मङ्गलाचरण
ओम स्थापकाय च धर्मस्य [गाना गाने की आवाज़] सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः
श्री रामकृष्ण के अंतिम दिन: माँ सारदा की दृष्टि से
श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र उसका हम पाठ कर रहे थे। बड़ा ही इंपॉर्टेंट दिन अभी आ रहा है। रामकृष्ण संघ में दो फेज में हम बांट सकते हैं हमारा पूरा इतिहास श्री रामकृष्ण देव की प्रगट लीला जब वह स्थूल देह में थे उस समय जो उन्होंने लीला किया था लीला विलास किया था और अप्रगट लीला श्री रामकृष्ण देव ने अपने स्थूल देह का त्याग करके संघ रूपी इस विराट देह में प्रवेश किया और फिर इस विराट देह के माध्यम से श्री रामकृष्ण लीला कर रहे हैं। तो यह द्वितीय चरण अभी रामकृष्ण संग में आन उपस्थित हुआ है। श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि बस अभी चंद ही दिनों में होने ही वाली है। तो वह जो कुछ आखिरी दिनों का वर्णन श्री मां शारदा देवी के जीवन चरित्र में इसका हम पाठ कर रहे थे। गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तक अध्याय का नाम है चीर सिमंतिनी चीर सधवा इस अर्थ में कि श्री रामकृष्ण देव की लीला श्री रामकृष्ण देव भी नित्य है। उनकी लीला भी नित्य है। इसके लिए मां कभी भी विधवा नहीं हो सकती। तो इस अर्थ में गंभीरानंद जी ने बड़ा ही सुंदर टाइटल दिया है इस अध्याय का चीर सधवा चीर सिमंतिनी तो इस अध्याय में ऑलरेडी हमने देख लिया कि मां के हृदय में एक आशा थी कि तारककेश्वर जाकर के महादेव के सामने हत्या देंगे। मां ने अपने खुद के जीवन में इनफ उदाहरण प्राप्त किए थे। इनफ उनको प्रूफ मिला था कि हां महादेव ईश्वर आर भक्त की आरती सुनते हैं और उसको परिपुष्ट करने के लिए उसकी पूर्ण करने के लिए आशीर्वाद भी देते हैं। वही फेमस सिंह वाहिनी देवी जयराम बाटी में उसके सामने मां की हत्या का प्रसंग तो वह तो मां को पता था इस आशा से मां तारकेश्वर गई महादेव के सामने हत्या दी किंतु देखा कि एक दिन रात को मां को एक विज़ हुआ जैसे कि बहुत सारी मिट्टी की हांडियां मिट्टी के पात्र एक के ऊपर एक सजा के रखे हैं। किसी ने लाठी मार के उनको तोड़ दिया हो। इस तरह का आवाज हुआ और यह अदृश्य वाणी सुनाई दी कि इस संसार में कौन किसका स्वामी है? कौन किसका क्या है? मैं किसके लिए यहां पर अपना देह त्याग करने के लिए यहां पर पड़ी हूं। वैसे तो यह वाणी मां के खुद के हृदय में से ही प्रकट हुई थी। तो अभी यह एक प्रलय विषाण महादेव जब वह प्रलय होता है तो वो रणसंगा जब बजाते हैं तो उसको प्रलय विषाण वो प्रलय विषाण की महान निनाद से मां के हृदय में त्याग और वैराग्य का अग्नि प्रज्वलित हो गया और वहां से मां फिरत चली आई काशीपुर जहां पर श्री रामकृष्ण देव को रखा गया था। सब भक्त ले आए थे कोलकाता में। काशीपुर नामक एक एरिया है। वहां पे एक उद्यान ग्रह में उनकी ट्रीटमेंट के लिए रखा गया था। तो वह तो हुआ पर्व समाप्त और उसके बाद में गंभीरानंद जी एक के बाद एक वर्णन करते हैं कि कौन-कौन से लक्षण उपस्थित होंगे ठाकुर की दे ठाकुर की महासमाधि से पहले। स्थूल देह त्याग करने से पहले कौन-कौन से लक्षण प्रकट होंगे उसका एक विवरण और अभी इसके बाद में गंभीरानंद जी वो कहते हैं कि मां को एक स्वप्न आया था उसमें मां ने देखा कि मां काली गर्दन टेढ़ी करके खड़ी है। तो मां ने पूछा मां शारदा ने मां काली को पूछा कि क्यों मां तुम इस तरह से खड़ी हो? तो मां काली ने कहा और वेटेर जो माने उसके उस चीज के लिए अर्थात कि ठाकुर की ओर इशारा करके कहा कि उनको कैंसर हुआ है बोलकर के मेरे गले में भी व्यथा हो रही है। तो मां ने समझा मां शारदा ने समझा कि मां काली भले ही चाहे अपने खुद से व्यथा अनुभव कर रही हो किंतु अभी उनकी इच्छा नहीं कि ठाकुर की लीला स्थूल देह में चले अभी ज्यादा समय तो भी वह एक एक के बाद एक यह सब साइंस यह सब क्या कहेंगे कि होनी अनहोनी यह सब मां की नजर के सामने आ रहा है और उसमें भी एक दिन ठाकुर ने मां को बुला के कहा कि देखो मुझे पता नहीं मेरे मन में हमेशा ब्रह्म भाव की उद्दीपना हो रही है। तो फिर मां बेचारी क्या कहेगी उसके सामने ब्रह्म भाव का उद्दीपन हो रहा है। क्यों हो रहा है? क्योंकि अभी ठाकुर इस मर्त्य्य लोक में लीला करना नहीं चाहते। वरना तो हमको पता ही है कथामृत पढ़ेंगे। इनफ एग्जांपल है कि ठाकुर जब भी समाधि की ओर जाते हैं कोई ना कोई एक सामान्य वासना लेकर के अपने मन को इस पृथ्वी पर खींच करके रखना चाहते हैं। कभी कहेंगे कि मैं तंबाकू का सेवन करूंगा। कभी कहेंगे कि मैं शौच के लिए जाऊंगा। ऐसा कुछ ना कुछ करके ठाकुर एक सामान्य एक बड़ी एक इच्छा प्रकट करके अल्प सामान्य इच्छा प्रकट करके अपने मन को पृथ्वी पर बांध के रखना चाहते हैं। ठाकुर बार-बार कहते हैं चीनी होते चाइना मा चीनी खेते बालोबाशी मैं शुगर होना नहीं चाहता। मैं शुगर खाना पसंद करता हूं। इस अर्थ में कि मैं ईश्वर स्वयं ब्राह्मण स्वयं नहीं हो जाता। ब्राह्मण से एक स्टेप दूर रह के भक्त भगवान और यह जो संबंध है उसका उपभोग करना चाहता हूं। जिससे कि पृथ्वी पर क्या है कि यह दिव्य भाव का प्रसार हो। किंतु यह दिव्य जो उनका मैसेज था, यह डिवाइन मिशन था, वह अभी समाप्त होने को आया है। और इसीलिए ठाकुर अभी कोई भी तरह की सामान्य इच्छा व्यक्त करके अपने मन को पृथ्वी पर बांधना नहीं चाहते। मृत्य लोक में रहना नहीं चाहते। भक्त और भगवान का यह जो संसार है इस संसार को तोड़ के अभी वह अपने स्वधाम में प्रयाण करने के लिए प्रस्तुत हो रहे हैं। तो इसीलिए जब ठाकुर कहते हैं मां को कि देखो पता नहीं क्यों मेरे मन में हर समय ब्रह्म भाव का ही उद्दीपन हो रहा है। तो फिर जननी इस बात का क्या उत्तर देगी? वह तो बस निरव निरव रह के अश्रु बहन अश्रु संवरण अश्रु बहाएगी। एकदम शांत रह के उनकी आंखों में से आंसू पड़ते रहेंगे। तो यह एक हमने देखा। इसके बाद में देखिए अभी जो सबसे महत्वपूर्ण घटना है। आखिरी दिन का वर्णन
श्री रामकृष्ण का अंतिम दिन: “मैं जैसे कहीं दूर जा रहा हूँ… जल के भीतर से”
