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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 26 Nov 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध और चैप्टर का नाम है बिंदु वासिनी इसका हम पाठ कर रहे हैं आखिर में दो तीन पेजेस बचे हैं इस चैप्टर के किंतु फिर भी एक बड़ा ही इंपॉर्टेंट पॉइंट इस आखिरी दो-तीन पेज में हम लोग डिस्कस करने वाले हैं हम लोग अर्थात कि महाराज ने लिखा है गंभीरानंद जी महाराज ने हम उसको उसके ऊपर में पढ़ेंगे और चर्चा करेंगे तो अच्छा ये एक दूसरा एक पॉइंट कि बिंदुवार अर्थ क्या है एक्चुअली जब चैप्टर का प्रारंभ हुआ था उसी समय मैंने इसके बारे में सोचा था कि इस शब्द का इस चैप्टर के हेडिंग का एक अर्थ होना चाहिए मैंने जब इसका इंग्लिश ट्रांसलेशन या हिंदी ट्रांसलेशन देखा हिंदी ट्रांसलेशन में बिंदु वासिनी शब्द ही दिया है और इंग्लिश ट्रांसलेशन में दिया है लाइट अंडर अ बुशेल इसका अर्थ क्या है कि लाइट अंडर ए बुशेल का अर्थ क्या है कि एक इस तरह का प्रकाश जो कि गोपनीय है जो कि सबको पता नहीं है जिसके बारे में जो कि एकदम जिसको कि ढक करके आवृत करके उसको प्रोटेक्टिव एक उसमें रखा गया है तो जिसको तो फिर अभी मां को भी देखिए कि मां का जीवन भी यदि आप स्टडी करेंगे तो ठाकुर जब तक थे सदेव वर्तमान थे और इवन ठाकुर की महासमाधि के बाद में भी जब तक स्वामी जी थे तब तक माने अपनी जो उनकी जो शक्ति थी उसको गोपनीय रखा था ठाकुर ने क्या किया मां की आराधना करके मां की शक्ति के आधार पर धर्मचक्र प्रवर्तन किया किंतु मां खुद तो गोपन थी मां खुद तो किसी के सामने नहीं आती थी यहां तक कि ठाकुर के जो बाकी सब भक्त है गिरीश घोष वगैरह इनको भी मां की महिमा का ज्यादा कुछ अंदाज नहीं था स्वामी जी ही थे सर्वप्रथम जो कि मां की महिमा का जाहिर में प्रचार करना उन्होंने शुरू किया था जाहिर में अर्थात क्या कि भक्तों के भीतर में तो यह स्वामी जी थे कि जिन्होंने मां की महिमा का सर्वप्रथम प्रचार प्रारंभ किया ठाकुर स्त्री भक्तों को मां के पास में भेजते थे किंतु इन जनरल पुरुष भक्त बहुत कम ही मां के पास में जाते थे ये लाटू महाराज थे बूढ़ो गोपाल अर्थात कि स्वामी अद्वैतानंद जी महाराज थे इनके जैसे कुछ कुछ डिवोटा थे या त्यागी संतान थे जिनको कि ठाकुर के पास में से आदेश प्राप्त हुआ था कि जाकर के मां की सेवा करें जिस किसी भी तरह से हो जैसे कि रोटी बनाना है तो उसके लिए आटा बनाना पड़ेगा अभी आटे को ठेस ना वह थोड़ा सा कठिन कार्य है थोड़ा सा फिजिकल स्ट्रेंथ ले लेता है या तो फिर बाजार में जाकर के चीजें परचेस करना तरकारी है फल है आटा है जब जीवन ज किचन चलाने के लिए संसार चलाने के लिए जो कुछ भी चाहिए बर्तन है जो कुछ भी चाहिए यह सब खरीद करना है उसके लिए ठाकुर ने इनको कहा था किंतु इनके अलावा बहुत कम लोग ही स्त्री भक्त ही मां के पास में आती थी अभी देखिए कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां के मन में एक प्रचंड जैसे कि एक वरहा अग्नि जैसे प्रकट हुई अभी ठाकुर तो च ले गए वह क्या अभी किस चीज को लेकर के पृथ्वी पर रहेगी तो यह वरहा अग्नि से लेकर के माने नॉर्थ इंडिया यानी कि उत्तर भारत के जो तीर्थ स्थान थे उसकी उसकी यात्रा करके वहां पर मंदिरों का दर्शन करके वहां पर जप करके अपने मन को संपूर्ण रूप से ठाकुर के श्री चरणों में अर्पित करके मां ने समय बिताया था उसके बाद में जब मां कलकत्ता वापस आई तो फिर ठाकुर ने तो कहा था कि तुम किसी के घर मत रहना अपना खुद का घर रहना है तो हमेशा अपने खुद के घर में रहना है जिससे कि क्या होगा कि दूसरों पर डिपेंडेंस नहीं आता तो फिर मां गई कामर पुकुर अभी ये कामर पुकुर में ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां जो कुछ दिन रही है वह मां के सबसे ज्यादा कहेंगे कि कष्टम दिन थे क्योंकि यह रामलाल दादा और यह लक्ष्मी दीदी दोनों ने जैसे कि मां का त्याग कर दिया था और उन्होंने व वे दोनों तो कोलकाता में रहते थे और इतना ही नहीं ठाकुर की महासमाधि के बाद में जो मां को तीन चार रुपया जो मिलता था काली मंदिर से ठाकुर के नाम पर पेंशन कहो या जो भी कहो तो यह उन्होंने बंद करवा दिया रामलाल दादा ने जाकर के वहां का जो खजांची अर्थात की चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर आज की लैंग्वेज में कहे तो काली मंदिर का उसके पास जाकर के कहा कि मां के तो बहुत सारे भक्त है बड़े धनी भक्त है तो मां को पैसों की जरूरत नहीं है यह अ अननेसेसरी है पा छ जितना भी देते हैं मां को यह बंद कर दीजिए तो उन्होंने पैसा देना बंद कर दिया तो अभी ऐसा नहीं है कि मां बिल्कुल ही वंचित थी हमको तो पता है अगले वाले चैप्टर में भी हमने देखा कि ठाकुर पूछते हैं मां को तुम रात को कितनी रोटी खाती हो तो मां बेचारी लज्जा से जैसे कि मिट्टी में मिल गई अपने मुंह से कैसे कहेगी कि वह कितनी रोटी खाती है किंतु ठाकुर तो छोड़ने वाले नहीं थे ठाकुर को तो पता है कि उनकी महासमाधि प्रथम होगी बाद में मां को पृथ्वी पर रह कर के बहुत सारा कार्य करना है मां जगदंबा का तो इसलिए ठाकुर पूछ रहे हैं तो जब मां ने कहा कि पांच छ रोटी खाती हूं तब ठाकुर ने कैलकुलेशन करके जितना रुपया चाहिए था खाने पीने के लिए उतना उन्होंने जमा करवा दिया था बलराम बाबू की जमींदारी में और बलराम बाबू छछ महीने पे उसका जो इंटरेस्ट आता था वो मां को भेजते थे तो ऐसा नहीं है कि मां संपूर्ण रूप से असहाय थी किंतु देखिए कि ठाकुर का हमेशा से यह कहना था कि जदी मोटा भात का पड़े अभाव थाक वे ना अर्थात कि यह जो रहने पीने और खाने की जो समस्या है वो नहीं रहेगी किंतु जीवन तो देखिए कि कष्ट से भरा हुआ है और फिर मां वहां पर अकेली रहेगी और कामा पुकुर में तो कुछ-कुछ असामाजिक तत्व भी रहते थे जो कि साधु लोगों को काफी परेशान किया करते थे सत चरित्र लोग होंगे उनको यह असामाजिक तत्व परेशान किया करते थे यह मां का अनुभव था एक साधु वहां पर आए थे मां उनकी कुछ ना कुछ तरह से वह मदद करती थी उस साधु को इन्होंने परेशान करके भगा दिया था तो यह सब वहां पर कमार पुकुर में होता रहता था तो इसी समय देखिए कि किंतु कुछ दिन के बाद में स्वामी जी की महा समा के बाद में और फिर क्या है कि रामकृष्ण संघ की स्थापना हुई और शरत महाराज ने मां की सेवा का भार ग्रहण कर लिया और श्यामा सुंदरी देवी ने अर्थात कि मां शारदा की मां गर्भधारिणी मां उन्होंने कामर पुकुर जाकर के देखा कि अरे उनकी बिटिया