प्रार्थना
ओम स्थापकाय धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपण अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णाायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित जिस चैप्टर का हम पाठ कर रहे हैं उसका नाम है भार समर्पण इस चैप्टर में हमने देखा ऑलरेडी कल से हमने पढ़ने की शुरुआत कर दी है। हमने देखा कि ठाकुर की लीला संवरण का समय अभी नजदीक आता जा रहा है और एक्चुअली यह चैप्टर में जो घटनाएं हैं वह तो ठाकुर जब दक्षिणेश्वर में थे उसी समय की घटनाओं को यहां पे गंभीरानंद जी महाराज ने संकलित किया है और उसके ऊपर में उन्होंने कुछ ना कुछ व्याख्याएं की है। ठाकुर जबकि शोशी
स्वामी विवेकानंद के भारत आगमन से भारतीय समाज में आध्यात्मिक और सामाजिक पुनर्जागरण हुआ
पूजा के बाद से ही ठाकुर चाहते थे कि मां धीरे-धीरे करके अपने संतानों का जो आध्यात्मिक भविष्य है उसका घड़ करने का जिम्मा अपने पास में ले। किंतु यह जो पूरा कार्य करना था वह उस समय के भारत की जो ऑर्थोडॉक्स उस समय की जो कंजर्वेटिव समाज व्यवस्था थी उसके भीतर में रहकर के करना था। यह निवेदिता या तो फिर जोसेफाइन मैक्लाउड या तो फिर सारा ओली बुल इन लोगों को लेकर के जब स्वामी जी भारत में आए थे तो उस समय भारत की परिस्थिति किंतु संपूर्ण रूप से बदल गई थी। यह हमको देखना है। बहुत सारे लोग यहां तक कि यह जो शरद चंद्र चक्रवर्ती जो कि स्वामी जी का इतना कंजर्वेटिव ब्राह्मण डिसाइपल था। वह भी कहता है कि जिस तरह से वह स्वामी जी को कहता है कि आज के युग में आपने यह जो फॉरेन डिसाइपल को लेकर के यह जो गोरे डिसाइपल है मिस्टर एंड मिसेज सेवियर और यह जो तीन और यह जो उस समय मिस्टर एंड मिज सेवियर स्वामी जी के साथ में आए थे। सर्वप्रथम स्वामी जी जब लंदन से भारत वापस आए उस समय यह दो उनके साथ में थे और यह वो यह था गुडविन था। तो यह जो गोरे लोग आपके साथ में आए हैं भारत में और वे लोग कटिबद्ध हैं। वे लोग प्रण करके आपके साथ में वेदांत और योग का प्रचार करने के लिए वे लोग तैयार है। यही इस युग का सबसे बड़ा आश्चर्य है। यह वह शरद चंद्र चक्रवर्ती स्वामी जी को कहता है। तो वह जो एक समय था 1900 के बाद का कि भारत में जागरण आ चुका था। एक तरह का पॉलिटिकल अवेयरनेस जागृत हो चुका था कि जिसकी वजह से वैसे तो स्वामी जी भारत में आए थे 1897 की जनवरी मास में किंतु उसी समय यह जो जो 19th सेंचुरी का जो आखिरी समय था उस समय में यह जो आखिरी 5 साल ना कि 10 साल यह भारत एक तरह की नींद में जो डूबा था तमस में जो डूबा था उसमें से जग रहा था और इसके पीछे यदि कोई एक डेट यदि हमको देनी हो कि वह कौन सी तिथि है, कौन सी तारीख है, कौन सा नक्षत्र है कि जिस समय यह पुराने भारत का जो अंत आया नया भारत का शुरुआत हुआ तो वह डेट तो वैसे होगा 1836 ठाकुर का भूमि पर अवतरण उनका जो जन्मदिन है वही होना चाहिए। किंतु इसका जो वाइडर जो प्रभाव समाज के ऊपर में पड़ा समाज ठाकुर का आगमन ठाकुर के क्रियाकलाप ठाकुर की लीलाएं वो कोलकाता के शहर तक सीमित था ऐसा हम कह सकते हैं। नो डाउट यह हीरानंद या तो विजय कृष्ण गोस्वामी वगैरह जो दूसरे शहरों में दूसरे राज्यों में गए या तो फिर यह नाग महाशय है वगैरह तो उन्होंने निश्चय ठाकुर के नाम का प्रचार तो किया या तो फिर रेधर हम कहेंगे कि उनके जीवन की महत्ता देखकर के उनके जीवन की जो नोबिलिटी है स्पिरिचुअल उनकी जो एटेनमेंट थी वह देखकर के वहां के लोगों को अवश्य पता चला होगा कि इनके गुरु श्री रामकृष्ण और श्री रामकृष्ण इतने महत साधु चरित्र अवतार तो शायद इसके रूप में वे लोग ना पहचाने किंतु इस तरह के एक महत चरित्र संत कोलकाता में रहते हैं। किंतु कोलकाता से बाहर पूरे भारत देश में गांवगांव शहर शहर जो एक स्वतंत्रता एक जो अपनी यह जो गर्व है भारतीय सनातन यह जो चिंताधारा का उसके ऊपर में यह गर्व प्रकट होना अपने हिंदू धर्म पे एक भीतर में से एक तरह का एक प्रेम जागृत होना क्योंकि क्या है कि उस समय की परिस्थिति हमने देखी थी कि रिफॉर्म सोसाइटी वाले जितने भी थे वह दिन रात हिंदू हिंदू धर्मों को गाली देते रहते थे। तो उनको सुनकर के जो कॉलेज एजुकेटेड मिडिल क्लास यूथ है जिनमें कि प्रोमिनेंट स्वामी विवेकानंद स्वयं थे उस समय के नरेंद्र उनके मन में एक तरह से यह प्रवेश हो गया था कि क्या हमारी सनातन भारतीय संस्कृति उसके भीतर में वह सत्व या तो वो शक्ति या वो पावर क्या अभी तक बचा है जो कि यह जो मॉडर्न ऑन स्लॉट है यह जो आधुनिक आक्रमण है विचारधारा का उसके सामने टिक पाए है क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं थी कि विदेश से विदेशी लोग अपने विदेशी धर्म को लाए थे। साथ-साथ में हमारे भारतवासियों ने यह भी देखा कि सुपीरियर फॉर्म ऑफ ऑर्गेनाइजेशन और उसके बाद में जो लर्निंग एंड नॉलेज अबाउट मॉडर्न साइंस, साइंस एंड टेक्नोलॉजी यह इन लोगों का इतना एडवांस था कि हम जैसे भारत जैसी इतनी विशाल विराट जो सत्ता थी हजारों सालों से जो हमारी संस्कृति चली आ रही है। करोड़ों-करोड़ों की जिसकी जनसंख्या है। उसको जैसे कि चिपटी माने क्षण भर में ऐसा लगा जैसे कि कि वह जो कहां पर वह जगत के दूसरे कोने में जगत के एक कोने में छोटा सा एक टापू है जहां पर हमेशा ठंडी गिरती रहती है। सूरज का प्रकाश भी उनको देखने को नहीं मिलता। चंद लोग मुट्ठी भर लोग वहां पर जीते हैं। वहां से एक डेलीगेशन क्या आया 10 15 20 25 100 200 लोगों का कि हजारों सालों पुरानी संस्कृति को जैसे कि क्षण भर में उन्होंने अपने वश में कर लिया हो। क्या एक्सप्लेनेशन हम दे सकते हैं हमारे खुद के दुष्कर्म के अलावा और क्या कह सकते हैं। अदरवाइज साइंस एंड टेक्नोलॉजी का जो गैप था वह इतना बड़ा था। किंतु मुझे नहीं लगता कि इवन यह गैप यह बात एक्सप्लेन कर पाएगी। तो जो भी है सभी जो भारतीय थे जो खास करके जो चिंतन करते थे जो सोचते थे जो यह सब चीजों के ऊपर में एक मंतव्य रखते थे सभी के मन में यह सब जागृत हो गया था। यह भाव कि हिंदू धर्म या तो अपनी सनातन संस्कृति है। उसके भीतर में कितना सत्व है और नहीं है। यह चिंतन प्रारंभ हो गया था। तो इस चिंतन को लेकर के किंतु जब स्वामी विवेकानंद ने वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ शिकागो में जो अमेरिकन भाइयों और बहनों अमेरिकन बहनों और भाइयों ऐसा करके जब संबोधन किया तो उस समय जो जागृत हो गई थी भारत की चेतना तो उसके बाद में देखिए जब स्वामी जी भारत आए तो उनको एक नया भारत देखने को मिला था। मुझे लगता है कि स्वामी जी के माइंड में यह जो होगा सबसे बेस्ट कंट्रास्ट कौन सा होगा? स्वामी जी जब भारत लौटे होंगे जब गए थे उस समय का भारत और जब वापस आए हैं उस समय का भारत मुझे लगता है कि स्वामी जी की जो सूक्ष्म दृष्टि थी उन्होंने इस बात को अवश्य समझ लिया होगा डिटेक्ट किया होगा उनको यह बात दिख रही होगी उनको यह बात पता चल गई होगी कि यह दोनों भारत में कितना बड़ा डिफरेंस है। अभी क्या है? स्वामी जी खुद तो अपनी प्रशंसा करेंगे नहीं। स्वामी जी खुद तो कहेंगे नहीं कि मैंने जो अमेरिका में कार्य किया उसकी वजह से भारत देश आज मैं जब वापस आ रहा हूं तो बिल्कुल नया भारत देश दिखता है। तो ऐसा स्वामी जी तो बोलेंगे नहीं। किंतु जो स्वामी जी के जो रीडर्स है, स्वामी जी के जो फॉलोअर्स है जैसे कि हम मैं कहता हूं कि वी कैन सेफली अस्यूम क्योंकि मैं जब स्वामी जी को पढ़ने से पहले मैं भी थोड़ा बहुत हिस्ट्री पढ़ा करता था तो उस समय मुझे तो एक प्रश्न तो यह आया ही था कि यह जो भारत देश इतना विशाल इतना विराट इतनी पुरानी संस्कृति इतना एडवांस्ड सिविलाइजेशन एक मुट्ठी भर गौरों के सामने कैसे झुक जाए और उसमें भी देखिए देखिए कि बात सिर्फ यह नहीं है कि हिंदू संस्कृति उनके सामने झुक गई। हमको पता है कि और एक रेडिकल मूवमेंट जो कि अरेबिया में प्रारंभ हुई थी इस्लाम वो इस्लाम के रूलर मुगल एपरर्स भारत पे राज कर रहे थे। तो जब वे लोग भारत में आए तो सिर्फ वही बात वो हुई थी कि जो भारत इतना जैसे कि डिप्रेव हो गया था। इतना बैकवर्ड हो गया था मॉडर्न थिंकिंग में कि वह जो चंद घोड़ेवार जो अरेबिया से ना कि यह अफगानिस्तान से आए थे उन लोगों ने भारत के ऊपर में संपूर्ण कब्जा कर लिया तो वो एक बार रिपीट हो चुका था किंतु अब तो यह मुगल सल्तनत थी देन दे आर सपोज टू बी मोर एडवांस देन हिंदूस एटलीस्ट इन दिस मैटर ऑफ एडप्टिंग न्यू टेक्नोलॉजी यह जो युद्ध क्षेत्र की जो नई-नई टेक्नोलॉजीस है उसको एक्सेप्ट करने में मुगल