Class
ओ स्थापक धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम श्री मां शारदा देवी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित कल हमने जिस तरह से देखा कि ठाकुर को वहां पर दक्षिणेश्वर में रहते-रहते पेट का असु अर्थात की पेट की बीमारी इतनी सारी हो गई थी कि वह पेट में से मल ही निकल रहा है बार-बार ऐसा कहते थे और फिर आखिर में क्या कहा कि इस तरह से शरीर के ऊपर में घृणा हो गई और घृणा होने के बाद में ही उन्होंने शरीर का केयर करना बंद कर दिया अब हमको यह पता है कि शरीर की थोड़ी बहुत तो केयर करनी ही चाहिए किंतु खैर यह तो अवतार रिष्ट है जब तक उनका जीवन का प्रयोजन रहेगा तब तक जगन माता उनका जीवन रखेगी जिस तरह से ठाकुर ने बताया था एक बार दक्षिणेश्वर में कोई आया उसने कहा कि किसी ने सुसाइड कर लिया है तो और कोई जो सामने ठाकुर के बैठे थे उन्होंने कहा कि ये सुसाइड की बात आत्महत्या की बात सुनकर के बड़ा डर लगता है तब ठाकुर ने क्या कहा जब यह मकर ध्वज बोलकर के एक आयुर्वेदिक औषध है उसको काच के एक बोतल में बनाया जाता है तो जब तक वह मकर ध्वज बनता है तब तक वह काच की बोतल की जरूरत रहती है एक बार यह मक मकर ध्वज औषध तैयार हो गया तो फिर काच की बोतल को आप कभी भी तोड़ दे सकते हैं तो वैसा ही यह मनुष्य का शरीर है शरीर का उद्देश्य है ईश्वर प्राप्ति आत्मदर्शन जब तक यह उद्देश्य समाप्त नहीं होता शरीर रहेगा उद्देश्य समाप्त होने से शरीर चला जाएगा अभी आप कहते हैं कि अरे हम लोगों का शरीर तो भीभी अभी हमारी जब मृत्यु होती है तो हमको कहां ईश्वर प्राप्ति होती है किंतु इस तरह से देखना है कि एक समय के लिए एक जन्म के लिए हमारा प्रयोजन समाप्त हो गया अभी जो नेक्स्ट स्टेप है अपनी साधना में वो अगले जन्म से स्टार्ट होगा तो यहां पर भी ठाकुर ने भले ही चाहे अपने शरीर की केयर ना करी हो किंतु जगन माता को पता है कि ठाकुर का शरीर कब तक रहेगा किस प्रयोजन से रहेगा और जब तक प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती तब तक ठाकुर का शरीर भले ही चाहे वह अपनी केर ना करे शरीर तो ठीक ही रहेगा तो यहां तक कल हमने पढ़ा था आर थोड़ा सा आगे पढ़ते हैं गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं रसिक चूड़ामण श्री रामकृष्ण रसिक तार एकटी दृष्टांत बड़ो ही उपभोग रसिक चूड़ामण श्री रामकृष्ण की रसिक का एक उदाहरण बड़ा ही सुंदर है श्री मां बोलिया छन श्री मां ने कहा था कामर पुकुरे लखीर मा और आमी रां तुम कामर पुकुर में लक्ष्मी की मां और मैं खाना पकाती थी एक दिन खेते बसे छ ठाकुर और हृदय एक दिन खाने के लिए बैठे हैं ठाकुर और हृदय लखीर मां भालो राते पते लक्ष्मी की मां बड़ा अच्छा पकाना जानती थी श जेटा रधे से शटा खे बोलले जो लक्ष्मी की मां ने बनाया है वो खाकर के ठाकुर ने कहा ओ रिदु य जे रधे छ य रामदास बुद्धि अर्थात की ओ हृदय यह खाना जो कि बहुत अच्छा है जिसने बनाया है वह रामदास वैद्य है अभी रामदास वैद्य अर्थात की एक जाना माना एक वहां पर एक वैद्य होंगे तो मैंने अभी ऐसा होता है ना कि यह आइंस्टाइन जैसा है कभी-कभी अभी अभी देखिए कि आइंस्टाइन का फील्ड है वैसे फिजिक्स या तो साइंस किंतु कोई भी किसी भी फील्ड में बहुत अच्छा होने से इवन भी जैसे गाने में बजाने में तो हम कह सकते गाने में ये आइंस्टाइन है हालांकि ये आइंस्टाइन को हालांकि आइंस्टाइन वायोन्यूज बजाता हूं तो वायोन्यूज से फिर वो जो बंद दरवाजे होते हैं क्रिएटिविटी के खुल जाते हैं तो किंतु फिर भी उसका मेन फील्ड था वो फिजिक्स तो हम कभी कभी उपमा देते हैं उस फील्ड का जो कि बड़ा ही नाम किया हुआ व्यक्ति उसकी उपमा देकर के दूसरे फील्ड वालों की सराहना करते हैं तो यह रामदास वैद्य था तो वो था बड़ा ही ख्यात नाम वैद्य डॉक्टर उस समय का तो ठाकुर ने उपमा दे कर के बताया कि यह इतना अच्छा का जिसने रंधा है खाना बनाया है वो जिस तरह से रामदास वैद्य दवाई देने में बड़ा ही निष्णात है निपुण है यह जिसने बनाया है अच्छा खाना व खाना बनाने में ही इतना ही निष्णात और निपुण है अच्छा इसके बाद में आमी जेटा रहदे छी खे बोलेन आर ए छी नाथ सेन अर्थात की मां कहती है मैंने जो बनाया था उसको खा कर के बोले यह जिसने बनाया है वो है श्रीनाथ सेन अभी श्रीनाथ सेन कौन था श्रीनाथ सेन तूड़ी वो जो हाथ पैर का डॉक्टर ऑर्थोपेडिक डॉक्टर बोलते हैं ना जिसको हाड वैद्य गुजराती में जिसको कहते हैं तो ये श्रीनाथ सेन अर्थात की अभी ये हाड वैद्य क्या क्या होता है उसका तो कोई स्टैंडर्ड नहीं होता वो हाथ पैर टूट जाने से उसके पास जाया जाता है मुझे याद है कि मेरे शहर में मैं जब छोटा था तो वो जो सब एक लाइन में दुकाने होती है ना रास्ते के किनारे तो उसके ऊपर में ये शर्ट अभी हम लोगों का देखिए डॉक्टर की ऑफिस का कैसा है एक कांसेप्शन रहता है कि बड़ा ही डिग्निफाइड ऑफिस होगा बड़ा ही वो बाहर में एक काच का दरवाजा होगा काच के दरवाजे के बाहर में बेंच वगैरह लगे होंगे आपको वहां पर वेट करना है एक कंपाउंडर आपका नंबर लिखेगा फिर जैसे-जैसे नंबर आएगा आपका कंपाउंडर बुलाता जाएगा वो बड़ी ही वो स्विवेल चेयर यानी कि वो गोल-गोल घूमती हुई कुर्सी पे वो डॉक्टर बैठा होगा एसी वगैरह होगा ऐसा अपना एक कांसेप्शन होता है डॉक्टर की ऑफिस का जब हम डॉक्टर को मिलने के लिए जाते हैं और यह एक मुझे अभी भी याद है कि मैं स्कूल में जाता था देखता था कि रास्ते के किनारे जिस तरह से वो शटर होता है ना माने वो कोई भी एकदम मने बिल्कुल सस्ती चीजें वहां प मिलती है चार र ₹ की ये पान वगैरह जहां पे बिकते हैं तो उस तरह की एक दुकान थी वहां पे एक लिखा था बड़े अक्षर में हाड वैद्य और एक आदमी वहां पर बूढ़ा आदमी वहां पर बैठा रहता था यदि किसी के हाथ फर मने मिस अलाइन हो गए हैं या तो टूट गए हैं तो वो ऐसा हथोड़ी वगैरह रहता था उसको मार