गंभीरानंद जी महाराज कर रहे हैं। क्या कहते हैं? शरीर त्यागे दिन बिछानाए बालिश भोर दिया ठाकुर बोश्या चैन जिस दिन शरीर त्याग होने वाला था उस दिन अपने बिस्तर में एक तकिए को तकिए पर भार देकर के ठाकुर बैठे हुए हैं। एक रोग शजजा वैसे ही तो रोग शैया है। वैसे ही तो बीमार हुए हैं। ताहाते आशा आलोक निर्वापितो उसमें भी आशा का आलोक आशा का जो प्रदीप है वह निर्वापित हो रहा है बुझ गया है ताई चार दिखे गंभीर विषादर छाया और इसीलिए चारों ओर है गंभीर विषाद अर्थात कि शोक ग्रीफ का मातम का वातावरण शकले भाबिया छिलेन कथा बंधो होइया लिया छ। सब लोग सोच रहे हैं कि ठाकुर की बात बंद हो गई है। ठाकुर ने वार्तालाप करना बंद कर दिया है। किंतु श्री मां और लखी दीदी आशीते तीन बोली लेन किंतु जैसे ही श्री मां और लक्ष्मी दीदी आए साथ में ही ठाकुर ने कहा ऐसे छो आई हो देखो आमी जेनु कोथाए जाचीी देखो मैं जैसे कि कहां पे जा रहा हूं जलेर भीतर दिए अनेक दूर पानी में से चलते-चलते बहुत दूर तक जा रहा हूं जैसे अब देखिए ये भी तो ठाकुर का कैसा एक विजन है कि पानी में चलते-चलते जैसे कि यह दूसरे किनारे की ओर जा रहे हैं। यह किस तरह से इसको समझाएंगे। जैसे यह भवसागर है। भवसागर के एक किनारे यह मर्त्य लोक है और यह उसके दूसरे किनारे यह वैुंठ है या तो कैलाश है या तो फिर यह काशी वाराणसी है। तो यहां पर भी ठाकुर जैसे कि यह भव समुद्र ऐसा चलते-चलते पता नहीं कितने दूर जा रहे हैं। जैसे कि इस मर्त्य लोक को छोड़कर के स्वधाम प्रयाण कर रहे हैं। जैसे ही ठाकुर ने ऐसा कहा श्री मां कादी ते लागी लेन श्री मां रोने लगी मां को पता चल गया कि महाप्रयाण की घड़ी आन उपस्थित हुई है ठाकुर बोली ले ठाकुर ने कहा तो मादे भावना की तुम लोगों को चिंता किस बात की है जेमोन छीले तेमनी थाकबे जैसे थे वैसे ही रहोगे आर एरा अर्थात कि यह लोग जो है ये सब अर्थात कि नरेंद्र वगैरह आर जेमन कोरे छे तोारो तेमनी करे जैसे मेरी सेवा की है उन्होंने वैसे ही तुम्हारी भी सेवा करेंगे लोखी टीके देखो काछे देखो लक्ष्मी को देखो साथ में रखना यही लक्ष्मी दीदी जो कि मां की ठाकुर की भतीजी थी जो कि मां के साथ में नहबत में रहती थी तो ठाकुर ने कहा कि तुमको चिंता किस बात की है? रो क्यों रही हो? जैसे तुम थी वैसे ही रहना। जैसे कि तपस्या तपस्या करके मां ने जीवन बिताया है। वैसे ही ईश्वर भाव में ही तपस्या करके ही जीवन बिताना। अपने त्यागी संतानों का भक्त संतान गणों का जिम्मा जो ठाकुर ने मां को दिया है, उसको अभी मां जिस तरह से वहन कर रही है, वैसे ही वहन करती जाना। और यह जो नरेंद्र वगैरह त्यागी संतान गण है उन्होंने मेरी जिस तरह से सेवा की है वे तुम्हारी भी इसी तरह से सेवा करेंगे और लक्ष्मी दीदी के बारे में अभी यह लक्ष्मी दीदी के बारे में जो स्टेटमेंट है एक्चुअली पता है लक्ष्मी दीदी के रेमिनेशन से उसमें से यह आखिरी प्रसंग लिया गया है। इसलिए हो सकता है कि शायद लक्ष्मी दीदी ने अपने बारे में जो ठाकुर ने कहा उसको स्पेशली याद रख के जो कहा है वह गंभीरानंद जी ने यहां पर लिखा है तो ठाकुर कहते हैं आखिर में कि लक्ष्मी को देखो सब समय तुम्हारे साथ में रखना
श्री रामकृष्ण का अंतिम दिन: अशुभ लक्षण
श्री माय अबो चेतना पूर्व होई ते से आशु बिपते छाया पाते खोने खोने चमकिया उठीते छिलो श्री मां की अवचेतना श्री मां का मन पूर्व होते ही पहले से ही यह जो विपद आन पड़ी है उसकी छाया पात से क्षण क्षण चमकिया चम चमकिया उठी ते छिलो चमत्कृत हो रहा था जैसे कि आज कुछ ना कुछ अनहोनी घटने वाली है आशु बिपतेर छाया यह अर्थात कि यह जो विपद है जो सामने आन पड़ी है उसकी छाया जैसे कि अब सबके ऊपर में मंडरा रही है और उनके मन में बार-बार चमक जैसा हो रहा है से दिन शब्द दिखे जेनु एकटा बिपर जोर भाव दिखा दिलो उस दिन सब तरह से जैसे कि एक विपर्यय का भाव देखने लगा विपर्यय अर्थात की एक तरह की अनहोनी एक तरह का अशुभ सुकन सेक संतान दे जन्नतिनी खिचड़ी रंधते छिले उहार नीचे अंशो धरिया गैो सेवक संतान के लिए वह खिचड़ी बना रही थी मां उसमें नीचे का अंश जो है वह जल गया आप खाना बनाने के समय कभी-कभी ऐसा होता है कि वह चिपक जाता है नीचे में और जल जाता है तो आज भी ऐसा खिचड़ी के साथ में हो गया संतान दे पाते तीनी ऊपर अंश परिबेशन को ले नीचे अंशो स्वयं ग्रहण को ले संतान के पात्र में खाने के पात्र में मां ने ऊपर का अंश परोसा और नीचे का जला हुआ अंश उन्होंने अपने से ग्रहण किया। देखिए जननी का मन कैसा होता है। खिचड़ी बनाई है तो नीचे से जल गई है तो जला हुआ भाग मां ने स्वयं खाया और ऊपर से अच्छा भाग जो था वह संतान गणों को दे दिया। ताहार एक खानी देसी साड़ी छादे सुकाईते छिलो मां की एक देसी साड़ी छत पे सुकाने को रखी थी। उहा हराइया गो वह जैसे कि खो गई उड़कर के कहीं पे चली गई एकटी जोर कुंजा छिलो तुली बार समय उहा पड़िया चुरमार होइया गो एक पानी का कुंजा था मिट्टी का उसको उठाने को गए तो एकाएक हाथ से गिर गया और टूट करके चकनाचूर हो गया। देखिए यह अनहोनी चारों ओर अभी दिख रही है। ठाकुर का देह जाने वाला है तो देह जाने के समय यह सब विपर्यय घटनाएं हो रही है। खिचड़ी जल गई। साड़ी उड़ गई हवा में। माटी का कुंजा जो था वह टूट गया। अखंडानंद जी उनकी रेमिनेशंस में एक जगह पे है। मैंने खोजने का प्रयास किया। मुझे मिला नहीं इस समय किंतु बहुत पहले मैंने पढ़ा था। जिस दिन जिस रात को ठाकुर का देह त्याग हुआ था उस दिन रात को उन्होंने देखा कि चांद की चारों ओर जैसे कि बादलों का एक रिंग हो गया है। बादलों का कि प्रकाश का। अभी मुझे एग्जैक्टली याद नहीं है तो इसको बड़ा ही अपशुकन माना जाता है। तो अखंडानंद जी गंगाधर महाराज ने इमीडिएटली नरेंद्र को कहा कि नरेंद्र देखो इस तरह से आकाश में दिख रहा है। तो नरेंद्र ने भविष्य के स्वामी विवेकानंद ने देख के कहा अरे भाई देखो इसके बारे में किसी को बताना मत। हमको पता है, मुझे पता है, तुमको पता है। और किसी को बताना मत कि इसका सिग्निफिकेंस क्या है। ऐसा एक रेमिसेंस मैंने बहुत पहले पढ़ा था। अभी कुछ दिनों पहले मैंने उसको खोजने का प्रयास किया। मिला नहीं। तो एनीवे देखिए यह जो एक के बाद एक अपशुकन वाली घटनाएं हो रही है। मां की महासमाधि के समय में भी ऐसा हुआ था कि एक ज्योतिष को बुलाया गया था। ज्योतिष ने घट स्थापन करके कुछ विधि करने को कहा था। तो अभी घट जैसे ही स्थापित हुआ मिट्टी का देखा गया कि उसमें छेद हो गया है और छेद में से यह जो सब सामग्री थी घट के भीतर में रखी हुई पूजा की वह सब बह के बाहर आ रही है। तो सब लोग तो बड़े ही डर गए। इमीडिएटली वह मिट्टी का घड़ा हटा के दूसरा मिट्टी का घड़ा रखा गया घटस्थापन की विधि के लिए। तो जैसे ही दूसरा घड़ा रखा गया देखने में आया कि उसमें भी छेद हो गया है। उसमें से भी जल निकल रहा है। तो तो अभी लोग सभी लोग इतने डर गए। फिर एक पीतल का घड़ा मंगवाया गया। इस आशा में कि चलो इसमें तो छेद नहीं होगा। और पीतल का घड़ा जैसे ही स्थापित हुआ देखा कि उसके भीतर में भी छेद हो गया। तो देखिए कि यह महापुरुष का जब देह त्याग होने वाला है या तो फिर जब महापुरुषों ने आध्या शक्ति या तो नारायण उन्होंने एक बार सोच लिया है कि बस अभी महासमाधि ग्रहण करनी है तो मनुष्य के चाहे जितने भी प्रयास हो उनके देह को पृथ्वी लोक पर बांध के रखने के लिए वह प्रयास कभी भी सफल नहीं होंगे। तो यहां पर भी देखिए कि एक के बाद एक इस तरह की घटनाएं घट रही है जैसे कि मां के मन में आशंका के घने काले बादल आकर के छा गए और इसके बाद में आखिरी रात
