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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः आज से श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र लेखक स्वामी गंभीरानंद जी महाराज प्राण टान अर्थात की प्राणों की पुकार या तो फिर प्राणों का आकर्षण इस चैप्टर का अभी आखिरी दो पैराग्राफ आखिरी पेज बचा है जिसको कि आज हम देखेंगे इस आखिरी पेज पर दो प्रसंग है जो कि गंभीरानंद जी महाराज हमारे सामने वर्णित करते हैं और यह दोनों प्रसंग बड़े ही गुरुत्व पूर्ण बड़े ही महत्त्वपूर्ण है एक तो है फिलोसॉफिकल टॉपिक को लेकर के एक प्रसंग की चर्चा हो सक है और दूसरे प्रसंग का रामकृष्ण संघ की भावधारानी है तो पहले एक के बाद एक प्रसंग पढ़ेंगे फिर उसके ऊपर में थोड़ा सा चर्चा करेंगे गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं काशीपुर एकटी घटनाए ठाकुरे सेवाए श्री मायर ओ कांतिक तार परिचय पाबा जाए काशीपुर में एक घटना के माध्यम से हम को पता चलेगा कि मां की उनकी ओर सेवा कितनी गंभीर थी कितनी एकांतिक थी अभी देखिए कि पट भूमि का तो हमको पता ही है बैकग्राउंड इस चैप्टर का कि ठाकुर उनको कैंसर हो गया है और काशीपुर में उनको चिकित्सा के लिए लाया गया है और मां भी वहां पर रहती है और एक के बाद एक सब त्यागी संतान वहां पर आकर के मिलित हुए हैं गृहस्थ संतान दिन के दौरान रह ते हैं दिन के समय रहते हैं और उनमें से कोई ना कोई सुपरविजन करेगा जैसे कि मास्टर महाशय डॉक्टर सरकार को कहते थे डॉक्टर सरकार अर्थात कि महेंद्र लाल सरकार जिनकी चिकित्सा ठाकुर उस समय ले रहे थे तो मास्टर महाशय डॉक्टर सरकार को मिलने के लिए गए तो डॉक्टर सरकार ने उनको पूछा कि अच्छा आप लोग ठाकुर की चिकित्सा का बंदोबस्त किस तरह से करते हैं तो मास्टर महाशय कहते हैं कि यह त्यागी संतान जो है ठाकुर के यह त्यागी भक्त वह दिन के दौरान वहीं पर रहते हैं और वह लोग ठाकुर की सेवा करते हैं और यह जो गृहस्थ वरिष्ठ भक्त है सब उनमें से कोई ना कोई एक एक दिन वहां पर रहेगा और ओवरऑल सुपरविजन करेगा तो इस तरह से सब सेवा का आयोजन हो रहा था तो उसी पट भूमिका में उसी परिप्रेक्ष्य में इस घटना को लिखा गया है कि हमको तो पता है कि ठाकुर के लिए सबसे से ज्यादा महत्त्वपूर्ण सेवा करने वाली तो मां शारदा ही थी जनरली हम ठाकुर का जीवन या तो रामकृष्ण संघ के साथ में जो युक्त है भक्त सन्यासी सभी लोग ऊपर ऊपर से आपको ऐसा लगेगा काशीपुर की घटना का विवरण पढ़ने से किय नरेण राजा महाराज शशि महाराज लाटू महाराज यही लोग प्रधान परिचर्या ठाकुर की करते थे वही लोग प्रधान सेवक थे और उन्हीं की सेवा की वजह से ठाकुर के आखिरी आखिरी दिनों में उनको कुछ अभी कैंसर तो एक ऐसा टर्मिनल डिसीज है कि एक बार लगा है तो उस समय तो उसका कोई यह नहीं था इलाज किंतु एक ईज ऑफ लाइफ पेन मैनेजमेंट जिसको कहते हैं वह थोड़ा ठाकुर के जीवन में उनका जीवन थोड़ा सा आखिरी आखिर का आसान हुआ क्योंकि ये त्यागी लड़के लोग उनकी सेवा करते थे किंतु जैसे-जैसे हम मां शारदा देवी के जीवन में गंभीर रूप से प्रवेश करने के लिए जाएंगे हमको पता चलेगा कि त्यागी संतानों के पीछे मां की ही सेवा सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण थी वही बात है कि मां किसी की नजरों के सामने नहीं आती थी देखिए कि रामचंद्र दत्त ने ठाकुर की जीवनी लिखी बाद में उसमें उन्होंने शशि महाराज की बड़ी ही प्रशंसा की है उसमें लिखा है कि शशि भाई तुम अमर हो गए हो ठाकुर की सेवा करके और स्वामी विवेकानंद भी शशि महाराज की एक निष्ठ सेवा को पहचानते थे रिकॉग्नाइज करते थे इसीलिए जब विरजा हुआ वराह नगर मठ में सभी त्यागी अपने गुरु भाइयों को सन्यास नाम देने की बारी आई तो उन्होंने शशि महाराज को राम कृष्णानंद नाम दिया तो आज यदि कहेंगे कि रामकृष्ण संघ में सेवा का सर्वोच्च आदर्श कौन है तो शशि महाराज का नाम आएगा लाटू महाराज का नाम आएगा किंतु हमको पता है कि यदि आपने हमारा रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य अच्छे से स्टडी किया हो तो अपने साहित्य में मां शारदा देवी की सेवा का जो अवदान है वह इतना ही महत्त्वपूर्ण है वह इतना ही गाभण है तो यहां पर देखिए कि यहां पर महाराज जी लिखते हैं कि मां ठाकुर की एकांतिक रूप से सेवा करती थी और उसका एक उदाहरण भी हमको यहां पर मिल है हालांकि देखिएगा कि यह उदाहरण किस तरह का है महाराज जी लिखते हैं एक समय ठाकुरे जनन गुगली झोले व्यवस्था होलो एक समय चिकित्सक ने कहा कि ठाकुर की ठाकुर के लिए गुगली अर्थात की स्नेल कहते हैं गुजराती शब्द है गोकड़ा तो उसका झोल अर्थात कि इसका जूस बना कर के ठाकुर को पिलाया जाए झोल अर्थात की एक तरह का ग्रेवी मिश्रित जूस तो ठाकुर श्री मां के उहा करी ते आदेश दले तीनी आपत्ति जाना लेन ठाकुर ने मां को कहा कि गुगली अर्थात कि स्नेल का जूस उसका झोल बना कर के मुझे दो चिकित्सक ने कहा है तो मां ने उसके बारे में आपत्ति जना करके कहा ओई गुलो जंत प्राणी घाटे देखी चोले बेड़ा आमी ए देर माथा ईंट दिए छच दे पार्बोना मां कहती है कि यह तो जीवंत प्राणी है मैं देखती हूं कि घाट के ऊपर में अर्थात कि नदी या तालाब के किनारे पे ये तो चलते घूमते हैं मैं इनके सर पे ईंट मार कर के यदि आपने स्नेल देखी होगी अ तो देखा होगा कि उसके ऊपर में एक शेल रहता है शेल को तोड़ कर के उसके पीछे के भीतर का जो जीवंत प्राणी है उसको फिर वो बॉईल करना होता है तो मां कहती है कि यह तो मैंने देखा है कि तालाब या नदी के किनारे घूमते फिरते हैं जीवंत प्राणी है उसके सर पर ईंट मार कर के यह शेल तोड़ कर के फिर उसका झोल बनाना यह मेरे से नहीं होगा शून्य ठाकुर बोली लेन शेकी आमी खाबो अमार जनने करबे सुन कर के ही ठाकुर ने कहा यह क्या बात कर रही हो तुम मैं खाऊंगा मेरे लिए करो तखन श्रीमा रोख करिया उ हाती प्रवृत होई लेन तब जब अभी ठाकुर ने आदेश किया है तब मां ने अपने मन में जोर लाकर के मने रोख लाइया अर्थात कि कैसे भी करके अपने मन को आश्वस्त करके सद्र करके जोर करके यही करने में वह प्रवृत्त हुई क्या करने में उस स्नेल के ऊपर में ईंट से मार कर के उसका शेल जो है वह तोड़ देना है फिर उसके भीतर का जो प्राणी है उसको बॉयल करके उसका जूस बनाना है जो भी बनाना है एवं संगे संगे एक तथ तहा हृदय उद् भाषित होलो जे ठाकुर निजर सृष्टि निजे संहार करी दे छ और जैसे ही माने ऐसा किया साथ-साथ में ही एक तथ्य एक बहुत बड़ा एक सच उनके सामने प्रकट हुआ कि ठाकुर जैसे की अपनी ही सृष्टि का संहार अपने ही हाथों से करते हैं निजे निजर सृष्टि ठाकुर निजे सृष्टि निजे संहार करते छ ठाकुर अपनी सृष्टि अपने से ही संहार करते हैं देखि कि ये बहुत बड़ा एक उदाहरण एक बहुत बड़ा एक टीचिंग है जैसे कि हम लोग माय प्लान ऑफ कैंपेन में आगे भी पढ़ेंगे कि बुद्धिज्म में जो प्रॉब्लम हुआ बुद्धिज्म के जो कुछ मिसकनसेप्शन तो उसी की वजह से भारत में अवनति का एक बहुत लंबा दौर प्रारंभ हुआ अभी ऐसा नहीं था कि वह वैदिक ओरिजिनल अपना धर्म था वह सब कुछ ठीक-ठीक था वह नहीं था बोलकर के ही तो भगवान बुद्ध को अवतार होकर के आना पड़ा था तो वह बात तो एकदम सही है कि वैदिक युग का अस्त हुआ भारत में यह यज्ञ फिर यह क्षत्रिय ब्राह्मण यह जो ण वर्णाश्रम प्रथा आश्रम प्रथा यह चतुर य की अर्थ काम मोक्ष यह जो है धर्म अर्थ काम मोक्ष यह जो भी प्रथाएं थी यह सब कथाओं का धीरे-धीरे करके लोप होना शुरू हुआ था बोलकर के ही तो आखिर में भगवान बुद्ध को आना पड़ा था अभी भगवान बुद्ध के आने से जहां तक भगवान बुद्ध का चरित्र एकदम कोई भी प्रश्न ही नहीं है स्वामी जी ने खुद ने कहा कि मेरी सर्वोच्च श्रद्धा भगवान बुद्ध के प्रति है किंतु जैसे कि समय का भी तो एक चक्र है ना जैसे कि वैदिक युग का भी उद्गम हुआ वैदिक युग का भी सूर्योदय हुआ था और वैदिक युग का भी सूर्यास्त हुआ था सूर्य उनका भी एक तरह से रास हुआ था तो यह बुद्धिज्म का भी बुद्धिस्ट युग का भी सूर्योदय हुआ प्रारंभ हुआ और इसका भी रास हो रहा था तो उस समय में यह अहिंसा परमो धर्म वाली एक बात हम सबके मन में प्रवेश कर गई मैंने बहुत सारे भारतीयों के मन में तो देखिए कि यह अहिंसा परमो धर्म बोलने से प्रॉब्लम यह है कि जब शत्रुओं का आक्रमण होगा तो उनके सामने रक्षा करने के लिए क्षत्रिय लोग नहीं बचेंगे या तो फिर क्षत्रिय लोग सब समय यह एक तरह की द्विधा अपने मन में रखेंगे कि क्या मैं उनके आक्रमण का प्रति आक्रमण करके उत्तर जो दे रहा हूं युद्ध के मैदान में जाकर के युद्ध कर रहा हूं वह सही है कि गलत है यह द्विधा उनके मन में हमेशा रहेगी देखिए यहां पर प्रॉब्लम किंतु क्या होता है कि जब तक आप धर्म को सही सही फॉलो करते हैं ना तो ईश्वर भी सहाय होते हैं जैसे कि ठाकुर ने एक भक्त मालिका वह भक्त मालिका अर्थात कि यह वैष्णव लोगों की भक्त मालिका उसमें एक राजा जयमल का उदाहरण है काफी कुछ उदाहरण है उसमें कि यदि आप ईश्वर पर एकदम संपूर्ण रूप से भरोसा रखते हैं संपूर्ण रूप से शरणागत होते हैं तो किस तरह से ईश्वर स्वयं आपकी रक्षा करते हैं तो कैसा उदाहरण है कि यह राजा अपने महल में अपने निश्चित समय के अनुसार प्रतिदिन वह पूजा किया करता था मने भगवान कृष्ण की अभी यह उनके जो शत्रु राज्य है उन लोगों को पता चला कि यह राजा हमेशा बिना किसी वो बिना किसी इंटरप्शन के कोई भी कार्य बीच में आ जाए सबको छोड़ कर के पूजा के समय अवश्य निश्चय पूजा करेगा तो यह शत्रु राजा को गुप्त चरों से अपने जासूसों से जब यह समाचार मिला तो उसने यह सोच लिया कि चलो इसी राज्य पर उसी समय हमला किया जाए जबकि राजा पूजा कर रहा है अभी राजा पूजा कर रहा है और आक्रमण हुआ तो सेनापति को ठीक-ठीक एक गाइडेंस देना अपने सैन्य को जागृत करना अपने सैन्य जो बिखरा हुआ है सबको इकट्ठा करके प्रति एक हमला करना या तो बचाव करना यह शायद इस राज्य से नहीं हो पाएगा और लोग जीत जाएंगे इसी आशा में इस लोभ में शत्रु राजा ने उसी समय आक्रमण किया जिस समय यह राजा पूजा कर रहा था अभी देखिए कि वह पूजा कर रहा है उसकी रानी है उसकी मां है सब लोगों ने आकर के चिल्ला कर के कहा अरे शत्रु का आक्रमण हो गया है तुम जाओ राज्य की रक्षा करो वरना तो शत्रु महल में चले आएंगे तो सबका संहार कर देंगे तो अभी यह राजा है वह कहता है कि नहीं मैं यदि पूजा का समय है तो पूजा ही करूंगा बाद में ही देश की रक्षा होगी इससे पहले मैं यहां से खड़ा ही नहीं होऊंगा तो अभी यह रानी भी रो रही है उसकी मां भी रो रही है सोच रही है कि अभी शत्रु आ ही गए अभी हम क्या करेंगे किस तरह से बचेंगे तो अभी यहां पर इस तरह सा इस तरह का ड्रामा चल रहा है राज्य महल में राजा कुछ भी चिंता किए बिना पूजा कर रहा है तो कर ही रहा है यहां पे एकाएक ये युद्ध क्षेत्र में देखिए कि क्या हुआ वो शत्रु राजा है वो तो बड़ा ही खुश हो गया देखा कि वो सही में में वो उसका वो राजा आ नहीं रहा है युद्ध क्षेत्र में तो वो महल की ओर राज्य की ओर बढ़ता ही जा रहा है उस समय एकाएक देखा कि राजा का जो घोड़ा है उसके ऊपर में एक एक सैनिक एक महा भयानक महावीर योद्धा एक हाथ में खुली तलवार लेकर के राजा के ही घोड़े पर बैठ कर के युद्ध क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है तो उसको देख कर के उस राजा के जो सैनिक थे बड़े ही उत्साह में आ गए और जैसे ही यह राजा के घोड़े प जो योद्धा बैठा था उसने जैसा वो शत्रु राजा के ऊपर में आक्रमण किया सब सैनिक मिलकर के उसके पीछे जा रहे हैं और वह शत्रु राजा को हरा कर के भगा दिया वहां से अभी देखिए कि वो एक्चुअली राजा तो अपने मंदिर में पूजा कर रहा है उसके घोड़े प बैठ कर के और एक योद्धा वो युद्ध क्षेत्र में घूम रहा है अभी किसका दुस्साहस होगा कि राजा के घोड़े प बैठ कर के युद्ध क्षेत्र में जाए यहां पे राजा तो अपनी पूजा समाप्त करके वोह तबेले में अस्तबल में आया उसके घोड़े को लेकर के सोचता है अभी मैं युद्ध क्षेत्र में जाऊंगा तो देखा व घोड़ा एकदम पसीना पसीना होकर के वहां पर खड़ा है और बाकी सभी सैनिक भी वहां पर खड़े हैं कहा कि राजा आपने तो बड़ा कमाल कर दिया आप तो युद्ध क्षेत्र में आकर के शत्रु को हरा दिए तो राजा कहता है कि मैं तो पूजा कर रहा था तो युद्ध क्षेत्र में गया कौन तो गए श्यामर शह जो जिनकी पूजा कर रहा था राजा वही वो मंदिर में से बाहर निकल कर के उसी राजा के घोड़े पर जाकर के शत्रु को पराजय करके चले आए तो देखिए कि यदि आप यह कहते हैं कि मैं अपने धर्म को इस तरह से फॉलो करूंगा कि कभी-कभी यदि आवश्यकता आन पड़ने पर भी मैं अपने राज्य की रक्षा नहीं करूंगा या तो फिर मैं धर्म को फॉलो कर रहा हूं इसलिए वह मैं नहीं कर पाऊंगा तो ईश्वर स्वयं आकर के अपनी रक्षा करेंगे यह बात तो आपका विश्वास ऐसा होना चाहिए तभी आप कह पाएंगे कि मैं अपने कर्तव्य की कर्तव्य का पालन नहीं करूंगा वरना राजा ऐसा कैसे कहेगा कि राज्य पर आक्रमण हो रहा है मैं युद्ध क्षेत्र में नहीं जाऊंगा उसके पास में कोई भी एक्सक्यूज ऐसा नहीं है क्षत्रिय धर्म उसको अलाव ही नहीं करेगा उस समय उसको महल में रहने के लिए किंतु यदि धर्म का ठीक-ठीक पालन करते हैं तो फिर यह भी संभव है किंतु हुआ ऐसा बुद्धिज्म के अस्त चल के समय में कि धर्म का नाम ले रहे हैं और यहां पर जितने भी अनाचार दुराचार सब चल रहा है और यहां पर अहिंसा परमो धर्म की चल रही है तो स्वामी जी एक ऐसा उदाहरण देते हैं कहते हैं कि वहां सिंहल में अर्थात कि आज के श्रीलंका की यह बात है वहां पर स्वामी जी गए थे तो वहां पर अभी यह सही कहा सही घटना है कि स्वामी जी कोई कहानी कहते हैं