मार करके ठीक करेगा तो वो मुझे याद है बचपन से ही कि हाड वैद अर्थात की कौन जिसको कुछ नहीं आता या तो फिर वो ब जिसके पास में वही जाएगा जिसके पास में कोई रुपया वगैरह नहीं है और किसी अच्छी जगह पर जाने के लिए तो यहां पर देखिए कि ठाकुर उपमा कैसी देते हैं कि लक्ष्मी की मां ने खाना बनाया तो बड़ा ही सुंदर खाना बनाया तो वो हो गई श्रीनाथ वो हो गई रामदास वैद्य अर्थात की जो कि बड़ी बड़ी बड़ी ही निष्णात है उस कार्य में और मां ने जो खाना बनाया था वो है श्रीनाथ सेन अर्थात की हाड वैद्य अर्थात की वो ऑर्थोपेडिक्स तो मां कहती है सुने हृदय बोल सेन ता बोटे यह बात सुनक के हृदय ने कहा अच्छा तो ठीक है तबे तुम्हार य हाड़े बैदी तुम्ही शप समय पावे यह जो हाड़े बैदी यह जो हाड़ है वह तुमको सब समय मिलेंगे गा टिप पा टिप पजन तो डाकले ही होए मने शरीर मने मसाज करना है पैर दबाना है बुला लेने से ही वो मिल जाएगा हाड वैद्य क्या है कि उसको दुकान सब समय खुली रहती है ऐसा भीड़भाड़ तो होता नहीं है जब भी जाएंगे वोह अवेलेबल होगा तो यहां पर मां भी मां तो अपनी खुद की वो तो धर्म पत्नी है सहधर्मिणी है साथ में ही रहती है दक्षिणेश्वर मैं ठाकुर को जब भी काम है बुला लीजिए बोलेंगे कि दर्द कर रहा है पैरों में तो पैर दबा दो तो मां पैर भी दबा देगी किंतु रामदास बदी तार नेक टाका विजिट रामदास वैद्य को बुलाएंगे तो उसको विजिट के लिए बहुत सारा रुपया देना पड़ेगा ताकि तो आर सब समय पावे ना उसको तो सब समय मिलेगा नहीं आर लोके आगे हथ उड़े के डाके माने पहले तो लोग ये जो हाड़ वैद्य है उसको बुलाते हैं शे तो र सब समय बांधव वो तुम्हारा सब समय के लिए साथी है ठाकुर बोलले ता बटे ता बटे ए सबब समय आे तो वो ठीक कह रहे हो ठीक कह रहे हो यह सब समय के लिए है माने जो महंगा डॉक्टर है जब बीमारी सर्दी जुकाम होता है तो हम थोड़ी ना कोई एमडी या स्पेशलिस्ट के पास जाएंगे अभी आजकल तो मैंने देखिए हृदय उस समय बोल रहा है कि रामदास वैद को बुलाना है तो बहुत रुपया देना पड़ता है विजिट के लिए माने ये डॉक्टर लोगों का उसी समय से था कि बहुत सारा रुपया देना पड़ता था आज भी है जद स्पेशलिस्ट के पास जाएंगे तो बहुत सारा रुपया आपको देना पड़ेगा किंतु यह हार्ड वैद्य है उसको सबसे पहले जब सर्दी जुकाम हुआ है छोटी मोटी कोई भी चीज हुई है तो पहले ऐसे किसी डॉक्टर को दिखाओ जिसके पास में कोई फैंसी डिग्री नहीं है वोह वैसे ही अपनी गली के किनारे बैठा हुआ है दुकान खोल कर के और सर्दी जुकाम की वो जो भी पेनिसिलिन वगैरह जो भी है पैरासिटामोल उसके पास में से ले लो हां बड़ा सीरियस कुछ होता है दर्द वगैरह या बीमारी तो किसी सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाने के लिए जाओगे तो देखिए कि ठाकुर किस तरह से हंसी मजाक में इस तरह से उपमा देकर के समझाते हैं कि मां का खाना इतना अच्छा नहीं बनता था लक्ष्मी दीदी की मां का खाना इतना अच्छा बनता था तो वह हो गई रामदास वैद्य और मां हो गई हथोड़े हाड़ वैद्य श्रीनाथ सेन इसके बाद में एक दूसरा प्रसंग है महाराज जी लिखते हैं फड़ने ऊपर श्री श्री ठाकुरे एकटा बाल सुलभ प्रीति छीलो फड़न अर्थात की गुजराती में जिसको बहते हैं कहते हैं वगार और हिंदी में कहते हैं छोक देना माने वो तेल जब उबलता है कोई भी सब्जी बनाने के लिए तो उसमें राई है जीरा है मिर्च है वगैरह उसमें डालते हैं उसको वघर या छोक या तो फड़न कहते हैं तो वो डालने से उसके बाद में तेल में जब सब्जी वगैरह डालेंगे तो उसका बड़ा ही टेस्ट आएगा यह हिंग है वगैरह मने जिसकी जो कि इंटरेस्ट तो ठाकुर को इस तरह से वगार दिया हुआ खाना छोक दिया हुआ खाना बड़ा अच्छा लगता था बाल सुलभ प्रीति छेलो देखिए महाराज जी क्या लिखते हैं बच्चे की तरह वो उसको पसंद करते थे ऐसा होता है ना कभी-कभी कि कोई लड़का बाहर गया है वो जॉब करने के लिए विदेश गया है अमेरिका आजकल तो बहुत सारे लोग जाते हैं दुबई वगैरह भी जाते हैं तो घर में मां-बाप तो हम भारत में ही रहते हैं इंडिया में अभी तीन-चार साल के बाद में वह विदेश से वापस आया तो कहता है कि मां जो मैं छोटा था उस समय तो तुम जिस तरह का खाना बनाया करती थी उस तरह का खाना बनाओ क्योंकि क्या है कि यह बचपन की ये यादें जबकि हमारा जीवन बड़ा ही सरल रहता था बड़े होने के बाद में क्या है दुनिया भर के कॉम्प्लिकेशंस अपने जीवन में आ जाते हैं तो यह बचपन का सरल जीवन जबकि कॉम्प्लिकेशन ज्यादा से ज्यादा इतना ही रहता था कि मैं किस तरह के कपड़े पहनूंगी मैं अपनी मां के साथ में झगड़ा करूंगा कि नहीं करूंगा मां मेरे लिए क्या पका देंगी या तो मेरे मित्र के साथ में मुझे कहां पर जाना है क्या खेलना है यही सब लेकर के बच्चों की दुनिया होती है बड़े हो जाने के बाद में यह इंश्योरेंस है यह क्या-क्या है सब आपको प्रमोशन है जॉब चेंज करनी है स्किल अपग्रेड करनी है वगैरह वगैरह चलता रहता है तो यह बचपन के दिनों की यादें हम सबके हृदय में बहुत अच्छे तरीके से रहती है इसीलिए जो बाल वार्ताएं है ना जो कि जो कि बड़े वर्ल्ड वाइड ऑथर्स होते हैं जैसे कि हैरी पॉटर तो यह बचपन की कहानियां इवन बड़े लोग भी बड़े इंटरेस्ट से पढ़ते हैं क्यों क्योंकि अपने मन में ना वे लोग एक एक तरह से चाहते हैं कि चलो उस सरल जीवन में वापस चले जाए एक साइकोलॉजी है सिंपल साइकोलॉजी है यह कभी भी कोई भी बीमार होता है तो कभी-कभी डॉक्टर्स बोलते हैं कि कहीं पर जाकर के दूसरी जगह पर जाकर के हिल स्टेशन वगैरह प जाकर के चेंज ऑफ एयर एयर माने हवा बदल करके आओ क्यों क्या बहुत सारी बीमारी साइकोसोमेटिक रहती है ये मैंने साइकोलॉजी मेडिसिन का शब्द है साइकोसोमेटिक अर्थात कि माइंड में पहले तो स्ट्रेस उत्पन्न होता है टेंशन खड़ा होता है चिंता खड़ी होती है फिर यह स्ट्रेस या चिंता अपने शरीर पे अपने स्वास्थ्य के ऊपर में असर करता है