श्री रामकृष्ण की महासमाधि
क्रमेश श्रावण महानिशा और धीरे-धीरे करके 31 श्रावण की महानिशा आई 15th अगस्त अगस्त 1886 रात्रि द्व प्रहर अतीत होइया एकटी दुईटी मिनट खो लो रात्रि के दो प्रहर बीत करके एक या दो मिनट हुआ है 15th अगस्त में से 16th अगस्त क्रॉस हुआ है मिडनाइट को शरे उपकठे ब्रुख गुलमो परिब्रतो से बहत उद्यान बाटी तोखन एके बार नीरव शहर के बाहर में वृक्ष गुल्म परिवृत्त वही विराट उद्यान बाटी एक संपूर्ण रूप से नीरव है शुध निद्रा विहीन भक्त वृंदो श्री प्रभु शज्जा पारश्व शोबे तो थाकिया श चकीते देखते छ सिर्फ निद्रा विहीन भक्त वृंद श्री प्रभु की शैया के पार पारश्व में शैया पारश्व शैया के पास में समवेत होकर के एकत्रित होकर के सचकित नयने देख रहे हैं। तनी समाधि मग्न ठाकुर समाधि मग्न है से समाधि आर भांगी लोना वह समाधि और टूटी नहीं उहा महा समाधि ते परिणत होईलो वह समाधि आखिर में महा समाधि में परिणत हुई चिकित्सोक आशिया सुनाई लेन जानाई लेन आर आशा नाई चिकित्सक ने आकर के बताया अभी और आशा नहीं है। देखिए गंभीरानंद जी ने तो एक ही पैराग्राफ में यह महासमाधि का विवरण किया है। इसके बाद में किंतु मैंने विभिन्न सोर्सेज से ठाकुर की महासमाधि के जितने भी विवरण है वह सब एकत्रित किए हैं। तो वो हम पढ़ेंगे।
महाप्रयाण की तैयारी: कैसे ठाकुर ने माँ और स्वामीजी को सौंपा उत्तराधिकार
देखिए कि ठाकुर की महासमाधि का जो सिग्निफिकेंस है वो इस तरह से हमको जितना ही हम इसके बारे में चिंतन करें उतना ही हमको ऐसा लगता है कि देखिए कि ठाकुर का आना वैसे तो एक दृष्टि से सफल ही हुआ है। ठाकुर ने आकर के सर्वप्रथम तो क्या किया कि भक्त वृंद के भीतर में खास करके जो मुमुक्षु गण है भक्त वृंद नहीं कह के कहेंगे कि मुमुक्षु वृंद के भीतर में भक्ति भाव का ईश्वरीय भाव का संचार किया विदेशी आक्रमणों से आहत हमारे देश में जो एक संशय प्रकट हो गया था संशय राक्षस कि नहीं भारतीय आध्यात्मिकता भारतीय ऋषि मुनिगण, भारतीय शास्त्र, भारतीय अध्यात्म और धर्म वो सब मिथ्या है। यह जो एक मोह या आशंका हमारे मन में बैठ गई थी, उसको तोड़ा, उसका भंजन किया और फिर ठाकुर ने तीन बड़े काम किए हैं। अपनी महासमाधि से पहले। एक तो है कि स्वामी विवेकानंद को तैयार करके यह जो उनके जो भक्तगण है उनके नेतृत्व पद पर उनको स्थापित किया है। सर्वप्रथम तो कहे तो उन्होंने अपना एक संघ गठित किया है। उन्होंने एक विद्या का संसार स्थापित किया है। कथामृत में हम देखेंगे कि ठाकुर कहते हैं कि एक तो है अविद्या का संसार जहां पर काम कांचन के पीछे ही हमारी नजर रहती है और एक है विद्या का संसार जगत में रहना है तो संसार में तो रहना ही है किंतु हम इस संसार को क्यों अविद्या का संसार बनाएं क्यों नहीं विद्या का संसार बनाएं तो यह एक ठाकुर ने बहुत बड़ा कार्य किया विद्या का संसार स्थापित किया। पहले तो जो एक डाउट एक संदेह लोगों के मन में बैठ गया था। उस संदेह का भंजन किया। उसके बाद में जो अंतरंग भक्त वृंद इकट्ठा हुए थे उनका एक संघ तैयार किया। एक विद्या का संसार तैयार किया। और इसके बाद में तृतीय है स्वामी विवेकानंद को उन्होंने लीडर बनाकर के संघ के सिरमोर नेतृत्व पर स्थापित किया और चतुर्थ है मां शारदा को जगत जननी बनाकर के मां शारदा तो जगत जननी थी ही थी किंतु यह जगत जननीत्व है उसको जैसे कि आवाहन करके उसको जागृत करके यह समग्र विश्व जैसे जैसे कि मां के श्री चरणों पर फेंक दिया है। तो यह चार महा कार्य ठाकुर ने अपने जीवन में किए हैं। और जैसे ही इसमें से आखिरी कार्य समाप्त हो गया, यह जो मां को उनकी जो उनकी आध्या शक्तित्व था, मां का जो जगत जननीत्व था, उसको जैसे ही ठाकुर ने जागृत किया साथ में ही उन्होंने स्थूल देह से विराम लेकर के अपने निज धाम स्वधाम उन्होंने महाप्रयाण किया। पर दिन श्री ठाकुर पूतो
काशीपुर महाश्मशान में श्री रामकृष्ण का दाह संस्कार
देह काशीपुर चिताग्नि ते आहुत हो दूसरे दिन ठाकुर का पवित्र देह काशीपुर में चिताग्नि में आहुत हुआ चिता निर्वापितो होइले पवित्र भस्मास थी एक्ट पात्रे काशीपुर उद्यान बाटी ते आिया श्री रामकृष्ण शार राखा होइलो जैसे ही चिता निर्वापित हुई चिता में से पवित्र भस्मास्थि एकत्र करके एक पात्र में काशीपुर उद्यान वाटी में लाकर के श्री रामकृष्ण देव की शैया के ऊपर में रखा गया जिसको स्वामी जी आत्मारामर कोटा अर्थात कि आत्माराम का पात्र ऐसा कहते थे तो एक कलशी में ठाकुर के पवित्र भस्मास्थि एकत्र करके वहां पे काशीपुर उद्यान ग्रुप में जिस शैया के ऊपर में ठाकुर शयन करते थे। उसी शैया पे राके रखा गया। अभी देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के जो अन्य विवरण है वह थोड़ा सा मैं देख रहा हूं। अ मेरे पास में यहां पर एटलीस्ट रामलाल दादा का वर्णन है। स्वामी जी का खुद का वर्णन है। लाटू महाराज ने जो वर्णन किया है वह है शशि महाराज का है। काली महाराज का है और रामचंद्र दत्त छह वर्णन है मेरे पास में यहां पे जो कि मुझे मिले हैं। तो छह वर्णन हम देखते हैं। ठाकुर की महासमाधि के बारे में यह छह लोगों का क्या कहना है? सर्वप्रथम रामलाल दादा। रामलाल दादा कौन
श्री रामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: रामलाल दादा की दृष्टि से