वह तो मुझे पता नहीं है किंतु स्वामी जी स्वयं इसका उल्लेख करते हैं एक सेठ जी थे बुद्धि उसके घर में रात में एक चोर ने प्रवेश किया अभी वोह चोर की पता नहीं कुछ गड़बड़ हो गई होगी उससे तो तो फिर ये शेठ जी के जो लड़के थे उन्होंने चोर को पकड़ लिया और पकड़ करके उसकी पिटाई करते हैं तो वो शेठ जी सोए हुए थे हल्लागुल्ला सुन कर के वो बाहर में आए अपने कमरे में से देखा कि ये लोग उसको मार रहे हैं चोर को तो शेठ जी चिल्ला उठे अरे अरे ये क्या कर रहे हो क्या कर रहे हो पता नहीं अहिंसा परमो धर्म इसको तो इस तरह से आप मार नहीं सकते चोर को तो ये लड़के लोग तो बड़े आश्चर्य चकित हो गए कि यदि अहिंसा परमो धर्म है तो कैसे अभी इस चोर के साथ में कुछ किस तरह से उसको दंड दिया जाए तो शेठ जी कहते हैं कि अच्छा देखो चिंता मत करो एक बड़े से बोरे में बांध कर के इस चोर को इस चोर को एक बड़े से बोरे में बांध दो फिर इस बोरे को समुंदर में फेंक दो इस तरह से हमको उसको मारने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी और उसको दंड भी मिल जाएगा तो देखिए कि यह बात तो बड़ी-बड़ी करते हैं कि अहिंसा परमो धर्म यहां पे वह चोर को बोरी में बांध करके समुंदर में फेंक देते हैं उसका अर्थ है कि उसका निश्चित मृत्यु है उस में से तो बाहर नहीं निकलने वाला है वह नहीं निकल पाएगा तो स्वामी जी कहते हैं कि इस तरह की बातें करने से कि जब आपको रक्षा करने की जरूरत है उस समय आप धर्म को ले आएंगे तो धर्म पक्का होना चाहिए सिर्फ बातों की बातें नहीं होनी चाहिए वरना तो आपका आचार दुराचार में परिणत हो जाएगा यह ओपन हेमर एक बहुत बड़ा साइंटिस्ट जिसने कि यह एटम बम प्रोजेक्ट मैन हटन अमेरिका में प्रो प्रोजेक्ट मैन हटन अर्थात कि जिस सीक्रेट प्रोजेक्ट के द्वारा न्यूक्लियर बम एटम बम का इन्वेंशन हुआ एटम बम को बनाया गया मैन्युफैक्चर किया गया उसका वह सुपरवाइजर था लीड साइंटिस्ट था तो जब सबसे पहली बार एटम बम का विस्फोट हुआ तो वह ओपन हैमर वहां पर उपस्थित था और उसने गीता का यह श्लोक उसकी आवृत्ति की थी एटम बम के फूटते फूटते ही कि किस तरह से भगवान कृष्णा वो चैप्टर में कहते हैं जो अर्जुन देखता है कि जितने भी योद्धा है जितने भी यह घोड़े सवार है हाथी के ऊपर में सवार है उसके संबंधी है जितने भी है सभी लोग जैसे कि भगवान कृष्ण के विश्वरूप स्वरूप है उनके कराल मुंह में प्रवेश कर रहे हैं उनके मुंह में जैसे कि महा अग्नि ज्वलित है और उनके मुंह में प्रवेश करके ये सभी योद्धाओं का मृत्यु हो रहा है और भगवान कृष्ण अर्जुन को क्या कहते हैं तुमको तो सिर्फ निमित्त होना है इनकी हत्या करने वाला तो मैं हूं अर्थात कि देखिए कि ये सृष्टि स्थिति और संहार ये तीन देवता भारत में हमको पता है कि भगवान विष्णु है सृष्टि को उसकी ये उसकी पुष्टि करते हैं ब्रह्मा जी है सृष्टि की रचना करते हैं भगवान विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं भगवान शिव सृष्टि का संहार करते हैं किंतु सही में देखा जाए तो एक तीन तीन एक ये तो एक ही ईश्वर के तीन स्वरूप है इसी ईश्वर के द्वारा सृष्टि की रचना होती है पालन होता है संहार होता है जैसे कि ठाकुर का वह दर्शन था कि गंगा के किनारे बैठे थे देखा कि एक सुंदर युवती ने गंगा में से बाहर आकर के एक बच्चे को प्रसव किया फिर यही युति कराल स्वरूप धारण करके बच्चे का भक्षण कर लिया तो यही महाकाली सृष्टि की रचना भी करती है और यही महाकाली सृष्टि का भक्षण भी करती है और हम हिंदू लोग ही है कि यह मां काली का जो कराल स्वरूप है जो भयावह स्वरूप है उसकी भी हम लोग पूजा करते हैं काली द मदर स्वामी विवेकानंद की यह पोयम है इसके भीतर में हमने विषद रूप से इस प्रसंग की इस पॉइंट की आलोचना की थी कि किस तरह से यह जो क्रिश्चियनिटी है या जिसको सेमिटिक रिलीजन कहे जाएंगे रिलीजन को यदि दो स्कूल में बांटा जाए तो सेमिटिक रिलीजन और आर्यन रिलीजन तो सेमिटिक रिलीजन अर्थात कि सर्वप्रथम जुडा इजम उसके बाद में क्रिश्चियनिटी और तीसरा है इस्लाम और आर्यन धर्म की बात की जाए तो अपना वैदिक धर्म उसके बाद में यह बुद्धिज्म और अपना यह जैनिज्म अभी यह आर्य धर्म में भी हम कहेंगे कि दो ब्रांचेस है एक ब्राह्मण धर्म है एक श्रमण धर्म है तो ब्राह्मण धर्म में अपना वैदिक रिलीजन आ जाएगा और श्रमण धर्म में बाकी दो आ जाएंगे बुद्धिज्म और जैनिज्म तो हमारे यहां पर यह आर्यन ब्रांच है वह चाहे ब्राह्मण ब्रांच हो ना कि श्रमण ब्रांच हो दोनों में हमने ईश्वर के यह जो सौम्य स्वरूप है और कराल स्वरूप है यह एक ही अंतिम सत्ता के एक ही अल्टीमेट पावर के दो एस्पेक्ट है इस तरह से हम लोग स्वीकार करते हैं जबकि यह सेमिटिक ब्रांच है बाकी तीन रिलीजन उसमें वो ईश्वर को और शैतान को सेपरेट कर दिया है कहते हैं कि ईश्वर और शैतान इन दोनों के बीच में एक महायुद्ध हमेशा से चल रहा है जिसका जब विजय होगा उसकी असर पृथ्वी पर पड़ेगी अर्थात कि पृथ्वी में यह ब्लैक प्लेग यह यूरोप में चला था एक समय ना कि यह वर्ल्ड वॉर ना कि यह न्यूक्लियर वॉर जापान पे एटम बम फेंके यह सब जब समय चल रहा है तो जैसे कि शैतान की विजय होती है और जीसस का जन्म होता है यानी कि ऐसी कोई धार्मिक घटनाएं होती है तो यह भगवान की विजय होती है सो दैट इज देर इंटरप्रिटेशन यह मैं बड़ा ही क्रूडली कह रहा हूं उनका फिलोसोफी वैसे काफी सोफिस्टिकेटेड है किंतु इतना सोफिस्टिकेशन में नहीं जाकर के इतना डिटेल में नहीं जाकर के बेसिक हमको समझ में समझना चाहिए कि अपने यहां पे कराल स्वरूप और सौम्य स्वरूप सृष्टि का सर्जन जन पालन और संहार भले ही चाहे तीन देवता अलग बताए गए हो जो भी हिंदू धर्म का अभ्यास करता है सब कहेंगे कि एक ही अल्टीमेट डिविह्ली इन दोनों के बीच में जैसे कि एक बैरियर जैसी बना दी है दोनों अलग है दोनों को आपको सेपरेटली डील करना होगा तो यह जो हिंदू धर्म में है हिंदू धर्म का जो सबसे बड़े दो ग्रंथ हैं महाभारत और रामायण दोनों को देखिए कि युद्ध के आसपास में वह रचे गए हैं यहां पे महाभारत का युद्ध हुआ है वहां पे वो लंका के ऊपर में भगवान राम ने आक्रमण किया है तो अहिंसा कभी भी हिंदू धर्म का फाउंडेशन नहीं है अहिंसा को यदि देखा जाए तो देखिएगा कि अपने यहां पे दो डिवीजन बड़े ही स्पष्ट रूप से है एक है व्यष्टि धर्म एक है समष्टि धर्म यदि मैं जहां तक मेरा ईश्वर के साथ में संपर्क है उस संपर्क को फॉलो करते-करते मैं अहिंसा का पालन करूंगा तो चलेगा किंतु यदि मैं गृहस्थ हूं कि जद मैं राजा हूं और मेरे परिवार पे या तो राज्य पर आक्रमण होता है तो यदि मैं उसका मुकाबला नहीं करूंगा तो फिर यह गलत बात है मेरी ना मर्दानगी होगी मेरी कमजोरी कही जाएगी यह अधर्म है धर्म नहीं है और यह जो जो धर्म और व्यष्टि और समष्टि दो डिवीजन है