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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

दैवाधीन : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 23 May 2024

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ओ स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्मा स्वरूप अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित प्रकरण है देवाधि और समय है शोड़ी पूजा के बाद का मां वहां की आबोहवा ऐसी है दक्षिणेश्वर की गंगा का गंगा की हवा है बार-बार डिसेंट हो जा रहा है और इसकी वजह से पहले तो शंभू बाबू ने मां का ट्रीटमेंट लेने मां को ट्रीट करने का मां की ट्रीटमेंट देने का प्रयास तो किया अच्छे से वैद्यराज को बुला कर के किंतु फिर भी अभी पता नहीं जो भी कारण हो मां को प्रॉपर ट्रीटमेंट नहीं मिल पा रही थी या तो फिर यह रोग का स्वरूप इतना भयावह हो गया था कि उससे कोई ट्रीटमेंट से फर्क नहीं पड़ रहा था तो मां कभी जयराम बाटी जाएगी और जयराम बाटी में और दूसरी समस्या है कि श्यामा सुंदरी देवी मां के पिताजी रामचंद्र का निधन हो गया था और उनकी माता जी श्यामा सुंदरी देवी के पास में इनकम का दूसरा कोई स्रोत नहीं था दूसरा कोई सोर्स नहीं था तो बेचारी क्या करेगी अपने बच्चों को कैसे खिलाएगी कैसे पिलाए गी कैसे उनकी पढ़ाई लिखाई करवाएगी तो इसकी वजह से श्यामा सुंदरी देवी को वहां पर जो धनी परिवार थे उनके वहां से काक परिश्रम करके कुछ कुछ काम करके जैसे कि धान भुनना वगैरह है यह सब काम करके गुजरान चलाना पड़ता था और अपने लड़के थे उनको अपने रिलेटिव्स के वहां पर संबंधी के वहां पर व भेजना पड़ा क्योंकि अपने घर में तो खाने को है नहीं तो एटलीस्ट चाहे किसी रिलेटिव के वहां पर जाए और वहां पर जाकर के कुछ खाना मिले तो अच्छा है पढ़ाई लिखाई जदी हो पाए तो अच्छा है तो जयराम बाटी में यह अवस्था और दक्षिणेश्वर में बीमारी जयराम बाटी में गरीबी मां बेचारी कभी जयराम बाटी आएगी तो कभी दक्षिणेश्वर जाएगी तो यह सुन कर के ठाकुर क्या क कते हैं ताई तोरे हृदय व केवल आश बे आर जाबे मनुष्य जन्मेर किछु करा होई बेना मां सिर्फ आएगी और जाएगी मनुष्य जीवन का जो कर्तव्य है उसका कब पालन होगा उसका कुछ हो नहीं पाएगा कभी कुछ हो नहीं पाएगा प्रश्न करते हैं मनुष्य जन्मेर किछुई करा होवे ना मनुष्य जीवन का जो कर्तव्य है उसका पालन नहीं कर पाएगी अभी जब ठाकुर ऐसा बोलते हैं तो हमारे मन में भी प्रश्न होता है कि मनुष्य जीवन का कर्तव्य क्या है आप क्या सोचते हैं कि मनुष्य जीवन का कर्तव्य ईश्वर प्राप्ति है अरे नहीं मनुष्य जीवन का कर्तव्य है अपनी जो भी आशाएं हैं निराशा एं हैं आकांक्षाएं हैं सब कुछ तो ईश्वर के चरणों में बलि स्वरूप दे देना सब संपूर्ण रूप से शरणागत हो जाना अपना जो अहम है कि हां मैं यह चाहता हूं या तो मैं यह करूंगा या तो मैं यह प्राप्त करना चाहता हूं या तो यह मेरी यह एंबिशन है सब कुछ ईश्वर के चरणों में दे देना यही तो सबसे बड़ा मनुष्य जीवन का यह तात्पर्य है आप क्या सोचते हैं कि मैं चाहता हूं कि मुझे ईश्वर प्राप्ति हो और मैं साधना करूंगा इससे क्या मुझे ईश्वर मिलेंगे मेरी ऐसी तो कौन सी शक्ति है जिससे कि मैं साधना करके ईश्वर को प्राप्त कर सकूं मेरे हाथ में जो है साधना तो करना ही है नो डाउट यह कर्म ज्ञान भक्ति ध्यान यह साधना अवश्य करनी है किंतु साधना से भी सबसे आगे यह बात रखनी है याद कि ईश्वर यदि दर्शन देते हैं तो अपनी प्रसन्नता से दर्शन देंगे अपनी कृपा से दर्शन देंगे इसके लिए नहीं कि हमने 10000 जप कर लिए एक साल बैठकर के प्रतिदिन में 10000 जप करता हूं इससे भगवान ने खुश होकर दर्शन दिया नहीं है आप लाखों लाखों जप कर ले ईश्वर का दर्शन देना ईश्वर की कृपा पर निर्भर है मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी प्राप्ति है शरणागति और यहां पे मां ने क्या किया है ठाकुर को असुविधा ना हो ठाकुर यह चिंता में ना पड़ जाए कि अरे मां बीमार है तो मां की ट्रीटमेंट करनी पड़ेगी इसके लिए मां पता है कि जयराम बाटी की कैसी दुरावस्था है