालन कर लेंगे किंतु वो चाहिए निष्ठा अदर वाइज क्या होगा मुंह से तो बोलते हैं कि मुझे भगवान पर विश्वास है और किंतु फिर वह उसकी तरह कि धोबी मारने को आए तो पत्थर उठा लिया तो ऐसे नहीं चलेगा दो मुंह वाली बात नहीं चलेगी यदि आपको ईश्वर में विश्वास है तो ऐसा विश्वास कीजिए कि फिर ईश्वर को स्वयं आ कर के आपके लिए समष्टि धर्म का पालन करना पड़े इसको हमने पहले भी डिस्कस किया था देखिए कि फर्स्ट प्रिंसिपल है ब्रह्म सत्य और जगत भी सत्य क्योंकि जगत तो इस ब्रह्मण का ही एक छाया स्वरूप है ब्रह्मण की ही किरण समान है तो यदि इस फर्स्ट प्रिंसिपल से बाकी सब कुछ डिराइवर होता है बाकी और अब जैसे कि भगवान बुद्ध के अवतार में निर्वाण का महत्व इतना ना था कि उसको छोड़ कर के भगवान बुद्ध ने एक बार निर्वाण का मंत्र दे दिया तो फिर उसके ऊपर में कुछ भी बिल्ड अप करना संभव नहीं था क्योंकि वह सब कुछ निर्वाण की ओर ही ले जाता है फिर वह आनंद हो कि भगवान बुद्ध की पत्नी या उनकी मां हो कोई भी हो उस अल्टीमेट फर्स्ट प्रिंसिपल के ऊपर में बिल्ड अप करने में समर्थ नहीं थी क्योंकि वह यूनिक प्रिंसिपल अपने आप में था जबकि ठाकुर का ऐसा है कि ब्रह्म भी सत्य और शक्ति भी सत्य ब्रह्म शक्ति अभेद तो इसके ऊपर में ठाकुर और स्वामी जी और मां दोनों ने अपना एक यूनिक पर्सपेक्टिव दिया है स्वामी जी ने इसी प्रिंसिपल को सिविलाइजेशनल स्केल पे अप्लाई किया है ऑन द स्टडी ऑफ द राइज एंड फॉल ऑफ द सिविलाइजेशन अभी प्रश्न होगा सिविलाइजेशन यदि मिथ्या है निर्वाण प्राप्ति ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है तो स्टडी का क्या तात्पर्य है तात्पर्य है क्योंकि ब्रह्मा और शक्ति अभेद है सिविलाइजेशन शक्ति का ही एक स्वरूप है बोल कर के ही राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन वाज अ रिलेवेंट फील्ड ऑफ स्टडी और वही प्रिंसिपल को एक्सटेंड करके माने फैमिली लेवल पर अप्लाई किया है फैमिली का क्या महत्व है भगवान बुद्ध के आसपास में जितने भी थे सभी ने संन्यास धर्म लेना उचित समझा राजाओं ने भी संन्यास धर्म लेना उचित समझा जबकि यहां पर मां है एकदम क्लियर संसार में ही रह रही है वही अपने पागल भाइयों के साथ में पागल यह राधू माकू पागली मामी इनके साथ में रहकर के संसार धर्म का इतना आदर्श पूर्वक पालन कर रही है व्हाट इज द रिलेव ऑफ दैट जद ईश्वर प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है तो नहीं किंतु यह संसार भी जैसे कि वही शक्ति का एक स्वरूप है और संसार को भी विद्या का संसार कैसे परिणत बन कर देना अविद्या के संसार में से विद्या के संसार की ओर कैसे जाना दैट इज मदर्स कंट्रीब्यूशन तो व राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन हो या तो यह विद्या का संसार हो दोनों के पीछे वोह फर्स्ट प्रिंसिपल कारण भूत है कि ब्रह्मा और शक्ति अभेद है यस अभी देखिए इंटरेस्टिंग इंटरेस्टिंग