इसके पीछे में जो फर्स्ट प्रिंसिपल कार्यरत है ठाकुर का कि ब्रह्मा और शक्ति एक है अभेद है जब स्थिर रहते हैं तो मैं ब्रह्मा कहता हूं जब चलित है कार्य करते हैं सृष्टि स्थिति प्रलय करते हैं तो मैं उनको शक्ति कहता हूं तो यह फर्स्ट प्रिंसिपल से बाकी सब कुछ आता है हम लोग यह ब्रह्म सत्य है जगत मिथ्या है बोलकर के जगत को उड़ा नहीं देते यह उड़ाने का गलती बुद्धिज्म में हुआ था कुछ हद तक जैनिज्म में भी हुआ है यह श्रमण ब्रांच ऑफ रिलीजन है उसमें यह गलती हो गया है अभी देखिए कि यदि हम ठाकुर का उच्च साधक का प्रिंसिपल पकड़े कि पहले तो नेती नेती करके जगत त्याग करना है उसके बाद में जब आपको ईश्वर प्राप्ति होगी तब ईश्वर प्राप्ति ही या तो फिर आप जद निर्वाण प्राप्ति कहे ना कि आत्म साक्षात्कार आत्म दर्शन कहे ना कि ब्रह्म साक्षात्कार कहे कि ब्रह्मज्ञान प्राप्ति कहे जो कुछ भी आप नाम दे वो अल्टीमेट डिवाइन एक्सपीरियंस के बाद में आपको यह जगत उसी का बना हुआ है यह दिखने लगेगा तो जहां तक भगवान बुद्ध या तो भगवान महावीर का जो व्यक्तिगत जीवन था देखिए कि कितनी करुणा थी उनमें कितना कंपेरिजन था इन दोनों के बारे में इतनी सारी कहानियां है वो पारधी एक पक्षी को मारने के लिए आया तो यदि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या है तो भगवान बुद्ध कहते हैं ठीक है मार के ले जाओ पक्षी को किंतु ऐसा नहीं अपनी ही पैर में से पक्षी का जितना वजन है उतना मांस काट कर के पारधी को दे दिया जब वह किसी के घर पर जाते हैं वह उनको वह शुक्र मांस ऑफर किया गया अभी भगवान बुद्ध ने सोचा देखा कि यदि वह ग्रहण नहीं करेंगे तो उसको दुख होगा तो उसको ग्रहण किया पता है कि उनको एक खाने से उनका मृत्यु होगा फिर भी उन्होंने उसको ग्रहण किया ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या कहेंगे तो यह बात नहीं होगी क्यों कौन होता है वह मुझे यह सब पॉइजन अस चीजें खिलाने वाला मैं नहीं खाऊंगा क्या कर लेंगे जगत है ही नहीं मैं तो निर्वाण प्राप्त हो गया है मुझे फिर क्या यह सब मामला है किंतु इन लोगों का निर्वाण प्राप्ति के बाद का एटीट्यूड देखिए ठाकुर का जो उपदेश है कि नेती नेती करके ईश्वर प्राप्ति करना फिर इती इती करके देखना कि वही ईश्वर का वही ब्रह्मण का यह पूरा जगत बना हुआ है बिल्कुल एगजैक्टली दोनों ने फॉलो किया है वही बात है कि बिकॉज कि उन्होंने खुद ने कोई प्रिंसिपल प्रोपाउंड नहीं किया और उनके चेलों ने अपने मन घण कुछ प्रिंसिपल बना दिए उसमें ऐसा आ गया कि सन्यास मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है यह जितने भी धर्म वेदिक धर्म में प्रदर्शित किए गए हैं क्षत्रिय धर्म ब्राह्मण धर्म पितृ धर्म संतान धर्म वगैरह वगैरह सबका त्याग करके मोक्ष मार्ग का आश्र लो जो चार पुरुषार्थ है धर्म अर्थ काम मोक्ष उसमें से मोक्ष पुरुषार्थ का ही आश्रय लेना है धर्म अर्थ काम को त्याग करो अभी यहां पर प्रॉब्लम यही है कि उच्च साधक के लिए तो यह ठीक है मंद या मध्यम साधक के लिए यह बिल्कुल गलत रास्ता है और जितने भी मंद मध्यम साधक थे उन्होंने इस तरह से सन्यास मार्ग मोक्ष मार्ग का आश्रय लिया तो स्वामी जी ही कहते हैं कि मठ में बुद्धि विहार में ऐसा करप्शन प्रवेश कर गया कि धीरे-धीरे करके पूरा बुद्धिज्म उसकी वजह से खत्म हो गया देखिए एक घटना उसी समय की है कि आनंद ने आकर के कहा भगवान बुद्ध को कि स्त्रियां सन्यास लेना चाहती है तो भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया यदि इस तरह से हम उनको सन्यास देंगे तो बुद्धिज्म यह जो बुद्ध बुद्धिस्ट संघ है उसका आयु आधा हो जाएगा क्यों क्योंकि वैसे ही मंद और मध्यम भिक्खू से यह भरा पड़ा है यह विहार सब उसमें भी आप भिखुदन को प्रवेश करवाएंगे तो फिर क्या होगा तो उस समय उन्होंने कहा था कि तो फिर ये कंपेज भी तो है दया भी तो है उस समय देखा कि कुछ-कुछ स्त्रियां थी जो कि सही सही निर्वाण प्राप्ति करना चाहती थी तो फिर भगवान बुद्ध ने आनंद की यह बात स्वीकार कर ली ठीक है चलो स्त्रियों के लिए बुनियो के लिए वि विहार की रचना करो तो यह जो प्रॉब्लम बाद बाद में आए यह थिरी क्लियर नहीं होने की वजह से यह सब प्रॉब्लम आए आज भी देखिए कि हम जब बहुत बार सोचते हैं कि ठाकुर का अप्रोच और स्वामी जी का अप्रोच फंडामेंटली डिफरेंट है ठाकुर कहते हैं पहले जब कालीघाट में जाते हैं तो क्या दक्षिणा वगैरह देंगे क्या हम लोग ऐसा कहेंगे मां काली का दर्शन हो गया तो कि कुछ हॉस्पिटल स्कूले बना दो नहीं हम कहेंगे पहले आपका दर्शन दीजिए आशीर्वाद दीजिए बाद में फिर स्कूल हॉस्पिटल जितना बनाना है बनाते रहो काली घाट प गए तो क्या भिखारियों को दक्षिणा देंगे ना कि पहले मां काली का दर्शन कर लेंगे धक्का मुख करके जो भी हो फिर बाहर आकर के दान दक्षिणा देते रहिए तो ये यह बात पढ़कर के हमको लगता है कि स्वामी जी यह शिव ज्ञान जीव सेवा का अनुष्ठान क्यों किए हैं मास्टर महाज जैसे मास्टर महाशय इस गड़बड़ में असमंजस में फंसे थे फिर वह काशी में थे उस समय जबकि राजा महाराज भी थे मां शारदा देवी भी थी उस समय मां शारदा देवी किरण दत्त महाशय के घर पर रहती थी अद्वेता आश्रम सेवाश्रम देखने के लिए मां का आगमन हुआ देख कर के मां बड़ी ही खुश हो गई फिर कहा फिर वो किसी एक अपने संतान के माध्यम से र की नोट वो वहां पर प्रणा दक्षिणा के लिए पहुंचा दी रोगियों की सेवा करने के लिए तो जैसे ही राजा महाराज को पता चला तो उन्होंने इमीडिएट मास्टर महाशय को पुकारा कहा कि देखिए माने दक्षिणा भेजी है वहां से तो फिर मास्टर महाशय भी कहते हैं एक ु ना मैंने जोनाई अभी अस्वीकार करने का अभी कोई भी मतलब नहीं है अस्वीकार करने से बिल्कुल नहीं चलेगा तो दो चीजें यहां पे एक तो है कि माने मां मां को सभी लोग अल्टीमेट अथॉरिटी के रूप में स्वीकार करते थे वह एक बात है दूसरा कि मां ने खुद ने स्वामी जी के यह कर्मयोग का जैसे कि सराहना की है कर्मयोग को अपनी स्वीकृति दी है तो यह कंफ्लेक्स नहीं है जस्ट बेसिक आइडियाज को हमको क्लियर रखने हैं तो यहां पे भी देखिए यह घटना को फिर से एक बार मैं दोहरा देता हूं कि ठाकुर को कहा गया कि स्नेल उसको जूस बना कर के आपको झोल बना कर के पीना होगा ठाकुर ने मां को कहा तो मां ने कहा अरे तो जीवंत प्राणी है इसकी हत्या मैं कैसे करूंगी तब ठाकुर ने कहा कि क्यों मैं मैं खाऊंगा मेरे लिए करो तब कहीं जाकर ने मां को माने उस नेल को पकड़ कर के ये लोग ले आते थे उसके सर पर ईंट मार कर के उसका जो शेल होता है उसको तोड़ कर के भीतर के प्राणी को उबाल करके जैसे भी हो झोल बना कर के ठाकुर को खिला रही है उस समय मां को जैसे कि यह दर्शन हुआ ना कि एक अनुभूति हुई कि ठाकुर ही अपनी सृष्टि का संहार स्वयं कर रहे हैं देखिए कि