लोग तो ज्यादा आगे थे। होने ही चाहिए। अदरवाइज तो हिंदू राजाओं के ऊपर में राजपूत मराठा राजाओं के ऊपर में उन्होंने इस तरह से माने उनको हटा के संपूर्ण भारतवर्ष पे अपना कब्जा कर लेना संपूर्ण तो नहीं किंतु फिर भी अच्छा इसमें भी क्या है कि देखिए कि उस समय का यदि भारतवर्ष गिने तो म्यांमार से प्रारंभ करके यह अफगानिस्तान तक जाता था। उसमें यदि साउथ इंडिया को छोड़ दें और जो सिर्फ नॉर्दन स्ट्रिप है यह म्यांमार से अफगानिस्तान और ऊपर में कश्मीर तक जाती हुई तो वो जो भारतवर्ष पे वे लोग जो उनका अधिकार था वो आज के भारत की जो साइज थी इंक्लूडिंग साउथ इंडिया आज के भारत की जो साइज है उससे ज्यादा थी। तो एनीवे उन्होंने बहुत सारे म बहुत बड़े हिस्सों पे अपने पे राज किया। किंतु प्रश्न है कि जब गोरे लोग आए यह जो चाहे डच हो ना कि चाहे फ्रेंच हो ना कि चाहे पोर्तुगीज हो ना कि अल्टीमेटली ब्रिटिश हो तो इनके सामने यह मुगल सल्तनत ने भी घुटने टेक दिए। इसकी बहुत सारी कहानियां है। मैं बीच में बीच में एक बार मैंने स्टडी किया था इन सब चीजों का कि किस तरह से वह जो आखिरी जो मुगल राजा था बादशाह था इसको डराधमका करके ब्रिटिश लोगों ने यह सब बिहार और बंगाल की दीवानी ले ली थी। यानी कि वहां की जमींदारी का वह पूरा अपने पे ले लिया था। उसका क्या कहेंगे अथॉरिटी। तो यह प्रश्न तो होगा ही। किंतु यह प्रश्न मुझे हुआ था जब मैं हिस्ट्री पढ़ रहा था। किंतु साथ में यह प्रश्न भी मुझे हुआ था कि अच्छा ऐसे कुछ चंद सालों में ऐसा तो क्या हुआ कि यह जो इंडियन नेशनल कांग्रेस है उसकी ये जो फ्रीडम मूवमेंट स्टार्ट हुई उसने इतना पावर पकड़ लिया फटाक करके खास करके देखिए कि जो इंडियन नेशनल कांग्रेस के जो प्रथम हरोड़ के जो नेता थे वो चाहे वह बाल गंगाधर तिलक हो ना कि फिर यह सुभाष चंद्र बोस हो ना कि फिर यह महात्मा गांधी हो इसमें बाल बाल गंगाधर तिलक को छोड़कर के जितने भी बादबाद में फ्रीडम मूवमेंट में प्रोमिनेंट हुए सरदार पटेल है या तो फिर जवाहरलाल नेहरू है वगैरह वो तो बाद में आए थे। उसके पहले कांग्रेस में देखिए कि जितने भी लीडर थे वे लोग चाहते और खास करके कांग्रेस की स्थापना तो यह कुछ ब्रिटिश लोगों ने इकट्ठा होकर की थी। तो ब्रिटिश और इंडियन दोनों थे उस कमेटी में किंतु ब्रिटिश लोग भी थे उसमें। तो उनका ऐसा था कि ब्रिटिश गवर्नमेंट ब्रिटिश राज के साथ में नेगोशिएशन करके लोकल कुछ स्थानिक राइट्स इन सब लोकल बॉडीज को दिए जाने चाहिए। वो चाहे म्युनिसिपालिटी हो ना कि ये स्टेट लेजिस्लेचर हो। ये जो सेंट्रल लेवल पे तो कोई राइट मिलने वाले नहीं है। किंतु एटलीस्ट लोकल लेवल पे उनका थोड़ा अ मेजर अ मेजर ऑफ ऑटोनोमी थोड़ा बहुत स्वतंत्रता उनको मिले। ऐसा यह सब लोग करना चाहते थे कि बीच-बीच में यह जो वायसराॉय होता था उसके सामने उपस्थित होकर के यह लोग पिटीशन देते थे और वायसरॉय को भी लगता था कि ऐसे लोगों को थोड़ा सा एंटरटेन करना चाहिए। जैसे कि भारत में क्या है कि पब्लिक ओपिनियन बना रहे कि हां ब्रिटिश गवर्नमेंट हमारे लिए कुछ कर रही है। भले ही चाहे हमारी 90% धन संपत्ति लूट ली 10% हमारे पर दया कर रहे हैं। ऐसा ये मूर्ख भारतवासियों को दिखे इसके लिए फिर ब्रिटिश गवर्नमेंट भी यह इंडियन नेशनल कांग्रेस को टोलरेट करती थी। किंतु सडनली देखिए कि खास करके गांधी जी के भारत में आगमन के बाद में ये जो एक पावर एक म एक क्रिटिकल मास पकड़ लिया अपनी फ्रीडम मूवमेंट ने वो वो हाउ वास दैट पॉसिबल ऐसे कुछ 10 15 सालों में ऐसा तो भारत में क्या परिवर्तन आ गया जो कि ये पिछले 1000 साल से जब से खास करके ये जो इस्लामिक आक्रमण प्रारंभ हुए थे उस समय जो ये भारत में जो नेशनल लेवल पर एक यूनिट िटी और एक डिटरमिनेशन और स्वतंत्रता प्राप्ति की एक जो प्रचंड इच्छा जो दिख रही थी 1915 के बाद में खास करके 1900 ये जो बंग भंग की जो मूवमेंट प्रारंभ हुई तभी से यह सब प्रारंभ हो गया था 1905 के आसपास में से तो ऐसा तो क्या हुआ कि सडनली सोया हुआ भारत जग गया उसमें कुछ-कुछ घटनाओं का जैसे कि दिशा निर्देश हमको मिलता है जलियांवाला बाग का जो अह यह जो नरसंहार हुआ तो बहुत सारे लोग कहते हैं कि जिस तरह से भारतीयों को इस ब्रिटिश लोगों ने उन्होंने मर्डर किया खुलेआम इस तरह से वो गार्डन में तो इसी वजह से भारत में जैसे कि एक तरह से चेतना वापस आ गई। किंतु पता है कि 1857 का यह जो हमारा फर्स्ट वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस था उसके बाद में ब्रिटिश लोगों ने कितने हजारोंज़ों भारतीयों को मर्डर कर दिया था रिवेंज लेने के लिए, बदला लेने के लिए। वो उसका तो संख्या भी अपने पास में नहीं है। तो इतने हजारों हजारों लोगों की हत्या करने के बाद में जो भारत में नवजागरण नहीं आया तो यह जलियांवाला बाग के हत्याकांड के बाद में से कैसे आ जाएगा? यह सब प्रश्न मेरे मन में घूम रहे थे। किंतु जब से मैंने स्वामी जी को पढ़ना शुरू किया तब मुझे यह एक मिसिंग लिंक मिल गया जो कि अपने यह जो सेकुलर जो सेकुलरिज्म का जो एक पागलपन चला था भारत में इंडिपेंडेंस के बाद में तो यह स्वामी जी का जो कंट्रीब्यूशन है भारत के इंडिपेंडेंस मूवमेंट के पीछे में भारत को जागृत करने में उसको हमने जैसे कि संपूर्ण रूप से भूल गए हैं। संपूर्ण रूप से हमने इसको विस्मृत कर दिया है। आजकल जो चंद लोग हैं जो कि स्वामी जी को इन डेप्थ स्टडी करते हैं। स्वामी जी के हिस्टोरिकल योग और वेदांत के विचारों को एकदम उसको कॉन्टेक्स्ट के साथ में स्टडी करते हैं। आज उन लोगों को पता चलता है कि स्वामी जी का फ्रीडम मूवमेंट में भारत के नवजागरण में भविष्य के भारत के घड़ में स्वामी जी की क्या भूमिका थी और यदि हमारे लिटरेचर में अपने साहित्य में अपनी भावधारा में और ज्यादा डीप में जाएंगे तो पता चलेगा कि स्वामी जी के पीछे में मां और ठाकुर थे। किंतु यदि मां और ठाकुर को फिलहाल भूल जाए सिर्फ एक स्वामी जी के बारे में हम बात करें तो भी देखिए कि स्वामी जी का कंट्रीब्यूशन माने ठाकुर और मां तो एकदम पक्के रिलीजियस हिंदू कैटेगरी में आ जाएंगे। एटलीस्ट स्वामी जी को तो आपको तो उस कैटेगरी से ऊपर उठा के एक यूनिवर्सल एक देना चाहिए। हालांकि सी द धर्म इटसेल्फ इज़ यूनिवर्सल। किंतु यह अपना एक पोइजनस माइंडसेट बन गया है तो कि यह सेुलर है और यह रिलीजियस है। अभी नेक्स्ट संडे को मुझे यहां पे एक वोकर्स क्लब है। मॉर्निंग वॉक के लिए जो लोग जाते हैं उन लोगों का एक क्लब है। उसमें मुझे बोलने के लिए बुलाया है स्पीच देने के लिए। तो उसमें उन्होंने स्पष्ट कहा है कि कोई भी धार्मिक सब्जेक्ट को सिलेलेक्ट मत कीजिए। अभी मैं कल ही एक वॉलंटियर्स के वालंटियर के साथ में बात कर रहा था। मैंने कहा कि देखिए इन लोगों का माइंडसेट कि धर्म को और जगत की जितनी एक्टिविटी है उसको सेपरेट करना चाहते हैं। क्यों करना चाहते हैं? क्योंकि इनके माइंड में ना ये यूरोपियन आइडियाज सब बैठे हुए हैं। सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट। यह विचार कैसे आया? क्योंकि यह जो कैथोलिक चर्च जो था उसका पावर पॉलिटिकल पावर धीरे-धीरे करके मिडीवल एजेस में इतना बढ़ गया था कि जितने भी राजा थे यूरोप के ब्रिटिश ब्रिटेन का राजा ये फ्रांस का राजा ये रशिया का राजा सब रशिया तो खैर ऑर्थोडॉक्स चर्च में आता है। ये जो वेस्टर्न यूरोप के जितने राजा थे उन सबके ऊपर में ये कैथोलिक चर्च जो कि रोम में बेस्ड था वो अपना एक आधिपत्य जमाना चाहता था। अपना एक ऑथॉरिटी उनके ऊपर में इंपोज करना चाहता था। तो उस समय वहां के जो पॉलिटिकल थिंकर्स थे उन्होंने कहा कि चर्च के पास में जो एक्सपर्टाइज है इट इज़ रिलेटेड टू गॉड रियलाइजेशन और द जर्नी ऑफ द सोल टुवर्ड्स द डिविनिटी। बट दे डू नॉट हैव एनी एक्सपर्टाइज रिगार्डिंग टैक्सेशन रिगार्डिंग द वॉरफेयर रिगार्डिंग द डे टू डे एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ ए स्टेट यह सब तो इनके पास में कुछ है नहीं तो फिर इन लोगों को यहां से एडमिनिस्ट्रेशन से दूर कर दिया जाए बोलकर के यूरोप में यह कांसेप्ट आया कि सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट और इसी को हम लोग जो अपना हिस्ट्री तो ठीक से समझे नहीं है यूरोपियन हिस्ट्री को डाइजेस्ट करने का प्रयास कर रहे हैं और उसमें हमको को इनडाइजेशन हो जाता है। भारत में देखिए कि भारत में ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन कभी था ही नहीं। जिस तरह से कैथोलिक चर्च एक ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन है। इस तरह से भारत में था ही नहीं। भारत में यह संत, महात्मा, फकीर, साधु, कवि, पोएट यह गांव-गांव, शहर-शहर, जंगल जंगल वन वन घूमते थे। जो भी सामने मिला उनको राम कथा सुनाते थे। या तो फिर आत्मन की दिव्यता का एक उपदेश देते थे। तो फिर यह जो एकदम जो अपना डिस्ट्रीब्यूटेड ग्रास रूट लेवल पे डेमोक्रेटिक जो फॉर्म ऑफ रिलीजन है यह हमारे हिंदू धर्म ने कभी भी राज्य शासन में अपना अधिकार जमाया ही नहीं है। हां, बड़े-बड़े राजा होते थे। उनके सलाहकार के रूप में यह सब ऋषि मुनियों से वे लोग सलाह लिया तो करते थे किंतु भारत में यह क्षत्रिय और ब्राह्मी इन दोनों की जो ऑथॉरिटी है दोनों का जो कार्यकलाप है एकदम शास्त्रीय दृष्टि से इन दोनों को सेपरेट किया गया है। जो ब्राह्मी होगा वह राज्य शासन में अपना अधिकार नहीं बिठाना चाहेगा। जो राजा या क्षत्रिय होगा वह धर्मीय शासन में धर्म के शासन में अपना अधिकार नहीं चलाएगा। वो दोनों के धर्म ही अलग है। दोनों के जो विश्व है दोनों के जो जगत है दोनों की जो कार्य प्रणाली है वो जो स्फीयर ऑफ इन्फ्लुएंस है वो कंप्लीटली डिफरेंट है। राजा राज्य शासन करेगा। ब्राह्मण है या संत है या तो फिर ऋषि मुनि है। ईश्वर दर्शन ईश्वर प्राप्ति की बातें करेंगे। राजा को उपदेश अवश्य देंगे। किंतु राजा के ऊपर में एस सच कोई ऑथॉरिटी नहीं है। तो देखिए कि भारत में हमने यह सेपरेशन ऑफ चर्च एंड स्टेट हमेशा से रहा है। उसको कोई यूरोप से लाकर के इंपोज करने की आवश्यकता नहीं है। तो इसकी वजह से एक एक झूठ-मूठ का एक सेकुलरिज्म की वजह से आज देखिए कि एक साधु को प्रवचन देने के लिए बुलाते हैं और साधु को कहते हैं कि धर्म के बारे में बात मत कीजिए। तो खैर अभी यह क्या करेंगे इसके बारे में? तो देखिए कि यहां पर किंतु जो मैंने अपना भारत का हिस्ट्री जो पढ़ा था, विश्व का जो हिस्ट्री पढ़ा था उसमें जो एक मिसिंग लिंक जो मुझे लग रहा था कि भारत में जो नवजागरण आया उसके लिए यह जितने भी कांग्रेस के लीडर्स हैं या तो फिर यह जो अपनी फ्रीडम मूवमेंट है दैट इन इटसेल्फ इज नॉट इनफ। वह अपने आप में पर्याप्त नहीं है और एक रीजन होना चाहिए और एक फैक्टर होना चाहिए। एंड दैट फैक्टर इज स्वामी विवेकानंद और ऑफ कोर्स स्वामी जी के पीछे में ठाकुर और मां। तो यह जो स्वामी जी जब भारत में आए
माँ के गुरुभाव के दो चरण : पहला, ठाकुर के जीवनकाल के दौरान। दूसरा, जनवरी 1897 में स्वामी विवेकानंद के भारत लौटने के बाद
या जो विदेशी शिष्याओं को लेकर के आए जो सिस्टर निवेदिता ने कोलकाता में बालिकाओं की स्कूल की गर्ल्स स्कूल की स्थापना की। वह एक बिल्कुल नया युग था कि जबकि समाज भी स्त्रियों के जो हक है, स्त्रियों के जो अधिकार है या तो फिर स्त्रियों को जो शिक्षा दीक्षा वगैरह जो मिलना चाहिए उसके प्रति बहुत ही जागृत हो गया था। ऐसा नहीं था कि पहले नहीं था। किंतु पहले की जो रूढ़िच चुस्त व्यवस्था थी, उसमें उस तरह से चलना था। तो यहां पर देखिए कि मां का भी यह जो मिनिस्ट्री है, मां का जो मिशन है, उसको आप दो हिस्सों में इसी तरह से बांट सकते हैं। एक तो जैसे ठाकुर की दृष्टि से देखें तो हमको पता है कि ठाकुर के रहते-रहते ठाकुर ने मां को जो तैयार किया यह अपने त्यागी संतानों का, गृहस्थ संतानों की आध्यात्मिक शिक्षा अपने हाथ में लेने के लिए वह तो है ही है। ठाकुर के रहते-रहते दक्षिणेश्वर में काशीपुर में और ठाकुर की महासमाधि के बाद में वो एक एनालिसिस है ही है। दूसरा एक एनालिसिस मेरा जो पर्सनल ऐसा मानना है कि स्वामी जी के विदेश में से आने से पहले रिटर्न आने से पहले स्वामी जी विदेश से भारत में प्रथम बार कब वापस आए? तो 1897 1897 जनवरी महीने में इन द जनवरी मंथ। तो यह जो 1897 जनवरी जो है वह दैट इज वन कट ऑफ डेट कि उसके पहले जो मां ने जितना भी कार्य किया है यह जो अपने संतानों को शिक्षा दीक्षा देने का वह बड़े ही गोपनीय तरीके से किया है। बड़ा ही अपने को लज्जा के पट में आवृत रख के किया है। बड़ा ही सीक्रेटली किया है। जिससे कि क्या है कि यह ऑर्थोडॉक्स भारत का जो समाज था खास करके यह जो हिंदू समाज उसमें बहुत ज्यादा खलबली ना मच जाए। उसमें बहुत ज्यादा मां के विरोध में कोई ज्यादा लोग बात ना करें। तो वह एक था। किंतु जब स्वामी जी भारत आए तो बात सिर्फ यह नहीं थी कि स्वामी जी ने एक इंस्टिट्यूशन रामकृष्ण मिशन की रचना की और यह इंस्टीट्यूशन का फुल बैकअप मां को मिल रहा था और इसकी वजह से मां का जो शिक्षा दीक्षा देने का जो कार्यक्रम था मां का जो मिशन था वो मिशन ज्यादा फैला वो तो एक है कि इंस्टीट्यूशन का बैकअप था किंतु साथ में ही यह जो माइंडसेट परिवर्तन हुआ मुझे मुझे लगता है मेरा जो पर्सनल यह जो एनालिसिस है कि यह जो स्वामी जी के आने से पहले का और स्वामी जी के रिटर्न आने के बाद का माइंडसेट एकदम रेडिकली चेंज हो चुका है। ये जो लेक्चर फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा स्वामी जी ने जो दक्षिण भारत में खास करके कोलंबो में जब उन्होंने पदार्पण करके यह जो आग यह जो ध्वनि प्रकट की है यह वेदांत की आत्मचिंतन की यह आत्मश्रद्धा की आत्म गौरव की देश गौरव की देश प्रेम की यह जो प्रचंड दावानल रूपी अग्नि जो स्वामी जी ने प्रकट की वो साउथ इंडिया में वो धीरे-धीरे करके पूरे भारतवर्ष में फैल गई। जहांजहां स्वामी जी गए इतना प्रचंड उनको आवकार मिला है। इतना प्रचंड उनको वेलकम मिला है। सब जगह पर लोग अपनी ये जो हजार साल की नींद से जग गए और नए भारत की यह जो क्षमताएं हैं नए भारत का जो पोटेंशियल है उसके बारे में यह लोग अवेयर हुए कि यही सनातन धर्म को पकड़ करके ही हम यह जो आधुनिक यह राक्षसी सभ्यता है स्वामी जी ने क्या कहा कि यह लोग सब विरोचन के संतान है। उनके लिए भोगवाद ही उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ धर्म है। तो यह जो विरोचन की जो संतान थी इनके ऊपर में हमारे जो देव के संतान अमृतस्य पुत्राह हम लोग जो अमृत के जो संतान है वो विरोचन के संतान हम अमृत के संतान वही सनातन अमृतमय वेद की जो धारा भारत के गांवगांव गली गली घरघर प्रत्येक हृदय के भीतर में जो बह रही है उसी अमृत धारा का पान करके इसी भारत को नवजीवन दे सकते हैं हमको हमको हमारा सनातन धर्म छोड़कर के विदेशी सभ्यता विदेशी संस्कृति यह जो सेकुलरिज्म जैसे नाटक इसको अपनाने की जरूरत नहीं है। वो जागरण जो भारत में आया एक जो नव भारत का वो जो शंख निनाद जो हुआ उसके बाद का जो मां का मिनिस्ट्री है उसके बाद का जो मां का मिशन है वो बहुत ही व्यापक पैमाने पर स्प्रेड हुआ। इसीलिए देखिए कि जब मां की स्मृति कथाएं पढ़ते हैं हम मायर कथा है कि मायर पद प्रांत है कि मातृ चरण है कि ये जितनी भी स्मृति कथाएं हैं उन सब में देखिए कि ठाकुर के रहते-रहते या तो फिर यह जो सन्यासी संतान सब भिक्षा करके पूरे भारत में घूम रहे थे या तो स्वामी जी जब अमेरिका थे उसके उस समय की स्मृति कथाएं मां के जीवन की बड़ी ही अल्प देखने को मिलेगी क्योंकि मां का जो दायरा था। उस समय यह जो आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करने का वह देखिए कि ठाकुर के अंतरंग भक्तों तक ही सीमित था। यह दाना काली की पत्नी यही योगिन मां, यही गोलाप मां, यही जो स्त्री भक्त ठाकुर के पास में आती थी। वही जो त्यागी संतान ठाकुर के पास में आते थे। उन्हीं को ठाकुर फिर मां के पास में भेजते थे। तो वह एक सीमित दायरे में मां का यह जो गुरु भाव था वह वहां पर समर्पित था। किंतु जैसे ही स्वामी जी भारत में आए यह लोक जागरण का नवयुग का जो अभ्युदय हुआ उसके बाद में मां का मिशन भी जैसे कि फटाक करके पूरे विश्व को वो छा गया। यह जो तीन विदेशी महिला और खास करके निवेदिता जोसेफ ओलीबुल जोसेफाइन मैकउड और सिस्टर निवेदिता यह तीन विदेशी गोरी महिलाएं जब मां के पास में आई तब यह ईस्ट और वेस्ट का सही-सही मिलन हुआ। वह जो देखिए कि निवेदिता जब पहली बार मां को मिलने के लिए जा रही थी। स्वामी जी ने सब व्यवस्था की तो थी किंतु स्वामी जी बड़े टेंशन में थे कि मां तो है इतनी रूढ़िच चुस्त और यह तो है विदेशी गोरी महिला तो फिर मां इसको किस तरह से स्वीकार करेगी और यदि मां यदि अस्वीकार कर दे तो निवेदिता को जो दुख होगा उससे कहीं ज्यादा दुख स्वामी जी को होता तो स्वामी जी बड़े टेंशन में थे किंतु जैसे ही निवेदिता मां के पास में से वापस आई उसने कहा मां ने मुझे स्वीकार किया है तो निवेदिता जितनी खुश हुई थी उससे उससे कहीं गुना खुश स्वामी जी हो गए थे। स्वामी जी की खुशी जैसे कि उनके हृदय में समा नहीं रही थी। इतने वो खुशख हो गए थे। उस दिन ये जो पैरेलल देखिए कि जिस दिन स्वामी जी ने मां काली को स्वीकार किया था उसके दूसरे दिन ठाकुर की वो जो स्मृति कथा में है कि ठाकुर कितने खुश थे। जो भी आता है वहां पे दक्षिणेश्वर में सबको कहते थे। नर मां काली के मैनेज है। नरेंद्र काली मैनेज है। नरेंद्र काली मैनेज है। नरेंद्र ने मां काली को माना है। नरेंद्र ने काली को माना है। तो वो जो ठाकुर की जो खुशी थी कि यहां पे थे नरेंद्र जो कि आधुनिक भारत के वो जो एक रिप्रेजेंटेटिव कहे जाएंगे। यहां पे है मां काली सनातन हिंदू धर्म की प्रतीक। यह दोनों का जो मिलन हुआ, नरेंद्र ने मां काली के सामने जो आत्मसमर्पण किया, वो जैसे कि नवभारत का शंख घोष वो जो एक हुआ था ठाकुर की नजरों के सामने ठाकुर की प्रेरणा से वैसे ही एक दूसरा शंख घोष यहां पे जब निवेदिता मां के पास में आकर के उसने जब आत्मसमर्पण किया और सिर्फ उसका आत्मसमर्पण यह इनफ नहीं है। मां ने उसको जो स्वीकार किया दैट इटसेल्फ यह जो दूसरा शंखघोष यह जो भारत के नवनिर्माण का नाउ देखिए कि यह जो मां का जो भार समर्पण का जो कार्यक्रम यह जो पूरा प्रोसेस जो कि यह यहां से प्रारंभ हुआ था शोडशी पूजा से उसको कहेंगे कि वो एक ग्रेजुएट लेवल पर आ गया जब मां ने निवेदिता को स्वीकार किया तो और उसके बाद में मां का हृदय जैसे कि खुल गया जो भी आता है सबको मां दीक्षा
माँ ने बुरे कर्मों वाले एक व्यक्ति को दीक्षा दी, और उसके पापों को अपने ऊपर ले लिया
देती थी। एक बड़ी सुंदर घटना है कि कुछ भक्त जयराम भाटी गए थे राजा महाराज ने वो लोग एक्चुअली आए थे राजा महाराज के पास में तो फिर राजा महाराज ने कहा कि मैं तो इनको दीक्षा नहीं दे पाऊंगा उनका संस्कार अच्छा नहीं लग रहा है तो एक काम करो आप लोग सब मां के पास चले जाओ जय राम भाटी तो यह भक्त लोग गए मां के पास में इसके बाद में जब यह लोग वापस आए तो इनके साथ में और भी एक भक्त थे जिन्होंने यह पूरी घटना जय राम भाटी में क्या हुआ था। यह उन्होंने देखा था और उन्होंने आकर के बेलूर मठ में आकर के पूरा रिपोर्ट किया। वह कब कब हुआ था कि जब राजा महाराज और यह बाबूराम महाराज यह जो ठाकुर के त्यागी संतान थे वो बेलूर मठ में वहां पर बैठे थे। स्वामी जी का जो बेडरूम है स्वामी जी का कमरा उसके बाहर में जो वरांडा है उसमें जो ग्राउंड फ्लोर का जो वरांडा है जो कि गंगा को फेस करके है। उसके एक साइड में पहले विजिटर रूम हुआ करता था। आज भी उसको विजिटर रूम ही कहते हैं। किंतु वहां पर खास करके ये जो हम लोग जो नए आए हुए ब्रह्मचारी थे हम लोगों के लिए संगीत के क्लासेस हुआ करते थे वहां पे। तो वो विजिटर रूम्स के बाहर में जो वरांडा है वहां पे एक बेंच है। यदि आप गए होंगे तो आपने देखा होगा। वो बेंच आई थिंक वही पुराना वाला ही है। आई डू नॉट नो। मैं अनुमान करके कहता हूं। या तो वही ओरिजिनल बेंच है या तो फिर उसी तरह का दूसरा बिठाया है जो भी है तो उस बेंच पे यह राजा महाराज वगैरह बैठे थे सामने सब बाकी भक्त बैठे थे त्यागी संतान बैठे थे सब साधु और उस समय यह जयराम भाटी से आए हुए एक भक्त ने पूरा रिपोर्ट किया कहा कि जो भक्तों को आपने दीक्षा नहीं दी थी वह जब जयराम भाटी गए तो मां ने इनको देखकर के अफसोस करते-करते कहा कि देखो जब अपना लड़का विदेश में जाता है तो वहां से वह मां के लिए कितनी सुंदर-सुंदर गिफ्ट भेजता है और कितना अच्छा अच्छा खाना वगैरह भेजता है और राजा ने ना कि मेरे लिए ऐसे असार लोगों को भेजा कि जिसको मैं दीक्षा दूंगी तो उसके कर्म मुझे अपने पर लेकर के मुझे कितना सहन करना पड़ेगा ऐसा मां बोल रही है बीच-बीच में जो कोई सुन ना पाए किंतु यह जो दूसरा भक्त था वह सब सुन रहा था तो फिर थोड़ी देर के बाद में इस तरह से अफसोस करने के बाद में मां ने किंतु फिर अपने मन को ठीक कर लिया। कहा कि अच्छा ठीक है इन भक्त भक्तों को मैं दीक्षा दूंगी। राजा ने जब भेजा है किंतु बात सिर्फ यह नहीं है ना कि राजा महाराज ने भेजा है। मां का हृदय अभी इतना विशाल हो गया है कि जो भी आएगा पापी तापी जो भी है जो मां के चरण में गिरेगा जो अपने को शरणागत करेगा उनके ऊपर में मां की कृपा होने ही वाली है। तो फिर मां ने उनको दीक्षा दी। किंतु यह रिपोर्ट जो दूसरा भक्त जब बेलूर मठ में राजा महाराज बाबूराम महाराज सबको सुना रहा था तो बाबूराम महाराज हाथ जोड़कर के बार-बार कह रहे हैं कि कृपा ही केवलम कृपा ही केवलम इस तरह का जहर जो है वो सिर्फ मां ही हजम कर पाती है। राजा महाराज जैसे राजा महाराज ठाकुर के मानस पुत्र स्वयं उन्होंने इस जहर खाने से मना कर दिया। जहर को पचाने से मना कर दिया। वह जहर पचा के मां जैसे कि नीलकंठ हो गई। तो यह जो बेलूर मठ में जो त्यागी संतानों को पता चला कि कितनी महत उदारता मां में उस समय प्रस्फुटित हुई थी। तो देखिए कि यह पूरा
माँ का गुरुभाव : षोडशी पूजा से प्रारंभ होकर निवेदिता के समर्पण तक
ट्रेजेक्टरी है मां के जीवन का कि वहां पे शोडशी पूजा हुई। शोडशी पूजा से लेकर के एक के बाद एक बहुत सारी छोटी-छोटी घटनाएं हैं जिसका कि हम इस चैप्टर में पाठ करेंगे भार समर्पण में जिस घटनाओं के माध्यम से मां का मातृत्व मां का गुरुत्व शक्ति वो प्रस्फुटित हो रहा था वो अपनी परिणति पर पहुंचा जब मां ने निवेदिता को स्वीकार किया था। जैसे ही यह जो नरेंद्र की मां काली को स्वीकार करने की पूरी जर्नी थी। पहले तो जब आता था पहले पहले तो ठाकुर की मजाक करके कहता था कि आपको जो दर्शन हो रहा है वह सब हेलुसिनेशन है। वह सब आपके मन का भ्रम है। और फिर यह हाजरा के साथ में बैठकर के मजाक करता रहता था कि यह घटी भी ब्रह्म है। यह बाटी भी ब्रह्म है वगैरह-वगैरह। वो जो ट्रैजेक्टरी का अंत एक तरह का माइलस्टोन रिच हुआ जब मां काली के सामने नरेंद्र ने आत्मसमर्पण किया। उसके बाद में जगत जय करने की यात्रा चली। तो मेरी दृष्टि से मुझे ऐसा लग रहा है कि मां का जो मां की शोडशी पूजा से जो मां की यह जो गुरुत्व शक्ति जो उसका बाह्य प्रस्फुटन प्रारंभ हुआ। हृदय में तो थी ही थी। बचपन की बहुत सारी घटनाएं हमको पता है। किंतु जो बाह्य जो एक तरह से मैनिफेस्टेशन जो प्रारंभ हुआ दैट रीच्ड अ माइलस्टोन जबकि निवेदिता ने उनके सामने आत्मसमर्पण किया और उस घटना के बाद में जैसे कि मां का यह जो मातृत्व हृदय है उसने अब पूरे विश्व को अपने भीतर में समाहित कर लिया। इसके रिलेटेड निवेदिता ने अमेरिका से एक पत्र लिखा है। अमेरिका से ही मोस्ट प्रोबेबबली मां शारदा देवी को। उस पत्र में उन्होंने लिखा है कि उस समय सारा ओलीबुल बहुत बीमार थी और निवेदिता वहीं पर रह रही थी। तो इतना सुंदर पत्र है। वह लिखती है कि मैं मदर मेरी को प्रार्थना करने के लिए चर्च में गई। किंतु मदर मेरी को प्रार्थना करते-करते ही मेरी नजर के सामने आपका चेहरा वह प्रस्फुटित हो उठा। और ऐसा करके वह जो पत्र लिखती है कि मां की जो महिमा अपार करुणा अपार महिमा वो मधुर मेरी की तरह ही उनको किस तरह से मन में शांति दे रही है वो पत्र इतना सुंदर है वो एक एक दिन निकाल करके उसका पाठ करेंगे कि निवेदिता अपने हृदय के अंतर्मन से किस तरह से मां शारदा देवी की एक छोटी बालिका हो गई थी। मां उसको खुकी करके पुकारती थी। खुकी बंगाली शब्द है। उसका अर्थ है छोटी बच्ची। तो यह खुकी करके वो मां वो उनको पुकारती थी और निवेदिता खुद अपने को मां की एक बच्ची की तरह समझती थी। तो यह पूरा ट्रेजेक्टरी यहां पर उसके जो शुरू शुरू के जो प्रसंग है यह भारत समर्पण चैप्टर में वो गंभीरानंद जी महाराज ने लिखे हैं। अभी यहां पे एक पूरा पैराग्राफ है। उसका आज हम पाठ कर लेते हैं। गंभीरानंद जी महाराज
ठाकुर माँ को गुरु का पद संभालने के लिए तैयार कर रहे हैं