इतने कष्ट में रह रही है तो वह उनको लेकर के जयराम बाटी चली आई तो यह जयराम बाटी मां आई यहां पर रामकृष्ण संघ की स्थापना हुई स्वामी शारदानंद जी महाराज जो कि संघ के सर्वप्रथम जनरल सेक्रेटरी उन्होंने स्वयं मां की सेवा का भार ग्रहण किया यह जो सब कुछ कुछ घटनाओं का यह जो संगम हुआ तब से धीरे-धीरे करके मां जब भी कलकत्ता आती थी तो कलकत्ता के भक्तों में मां का नाम प्रचार होना शुरू हो गया और धीरे-धीरे करके एक के बाद एक भक्त मां के पास में आते गए फिर उनको पता चला कलकाता आने वाले भक्तों को पता चला कि कलकाता में तो शरद महाराज रहते है बाकी सब सन्यासी संतान है मां के अर्थात कि मां की मां का दर्शन करना मां के साथ में बात करना बहुत ही मुश्किल है जब भी मां कोलकात्ता जाएगी इतना लंबा घुटा टान करके वह एक चद्दर अपने शरीर पे आवृत करके अपने शरीर को एक मोटी चादर से आवृत करके एक खाट के ऊपर में बैठेगी सब भक्त लाइन में खड़े रहेंगे यहां पर गोलाप मां रहेगी कहां पे वो नीचे में शरत महाराज है यह सब लोग जैसे कि मां के जो जो पहरेदार है मां के जो गार्ड्स है वह सब वहां पर खड़े रहते हैं फिर एक के बाद एक भक्त मां को प्रणाम करेंगे प्रणाम किया फिर वहां से इमीडिएट निकल लो और कोई बातचीत नहीं थोड़ा बहुत मां जद जद मां को प्रश्न है तो मां एकदम मृदु स्वर से प्रश्न करेगी गुलाप मां पास में खड़ी है तो गुलाप मां उच्च स्वर में गुलाप मां तो एकदम यह था ना उनका नेचर बड़ा अग्रेसिव था तो उच्च स्वर में वो पूछती कहती थीय भक्त को कि मां यह पूछ रही है या तो मां ये कह रही है तो भक्त भी वह बड़े ही आद मतलब सम्मान पूर्वक श्रद्धापूर्वक कुछ उत्तर देगा और वहां से चला जाएगा तो यह बाद की बात है कुछ भक्तों को बाद में समझ में आ गया यदि मां के साथ में बात करनी है मां को जदिया राम बाटी जाओ भले ही चाहे लंबा कष्ट का रास्ता हो जयराम बाटी जाएंगे मां अपने हाथों से खिलाएगी पिलाए गी उनके बर्तन धो देगी उनके साथ में बात करेगी कितना उनको प्रेम करेगी तो देखिए कि भक्तों का आना जाना कोलकात्ता में और जयराम बाटी में प्रारंभ हो गया और मां का भी मातृत्व धीरे-धीरे करके जो जैसे कि व ठाकुर कहते हैं ना फूल खिलता है फूल की सौरभ जब प्रसारित होती है तो मधुमक्खियां अपने से आकर के फूल के ऊपर में बैठ कर के मधु पान करती है वह गाना गाते गाते वो फूल को कहीं आमंत्रण देने को नहीं जाना पड़ता इनवाइट देने के लिए कि हां चलो अभी आकर के मधु पान करो वह उसकी सौरभ से उसकी सुगंध से मधुमक्खियां अपने से आती है तो यहां पर भी मां का यह जो प्रेम रूपी सौरभ धीरे-धीरे प्रसारित होना शुरू हुआ और सभी लोग मां मां के संतान भक्त मां के पास में आने लगे किंतु यह सब कब की बात है 1902 के बाद की बात है जब स्वामी जी की भी महासमाधि हुई थी तो देखिए कि मां के जीवन को आप कितने पीरियड में डिवाइड कर पाएंगे सर्वप्रथम तो पीरियड है कि जबकि मां जयराम बाटी में मां का जन्म हुआ 5 साल की थी तब तक जयराम बाटी में वह बच्ची की तरह वहां पर रहती थी तो यह फर्स्ट पीरियड होगा सेकंड पीरियड होगा कि ठाकुर के साथ में विवाह हुआ 18591 59 में 18590 73 के आसपास का समय तो यह जो समय था मां का ठाकुर के साथ में विवाह हुआ था किंतु ठाकुर खुद रहते थे दक्षिणेश्वर में दक्षिणेश्वर से एक बार वह सिर्फ कामर पुकुर आए थे उनकी साधना समाप्त होने के बाद में तो क्या है कि मां कभी कामर पुकुर आती कभी जयराम बाटी रहती सुनती कि उनका पति तो पागल हो गया है लोग मां की मजाक करते कहते कि अरे वह तो पागली की स्त्री है पागल की पत्नी है अर्थात कि ठाकुर के बारे में जो उल्टी पुल्टी बातें वहां पर चलती थी ग्राम्य विस्तार में कि हां ठाकुर निव स्त्र होकर के मां का मां जगदंबा का नाम लेते लेते रोते हैं जमीन पर रेंगते हैं पता नहीं मां काली का भोग बिल्ली को खिला देते हैं क्या-क्या सब ठाकुर के बारे में चलता था और बातें गलत नहीं थी बहुत कुछ सही भी था वही है कि ठाकुर का भाव कोई समझ नहीं पाता था तो जैसे मथुर बाबू समझ पाए खजान चन ने मथुर बाबू को पत्र लिखा कि छोटो भट्टाचार्य जो महाशय अर्थात कि ठाकुर वो भोग की लची अर्थात कि पूरी बिल्ली को खिला दे रहे हैं तो फिर वो मथुर बाबू ने आकर के अपनी नजरों से देखा कि ठाकुर किस तरह से भाव में मतवाले होकर के यह सब करते हैं झूठ मूठ का यह सब नहीं है झूठ मूठ का भाव इमीडिएट समझ में आ जाता है ठाकुर की महासमाधि के बाद में ठाकुर का यह भांजा ठाकुर का सेवक हृदय राम तो हृदय राम को पैसों की जरूरत थी वो उसको तो काली मंदिर से निकाल दिया गया था तो क्या करेगा बेचारा तो रामचंद्र दत्त महाशय जिन्होंने काकड़ गछ की स्थापना की काकुर्गाची आश्रम की जहां पर ठाकुर दो-तीन बार आ भी चुके थे तो वहां पर रामचंद्र दत्त ने इसको हृदय को कहा कि देखो मैंने ठाकुर की स्थापना की है ठाकुर के अस्थि भी वहां पर है तो तुम आकर के उनकी पूजा करो तुमसे अच्छा पुजारी कौन मिलेगा ब्राह्मण शरीर है ठाकुर का भांजा है ठाकुर की सदे देह सेवा की है तो तुमसे अच्छा पुजारी कौन मिलेगा तो हृदय भी आया किंतु पूजा करते करते क्या करता है पता है ठाकुर जिस तरह से वो पूजा का नैवेद्य वगैरह वो बिल्ली को खिलाना या तो फिर वोह पूजा के फूल अपने उससे अपनी पूजा करना यह जो सब ठाकुर किया करते थे ऐसा कुछ उसने करना प्रारंभ किया हृदय ने तो राम बाबू बड़े ही नाराज हो गए कहा कि देखो तुम तो ठाकुर नहीं हो ठाकुर की जितनी पवित्रता ठाकुर के जितनी साधना में निष्ठा और ठाकुर की तरह युगा वतार तो तुम नहीं हो तो यह सब नाटक मत करो जो विधि पूजा जो करनी होती है उसी तरह से करो अविधवा किंतु हृदय ने सुना नहीं उसका मन वैसे ही करप्ट हो चुका था तो राम बाबू ने उसको वहां से भगा दिया तो देखिए कि ठाकुर जो कुछ करते थे ठाकुर के बारे में जो सब कहानियां थी वह सही थी यह सब गड़बड़ करते थे किंतु इसके पीछे का भाव क्या है कोई समझता नहीं था तो मां उस समय जयराम बाटी कामर पुकुर में र ती थी और फिर यह सब कहानियां सुनती थी हृदय में बड़ा दुख होता था कि मेरे पति जब उ उनके साथ में मेरी बात हुई थी जब वह यहां पर आए थे तो इतना प्रेम मुझे किया था इतने सुंदर उनका हृदय है फिर पता नहीं लोग ऐसी बातें क्यों करते हैं तब मां ने ठीक किया कि मैं खुद दक्षिणेश्वर जाकर के उनका दर्शन करूंगी उनकी सेवा करूंगी तो मां का प्रथम बार दक्षिणेश्वर आगमन हुआ उसी समय ठाकुर ने मां की सड़सी रूप में पूजा की थी तो देखिए कि सेकंड फेज कौन कौन सा था फर्स्ट