फिर भी दक्षिणेश्वर छोड़ कर के जयराम बाटी जाती है और जयराम बाटी से दक्षिणेश्वर इसलिए चली आती है पता है कि दक्षिणेश्वर जाएगी तो बीमार होगी किंतु फिर भी दक्षिणेश्वर इसलिए चली आती है कि जयराम बाटी में रहेगी तो श्यामा सुंदरी देवी को कष्ट होगा कि अपनी बच्ची को क्या खिलाएंगे वो टेंशन में आ जाएगी कि अरे मेरे लिए मेरे घर में खाने को कुछ नहीं तो मैं अपनी बेटी की कैसे संभाल रखूंगी तो यहां पर पति को चिंता ना हो इसके लिए मां के घर चली जाती और वहां पर मां को चिंता ना हो इसके लिए पति के घर चली आती है यह है हमारी मां शारदा अपना जीवन अपनी आकांक्षाएं अपनी आशाएं संपूर्ण रूप से उन्होंने ईश्वर के चरणों में अपने पति देव के चरणों में उन्होंने समर्पित कर दिया है इससे बड़ा मनुष्य जीवन का क्या उद्देश्य हो सकता है क्या तात्पर्य हो सकता है यह समझ कर के भी नहीं समझने वाले ठाकुर मुंह से ऐसा बोल देते हैं कि अरे हृदय वो सिर्फ आएगी और जाएगी मनुष्य जीवन का जो कर्तव्य है उसका पालन कब करेगी उसका क्या कुछ नहीं होगा तो पता नहीं कि ठाकुर किस भाव में यह सब बोले हैं किस मूड में यह सब बोले हैं किंतु मां के संतान होकर के जब ठाकुर को मां के बारे में ऐसा कुछ बोलना बोलते हुए सुनते हैं तो हमारे हृदय को धक्का अवश्य लगता है तो जो भी है वह ठाकुर है तीनों लोगों के स्वामी है तो वो जो चाहे बोल सकते हैं उनकी इच्छा हम तो कुछ कह नहीं सकते कि भाई ठाकुर आप ऐसा मत कीजिए मां के बारे में हमको तो क्या है कि अपने हृदय की पीड़ा अपने हृदय में ही रखनी है अच्छा अभी गंभीरानंद जी महाराज आगे लिखते हैं किय रोग से आक्रांत होकर के मां के साथ में फिर क्या हुआ यहां पर देखिए कि इस बार मां जयराम बाटी आ चुकी है और जयराम बाटी में पीड़ा पुनरा आक्रमण काले श्री मां के घनो घनो सचे जाते होतो जयराम बाटी आकर के यह डा जेंटर का फिर से आक्रमण हुआ और मां को बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता था अथ च शरीर ए तो शीर्ण और दुर्बल होया पड़िया छलो जे बारंबार गमना गमने कष्ट होई तो इतना करने के बावजूद यह जो डे जेंट्री की वजह से शरीर इतना दुर्बल हो गया है कि बार-बार सोच के लिए जाने के लिए भी उनको बड़ा कष्ट होता था ताई गृह पार्श्व स्थ कलु गड़र पाड़ सुया थाकी पेन इसीलिए मां क्या करती थी पास में ही कलू गेड़े बोलकर के एक तालाब है उसके किनारे सोती रहती थी सेही समय पुकुरर जोले निजर अस्थि चर्म सार शरीर प्रति क् भी देखिया तहर एमन मने होया छलो बार-बार सोच जाना पड़ता है इससे कि डिहाइड्रेशन हो जाता है डिहाइड्रेशन होने की वजह से शरीर पूरी हड्डियां दिखने लगती है तो अस्थि चर्म ससार यह शरीर माने यह तालाब के किनारे सोते सोते पानी में जो अपना प्रतिबिंब है वह देखा देखा कि हड्डियां दिखाई दे रही है शरीर में तो माने यह देख कर के सोचा अरे छी ए दे हो यह देह तो बे आर केनो फिर अभी क्या प्रयोजन है इस तरह का देह की हड्डी पसलिया दिख रही है सौंदर्य पूरा नष्ट हो जा रहा है तो इस तरह का देह रखने से क्या प्रयोजन है एखा नहीं देहो टी थाक देहो छड़ी देह भले चाहे इस तालाब के किनारे ही पड़ा रहे मैं देह छोड़ कर के वापस चली जाती हूं देखिए आद्या शक्ति जगदंबा जगत के कल्याण के लिए अवती हुई है पति की सेवा के लिए प्रति पति के प्रयोजन के लिए कि उनको उनकी साधना में विक्षेप ना हो उनकी ईश्वर चिंता सतत तैल धारा वत योग शास्त्र में लिखा है कि ईश्वर चि तैल धारा वत होनी चाहिए अर्थात कि एक पात्र में से दूसरे पात्र में जब आप तेल डालते हैं तो कैसा बिना किसी विक्षेप के वह तेल की धारा पर गिरती है तो वैसे ही बिना किसी विक्षेप के ईश्वर चिंतन चलना चाहिए यह योग शास्त्र का निर्देश है तो यह योग शास्त्र को फलीभूत करने के लिए वह सही है उसके भीतर में सार है यह जगत को दिखाने के के लिए जगत के आदिश्वर श्री ठाकुर स्वयं प्रकट हुए और यह साधना कर रहे हैं और उनकी यह तैल धारा वत साधना में थोड़ा सा भी विक्षेप ना पड़े इसके लिए मां आध्या शक्ति जगदंबा अपने गांव वापस चली आई किंतु यह जो बीच-बीच में यह मनुष्य देह और यह