थे? ठाकुर के जो बड़े भाई थे रामेश्वर उनके पुत्र थे रामलाल। तो यह रामलाल दादा हमारे संघ के भक्तों के लिए रामलाल दादा तो उनका जो वर्णन है वो क्या है? ठाकुर शेष दिन आमी ठाकुर शेष समय छिलामना। ठाकुर का जब आखिरी दिन था उस समय आखिरी घड़ी में मैं ठाकुर के साथ में नहीं था। वह दक्षिणेश्वर काली मंदिर में थे। एक दिन रात्रि दुटार समय आमी ठाकुर घरे सुए आ। एक दिन रात को 2:00 बजे के समय मैं ठाकुर घर में सोया हुआ हूं। ऐन समय काशीपुर होते बूढ़ो गोपाल और कईक जन ऐसे दौरजा टेल छे। उस समय काशीपुर से बूढ़ो गोपाल और बूढ़ो गोपाल यानी कि भविष्य के स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज तो बूढ़ो गोपाल और उनके साथ में कुछ लोग आकर के दरवाजा ठकठका रहे हैं तारा बोलले जे स्वामी जी आमादे पाठिए दिलन शीघ्र चलो उन्होंने कहा कि स्वामी जी अर्थात कि नरेंद्र ने हमको भेजा है आप हमारे साथ में शीघ्र आइए ठाकुर गंभीर समाधि होए छे कि शरीर ग छे ताकि जानते पार छे ना ठाकुर को क्या गंभीर समाधि हुई है कि उन्होंने शरीर त्याग किया है वो किसी को समझ नहीं आ रहा है तारा आरो बोल ले और उन्होंने और भी कहा स्वामी जी बोले पाठालेन जे दादा ठाकुर काछे शर्बदा थकतेन दादा बते पारवेन ये समाधि की महा समाधि और उन्होंने यह भी कहा कि यह स्वामी जी अर्थात नरेंद्र ने यह भी कहा है कि दादा दादा अर्थात रामलाल दादा तो ठाकुर के साथ में सब समय रहते थे तो वह समझ पाएंगे कि यह समाधि है ना कि महा समाधि है आमीशु ने कैदे फेलुम मैंने तो जैसा ही सुना मैं रो पड़ा तोई तादेर शंगे चोले गूम साथ में ही उनके साथ में चला आया गए देखी ठाकुर लंबा भावे सुए रहे छ जाकर के देखा ठाकुर अपने बिस्तर पे वह सोए हुए हैं चौक दृष्टि शोजा आर जेनु मुझ के हस छ आंखों की दृष्टि सीधी है और जैसे कि हल्का सा हंस रहे हैं आमी बोलूं मैंने कहा समाधि लक्षण देखी ता एक बार कातकन के आना हो शेकी बोले सुनी तो समाधि का लक्षण तो दिख रहा है तो एक बार कैप्टन अर्थात कि विश्वनाथ उपाध्याय यह कैप्टन के बहुत सारे प्रसंग कथामृत में है तो उनको उनको बुला के लाया जाए। देखिए कि वह क्या कहते हैं। से अनेक विषय जाने। उनको बहुत बात उनको अनेक विषयों के बारे में पता है। स्वामी जी कैप्टन के आनाते लोग पाठा लेन। स्वामी जी ने कैप्टन को बुलाने के लिए लोगों को भेजा। तीन ऐसे बोलले जे समाधि लक्षण। कैप्टन ने आकर के कहा कि समाधि के लक्षण है। ठाकुर मेरु दंड ते शखन गावादी घिए मालिश करे दिलन तो गरम ठेक लो ठाकुर के यह जो करोड़ रज्जू है स्पाइनल कॉर्ड है अर्थात पीठ पे गाय का घी मालिश करने जब लगे तब लगा कि देह उनका अभी भी गर्म है ठाकुर रात्रि बारोटार समय होते ए भावे समाधि ते रोए छ ठाकुर रात के 12:00 बजे से इसी तरह समाधि में थे पर कैप्टन जखन देख ले जे ठाकुर सिर दाड़ा ठंडा होए गए छे तखन बुझले जे ठाकुर महासमाधि होए छे जब इसके बाद में कैप्टन ने देखा कि ठाकुर की पीठ यानी यह करोड़ रज्जू ठंडा हो गया है तब उन्होंने समझा कि ठाकुर को महासमाधि हुई है। उस समय तो मेडिकल साइंस तो कोलकाता में इतना अवेलेबल नहीं था कि आप वो प्रॉपर एग्जामिनेशन करके देख पाए कि हार्ट बीट रुक गया है कि क्या है और यदि हार्ट बीट रुक गया है पल्स नहीं मिल रहा है तो भी तो आप नहीं कह सकते कि ठाकुर की महासमाधि हुई है क्योंकि बहुत बार समाधि में भी ठाकुर के हार्ट बीट रुक जाते थे वह एक घटना है ठाकुर समाधि में है और उनकी आंखें खुली तो किसी ने टेस्ट करने के लिए कि ठाकुर क्या यह फेक तो नहीं कर रहे माने यह दिखावा तो नहीं कर रहे ऐसा देखने के लिए उसने आंखों में उंगली डाली। आप जितना भी दिखावा करते हो जितना भी अच्छा एक्टर हो उसकी आंख पर जैसे ही आप उंगली रखेंगे उसकी आंख मीटमिटएगी ही वह अपनी की आंख की अवश्य रक्षा करेगा। किंतु जैसे ही उसने आंख पर उंगली रखी ठाकुर की आंख थोड़ी सी भी मीट मिटाई नहीं पलक थोड़ी सी भी झपकी नहीं तो उसने माना कि नहीं ठाकुर फेक नहीं कर रहे ठाकुर दिखावा नहीं कर रहे यह सहीसही में समाधि है जो कि मेडिकल साइंस के अनुसार असंभव है। आंख की यह जो पलक का न झपकना, हार्ट बीट का रुक जाना, पल्स नहीं मिलना यह सब तो मेडिकलली संभव ही नहीं है। जीवित व्यक्ति के भीतर में तो यह जब मेडिकल साइंस उसके बाद में किंतु यह आदमी ने जब ऐसा किया था बाकी भक्तगण बड़े नाराज हो गए थे। तो ये किंतु देखिए कि मेडिकल साइंस की दृष्टि से ठाकुर को किस तरह से एग्जामिन करें। तो यह कैप्टन का एक अच्छा एक था उपाय कि उनकी पीठ पर घी जो है गाय का वो मालिश कर रहे हैं। जब तक उनकी पीठ यानी करोड़ रज्जू स्पाइनल कॉर्ड वो गर्म था तब तक लगा कि ठाकुर के देह में अभी भी जान है या तो फिर जीवन है। किंतु जैसे ही यह करोड़ रज्जू ठंडा होने लगा तब पता चला कि नहीं अभी जीवन इसमें से निकल चुका है। प्राण जो है वह निकल चुके हैं। तार पर दिन बेला बोध होए 12:30 टार समय विलीन होए जा। उसके बाद में दूसरे दिन लग रहा शायद 12:30 के समय विलीन हो गए। विलियन अर्थात कि संपूर्ण रूप से जो है उनका प्राण चला गया। अभी क्या इसका अर्थ है वह तो वही जाने तार पर तार बदन मंडल शुष्कों और चखू बंद होए गो और उसके बाद में उनका वदन मंडल शुष्क और आंखें बंद हो गई शेष समय सुने छिलुम केवल तनी मां बोले छिले आखिरी समय अभी रामलाल दादा खुद तो वहां पर थे नहीं किंतु जब वह आए थे उस दिन वहां पर रात को जो दूसरे भक्तों के साथ बात हुआ तो दूसरे भक्तों से उन्होंने सुना कि आखिरी समय में ठाकुर ने सिर्फ मां बोला था। अभी यह किस तरह से इसका अर्थ करेंगे? जगत जननी मां भी और हमारी सर्व जननी मां भी आध्या शक्ति वो चाहे मां शारदा हो कि मां काली वो दोनों तो आखिर में एक ही है।
श्री रामकृष्ण के अंतिम दिनों का वर्णन: स्वामी विवेकानन्द की दृष्टि से
अभी स्वामी विवेकानंद का वर्णन है। देखिए स्वामी जी क्या कहते हैं। वही जे ठाकुर जाके काली-काली बोले डाकते हैं ठाकुर देहो राख बार दो-तीन दिन आगे सेटे ए शरीर ढुके गए छ वह जिसको ठाकुर काली काली करके बुलाते थे वही काली ठाकुर के देह जाने के दो-तीन दिन पहले इस देह में घुस चुकी है प्रवेश कर चुकी है स्वामी जी ने अपनी ओर इशारा करके कहा है शेटे यामा के एिक ओदिक काश कोरिए बेड़ाई वही काली जो इस देह के भीतर में प्रवेश कर चुकी है वही मुझे इधरउधर सब जगह पे काम करके मुझे घुमाती है स्थिर होए थकते देना स्थिर होकर के रहने नहीं देती निजे सुखे दिख के देखते देना अपने खुद के सुख की ओर देखने नहीं देती ठाकुर देो जाबार तीनचार दिन आगे तिनी आमा के एकाकी एक दिन काछे डाक ले ठाकुर के देह जाने के तीन-चार दिन आगे उन्होंने मुझे अकेले एक दिन अपने पास में पुकारा आर सामने बोशिए अमारदी के एक दृष्ट चे समाधिष्ट होए पड़ले और मुझे अपने सामने बिठा करके मेरी ओर देखतेदे एक दृष्टि से देखतेदे समाधस्त हो पड़े आ तो ठीक अनुभव करते ला तार शरीर थेके एक सुख तेज तेज इलेक्ट्रिक शोके तो