ब्लड प्रेशर बढ़ा देता है वगैरह करता है और फिर यह ब्लड प्रेशर कम ज्यादा होने से ही अपनी इम्यून सिस्टम थोड़ी वीक हो जाती है और इसी में से बाकी सब बीमारियां शरीर में प्रवेश करते हैं तो यह मन जो है वह अपनी मन का स्वास्थ्य शरीर के स्वास्थ्य के लिए बड़ा ही आवश्यक है तो इसीलिए बहुत बार लोग इस तरह से बचपन की कहानियां पढ़ते हैं इस तरह की नोवल या तो इस तरह की स्टोरी बुक्स जो कि बच्चों के लिए लिखी गई है तो उसको पढ़ कर के हम हम जद यदि बचपन में वही पढ़ते होंगे तो उसको पढ़ कर के फिर से बड़े होने के बाद में पढ़ कर के हमको बचपन के दिनों की बातें याद हो जाती है कि हां हम भी इस तरह से स्कूल में जाते थे हम भी इस तरह से क्लासरूम में बैठते थे उस समय एक्चुअली जब हम क्लासरूम में बैठते थे तब हमको परीक्षा का डर टीचर का डर या मने सब तरह के टेंशन अपने मन में रहते थे मने जब बच्चे थे तब किंतु जब हम बड़े होते हैं तो ये नेगेटिव एसोसिएशन सब भूल जाते हैं और सब अच्छी-अच्छी चीजें ही याद रखते हैं मेरा खुद का जैसे कि मैं पहली बार बेलूर मठ में गया था तो एक तो टेंशन था कि भैया ये मोनिस्टिक लाइफ तो इतना डिफिकल्ट है स्वामी जी को पढ़ा है उपनिषद थोड़े बड़े कुछ थोड़े बहुत ऊपर ऊपर से देखे हैं तो जिस तरह से जो डिसिप्लिन है जिस तरह से हमको डेडिकेशन रख कर के प्रचंड तपस्या करनी है वो मेरे से होगी कि नहीं मुझे पता है कि मेरा विल पावर कितना वीक है तो इतना वीक विल पावर लेकर के रामकृष्ण मिशन में रह पाऊंगा कि भी नहीं और फिर यह पियर प्रेशर होता है ना कि कंपटीशन जैसा कि अरे मैं मेरे साथ में ये जो बाकी सब ब्रह्मचारी है वो इतना अच्छे से सुबह को उठ जा जाता है फटाफट करके मुझे उठने में बड़ा ही दिक्कत होता है बड़ी परेशानी होती है तो मैंने दूसरों को देखते हैं एक टेंशन रहता है तो वो सब था जब मैं पहली बार बेलूरमठ गया था किंतु आज उसको ऑलमोस्ट 20 साल हो गए आज मुझे बेलूरमठ का क्या याद है मुझे वही सब अच्छी-अच्छी चीजें याद है कि गंगा के किनारे हम लोग एक के बाद एक मंदिर में प्रणाम करने के लिए जाते थे वहां पर मंगल आरती के बाद में मेन टेंपल से बाहर आते थे तो गंगा के सामने की ओर सूर्योदय होता था था और वो सूर्योदय मेन टेंपल के ऊपर में गिरता था और उसका हम प्रणाम करते थे खड़े-खड़े मेरा ये हमेशा से हैबिट रहा है जब भी मैं बेलूरमठ में जाऊंगा मंगल आरती समाप्त होने के बाद में जब मंदिर में बैठे हैं किंतु जब सूर्य की पहली किरण वो मंदिर में प्रवेश करती है यदि आपने देखा होगा बेलूरमठ का मंदिर किस तरह से गंगा को लग कर के है तो जब भी गंगा के सामने की ओर सूर्योदय होगा मेन टेंपल के ऊपर में उसकी किरणें गिरेगी तो मैं वहां पर खड़ा रह कर के बाहर का वो जो यह है चौगान ज सा वहां पर खड़े रह कर के मैं सूर्यनारायण के दर्शन करूंगा प्रणाम करूंगा ये मैं हमेशा से करता हूं जब मैं बेलूर मट रहता हूं तो आज मुझे बेलूरमठ की वही बात याद है इवन जब मैं कंप्लीट वर्ष के लिए बेलूरमठ में था उस प्रोजेक्ट में काम करता था तब भी उसमें टेंशन तो थे दूसरी मने बहुत सारी बातें होती है आप कम्युनिटी में रहते हैं तो कुछ ना कुछ तो चलता ही रहता है किंतु आज उस बात को चार पाच साल हो गए सब अच्छी-अच्छी चीजें याद है कि मैं किसके साथ में क्या गप लगाता था आत्म रूपा अंद जी महाराज हम हमारे इंचार्ज थे वो थे वैसे अमेरिकन किंतु संस्कार बिल्कुल इंडियन जैसे और यह कॉमिनेशन इतना मने परफेक्ट था कि बेस्ट एलिमेंट ऑफ वेस्ट एंड बेस्ट एलिमेंट ऑफ ईस्ट बेस्ट एलिमेंट ऑफ वेस्ट क्या है मने पश्चिमी सभ्यता के सबसे अच्छे गुण क्या है तो एक रेजर शार्प लॉजिक होना रीजनिंग कैपेसिटी होना सब चीजों को रीजन के ऊपर में रख कर के देखते थे और फिर अपने प्राच्य सभ्यता अर्थात कि भारतीय सभ्यता के सबसे बड़े सद्गुण क्या है कि एक श्रद्धा और निष्ठा होना ईश्वर के प्रति एक सरल श्रद्धा और निष्ठा तो ये उनमें दोनों था एक रीजनिंग करने की भी कैपेसिटी थी और एक सरल विश्वास भी था ठाकुर पे तो इस तरह से कोई मने और उम्र में भी वो 80 प्लस थे और इतने सीनियर थे इतने सारे साधुओं से मिले हैं इतनी जगह पर घूमे हैं एक्सपीरियंस से साधना की है तो उनके साथ में गप लगाते लगाते मुझे इतना अच्छा लगता था तो आज इतने दिनों के बाद में बेलूर मट की मेरे वही सब याद बातें याद है कि उनके साथ में बैठ के गप लगाते थे या तो फिर वहां यूनिवर्सिटी है यहां पे व वेद विद्यालय है यहां पर शारदा पीठ है वगैरह वगैरह जगह पर जाते थे वहां के साधुओं के साथ गप लगाते थे तो इसी तरह से यह जो लिखा है ना कि ठाकुर का एक बाल सुलभ प्रीति था बच्चे की एक बचपन की यादों की एक उसके ऊपर में यह रहती अच्छा आप कहेंगे कि ठाकुर तो सब साइकोलॉजी से ऊपर है यह सब तो हम जैसे सामान्य लोगों के लिए लिए ठाकुर के भीतर में साइकोलॉजी कहां आएगी अर्थात कि साधना करते-करते ब्रह्म प्राप्ति करती है तो यह अपनी कॉन्शसनेस है जो कि नॉर्मल कॉन्शसनेस है वो चली जाती है और फिर जैसे कि ठाकुर ने कहा ना कि तोतापुरी के साथ बात हो रही थी वो जो तोतापुरी ने कहा कि नियमित ध्यान करना चाहिए कैसे जैसे कि ये कमंडलु है उसको आप प्रतिदिन नहीं उसको धोएंगे तो उसके ऊपर में माने वो पीतल का या तांबे का ये जो पात्र है यदि उसको प्रतिदिन नहीं धोएंगे तो उसके ऊपर में धूल जम जाएगी तो ठाकुर ने क्या कहा अच्छा ठीक है किंतु जद यह पात्र है वह जद सोने का हो जाए तो सोने का यदि पात्र हो तो फिर उसको धोने की वैसे जरूरत नहीं उसको एक बार पानी में डाल दो धूल मिट्टी निकल जाएगी सोना अपने से चमकने लगेगा तो इमीडिएट वो तोतापरी ने कहा हां ठीक ठीक ठाकुर ये सब सूक्ष्म तत्व पकड़ लेते थे तो यहां पर भी हम लोग आर्गुमेंट कर सकते हैं कि अपना तो यह पित्तल का पात्र है या ये मैंने इस तरह से इस तरह से होगा अपना पात्र