डिविली ये आध्या शक्ति स्वरूप और मानवी स्वरूप ये दोनों की बॉर्डर लाइन प ये तो रहती है तो कभी-कभी मन में संशय जागृत होता है कि यह शरीर का क्या प्रयोजन है आखिर में यदि यह शरीर लोक कल्याण के लिए आया है तो मैं तो लोक कल्याण नहीं कर रही हूं मेरे जो रिलेटिव्स है मेरे जो स्नेही जन है मेरे जो परम प्रिय आदरणीय लोग हैं उनके मन को तो सिर्फ मैं कष्ट ही दे रही हूं जयराम बाटी आती हूं तो मां को कष्ट कि बच्ची को क्या खिलाएंगे बिटिया की कैसे संभाल रखें दक्षिणेश्वर जाएगी तो पति को कष्ट के बेचारी वह दुख में है तो मैं कैसे ईश्वर चिंतन करूंगा तो यह कष्ट देने की बजाय यदि जगत कल्याण नहीं हो रहा तो इस देह का क्या प्रयोजन है मां जगदंबा के मन में भी कभी-कभी यह संशय जागृत हो सकता है एखानी देहो थाक देहो छड़ी यह देह भले ही चाहे तालाब के किनारे पड़ा रहे देह छोड़ कर के मैं चली जाती हूं परे तिनी बोलिया लेन बहुत दिनों के बाद में जब अपने भक्तों के साथ में मां बैठी हुई थी तब मां ने बताया था मां ने अपने मुंह से उस घटना का वर्णन किया था आमार असु केर समय मेरे असु का अर्थात की मेरी बीमारी का वोह समय था तखन शोब शरीर फूले गए छ पूरा शरीर जैसे कि फूल गया था ब्लोटिंग जैसा हो गया था नाक कान दिए रोश छोर छे नाक और कान में से रस निकल रहा है उमेश अर्थात की मां का भाई उमेश ने कहा दीदी खाने सिंह वाहिनी आन हत्या देवे उमेश यानी कि मां के भाई ने कहा दीदी यहां पर सिंहवाहिनी देवी है क्या उनके सामने धर दोगी क्या जब सब उपाय विफल हो जाए तो ईश्वर के अलावा और क्या हमारे मददगार है इस जगत में ईश्वर के अलावा और कौन है हाथ धरने वाले देखिए कि सिंहवाहिनी स्वयं सिंहवाहिनी के सामने धरना दे रही है यह कैसा यह मां का जीवन का यह लीला है श यामा के राजी कोरे धरे गेलो यह मां का भाई उमेश उसने मां को राजी करवाया कि हां सिंहवाहिनी के सामने धरना दो और वही मां का हाथ पकड़ कर के मां का गाइड करते करते मां को ले गया क्योंकि आंख और कान में से तो रस निकल रहा है दिख भी नहीं रहा है तो मां बेचारी कैसे जाएगी शरीर पूरा अस्थि चर्म सार क्षय हो चुका है तो शरीर में ताकत भी नहीं तो उमेश ही मा को लेकर के गया पूर्णिमा रात आमार काछ अमावस्या पूर्णिमा की रात है किंतु मेरे लिए है अमावस्या क्यों चोखे देखते पाई ना जोल पड़े पड़े चखू गछ आंख से दिख नहीं रहा है आंख में से यह रस यानी कि जल गिरते गिरते आंख बिल्कुल चली गई है आंखों से कुछ दिखाई नहीं दे रहा अमावस्या की पूर्णिमा की रात हो गई है मेरे लिए अमावस्या की रात गए मायर माड़ो ते पड़े रल जाके मां के मंडप में पड़ी रही आबार अमाशा जाके पड़ी तो रही किंतु फिर अमाशा तो फिर भी है डा जेंटली तो लगी ही हुई है तीन चार बार हा तोड़े हथोड़े रात्रे शौच गेल तीन चार बार रात को ही शौच के लिए जाना पड़ा और हथोड़े हथोड़े अर्थात कि आंख से दिखाई तो नहीं दे रहा यानी कि हाथ आगे रख कर के मां जा रही है जैसे किसी चीज के साथ में टकरा ना जाए अभी मां के हाथ ही है मां की आंखें बिखे मां छीलो ओई खानी तार घर मां को जिसने प्रथम भिक्षा दी थी उसको कहते हैं भिक्षा मां तो व भिक्षा मां थी मां की और उनका घर वही पर पास में था से माझे माझे गला खें कारी दी तो आमी भोई ना पाई वह बीच बीच में गले से खोक करती जिससे कि मां को डर ना लगे पड़े रल वही पे में पड़ी रही किछु खण परे अर माके सेसे बोल छन कामर देर एकटी मेयर बेसे राधु मतो अतो बड़ो मेटी कुछ समय के बाद में ही मेरी मां को आकर के कहती है लहार की लड़की की तरह राधु की उम्र की होगी 13 14 साल की 12 13 साल की देखिए मां ने कितना सहज रूप से कह दिया कि मैं वहां पर पड़ी रही और कुछ ही क्षण के बाद में कुछ ही समय के बाद में मेरी मां को आक के कहती है कौन आकर के कहती है उनकी मां को मां जगत धात्री मां सिंहवाहिनी स्वयं मां सिंहवाहिनी स्वयं एक छोटी लड़की का स्वरूप धारण करके लुहार की लड़की का स्वरूप धारण करके 12 13 साल की आ को श्यामा सुंदरी देवी को अर्थात की मां की मां को कहते हैं जाओ जाओ उठिए अनुग जाओ जाओ मां मां को लेकर के आओ अपनी बिटिया