फेज वो बालिका स्वरूप एक से लेकर के 5 साल की उम्र जन्म से लेकर के 5 साल सेकंड फेज कि ठाकुर के साथ में विवाह हुआ तब से लेकर के मां सर्वप्रथम का दक्षिणेश्वर आई वो सेकंड फेज और फिर सेकंड फेज में देखिए कि जब से मां की पूजा की ठाकुर ने तब से ठाकुर ने शक्ति का आश्रय लेकर के शक्ति का आश्रय लेकर के आधार लेकर के कलकत्ता में धर्म चक्र प्रवर्तन अर्थात कि मां जगदंबा की जो वाणी उन्होंने खुद श्रवण की है मां जगदंबा का जो उन्होंने खुद दर्शन किया है विभिन्न साधन पद्धतियों से प्रत्येक साधन पद्धति का जो सर्वोच्च लक्ष्य है जो उन्होंने प्राप्त किया है वह चाहे अद्वैत वेदांत हो ना कि वह वैष्णव शास्त्र हो ना कि यह शक्ति साधना या तंत्र साधना हो कि इवन क्रिश्चियनिटी या इस्लाम हो जितने भी पंथ के गुरु ठाकुर के पास में आए सिद्ध ठाकुर के पास में आए उन सबसे ठाकुर ने उन उन पंथ की साधना को सीख कर के उस साधना करके खूब ही अति अल्प समय में उसमें सिद्धि प्राप्त की थी तो यह ठाकुर की सिद्धियां ठाकुर को बटोर नहीं है अभी आज के यंग बंगाल में जैसे कल हमारी बात हुई थी तो यह यंग बंगाल में बटोरने के लिए ठाकुर ने पहले तो मां की पूजा की अर्थात की शक्ति साधना की फिर यह कार्य प्र आरंभ किया और यह कार्य कब तक चला ठाकुर को जब कैंसर हो गया 1885 के आखिरी समय तब तक तो यह जो फेज है इस फेज में भी दो पार्ट है एक पार्ट यह है कि ठाकुर सर्वप्रथम जो अपना कार्य प्रारंभ करते हैं केशव सेन वगैरह को जा जा कर के मिलते हैं सामने से जाक के मिलते हैं यह एक फेज था दूसरा फेज कि जैसे रामचंद्र दत्त फिर ये राखल उसके बाद में मास्टर महा शय और नरेद और यह योगेन महाराज ये जो सर्वप्रथम आने वाले थे अंतरंग शिष्य इनका आना प्रारंभ हुआ और तब से लेकर के एक के बाद में गिरीश घोष है बलराम बसु है सुबोध महाराज यानी कि खोका महाराज है शशि महाराज है शरत महाराज है सबका आगमन प्रारंभ हुआ तो इसको हमने नाम दिया था जदी याद हो कि ठाकुर का जीवन जब स्टडी कर रहे थे उस समय आनंद की हार्ट मने मार्ट ऑफ जॉय आनंद देर हार्ट तो यह आनंद की हार्ट ठाकुर लगा कर के बैठे थे और कितने ही लोग ठाकुर के पास में आते थे किंतु उस समय मां का जीवन देखिए कि अति अल्प लोग मां के पास में आते थे इवन ठाकुर के अंतरंग भक्तों का आना प्रारंभ हुआ उस समय भी स्त्रियां ही सिर्फ मां के पास में ज्यादा आती थी पुरुष भक्त मां को मां से दूर ही रहते थे ठाकुर की यह पूरी व्यवस्था थी इसके अनुसार तो यह जो फेज है कि जब ठाकुर ने मां की शोड़ी के रूप में साधना की तब से लेकर के अंतरंग भक्तों का आना प्रारंभ हुआ तब तक मां है वहां पे उनका प्रकाश निखर रहा है जैसे व उनका जो प्रकाश है वो हृदय में वो जैसे कि वो उनकी पूजा करके जो उनके भीतर में मां जगदंबा है मां शारदा के भीतर में ठाकुर ने यह सड़सी पूजा करके मां को आवाहन देकर के उनको जागृत कर दिया है किंतु अभी तक किसी को पता नहीं है कि मां यहां पर है तो मां है आध्यात्मिक उनके भीतर में मां जगदंबा जागृत हो गई है किंतु अति अल्प लोगों को पता है कि मां यहां पर है इसका अर्थ कि एक ऐसा प्रकाश जो प्रकाश है किंतु अभी भी गोपनीय है अभी भी वह सीक्रेट है ज्यादातर लोगों को पता नहीं है तो यह जो लाइट अंडर बुशेल यह जो इंग्लिश टाइटल है या तो इसका का यही अर्थ होता है और यह जो बंगाली टाइटल है बिंदु वासिनी इसका जो हिंदी ट्रांसलेशन है यह मुझे उसका अर्थ नहीं पता था फिर मैंने एक दूसरा एक साधु है मेरा बैचमेट ही है वो बंगाली है तो उसको यह सब अच्छा उसको ट्रेडिशनल सब पता रहता है तो मैंने उसको पूछा कि भाई इसका अर्थ क्या है बताओ तो लिटरल तो मुझे समझ में आता है किंतु उसका एक्चुअल मीनिंग क्या होगा तो वह कहता है अभी उसके अनुसार मैं कहता हूं कि बिंदु वासिनी देवी बोलकर के एक देवी है काशी के आसपास में ही कहीं पे बड़े ऊंचे पहाड़ पर वह अवस्थित है और वहां पर जाना बड़ा दुर्गम है तो अर्थात कि एक ऐसी देवी जो कि है जाग्रता किंतु उनका दर्शन पाना दुर्गम है इसका यह अर्थ हो सकता है बिंदु वासिनी चैप्टर के नाम का तो मुझे बड़ा अच्छा लगा सुनक के मैंने कहा अच्छा किया यह बताया तुमने तो यह बिंदुवार और इसमें जो भी घटनाएं हैं हमको पता है कि मां वहां व पे दक्षिणेश्वर में थी किंतु अति अल्प लोग ही मां के पास में आते थे मां की महिमा से ज्ञात थे और जिनके साथ में मां ने उनको आशीर्वाद दिया था अभी देखिए कि ये रिलेवेंट क्यों है ये डिस्कशन क्योंकि अभी तक तो हमने यह देखा एक के बाद एक कि ठाकुर के साथ में मां का संबंध कैसा था किंतु अभी जो कुछ एक दो पेजेस बचे हैं उसमें से जो कुछ घटनाएं हैं यह सर्वप्रथम यह जो प्रारंभ होता है मां का मातृत्व का प्रकाश सर्वप्रथम क्योंकि अभी एक के बाद एक भक्त है जो आध्यात्म ज्ञान पिपासु है वह मां के पास आना शुरू होंगे और मां के पास में से आध्यात्मिकता की प्रार्थना करेंगे उसकी याचना करेंगे और मां बिना किसी झिझक के बिना किसी संदेह के उनके ऊपर में कृपा करती है तो यह है मां के प्रकाश और इसीलिए इस चैप्टर का नाम रखा गया है बिंदु वासिनी अर्थात कि एक इस तरह की ज्योति जो कि अभी सबके सामने प्रकट नहीं हुई है या तो फिर एक इस तरह की देवी कि जिनका दर्शन पाना अभी भी मुश्किल है तो अभी महाराज जी जो कुछ गंभीरानंद जी महाराज जो प्रसंग का वर्णन करते हैं महाराज जी क्या लिखते हैं श्री मां लज्जा शलाला एवं श्री श्री ठाकुरे संपूर्ण मतानु बतीनी होयले ओ एक विषय तीनी तहर स्वाधीनता अटूट राखी तेन मां थी लज्जा शीला और हमेशा ठाकुर की बातों का पालन किया करती थी ठाकुर जो कहेंगे वह मां अपने सर पर लेकर के उसका पालन करती थी किंतु एक ऐसा विषय है जिसमें कि मां ने अपनी स्वाधीनता को अटूट रखा है कौन सा विषय शेटी तहर मातृत्व इलाका और ये विषय हो गया उनके मातृत्व का राज्य मां का राज्य यहां पर मां ही सर्वोपरि है मां के पास में आकर के आप जो मांगेंगे मिल जाएगा फिर यहां पर ठाकुर का भी कुछ आदेश नहीं चलेगा य संबंध आमा दिग के परे अनेक घटना सहित परिचित होते होई बे यह मां का मातृत्व का राज्य इसके बारे में बहुत सारी घटनाओं से हम बाद में परिचित होंगे आपात तो तीन टी उल्लेख कोरीते छी बाद में बहुत सारी घटनाओं के साथ में परिचित होंगे किंतु फिलहाल तीन घटनाओं का उल्लेख कर रहे हैं श्री मायर संगिनी तो खन अति अल्पो कोखोनो धी ब रमण रा आश तो एक जन यो किछु दिन छलो मा की संगिया उस समय बहुत कम थी कभी-कभी यह धीवर रमणी अर्थात कि ये मछुआ जो मछली