अपना मन तो हमको यह सब साइकोलॉजी अप्लाई होती है कि हां कभी बहुत टेंशन में चले जाएंगे तो बचपन की यादें याद करेंगे मुझे याद है मैं जब छोटा था तो गुजराती यह सब वो बच्चों के लिए मैगजीन आते हैं ना चांदा मामा है या चंपक है या तो निरंजन है वो गुजराती में आते है मुझे पता नहीं दूसरी लैंग्वेज में है कि नहीं तो वो सब मैं पढ़ता रहता था तो उसमें सब वो चित्र कथाएं आती रहती थी तो अभी भी मुझे वो सब चित्र कथाएं याद है कभी-कभी में उसके बारे में सोचता भी हूं एक था तभा भट्ट और मियां फुसकी मुझे पता नहीं कि और किसी लैंग्वेज में है कि नहीं तो वो एक बड़े ही सुंदर बने वो हस्य वाली वो सब चित्र कथाएं वगैरह मुझे अभी भी याद है सब कुछ याद है जब हम लोग टेंशन में आ जाते हैं तो अपना माइंड है ना इसको ऑटो डिफेंस सिस्टम कहते हैं वो ऑटोमेटिक ये डिफेंस सिस्टम कार्य करना शुरू हो जाती है बड़ा टेंशन होता है तो ऑटोमेटिक इस तरह से कुछ अच्छी-अच्छी यादें अपने मन में लाकर के ड़ी करेगी या तो हमको इस तरह के सपने दिखेंगे जो कि हम सुबह को उठेंगे तो वह सपना इस तरह के बचपन के या अच्छी बातों के सपने ऑटोमेटिक ये टेंशन को ये स्ट्रेस को डिफ्यूज करेंगे ये अपने ब्रेन की ऑटो डिफेंस सिस्टम है और जिस ब्रेन की ये ऑटो डिफेंस सिस्टम अपने को खुद को प्रोटेक्ट करने की कैपेसिटी यदि कमजोर हो जाती है तो इस तरह का ब्रेन ज्यादा टेंशन सहन नहीं कर पाता और फिर टेंशन के बाद में विकृतियां शुरू हो जाती है स्क्रीज फेनिया है वगैरह जो मेंटल डिसीज है या तो फिर ये ब्लड हाई ब्लड प्रेशर है या तो शुगर है या तो फिर ये कोरोनरी आर्टरी डिसीज है ये सब फिर उसमें से स्टार्ट होती है ये सब कब स्टार्ट होता है जब ये ऑटो इम्यून सिस्टम या तो फिर ये ऑटो डिफेंस सिस्टम काम करनी बंद हो जाती है तो इसीलिए कॉन्शियस अच्छा तो ये सब तो अपना एक नॉर्मल कॉन्शसनेस के लिए हो गया जो कि पीतल का पात्र है या तांबे का पात्र है इसके लिए ठाकुर का तो तो सोने का पात्र था ठाकुर ने तो ईश्वर दर्शन आत्म साक्षात्कार ब्रह्म साक्षात्कार कर लिया था ऊपर से तो वो अवतार वरिष्ठ आय थे तो हम लोगों की साइकोलॉजी क्या उनको अप्लाई होगी कि नहीं होगी तो इसके लिए अगेन वही बात है कि ठाकुर और मां इन दोनों में हमको ड्यूल रोल्स देखने हैं एक ड्युअलिटी देखनी है एक तो है कि मनुष्यवकाशा देखना है और मनुष्य त्व के हिसाब से और यह भी देखिए मान लीजिए कि इवन सामान्य मनुष्य ईश्वर दर्शन प्राप्त करता है और फिर वह जीवन मुक्त की तरह रहता है तो वह जिस तरह से एक अज्ञानी जीव होता है अपनी माया के बंधन में बंधा हुआ वैसे ही यह जीवन मुक्त कोई ना कोई लालसा या कोई ना कोई माने सात्विक वासना रख देगा क्योंकि उसके शरीर के द्वारा कोई जगत कल्याण का कार्य होने वाला है जैसे कि ठाकुर ने कहा कि शंकराचार्य ने विद्या का अहम रखा था तो यह विद्या का मैं विद्या मेरे पास में बहुत विद्या है मैं पंडित हूं ऐसा एक अहम रहने से शंकराचार्य पूरे भारत में घूम कर के जितने भी पंडित थे विभिन्न विभिन्न शाखाओं के विभिन्न विभिन्न दर्शन शास्त्रों के उनके साथ में आर्गुमेंट करके उनको कन्विंसिंग भीतर में ये विद्या का अहम नहीं रहता कि हां मैंने इतनी विद्या प्राप्त कर ली है और अभी मुझे इस जगत में रेवोल्यूशन लाना है यदि ऐसा नहीं होता गंगा के किनारे या तो फिर यह नर्मदा के किनारे जहां पे यह शंकराचार्य गुफा है आज अभी वह एमपी गवर्नमेंट बहुत बड़ा वहां पे स्मारक वगैरह बना रही है तो ऐसा वहां पे नर्मदा के किनारे कहीं प बैठ के शरीर त्याग कर देते तो भारतीय सनातन संस्कृति का पुनर्जीवन होता नहीं वेदव्यास से चली आई हुई परंपरा फिर से टूट जाती तो वेदव्यास से शंकराचार्य तक ये जो पूरी परंपरा है शंकराचार्य के बाद में श्री रामकृष्ण यहां तक ये परंपरा जीवित चली आ रही है अद्वैत वेदांत की तो जद अभी ठाकुर को खुद को देखिए ठाकुर ने कहा है कि मैं वो कुठी घर के ऊपर में अर्थात कि जहां पर मथुर बाबू रहते थे वहां पर उसकी छत के ऊपर में जाकर के वो पुकारा करते थे अरे भक्तो तुम लोग कहां पे हो आओ यह संसारी लोगों की बात सुन कर के मेरे कान जल गए अच्छा ठाकुर को क्या पड़ी है कि भक्तों के साथ में बात करने की भक्ति भक्त को लेकर के रहने की ठाकुर ऐसा क्यों कहते हैं कि मुझे चीनी खानी है मुझे चीनी होनी नहीं है मैंने मैंने देखिए कितना सुंदर एक ही मैंने इतना सुंदर उदाहरण से अद्वैत और द्वेत का उन्होंने परिचय दे दिया चीनी होना अर्थात कि ईश्वर होना और चीनी खाना अर्थात कि ईश्वर के भक्त होकर के ईश्वर के साथ में एक रिलेशनशिप क्रिएट करना जैसे मैं बालक हूं भक्त ईश्वर मां है ज मैं हनुमान की तरह उनका दास हूं और ईश्वर भगवान राम है जिनकी मैं सेवा कर रहा हूं मैं सुदामा की तरह उनका सखा हूं और भगवान कृष्ण बनकर के वो मेरे वो जो मैंने जो थोड़ा बहुत व पोहा लेकर के आया था पूर्व अंदर से वो भगवान कृष्णा उसका आहार कर रहे हैं तो इस तरह से या तो फिर मैं राधा हूं और भगवान कृष्ण की प्रेमिका हो यानी ये मधुर भाव सख्य भाव शांत भाव दस्य भाव बालक भाव इन भाव से भगवान के साथ में संबंध रखना यह ठाकुर चाहते थे नहीं कि चीनी हो जाना मैं ही कृष्णा हो कर के बैठ जाऊंगा तो फिर मुझे जगत की क्या कोई लेना देना है तो मैं बस तो व समाधि में जाकर के ठाकुर कहते हैं मुझे बेहोश नहीं होना तुम मुझे बेहोश मत करना मां को कहते हैं बार-बार मैं होश में आना चाहता हूं जैसे कि मैं सबके साथ में बात करूं कोई भी फंक्शन वगैरह होता है लोग इकट्ठा होते हैं ठाकुर को भाव हो जाता था भाव होकर के भाव में चले जाते ठाकुर क्या कहते है मां को बोलते हैं कि मां मुझे बेहोश मत करना मैं सबके साथ में भजन कीर्तन करना चाहता हूं सबके साथ में गप लगाना चाहता हूं तो यह ठाकुर का था तो मने अपेरेंटली उन्होंने यह मनुष्यवकाशा