को लेकर के आओ अशोक ताके फैले रखते उसको इस तरह की भयावह बीमारी है क्या उसको मां के मंदिर में पड़ी रहने दोगी एक खून नहीं आनो ग अभी जाकर के लेकर आओ ही औषध दियो तेही भालो होए जावे यह औषध दो इसी से मां ठीक हो जाएगी िक आमा के बोलले अब यहां पर यह तो जाकर के सिंहवाहिनी ने मां की मां को बोला कि अरे त यहां पर सोई हो तुम्हारी बिटिया वहां पर मंदिर में धरना दे रही है इसको अपनी प्राण से भी प्यारी बिटिया को इस तरह से क्या पड़ी रहने दे सकती हो जाओ उसको लेकर के आओ और यह औषध देना और यहां पर सिंहवाहिनी देवी मां को आ करके कहती है लाव फूल नून दिए रगड़े तार रोज चोखे फूटे दियो फोटा फोटा करे दियो लाऊ अर्थात की लोकी का फूल उसमें नमक मिला कर के उसका एक एक टीपा अपनी आंखों में देना भलो होए जावे अच्छी हो जाओगी तार परोर मा जे औषध पलेन ताई नीलम उसके बाद में माने जो औषध पाया था वही मैंने लिया आर लाव फूले फूट चोखे दिलम और लाव फूल का जो एक एक टीपा आंखों में दिया अभी यहां पर मां क्या कहती है पता है मां कहती है कि श्यामा सुंदरी देवी को सिंहवाहिनी ने औषध दिया था तो पहले वह लिया और उसके बाद में यह लोकी के फूल को नमक के साथ में मिलाकर के उसका एक एक टीपा अपनी आंखों में डाला तो यहां पर प्रश्न हो सकता है कि सिंहवाहिनी देवी ने एक औषध खुद एक दवाई खुद क्या श्यामा सुंदरी देवी को दी था यह तो एक बहुत बड़ा चमत्कार हो गया दर्शन तो हमको समझ में आता है कि चलो सिंहवाहिनी ने आकर के मां को दर्शन दिया और दर्शन में आकर के कहा कि यह लौकी के फूल को नमक के साथ में मिलाकर के एक एक टिपा लेना तो यह तो समझ में आता है दर्शन बड़ा ही एस्टाब्लिशड मेथड है अपने धार्मिक साहित्य में आध्यात्मिक साहित्य में किंतु यहां पर तो एक स्टेप आगे बढ़ करके सिंहवाहिनी देवी ने एक औषध लाकर के श्यामा सुंदरी देवी को दिया है तो एक मटेरियल एक चीज उसको देना अब सपने में आकर के या तो मानसिक जो दर्शन होता है व तो ठीक है हमको भी सपना आते हैं हम लोग भी सपने देखते हैं और हमको पता है कि यह आंखों के अलावा भी हम बहुत सारी चीजें देख सकते हैं जहां पर अपने कान नहीं चाहते वो बातें हम सुन सकते हैं जहां पर आंखें नहीं जाती वह चीज देख सकते हैं यानी कि अति इंद्रिय दर्शन अति इंद्रिय वाणी श्रवण यह सब तो ये एस्टाब्लिशड चीजें हैं हमने भी शायद थोड़ा बहुत अनुभव किया होगा यदि वास्तव में नहीं तो सपने में किंतु यहां पर तो एक और भी स्टेप आगे जाकर के बाइबल में जैसे चमत्कार किए हैं ना एक कटोरी एक टोकरी है टोकरी में कुछ ब्रेड है अभी बहुत सारे लोग खाने के लिए इकट्ठा हो गए तो क्या किया एक टोकरी दे दी कि जाओ इसमें से ब्रेड कभी खत्म नहीं होगी ब्रेड निकालते रहे और टोकरी कभी खत्म ही ना हुई ब्रेड कभी खत्म ही नहीं होगी अपने यहां पे अपने शास्त्रों में पुराणों में इतने सारे चमत्कार है तो यह तो उस लेवल का चमत्कार हो गया कि औषध श्यामा सुंदरी देवी को दिया और यह औषध मां ने सबसे पहले इसका व्यवहार किया देखिए यहां पे मैं फिर से पढ़ता हूं जो सेंटेंस है ई औषध दियो तेही भलो होए जावे यह औषध देना इसी से वह ठीक हो जाएगी यह पहले कहा बाद में क्या कहा तार पर मा जे औषध पलेन ताई मिलू इसके बाद में मां ने जो औषध प्राप्त किया था वही मैंने लिया इस सेंटेंस को हम दो तरह से देख सकते हैं या तो जैसे मां को कहा कि लोकी के फूल के साथ में नमक को मिलाकर खाना तो ऐसा भी एक इंटरप्रिटेशन हो सकता है कि यह औषध है किसी वैधराज के वहां पे या और किसी के वहां पे उसको लाके लेना या तो फिर सिंहवाहिनी देवी ने अपने हाथों से कुछ औषध श्यामा सुंदरी देवी को दिया था अभी दोनों तरह के इंटरप्रिटेशन हो सकते हैं किस इंटरप्रिटेशन को ग्रहण करना यह आपकी श्रद्धा के ऊपर में डिपेंड करता है तो जो भी है यहां पर सिंहवाहिनी ने दो औषध दिए एक तो दिया श्यामा सुंदरी देवी को और एक बताया एक फार्मूला बता दी मां शारदा को कि लौकी के फूल के साथ में नमक मिला कर के आंखों में एक एक टिपा देना लाऊ फुलेर फूट चोखे दिलम माने कहा जैसे सिंहवाहिनी ने बताया था लोकी के फूल के साथ में नमक मिलाकर एकएक टिपा आंख में दिया दते जेमन जाल टेने आने ओमनी चोखेर सब मोला टेने बेर करे दिलो जिस तरह से औषध देते ही एक मछुआरा होता है ना मछुआरा पानी में जाल सेकता है वो मछली को पकड़ने के लिए और जैसे ही जाल को खींचता है तो विस्तृत जाल होती है ना पानी में वह कैसी एक साथ में इकट्ठी होकर के पानी से बाहर आ जाती है तो वैसे ही जैसे यह एकएक टीपा आंख में दिया तो वैसे जाल की तरह जो महिला आंख में फैला हुआ था तो एक साथ में खींच करके बाहर आ गया यह कितना सुंदर ग्राफिकल डिस्क्रिप्शन माने दिया है श दनई चोख भलो होए गलो उसी दिन को आंख ठीक हो गई आर शरीरे श फूलो टलो कमे गेलो शरीर जो फूल गया था वह भी कम हो गया बेश झर झरे होलम एकदम स्फूर्ति आ गई शरीर में शेरे गलम ठीक हो गई बीमारी चली गई इसके बाद में जे जिज्ञास करतो बोल तुम जो कोई भी पूछता था मैं बताती थी मां सिंहवाहिनी औषध दिए छन मां सिंहवाहिनी ने औषध दिया है शही होते ही मायर महात्म्य प्रचार होलो उसी दिन से मां सिंहवाहिनी का महात्म्य प्रचार हुआ आमि औषध पेल जगत धन्य होलो मुझे भी औषध मिला जगत भी धन्य हुआ आगे आगे मां के अतो के जान तो ना आगे आगे मां सिंहवाहिनी का इतना महात्म प्रचार नहीं था अर खड़ो मायर खाने हत्या दिए लेन मां के रिलेटिव वह सिंहवाहिनी के वहां पर उसने धरना दिया था ताके किंतु एमन देव छेड़ दिले जे टिकते दलो ना अर्थात की वह जब धरना दे रहे थे मां के संबंधी उस समय उनके ऊपर में बड़े-बड़े काले पपड़े या तो फिर काली चींटिया ऐसी उनके ऊपर में छोड़ दी कि वह बेचारे वहां पर टिक नहीं पाए मां के ऐसे स्वपने बोलले अभी फिर से मां श्यामा सुंदर को आ कर के सिंहवाहिनी सपने में कहती है आमी ज शयने आछ एक एकन केन हत्या दिए छ दिए छ मैं अभी शयन कर रही हूं इस समय क्यों धरना दे रहा है व बामुन मानुष य सबब जाने ना वह तो ब्राह्मण है पूजा पाठ अच्छे से समझता है देवता जब शयन करते हैं उनको परेशान नहीं करते अच्छे से पता है किंतु फिर भी रात को आकर के धरना दे रहा है किस तरह की मूर्खा में कर रहा है ब्राह्मण होने के बावजूद जाओ जाओ उठिए आनो ग जाओ जाकर के उसको उठा कर के ले आओ ऐसा जब सिंहवाहिनी ने कहा तो श्यामा सुंदरी देवी क्या कहती है ये तो कथा बोलले और ओष टुकू बोले दिली तो होतो इतना सब कुछ बोल दिया कि वह ब्राह्मण है उसको पता नहीं कि मैं जब शयन कर रही हूं तब धरना नहीं देते इतना सब कुछ बोल लिया किंतु औषध नहीं दिया यदि औषध ही दे देते तो एक ही लाइन में यह बात प खत्म हो जाती तो जो भी है श्यामा अभी देखिए कि श्यामा सुंदरी देवी को बार-बार सिंहवाहिनी जाकर के स्वप्न देती है या तो दर्शन देती है यह भी एक कितना बड़ा उनका सौभाग्य है यह घटना से हम क्या समझते हैं कि सिंहवाहिनी सिंहवाहिनी के सामने धरना दे रही है सिंहवाहिनी सिंहवाहिनी को प्रार्थना कर रही है कि अरे रा जो यह असु है वह ठीक हो जाए तो यह कैसी लीला है यह मनुष्य जन्म का क्या माधुर्य है मां जगदंबा के लिए इसका हम जितना ही चिंतन करें अपनी बुद्धि से जितना ही सोचे उतना ही हमको लगता है कि ना ही इसको बुद्धि से समझ पाएंगे ना ही इसको हम अपनी अकल से इसका प्रॉपर एनालिसिस कर पाएंगे आखिर में तो वही एक है कि इस लीला के माधुर्य का आस्वादन करना और अपना मनुष्य जन्म धन्य समझना कि यही ठाकुर मां स्वामी जी की शरण में चरण में हमको शरण मिली तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओ श्री

Questions & Answers

राम शरणागति है सा क्योंकि शरणागति आप मेहनत करके नहीं ला पाएंगे क्या साधना है तो यह कर्म ज्ञान भक्ति और ध्यान यह साधना है कर्म अर्थात की निस्वार्थ रूप से कार्य करना ध्यान राजयोग अर्थात की मन को एकाग्र करना ज्ञान यानी कि त्याग करना और भक्ति यानी कि प्रार्थना करना किंतु यह जो शरणागति और त्याग यह जो दोनों चीजें है ना देखिए त्याग है जो ब्रह्म च्य और शरणागति यह दोनों ना ईश्वर की कृपा से आते हैं हम यदि चितना ही चाहे मैं जद कितना ही चाहे दावा कर लू कि मैं ब्रह्मचर्य का पालन करता हूं या तो मेरे मन में शरणागति है वह मेरे साध्य की बात नहीं