पकड़ने वाले जो होते हैं उनकी पत्नियां या उनकी स्त्रियां कभी-कभी मां के पास में आती थी एक काम वाली की को भी रखा था किछ कुछ दिन के लिए आर कोलकाता ईते के हो के हो आशीते और कोलकाता से कभी-कभी कोई स्त्री भक्त आ जाती थी जिनको कि ठाकुर मां के पास में भेजते थे भक्त शंखा तखन ते मन बाड़े नाई भक्त संख्या अभी भी इतनी बड़ी नहीं है शही समय एक वृद्धा श्री मायर निकट आशी तो उस समय एक वृद्ध स्त्री मां के पास में आती जवने से अनेक दुष्कर्म करीले ओ ओई काले से हरिनाम करीतो एवम एई मायर निकट आशि तो यवन में अर्थात की अपनी युवावस्था में इस वृद्धा ने बहुत तरह के दुष्कर्म किए थे किंतु अभी तो वह वृद्धा हो गई है और अकेली ही मां के पास में आती थी और वह हरिनाम भी करती थी श्री मां ताहर शहीद कोथा बोली देन मां इस वृद्धा के साथ में बातें करती इहा लोखो करिया ठाकुर एक दिन बोली लेन अभी ठाकुर ने देखा कि एक वृद्धा मां के पास में आ रही है अपनी युवावस्था में बड़े ही दुष्कर्म किए हैं किंतु अभी व हरि नाम करती है और मां के पास में आकर के गप लगाती है और मां भी उसके साथ में बातें करती है ठाकुर ने यह देख लिया तो उन्होंने क्या कहा इहा लोखो करिया ठाकुर एक दिन बोली लेन इसको देख कर के इसको नोटिस करके ठाकुर ने एक दिन कहा ओटा के एखाने केनो उस वृद्धा को उसको तुम यहां पर क्यों रखती हो ओटा के एखाने केनो उसको यहां पर क्यों यह होगा लिटरल ट्रांसलेशन अर्थात कि उस वृद्धा को तुम अपने यहां पर बिठा कर के उसके साथ में बातें क्यों करती रहती हो मां बोली लेन ओ एक खन भालो कथाई तो कोई हरि कथा कोई ताते दोष की मां ने कहा वोह तो अभी अच्छी बातें ही करती है हरि नाम करती है हरि कथा करती है उसमें तो क्या है मां जानी तेन मां को पता था मानु शेर मनोभाव सर्वदा एकरूप थाके ना मां को पता था कि मनुष्य का भाव हमेशा एक तरह का नहीं रहता मंद व्यक्तियों क्रम उत्तम होते पारे मंद व्यक्ति भी अर्थात कि बुरा व्यक्ति भी हो सकता है कि समय के साथ में अच्छा हो सकता है एक दि के श्री रामकृष्ण कर्तव्य बुद्धि तहा के बोलिया द तो मंद लो के आशिया औ सत आलोचना करते पारे यहां पर ठाकुर की कर्तव्य बुद्धि थी उनको पता था कि मां शारदा की रक्षा करनी है उनको सिखाना है अच्छे संस्कार देने हैं जिससे कि जब भक्तों की संख्या बढ़ेगी तो लोक व्यवहार किसे करना है वह मां को पता चले यह चल कल हमने अच्छे से डिस्कस किया था तो यहां पर ठाकुर की भी एक कर्तव्य एक बुद्धि थी उनकी भी एक उन्होंने दायित्व लिया था मां का और तो कोई टीचर था नहीं मां को अंक गणित यह वगैरह सिखाने के लिए शब्द ज्ञान देने के लिए किंतु ठाकुर को पता था कि यह शब्द ज्ञान अंक ज्ञान इसकी वजह मां को सबसे ज्यादा जरूरत है लोक व्यवहार और आध्यात्मिक ज्ञान की तो यह सब जवाबदारी ठाकुर ने अपने हाथों में ली थी तो उनकी तो एक कर्तव्य उनका बनता है कि मां के पास में कौन आता है मां किसके साथ बात करती है नजर रखे मां को सावधान कर दे तो इसीलिए ठाकुर की यह जो कर्तव्य से वो प्रेरित हो करके उन्होंने सोचा कि यह जो अच्छे लोग नहीं है वे लोग असत अर्थात की बुरी आलोचना मां के पास में कर सकते हैं मंद व्यक्तियों क्रम उत श्री मां के ताहा होते रखा करा उचित मां को इससे रक्षा करनी जरूरी है देखिए ठाकुर का ये जो डर था वो डर कोई हवाहवा में नहीं था ठाकुर ने एक बार कुछ ये जो सब स्त्रियां आती थी तो वहां पर गंगा है गंगा का किनारा वहां पर बड़ा सुंदर घाट यह रानी राम ने बनाया हुआ है तो घाट के ऊपर में स्नान करने के लिए या तो फिर कपड़ों कपड़े धोने के लिए यह सब वो दक्षिणेश्वर गांव की स्त्रियां है वगैरह आया करती थी और वह आकर के ठाकुर अभी वोह जैसे होता है कि 10 लोग इकट्ठा होते हैं अपने मित्रों के साथ में तो काम करते-करते दुनिया भर के गप तो लगाएंगे ही लगाएंगे तो ठाकुर के यह जो सब चित्र विचित्र जो आचरण थे कि वह सब आचरण के बारे में यह सब डिस्कस करती थी और फिर मां के पास में भी जाकर के पता नहीं क्या-क्या सब बातें करती रहती थी तो ठाकुर बेचारे थोड़े से चिंता में पड़ गए और उन्होंने जाकर के मां को कहा कि देखो यह जो सब स्त्रियां आकर के तुमको कहती है कि अभी क्या है कि स्त्रियों को तो है कि मातृत्व सबसे बड़ा यह है उनके जीवन का एक फेज मातृत्व उनके जीवन का एक बहुत बड़ा आयाम है मां का संतान होने वाला नहीं है ठाकुर अपनी स्त्री के साथ में सोते नहीं है क्यों नहीं सोते क्यों ऐसा ये सब अभी वो तो रूमर्स अफवा तो चलेगी और ठाकुर के कान में आया कि ये स्त्रियां ऐसी कुछ बातें जाकर के मां के पास में करती है कि ठाकुर आपके साथ में क्यों रहते नहीं है आपको संतान क्यों नहीं होता है यदि इसका कुछ इलाज करना है तो कैसे करना है वगैरह वगैरह ठाकुर के कान में आया तो ठाकुर मां के पास में जाकर के कहते हैं देखो यह सब स्त्रिया आकर के तुमको कहेगी मेरे बारे में सब उल्टी पुल्टी बातें करेंगी कहेंगी कि इनको यह औषध दे दो तो यह औषध खा कर के वो तुम तुम्हारे साथ में वह सहवास करेंगे आपको संतान होगा वगैरह वगैरह किंतु तुम यह सब बातें सुनना मत मुझे कोई औषध वगैरह मत चोरी चुपके मत दे देना मेरे पास में सब कुछ है किंतु मैंने मां जगदंबा को सब कुछ अर्पित कर दिया है तो ठाकुर भी टेंशन में आकर के मां को इस तरह से सावधान करते थे और देखिए कि स्त्रियों का तो ऐसा है ही है कि उनको संतान चाहिए ही ठाकुर का एक दूसरा एक भक्त था उसका नाम था हरीश तो हरीश ठाकुर के पास में नियम रूप से आया करता था उसकी पत्नी भी थी अभी उसकी पत्नी ने सोचा कि हरीश को शायद कुछ फिजिकल डिफेक्ट होगी या जो कुछ भी है इसीलिए उसको संतान नहीं हो रहा है यह ब्रह्मचर्य वगैरह हवाहवा में बातें हैं उसको निश्चय कुछ फिजिकल या मेंटल प्रॉब्लम है तो स्त्री ने क्या किया हरीश की पत्नी ने उसको चोरी चुपके खाने में कुछ ऐसा औषध दे दिया कुछ ऐसी दवाई दे दी कि जिससे अभी उसको संतान हुआ कि नहीं वह तो पता नहीं किंतु हरीश का माथा खराब हो गया और और वो पागल हो गया और जयराम बाटी में मां जब थी कमार पुकर में जब मां थी एक दिन वह वहां पर गया और पता नहीं क्या सब उल्टी पुल्टी हरकत कर रहा है एक दिन तो मां के पीछे में दौड़ने लगा मां भी वहां पर दौड़ते दौड़ते जब थक गई अपने को बचाते बचाते जब तब मां के भीतर में भी वोह बगला स्वरूप रुद्र स्वरूप का वो आविर्भाव हुआ मां ने उसको धक्का मार के जमीन पर पटक दिया उसके छाती पर पैर रखा उसकी जीप खींच करके जोर-जोर से चाटा मारना शुरू कर दिया