आर शरीर डुबचे उस समय में ठीक ठीक अनुभव कर रहा था कि उनके देह में से एक सूक्ष्म तेज इलेक्ट्रिक शोक की तरह मेरे शरीर में प्रवेश कर रहा है। देखिए यह इलेक्ट्रिक शोक वाला वही जो स्वामी जी ने अपना भाव काली महाराज के भीतर में संचार कर दिया था। तब फिर बाद में काली महाराज को अभेदानंद जी को किसी ने पूछा था कि आपको क्या महसूस हुआ था? तो काली महाराज ने कहा था जैसे कि इलेक्ट्रिक शॉक लगने से जिस तरह से देह कंपायमान होता है इस तरह से मुझे अनुभूति हुई थी तो यहां पर भी ठाकुर अपना भाव नरेंद्र के भीतर में संचारित कर रहे हैं और इसीलिए जैसे कि एक इलेक्ट्रिक करंट प्रवाहित हो रहा हो ठाकुर के भीतर में से नरेंद्र के भीतर में इस तरह का भाव स्वामी जी को हुआ था क्रम आयो बा ज्ञान हरि आष्ट हो ग धीरेधीरे मैं भी बाह्य ज्ञान गवा करके जड़ सा हो गया कतो क्षण ए रूप भा छिल आार किछू मने पड़े ना मैं किस कितना समय इस भाव में था मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है जोखन बाज चेतना हो देखी ठाकुर कांद छन जब मेरी बाह्य चेतना हुई वापस लौट आई तब देखा कि ठाकुर रो रहे हैं। जिज्ञासा कराए ठाकुर सने बोल लेन जब मैंने पूछा कि क्यों रो रहे हैं? तब ठाकुर ने सस्नेह कहा आज यथा सर्वस्व तो के दिए फकीर हो लूं। आज मेरा जो कुछ भी था यथा सर्वस्व तुमको देकर के फकीर हुआ। ए मां ए शक्ति ते जगत अनेक काज करे तू के फिरे जावी तू ए शक्ति ते जगत अनेक काज करे तभी फिरे जावी तुम इस शक्ति से जगत के बहुत सारे कार्य करोगे और फिर तुम फिरत आओगे आार बोध हो एही शक्ति आमा के ए काज से काजे केवल गुरु है मुझे लग रहा है कि वही शक्ति मुझे इस काम के लिए उस काम के लिए चारों ओर घुमा रही है बोथक अर्जुनो अमार ए देह हो नहीं बैठे रहने के लिए मेरा यह देह बना नहीं है ठाकुर जोन काशीपुर बागान है तो तार शरीर जाए ठाकुर जब काशीपुर बागान में थे जब उनका शरीर जा जाएगा जाएगा ऐसा हो रहा था तो तार बिछानार पासे एक दिन मोने मोने भाची उस समय में उनके बिछाने के पास में बैठकर करके मन में ही मन में सोच रहा हूं। ए समय यदि बोलते पारो आ भगवान तब विश्वास करो इस समय यदि तुम बोल आप बोल पाए कि मैं भगवान तब मैं विश्वास करूं तुम ही सत्यश भगवान तब मैं विश्वास करूंगा तुम सच सच में भगवान हो जोखन शरीर जा दुई दिन मात्र बाकी जब शरीर जाने के सिर्फ दो दिन बाकी है ठाकुर हटात अमार देख के चाहिए बोल ठाकुर एकाएक मेरी ओर देख कर के बोले जय राम जय कृष्ण से श्री इदानिंग ए शरीरे राम कृष्ण जो राम जो कृष्ण वही आज के इस युग में इस शरीर में राम कृष्ण तोर वेदांते दिख दिए नहीं तुम्हारे वेदांत की ओर से नहीं वेदांत दिख दिए नहीं तुम्हारे वेदांत की ओर से नहीं वेदांत के दृष्टि बिंदु से नहीं आमीशु ने अबाक होए रहूं मैं सुनकर के अबाक होकर करके रह गया। स्वामी जी का विवरण और अभी है लाटू महाराज का विवरण। लाटू महाराज क्या कहते हैं?
श्री रामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन: स्वामी अद्भुतानन्द की दृष्टि से
लाटू महाराज का विवरण जो है वह काफी डिटेल में है और काफी उन्होंने सब डिटेल्स दी हुई है। क्या कहते हैं लाटू महाराज? शोबार समय जैमन ठाकुर ठाकुर रोज बोलते हरि ओम तत्सत शदिनो तनी श कथा बोलले सोने के समय जैसे ठाकुर प्रतिदिन कहते हरि ओम तत्सत उस दिन ओ उस दिन भी अर्थात कि आखिरी दिन भी ठाकुर ने वही बात कही हम तोखो पाखार माताश कोर छिलम यह हिंदी और बंगाली मिश्रित लाटू महाराज की भाषा हम अर्थात कि हम या तो फिर मैं मैं उस समय पंखे का हवा पंखे की हवा कर रहा था। रात प्राय 11 टार समय तिनी इटा दीर्घ श्वास फैल लेन रात को लगभग 11:00 बजे के समय उन्होंने एक दीर्घ श्वास फैला दीर्घ श्वास लिया। तार पर ही मने होलो जेनो तार समाधि होए छे। इसके बाद में ही मुझे लगा कि जैसे उनकी समाधि हुई है लोरेन भाई तखन हामादे सब हरि ओम तत्सत नाम कीर्तन करते बोल लेन लोरेन अर्थात कि नरन नरन का अपभ्रंश करके कहते हैं लोरेन तो वही लोरेन भाई उस समय हम सबको हरि ओम तत्सत नाम कीर्तन करने को बोला अनेक क्षण नाम कीर्तन पर रात एकार समय तार समाधि भांग लो अनेक क्षण बहुत लंबे समय तक नाम कीर्तन के बाद में रात को 1:00 बजे के समय उनकी समाधि टूटी तखन एक टू सुजीर पायस खेले उस समय उन्होंने सूजी का थोड़ा सा पायस खाया सूजी अर्थात रवा पायस अर्थात खीर रवे की थोड़ी खीर खाई शशि भाई ता खाइए दिलले शशि भाई ने वह खिला दी थी तार पर हठात तार समाधि होो उसके बाद में एकाएक उनकी समाधि हुई ता देखे लोरेन भाई केमोन संदेहो जाग लो वो देख के नरन को लोरेन भाई को कैसे किस तरह का एक संदेह हुआ गोपाल दादा के डेके बोललेन गोपाल दादा को पुकार करके कहा वही बूढ़ो गोपाल दादा वही जो रामलाल दादा को बुलाने को जाते हैं तो गोपाल दादा को बुला करके कहा एक बार रामलाल दादा के डेके आते पारो एक बार क्या दक्षिणेश्वर से रामलाल दादा को पुकार के ला पाओगे गोपाल दादा हम के शंगे शही राते दक्षिणेश्वर गो गोपाल दादा मुझे साथ लेकर के उसी रात को दक्षिणेश्वर गया रामलाल से राते हमारे देर शंगे एलेन रामलाल उसी रात को हमारे साथ में आया देखे सुने बोलले देखकर के सुनकर के कहा एक ब्रह्म तालु गरम आ भी ब्रह्म तालु गर्म है यह कपाल जो है ना कपाल नहीं सर के ऊपर में वह अभी भी गर्म है तोरा एक बार कातेन के खबर दाओ तुम लोग एक बार कैप्टन को खबर दो वही पूरी कहानी जो रामलाल दादा ने कही थी भोरे शोकाले मोहिंदर डॉक्टर के आना हो अर्ली मॉर्निंग को सुबह को मोहिंदर डॉक्टर को बुलाया गया। वही डॉक्टर सरकार कि जिसके बारे में बहुत सारी बातें कथामृत में है। वही महेंद्र सरकार को बुलाया गया। तनी देखे सुने बोलले उन्होंने देख सुन के कहा ठाकुर देहो रक्षा को करे छ ठाकुर ने देह त्याग किया है देह रक्षा की है एक टू पर ही ठाकुर भक्तों उपाध्याय एलेन थोड़ी देर के बाद में ही ठाकुर के भक्त वही कैप्टन आया तीन ठाकुर गाय माथाए घी मा खाते बोले उन्होंने ठाकुर के देह के ऊपर में सर के ऊपर में घी लगाने को कहा। देखिए यहां पर हमको पता चलता है कि डॉक्टर सरकार ने पहले ही आकर के ठाकुर को मृत घोषित कर दिया था। इसके बाद में यह कैप्टन ने आकर के घी लगाने को कहा था। शशि भाई ठाकुर गाय घी मा खा लेन और वैुंठ बाबू ठाकुर पाए घी मालिश करते लाले शशि भाई ठाकुर के देह पे घी लगा रहे हैं और वैुंठ बाबू ठाकुर के पैर पर घी मालिश करने लगे ताते कुछ होना उससे भी कुछ हुआ नहीं तो कौन मां थकते