है यह दोनों इतनी बड़ी चीजें हैं कि ईश्वर की कृपा नहीं होगी तो नहीं होगा देखिए कि ब कलमा सिर्फ गिरीश घोष ने दिया था वही एक भैरव के लेवल का साधक था कि जो कि शरणागत हो पाया था इवन स्वामी जी को पूरा जीवन भटकना पड़ा स्वामी जी ने आखिर में जो एक पत्र लिखा है ना कि अभी तक मेरी खुद की एंबिशन थी अभी तक मेरी खुद की महत्वाकांक्षा थी जो कि मुझसे यह सब करवाती थी किंतु यह सब एंबिशन धीरे-धीरे करके जा रही है अभी सही में फिर से वही नरेण हो गया हूं जो कि दक्षिणेश्वर में पंचवटी के नीचे में बैठकर के मंत्र मुग्ध होकर के ठाकुर के उपदेश ठाकुर की वाणी श्रवण किया करता था तो स्वामी जी को पूरा जगत भटकना पड़ा वो शरणागति लाने के लिए ठाकुर ने खुद ने कहा है कि जब हाथ टूट गया था तो ठाकुर ने कहा देखी एर भीतर सुधु द्वि जन आमी मां और मायर छले देख रहा हूं कि इस देह के भीतर में सिर्फ दो है मां है और मां का संतान है और कोई अभी इस देह के भीतर में नहीं ठाकुर को पूरा जीवन घूमना पड़ा था यह पूर्ण शरणागति लाने के लिए सिर्फ मां है और यह गिरीश घोष है दो को हमको पता है कि वो शरणागति के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ी देखिए दुख और कष्ट तो जीवन में आने वाला है संतान का मृत्यु हो कि अपने पति-पत्नी का मृत्यु हो ना कि पिता माता का मृत्यु हो मृत्यु तो अपने जीवन में संलग्न है ऐसा कौन है कि जिसके जीवन में किसी ना किसी प्रियजन का मृत्यु नहीं है किंतु शरणागति आना कितनी बड़ी बात है मैं तो कहता हूं भाई शरणागति दे दो बाद में जितने मृत्यु होते हैं होते रहे वो तो होने ही होने मृत्यु वो कष्ट तो होने ही वाला शरणागति आ जाए तो बहुत अच्छा है भाई देखिए शरणागति का रिलेशन है त्याग के साथ में जो भी आध्यात्मिक उपलब्धिया है सबका रिलेशन है त्याग के साथ में अभी मैं एक अपना खुद का उदाहरण बताता हूं एक समय था मेरा एक प्रोजेक्ट था शारदा कोश बोलकर के तो उसमें मैंने क्या किया था कि मैंने एक सॉफ्टवेयर बनाया तो ठाकुर महा स्वामी जी के जीवन रिलेटेड जितनी भी क्रोनोलॉजिकल घटनाएं हैं वोह सबको मैंने उसमें एक के बाद एक एंटर कि और उसको मैं विभिन्न तरीके से उसको सर्च कर सकता हूं ब्राउज कर सकता हूं तो मैंने सोचा कि यह सॉफ्टवेयर सभी डिवटी के लिए सभी ठाकुर महा स्वामी जी प जो स्टडी करते हैं उनके लिए कितना एक इंपॉर्टेंट सॉफ्टवेयर हो जाएगा अभी जब मैं यह ऐसा बोलता हूं कि लोगों को कितना उससे बेनिफिट होगा तो जो अनस्पोकन पार्ट है इसका कि लोग यह भी तो सोचेंगे कि इसने बनाया है तो यह भी कितना अच्छा य सॉफ्टवेयर इंजीनियर कहो ने कि एक स्टूडियस पर्सन है व्हिच इज एन अनस्पोकन पार्ट ऑफ दिस इक्वेशन राइट तो यह मैं इसके ऊपर मैं बहुत लंबे समय तक काम करता रहा करता रहा और मेरी जो एंबिशन थी सम हाउ वो एंबिशन कभी फुलफिल नहीं हुई क्योंकि अपना जीवन तो अपने हाथ में नहीं है हमको तो जो ड्यूटी दिया जाता है उसमें से यदि समय मिलेगा तो आप यह एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी में आप हाथ डालेंगे तो मैं जब राजकोट मेरा पोस्टिंग हुआ मैं जब बेलूर मठ में था मेरे पास में कुछ फ्री टाइम था मैं सोचता था कि चलो मैं उसमें थोड़ा काम करूं जब मैं राजकोट आया मैं इतना बिजी हो गया पूरे डिपार्टमेंट का रिस्पांसिबिलिटी पब्लिकेशन का कि यह सॉफ्टवेयर के ऊपर में आई कैन नॉट वर्क एथिकली स्पीकिंग ये तो ठीक नहीं रहेगा इतनी बड़ी जिम्मा मेरे सर पे है तो उसमें से टाइम काट करके मैं अपने पर्सनल कुछ करूं तो ये ठीक नहीं है तो ये सॉफ्टवेयर को मुझे छोड़ना पड़ा अधूरा तो अभी ये जो मेरे मन में ये जो एक कशमकश चल रहा था द्वंद चल रहा था एक तो है कि स्ट्रांग एंबिशन ऐसा कुछ करके जा कि जिससे कि हमारा नाम हमेशा के लिए हो जाए और साथ में यही है कि मैं जद इसको थोड़ा सा भी समय दूंगा तो यह तो अन एथिकल होगा ये कशमकश के आखिर में सडन एक दिन ब्रेक हो गया मेरे माइंड में कि अरे छोड़ो यार यह सब पूरी चीज को ठाकुर की जद इच्छा होगी तो ठाकुर यह सब सॉफ्टवेयर करेंगे मेरे मैं क्यों अपना यह सब टेंशन अपने सर पर लेकर