क्या कहते हैं? इहार पर श्री मां के स्वकार साधने जन स्पष्ट आह्वान जाना बार समय आगत एवं भक्त दिग के ओ विषय अबोहित कोरा आवश्यक यह जो ठाकुर ने मां की शोशी पूजा जो की थी वह तो बड़ी ही सीक्रेटली हुई थी। किसी को इसके बारे में बहुत कम लोगों को इसके बारे में पता था। किंतु इहार पर इसके बाद में अभी मां का जो स्व कार्यकार्य है उसके साधन के लिए स्पष्ट आह्वान जनाने का स्पष्ट आह्वान देने का समय आ चुका है। मां का जो जिस कार्य के लिए जगदंबा का पृथ्वी पर नर देह नारी देह धारण करके अवतरण हुआ था। उस कार्य का अभी मां को अंगित इंगित करवाने के लिए मां को रिमाइंड करवाने के लिए यह समय आ चुका है। एवं भक्त दिग के ओ से विषय अबितो कोरा आवश्यक और भक्तों को भी उस विषय के बारे में जानकारी देने की जरूरत है ताई श्री रामकृष्ण लीला बसाने पूर्ववती कोकटी बस धरिया तहार ए विषयक चेष्टा एकटा सु परिकल्पितो धाराए परिचालित होते देखा जाए इसीलिए श्री रामकृष्ण के लीला अवसान के पहले के कुछ साल चल कुछ सालों से उनकी इस बारे में जो प्रयत्न है चेष्टा है उसका एक सुपरिकल्पित धारा एक सोचा समझा प्लान करके ऐसा वैसा हवा में नहीं रैंडमली नहीं सुपरिकल्पित संस्कृत शब्द है बंगाली में यूज किया है बड़ा ही वेल प्लांड इसका अर्थ होगा बड़ा ही अच्छे से सोचा समझा हुआ धारा यानी कि प्रवाह बड़ा ही एक सु परिकल्पित धारा में इसको परिचालित होकर के हम देख सकते हैं। परिचालित होता देख सकते हैं। इसका वेल प्लान इंप्लीमेंटेशन हम देख पा रहे हैं। माता ठाकुरानी के तत् पूजा कोरिया अन्न भावे सम्मान दिया एवं नाना कथा प्रसंगे तहार देवित्व उल्लेख करिया तहार अब चेतना के ओई विषय जागरूक राखतेन मां को वो ठाकुर मां की पूजा करके अन्य तरह से सम्मान देकर के और विविध प्रसंग से विविध वार्तालाप से वार्तालापों में उनके देवत्व का उल्लेख उल्लेख करके उनकी जो चेतना है, उनका जो सबकॉन्शियस माइंड है, उसको वह इस विषय के बारे में जागरूक रखते थे। इस विषय के बारे में वह समान रखते थे। विभिन्न तरह से विभिन्न बातों से वह मां को एक तरह से रिमाइंड करवा देते थे कि हम लोग इस जगत में रसगुल्ला खाने के लिए नहीं आए हैं। यदि सुस्थ हो ना कि असुस्थ यदि मंद अधिकारी हो ना कि उच्च अधिकारी हमारा कार्य ही है इनको धर्म की शिक्षा और दीक्षा देने का। इस बारे में वह मां को सतत एक तरह का रिमाइंडर देते रहते थे। शय साधनार द्वारा उजीवितो ओ अनंत शक्ति पूर्ण बहु मंत्रो श्री मां के सिखाइया एवं की रूप अधिकारी के की दृश्य मंत्र देते होबे इत्यादि बोलिया दिया तहार गुरु शक्ति के कारोन्म मुखी करते छिलेन अपनी खुद की साधना के माध्यम से उन्होंने जो अनुभव किया है उस तरह के बहु अनंत शक्तिपूर्ण बहु मंत्र उन्होंने मां को सिखाए थे और किस किस तरह के अधिकारी को किस तरह का मंत्र देना है वगैरह कह के उनकी गुरु शक्ति को कारयोन्मुखी करीते छिलेन कार्यमुखी कर रहे थे। उनकी गुरु शक्ति को एक्टिवेट कर रहे थे। आज की लैंग्वेज में यदि कहा जाए तो कार्यशील कर रहे थे। देखिए कि ठाकुर ने जितने भी देवता हैं उस सभी देवताओं के कौन-कौन से बीज मंत्र है, कौन-कौन से अन्य नाम मंत्र है, वह सब धीरे-धीरे करके अपनी साधनाओं के माध्यम से उन्होंने रियलाइज किए थे। अपनी साधनाओं के माध्यम से उन्होंने साक्षात किया था। और यह सभी मंत्र उन्होंने मां को दिखाना शुरू किया था कि कौन से अधिकारी के लिए कौन सा मंत्र देना चाहिए। अभी यह प्रश्न एक हो सकता है कि आज के युग में यदि आप हमारे गुरु महाराज से दीक्षा लेंगे गुरु महाराज यानी कि परम पूजनीय प्रेसिडेंट महाराज के पास से दीक्षा लेंगे यदि आज तो आपको श्री रामकृष्ण मंत्र ही मिलेगा। तो मुझे लगता है कि यह जो सर्व देव देवी स्वरूपाय श्री रामकृष्ण उनके नाम और बीज के भीतर में सभी देवी देवताओं के मंत्र समाहित हो चुके हैं। अधिकंतु बालक ओ महिला भक्त दिग के श्री माय निकट पाठ दिया एवं ओशंगे नाना उपदेश दिया ताहार मातृ भाव प्रसार क्षेत्रो रचना करेते छिलेन और इस तरह से कौन से मंत्र कौन से अधिकारी के लिए उपयुक्त है यह दिखाने के साथ में ही यह जो छोटे-छोटे जो बालक संतान ठाकुर के पास में आते थे यह जो त्यागी संतान जो ठाकुर के पास में आते थे वह और यह महिला भक्त जितने भी हैं उन सबको मां के पास में पहुंचा देते थे। मां के पास में भेज देते थे और उसी के साथ में विभिन्न उपदेश देकर के उनके मातृभाव प्रसार का क्षेत्र वो रचना करते थे। देखिए मातृभाव प्रसार का क्षेत्र। इसका अर्थ क्या हुआ कि जब ठाकुर थे उस समय जो कंजर्वेटिव जो व्यवस्था थी उस समय मां का जो मातृभाव का क्षेत्र था वह यह त्यागी संतान और महिला भक्तों तक सीमित था। पुरुष भक्तों के सामने मां कभी आती भी नहीं थी। बाद में जब ठाकुर की महासमाधि के बाद में नरेंद्र के स्वामी विवेकानंद के भारत में आगमन के बाद में यह जो नव भारत का जो प्रारंभ हुआ यह जो पुरुष भक्तों को जो कि ठाकुर के त्यागी संतान नहीं थे और यह महिला भक्त भी नहीं थी। इस तरह के पुरुष भक्तों को मां ने जो दीक्षा देने की शुरुआत की वो नव भारत में यह सब संभव हो पाया है। वह जो भारत था कंजर्वेटिव भारत था ऑर्थोडॉक्स भारत था उसमें मां का जो मातृत्व महिमा क्षेत्र था वो मातृत्व महिमा क्षेत्र किंतु यह त्यागी संतान और यह महिला भक्तों तक सीमित था। इारे शंगे तनी आभार तहां के स्पष्ट भार ग्रहण आह्वान करते एवं भक्तगण के ओ ओई भाभी परिणति जन प्रस्तुत करते थाकीतेन उसी के साथ-साथ में ही वो मां को स्पष्ट ही भार ग्रहण करने के लिए वह आह्वान करते भार ग्रहण करने के लिए विनति करते और भक्तगण को भी वह जो भाभी परिणति यह जो भविष्य में जो होने वाला है उसके लिए ठाकुर प्रस्तुत करते रहते तैयार करते रहते आमरा अतः पर ए शकल घटना ारी आलोचनाएं अग्रशर होइबो इसके बाद में हम इसी सब घटनाओं की आलोचना प्रारंभ करेंगे तो यह आलोचना अभी हम कल से करेंगे आज यहीं तक ओम शांति शांति शांति हरि ओम ओम तत्सत श्री राम
प्रश्न: आपने माँ की कहानी सुनाई - कैसे उन्होंने एक व्यक्ति के पापों को अपने ऊपर ले लिया। मैंने भी दीक्षा ली है, लेकिन मुझे कोई आध्यात्मिक अनुभूति नहीं हुई।
कृष्णपणमस्तु। देखिए मैं अपने खुद के बारे में बताऊं। मैंने वैसे स्वामी जी को थोड़ा बहुत पढ़ा था बोलकर के ये जो स्वामी जी का जो आईडिया था कि यंग लड़कों को यह देश की सेवा के लिए जीवन समर्पित करना चाहिए। तो ऐसा एक भाव ले मैं यहां पे आया था। फिर आकर के पता नहीं है मतलब जिस तरह से मैं आया था रामकृष्ण मिशन के साथ में परिचय था साधुओं को पहचानता था बोल के ही आया था किंतु दीक्षा क्या है मंत्र जप क्या है वगैरह कुछ नहीं पता था मेडिटेशन के बारे में किताबें पढ़ी थी प्रैक्टिस अपने से कुछ कर किया करता था किंतु मंत्र दीक्षा के बारे में अब्सोलुटली कुछ नहीं पता था तो वो मंत्र जब मैं आया था मैं चेन्नई जॉइ किया था मैंने उस समय टी नगर सेंटर में तो महाराज ने पूछा तुम्हारी दीक्षा हुई है तो मैंने कहा दीक्षा क्या है मुझे मुझे नहीं पता है। तो बोला ठीक है चलो एक काम करो वो रंगनाथानंद जी महाराज परम पूजनीय रंगनाथानंद जी महाराज आ रहे हैं बेंगलुरु में तो तुम जाकर के दीक्षा ले लेना तो मैंने कहा ठीक है आप कहते हैं तो ले लेता हूं मेरे माइंड में तो वही था कि वो स्वामी जी ने जो कहा देश सेवा या तो फिर गरीबों की सेवा वो करना है यह दीक्षा वगैरह यदि सिस्टम है यहां का तो ले लेना पड़ेगा व्हाटएवर जो इंस्टीट्यूशनल नियम होता है उसके अनुसार तो मैं बेंगलुरु गया वहां पे वो मैं ब्रह्मचारी के कपड़े में गया था तो वो जो महाराज जी के जो सेवक थे उनको बड़ा अच्छा लगा। यह ब्रह्मचारी दीक्षा लेने के लिए आया। जनरली तो क्या है कि जो जॉइ करने को आता है तो पहले से ही दीक्षित होता है। सिस्टम के साथ काफी परिचित होता है। बाद में जॉइ करता है। तो वहां पे जितने भी लोग थे मैं अकेला एक ब्रह्मचारी था। तो मेरे साथ में वो सेवक महाराज अलग से बैठकर के बातें करते थे। महाराज को सुबह को मॉर्निंग वक के लिए जाते थे। मैं साथ-साथ में जाता था। दैट वास वेरी गुड टाइम। वन वीक मेरा बहुत अच्छा गया। किंतु क्या है? जब मैं वापस आया तो वही बात है ना कि आए हैं गांव में कार्य करने के लिए रूरल डेवलपमेंट ट्राइबल डेवलपमेंट कुछ फंडामेंटल कुछ करना है नहीं कि एक आश्रम में बैठ के ये सब किताबें किताबें पढ़नी है तो जब मैं सुहितानंद जी को उस समय सुहितानंद जी हमारे पीपीडीस के इंचार्ज थे उनको मैंने कहा कि महाराज जी मुझे तो गांव में काम करना है यह सब कुछ मेरे से नहीं होगा क्लास में बैठकर के काम करना वगैरह तो उन्होंने बोला अच्छा ठीक है तुम जाओ रांची चले जाओ मैं सब व्यवस्था कर देता हूं तो मैं रांची आया 3 साल जो मैं रहा था मैंने मुझे याद नहीं है कि मैंने कभी ऐसा मंत्र का जप किया होगा या मंत्र दीक्षा के बारे में मैंने कभी सोचा भी होगा। मैंने वह जो पूरा मेरा जो शुरुआत का जो चार साल ऐसा कुछ गया है वो दीक्षा लेनी है बोलकर के दीक्षा ली है। दैट इज ऑल। किंतु उसके बाद में जब मैं बेलूर मठ में वापस आया जब वो एक धीरे-धीरे करके एक अकल ठिकाने आई कि नहीं आध्यात्मिकता का भी जीवन में जरूरत है। और जब मैंने खास करके