अभी एक प्रश्न होगा कि मां इस तरह से एक इसका विरोध क्यों करती है क्योंकि मां तो ठाकुर के लिए मछली बनाती थी मछली का झोल वगैरह बनाती थी हमको पता है कि दक्षिणेश्वर के दिनों का जो वर्णन है उसमें यह स्पष्ट वर्णन है कि वहां पे नबत में मां रहती है छोटी सी जगह पर रहना है वहीं प यह सोने के लिए बिस्तर वगैरह रखा हुआ है साइड के ऊपर में ये चटाई वगैरह और फिर वहीं पर ठाकुर का खाना होता है और छत के ऊपर में से वो जो बास्केट झुला करके रखते हैं वो जो घटी जो झुला करके रखते हैं उसमें पानी भरा है और पानी में मछलियां है तो मछली का झोल ठाकुर को बना कर के खिलाना है तो वो भी तो एक तरह से जीवंत प्राणी है ना उसके बाद में देखिए कि जयराम बाटी की कहानियां बड़ी फेमस है कि जो भी वह भक्त संतान वहां पर जाते हैं तो मां कहते हैं कि यह मां सिंहवाहिनी का महाप्रसाद है तो मैंने खुद ने बनाया है तुम खाओ तो ये लोग कहते हैं मां में महाप्रसाद महाप्रसाद का अर्थ है कि ये बकरे का मांस बकरे को बलि स्वरूप दिया जाता है मां काली को फिर उसको उसका कोई एक टुकड़ा मांस का रंध करके महाप्रसाद होकर के मां को पहले तो ऑफर करते हैं फिर महाप्रसाद ग्रहण किया जाता है तो मां ने कहा मैंने खुद ने महाप्रसाद बनाया है तुमको खाना पड़ेगा मैं जब पहली पहली बार बेलूर मठ में गया था तो काली पूजा के दिन के दूसरे दिन की बात है वो पूछ रहे हैं मुझे जो हम लोग किचन में जाते हैं ना सुबह को अर्ली मॉर्निंग नाश्ता कर ने के लिए तो मां काली का जो ऑफर जो नैवेद्य वगैरह जो भोग ऑफर किया है रात को तो सुबह को सभी साधुओं को देंगे तो मैं जैसे ही मैं बिल्कुल पहला मेरा बेलूरमठ में स्टे था पीपीटीसी में था उस समय की बात है मैं जैसे ही किचन में प्रवेश किया तो पूजा वो जो भंडारी महाराज है पूछते हैं महाप्रसाद खाना है तो यहां पर बैठो नहीं खाना है तो वहां पर बैठो तो पहले तो मैंने सोचा महाप्रसाद तो खाया जाएगा ना तो अच्छी बात है तो मां काली को ऑफर किया होगा तो फिर मैंने सोचा कि महाप्रसाद क्या होता है खीर होता है ना कि क्या होता है तो बोले तुम वहां पे जाके बैठो तुम्हारा काम नहीं यहां पे फिर मैं वो जहां पे बैठा जाकर के मैंने और किसी को पूछा महाप्रसाद क्या है तो बोला बकरे का मांस है मैंने कहा अरे राम तो देखिए कि मां खुद महाप्रसाद बना कर के वो अपने संतानों को खिलाती थी तो फिर यहां पे मां क्यों ऑब्जेक्शन ले रही है पहले तो यदि नहीं मारना है किसी को तो मछली को भी ना मारे बकरे का जो मांस है महाप्रसाद उसको भी ना राधे उसके बारे में मां कोई ऐसा ऑब्जेक्शन नहीं है यहां पर ही क्यों है तो ऐसा है अभी देखिए यह तो थिरी सब अपनी-अपनी है यह सर के ऊपर में ईंट मार कर के उसकी हत्या करना वह शायद मां को अच्छा नहीं लगा होगा महाप्रसाद तो क्या है बकरे का बली वहीं पर मंदिर में दे दिया जाता है और फिर उसका मांस का टुकड़ा ही आता है वहां पे और मछली को तो जैसे कि यह लोग एक तरह से नॉनवेज ही गिना जाता है बंगाल में एक सुंदर घटना है कि पुण्य पुकुर मां के घर के पास में ही जयराम में घर के पास में ही पुण्य पुकुर है तो पुण्य पुकुर में बहुत सारी मछलियां थी तो एक बार अपने शरत महाराज वगैरह कुछ साधू लोग वहां पर गए थे किसी काम से तो एक दूसरे भी महाराज थे तो यह महाराज मां के त्यागी संतान यह कहानी कह रहे हैं तो वो मछली पकड़ने को पुण्य पुकुर के किनारे पर बैठे हैं सोचा कि एक दो मछली पकड़ेंगे और फिर मां को बना कर के खिलाएंगे ना कि जो भी है वहां पे एकाएक शरत महाराज यानी कि मां के द्वारी शारदानंद जी महाराज रामकृष्ण संघ के जनरल सेक्रेटरी ठाकुर के त्यागी संतान स्वामी विवेकानंद के गुरु भाई वो वहां पर आकर उपस्थित हुए देखा कि यह साधु मछली पकड़ रहा है बड़ा जोर-जोर से उत्साह देने लगे अरे और भी पकड़ो और भी पकड़ो तो तो फिर वो साधु सोच रहा है कि जनरल सेक्रेटरी महाराज मां के शिष्य मां के द्वारी व स्वयं कह रहे हैं तो फिर पकड़ लेते हैं मछली बोल कर के बहुत सारी मछली पकड़ ली तो फिर पकड़ ली तो फिर अभी शरत महाराज बड़े ही सीरियस होकर के कहते हैं अरे इतनी सारी मछलियां तुमने पकड़ ली क्या करोगे तुम इस सबका तो ये साधू भी बेचारा डर गया बोला कि महाराज आपी ने तो कहा कि आप ही तो उत्साह दे रहे हैं मछली पकड़ो मछली पकड़ो बोलके मैंने पकड़ लिया अभी मैं क्या करूं आप ही बताइए अभी वो जब शरद महाराज ऐसा सीरियस हो कर के कहेंगे तो वो तो डर ही जाएगा बेचारा तो फिर अभी क्या शरद महाराज का पूरा नाटक है वो पहले ही सब प्लान कर लिए होंगे तो फिर आखिर में वो शरद महाराज कहते अच्छा एक काम करो तो बड़े अच्छे से इसको मछली को भाजा करके वो फ्राई करके मां के जितने भी भाई हैं सब सबको बुला करके बिठा करके खिलाओ पूरी पूरी मछली उसको फ्राई करना उसको काटना बाटना मत तो यह त्यागी महाराज जी जो सेवक महाराज है वह कहते हैं अच्छा ठीक है महाराज जैसा आप कहे फिर उस दिन वह काली मामा वगैरह मां के जितने भी भाई थे परिवार जन थे सबको निमंत्रण दिया गया फिर जो मछली पकड़ी थी पूरी पूरी मछली उसको व फ्राई करके सबको वोह अपने वो पाते में उनके थाली में एकएक करके परोस दी गई तो वो जो मामा मामा ही कहेंगे हम उनको तो मां के भाई है तो काली मामा व वगैरह बड़े आनंद करके करके मछली खा रहे हैं तो शरत महाराज भी खुश हो गए सो वो बोलने लगे कि मामा लोगों ने कभी इतना बड़ा मछली पूरा हुआ फ्राई किया हुआ उन्होंने खाया नहीं होगा कभी भी देखो वो कितने खुश हो गए तो यह प्रश्न हो सकता है कि जब इस तरह से मछली बनना या तो महाप्रसाद बनना तो ये नियमित वो सब होता था रूटीन बातें थी तो फिर यह स्नेल का झोल बनाने में मां को क्या आपत्ति थी तो सही में ये सब कुछ-कुछ प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं होता आप अपनी थिरी चलाते जाइए चलाते जाइए उसमें आप गोल गोल घूम जाएंगे तो मेरे पास में भी ऐसा कोई उत्तर नहीं है इसका अच्छा अभी इसके बाद में दूसरी घटना दूसरी घटना में यह भी एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण घटना है इसके बारे में भी काफी डिस्कस करना होगा गंभीरानंद जी महाराज क्या लिखते हैं त्यागी युवक भक्तगण श्री मां के खन होते की चोखे देखीते तहा रे एकट निदर्शन एक सामान्य घटनाए पाई त्यागी युवक भक्त जो की काशीपुर में रहते थे ठाकुर की सेवा करते थे वो मां को किस दृष्टि से देखते थे उसका एक उदाहरण एक छोटी सी घटना से हमको मिलता है श्री रामकृष्ण एक दिन इहा दिग के बोली लेन तो देर भिखार अनोखे ते इच्छा हो श्री रामकृष्ण ने एक दिन त्यागी संतानों को कहा कि तुम लोग भिक्षा करके लाओ तुम्हारे हाथों से की गई भिक्षा का अन्न खाने की मुझे इच्छा हो रही है इहा श्या श्री जुक्तो नरेंद्रा दी भक्तो गण उल्लासे नाच उठीले जैसा ही