कायद उनको भी अप्लाई होती है तो यहां पर महाराज इस तरह से लिखते हैं कि ठाकुर का इस तरह से बाल सुलभ बड़ी ही प्रीति थी यह छोक के ऊपर में ये वगार के ऊपर में एक दिन भ्रात श पुत्री लोखी के डाकिया बोली लेन एक दिन ठाकुर ने अपने भाई की पुत्री लक्ष्मी दीदी ये लक्ष्मी दीदी को बुला कर के कहा क्या कहा लक्ष्मी चार पोशर पांच फड़न किने दिए आई तो चार पैसे का पांच फड़न ये तू खरीद करके ले आओ अब यह पांच फड़न अर्थात की पांच तरह की सामग्री इस तरह से छोक में डाली जाती है मैं अनुमान करके कह सकता हूं ये राई होगी या तो फिर ये मैंने हींग होगी वगैरह वगैरह जो भी है मैंने वो पांच तरह की आइटम उसको पांच फड़न अर्थात कि पांच तरह के वगार की चीजें छोक की चीजें तुम पा चार पैसे की लेकर के आओ माने अभी ये सुन कर के भी हंसी आती है कि चार पैसे की कोई चीज आती होगी हम आजकल तो पैसा चलता ही नहीं है मने 50 पैसा अभी भी कुछ समय तक था किंतु अभी पैसों का कोई कीमत ही नहीं है तो अभी चार पैसों का थोड़ा सा यह छोक का सामान सामग्री लेके आओ ताहर पर श्री मां के बोली लेन उसके बाद में मां को कहा क्या कहा पांच मिसली डाल करो माने पांच तरह के विभिन्न ये आइटम दी हुई याने अभी व ये होगा उसमें शायद पांच मिशाली पांच डिफरेंट डिफरेंट टाइप के पल्स डाली हुई डाल करना पल्स अर्थात की कठोर इसको कि गुजराती में कहते मुझे पता नहीं हिंदी शब्द क्या है तो वो मूंग होगा चना होगा तुवे होगी यह सब पांच तरह की वो पल्स डाल कर के ाल दाल बनाना एमन सोमरा देवे जनो गु एर गोंगा जनो शयर गोंगा इस तरह से छोक देना कि चारों ओर मने अभी देखिए शुए और गंगई का अर्थ क्या है मुझे नहीं पता मैंने हिंदी में देखा किताब में उसमें से इतना ही लिखा है कि बहुत ही अच्छी तरह से छोक देना किंतु ये ये मैंने इसका बंगोली क्या एक्चुअली मीनिंग है वो पता नहीं वो ठीक से ट्रांसलेट करना चाहिए एक्चुअली ये ट्रांसलेशन में यही प्रॉब्लम होता है बहुत बार ये जो माने ये क्या कहते हैं इसकी नंस जो होते है ना कि माने एकदम वो कल्चरल उस समय की सब बातें वो गांव की बातें माने मुझे लगता है कि कोलकात्ता में भी बहुत सारे लोगों को इस तरह की शब्द नहीं पता होगा तो उसका प्रॉपर ट्रांसलेशन फुट नोट में देना चाहिए भले चाहे आपका पढ़ने का फ्लो ब्रेक हो जाए ट्रांसलेशन में किंतु प्रॉपर ट्रांसलेशन उसका होना चाहिए फुटनोट एटलीस्ट होना चाहिए कि ठाकुर ने किस तरह से गांव का शब्द प्रयोग जो गुजराती में कहते तड़ पदी भाषा तो इस तरह से वो गांव के शब्द प्रयोग करते हैं तो यहां पर यह नहीं पता मुझे कि शय और गंगाई क्या होता है ट्रांसलेशन में सिर्फ इतना लिखा है कि इस तरह से छोक देना कि बहुत जैसे कि मने सुगंध उसकी चारों ओर फैल जाए आर एक दिन तीनी सुनीत पाइन भ्रात जाया रामलाल जलनी श्री माके बोली ते छन जे घोरे पांच फड़न नाई तरान फड़न छाड़ राते होई और एक दिन उन्होंने क्या सुना कि यह रामलाल की मां अपनी मां को मां शारदा को कह रही है कि अच्छा घर में यह पांच फड़न अर्थात की यह छोक देने की पांच तरह की सामग्री नहीं है तो बिना छोक दिए ही सब्जी बनाई जाए तीनी सुनिया बोली लेन ठाकुर ने जैसे सुना इमीडिएट वो कहे की अरे यह क्या कह रही हो पांच फड़न नहीं ता एक पैस आनि ना होना जद ये पांच चीज नहीं है छोक देने के लिए तो एक पैसा देक के लेके आओ तो जाते जा लागे ता बाद दिले होबे ना जिसको जो इच्छा है वह निकाल दिया ऐसा निकालने से नहीं चलेगा तो मादर ई फड़ने गंधेर बेन खेते दखिनेश्वर माछ मुड़ो पायर बाटी फेले ल ये तुम लोगों का सुंदर छोक दिया हुआ छोक देकर के बड़ी सुगंध आती है इस तरह का खाना खाने के लिए मैं दक्षिणेश्वर में यह पायस अर्थात की खीर की बाटी और मछली वहां पर सुंदर मछलियां बनती होगी वो छोड़ कर के मैं यहां पर आया हूं आर ताई तोमरा बाद दते चाओ और वो जो छोक दिया हुआ सुगंधी माने पकवान तुम छोक देना ही नहीं चाहती हो जिससे कि तो फिर यहां पर आकर के सब्जी खाने का क्या अर्थ रहा रामलाल जोनोनी लज्जा पाइया तो खन फड़ने व्यवस्था करी लेन रामलाल की मां इससे बड़ी ही लज्जित हो गई बड़ी ही शर्मिंदा हो गई और इमीडिएट किसी को भेजवा करके यह छोक देने की सामग्री उन्होंने मंगवा ली देखिए ठाकुर का किस तरह से यह सुमधुर भाव है एक और है कि सर्व त्यागी सन्यासी जीवन में किसी चीज की स्पू हा नहीं एक पैसा भी अपने पास में नहीं रखते नरन यानी कि भविष्य के स्वामी विवेकानंद तो नरेंद्र ने एक बार सुना कि ठाकुर ना की क्या पैसों को स्पर्श नहीं करते कर सकते हैं तो उ उसने नरेंद्र ने क्या किया माने डिटेल माने इस प्रसंग का वैसे तो सबको पता है नरेंद्र ने क्या किया किंतु डिटेल जो है क्या है पता है नरेंद्र ने एक दिन ठाकुर गए थे कहीं दक्षिणेश्वर से बाहर गए थे कोलकात्ता की ओर किसी भक्त के वहां पे नरेंद्र ने नरेद आया देखा कि ठाकुर के कमरे में कोई नहीं है तो एक सिक्का ठाकुर के जो बिस्तर है जहां पर ठाक बैठते थे सोते थे उसके नीचे में रख दिया और इसके बाद में नरेंद्र ने क्या किया कि वो पंचवटी की ओर चला गया किसी को बिना कुछ बताए हुए ठाकुर आए वहां कलकाता से और जैसे ही अपने बिस्तर पर बैठने को गए वैसे ही बड़े ही चिल्ला उठे जैसे कि बीछी ने उनको काट दिया हो तो इमीडिएट खड़े होकर हो गए तो बाकी सब जो डिवटी खड़े थे उन्होंने कहा अरे बिस्तर में ऐसा तो क्या है जिसने ठाकुर को काट लिया बीछी है या कोई इस तरह से कोई पशु पक्षी वहां पे है क्या तो बिस्तर उठाया तो देखा एक सिक्का पड़ा था अभी देखिए डिटेल देखिए क्या है नरेंद्र उस जैसे ही ठाकुर आए वो पंचवटी में से वहां पर ठाकुर के कमरे में आकर के खड़ा हो गया था तमाशा देखने के लिए कि क्या होता है और यह जो सब हुआ मैंने ठाकुर बड़े ही चिल्ला करके खड़े हो गए बिस्तर उठाया गया पैसा मिला सब कुछ उसने देख लिया किंतु एक शब्द बोला