मां की किताबें पढ़ना शुरू किया। तब मुझे लगा कि एक इनर डायमेंशन कितना बड़ा है। तब तक देखिए कि यह मंत्र ना और फिर मैं जब बेलूर मठ में सेकंड टाइम लौटा पीपीटीसी में तब मैंने सीरियसली मंत्र जप करना शुरू किया। उसके पहले मंत्र है वो याद रखना था उतना ही। उससे आगे और कुछ नहीं। मुझे लगता है वो मंत्र ना जैसे कि सबकॉन्शियस में वह कार्य कर रहा था। वह जैसे बीज जमीन में जाता है। ज्ञान योग में स्वामी जी इस बात को ना बड़ी स्पष्ट रूप से कहते हैं। ज्ञान योगी राजयोग में भूल गया। बीज को आप जब जमीन में डालते हैं ना तो उसका जेस्टेशन जब होता है वहां से लेकर के किंतु जो प्रथम उसकी जो ये होता है ना अंकुर जो प्रस्फुटित होता है जमीन से बाहर आता है उसमें एक समय लगता है तो जो बाहर से देख के आपको ऊपर से नहीं पता चलेगा कि वो जर्मिनेट हो चुका है। उसकी जड़े शाखा प्रशाखा आना शुरू हो गया है। जब तक वो जमीन से बाहर नहीं आता। ह वह जो जेस्टेशन पीरियड जो होता है ना अपने लाइफ में होता है मंत्र का और अभी आप सभी के जीवन में देखिए कि जो लोग मंत्र लेते हैं वह जप कितना करते हैं दैट इज अनदर मैटर किंतु रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य के प्रति रामकृष्ण विवेकानंद मां शारदा देवी की वार्ताओं के प्रति उनके उपदेशों के प्रति जो प्रेम प्रकट हुआ है दैट इटसेल्फ सेज़ कि यह तो कितना बड़ा भीतर में से कार्य हो रहा है। अदरवाइज आप बीच डाला तो वट वृक्ष होने में देरी तो लगेगा ही। सो उसका अर्थ यह नहीं है कि प्रोसेस अटक गया है। इट विल टेक टाइम टू मतलब मैनिफेस्ट ना मीनवाइल सिग्नल है ना कि
प्रश्न: मंत्र का महत्त्व समझने भी समय लगता है. किन्तु क्या कोई सिग्नल मिलते है रास्ते में?
देखिए रामकृष्ण विवेकानंद साहित्य में प्रेम होना ठाकुर मां स्वामी जी की बातें सुनने में प्रेम होना बीच-बीच में मंदिर में जाना साधु संग करने की इच्छा होना यह तो सब इंटरमीडिएट सिग्नल है ना या आप यदि आप वो मान लीजिए कि वो राजकोट से कोलकाता की यात्रा करेंगे तो आप यात्रा कर रहे हैं कैसे पता चलेगा कोलकाता इमीडिएटली तो आने नहीं वाला है वो भूसावल आएगा फिर मध्य प्रदेश आएगा वो रायपुर आएगा नागपुर आएगा तो जैसे-जैसे वह स्टेशन आते-जाते पता चलता जाता है कोलकाता की ओर जा रहे
प्रश्न: मंत्र का महत्त्व समझना बड़ा मुश्किल है
हैं। रिस्पांसिबल इज आवर सेकुलर माइंडसेट। मैं खुद मुझे खुद को यह सब चीजों को एक्सेप्ट करने में कितना स्ट्रगल करना पड़ा है। मैं हमेशा इसको अंधश्रद्धा या तो पुराना थिंकिंग बोल के उड़ा देता था। क्या स्वीकार करना है? तो स्वामी जी का राष्ट्र प्रेम ये जो जीवे दया शिव ज्ञान जीव सेवा इस बात को एकदम साइंटिफिक बेसिस पर मैं स्वीकार कर सकता हूं। किंतु यह मंत्र है, यह दीक्षा है, यह ईश्वर दर्शन है। यह सब क्या है? यह सब स्वीकार करने में सही में मुझे स्ट्रगल करना पड़ा है। ना सबका एक स्पिरिचुअलिटी मैच्योरिटी का एक पीरियड मतलब एक ट्रेजेक्टरी होता है ना। किसी किसी का हो जाता है। अब जैसे कि पूर्व जन्म के संस्कार अच्छे होते हैं तो वो इमीडिएटली उनको हो जाता है। शंकराचार्य ने देखिए ना इतनी छोटी उम्र में 16 साल की उम्र में भाष्य लिख दिए। बाकी 16 साल भारत भर के वो अद्वैत वेदांत का प्रचार कर दिया। स्वामी जी भले ही चाहे उनको एक समय लगा होगा मां काली को स्वीकार करने में किंतु फिर बाय द एज ऑफ 39 पूरे विश्व में उसी मां काली का प्रचार कर दिया वही निवेदिता को विदेशी औरत को बुला करके मां काली पे निबंध लिखवा दिया एक बार पिकअप पकड़ लेता है माने दो चीज होगा किसी का स्टार्टिंग देरी से होगा किसी का यह होगा जल्दी हो जाएगा किसी को पिकअप करने में देरी लगेगा किसी का फास्ट हो जाएगा दैट्स एवरीवन है इट्स ओन ट्रेजेक्टरी
प्रश्न: ठाकुर देख-सुन शिष्य बनाते थे किन्तु माँ सबको दीक्षा देती थी. ऐसा क्यों?
वह जो हमारे स्मरणानंद जी महाराज कहा करते थे कि यदि आप मंदिर में जाएंगे ना ठाकुर मां स्वामी जी का जो फोटो देखेंगे स्वामी जी आंखें स्वामी जी की आंखें बंद दिखेगी और ठाकुर की आंखें अर्ध खुली है जबकि मां की आंखें पूरी खुली है। इसका अर्थ है कि स्वामी जी बड़ा देख देख करके शिष्य बनाते थे। ठाकुर जनरली लोगों को बनाते थे शिष्य। जबकि मां के पास में जो आता था सबको मां शिष्य बना देती थी। वो फोटो देख के ही आप समझ जाएंगे ये तीनों का क्या है वो स्ट्रेटजी। ये सब प्रश्नों की कोई है ना ये सब प्रश्नों की कोई ऐसे गंभीर मीमासा होनी शक्य नहीं है क्योंकि यह सब आध्यात्मिक विषय इतने गहन है कि इसके बारे में हमारी क्षुद्र बुद्धि वह अटक जाएगी काम करती। क्योंकि अपनी जो एक्सप्लेनेशन होती है ना इस सब चीजों के बारे में वह एज ए अपने खुद के आनंद के लिए अच्छी है। वी कैन नेवर प्रोपगेट इट एज ए फैक्ट और एज अ ट्रुथ और एज ए इवन एनलाइटेंड ओपिनियन वो है। हम ऐसा कह सकते हैं कि मेरा अंडरस्टैंडिंग
प्रश्न: जो लोग आपको बुला रहे है स्पीच देने के लिए किन्तु कह रहे है की धर्म पे नहीं बोलना -- यह बात कितनी अजीब सी लगती है. धर्म ही तो भारत का प्राण है.
है। ये जो मैंने कहा था ना कि ये कॉलेज के स्टूडेंट यहां पे आते हैं तो उनके लिए मैं क्लास लेता था लेता हूं। तो मैं सोच रहा हूं कि किस तरह से उनको इंटरेस्ट बनाया जाए। तो मैंने देखा कि जब मां की बात करता हूं स्वामी जी के म छोटे-छोटे प्रसंग वो इतने उनको अच्छे लगते हैं दे ऑल रिसोंड वेरी पॉजिटिवली। तो मेरे पर यदि छोड़ दिया जाता तो मैं वही सब प्रसंग एक के बाद एक मां के वो बताता उनको कितना अच्छा लगता। उसकी बजाय अभी वो एक पीस एंड हैप्पीनेस इन डेली लाइफ बोल के वो बिना मतलब का एक सब्जेक्ट है। तो ठीक है। अभी माने कैसे भी हो एटलीस्ट चलो भाई रामकृष्ण मिशन के साथ में उनका कुछ कांटेक्ट है बोल के ही मैं जा रहा हूं अदरवाइज मैं सोचना पड़ता क्या करूं ना बट एटलीस्ट दैट वास एक्सप्लसिटली रिलेटेड टू रिलीजन म वर्ल्ड पार्लियामेंट ऑफ रिलीजन दैट रिलीजन कम्स विद इन द टाइटल ऑफ द कॉन्फ्रेंस इटसेल्फ तो वहां पे एटलीस्ट स्वामी जी को इस तरह का कोई ये नहीं था रिस्ट्रेंट कि धर्म पे बात नहीं करनी है। इनफैक्ट धर्म पे ही बात करनी है। वो तो इंडियन कल्चर एंड ट्रेडिशन के बारे में इसलिए बोलते थे कि लोगों को भारत पे प्रेम जागृत हो। दैट ना वो अपना डिवोटी है वो बोला रहा है कि वो कह रहा है कि आप आइए इसलिए मैं जा रहा हूं बेसिकली और नेचुरली हम लोग जब जाएंगे तो ठाकुर मतलब एटलीस्ट स्वामी जी के बारे में तो मुझे बोलना ही होगा। ऐसा तो मैं ऐसा किसी भी तरह का कंडीशन सुनने वाला नहीं हूं। बट वी हैव टू बी जैसा आपने कहा कि आपने ठीक ही कहा कि रामकृष्ण मिशन के साधुओं का यह एक जग जाहिर है एक्चुअली मुझे कुछ उसी उसी सिलसिले में मुझे यहां के जो सेक्रेटरी महाराज हैं उन्होंने मुझे बताया कि वो दिल्ली में थे उस समय एक वो मुस्लिम बॉडी जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में एक कॉन्फ्रेंस थी तो वो अपने वहां दिल्ली के जो बड़े महाराज थे उस समय के शांतात्मानंद जी उनको बुलाया था तो शांतात्मानंद जी नहीं जा पाए थे उस समय यहां के जो बड़े महाराज हैं वहां पर मैनेजर थे तो उनको कहा कि तुम जाओ तो महाराज गए तो महाराज को ऑलरेडी कुछ कुरान का बारे में कुछ स्टडी है तो कुरान का एक जो एक है पैसेज वो वो पढ़ के गए थे और उसके बारे में उन्होंने बोल दिया तो वहां के लोग इतने खुश हो गए जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी दिल्ली की वो इतना खुश हो गए हैं कि बाद में वो महाराज को आग्रह करने लगे कुरान के बारे में और भी ज्यादा बताइए महाराज बोलते हैं अभी महाराज ने उनके सामने कुछ नहीं बोला मुझे बता रहे हैं मैं एक ही पैसेज पढ़ के गया था मुझे ज्यादा आता भी नहीं बट हमारे बारे में इस तरह का है कि यह जो साधु है रामकृष्ण मिशन के दे हैव यूनिवर्सल आउटलुक वो सेक्ट या जैसे कि कुछ-कुछ होते हैं ना सेक्ट कि वो अपने बारे में ही बोलेंगे अपनी ही बढ़ाई करेंगे ऐसा हमारा नहीं है ऐसा एक जगजाहिर है यह बात सही है ये जो सिविलाइजेशनल स्टडी खास करके है राइज़ एंड फॉल ऑफ सिविलाइजेशन और इसके पीछे में जो रिलीजन इज़ अ फैक्टर मतलब नॉट एनी डिनोमिनेशन बट रिलीजन पर से इज़ अ फैक्टर तो दैट इज़ अ पार्ट ऑफ़ सिविलाइजेशनल
प्रश्न: ठाकुर कहते हैं कि शक्ति तो सभी में है लेकिन उसका प्रकाश सभी में अलग-अलग है। जब की स्वामीजी कहते है -- मैनिफेस्ट योर डिविनिटी। इन दोनों में फर्क क्या है?