ना पेरे ठाकुर घोरे एलेन तब मां को तो पता चल ही गया होगा यह सब पूरा ही मां को तो कोई किसी को आकर के न्यूज़ देने की जरूरत नहीं है। ठाकुर के साथ में मां के मन का तादात्म बना ही हुआ है। वही जो शोडशी पूजा की रात को दोनों के मन का जो मिलन हुआ था, संगम हुआ था वह संगम जैसे कि आज टूटा है। स्थूल देह में टूटा है। सूक्ष्म देह में नहीं। तो ठाकुर फिर मां तो रह नहीं पाई। ठाकुर के घर में आई और मां काली को तुम की दोष हम छेड़े चोले गले गो मां काली तुम मेरे किस दोष से मुझे छोड़कर के गई ऐसा बोलकर के रोने लगी मां के कांदते देखे बाबूराम और जोगिन भाई शेखाने गैो मां को रोती हुई देखकर के बाबूराम महाराज स्वामी प्रेमानंद जी और योगिन भाई आई अर्थात कि योगानंद जी वहां गए और गोलाप मां के घरे घरे गैो और गोलाप मां को बुला के और मां को मां को पकड़ मां को ये एस्क करके लेकर के उनके घर में ले गए ए मध्य कोलकाता भक्तरा श खबर पे ग छिलो इसी बीच में कोलकाता के भक्तों को सब खबर पहुंच चुकी थी सुने छी सुना सुना है अखोय मास्टर और हुटको गोपाल से राते कोलकाता खबर दिए छिलो अक्षय मास्टर और हुटको गोपाल वो जो हुटको एकाएक आता था एकाएक चला जाता था स्वामी जी ने नाम दिया था हुटको गोपाल यही दोनों ने कोलकाता में रात को घरघर फिर करके सबको खबर दे दिया था कि ठाकुर की महासमाधि हो चुकी है कोलकाता और भक्तरा शब एके आस्ते ला लो कोलकाता के भक्त सब एक के बाद एक आने लगे। तादेरनी ठाकुर रेक्ट फोटो तोला होलो उनको लेकर के ठाकुर का एक फोटो लिया गया। वही जो फेमस फोटो है दो फोटो है। एक्चुअली दोनों में थोड़ा सा चेंज देखने को मिलता है। वह दोनों फोटो मैंने पब्लिश होते हुए देखे हैं कहीं-कहीं। किंतु उसमें ठाकुर का जो ठाकुर को बिस्तर पर सुलाया गया है और चारों ओर भक्त वृंद खड़े हैं और हाथ में वह सर्वधर्म का सिंबल वगैरह लेकर के तो यह फोटो जब भी हम छापते हैं उसमें ठाकुर को जो है कि ब्लैकउ कर देते हैं। सिर्फ भक्त लोग खड़े हैं बिस्तर के चारों ओर ऐसा दिखता है। तो वह फोटो दो लिए गए। मेरे पास में वैसा फोटो है जहां पर ठाकुर को ब्लैक नहीं किया गया। किंतु सही में इस तरह से फोटो को शेयर करना या रखना उचित नहीं। तो एनीवे यही सब करतेकरते बेला पड़े गो यही सब करतेकरते समय हो चुका था माने दिन ऊपर में आगे बढ़ रहा था तो कौन से फूल देवा शाहजानो खाटे कीर्तन करतेकरते ताके शशाने जावा होलो तभी वही फूल से सजाए हुए खाट पे ही सुला के उनको कीर्तन करतेकरते श्मशान में ले गए ले जाया गया रामबाबू हममा के बोल रामबाबू ने मुझे कहा तू बागा ने एक किुण थेके जा पर अख बाबू एले तूई ओखाने जाश रामबाबू ने मुझे रामचंद्र दत्त ने मुझे कहा कि तुम अभी गार्डन जो है काशीपुर गार्डन में थोड़ा सा समय रुक जाओ उसके बाद में अक्षय बाबू जब आएंगे तब तुम यहां से जाना हमने ताई बागाने रोए गूंम मैं इसीलिए बागान में रह गया अभी देखिए सब लोग तो चले गए हैं ठाकुर को क्रिमेट करने के लिए तो मां तो वहीं पर है गार्डन हाउस में ही है तो मां की तो रक्षा करने के लिए मां की तो देखभाल करने के लिए किसी को रहना होगा तो ये रामबाबू की उपस्थित बुद्धि कहो प्रैक्टिकल सेंस कहो तो रामबाबू ने कहा कि मां का तो नामोल्लेख उन्होंने नहीं किया किंतु उन्होंने इतना कहा कि तुम अभी थोड़ा सा यहां पर रुक जाओ और फिर अक्षय बाबू आने से तुम जाना यहां से तो लाटू महाराज कहते हैं हमने ताई बागाने रोए गूं मैं इसीलिए फिर बागान में रह गया मां एक बार कह दे शी जे चुप कर ले आर तार गोलार आवाज सुना गौना मां जो वो एक बार चित्कार करके रोई थी उसके बाद में संपूर्ण रूप से शांत हो गई और उनके गले की आवाज सुनी नहीं गई मेनु शेर एमोन धोर जो हमने जीभो ने देखी नहीं स्त्री लोगों का इस तरह का धैर्य मैंने अपने पूरे जीवन में देखा नहीं है। स्त्रियों का स्वभाव होता है रोने का। जब किसी का देह त्याग होगा तो रोना, चित्कार करना यह सब तो होता ही है। किंतु लाटू महाराज कहते हैं कि मां ने जो एक बार चित्कार करके जो रोया था उसके बाद में मां के गले की आवाज फिर मैंने सुनी नहीं। स्त्रियों के भीतर में इस तरह का धैर्य मैंने और कहीं देखा नहीं है। रातें हमने शशाने गूं रात को मैं श्मशान में गया शेखा ने देखी ओने के गंगार धारे चुप कोरे बोश वहां पे जाकर के देखा बहुत सारे भक्त गंगा के किनारे चुप होकर के बैठे हुए हैं शशि भाई एक खाना पाखा हाथ दिए चितार काछे बोसे छिलो शशि भाई एक पंखा हाथ में लेकर के चिता के पास में बैठा था तार पासे शरोट भाई छो उसके पास में शरद भाई था यह शरोट भाई म लाटू महाराज की कहने की स्टाइल शशि भाई के हमने तो हाथ धरे तुल्लूम शशि भाई को तो मैंने हाथ से उठाया हाथ पकड़ के उठाया शरोट भाई आर लोरेन भाई ताके को तो बुझा ले शरद भाई और लोरेन भाई ने उसको कितना समझाया बाकी शशि भाई एकटा कथा बोल लेना किंतु शशि भाई ने एक बात भी कही नहीं। देखिए मां के बाद में जैसे कि इतना दुख जिसको हुआ है वह शशि भाई को शशि महाराज को जानो पता है तार अस्थि और भस्मो एकटा कोलशी ते पूरे शशि भाई माथाई कोरे बागाने छिलो ठाकुर की अस्थि और भस्म एक कलसी में रखकर के शशि भाई अपने सर पर रखकर के बागान में वापस आया था जे बिछाना तनी सुतेन शखाने कोलशिटी रेखे देवा हो लो जिस बिछाने में ठाकुर शयन करते थे उसी बिछाने के ऊपर में इस कलसी को रख दिया गया पर दिन गोलाप मां ऐसे खबर दिलो दूसरे दिन गोलाप मां ने आकर के खबर दिया मां के उननी देखा दिए हाथर बाला खुलते निषेध करे छ मां को ठाकुर ने दर्शन देकर के कहा है कि हाथ में जो चूड़ी है उसको खोलने से ठाकुर ने निषेध किया है बोले बोले छ कहा था आमी की कोथाई ग छ गो यही तो रहे छ तू यही घर थे कि वही घर ऐसे छ मैं क्या कहां पे गया हूं क्या यहां पे तो रहा हूं बस इस कमरे से उस कमरे में आया हूं गोलाप मार कथा सुने जारा सब दुख कोर छिलो तादेर संदेहो मिटे गो गोलाप मां की बात सुनकर के जो लोग सब दुख कर रहे थे उनका संदेह मिट गया तारा तो खून शोले मिले बोलले तब सब ने मिलकर के कहा सेवा जैमन चोल छिलो तेमनी चलबे सेवा जिस तरह से चल रही थी वैसी ही चलेगी इसके बाद में भी लाटू महाराज का काफी वर्णन है और इसके बाद में शशि महाराज का जो कि अभी हम नेक्स्ट क्लास में देखेंगे। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु
प्रश्न: यह आश्चर्यजनक है कि किसी ने यह जाँचने के लिए कि ठाकुर सच में समाधि में हैं, उनकी आँख में उंगली डाल दी!