नहीं और उसके बाद में वो फिर से पंचवटी चला गया नरेण ठाकुर को पता चल गया ठाकुर देख रहे थे ठाकुर की ऑब्जर्वेशन पावर कैसा है सबके सामने देख रहे थे नरेंद्र के सामने भी देख रहे थे नरेंद्र चुपचाप खड़ा है कुछ नहीं बोल रहा है और जैसे ही यह पैसा मिल गया वैसे ही चुपचाप वो पंचवटी में चला गया इमीडिएट ठाकुर समझ गए कि हां नरन ने ही यह परीक्षा करने के लिए सिक्का यहां पे रखा था तो ठाकुर जिस सिक्के को मैंने पैसा वो उनके बिस्तर पे नीचे में रखा है पता भी नहीं है फिर भी वो बिस्तर के ऊपर में बैठ कर के उनको साप ने हो इस तरह से हो गया तो ठाकुर ये सब छोटी-छोटी चीजें कि अच्छा लक्ष्मी की मां बड़ा अच्छा खाना बनाती है तो उनकी प्रशंसा नाके फिर ये ये ये छोक देना बिना छोक दिए हुए सब्जी नहीं खाएंगे यह सब क्या है तो यह सब बाल सुलभ स्वभाव है इसीलिए इस व्याख्या आगे ही हमने गंभीरानंद जी ने कर दी है कि हम सबके भीतर में एक बचपना रहता ही है और हम सभी लोग चाहते हैं कि बीच-बीच में वह बचपना प्रकट हो वो बचपन की वो सुमधुर यादें बचपन के सरल दिन बिना किसी ट शशन चिंता के वो सब समय वो वापस आए और इस तरह से हम फिर से रहे यह हम सभी लोग चाहते हैं और ठाकुर वैसे तो है अवतार ईश्वर के प्रकाश स्वयं किंतु फिर भी ये ह्यूमन साइकोलॉजी का एक अंश उनमें था ही और दूसरा कि उन्होंने बालक भाव की साधना की थी मां जगत जननी जगदंबा मां काली को उन्होंने मां के रूप में देखा था ईश्वर को मां के रूप में देखा था और चाहते थे कि वह बच्चे के रूप में रहे तो वैसे भी तो एक ह्यूमन साइकोलॉजी की वजह से बचपना होता है और वैसे ही बालक भाव की साधना की है तो ठाकुर में यह बचपना एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है ठाकुर एक बार एक पात्र में वो य ये होती है ना बास्केट बास्केट के भीतर में कोई डिवटी कोई भक्त ठाकुर के लिए बड़ी ही सुंदर जलेबी लेकर के आए अभी जलेबी क्या है कि ठाकुर को बड़ा ही प्रिय माने वो मिष्ठान मिठाई है ठाकुर कहते थे कि जलेबी क्या है वाइस रोय की गाड़ी का पहिया है जहां पर बहुत भीड़ होती है तो वाइस य की उस समय तो ब्रिटिश सल्तनत थी ब्रिटिश राज था और वाइस रॉय जहां पर भी जाएगा सर्वोच्च सम्मान मिलेगा बड़ी भीड़ भी क्यों ना हो वाइस रोय की गाड़ी आएगी तो सब लोग उसको जगह दे देंगे तो ठाकुर क्या कहते हैं जिलेबी है वाइस रोई की गाड़ी का पहिया पेट भले ही चाहे कितना भर गया हो खाने के बाद में किंतु खाने के बाद में भरे हुए पेट में भी यदि कोई जलेबी देता है तो जलेबी खा लेनी चाहिए क्योंकि वास रोई की गाड़ी के पहिए की तरह पेट में जगह हो जाएगी तो इसके ठाकुर को जलेबी बड़ी पसंद थी कावर पुकुर जाएंगे तो वो वहां पर वो रामकृष्ण मिष्ठान भंडार वगैरह करके सब है दुकान तो बहुत सारी दुकान कोई कोई कहता है कि इस दुकान में ठाकुर जब छोटे थे तो वो वहां से मिठाई लेकर खाते थे तो अभी बहुत सारी दुकान हो गई तो एक दुकान में लिख दिया आदि रामकृष्ण मिष्ठान भंडार ये सर्वप्रथम है अभी सर्वप्रथम क्या है हमको तो पता नहीं वहां लोगों रहते हुए लोगों को पता होगी जो भी है तो अभी किसी भक्त ने एक बास्केट में एक टोकरी में जलेबी लाकर के ठाकुर के सामने रख दी ठाकुर बढ़िया मजे से बैठकर के जलेबी खा रहे हैं उस समय 5 साल का एक लड़का ठाकुर के कमरे में प्रवेश किया अभी जैसे ही उस बच्चे को देखा अब ये देखिए बिल्कुल बचपन का भाव बचपन का भाव ठाकुर के ऊपर में सवार हो गया बचपन 5च साल का बच्चा जबी जलेबी खाता है और दूसरा उसका मित्र आ जाता है बंधु आ जाता है तो सबसे पहले उसके मन में यही आएगा कि अरे ये जलेबी तो बड़ी सुंदर है बड़ी टेस्टी है मैं क्यों उसके साथ में शेयर करूं मेरे मित्र के साथ में क्यों शेयर करूं वो छुपा देगा बच्चा तो वैसे ही ठाकुर के मन के भीतर में 5 साल के बच्चे के भाव का उदय हुआ और ये टोकरी थी जलेबी की उन्होंने अपने पीछे छुपा दी और छुपाते छुपाते ठाकुर समाधि में मग्न हो गए तो ये थे अपने ठाकुर बचपना उनमें अभी देखिए ऐसा नहीं है कि उनको मने जलेबी के प्रति कोई स्पृहा या वासना थी या तो फिर बच्चे के साथ में वो शेर करने से उनकी जलेबी कम हो जाती वो अपने भक्तों को जितनी बोलते उतनी जलेबी लेक आते हैं उनके ठाकुर को को एक बार वो ठंडा बर्फ खाने की बड़ी उनको माने उनको टेस्ट लग गया था बर्फ खाने का तो गर्म के दिनों में जितने भी भक्त आते थे तो वो कोलकाता से बर्फ लेके आते थे तो बर्फ खाएंगे बर्फ वाला पानी पिएंगे कोईकोई कहता है इसी वजह से ठाकुर को गले का कैंसर हो गया तो जो भी है कैंसर पूरा एक दूसरा स्टोरी है किंतु ठाकुर को कुछ खाने की इच्छा होगी और उनको वो मिल ना जाए ऐसा कभी हो सकता है किंतु फिर भी ये बचपना देखिए कि बिल्कुल 5 साल के बच्चे की तरह जैसे अपना मित्र आएगा दूसरा अपने ही सवय स अपने ही उम्र का तो वो जिलेबी की टोकरी अपने पीछे में छुपा करके फिर धीरे-धीरे समाधि मग्ना हो गए तो ठाकुर में यह बचपना पूरा था और बच्चे की तरह ही और यह बचपन की जो लीला है यह जो सुमधुर लीला यह देख कर के ही अपने मन में वो सिमिलर भाव का उदय होता है यदि आप जहां पर जाएंगे जैसे हॉस्पिटल है डिस्पेंसरी है जहां पर बहुत सारे बीमार लोग इकट्ठा होते हैं वहां जाकर के ही अपना मन भी थोड़ा सा डिप्रेशन में चला जाएगा जबकि मंदिर है जहां पर सब भावुक भक्तजन इकट्ठा होते हैं ईश्वर की पूजा आराधना प्रार्थना होती है तो वहां जाकर के ऑटोमेटिक अपने मन में यह श्रद्धा भक्ति का उदय होगा तो जिस स्थान पे जिस तरह के व्यक्तियों से मिलते हैं उस स्थान या व्यक्तियों का कुछ ना कुछ असर अपने मन पर होता ही है तो ठाकुर की यह सब लीला देख कर के ठाकुर के मन के जो भाव है बाल सुलभ भाव है या तो फिर तपस्या के जो भाव है इस तरह से मने ह्यूमर अर्थात कि रमज वाले रसिक चुड़ा मणी ठाकुर को कहते हैं इस तरह के जो भाव