स्टडीज। देखिए, पहली बात तो है कि जो कंपैरिजन है ना वह वैलिड नहीं है। इसलिए क्योंकि ठाकुर ने कोई एक्शन लेने के बारे में नहीं कहा। ठाकुर ने जस्ट इज़ अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट कि ब्रह्म और शक्ति पूरे जगत में है और शक्ति का तारतम्य डिफरेंट है। ठाकुर ने ऐसा नहीं कहा कि इससे संतोष मान के बैठे रहो या इसके बाद में कुछ कहो। इज़ अ जस्ट अ मैटर ऑफ़ फैक्ट। इज़ अ स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट। जबकि यहां पर स्वामी जी एक्शन के बारे में बता रहे हैं कि मैनिफेस्ट योर डिनिटी मैनिफेस्ट योर शक्ति विदिन और जो अनकही बात है या तो फिर इसके जो पैरेलल चलेगा फर्स्ट ऑफ ऑल वी विल हैव टू गो डिपर इनसाइड अस इन ऑर्डर टू गो आउटसाइड फदर अहेड अहेड राइट तो दिस स्वामी जी का इज अ मैटर ऑफ वो इट्स अ मिशन स्टेटमेंट स्वामी जी जो बता रहे हैं इट्स अ मिशन स्टेटमेंट अभी इस ठाकुर का इज अ स्टेटमेंट ऑफ फैक्ट कि वह यह है राइट? तो इन दोनों का आप कंपेयर नहीं कर सकते। कंपेयर आप कहां कर सकते हैं? ठाकुर ने कहा कि ईश्वर दर्शन ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। दैट इज ठाकुरस मिशन स्टेटमेंट। उसके साथ में स्वामी जी का मिशन स्टेटमेंट कीजिए कि यह जो मैनिफेस्टेशन ऑफ डिविनिटी है वह होना चाहिए। तो वह दोनों हमको अलग दिशा में ले जाता हुआ दिखेगा। किंतु दोनों का एम तो एक ही है। स्वामी ठाकुर यदि कहते हैं गो डिपर इनो आवरसेल्फ। तो स्वामी जी कहते हैं गो आउटसाइड ऑफ आवरसेल्फ। सो दैट वे दिस बोथ आर कनेक्टेड। कि जितना आप डीप में जाएंगे उतना ही आप शक्ति का जो मैनिफेस्टेशन है उतना कर पाएंगे। ब्रिटेन का ही देखिए कि छोटा सा टापू है वहां पे सब समय ये धुमस ये जो जो ये कहते हैं कि ये फोग फोग लगा रहता है। सनराइज भी सनलाइट भी नहीं मिलता है। इतने कुछ चंद लाख लोगों का पॉपुलेशन होगा। किंतु भीतर में वो जो साइंस एंड टेक्नोलॉजी मॉडर्न लर्निंग को इतना उन्होंने डेवलप किया। यह जो जो न्यूटन वगैरह जैसे जो ग्रेटेस्ट साइंटिस्ट उस समय के थे इवन आज के भी सो दे वेर एबल टू प्रोजेक्ट देयर पावर अप टू इंडिया। बट हाउ वेवर दे एबल टू प्रोजेक्ट दे पावर टू अप टू इंडिया एंड चाइना बिकॉज़ दे डेवलप देयर इनर साइंटिफिक लर्निंग। सो जितना डीप में जाएंगे उतना ही आप बाहर आएंगे। तो ठाकुर का जो मिशन स्टेटमेंट है दैट इज रियलाइज गॉड। और स्वामी जी का जो मिशन स्टेटमेंट है कि मैनिफेस्ट योर डिविनिटी तो रियलाइज़ एंड मैनिफेस्ट। इन दोनों के बीच में आप कंपेयर कर सकते हैं। नहीं कि ठाकुर स्टेटमेंट ऑफ़ फैक्ट कि ब्रह्मा और शक्ति सब जगह पे है और शक्ति का मैनिफेस्टेशन इज़ डिफरेंट-डिफरेंट है। इट्स जस्ट अटै मैटर ऑफ़ फैक्ट। इट्स नॉट अ मैटर स्टेटमेंट ऑफ मिशन मिशन स्टेटमेंट। इसके साथ में ठाकुर का यह स्टेटमेंट कंपेयर करना चाहिए कि ईश्वर दर्शन ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। सो दैट विल अगेन बिकम डायनेमिक अकॉर्डिंग टू टाइम स्केल उसको हम वेरीरी कर सकते हैं।
प्रश्न: निवेदिता और माँ के बीच कितना विरोधाभास है!
माने आप जो मां काली का जो पूरा ये जो है ना फिलॉसोफी उस समय ये जो जो एजुकेटेड जो समाज था ना कोलकाता का वो बड़ा खफा था मां के मां काली के ऊपर। माने जितनी भी अंधश्रद्धा है भारत की एव्री ऑल द अंधश्रद्धा मां काली के भीतर में परसोनिफाइड दिखती है। माने जहां पे वो क्रिश्चियनिटी का जो एनलाइटेंड आईडिया सो कॉल्ड एनलाइटेंड आईडिया जिसके साथ में वो काली के साथ में कंपेयर करेंगे वो इतना बड़ा कंट्रास्ट दिखता है। सब कहते हैं मां काली का पुजारी यानी कि वो कितना वो अंधश्रद्धा कितनी वो जो कहेंगे कि वो इलिटरेसी में डूबा होगा। तो यहां पे ऐसी मां काली का स्वामी जी ने स्वीकार किया। उस समय के नरन म एपिटमी ऑफ वेस्टर्न लर्निंग ठाकुर ने खुद ने कहा एक बार जाकर नरेंद्र गीता की प्रशंसा करता है श्रीमद्भगवत गीता की तो ठाकुर क्या कहते हैं लगता है किसी विदेशी पंडित ने गीता की प्रशंसा की है इसलिए सो सही एपिमी स्वामी जी को बहुत या तो फिर स्वामी जी को पता चला होगा कि ठाकुर ने उनकी नस पकड़ ली है तो वो नारायण का महाकाली को स्वीकार करना यह जो इट्स अ वर्ल्ड मूविंग जो एक घटना है माने कैटेलिज्मिक इवेंट जिसको कहते हैं आज की लैंग्वेज में पृथ्वी पे उल्कापात होता है तो कैसी अध वो जो जनसंख्या स्पीशीज है वो नष्ट हो जाती है इसको कहते हैं कैटेकलिज्मिक इवेंट सो दिस इज़ आल्सो इन अ रिलीजियस फील्ड इज़ अ कैटलिज्मिक इवेंट नर का मां काली को स्वीकार करना सिमिलरली निवेदिता का मां शारदा देवी को स्वीकार करना जो कितना मतलब आप जस्ट सुपरफिशियली भी स्टडी करेंगे तो पता चलेगा कितना कंट्रास्ट है दोनों के बीच में एक बात बताऊं मैंने आपको पता है ना
प्रश्न: हमें नहीं पता था कि नरेन द्वारा माँ काली को स्वीकार करना इतनी महत्वपूर्ण घटना थी
मैंने वो जो पूरा एक शारदा कोष तैयार किया है एनसाइक्लोपीडिया कि 1836 से लेकर के ये 1936 कि ठाकुर के जन्म से लेकर के बेलूर मठ में ठाकुर का जो मंदिर का वो जो कंजक्रेशन हुआ वहां तक का 100 इयर्स का हिस्ट्री वो मैं पूरा कंपाइल कर रहा हूं टाइमलाइन वगैरह तो मैंने सोच के रखा है कि पूरा मैं मल्टी वॉल्यूम एक लिखूंगा हिस्ट्री हिस्ट्री कि 100 100 इयर्स हिस्ट्री ऑफ रामकृष्ण भावधारा तो पहले तो मैंने सोचा था कि प्रत्येक इवेंट को मैं उसमें स्थान दूंगा किंतु वो तो बहुत बड़ा हो जाएगा। फिर मैंने सोचा कि इतना बड़ा भी क्या मैं इतना समय भी मिलेगा कि नहीं इस जीवन में किसको पता तो फिर मैंने सोचा कि एक काम करता हूं टर्निंग पॉइंट्स को लेकर के मैं लिखूंगा। टर्निंग पॉइंट्स और मेजर थीम्स और मेजर आइडियाज इसको लेकर के। तो ये जो टर्निंग पॉइंट होते हैं ना उसके ऊपर में मेरा बड़ा एक नजर रहता है कि कहां पर टर्निंग पॉइंट आता है। कहां पर मेजर इवेंट होता है। कहां पर कैटेगिलिज्मिक इवेंट होता है। कहां पे वो जो मेजर आइडियाज डेवलप हो रहे हैं। सो यह जो है ना इट्स अ स्टडी ऑफ़ टर्निंग पॉइंट्स। क्योंकि अल्टीमेटली देखिए कि लीला प्रसंग में बहुत सारी घटनाएं हैं। गंभीरानंद जी की मां के जीवन में, स्वामी जी के जीवन में, कंप्लीट वर्क्स में, फिर यह कथामृत में इतनी सारी घटनाएं हैं। सब इकट्ठा करेंगे तो बहुत बड़ा हो जाएगा। तो भले ही चाहे मैं मल्टी वॉल्यूम भी लिखूं तो भी वो होगा नहीं। देन आई विल हैव टू फोकस ऑन सम की एस्पेक्ट्स। सो दिस टू की एस्पेक्ट्स आई हैव डिसाइडेड टर्निंग पॉइंट्स एंड मेजर आइडियाज और वो डेवलप कैसे हुआ है और ये उसका मैनिफेस्टेशन कैसे हो रहा है वो स्टार्ट नहीं किया है। आईडिया के रूप में है अभी ये
हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ब्रह्म-शक्ति-अभेद रूपी केंद्रीय विषय रामकृष्ण-विवेकानंद साहित्य में कैसे विकसित होता है