बुद्धिज्म में भी एक संघ है किंतु दैट इज आउट ऑफ कंपैशन भगवान बुद्ध में जो करुणा थी और वह करुणा के चलते भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा था कि अपने भाइयों के प्रति करुणा पूर्वक व्यवहार करें वही एक बीमार साधु एक भिक्खू उनके स उसमें था विहार में भगवान ने जाकर के देखा कि कोई उनकी सेवा नहीं कर रहा है सभी लोग साधना में मग्न है तो बुद्ध ने कहा तुम लोगों को शर्म नहीं आती है आप ही का भाई इस तरह से बीमार होक के वो पीड़ित है उसको पर थोड़ा सा जब ध्यान छोड़ के उसकी सेवा करो सो दैट वाज कंपैशन आउट ऑफ दिस करुणा अपने संघ में है कि ये संघ इट सेल्फ इज अ पार्ट ऑफ दिस शक्ति फील्ड सो सर्विंग अवर ब्रदर्स इज आल्सो सर्विंग गॉड इन अनदर फॉर्म सो दिखता है अपेरेंटली बाहर में से एक जैसा किंतु प्रिंसिपल उनके बड़े डिफरेंट है यहां पे क्या है कि मां ऐसा नहीं है कि वे लोग जो करते थे सब करने देती थी मां ने उनके बिहेवियर को मॉडिफाई करने का प्रयास तो काफी किया है अभी एक घटना है कि जयराम बाटी में है मनसा बोलक के एक लड़का मां के पास में आया बोल रहा है मां मुझे सन्यास दो तो मां ने उसको गेरुआ वस्त्र दिया अभी यह लड़का बड़ा अच्छा गायक था तो शाम को फिर वहां पर मां के घर के सामने वह हारमोनियम से लेकर के एक के बाद एक बड़े ही सुंदर भजन गा रहा है और सब मां के घर की सभी स्त्रियां मां भी अपने रामदे में बैठ कर के सुन रही है उस समय यही नलिनी और मां को आपस में बात कर रहे हैं वो बोल रहे हैं कि अरे इतना अच्छा लड़का मां ने इसको सन्यास दे दिया और फिर अभी वो उसका तो उसके मां पिताजी नेने उसको कितने कष्ट से बड़ा किया होगा कितनी अपेक्षा होगी अभी देखिए मां ने उसको सन्यास दे दिया मां तुम क्यों इस तरह के पाप में पड़ती हो कहां वो संसार धर्म करेगा ना कि कहां वो हरिद्वार जाकर के भिक्षा करेगा ना कि ये यों के मल मूत्र उसको साफ करता फिरे ग कि मां आपने ऐसा पाप क्यों किया साथ-साथ में ही मां के नाराज होकर के कह दिया कि क्या यह सभी लोगों की यह संसार वृत्ति होती है यह पशु वत भाव होता है हर साल तुम्हारे बच्चे होते हैं फिर भी तुमको अपने पति के पास जाने की आस मिटती नहीं है अभी सब छोड़ कर के तुम ठीक-ठाक करके रहो वरना भगा दूंगी यहां से ऐसा माने जोर से कहा कि ये लोग चुप हो गए तो अभी क्या है कि बात यह नहीं है कि मां उनको कह कहती है कि तुम लोग अपने जीवन को मॉडिफाई करो किंतु यह लोग जब ऐसी बातें करना शुरू करते हैं तब मां बड़ी नाराज हो जाती है वही उद्बोधन की घटना है कि राधू पैर में पायल पहन कर के वो घुंघरू पहन कर के इधर-उधर दौड़ रही है तो अभी उसके पैरों की तो आवाज होगी अभी जनरली लड़कियों के पैरों की ही ऐसी आवाज होती है तो मां एकदम नाराज हो गई कहा नीचे में सब साधु सन्यासी रहते हैं उनके मन में तुम विक्षेप पाड़ रही हो तुमको शर्म नहीं आती अभी का अभी यह पायल खोल दो चुपचाप