ठाकुर ने ऐसा कहा वैसे ही ये उल्लास के मारे आनंद के मारे नरेंद्र वगैरह त्यागी संतान गण नाच उठे क्यों क्योंकि भिक्षा करना सन्यास धर्म का सर्वप्रथम कर्तव्य है यह ठाकुर तिथि पूजा के दिन रात को बेलूरमठ में हम जितने भी ब्रह्मचारी है उस समय जिनके निर्दिष्ट किया गया होगा सन्यास के कैंडिडेट उनको संन्यास दिया जाता है फिर दूसरे दिन से लेकर के तीन दिन तक यह नव सन्यासियों को बिना सिलाई किए हुए वस्त्र पहन करके अर्थात की धोती और यह उत्तरीय यह पहन करके बिना चप्पल के खाली पैर बेलूर मठ में बेलूर मठ के आसपास में जितने भी घर है वहां से भिक्षा लाक के तीन दिन भिक्षा करनी होती है और यह भिक्षा पहले दिन जब लेकर आते हैं तो सर्व प्रथम भिक्षा रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज के क्वार्टर में पहुंचाई जाती है मोस्ट रिवर्ड प्रेसिडेंट महाराज भी उसको थोड़ा सा ग्रहण करेंगे फिर वैसे तो संन्यास कैंप एक अलग जगह पर होता है किंतु जहां पर पंगत में जहां पर बाकी सब साधु बैठकर के प्रसाद ग्रहण करते हैं वहां पर भी यह भिक्षा पहुंचाई जाती है और सभी सन्यासी बड़े ही आनंद के साथ में इसको ग्रहण करते हैं अभी क्या है कि यह प्रथा इतनी फेमस हो गई है कि बहुत बार तो ऐसा होता है कि सबको पता ही है कि कल रात को ठाकुर की तिथि पूजा की रात को सन्यास दीक्षा हुई है तो सुबह से ही मंदिर अ मठ के गेट के सामने ही बहुत सारे गृहस्थ भिक्षा लेकर के खड़े रहेंगे जैसे ही सन्यासी महाराज भिक्षा करने को मठ के बाहर निकले वैसे ही लोग उनको भिक्षा देना शुरू कर देंगे इसलिए बहुत सारे सन्यासी क्या करते थे मैंने भी ऐसा किया था मठ का एक बैक गेट है वहां से हम लोग निकल गए थे पता था कि मेन गेट से बाहर जाएंगे तो वहीं पे बहुत सारी भिक्षा मिल जाएगी तो थोड़ा सा ट्रेडिशनल एक्सपीरियंस किया जाए तो हम लोग ये पिछले वाले दरवाजे से निकले हम चार-पांच लोग थे और फिर वहां पर अलग-अलग घर में जाकर के भिक्षा मांगने लगे किंतु क्या है कि बेलूर मट को तो इतने सालों से है अभी 18971 197 से तो है बेलूरमठ 100 साल से भी ज्यादा सबको पता है कि आज को तो ये भिक्षा मांगने के लिए आने ही वाले हैं तो फिर क्या है वहां पर भी वह गृहस्थ लोग भिक्षा लेकर के तैयार ही खड़े रहते थे और जैसे ही एक घर में भिक्षा मांगने को जाएंगे दूसरे घर से बुलाएंगे महाराज जी यहां पे आइए यहां पे आइए आपके लिए भिक्षा रखी है तो अभी तो क्या है कि यदि आपको सही सही भिक्षा का अनुभव करना है तो नर्मदा किनारे की वहां प जाना होगा तो खैर जो भी है ये पहली बार ऐसा हुआ कि ठाकुर के नाम पर भिक्षा लेने के लिए त्यागी संतान निकड़ है तो ये लोग भी बड़े खुश हो गए कि चलो सन्यास जीवन का सर्वप्रथम स्टेप हमने ले लिया है एक्चुअली देखिए कि दो घटना वहां पर हुई थी ठाकुर ने गिरवा वस्त्र दिया था और ठाकुर ने भिक्षा करने को इन लोगों को कहा था था अभी यह मुझे पता नहीं देखना पड़ेगा कि दोनों में से पहला कौन सा हुआ यानी पहले गिरवा वस्त्र दिया था कि पहले भिक्षा के लिए कहा था कि दोनों साथ-साथ में ही हुआ वो थोड़ा सा मुझे देखना पड़ेगा किंतु यह दो इंपॉर्टेंट घटनाएं हैं कि जिसके माध्यम से ठाकुर ने अपने संघ की फाउंडेशन उन्होंने डाला था तो अभी देखिए कि गेरवा दिया उसको तो हम सभी लोग पहचानते हैं कि हां रामकृष्ण संघ की शुरुआत कब से हुई सभी लोग कहते हैं कि ठाकुर ने वहां पर गेरवा वस्त्र दिया वो बूढ़ो गोपाल महाराज थे बूढ़ो गोपाल महाराज ने कहा कि यह जो गंगासागर के लिए यात्रालू लोग जा रहे हैं उनको देने के लिए मैं गिरवा वस्त्र कमंडल फिर ये जपमाला वगैरह मैंने जुगाड़ किया है तो ठाकुर ने इमीडिएट कहा कि अरे तुम इन लोगों को वो देने को जा रहे हो तो ये अपने जो त्यागी संतान है उससे ज्यादा पवित्र कौन है इन्हीं को दे दो तो फिर ठाकुर ने एक के बाद एक सबको बुला कर के 10 त्यागी संतान थे उस समय उनके पास में तो दसों को गेरवा वस्त्र जपमाला वगैरह दिया था और कहा जाता है कि एक वस्त्र को रख देने के लिए कहा था और ऐसा भी कहा जाता है कि वह एक वस्त्र गिरीश घोष के लिए था जो भी है तो यह एक कहानी अपने संघ में प्रसिद्ध है किंतु यदि ठाकुर ने इस घटना के माध्यम से अपने संघ की स्थापना की है तो दूसरी घटना यह यहां पर जो वर्णन है वह भी इतनी ही महत्त्वपूर्ण है अपने संघ की स्थापना के पीछे में देखिए क्या होता है पहले तो ठाकुर ने कह दिया कि तुम लोग भिक्षा करके आओ मैं भिक्षा का अन्न ग्रहण करूंगा तो यह नरेंद्र वगैरह बड़े ही खुश हो गए और फिर देखिए कि क्या हुआ भिक्षा बाहर होई बार पूर्वे तहा देर मने होलो जे श्री मायर निकट प्रथम भिखा लवा उचित भिक्षा लेने के लिए जब वह काशीपुर गार्डन हाउस से बाहर निकले उसके पहले उनके मन में यह बात आई कि सबसे पहली भिक्षा मां के पास में से ले ली जाए ली जाए तदनुसार तहर निकट उपस्थित होले श्री मां तहादेर पात्रे एकटी टाका सोलो आना अर्पण करी लेन इस तरह से वे लोग मां के पास में भिक्षा करने को आए और मां ने इनके पात्र में एक टाका सोल आना इनके पात्र में रखा देखिए कि रामकृष्ण संघ का प्रथम डोनेशन आज जो 2000 करोड़ का अपना एनुअल टर्नओवर है उसके पीछे में सर्वप्रथम रुपया मां शारदा देवी ने दिया था और इस तरह से रामकृष्ण संघ की स्थापना की थी ठाकुर जितने प्रमाण मने कारण भूत है गेरुआ देकर के कि चलो तुम लोग गेरुआ लो संघ की स्थापना होती है भले ही चाहे यह शब्द वहां पे यूज ना हुए हो किंतु वो गेरुआ प्रदान करने का जो महात्म्य है उतना ही महात्म्य यहां पे मां का एक टाका ₹ रप 16 आने देने का है इस तरह से मां सही सही संघ जननी यहां पर प्रूव होती है ए रूपे प्रतिकार जर प्रथम है तहरा श्री मायर आशीर्वाद भिखा कोरीते एवं स्नेहमयी जननी ओ अका तरे तहा दान करते इसी तरह काशीपुर में रहते रहते ही त्यागी संतानों ने मां के पास में से सभी कार्यों का सभी जो प्रश्न है उनका निराकरण करने का सीखा और इसी तरह से मां बैकग्राउंड में खड़ी-खड़ी इन सबको संचालित करती थी इन सबको आशीर्वाद देती थी चालित करती थी ठाकुरर देहो क्रमश दुर्बल होते छे देखिया के हो मय माण होले तिनी शांतोना प्रदान करी तेन ठाकुर का देह दिन प्रतिदिन असु हो रहे हैं क्षण क्षण हो रहे हैं ऐसा देख कर के यदि कोई त्यागी संतान दुखित हो जाता तो माही जैसे कि इनको सांत्वना प्रदान करती एवं सेवाद विषय कोनो समस्या उदय होले तहा रही परामर्श उहर समा समाधान होई तो और सेवा वगैरा को लेकर के कोई भी प्रश्न खड़ा होता तो मां के ही आदेश के अनुसार मां की ही सलाह के अनुसार उसका समाधान होता वस्तुत काशीपुर प्रतिकार जर पश्चात बर दत्र श्री श्री मायर अदृश्य मंगल हस्त प्रसारित थाक सकले प्राण आशा और आनंदो संचार करीतो सही सही में देखा जाए तो काशीपुर में जितना भी कार्य हो रहा