है उसका एक अंश उसकी एक रेखा पात तो अपने सबकॉन्शियस के ऊपर में हो ही जाएगा भले ही हम उसको कॉन्शियसली समझे ना समझे भले ही चाहे हम उसको एक्टिवली ग्रहण करने का प्रयास करें ना करें इसीलिए राम कथा वगैरह जहां पर भी होती है वो जगह पवित्र हो जाती है वहां पर जितने भी लोग हैं वो चाहे ना भी चाहे किंतु फिर भी भगवान राम की बातें सुनने को मिलती है और यह सबकॉन्शियसली अपने मन पर कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ रेखाए छोड़ के जाती है अपने कुछ ना कुछ संस्कार को तो धो देती है तो इसीलिए पवित्र बातें सुंदर बातें यह रमज पूर्ण बातें यह सब पढ़ कर के अपने भी संस्कार धीरे-धीरे करके स्वच्छ होना निर्मल होना शुरू होते हैं हमको पता भी नहीं चलता बहुत एक एक सुंदर उदाहरण सर्वप्रिया जी महाराज ने हम लोगों का क्लास था टीसी में हमारे आचार्य थे एक बड़ा ही सुंदर उदाहरण दिया था कि देखिए सबकॉन्शियस कैसे काम करता है एक लेडी थी उनको एक्सीडेंट हुआ ना कुछ हुआ वो कोमा में चली गई अभी उनको रविंद्र संगीत बड़ा ही पसंद था बेंगोल की बात है और बंगाल में तो जो लोगों को संगीत प्रिय है रविंद्र संगीत को बड़ा ही पसंद करते हैं तो अच्छा यह रवींद्र संगीत प्रिय था किंतु कोमा में है हॉस्पिटल में है बेड पे लेटी हुई है अभी एक डॉक्टर आया डॉक्टर वो जैसे बीच-बीच में इंस्पेक्शन करने के लिए आते हैं कि क्या वाइटल साइंस वगैरह है तो वो अपने वहां पर वो बोर्ड रहता है वहां पर डॉक्टर अपना कुछ ना कुछ मार्किंग करते हैं साइन करके वो रखेंगे वहां पे लॉक बुक जैसा मेंटेन करेंगे तो डेली विजिट के लिए डॉक्टर आया और अपने मन में हल्के हल्के से कोई एक रवींद्र संगीत कोई एक गीत गुनगुना रहे हैं अभी गुनगुना रहे हैं तो एकाय क्या हुआ कहीं पे अटक गए अटक गए वो याद नहीं आ रहा है कि इस ये कड़ी के बाद की कड़ी क्या है तो ऐसा वो अटक करके सोच रहे हैं इमीडिएट यह जो लेडी जो कि कोमा में सोई हुई थी उसने वो उसकी बात की कड़ी गाना शुरू कर दी तो ये डॉक्टर एकदम आश्चर्यचकित हो गया कि अरे यह कैसे हो सकता है सर्वप्रिया अंद जी कहते हैं कि उन्होंने जो डॉक्टर ने ये सुना उसके पास से यह बात सुनी है यानी कि मैंने सुन कर के बड़ा आश्चर्य होता है किंतु ये ऑथेंटिक बात है तो ये मैंने देखिए कि सबकॉन्शियस के भीतर में अपने जो संस्कार रहते हैं वो कभी ना कभी कहीं ना कहीं वो जो नॉलेज रहता है जो इंफॉर्मेशन रहती है संस्कार रहते हैं कहीं ना कहीं तो किसी ना किसी तरह से प्रकट होंगे ही होंगे और अपना कार्य करेंगे ही करेंगे तो ये ठाकुर महा स्वामी जी के सुमधुर प्रसंग सुनक के एक समय तो कभी ना कभी आएगा कि हमको बहुत जरूरत है बड़े टेंशन में है कुछ रास्ता नहीं दिख रहा है और सडन एक प्रसंग आक के वो एक जैसे मेसमराइज हो जाता है ना हम लोग डर के मारे मेसमराइज हो जाते हैं कभी-कभी जैसे ये साप है चिड़िया को खाने के लिए चिड़िया के सामने जाएगा तो चिड़िया क्या बड़ी मेसमराइज हो जाएगी हिप्नोटाइज हो जाएगी और उड़ना भूल जाएगी पूरी फ्रीज हो जाएगी और साप उसको खा लेगा तो कभी-कभी डर है ना हमको मेसमराइज कर देता है हमको हिप्नोटाइज कर देता है हम मेंटली पैरालाइज हो जाते हैं सोचने में नहीं पाता समझ नहीं पाते कि क्या करना है क्या नहीं करना है इस समय इस तरह से प्रसंग खड़ा होगा और ये हिप्नोटिज्म टूट जाएगा और इमीडिएट अपने ये क्रिएटिव एनर्जी है वो फिर से प्रकट होगी और रास्ता अंधेरे में से रास्ता हमको फिर से दिखने लगेगा तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति श्री राम
Question Answer
कृ और ठाकुर निजर ठाकुर निजर माने ठाकुर खुद जब जब साधना तो क्या था कि वो मथुर बाबू के घर में रहते थे स्त्रियों के ही वस्त्र पहन करके और यहां तक कि मथुर बाबू लड़की का विवाह हुआ था तो उसकी लड़की को अपने पति के साथ में सुलाने के लिए ठाकुर जाते थे और घर में किसी को संकोच भी नहीं होता था तो ठाकुर खुद कहते हैं कि मैं भगवान कृष्ण की दासी हूं और गोपी होकर के रहते थे माने एक्चुअली ठाकुर को बारे में जद कहा जाए तो सब भाव उन्होंने अपने से साधना कर ली है ईश्वर के साथ में भाव जनरली होता है मनुष्य के साथ में ऐसा इक्वेट नहीं करके ईश्वर के साथ में ही आपकी और ईश्वर इन दोनों के बीच में है इस तरह से ही इसका एनालिसिस करना उचित है नहीं कि मेरा और किसी व्यक्ति के साथ में क्योंकि इस तरह से कहीं ना कहीं पंच महाभूत का शरीर है तो कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ तो खामी उसमें आ ही जाएगी किंतु हमारा और ईश्वर के साथ में जो संबंध रहेगा मधुर भाव जद रहेगा तो उससे ट इज द बेस्ट उसमें कोई भी सांसारिक का प्रवेश नहीं होगा मायर संगे ना भावई उचित ठाकुरे रा ठाकुर निजे जमन गोपी सज करके मधुर भाव की साधना करते थे वही ज्यादा बेटर है एक्चुअली मां कहती है कि ठाकुर के ऊपर में उनका वात्सल्य भाव था माने खुद ने एक बार कहा है तो मां और ठाकुर को नहीं सोच कर के मधुर भाव के लिए ठाकुर की ही भगवान कृष्ण के साथ में लीला वह उसके बारे में सोचना ज्यादा बेटर है यहां पर किंतु क्रिटिकल डिस्टिंक्शन है य अपने लिए कुछ है उसमें हम बे दरकार हो तो चलेगा जैसे मां ने खुद ने कहा ऊपर में ये प्रसंग है कि मल इतना निकल रहा है शरीर से ठाकुर अपने शरीर की ओर बे दरकार हो गए दूसरा है कि ईश्वर के प्रति जो आप कर रहा है ईश्वर की जैसे ठाकुर भंडार में कार्य करना जैसे अपना जितना भी एक्टिविटी है राम कृष्ण मिशन का वो सब ईश्वर की से मने मनुष्य के भीतर में ईश्वर को दर्शन करके डिस्पेंसरी चलना है तो एकदम परफेक्टली चलना चाहिए मनुष्य ईश्वर रूपी रोगियों की सेवा हो हो रही है पब्लिकेशन डिपार्टमेंट है इतना परफेक्टली चलना चाहिए कि वाचक रूपी ईश्वर की सेवा हो रही है तो यह हो गया कि जब ईश्वर ईश्वरा परण ईश्वरा आर् प्रण