और देखिए ठाकुर और 30-40 साल के बाद में आते हैं तो हम यह जो सब जितने भी मेडिकल इक्विपमेंट है उनको लगा के टेस्टिंग भी कर लेते किसको पता और ठाकुर तो ही वाज नॉट एर्स टू एनी सच मैं एक्सपेरिमेंट नहीं कहूंगा किंतु अब जैसे देखिए ना स्टूडियो में जाकर के ठाकुर ने फोटो अपना निकाला अब जब ठाकुर जिसको कहते हैं इस देह ये खोलटा माने ठाकुर का फोटो जब वहां पर पाया गया तो ठाकुर कहते हैं खोल्टा ये तो अब बाह्य आवरण सिर्फ है तो उन्होंने फोटो तो खिंचवाया ना स्टूडियो में जाकर के पोस्ट तो दिया ना सो इट इज नॉट लाइक ए ठाकुर वास कंप्लीटली एवर टू एनी सच थिंग्स सो वहां पे जाकर के बैठते समाधि में चले जाते हैं। फिर हमको देखना है कि किस तरह से एक्सपेरिमेंट करें। [हंसी]
प्रश्न: विद्या का संसार -- यह कितनी सुन्दर बात है. पूर्ण संन्यास सभी के बस की बात नहीं।
यह जो सिविलाइजेशनल अंडरस्टैंडिंग है हिंदू धर्म में पहले से था कि संसार त्याग या तो प्योर आध्यात्मिकता वो मुट्ठी भर लोगों के लिए संभव है। बाकी सबको आध्यात्मिकता की ओर ले जाना है। अविद्या से विद्या की ओर ले जाना है। फिर विद्या से निर्गुणत्व की ओर जाया जाएगा। विद्या से पार तो बाद में जाया जाएगा। तो इसीलिए यह जो क्षत्रिय ब्राह्मी शूद्र वैश्य यह जो वर्ण व्यवस्था जो थी यह आश्रम व्यवस्था वर्ण व्यवस्था ये सब क्यों था क्योंकि स्टेप बाय स्टेप ब्रह्मचर्य आश्रम गृहस्थ आश्रम वानप्रस्थ आश्रम सन्यास आश्रम स्टेप बाय स्टेप सबको सन्यास आश्रम की ओर जाना है। किंतु उसका तो समय आएगा तब जाना है। भाई अभी से गृहस्थ आश्रम में आप सन्यास के बारे में बात करेंगे तो क्या भ्रष्टाचार ही तो आ जाएगा। वो अखंडानंद जी ने शुरू शुरू में दीक्षा देना शुरू किया। महापुरुष महाराज प्रेसिडेंट थे तो अखंडानंद जी थे वाइस प्रेसिडेंट तो महापुरुष महाराज बहुत कहते हैं भाई तुमको दीक्षा देनी होगी मैं अकेला कितना दिन दूंगा तो अखंडानंद जी दीक्षा देना शुरू किया किंतु कंडीशन क्या कि जो हस्बैंड वाइफ दीक्षा लेंगे दोनों को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा। अभी जो लोग बेचारे दीक्षा लेना चाहते हैं वो तो बड़ी मुसीबत में फंस गए। किसी किसी ने वचन दे भी दिया कि ठीक है पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे ऐसा करके दीक्षा भी ले ली किंतु यह वचन का पालन क्या हो सकता है फिर भक्तों ने जाकर कंप्लेन की महापुरुष महाराज को और महापुरुष महाराज ने अखंडानंद जी को बुलाया देखो भाई हम लोग जिस तरह से जीते हैं ये लोग इस तरह से नहीं रह पाएंगे तुम इस तरह से वचन लोगे फिर वे लोग वचन देकर भ्रष्टाचार करेंगे इस तरह का उनको तकलीफ में मत डालो फिर अखंडानंद जी ने खुले हाथ दीक्षा देना शुरू किया [हंसी]
प्रश्न: हम सबको एक आध्यात्मिक संगति चाहिए, जो हमें अति-भौतिकवाद से सुरक्षित रखे। यह अपना सुबह का क्लास इसका अच्छा उदाहरण है।
सिर्फ वहां पर पहुंचने के बाद में भी जब फिर से नीचे आते हैं फिर से आपको सेम कम्युनिटी चाहिए। माने जिस क्षण निर्विकल्प अवस्था में रहते हैं उसी क्षण आपको नहीं चाहिए। किंतु जब जैसे वापस आते हैं ठाकुर ने स्वयं तोरा कोई कोथाया अच्छी शायर है। ऐसा करके पुकारा था सबको। वो तो निर्विकल्प समाधि के बाद में पुकारा था। मेरे लिए भी मैं जब राजकोट में था माने अप टू राजकोट मेरा स्केेड्यूल इतना हेक्टिक था कि मतलब जैसे ही दिन चालू हुआ काम काम तो अब मैं जब यहां पे आया ना देखिए हाउ थैंकफुली कि अपना कम्युनिटी बाय दैट टाइम ऑलरेडी एस्टैब्लिश हो चुका था। मैं जब यहां पर आया शुरू के दिन तो मैं इतना मतलब ऐसा हो गया ना कि अभी लाइफ के साथ में क्या होगा क्योंकि यहां पर कोई गोल ही नहीं है मेरे सामने फ्रैंकली स्पीकिंग मेरे लिए कुछ काम नहीं है यहां पे तो मैं करूंगा तो करूंगा क्या सुबह को उठ के जो एक फर्स्ट चीज वहां पर पब्लिकेशन में था तो यह करना है वो करना है वो वही चीज नजर के सामने ही नहीं आ रही ऐसा तो हुआ नहीं ना हमने तो उस लेवल पे नहीं उठने के बाद सीधा ठाकुर का चिंतन स्टार्ट हो वो लेवल पे तो अभी पहुंचते पहुंचे नहीं है। तो नाउ वेरी थैंकफुली सुबह को उठने से ही यह सब क्लास क्या अभी सब्जेक्ट है आज क्या टॉपिक है वो चालू हो जाता है। सो इस कम्युनिटी हैज़ सेव्ड मी आफ्टर कमिंग हियर और मैं राजकोट में तो सिर्फ इसीलिए स्टार्ट किया था समथिंग ऑन साइड किंतु यहां पे दिस हैज़ बिकम माय वो जो पहला वो साइड कोर्स होता है ना खाने में पापड़ और आचार किंतु अभी यह दाल भात हो गया यहां पे आकर [हंसी] मेन कोर्स हो गया है।
प्रश्न: एक ओर कहा जाता है कि भवसागर पार करना मुश्किल है; दूसरी ओर कहा जाता है कि ठाकुर के शरणागत होने से वही भवसागर गोष्पद-वारि (गाय के पैर के निशान में भरे पानी) के समान हो जाता है—यह कैसे संभव है?