था ठाकुर की सेवा का उन सबके पीछे वरदा आत्री श्री श्री मां किस तरह का शब्द प्रयोग किया है वर दत्र श्री श्री मां का अदृश्य मंगल हस्त अदृश्य मंगल हस्त प्रसारित रहता और सभी के प्राणों में आशा और आनंद का संचार करता तो जिस तरह से ठाकुर का गेरुआ प्रदान करने का महात्म्य है घटना का संघ की स्थापना में उतना ही महत्व है मां का एक रुपया एक टाका देने का वो पहली दक्षिणा प्रथम भिक्षा रामकृष्ण संघ की प्रथम डोनेशन जो कि आज इतना विस्तृत रामकृष्ण संघ पूरे विश्व में प्रसारित हुआ है तो आज यही तक अभी कल से दूसरा चैप्टर लेंगे इसके बाद का ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्रीराम कृष्णर्पण मस्तु त बकरे को भी तो काटने के लिए सर पर ही मारना पड़ता है किंतु क यह सब थिरी हम जितनी भी जाएंगे उसमें उतना ही उलझ जाएंगे कि इसको मारने को मना कर दिया इसको मार रही है तो ये काली मंदिर है ना दक्षिणेश्वर काली मंदिर वहां पर बकरे के लिए बलिदान का स्थान है ना यदि आप दक्षिणेश्वर में गए होंगे तो पहले तो मां का गर्भगृह है इसके बाद में नाट मंदिर है जहां पर सब भक्तगण बैठ कर के भजन कीर्तन करते हैं उसके बाद में बलि स्थान है तो वहां पर बलि स्थान वह मां की नजर के सामने नहीं है तो ठाकुर क्या कहा करते थे कि मां बकरा का बलि देख नहीं पाती है इसलिए उसको यहां पर रखा है हालांकि मां काली नहीं देख पाएगी यह थिरी ठाकुर कहां से ले आए ये तो पता नहीं किंतु ठाकुर ऐसा कहते हैं देखिए जो संहार मूर्ति स्वयं है वोह बकरे का बलिदान ना देख पाए यह ठाकुर कैसे वो सोच सकते हैं कितना पैराडॉक्स कितना है देखिए यह सब पैराडॉक्स का चिंतन हम करेंगे बात कैसा है पता है यह जो फालतू का चिंतन करके हम टाइम निकालते बेटर है कि यह सब चिंतन करें भले कोई उत्तर ना मिले कि एटलीस्ट चलो ठाकुर महा स्वामी जी के चिंतन में समय निकला ये सब प्रश्नों का सही कोई उत्तर नहीं होता है यह अपना चित्त शुद्धि के लिए यह सब ठीक है मजा करें भी बोला ना ठाकुर देखिए ठाकुर ने तो राजा महाराज को कहा कि मजा करने में भी झूठ मत बोलो य तो राजा महाराज एक दिन गए ठाकुर बोलते तुम्हारा सर मैं तुम्हारा चेहरा नहीं देख पाता हूं तुमने क्या दुष्का करके तुम आए हो तो राजा महाराज सोचते हैं हम तो दुष्का का अर्थ समझते थे कि चोरी करना डके करना ऐसा तो मैंने कुछ नहीं किया तब ठाकुर ने कहा तुम झूठ बोले हो क्या तो राजा महाराज बोलते हां मजाक मजाक में झूठ बोला है तो ठाकुर कहते इसलिए मैं तुम्हारा चेहरा नहीं देख पा रहा हूं तो जद मजाक में झूठ बोलने से जद चेहरा नहीं देख पाएंगे ठाकुर व ठाकुर खुद मजाक में झूठ कभी नहीं बोलेंगे यहां पर एक बात ऐसा है कि यह चीजें हमको ये जगत में रहकर कंट्रा इक्ट दिखती है किंतु जब हम हायर लेवल पर चले जाएंगे तो हो सकता है ऑटोमेटिक रिकन साइल हो जाए जैसे लोअर लेवल पर बहुत सारी चीजों में कंट्रक्शन दिखता है जैसे गवर्नमेंट का 10 ऑर्डिनेंस यहां पर आप लोकल लेवल पर देखेंगे लगेगा कि 100 अलग-अलग दिशा में जा रहे हैं और दिल्ली में जिसने ऑर्डिनेंस पास किए होंगे कुछ अच्छा सोच कर के ही किए होंगे वो समझ में नहीं आ रहा कि ग्राउंड लेवल पर सब गड़बड़ हो रहा है अधिकारी भेद भी और माइलस्टोन भी इवन यदि उच्च अधिकारी भी है जैसे नरेण है व ठाकुर की बहुत सारी बातों को नहीं समझ पाता था बाद बाद में वह समझा यानी किस माइलस्टोन पर आप खड़े हैं शुरू शुरू में नहीं समझ में आएगा बाद बाद में धीरे-धीरे करके बहुत सारा समाधान आप अपने में होता जाएगा मैंने भी इसके बारे में सोचा है की है यहां पे स्वामी जी स्वामी जी ही है जो कि सर्वप्रथम मां को सही स्वरूप क्या है वह उन्होंने पहचाना था इसी घटना में देखिए कि नरेंद्र आदि ऐसा लिखा है कि नरेंद्र ने मां के पास में जाकर के पहल की थी कि भिक्षा मांगने की बाद में भी जब स्वामी जी अमेरिका गए थे तो पहले तो जब प्रव्रज्या के लिए जब निकले थे तो मां उस समय कलकाता में थी तो मां के पास में से आशीर्वाद लेकर के निकले और जब अमेरिका जाने वाले थे तो मां का आशीर्वाद मांगने के लिए पत्र लिखा था तो सब कुछ स्वामी जी के ऊपर में आ जाता है अ अभी प्रश्न है कि स्वामी जी को यह रियलाइफ हुआ अभी स्वामी जी का ठाकुर के साथ में बिहेवियर देखिए और मां के साथ में देखिए ठाकुर की वो खुलेआम कभी-कभी कटाक्ष करके थे वो ठाकुर के सामने वाद विवाद करते थे ठाकुर के दर्शन मन का भ्रम है ऐसा खुलेआम बोल कर के घूमते थे वो ठाकुर ने वह चातक पक्षी की बात की तो कहा कि अरे तो चमगादड़ है तो ठाकुर भी बेचारे टेंशन में आ गए थे उमा काली के मंदिर में जाकर रोना शुरू कर दिया था कहता है नरेद कहता है ऐसा तो मां ने कहा कि उसको क्या पता तो फिर ठाकुर आकर के नरेद भी नाराज हो जाते हैं साला तुम जो बोलोगे भी सुनूंगा नहीं तो नर ठाकुर के साथ में नरेंद्र का यह जो उनको स्वीकार करने की जर्नी है दैट इज वेरी क्लियर कब उन्होंने स्वीकार किया आखिरी घड़ी में जब वो बैठे थे ठाकुर के सामने ठाकुर इतने बीमार थे उस समय नरेंद्र ने मन में सोचा इस समय यदि कहते हैं मैं अवतार हूं तो भी मैं सोचूंगा कुछ तो ठाकुर ने इमीडिएट मन की बात समझ ली तो दैट जर्नी इज वेरी क्लियर ऑन द अदर हैंड देखिए कि ठाकुर ने नरेंद्र को एस सच फॉर्मली मा को इंट्रोड्यूस नहीं किया था किनको इंट्रोड्यूस किया था बूढ़ो गोपाल महाराज को और लाटू महाराज को लाटू वहां पर वो बैठा था गंगा के किनारे व जप कर रहा था तो ठाकुर ने आके कहा अरे मां देखे वहां पे है नबत में वो रोटी के लिए वो आटा वो उसको मागना है तो तुम जाकर हेल्प करो फिर ठाकुर लाटू महाराज को लेकर मां के पास में आए बूढ़ो गोपाल महाराज को लेकर मां के पास में आए कहा कि वो शॉपिंग वगैरह करना है तो बूढ़ो गोपाल महाराज हेल्प करेंगे और घर का कुछ भी काम है तो लाटू महाराज हेल्प करेंगे ऐसा करके इन दोनों को इंट्रोड्यूस करवाया था नरेंद को इंट्रोड्यूस करवाया हो मां के पास में जाकर के इस तरह का का कोई घटना या प्रसंग एटलीस्ट मुझे तो याद नहीं है सो हाउ दिस नरेण केम टू एक्सेप्ट मां शारदा देवी व्हिच इज रियली अ पजल कि ठाकुर के साथ में इवन यह घटना के बाद में भी मां के पास में जो एक रुपया जब लिया उसके बाद में तो व आखिरी समय था कि ठाकुर के मन में अभी भी संदेह है सोच रहे हैं यही राम है ना कि कृष्णा है राइट तो मां के साथ में नरेण का ट्रेजक्ड इज कंपलीटली डिफरेंट टू श्री राम कृष्ण हिज रिलेशन विद श्रीराम कृष्णा यहां तक कि जब वह यहां पर सेकंड टाइम अमेरिका गए थे रिजली मैनर में रह रहे थे उस समय उनके मन में बहुत सारी घटनाएं क्लियर हो रही है कि हां वो उस समय कहते हैं कि मैंने व्यक्तियों का जो चरित्र का असेसमेंट किया है बहुत बार गलत निकला है ठाकुर जब असेसमेंट करते हैं तो कभी