तब कहीं जाकर के वो ठंडा हुआ उसके बाद में मां ने फिर वो कलकता पत्र लिखा और वो निरंजन महाराज वगैरह एक दो जो ठाकुर के संतान इमीडिएट दौड़ कर के कामर पुकुर आए और वो आ रहे हैं ऐसा सुनकर के हरीश वहां से भाग गया तो देखिए कि यह सब घटनाएं होती थी उस समय बहुत बार ऐसा होता है कि जद पति या तो पत्नी ये आध्यात्मिक राज्य में आगे बढ़ रहे हैं तो वो उनके साथ में रहने वाले को पसंद नहीं आता यह सब मीराबाई की कहानी जग प्रसिद्ध है वो मीराबाई भगवान कृष्ण को ही अपना पति मानती थी तो मीराबाई का जो पति था उनके ऊपर कितना अत्याचार करता था उनको लगता है कि जो यह विवाह है या तो शादी है यह दैहिक संबंध बनाने के लिए ही हुई है इससे ज्यादा इसका कोई प्रयोजन ही नहीं है तो ऐसे लोग जो भौतिकवादी होते हैं देहात्सेक्स उस दिन कि हां उनके बारे में यह स्त्रियां जो है वो वो गंगा के किनारे घाट प आती है वो ऐसी बातें करती इसलिए जाक के मां को चेतावनी देते हैं कि मुझे वो सीक्रेट चोरी चुपकी कोई दवाई वगैरह मत देना वह मेरा मेरे पास में सब कुछ है किंतु मैंने ईश्वर को सब कुछ समर्पित किया है तो ठाकुर की ये जो चेतावनी थी वो गलत नहीं थी ठाकुर को पता था सब तरह के लोग आते हैं सब तरह की उल्टी पुल्टी बातें करते हैं उससे मां को बचा करके रखना चाहिए किंतु यहां पर देखिए यहां की बात अलग है यह जो वृद्ध महिला मां के पास में आती थी भले ही उसका चरित्र एक समय खराब हो किंतु अभी तो वह हरि कथा ही कहती थी मां की शरण में आई थी तो फिर क्या हुआ आगे सुधु की ताई रूप व्यक्ति सहित गल्प गुज करा आगंतुक सासारी लोकर दृष्टि ते विष दूष और देखिए ठाकुर ने जो मां को सावधान किया कि इस महिला का चरित्र अच्छा नहीं था तुम इसके साथ में बात मत करना वह तुमको कुछ बुरी बातें सिखाएगी या सिखाने का प्रयास करेगी सिर्फ इतना ही नहीं ठाकुर के पास में जो सब भक्त आते थे वे लोग जद देखते कि मां इस तरह की वृद्ध महिला के साथ में वार्तालाप कर रही है तो उनके मन के ऊपर में एक बड़ी ही बुरी छाप पड़ती कि मां क्यों इस तरह के लोगों के साथ में बात कर रही है हालांकि देखिए कि ठाकुर या तो फिर मां लोग क्या कहते हैं उस की कोई बहुत ज्यादा चिंता नहीं करते थे ठाकुर को तो उनकी खुद की मां चंद्रावली देवी ने कहा था कि विवाह कर लो घर बनाओ घर बसेना तो यह जो सब तुम पागलपन कर रहे हो उससे थोड़ा सा मन थोड़ा सा पीछे आएगा थोड़ा सा तुम नॉर्मल होगे यह सब तो चंद्रा मणि देवी ठाकुर को ठाकुर के पास में इच्छित थी किंतु ठाकुर ने तो यह सब सुना नहीं हालांकि देखिए ठाकुर और चंद्रा मणि देवी का भी संबंध जो है बड़ा ही मधुर है ठाकुर अपनी मां को आघात देकर के या तो फिर मां के मन को संताप देकर के उन्होंने आध्यात्मिक साधना नहीं की है उन दोनों के बीच में एक जो गहराई में एक जो सेत था प्रेम का वह तो अटूट ही रहा है भले ही चाहे बाह्य दृष्टि से चंद्रा मणि देवी कभी-कभी अधीर हो जाती थी कि अरे मेरा प्रिय संतान गदाधर या तो फिर गदाई इसके बारे में लोग क्यों ऐसी सब बातें कर रहे हैं उसका भी तो संसार बस है कौन मां की ये इच्छा नहीं है तो मुंह पर तो यह सब बातें चलती थी किंतु चंद्रा मणि देवी और ठाकुर दोनों को पता था कि उन दोनों का प्रयोजन इस संसार में क्या है तो यह देखिए कि एक हद तक ठाकुर चिंता करते थे कि लोग क्या कहते हैं लोगों के कहने के अनुसार चलना है किंतु बियोंड वन पॉइंट एक ऐसी लक्ष्मण रेखा क्रॉस हो जाती है आध्यात्मिक जगत में कि फिर लोग क्या कहते हैं यह सब भूल जा कर के फिर आध्यात्मिक जो उन्नति है आध्यात्मिक पथ की अपनी यात्रा है उसी को याद रखा जाता है बाकी सब छोड़ कर के तो महाराज जी गंभीरानंद जी महाराज यह दो एक्सक्यूज या तो यह दो कारण हमको देते हैं कि इस वजह से इन दो कारण की वजह से ठाकुर ने मां को चेतावनी दी या मां को सावधान कर दिया किंतु ये दोनों कारण का मां के सामने तो कुछ यह नहीं है अर्थ नहीं है मां क्या कहती है और ठाकुर पहले तो कहते क्या है ताई तीनी बोलिया छिले छी छी वैश्या और संग की कथा सतो होक राम राम ठाकुर ने कहा छी छी वह तो वैश्या है उसके साथ में बात करने की क्या जरूरत है जितना ही चाहे कर लो वह हरि नाम करती है किंतु राम राम वह उसका चरित्र अच्छा नहीं था उसके साथ में बात करने की क्या जरूरत है श्री मां ठाकुरे शतक सतर्क वाणी तात्पर्य जो पूर्ण रूपे उपलब्ध करिया छले मां को पता था कि ठाकुर ने यह सतर्कता पूर्वक सावधानी पूर्वक यह उनको जो हा सतर्क वाणी उसका तात्पर्य क्या है मा माने ठीक-ठीक उसको महसूस किया था ठीक-ठीक उसको उपलब्ध किया था किंतु तिनी इहा ओ जानी तेन ज वृद्धारण्यम से धर्म पथे चलते छ एवं मातृ ज्ञाने ताहर जाता जात करें अभी तो वह धर्म पथ के ऊपर में ही चल रही है और मां को मां समझ कर के अर्थात की आध्यात्मिक गुरु समझ करके ही उनके पास में आना जाना करती है अत निराश रय व पापी तापीर आश्रय भूता होया तिनी सुधु लौकिक सावधान ता के श्रेष्ठ स्थान दिया शरणार्थी नि के दूरे शराबन की रूपे इसीलिए निराश रय और पापी तापी जो कि उन के आश्रय में आए हैं उनको सिर्फ लोग क्या कहेंगे इस भय के मारे उनको दूर कैसे कर देगी मां देखिए कि जब स्वामी जी अमेरिका में थे और ठाकुर का जन्मोत्सव दक्षिणेश्वर में उसका य सेलिब्रेशन होने वाला था उस समय कुछ भक्तों ने स्वामी जी को अमेरिका में स्वामी विवेकानंद को पत्र लिखा और कहा कि देखिए कि हम लोग भी तो दक्षिणेश्वर काली मंदिर में जाना चाहते हैं ठाकुर के तिथि महोत्सव में किंतु क्या है कि हमारे घर की जो महिलाएं हैं वह तो उच्च घर की उच्च कुल की महिलाएं हैं उनको लेकर के हम वहां पर जाएंगे और हमने देखा है कि वहां पर जिनका चरित्र अच्छा नहीं है ऐसी सब स्त्रियां भी वहां पर आती है इसलिए हम अपने अच्छे घर की स्त्रियों को लेकर के उत्सव में जाना नहीं चाहते तो जब स्वामी जी को इस तरह का संवाद मिला तो स्वामी जी ने सामने में क्या कहा ठाकुर आए हैं पापी ताप यों के लिए पद दलित के लिए जिनके ऊपर में अत्याचार हुआ है जिनके ऊपर में जिनको कि समाज में से जिनको कि ठुकरा दिया गया है जिनको कि समाज ने पापी बोल कर के घोषित किया है उन सबके कल्याण के लिए आए हैं ठाकुर दरिद्र नारायण चंडाल नारायण उनके लिए तो ठाकुर आए हैं यदि यह भद्र लोक और भद्र महिला अर्थात ये उच्च कुल के लोग या उच्च कुल की स्त्रियां उनको यदि वहां पर नहीं आना है तो ना आए यह जो पद दलित है उन्हीं के लिए सर्वप्रथम ठाकुर आए हैं तो देखिए कि ऐसा कुछ-कुछ लोगों के