बैठो यहां पे वरना देखो को तो इस तरह से जब इन लोगों का बिहेवियर एक हद क्रॉस कर जाता था तब मां इमीडिएट उनको डिसिप्लिन करती थी तो बट यू आर राइट कि मां ने कभी ऐसा नहीं कहा अभी राधु की ही बात देखिए राधू का विवाह हुआ वो जब उसको प्रेग्नेंट थी उस समय उसके जो नाटक चालू हुए थे फिर बच्चे को जन्म दिया उस समय तो जैसे वो बिस्तर में से खड़ी नहीं हो रही है सब समय बिस्तर में सो रही है अफीम खाने का अभ्यास बना लिया है वहीं बिस्तर में ही वो शौच वगैरह करती है मां को जाकर साफ करना पड़ता था ऐसा कष्ट वो मां को देती थी तब मां ने कहा कि देखिए मैंने इसको शादी करवा करके बहुत बड़ा गुनाह किया तो किसी ने मां को पूछा मां आपने इससे शादी क्यों करवाई तो मां ने कहा देखो उसके तो संस्कार है उसके अनुसार तो जो एक धर्म है संसार धर्म वो तो मुझे निभाना ही पड़ेगा ना तो मां एक और यह भी समझती है कि उनके संस्कार के अनुसार उनको जाना है और ऑन द अदर हैंड जब वो एक सीमा क्रॉस कर जाएंगे तो मां उनको डांटते भी थी दोनों चीजें थी वहां पर और सिर्फ मां नहीं स्वामी जी भी जब स्वामी जी लंदन में थे तो उनका छोटा भाई था महेंद्रनाथ तो वो वहां पर आया भूपेंद्र महेंद्र महेंद्र तो वह स्वामी जी के साथ में लंडन में रह रहा था तो स्वामी जी अभी उसका इच्छा था कि वह लॉयर का स्टडी करेगा और वहां पर ब्रिटिश इंपीरियल लाइब्रेरी ने कि ऐसा कुछ है वहां पर रेगुलर जाता था तब स्वामी जी ने उसको कहा अरे पगले तुम अमेरिका जाओ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनो और बार-बार कहते थे अमेरिका इस ऑफ इलेक्ट्रिसिटी अभी भारत को इंजीनियर की जरूरत है नहीं कि लॉयर की तो अभी यह उसका भाई भी पागल जैसा था नहीं मुझे लॉयर ही बनना है तो व्हाट एवर किंतु स्वामी जी ने उसको यह नहीं कहा कि तुम साधू हो जाओ तु इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हो भारत को इलेक्ट्रिसिटी की जरूरत है अमेरिका इ फूल ऑफ इलेक्ट्रिसिटी तो साधु होने की बात नहीं की क्योंकि ये लोग संस्कार भी पहचानते थे जिसका जो संस्कार नहीं है जोर जबरदस्ती उसको साधु बनाया तो फिर वह खुद भी भ्रष्ट होंगे संघ को भी पतित करेंगे क्योंकि देखिए ठाकुर ने इसको कहा ना केशव सेन को कि तुम तुम है ना संस्कार देख करर के शिष्य नहीं बनाते हो इसलिए ऐसा होता है वही वह वही कथामृत में हमने पढ़ा विजय कृष्ण गोस्वामी वहां से चला गया फिर केशव को गाली भी देता गया केशव के आधे संघ को भी तोड़ दिया अभी ऐसा नहीं है कि ठाकुर देख कर के बोलते हैं इसका संस्कार अच्छा है तो इसको शिष्य बनाओ इसका संस्कार अच्छा नहीं तो इसको मत बनाओ ठाकुर कैटेगरी इज करते थे कि किसका कितना संस्कार है जो त्यागी होने को उचित मतलब उसके क्षमता है तो उसको त्यागी बनाओ और यहां पर वई एज का कोई लिमिटेशन नहीं था गुणो गोपाल महाराज तो ठाकुर से भी ज्यादा वृद्ध थे उम्र में ये सबसे उम्र में बड़े थे