पूरा क्योंकि अल्टीमेटली क्या है? आपको एक सेंट्रल थीम पकड़ना है। रामकृष्ण विवेकानंद भावधारा है। उसका सेंट्रल थीम क्या है? तो मेरी दृष्टि से यह है कि ब्रह्म और शक्ति अभेद यह जो वैदिक युग में जो था कि यह पूरा जो नेचर, ह्यूमन सिविलाइजेशन, आइडियाज और स्पिरिचुअलिटी यह सबको कंबाइन हम गिनते थे। बाद का यह जो बुद्धिस्ट स्प्लिट हुआ और इस स्प्लिट को फिर यह भक्ति मूवमेंट और वेदांत मूवमेंट दोनों ने और ज्यादा इसके पीछे में डबल डाउन हो के इसको यह स्प्लिट को बढ़ाया कि ये सेकुलर वर्ल्ड इज डिफरेंट एंड स्पिरिचुअल वर्ल्ड इज डिफरेंट। ये कॉस्मोलॉजी है। एस्ट्रोनॉमी है। यह फिजिक्स है। केमिस्ट्री बायोलॉजी यह सब मिथ्या है। ब्रह्म अकेला सत्य है। या तो निर्वाण सत्य है या तो ईश्वर सत्य है। दैट स्प्लिट वाज़ हील्ड बाय दिस रामकृष्ण विवेकानंद थिंकिंग। तो हाउ दिस सेंट्रल थीम डेवलप्स थ्रू एव्री माइलस्टोन थ्रू द डेवलपमेंट ऑफ ऑल अदर मेजर आइडियाज दैट विल बी अ रियली फैसनेटिंग स्टडी उसके लिए सॉलिड मतलब थिंकिंग करना होगा बैठ
यदि हमारे साहित्य में विरोधाभास हैं, तो हमें उन पर चर्चा करने से कतराना नहीं चाहिए
के दूसरा क्या है पता है यह जो कंट्रास्ट है ना हम ही को खड़े करने हैं पैराडॉक्स हम ही को खड़े करने हैं कोई हमारे लिए खड़ा करे और हम उसको छुपा के रखें यह सब क्या है वी आर द इंटेलेक्चुअल इनहेरिटर्स ऑफ द उपनिषद वेदास एंड स्वामी विवेकानंद वी शुडंट बी अफ्रेड ऑफ कंट्रोवर्सी। वी शुडंट बी अफ्रेड ऑफ आर्गुममेंटेशन। यह रंगनाथानंद जी के बारे में वह एक विदेशी उनका इंटरव्यू ले रहा था। अमेरिका गए थे तो वो जितना प्रश्न करता है कंट्रोवर्शियल रंगनाथानंद जी इतना उत्साह से उसका उत्तर देते हैं तो वो लगता है वो कहता है कि इट सीम्स लाइक यू एंजॉय कंट्रोवर्सी। वी आर द हम लोग तो स्वामी जी के संतान हैं। वी शुड एंजॉय कंट्रोवर्सी। वी शुड एंजॉय कंट्रास्ट एंड पैराडॉक्स। क्योंकि ये है तो हमको एक इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज करने का मौका मिलता है। व्हाई शुड वी रन अवे? तो मतलब जितने भी पैराडॉक्स है जितने भी कंट्राडिक्शन है उसको रेज करने हैं और उसका उत्तर देना है। आंसर माइंड ने माइट नॉट बी कन्विंसिंग टू यू। बट इट प्रूव्स दैट वी आर नॉट रनिंग अवे फ्रॉम एनी कंट्राडिक्शन और एनी पैराडॉक्सेस।
दो बार माँ को दक्षिणेश्वर से चले जाना पड़ा था. एक बार ह्रदय के दुर्व्यवहार से, और दूसरी बार ठाकुर के कहने से. इसकी क्या व्याख्या है?
अब अब जैसे मां और ठाकुर का इतना दिव्य संबंध है। यही मां शारदा देवी जय राम बाटी से दक्षिणेश्वर आती है। तो एक बार हृदय उनके साथ में झगड़ा करता है। यहां पे क्यों आई हो? चले जाओ। तो यहां पे गंभीरानंद जी स्पष्ट लिखते हैं कि हृदय के डर के मारे ठाकुर कुछ नहीं बोल पाए। अरे भाई आप नारायण स्वयं है। मां जगदात्री की रक्षा आप नहीं करेंगे तो कौन करेगा? तो ऐसा हृदय के डर से कुछ नहीं बोल पाए। दूसरी बार मां आई तो ठाकुर का हाथ टूट गया था। तो ठाकुर ने कहा कौन से वो मुहूर्त में तुमने यात्रा की है तो बृहस्पतिवार बारबेलाए तो ठाकुर ने कहा जाओ यात्रा बदल करके आओ अशुभ मुहूर्त में यात्रा की बोल के मेरा हाथ टूट गया अब ये ठाकुर मां को ऐसी बात करेंगे ये क्या है भाई ऐसा राइट सो इट्स अ कंट्राडिक्शन समथिंग के अधर जो ठाकुर और मां के जो संबंध के बारे में जहां पे जो कुछ भी लिखा गया है ये उसके बिल्कुल विरोध में जाता है। सो व्हाई इज इट दैट? वी शुडंट बी अफ्रेड ऑफ आंसरिंग दिस क्वेश्चन। दूसरे लोग बाहर वेल ये साम्यवादी है। बोलते हैं ठाकुर ने मां का अपमान किया, मां को इग्नोर किया। अभी ये आजकल का फेमिनिज्म की दृष्टि से कहते हैं। अभी उसको छोड़ दीजिए। बट व्हाट कंट्राडिक्शन दैट वी कैन फाइंड विद इन आवर ओन लिटरेचर। व्हाई शुडंट वी टॉक अबाउट इट? व्हाई शुडंट वी रन अवे फ्रॉम इट? वही है कि ये सब चीजों का कोई प्रॉपर उत्तर हमको मिलेगा नहीं। द थिंग इज दैट कि हमारे पास में वह करेज है इसके बारे में बात करने का। और हम यह स्वीकार करते हैं कि इसका जो उत्तर है ना वह जब सुपरकॉन्शियस लेवल पर नहीं जाएंगे तब तक मिलेगा नहीं। बट मेन थिंग इज दैट वी एक्सेप्ट ऑल दिस क्वेश्चंस एंड वी डू नॉट रन अवे फ्रॉम देम। यह जो कैथोलिक चर्च ने जो जीसस के बारे में कुछ-कुछ जो अनकंफर्टेबल फैक्ट्स थे उसको छुपाने का प्रयास किया। इसके बाद में जो मॉडर्न एज में ऐसा हो गया है कि जीसस बोल के कोई था ही कि नहीं? यह सब प्रश्न खड़ा होने लगा है। तो अभी आपने एक दो फैक्ट छुपाने का प्रयास किया। उसमें से इतना बड़ा 2000 साल के बाद एक ये प्रॉब्लम खड़ा हुआ है। व्हाई शुड वी लेट दिस सॉर्ट ऑफ कंट्रोवर्सी अराइज़ आफ्टर 2000 ईयर? 2000 साल के बाद में इस तरह की कंट्रोवर्सी हो ये हम होने ही क्यों दे? ठीक ठीक ठीक। वो मां सीता इतनी पवित्रता स्वरूपणी स्वयं थी। फिर भी वो मां सीता के ऊपर में किंतु वो एक दूसरा था कि वो क्या है? राज्य शासन चलाने के लिए जो प्रजा की बात सुननी पड़ती है उसके लिए मां सीता को यह सब रैशन वैसे काम नहीं करता है। हम जो मां सीता के जो फॉलोअर्स हैं वो तो भगवान राम के पास में जाकर प्रश्न करेंगे ही करेंगे कि हमारी सीता मैया को क्यों जंगल में भेज दिया? नेचुरली वी शुड नेवर बी शाई अवे फ्रॉम क्वेश्चनिंग। माने भगवान भगवान राम ने मां सीता की एक बार परीक्षा की। भक्त लोग ये दो 10,000 साल से भगवान राम की परीक्षा कर रहे हैं। क्यों ऐसा किया? ये जो मां ने कहा ना कि ठाकुर क्या रसगुल्ला खाने को आए हैं? रसगुल्ला खाने को नहीं आए हैं। आदर्श स्थापन करने को आए हैं। और आदर्श स्थापन कैसे होगा? सेल्फ सैक्रिफाइस से होगा। सो नेचुरली कि जहां सेल्फ सैक्रिफाइस हम खुद नहीं करेंगे। ठाकुर मां स्वयं नहीं करेंगे तो हम कैसे सीखेंगे? इसमें होता क्या है ना? प्रॉब्लम क्या है ना? मां के संतान तो बुद्धि से नहीं सोचेंगे ना। हम लोग तो हृदय से सोच के बोलेंगे कि मां के साथ में ऐसा क्यों किया? अभी जैसे ठाकुर का अभी यह 150 साल है। हम क्वेश्चन कर रहे हैं। 1500 साल के बाद में भी यही क्वेश्चन हम उन लोग ठाकुर को पूछते ही रहेंगे मां के वो संतान हो करके कि क्यों मां को वहां से दक्षिणेश्वर से निकाल दिया। ये सब चीजों में बुद्धि नहीं चलती है ना।
प्रश्न: हम सब माँ के ही पक्ष में है, ठाकुर के नहीं
इसका अर्थ यह भी हुआ ना कि ब्रह्म ज्ञान से बड़ा मातृ हृदय है। ठाकुर के पास में ब्रह्म ज्ञान है। किंतु फिर भी हम लोग यदि चॉइस करने को आएंगे हम कहेंगे कि ब्रह्म ज्ञान नहीं मातृ प्रेम चाहिए। ये जो ब्रह्म शक्ति अभेद इससे बड़ा और प्रूफ क्या
प्रश्न: जीवन के आखिर में स्वामीजी भी बालक की तरह सहज हो गए थे.
है? वो जो बचपना कैसे प्रकटित होता था कि वो स्वामी जी के वो जो एक छागल यानी कि एक बकरा पाल के रखा था। हंस पाल के रखा था और राजा महाराज का बगीचा था। अभी यह स्वामी जी के ये जो यह बकरा वगैरह है वहां जाकर बगीचे में जाकर खा जाते थे। वो फल वगैरह फूल वगैरह तो फिर ये दोनों फिर झगड़ा करते हैं। वो फिर बीच में रास्ते में वो रेखा दौड़ते हैं। इस ओर वाला ये राजा महाराज का गार्डन और इस ओर वाला ये स्वामी जी का ये होठ ये जो पशुपालन वाला जगह ये इनको यहां पे नहीं आना है। इनको यहां पे नहीं जाना है। अभी ये ठाकुर की जो बात कि ईश्वर तब हंसते हैं जब कि दो भाई जमीन पे रेखा दौड़ते कहते इसकी जमीन तुम्हारी इस जमीन मेरी। तो यह जो म घोर संसारी और यह हो गया घोर बालक माने महा भयानक बचपना दोनों ब्रह्म ज्ञानी