मन में होता भी है मैं मैं खुद का अपना अनुभव है मैं एक आश्रम में रहता था वहां पर एक वॉलंटिली था अभी भी है तो बहुत अच्छा काम करते थे वह तो क्या है कि किंतु अभी जैसे सोशल कास्ट सिस्टम होता है ना तो उनकी कास्ट थोड़ी सी नीची थी और वह दूसरी कास्ट वाले जो कि अपने को हायर कास्ट समझते हैं वो देखते हैं कि एक लोअर कास्ट का व्यक्ति यहां पर आता है बहुत काम करता है साधु लोगों का भी उसके ऊपर में बड़ा प्रेम है तो यह लोग भाई जो उच्च कास्ट के जो होते हैं सो कॉल्ड अपने को कहलाने वाले उसमें से एक व्यक्ति मेरे पास में आकर के मुझे कहता है कि हम भी तो बहुत यहां पर काम करना चाहते हैं हम भी तो बहुत सेवा देना चाहते हैं किंतु वो आता है इसलिए हम नहीं आते अभी मैंने उसके मुंह पर बोला नहीं कि मत आना तेरी जरूरत भी नहीं है किंतु सबके साथ में तो अच्छा व्यवहार करना पड़ता है कि यह सब अभी भी चलता है ऐसा नहीं है कि उस सम यह सब होता था अभी भी किसी किसी के मन में यह सब संदेह रहते हैं कि अपना उच्च हायर कास्ट है दूसरे वालों का लोअर क्लास्ट है उनको उनसे ज्यादा हमारा राइट है तो ठाकुर यह सब चीजों के बारे में मां भी सोचती थी ऐसा नहीं है कि यह सब चीजों को संपूर्ण रूप से नकार देते थे वह बागदी का बागदी के पुत्र का वह जो उदाहरण व जो हमने पहले भी एक दो बार डिस्कस किया है कि एक लड़का जयराम बाटी गया दीक्षा लेने के लिए मां ने पूछा कि कौन सा क्या नाम है कहां से क्या करते हो पता चला वो बागदी है अर्थात की लोअर कास्ट का है तो मां ने कहा कि अभी ये सोचा मन में ही मन में कि जयराम बाटी यहां पे तो यह सब नात जात का इतना सब कुछ चक्कर उसमें भी उनके परिवार जन काली मामा ये नलिनी यह सबका दिमाग भी इतना गर्म अभी इसको यहां पर दीक्षा देंगे तो फिर कहां एक उपद्रव प्रारंभ होगा तो मां ने कहा एक काम करो अभी मेरी सेहत ठीक नहीं है तुम एक काम करो कलकत्ता जाकर के दीक्षा लो दूसरा कि तुम्हारे कुल गुरु भी तो है कुल गुरु के पास में तुम दीक्षा ले लो गुरु अर्थात कि अपने फैमिली के गुरु जैसे फैमिली फिजिशियन होता है अपने फैमिली के गुरु भी होते हैं तो ऐसा जब मां ने कहा तो वो लड़के ने एकदम बिंदास हिम्मत से कह दिया कि मां जब तुमको जरूरत थी एक बागदी की पुत्री हो सकी किंतु एक बागदी की मां होने में अभी तुमको लज्जा हो रही है अर्थात कि तेलो भेलो माठ में वो जो डाकत बाबा वो जो एक डकेट के साथ में मां का एनकाउंटर हुआ मां का मुलाकात हुआ तब मां ने कह दिया कि मैं तो आपकी लड़की हूं बिटिया हूं शारदा तो उस समय वो तो लोअर कास्ट का था वो भी तो बागदी था तो उस समय उसकी लड़की होने में तुमको कोई लज्जा नहीं हुई किंतु अभी मुझे दीक्षा देना अर्थात मेरी मां होना अभी तुमको लज्जा हो रही है तब उसने जब ऐसा कह दिया तो मां भी हंस पड़ी और दूसरे दिन काली मामा और नलिनी दीदी वहां पर नहीं थे तो उसको बुला कर के उसको दीक्षा दे दी तो क्या है कि यह सब चीजें समाज में रहते हैं अब टू एन एक्सटेंट हमको देखना पड़ता है कोई भी समाज की यह जो व्यवस्था है उससे परे नहीं है हां परे जाकर के रह सकते हैं किंतु फिर वह निंदा वगैरह जो सब चलता है उसमें फिर अपनी एनर्जी आपको मेंटल एनर्जी आपकी चली जाती है तो जो भी है यहां पर देखिए ठाकुर ने सावधान तो किया किंतु मां ने कहा कि वह अच्छी बातें ही करती है और मेरे पास में आती है तो फिर यहां पर यह बात सुनकर के ठाकुर ने फिर मां को और कुछ कहना बंद कर दिया फलत ठाकुरर आपत्ति परे ओ पूर्व बत आला पादी चली तेला लो इसकी वजह से ठाकुर ने भले चाहे आपत्ति प्रकाश की हो भले ही चाहे विरोध उन्होंने किया हो किंतु फिर भी वह वृद्धा मां के पास में आती रही मां के साथ में वार्तालाप करती रही श्री श्री ठाकुरों मायर मनोभाव बुजिया आर्थ विरक्ति करी लेना ठाकुर ने भी मां का मनोभाव समझ लिया मां का मन समझ लिया और फिर उन्होंने कभी फिर विरोध नहीं किया इ हारो परे भक्तो समागम आरंभ होया इसके बाद में धीरे-धीरे करके भक्तों का आना प्रारंभ हुआ है श्री श्री ठाकुर जन्नो फॉल मिटो प्रभृति थेट आश ठाकुर के लिए फल मिठाई वगैरा नियमित रूप से आती रहती थी आरती नियो इहा नबत पाठया तेन ठाकुर भी यह सब फल मिठाई नबत में भेज दिया करते थे श्री मा उहर अग्रभाग ठाकुरे जन्नो राखिया बाकी सब भक्तो ओ पाड़ा बालक बालिका देर मध्य बिलाया देन मां के पास में जो भी मिठाई फल वगैरह आते उसका अग्र भाग ऐसा कहा जाता है पहले से जो अग्रभाग निकाल दिया जाता है वह देवताओं के लिए फिर इस तरह से ठाकुर के लिए अग्रभाग निकाल कर के बचा करके रख देती थी और बाकी का वहां जो गांव के पड़ोस के स बच्चे बच्चियां जो होती थी उनमें वह बांट देती थी मा ठाकुरे निकट आगो तो बालक भक्तगण विशेष होतो स्त्री भक्त बंदो तो खन श्री मायर निकट जायते धीरे-धीरे करके जब अंतरंग भक्तों का प्रारंभ हुआ आना तो बालक संतान जो थे ठाकुर के वोह और खास करके स्त्री भक्त मां के पास जाना शुरू किए थे मात्र भावे भविता तिनी तहा दिग के आतर जत्न करी तेन एवं फल मिष्ट प्रवृति किछु ना खवाईया छड़ी तेना मातृ भाव से प्रेरित होकर के मां उनका आदर यत्न करती थी और यह फल मिठाई वगैरह जो रहता था उनको खिला करके फिर उनको छोड़ती थी बिना खिलाए खिलाए किसी को जाने नहीं देती थी ए विषय तीन एकट मुक्तो हस्तो लेन इस बात में मां थोड़ी सी मुक्त हस्त थी अर्थात कि यह कंजूसा करके यह कैलकुलेशन करके कि इतना इनको दिया अभी इतना मेरे लिए रखना है या फिर ठाकुर के लिए रखना है नो कैलकुलेशन कोई कैलकुलेशन नहीं जो सामने आया उसको जो हाथ में आया वह खिला दिया तो उसमें मां थोड़ी मुक्त हस्ती थी एक दिन ओई रूपे तहा के समस्त द्रव्य बिलाया दते देखिया तथा उपस्थित गोपालेर मां बोलिया उठीले उस समय मां को इस तरह से जी जान से दिल खोल कर के यह सब बांटते हुए देख कर के वहां पर गोपाल की मां अर्थात की अघोर मणि देवी उपस्थित थी गोपाल की मां की कहानी तो पता है हमको वो बाल गोपाल का दर्शन किया करती थी और जब ठाकुर के पास में आई तो देखा कि जिस बाल गपाल का वह दर्शन करती थी वही जाकर के ठाकुर के भीतर में मिलित हो गए हैं तो फिर वह ठाकुर को भी अपने बालक के रूप में बाल गोपाल के रूप में देखती थी और उनका ठाकुर के प्रति मातृ भाव था और ठाकुर के प्रति मातृ भाव है अर्थात की मां शारदा के प्रति वो अपनी सास की तरह अर्थात वह भी अपनी बिटिया है इसी तरह व्यवहार करती थी अभी जैसे ही वह सास का होता है ना वो जो बहू है वो सब कुछ बांट देगी अपने बच्चे के