मास्टर महाशय बाकी सबसे भी तो एज का भी कोई प्रॉब्लम नहीं था कि यंग लड़के हैं तो त्यागी और गृहस्थ है शादीशुदा है तो गृहस्थ ऐसा भी नहीं संस्कार देख कर के त्याग का उपदेश देते थे कौन त्याग के रास्ते पर कितना जा सकता है वो रसिक मैतर है तो उसको उस तरह से गेटमैन की ठाकुर के ऊपर श्रद्धा है तो गेटमैन को उस तरह से सबको संस्कार देख कर के उपदेश देना है जो उसके संस्कार से ज्यादा आपने कुछ बोल दिया तो खुद तो गिरेगा ही और वह ब्रह्म समाज को तोड़ कर के यह लोग चले गए ऐसा संघ को भी तोड़ेगा यदि स्पिरिचुअल इंक्लिनेशन अपने जैसा नहीं है तो फिर तो हमको क्या है कि देखिए दो बातें हैं उनको खुद को मॉडिफाई करना कोई कोई लाभ नहीं है एक स्पिरिचुअल झील जो हो है ना जो नए कन्वर्ट होते हैं ना उनमें ये झील बहुत ज्यादा होती है जनरली इसको न्यू कन्वर्ट सिंड्रोम बोलते हैं नया कन्वर्ट हुआ है तो बहुत ज्यादा जोर-जोर से वो उपदेश देगा तो दैट वी हैव टू अवॉइड ऑन द अदर हैंड जब हमको हाम होता है तो देन वी हैव टू ड्रॉ ए लक्ष्मण रेखा जैसे मां ने किया था कि ये राधू या नलिनी दूसरों को उनके बिहेवियर की वजह से हमको कष्ट होता है तो देन वी विल हैव टू से वी कैन नॉट टॉलरेट दिस एट द सेम टाइम लेट देम गो अहेड ऑन देयर ओन पाथ अदर क्योंकि सी वी कैन शेयर विद देम द टीचिंग्स फ्रॉम हियर ठाकुर म स्वामी जी के वो जो कोटेशंस वगैरह शेयर कर दिए पढ़ना है तो पढ़े नहीं पढ़ना है तो नहीं पढ़े मैं अपने स्टेटस पर कुछ कुछ रखते रहता हूं जिसको देखना है वो देखे ना देखना हो ना देखे उससे हमको कुछ नहीं है तो वह चलो एक अल्ट्रुजर्रा तक वैसा ही रहा फिर एक दिन बारिश आया तो उसमें से वटवृक्ष हो गया तो एक बीज हमने स्थापित कर दिया हो सकता है कितने साल के बाद में उसको जरूरत पड़ जाए और यह शक्ति दई किताब उसके पास शक्ति दई विचार है उसके पास में उसमें से प्रेरणा मिल जाए तो और या तो फिर उनके घर में पड़ी है कोई और बाहर से कोई आया देखा उसका जीवन बदल गया सो वी डू नॉट नो सो लेट अस डू इट अल्ट्रस्ट कली विदाउट एनी एक्सपेक्टेशन कि चलो किताब बांट दो बीच-बीच में क्या है वो बर्थडे होती है तो हम लोग गिफ्ट वगैरह देते हैं तो प्रबोध महाराज तो हमेशा कहते हैं शादी ब्याह वगैरह में वो स्वामी जी की किताबें बांटो सो इतना काम हमको कर देना है अपनी कॉन्शियस को हमको क्लियर करके रखना है फिर वो उसका ऊपर में कुछ करे ना करे वो उनका संस्कार जाने तो वो एक हो गया दूसरा कि उनके मिसबिहेवियर की वजह से यदि अपनी साधना में कहीं पे व्याधा होती है तो वी विल हैव टू टेक सम स्टैंड कि भाई ऐसा तो नहीं चलेगा अभी जैसे मैं अपने घर में स्टडी कर रहा था कभी-कभी देखता था आसपास में कहीं पे बड़े जोर-जोर से गाना बाजना व वगैरह चलता था तो मुझे जाकर के कहना पड़ता था कि अरे स्टडी में मुझे डिफिकल्टी हो रही है आप अपना स्टीरियो का आवाज थोड़ा कम कीजिए तो दैट वी विल हैव टू डू