घूमू मैं छोड़ देता हूं इस बात को जैसे ही मैंने इस चीज को छोड़ा ना सीधा मेरा मन शांत हो गया उस उस बात आज से ही फिर मेरा पूरा मन चला गया इसके बाद में मैंने सॉफ्टवेयर पर काम चालू रखा किंतु कब कब थोड़ा सा संडे को टाइम मिल जाता है सुबह को शाम को अपने से मैं अपनी खुद की संतोष के लिए करता हूं और मैं किसी को देता नहीं हूं उस सॉफ्टवेयर को ठीक किया है कि किसी के साथ में शेयर नहीं करना तो जब से मैंने यह बात छोड़ दी है ना कि लोगों को बेनिफिट होगा तब से मेरा मन शांत हो गया है तब से मैं एक्चुअली जदी मैं उसके ऊपर काम करता मैंने डेलिबरेशन उस कहीं ज्यादा काम इसके ऊपर में बाद में हुआ है तो ये छोड़ देना फ्रॉम देयर कमस शरणागति त्याग त्याग के बाद में शरणागति आती है जब तक वह जो ठाकुर ने कौवे का उदाहरण दिया है अपने मुंह में मछली को लेकर के उड़ रहा है जब तक कौवे के मुंह में मछली है जितनी भीय गीदड़ है उसके पीछे में दौड़ते हैं जैसे ही कौवे ने मछली को छोड़ दिया गीदड़ ने उसको भी छोड़ दिया शरणागति के लिए प्रथम कदम है त्याग त्याग जैसे ही करना हमने शुरू किया शरणागति ऑटोमेटिक आना शुरू हो जाएगी अभी वह साधना के किस स्टेज में करना है ट डिपेंड्स ऑनस कि मैं साधना के किस स्टेज में त्याग करूंगा इस प्रश्न के उत्तर पर पूरी गीता लिखी गई है जब तक शरीर में जोर है युद्ध करो जब युद्ध खत्म कब हो जाएगा पता चलेगा कि शरीर का जोर जो है शरीर की क्षमता जब पूरी व्यय हो गई है और युद्ध नहीं हो पर आ है तब ऑटोमेटिक युद्ध छूट जाएगा ठाकुर ने कहा ना कि व जो ये कोकोनट है कोकोनट के भीतर में कोपरा है तो यह जो कोपरा को क्या बोलते हैं जो भी बोलते होंगे कोपर गुजराती शब्द व्हाट एवर तो इसके भीतर में उसका यह जो है वो अभी जब कोकोनट ड्राई हो जाता है तो उसके भीतर का ये जो कोपरा जो है वो सेपरेट हो जाता है अपने से सेपरेट हो जाता है उसको फिर प्लान करके सेपरेट करने की जरूरत नहीं वो अपने से सेपरेट हो जाता है तो जब तक युद्ध कर सकते हैं युद्ध कीजिए उसके बाद में ऑटोमेटिक यह शरीर की शक्ति मन की शक्ति कम होती जाएगी और यह युद्ध करना छोड़ देंगे और यदि इससे पहले युद्ध छोड़ा तो हम इवन त्याग है ना हमको कभी शांति नहीं देगा जैसे कृष्ण ने अर्जुन को कहा तुम सोचते हो तुम सन्यास लो लोग क्या ये इस युद्ध छोड़ कर के सन्यास तुमको कभी शांति नहीं देगा इसके लिए जब तक तक शरीर में जोर है मन में कैपेसिटी है युद्ध करते जाना है धीरे-धीरे करके शरीर और मन की कैपेसिटी जवाब दे दे वहां से शरणागति प्रारंभ होगी किंतु सभी के साथ में ऐसा नहीं होगा देखिए जब आपकी शरीर और मन की कैपेसिटी जवाब देना शुरू कर दे कम हो जाए वहां से तो तम स्टार्ट होता है जनरली स्पीकिंग वहां से सत्व नहीं स्टार्ट होता वहां से सत्व कब स्टार्ट होगा जबकि आप संसार के युद्ध के साथ-साथ प लल यह साधना करते जाए तब कहीं जाकर के संसार का युद्ध समाप्त होगा और सत्व प्रारंभ होगा आप सोचते हैं कि भले चाहे रिटायर होने के बाद में साधना करने को बोला है रिटायर होने के बाद में शरणागति आएगी ऐसा तो कह दिया है तो मैं साधना भी तभी चालू करूंगा तो तो फिर तो आप रिटायर होने के बाद में तमज में चले जाएंगे इसके लिए जब तक हाथ पैर कार्य कर रहे हैं संसार का युद्ध कर रहे हैं पैरेलल साधना चलाते रहिए उस समय लगे साधना का कोई फल नहीं हो रहा किंतु जिस क्षण आप रिटायर होंगे उस क्षण ही सत्व का स्टेज चालू हो जाएगा रिटायर अर्थात कि रजस का फेज समाप्त होगा वो जो 60 साल की उम्र पर रिटायर वो नहीं वो तो कभी भी आपका वो कर्म का वर्कआउट कभी भी हो सकता है यंग एज में भी हो सकता है और बड़ी उम्र में भी हो सकता है किंतु ऑपरेटिव वर्ड इज कि जिस दिन रजत समाप्त होगा उस दिन आप तमस के गड्ढे में नहीं गिरेंगे सत्व रूपी यह कैलाश मानसरोवर की यात्रा प्रारंभ करेंगे देखिए जद एक उपमा देनी है ना तो एक ई बाइक आजकल तो यह ई व्हीकल आते हैं ना इलेक्ट्रिकल व्हीकल तो एक ई बाइक की उपमा देते हैं एक आदमी ई बाइक चला रहा है इलेक्ट्रिकल रिचार्जेबल बाइक तो अभी यह बाइक चला रहा है यानी तो