लिए अपने संतान के लिए कुछ रखेगी नहीं तो वो थोड़ी तो नाराज होगी थोड़ा तो मन में होगा इसलिए वो मां को कहती है कि ये तो मां को कहती है बहु मा अर गोपाल जन् किछु राख लेना अर्थात कि वहु मां मेरे गोपाल के लिए क्या कुछ रखा नहीं गोपाल अर्थात कि ठाकुर ठाकुर के भीतर में उनके बाल गोपाल विलीन हो गए थे तो ठाकुर को भी वह अपने बालक के रूप में संतान के रूप में देखती थी मां सब कुछ दे दे रही है तो मां को पूछा मेरे गोपाल के लिए क्या कुछ नहीं रखा मां लज्जा अधो बतन होलेन मां लज्जा से उनका चेहरा नत हो गया ठीक तो कोनोई नव गोपाल बाबु स्त्री एक चांगी संदेश लैया घोड़ा गाड़ी होई ते नामी लेन उसी समय देखने में आया जैसे ही मां को लज्जा हुई कि अरे मुझे उनसे यह सुनना क्यों पड़ा तो जैसे ही मां के मन में यह भाव प्रकट हुआ वैसे ही नव गोपाल बाबू बोलकर के एक भक्त उनकी स्त्री एक घोड़ा गाड़ी में वहां पर आई आगमन कि और उनके हाथ में एक बास्केट भर के संदेश था एवं श्री मायर हस्ते उहा दिया तहा के उपस्थित विपद ईते रखा करी लेन उन्होंने पूरा बास्केट भर के संदेश मां के हाथ में दिया और मां को जिस बात से लज्जित होना पड़ा था उस बात का निवारण किया जो विपद आ गई थी विपद से मां की रक्षा की मां तबू सखिले ना महाराज जी लिखते हैं कि इस तरह से गोपाल की मां अर्थात कि अघोर मणि देवी को मां को यह बोलना पड़ा और यह बोलक के मां को सुनक के मां को लज्जित होना पड़ा किंतु मां ने इससे कुछ सीखा नहीं अथवा य विषय तहर स्वभाव परिवर्तन करा असंभव छलो मा या तो फिर माने माने कुछ सीखा नहीं या तो फिर मातृत्व का राज्य में मां का स्वभाव परिवर्तन करना असंभव था श्री रामकृष्ण श्री मायर एक प्रकृति जानी तेन ठाकुर को भी पता था कि मां का ऐसा स्वभाव है जो आएगा सब काट देगी एवम जानी तेन बोलिया एक दिन श्री मा कोनो काज तहर घोरे आले तीनी अनु जोग सूरे बोली ले वो पता था इसीलिए ही मां किसी कारण सर किसी काम की वजह से ठाकुर के कमरे में आई तो ठाकुर ने कंप्लेन करते कहा य तो खर्च करले की भाबे चलवे इतना खर्च करने से कैसे चलेगा सुनिया ई मां बिना बाको बए नते दिखे फिरिया गले यह सुन करर के ही माने बिना किसी उत्तर दिए फिर से अपने नबत में चली गई तखन ठाकुर व्यस्त समस्त होया भ्रात पुत्र रामलाल के बोली लेन जैसे ही मां चली गई बिना कोई उत्तर दिए ठाकुर बेचारे घबरा गए और उन्होंने रामलाल को कहा व्यस्त होकर के रे रामलाल जात और खोड़ी के गए शांत कर अरे रामलाल जा जाकर के तुम अपनी चाची को शांत करो ओ राग कोरले एर शब नष्ट होए जावे अपनी ओर इशारा करके कहा क्रोध करेगी तो यहां का सब कुछ नष्ट हो जाएगा सब कुछ यहां का समाप्त हो जाएगा इहा श्री मायर फुटन मुख मातृत्व शक्ति निकट श्री श्री ठाकुरर स्वेच्छा कृत पराजय यह था मां की ये जो स् फुटन उन मुख अर्थात कि यह जो अभी प्रखर हो रही है अभी जो प्रकट हो रही है ऐसी मातृत्व शक्ति के सामने ठाकुर ने अपने से स्वीकृत किया हुआ पराजय देखिए यह भी एक बात है कि ठाकुर के बारे में कहा जाता है कि एक स्त्री रूपी ईश्वर की उन्होंने आराधना की अर्थात की मां काली की एक स्त्री को उन्होंने अपना गुरु बनाया अर्थात की भैरवी ब्राह्मणी को और एक स्त्री को उन्होंने अपना समस्त आध्यात्मिक जो वारसा था उन्होंने अर्पित किया था अर्थात कि श्री मां शारदा देवी को जब यह यह जो विमेन एंपावरमेंट की बात चलती है आज के युग में तो हमको यह याद रखना है कि इसके पीछे की जो सबसे बड़ी शक्ति है विमेन एंपावरमेंट की यह तो श्री रामकृष्ण स्वयं है इससे पहले देवता अभी जैसे कि आराध्य देव है तो कौन है तो महावीर है न कि शिव है न कि विष्णु है इस तरह से देवी आराधना करना इतना प्रचलित नहीं था है पूरे भारत में प्रचलन है वैसे किंतु ठाकुर ने इस देवी पूजा को जैसे कि एक तरह से मेन स्ट्रीम में लेकर के आए स्त्री को गुरु बनाना यह भी इतना प्रचलित नहीं था किंतु भैरवी ब्राह्मणी को गुरु स्थान देकर के उन्होंने इस बात को भी मेन स्ट्रीम में लेकर आए और तीसरा आखिर में यह पुरुष प्रधान देश है तो पुरुषों का ही अल्टीमेट सब बात चलेगी टेंपरली भले ही चाहे ऐसा हो ठाकुर खुद कहते हैं कि लोग अपनी बीवी के गुलाम होते हैं कोई ऐसा नहीं कहेगा कि मेरी बीवी बुरी है सब कहेगा हमार परिवार भालो सब कहेंगे कि मेरी बीवी भी अच्छी है तो यह सब किंतु कभी-कभी टेंपरेरिली चलता है किंतु सही में देखें तो पुरुष प्रधान देश में स्त्रियों को पुरुषों के सामने पुरुषों की आज्ञा के सामने झुकना ही पड़ता है किंतु यहां पर है कि सर्वप्रथम बार यह जो मां का मातृत्व था इसके सामने ठाकुर ने स्वेच्छा से सामने से चलकर पराजय उने स्वीकार किया जैसे भगवान शिव जमीन पर लेटे हुए हैं और उनके सीने पर पैर रख के मां काली खड़ी है तो किंतु वो तो एक ये मैंने खैर इसमें ज्यादा दोनों में सिमिलरिटी इतनी नहीं है किंतु एक तरह से देखा जाए तो ठाकुर ने इसी तरह भगवान शिव की तरह ही मां काली के सामने अपनी पराजय स्वीकृत की थी और दूसरा देखिए कि ठाकुर इस तरह से कंप्लेन करते हैं वो भी एक देखने वाली बात है कि ठाकुर को खुद को कंप्लेन करनी पड़ी ठाकुर खुद कैसे मुक्त हस्त थे जब वो तीर्थ यात्रा में जाते थे या तो फिर ये जो वहां पर काली मंदिर मेंही जो यात्रा उत्सव वगैरह होता था तो यह मथुर बाबू क्या करते थे जब मथुर बाबू जीवित थे ठाकुर के सामने सिक्कों का एक पूरा ढग खड़ा कर देते थे और ठाकुर जिसके ऊपर में जो कोई गीत गा रहा है कोई अच्छे से नाटक कर रहा है पात्र का अभिनय कर रहा है ठाकुर ये सिक्कों में से कुछ-कुछ उनको ये प्रोत्साहन देने के लिए कुछ-कुछ उनके सामने सिक्के फेंकें तो ये ऐसा होता है यात्रा या नाटक वगैरह में कि सिक्का है पैसा है नोट है वगैरह फेंका जाता है व जो कलाकार है आर्टिस्ट है उसको प्रोत्साहन देने के लिए तो एक पूरा ढग सिक्कों का यह मथुर बाबू खड़ा कर देता था यह सोच के कि यात्रा यह नाटक जितना देर तक चलेगा भजन कीर्तन जब तक चलेगा तो ठाकुर एक दो सिक्के उसमें से देते रहेंगे किंतु ठाकुर तो ठाकुर है भाव में आ गए किसी का कीर्तन सुनते सुनते तोव सिक्कों का जो ढग था पूरा उसके सामने धकेल दिया ले लो सबका सब ले लो तो मथुर बाबू भी फिर किसी भी तरह की कंप्लेन किए बिना का दूसरा ढग ठाकुर के बगल में खड़ा कर देते थे वो भी ठाकुर जब भी भाव में आएंगे पूरा पूरा वो यह दे देते थे यहां पे वृंदावन वगैरह में यात्रा के लिए गए हैं जिसको भी देना है तो पास में ऐसे ही यह मथुर बाबू ने सिक्के रखे हुए हैं जो भी