वेरी गुड आपका ये मतलब कोरिलेशन है। आज मैं और दो-तीन चीजें बोलना चाहता था भवसागर के साथ में बोला नहीं क्योंकि थोड़ा डिफरेंट मूड था आज क्लास का। देखिए वो कथा का एक प्रसंग है। ठाकुर किसी को पूछते हैं तुम सपना देखते हो क्या? तो बोलता है सपना देखता हूं। ठाकुर ने बोला क्या देखते हो सपना में? तो देखा कि मैं एक दिन रात को सपना देखा। चारों ओर जल ही जल है। पूरा जगत जैसे कि जल से भर गया है। हम लोग एक नौका में जा रहे हैं। तो ठाकुर ने कहा अच्छा फिर तो देखा कि एक ब्राह्मण है वो पानी के ऊपर में चलते-चलते जा रहा है। तो मैंने पूछा कि आप कहां जा रहे हैं? तो बोलता है भवानीपुर जा रहा हूं। तो अब ठाकुर ने जैसे ही सुना ठाकुर बोलते हैं अच्छा मुझे रोमांच हो रहा है। फिर बताओ तुम तुम दीक्षा लो। ठाकुर बोलते हैं साथसा तुम दीक्षा ले लो। तुम मंत्र ले लो। फिर क्या हुआ? तो बोलता है कि यह ब्राह्मण जा रहा है। तो मैंने कहा कि आप पानी पे कैसे चल रहे हैं? तो ब्राह्मण ने कहा इसके नीचे में ना रास्ता है इसलिए मैं चल के जा रहा हूं। तो यह आदमी बोलता है अब आप रुक जाइए थोड़ा। मैं भी आपके साथ में चलना चाहता हूं। तो ब्राह्मण कहता है देखो अभी तुमको आने में थोड़ा देरी है और मुझे जल्दी है। मैं जा रहा हूं। तुम यह रास्ता देख के रखना। इस रास्ते पे चल के आ जाना। तो [हंसी] देखिए ये ठाकुर ने ये पानी के नीचे में बराबर रास्ता बना करके गए हैं। हमको इसी रास्ते पे चल के जाना है। [हंसी] ठाकुर कहते हैं मुझे रोमांच हो रहा है। तुम जल्दी से मंत्र ले लो। [हंसी] [हंसी] ये भवसागर के नीचे में वही पानी के नीचे में ही ठाकुर सेतु बना करके गए हैं। हमें वही रामकृष्ण सेतु पर चल के भवसागर पार कर लेना है।
प्रश्न: जैसे यीशु पुनर्जीवित हुए थे, वैसे ही ठाकुर ने भी महासमाधि के बाद दर्शन दिए।
मैंने हमने तीन दो घटनाएं तो देखी ना कि वो जब स्वामी जी का जब जीवन देख रहे थे मां को भी दर्शन दिया स्वामी जी को भी दर्शन दिया और एक रामायित साधु को दर्शन दिया था। तीन दर्शन तो विद इन फर्स्ट वीक हो चुके थे। जो रामायण साधु जो अयोध्या से आया था। हां हां हां हां हां हां दक्षिणेश्वर में माने दैट इज सबसे बड़ा मिरेकल तो उसमें यह है कि ठाकुर एक पात्र में खीर बना के लेके उसको दिए और वो पात्र रामलाल दादा ने काफी समय तक बचा के रखा था। सो अपने ऑर्डर में मैंने कहा ना कि दो तीन ही ऐसी घटनाएं कि कुछ मटेरियल सम मिरेकल हुआ है। तो उसमें से एक मटेरियल मिरेकल कि वो जब मां सिंह वाहिनी ने आकर के मां मां की मां को श्यामा सुंदरी देवी को औषध दिया था कि मां शारदा की आंखों में दिखाई नहीं देता। यह औषध लो मेडिसिन लो उनकी आंखों में डालना थोड़ा सा। तो वह एक औषध दिया था ना वो आंख में डालने के लिए नहीं किंतु एक जनरल एक मेडिसिन दिया था। सो दैट इज वन मटेरियल मिरेकल और यह एक मटेरियल मिरेकल बाकी जितने भी है विज़ंस वगैरह है भविष्यवाणी है वो माने भाव होता है समाधि होता है। मटेरियल मिरेकल्स वेरी रेयर कुछ नहीं। रामलाल दादा ने जो बताया सो बताया। बस [हंसी] और यह तो देखिए कि यह घटनाएं तो हमको पता है। उसके बाद में कितना कुछ हुआ होगा। अब मास्टर महाशय ही देखिए ना अपने बारे में तो कुछ बताते ही नहीं है। उनको क्या-क्या विज़न नहीं हुए होंगे। जस्ट वी हैव टू इमेजिन ओनली राजा महाराज राजा महाराज का कहीं नाम उल्लेख नहीं है। मतलब आखरी आखिरी दिनों की घटनाओं में तो अभी उनको क्या विज़न हुआ होगा? शशि महाराज तो ठाकुर की डायरेक्ट सेवा करते थे। उनको माने इन सबके विज़न या एक्सपीरियंस सब कुछ तो आज इतिहास के वो पन्नों में छुप गया है ना।
प्रश्न: मैंने कई उत्कृष्ट साधकों को देखा है, जो अपनी आध्यात्मिक उपलब्धियाँ और ज्ञान दूसरों से साझा नहीं करते—क्या यह हमारी, हिन्दुओं की, एक कमी नहीं है?
यू आर राइट के थोड़ा सा ज्यादा शेयर करने से सबको थोड़ा सा यह मिलता है। क्या कहेंगे इंस्पिरेशन अभी देखिए ना ठाकुर 10-15 साल ही यदि लेट आते तो उनको तो हमने वीडियो पे ले लिया होता। स्वामी जी के लेक्चर्स रिकॉर्ड करके रख दिए होते। ज्यादा टाइम तो नहीं है यह ऑडियो वीडियो टेक्नोलॉजी डेवलप होने में। बड़ी मुश्किल से 10 15 20 25 साल बाद में तो सब रिकॉर्ड हो जाता होता। तो ये कथामृत पढ़ने की बजाय हमको साक्षात देखने को मिलता तो पूरे जगत को पता नहीं कितना बेनिफिट हो जाता। किंतु फिर उसमें क्या है कि ठाकुर देखिए कि एक बार कहते हैं आखिरी समय में ही कि मैं नादान मूर्ख जान के लोग मेरे पास में आकर के सब कुछ ले ले तो ऐसा ना हो बोलकर के मां ने इस देह को ज्यादा दिन टिकाया नहीं। तो फिर जो लोगों को कर्मों का भोग भोगना है वे लोग भी ऐसा शॉर्टकट मार के यदि कुछ प्राप्त कर ले सप्त गिरीश कोष जैसे होते नहीं है तो फिर कैसा माने सम मिस्ट्री यहां पे रहने देना है जैसे अपने जो बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र है सब दुर्गम स्थान पे है। अभी इस दुर्गम स्थान जैसा कुछ रहा नहीं है। किंतु यदि ट्रेडिशनली आप यदि मानसरोवर कैलाश अमरनाथ जाए तो जो तपस्या करनी पड़ती है तो अल्टीमेटली जब विज़न दर्शन होगा तो दैट वुड बी रियली वर्थ इट अब स्वामी जी को ही देखिए ना अमरनाथ जाने के समय उनका हार्ट एनलार्ज हो गया था इतना उनको कष्ट करना पड़ा था बट अल्टीमेट दर्शन वाज़ वर्थ इट। सो क्या है कि तपस्या इज़ एन एसेंशियल पार्ट ऑफ स्पिरिचुअल साधना। अभी बहुत ज्यादा इजी कर देन हु विल डू द तपस्या तो तपस्या नहीं होगी तो कर्मनाश नहीं होगा तो अगर आपके सामने कर्मनाश नहीं करके ऐसा यूटिलिटेरियन नहीं रख के मैं कहूंगा कि तपस्या इज अ फाउंडेशन ऑफ सिविलाइजेशन आज आप अब जैसे ये एस्टेन का चल रहा है जितना पढ़ते हैं उतना ही हमको लगता है कि पूरा अपर का म जो अपर क्लास जो है माने ये वेल्थी क्लास पूरा का पूरा करप्ट है क्या माने जिन जिनजिन लोगों को हम रिस्पेक्ट करते हैं स्टीफन हॉकिंग वगैरह वे लोग सब के सब इस मायाजाल में फंसे हुए हैं क्या तो ये जब पढ़ते हैं तब फिर किसको तपस्या करके देखते हैं तो लगता है ना भाई चलो सिविलाइजेशन जिंदा है वरना तो एक बार नेम फेम पावर पोजीशन आ गया फिर यही सब करना है क्या ओम