परिश्रम कर रहा है और यदि साथ-साथ में साधना कर रहा है इसका अर्थ है कि बाइक चलाते चलाते उसकी बाइक रिचार्ज भी हो रही है और यदि साधना नहीं कर रहा तो बाइक चलाते चलाते उसकी बाइक रिचार्ज नहीं हो रही अच्छा तो यह है साधना उसकी बाइक को रिचार्ज करती है और वह बाइक चलाने का जो परिश्रम करता है साइकिल को चलाने का उससे उसकी साइकिल चलती है अभी जिस क्षण वह थक गया और साइकिल पेडल लगाना बंद कर दिया उस क्षण दो चीजें होगी यदि उसकी साधना चलती रहेगी तो उसकी बाइसिकल रि हो गई है और बिना उसके परिश्रम के अभी वह आगे चलेगी और जद साधना रुक गई थी या तो साधना छोड़ दी थी और साइकिल रिचार्ज नहीं हुई तो जिस क्षण वह साइकिल चलाना बंद करेगा उसी क्षण साइकिल गिर जाएगी तो जब तक हम रजस के स्टेज में है हमको पता नहीं चलता कि साधना का क्या बेनिफिट है जिस क्षण रजस का स्टेज समाप्त होगा ना तब पता चलेगा साधना की है तो हम सत्व में जाएंगे और साधना नहीं की तो तमस में जा जाएंगे तो यह भरोसा इतना होना चाहिए कि की हुई साधना कभी विफल नहीं जाएगी जब तक रजस का फेज है ना पता नहीं चलता है क्योंकि वह हमको परिश्रम तो करना ही करना है जगत में है तो वह टेंशन लेना ही लेना है हम लोग आश्रम में है तो यह डिपार्टमेंट का टेंशन है ही है उस समय यह सुबह को मंगल आरती में जाए शाम को संध्या आरती में जाए इतनी सारी किताबें पढ़ दे कुछ भी काम नहीं करेगा वो जो टेंशन है वो तो है ही है वो काम करना है वो करना ही है ये स्टाफ का प्रॉब्लम है यह कहां पर यह प्रॉब्लम है कहां वो वो तो एज इट इज है बेनिफिट कब पता चलेगा मैं जब रिटायर होकर के आरोग्य भवन है हमारा रिटायरमेंट होम बेलूरमठ में वहां पर जब चला जाऊंगा तब पता चलेगा कि ये जो जीवन भर में मंगलारती अटेंड की संध्या आरती अटेंड की ठाकुर मा स्वामी जी की किताब पढ़ी उसका बेनिफिट तब पता चलेगा और ज नहीं अटेंड किया होता तो भयानक अवस्था हो जाएगी ऐसा भीतर भीतर में से यह ये आएगा एक असंतोष कि मैंने यह जीवन इस संघ को दे दिया ो रिटर्न में कुछ नहीं मिला य भयानक असंतोष आ जाएगा प्रश्न है कि शरणागति से क्या हम किसी समस्या से या कोई विपद आती है तो बच पाएंगे कि नहीं एक्चुअली जहां तक हमारे हाथ पैर इंद्रियां चलती है तब तक कोई भी विपद आपद आ जाए हमको उसका डट के प्रतिकार करना है फिर यह प्रतिकार करते करते ही एक समय ऐसा आएगा कि हमारा प्रतिकार समाप्त हो जाएगा और शरणागति प्रारंभ प्रारंभ हो जाएगी यानी कि हाथ पर हाथ जोड़ कर के हाथ पर हाथ रख कर के बैठे रहे कि भगवान मेरी रक्षा करो तो उससे तो होने वाला नहीं है वो हाथ पेर तो चलाने ही चलाने हैं यह थोड़ा सा काउंटर इंटूटिव लगता है ठाकुर की कहानी से विपरीत तो लगता है ठाकुर ने वोह भगवान शिव की कहानी कि अपने शिष्य को बचाने को जा रहे हैं शिष्य ने पत्थर उठा लिया अपने बचाव में तो भगवान शिव वापस आ गए यहां पे बात यह है कि पत्थर उठाना अर्थात यह नहीं कि वह अपना प्रतिकार कर रहा है तो वापस आ गए उसका अहंकार है कि मैं अपना बचाव करूंगा मेरे में वह क्षमता है इसलिए भगवान वापस आ गए भरोसा भगवान पर रखना है और हाथ यहां अपने चलाने हैं यह जदी होगा तब कहीं जाकर के हम सक्सेस होंगे अभी यह बात हो गई कि भरोसा मुझे मेरा खुद का घमंड तो है कि हां मैं मेरे में मैं कुछ हूं आई एम समबीत हाथ पे हाथ रख के बैठा हूं कि भगवान आके बचाएंगे वो तो दोनों तरह से गए माया मिली ना राम ऐसा हो गया य भरोसा रखना है भगवान के ऊपर में और हाथ चलाने हैं अपने दिस इज द सीक्रेट वो ब्रिटिश लोगों का वो जो है ना हैव फेथ इन गॉड बट कीप योर पाउडर ड्राई यह मुझे बहुत अच्छा लगता है इसी सेंटेंस से यही बात से उन्होंने पूरे भारतवर्ष में राज किया किंतु कितना उनका यह स्केप्टिसिजम भी बोलो ना कि कुछ भी बोलो ये समुंदर में यात्रा कर रहे हैं तो कभी भी कुछ भी हो सकता है पायरेट भी आ सकते हैं समुंदर आपको डुबा सकता है तो भगवान पर भरोसा रखो किंतु आपका जो गन पाउडर है उसको ड्राई रखो उसमें पानी मत जाने दो क्योंकि जब पायरेट आ जाएंगे तो आपकी रक्षा आप ही को करनी है वो भगवान नहीं आने वाला है