सामने आएगा सबका सब दे देते थे उस समय ये नहीं सोचते थे कि कितना किसको क्या देना है वो देवघर जाकर देवघर के पास में ग्राम है वहां पे लोगों की गरीबी देखी ठाकुर ने दरिद्रता तो मथुर बाबू को क्या कहा कि सबको सर पे डालने के लिए तेल दो नव वस्त्र दो और उनको पेट भर के खाना खिलाओ तो मधुर बाबू कहते हैं कि हमको तो लंबी यात्रा करनी है अभी से इतना खर्च करेंगे तो आगे जाकर पैसे कम पड़ जाएंगे किंतु ठाकुर थोड़ी ना सुनने वाले हैं तब कहीं जाकर के मथुर ने तेल दिया नव वस्त्र दिए आहार का बंदोबस्त किया तब कहीं जाकर के ठाकुर वहां से निकले हैं तो ठाकुर स्वयं इतने मुक्त हस्त है और इतने मुक्त हस्त ठाकुर को जब कंप्लेन करनी पड़ी तब सोच लीजिए कि मां कितनी मुक्त हस्त होगी मां कितनी उदार हृदय होगी ठाकुर को भी ठाकुर से भी ज्यादा उदार मां शारदा स्वयं थी तो और दूसरा कि देखिए कि मां जद क्रोध करेगी तो ठाकुर कहते हैं खानकार शब नष्ट होए जावे यहां पे जितनी भी आध्यात्मिक उपलब्धि है सब नष्ट हो जाएगी सब जैसे की खत्म हो जाएगी तो यह मां की जो आराधना की थी सड़सी पूजा उसके भीतर में देखिए कितने लेयर्स है बात सिर्फ यह नहीं है कि धर्म चक्र का प्रार करने के लिए प्रवर्तन करने के लिए ठाकुर ने मां की आराधना की है विष्णु और जगदंबा अवतार और शक्ति दोनों साथ-साथ में हमेशा रहते हैं और आध्यात्मिक शक्ति जो होती है अवतार की वह शक्ति या जगदंबा से ही प्राप्त होती है अच्छा तो आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णा क्योंकि क्या है कि मैंने खुद में कहा था ना कि मां को पहली पहली बार पढ़ा था मैं भी डिपॉट हो गया था कहां ठाकुर के दर्शन कहां स्वामी जी का फिलोसोफी और मां कहां यह मां का आओ बैठो खाओ इसमें क्या है ना कि देखिए अपनी खुद की ये जो यात्रा कहां तक है ये आपको वर्ल्ड फेमस है मठ में जो कहा जाता है कि प्रार लोग यहां पर आकर्षित होते हैं स्वामी जी को पढ़कर फिर जैसे जब ध्यान साधन स्टार्ट होता है तो ठाकुर के पास आ जाते हैं और जीवन के आखिर में मां के पास आते हैं तो ये आपकी स्पिरिचुअल मैच्योरिटी का यह माइल स्टोन है कि आप कहां तक गए हैं स्वामी जी तक है ना ठाकुर तक है कि मां तक आ चुके हैं मां ने खुद ने कहा है ना किसी ने मां को पूछा कि आपके नाम का जप करना है तो कैसे करना है तो मां ने कहा राधा भी बोल सकते हो मां भी बोल सकते हो तो इससे हमको हिंट ले लेनी है मां ने खुद बोला है देखिए यहां पे जो कि वो ठाकुर कहते हैं ना कि ऋषि रा भय तराश तराश तो अर्थात कि ऋषि लोगों को ना बड़ा डर लगता था बड़े डर के डर के रहते थे कोई कोई होता है कि कैसे भी करके अपने को बचा बचा करके भवसागर पार कर लेना है कि तो कोई कोई होता है जैसे नारद या सुखदेव जैसे कि बहादुरी काट इतना शक्त लकड़ी कि वो उस लकड़ी का जहाज बनाएंगे पूरा लोग हजारों लोग उसके जहाज में बैठक भवसागर पार करेंगे तो यहां पे ठाकुर हमेशा मैं मेरा अपना ये बोलने से झकते थे ठाकुर अपने मुंह से तो बोल ही नहीं सकते कि तुम मेरे नाम का जप करो या ऐसा करो बहुत उच्च आध्यात्मिक भाव में चले जाएंगे या तो फिर नरन के मन में संदेह होगा तब कहीं जाकर के बोलेंगे जय राम जय कृष्णा श्री राम कृष्णा किंतु यहां पर मां सहज अवस्था में बोल देती है हंसते हंसते बोल देती है कि हां मेरे नाम का जप करना है तो राधा या मां नाम से करो अपने खुद के हाथों से अपकी मूर्ति की प्रतिष्ठा करती है कोवाल पाड़ा में ज मां के लिए उच्च आध्यात्मिक भाव निर्विकल्प समाधि और यह सहजा अवस्था दोनों एक हो गया है ठाकुर ऐसे डरते डरते रहते थे सहज अवस्था में मां को ऐसा कुछ नहीं है बड़ा रेर कुछ कुछ यह है विवरण कि मां को भाव हुआ है एक बार मां इनको कहती है योगेन मां को तुम जाकर के कहो ना ठाकुर को मुझे भी भाव हो ऐसा कुछ करें मां देखती थी सबको भाव हो रहा है मुझे ही क्यों नहीं हो रहा है समझ में नहीं आ रहा है कि वो खुद भाव राज्य की वो रानी स्वयं है मने आराध्य देवी भाव राज्य की स्वयं है मां को पता नहीं है तो वो योगिन मा जाकर के ठाकुर को कहते है कि मां ने कहा है कि सबको भाव हो रहा है मुझे कुछ नहीं हो रहा तो सुनकर के ठाकुर गंभीर हो गए तो योगिन मा को अभी ठाकुर गंभीर होते थे किसी का साहस नहीं होता था कुछ बोलने का तो योगिन मा वापस चली आई देखा कि वह कमरे का दरवाजा बंद था नबत का खोल के देखा मां भाव में आकर के ध्यान कर रही थी कभी हंस रही तो कभी रो रही है तो फिर योगिन मा ने सोचा कि अभी मैं मां को यहीं पे ऐसा ही रख देती हूं मैं बाहर में जाकर के बैठती हूं उनके सामने इस अवस्था में नहीं बैठना फिर वो गई फिर थोड़ी देर के बाद में वापस आई मां उस समय सहज अवस्था में थी तो फिर योगिन मां कहती है कि मां तुम कहती हो कि तुमको भाव नहीं होता है तो देखो क्या हुआ आज तो मैंने देखा तो मां फिर हंस कर के चुप हो गई यह सब उनके लिए बड़ा सहज था मां के लिए बस वही है कि वो इतने उ सहज अवस्था ही इतनी उच्च अवस्था थी कि पता नहीं चलता था बाहर से यह जो बिंदु वासिनी जो टाइटल है ना यह बिंदु वासिनी टाइटल ये इसे बड़ा अच्छा दिया है महाराज जी ने यदि ठाकुर और मां को कंपेयर करेंगे ना तो ठाकुर ने जितने उदाहरण दिए ना सब ठाकुर को लग जाते हैं किंतु इनको कैसे लगते हैं ठाकुर कहते हैं ना बगीचे में जाते हैं तो कितने पौधे कितने पेड़ कितने दाल कितने पत्ते कितनी आम यह सब कैलकुलेशन मत करो आम खाओ और हष्ट पुष्ट हो तो ठाकुर ने यह सब साधना की तो यह तो पेड़ गिनने जैसा ही हुआ ना पत्ते गिनने जैसा जबकि मां ने आम खा कर के हष्ट पुष्ट हुई है बिना साधना के सिद्धि ये यह देखिए कि इसीलिए तो इन तीनों का आगमन एक साथ में हुआ है ना ज स्वामी जी के आने से ही यदि हो जाता तो ठाकुर मां की क्या जरूरत थी ठाकुर के आने से ही हो जाता मां स्वामी जी की क्या जरूरत थी तीन तीनों लोग ये सिविलाइजेशन के एकएक एस्पेक्ट को एमप्लीफाई करते हैं यह जो पर्सनल साधना है व्यक्तिगत साधना इस एस्पेक्ट को एमप्लीफाई किया है ठाकुर ने यह जो सोसाइटल सिविलाइजेशनल लेवल राइज एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन है इस एस्पेक्ट को स्वामी जी उसके बारे में प्रकाश डालते हैं और फैमिली लाइफ है इसके ऊपर में अधिष्ठात्री देवी है मां शारदा यानी कि पर्सनल लाइफ फैमिली लाइफ एंड सिविलाइजेशनल लाइफ इन तीनों एस्पेक्ट को कवर करने के लिए तीन लोग आए हैं फैमिली लाइफ अर्थात के ही मां शारदा अभिन्न है सेपरेट हो ही नहीं सकते हां ये तो एक ब्रदरहुड है