गलत नहीं निकला वह सब रियलाइफ हिज लाइफ जैसे कि ठाकुर को स्वीकार करने की उनकी लाइफ लोंग जर्नी थी ऑन द अदर एंड मां को जैसे कि पहले ही बार में पहले ही समय से स्वीकार कर लिया नरेंद्र वोल अमेरिका से पत्र लिखता है कि पहले मां का मठ होगा बाद में संतानों का मठ होगा वह जो सजीस ऑफ इंडिया में कहते हैं को रामः कौन है राम सीता ही तो है जो कि सर्वशक्ति मई है तो इज अ वेरी इंटरेस्टिंग कंट्रक्शन राइट कि ठाकुर को स्वीकार करने की उनकी लाइफ लंग ट्रेजे क्ट्री रही है जबकि मां को उन्होंने फ्रॉम डे वन स्वीकार कर लिया है वो विज्ञान महाराज की घटना है कि विज्ञान महाराज को कहा जाओ मां को प्रणाम करके आओ तो विज्ञान महाराज जाकर खड़े खड़े नहीं कि ऐसा कुछ प्रणाम कर रहे है पीछे मुड़ के देखा तो स्वामी जी खड़े बेचारे घबरा गए तो नरेण कहता है शक पेसन साष्टांग को प्रणाम करो ये क्या कर रहे हो तुम साष्टांग प्रणाम करो सो अपने संघ में भी इवन दूसरे गुरु भाइयों को भी मां का महत्व समझाने वाले थे वो स्वामी जी थे सो हाउ कम स्वामी जी एक्सेप्टेड मदर फ्रॉम द बिगिनिंग या तो फिर उनके मन में कोई द्विधा है और कोई इवेंट्स हुई है उनकी कोई ट्रेजक्ड हुई है आई डू नॉट नो क्योंकि इस तरह का कहीं प भी मैंने नहीं पढ़ा है जब जहां पे भी नरेण का और मां का रिलेशन हमने देखा है पहले ही दिन से जैसे कि स्वामी जी ने मां को संपूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है और बाद बाद में जिनके भी मन में संदेह था वोह संदेह का निराकरण नरे ने ही किया है सो स्वामी जी इज द मिसिंग लिंक बिटवीन मदर एज अ गुरु पत्नी एंड मदर एज अ जगत जननी बट हाउ स्वामी जीस ओन ट्रेजेडी इवॉल्वड आई डू नॉट नो ऐसी कोई घटना हमको देखने को नहीं मिलती कंट्रास्ट देखिए ना ठाकुर का और मां के साथ में दोनों के रिलेशन का ठाकुर को स्वीकार करने के लिए जिनको लाइफ लंग जिनको जर्नी करनी पड़ी वह मां को ऐसा फट करके स्वीकार कर लेंगे ट मींस वट कोई बहुत बड़ा कुछ हुआ होगा स्वामी जी ने कभी कुछ बोला नहीं है बहुत अच्छी बात है कि मां स्वामी जी को खाना खिलाती थी बढ़िया और स्वामी जी ने सोचा जो इतना अच्छा खाना बना सकती है व जगत जन्नी हो सकती है किंतु मां पर कभी संदेह किया हो और संदेह का निराकरण हो गया हो और फिर नर ने मां को स्वीकार कर लिया हो इस तरह की एक भी घटना अपने लिटरेचर में नहीं है मां के बारे में स्वामी जी बड़ा ही कम बोलते हैं ठाकुर के बारे में स्वामी जी ने जितना बोला है और अपना संदेह उन्होंने सबके सामने स्वीकार किया है वह उन्होंने मां के साथ में कभी नहीं किया यदि संदेह होगा भी तो उन्होंने कभी कहा नहीं कि इस घटना से मेरा एक इवोल्यूशन हुआ म न तो जा बिल्कुल ठीक है कि इवन स्वामी जी भी मां का चेहरा शायद आखिरी तक नहीं देख पाए स्वामी जी को तो छोड़ ही दीजिए शरद महाराज का कि शरद महाराज के सामने मां घुम नती थी शरद महाराज जब प्रणाम करने को जाते मां घुम टान के बैठी है फिर शरद महाराज जब बाहर आते तो नाराज होकर कहते आमी जनो बेटी शसुर मैं जैसे कि उनका ससुर हूं इस तरह से घुमता नती है फिर आखिरी आखिर में मां का जब देहांत हो रहा था उस समय मां को पता था कि शरत के मन में यह एक है कि मैं उनके सामने घूमता टान हू तो आखिर में जब बालिका स्वरूप है मां का वो उस समय नाराज होकर के कहती थी यह थर्मोमीटर वो बगल में थर्मोमीटर देना तो मां कहती है काठी दाओ मने लकड़ी दो बगल में फिर यह खाओ वो खाओ यह सब क्या है मैं नहीं खाऊंगी नहीं थर्मोमीटर लगाओगी फिर वो शरद महाराज को कंप्लेन गई शरद महाराज आए तो फिर मां घुमता नहीं टानीज के है कि बेटा देखो यह सब मुझे इतना परेशान करते हैं तब शरद महाराज एकदम छोटी बच्ची को जैसे मनाते हो वैसे ही मां को फिर उन्होंने अपने हाथों से वोह खाना खिलाया था तो शरद महाराज कहते हैं मेरे मन में जो यह था आखिरी समय तक वो माने जैसे कि उसको भंग कर दिया तो शरद महाराज ने यदि मां का चेहरा नहीं देखा हो आखिरी समय तक तो डाउट है कि स्वामी जी ने देखा हो सो दैट वे यू आर राइट वो उसमें भी है ना वो रामायण में है कि वो मां सीता के गहने वो लक्ष्मण को दिखा रहे हैं कि मां का गहना है कि क्या है तो गले का हार तो बोला कि गले का हार तो पता नहीं मैं बता नहीं पाऊंगा मां सीता का है कि नहीं क्योंकि मां का चेहरा तो मैंने कभी देखा नहीं किंतु ये जो पैरों का जो घुंघरू है वो मैं बता पाऊंगा पायल क्यों क्योंकि मैं उनके पैरों के उनको पैरों के सामने में नतमस्तक हो कर के प्रणाम करता था इसलिए मुझे पता है कि ये मां सीता की पायल है तो ये अपनी ट्रेडिशनल भी थी गिरीश घोष का था एक प्रसंग कि अपने घर की छत पर गया है देखा कि वहां बलराम मंदिर के छत के ऊपर में मां बैठी है तो इमीडिएट नीचे आ गया क्यों मैं बोलता है मेरे पाप चक्षु है पाप नेत्र है इस नेत्रों से मैं मां का दर्शन नहीं करूंगा तो किंतु ऐसी एक भी घटना जद होगी भी जद मान लीजिए कि मां ने दुर्गा के रूप में स्वामी जी को दर्शन दिया भी होता तो ठाकुर ने तो स्वामी जी को कितने दर्शन दे दिए हैं वह तो पहले ही दिन दर्शन से ही शुरू हुआ है ठाकुर के दर्शन ठाकुर ने जो दर्शन करवाए उस परे विश्वास नहीं माने दर्शन करवाए विश्वास हो गया मुझे नहीं लगता दर्शन कोई कारण भूत है स्वामी जी वाज यूज टू हैव दर्शन एटस वो दर्शन को तो लुसिन बोल के उड़ा देते थे समथिंग एल मस्ट समथिंग एल्स मस्ट बी देयर किंतु वो क्या है वी डू नॉट नो मां कहती है कि शरत आमार वासु कीर मत शरत मेरा जैसा वासुकी नाग की तरह है सब जैसे कि अपने वह उसमें वह आवरण उसको यह करके प्रोटेक्ट करके रखता है सबको पूरे स को साधु सन्यासियों को सबको ये शरद महाराज का जब महा समाज हुई ना फिर उनकी डायरी यह डायरी इन सबके हाथ में आई तो लिखा है उसमें कि आज न घंटे तक ऐसा बस ऐसा ही कुछ सामान्य सामान्य एंट्री है तीन घंटे तक समसा बस ऐसा ही कुछ लिखा है सामान्य तरीके से वो सोचा कि तीन घंटे तक क्या आज सुबह को फिर दूसरे दिन लिखा है चार घंटे तक क्या अर्थ है फिर पता चला कि चार घंटे तीन घंटे वह समाधि में रहते थे दिव्य उनको अनुभूतियां होती थी ऐसा वो आखिरी आखिर में प्रतिदिन इस तरह की उन्होंने एकदम सामान्य रूप से लिखा है तीन घंटा आज आनंद हुआ ना कि ऐसा कुछ तब पता चला कि अरे बाप रे प्रॉब्लम हमारे ऑर्डर में क्या है कि देखिए आदर्श इतना उच्च है कि इवन जैसे आपने कहा शरद महाराज को अप्रिशिएट करना अभी थोड़ा मुश्किल हो जाता है कहां मां ठाकुर स्वामी जी है अभी कौन दूसरे को याद करेगा लाइक अ रोरिग सन उनके सामने आप बहुत बड़ी थाउ वोट की फ्लड लाइट भी लगा दे को फर्क नहीं पड़ने वाला जब तक ठाकुर महा स्वामी जी है अभी शरद महाराज राजा महाराज इनका जीवन भी जैसे फीका पड़ जाता है इनके सामने क्या करेंगे