जो कोई भी चीज है उसको परफेक्शन होना चाहिए जबकि मेरे लिए खुद भी है चलेगा अभी मेरा आप ऑफिस देखिए और मेरा रूम देखिए आपको इमीडिएट डिफरेंस समझ में आ जाएगा रूम में सब कुछ इधर-उधर पड़ा हुआ है किंतु ऑफिस में एक पेन जद इधर गिरी होगी तो मैं एकदम डांट दूंगा सबको कि ऐसा नहीं भाई एकदम ठीक ठाक सब होना चाहिए वरना तो नहीं चलेगा यह ठाकुर का काम है वो मेरा काम है वो सब चीजें इधर उधर पड़ेगी वो वही बेड के नीचे में कुछ है कोई कहां पे है वो चलेगा ऑफिस में नहीं चलेगा सो दिस इज अ क्रिटिकल डिस्टिंक्शन ये अभी देखिए यहां पर जो साधक है उसके बारे में कहा गया है यदि आपको साधना करनी है तो आपको एकदम पार्टिकुलर रहना है जो कुछ भी चीज को आप हाथ लगाए वो परफेक्टली करेंगे किंतु अगेन यह सभी चीजें हैं जो कि ईश्वरा अर्पण की गई है यदि आप अपने खुद के प्रति थोड़े बहुत बेदर का रहेंगे चलेगा अब जैसे चिलम सजाना है या तो फिर हम मान लीजिए कि जैसे कि बेलूर मठ में ही ठाकुर को हुक्का दिया जाता है तो ठाकुर को जिस तरह से आप हुक्का देंगे मने ऑफर करेंगे तो उसको तो आपको अच्छे से सजा करके देना ही है आप यदि अपने लिए करेंगे और ठीक ठाक नहीं करेंगे तो चलेगा मैंने देखिए आइडियल स्पीकिंग यू शुड बी परफेक्ट इन एवरीथिंग इन प्रैक्टिस ऐसा नहीं होता है स्वामी जी भी इतने परफेक्ट नहीं थे यह जब जितने भी स्मृति कथाएं हम पढ़ते हैं कि स्वामी जी के कमरे में गए तो कमरे में जाकर के क्या देखा सब चीजें अस्तव्यस्त पड़ी हुई है ठाकुर ने खुद ने कहा था नरेंद्र जब मुझे पहले मिलने के आया था तो एकदम मैंने फट मैंने इस तरह के कपड़े पहने थे जो कि पता नहीं कितने टाइम से धुए नहीं होंगे इस तरह के मेले कपड़े पहन कर के आया था किंतु ठाकुर कहते हैं कपड़े के ऊपर इसकी नजर नहीं है उसकी नजर और कहीं बलराम बाबू के घर में जाते थे तो उनको स्वामी जी को पान खा कर के थूकने की आदत थी तो उनके जो छोटे भाई है महेंद्र नाथ दत्त वो एक स्मृति कथा में कहते हैं कि उनके खुद के कमरे में स्वामी जी जहां तहां थूका करते थे और बलराम भवन में जाते थे तो बल वहां पे बलराम खुद वो जो थूक दनी है वो हाथ में लेकर के खड़े रहते थे और नरेंद्र जब थूकना चाहता था तो सामने वो थूक दनी रखते कहते थे नरेण इसमें थू को और इधर-उधर मत थूकना मने देखिए दो तरह से एक तो नरेण की हैबिट ऐसी थी दूसरा कि बलराम बाबू का मने क्या एक भक्ति भाव कैसा था तो स्वामी जी के खुद के जीवन में देखि कि सब कुछ उनका अस्तव्यस्त रहता था किंतु मन रहता था ईश्वर में अर्थात ईश्वरा आर् प्रण हम कुछ करते हैं तो उसमें परफेक्शन चाहिए यदि आप प्रैक्टिक आइडियल स्पीकिंग सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए प्रैक्टिकली ऐसा होता नहीं है यह अपना साधना का जो लिटरेचर है दो तरह का है एक दर्शन शास्त्र है दूसरे है कि यह पौराणिक शास्त्र है पौराणिक शास्त्र अर्थात की ईश्वर के लीला का वर्णन तो अभी जैसे खास करके भागवत है या तो कथामृत है वहां पर देखेंगे कि इस तरह के भाव की ही बातें की गई है अभी ठाकुर ने हालांकि ठाकुर ने सभी भावों की साधना की है उन्होंने बालक भाव को सबसे ज्यादा प्राधान्य दिया है और कथामृत पढ़कर के ठाकुर का बालक भाव बड़ा ही सुंदर रूप से हमको दिखता है तो इस तरह के ग्रंथ हम जितना भी पढ़े ना उतना ही वह भाव हमारे मन में पुष्ट होता जाएगा अभी मधुर भाव की साधना करनी है तो वो भागवत के वो जो रास अध्याय वगैरह जो है उसको पढ़ना है माने उस तरह का साहित्य पढ़ कर के हमको उस भाव की पुष्टि होती है सख्य भाव की साधना करनी है तो वह सुदामा वाला प्रकरण पढ़ना है शांत भाव की साधना करनी है तो अपने ऋषि मुनियों की बातें पढ़नी है दस्य भाव की साधना करनी है तो हनुमान के बारे में पढ़ना है यह रीडिंग जो है ये स्वाध्याय जो है ये दिस इज अ वेरी इपोर्ट क्योंकि क्या है देखिए अभी आप किसी इस तरह से जिस दक्षिणेश्वर में मैं यदि ठाकुर होते और उस समय में होता मैं इतना स भाग्य होता तो ठाकुर मेरे जिस मेरा जिस तरह का भाव है उस तरह के भाव के भजन है उस तरह के भाव की बातें ठाकुर करते आज मैं इस तरह के साधक को कहां पाऊंगा कि उसके पास में जाकर के मेरे भाव के अनुसार बात करें और वोह इस तरह की बातें बहुत ज्यादा मने नहीं करना ही उचित है भाव मन में ही रहे और ग्रंथ का पाठ करके ही भाव को पुष्टि देते रहे वो मेरा खुद का जो है मेरा खुद का एक तरह से बालक भाव ही है और कथामृत पढ़कर करके ही उसकी पुष्टि हुई है तो मुझे यह मार्ग सबसे ज्यादा सेफ लगता है शरणागति सभी भाव में है शरणागति सभी भाव में है जब तक अहम नहीं रहे जब तक अहम रहेगा एक जापान की एक सुंदर कहानी है कि एक बड़ा ही एक विख्यात एक मास्टर था मने मेडिटेशन का उसको मिलने के लिए एक व्यक्ति आया एक राजा का लड़का अभी राजा के लड़के तो पता है ना घमंड से भरे हुए रहते हैं तो यह मेडिटेशन मास्टर के पास आकर के कहता है मुझे मेडिटेशन सिखाई है तो ये जन मास्टर थे उन्होंने क्या किया कि वो जापान में तो टी सेरिमनी होता है तो एक चाय के कप में उन्होंने चाय डालना शुरू किया किटली में से अभी चाय का कप तो भर गया किंतु फिर भी ये जेन मास्टर है चाय डालते ही जाते डालते ही जाते हैं तो वो राजकुमार के जो भी सामने बैठा था घमंडी व्यक्ति कहता है अरे अरे क्या पागल होए क्या चाय का कप भर गया फिर भी आप उसमें चाय डाल रहा है तो जैन मास्टर ने क्या कहा कि देखो तुम्हारा मन जो है ना इस चाय के कप की तरह है पहले ही भरा हुआ है उसमें मैं जो कुछ भी डालूंगा वो ऊपर से बह जाएगा भीतर में कुछ नहीं जाएगा पहले तो अपने मन को खाली करो बाद में ये जो कप को खाली करने से जो चाय डालेंगे तो कप में भरा आएगी तो वैसा अपना जो घमंड है या तो अहंकार है उसको खाली करके बाद में ही सब साधना होती है यानी शरणागति इज अ प्री कंडीशन फॉर ऑल साधना