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ओम स्थापक यच धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः मां शारदा देवी की जीवनी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित तो हमने एक चैप्टर कल समाप्त किया मां के आविर्भाव जयराम बाटी ग्राम में हुआ उसका नाम था चैप्टर का शक्ति पेठ क्योंकि शक्ति का जहां पर आविर्भाव होता है या तो शक्ति की जहां पर महात्म है जहां पर शक्ति का उसको भारत में शक्ति पीठ कहा जाता है तो जैसे कि महापुरुष महाराज ने एक बार बिलुर मठ के बारे में कहा था मां का मां का देह त्याग मां की महासमाधि के बाद में मां का शरीर मां के शरीर का पार्थिव शरीर का दाह बिलर मठ में किया गया था तो महापुरुष महाराज एक दिन कुछ भक्त लोग आए थे तो उनको कह रहे थे कि देखो सती के शरीर के 51 टुकड़े 51 उनके शरीर के अंग जहां पर भी गिरे वहां पे एक-एक शक्तिपीठ हुआ है तो यहां पर मां शारदा का पूरा शरीर दाह हुआ है तो सोच लीजिए कि यदि एक-एक अंग से एक-एक शक्ति पीठ हो सकता है सती के तो मां शारदा के पूरे देह का एक जगह पर दहन हो तो बेलूरमठ कितना बड़ा शक्तिपीठ होगा यह महापुरुष महाराज ने एक बार कहा था तो वैसे ही जहां पर मां शारदा का आविर्भाव हुआ जयराम बाटी उसका भी महात्म हम समझ ही सकते हैं उसको भी हम शक्ति पीठ के रूप में कह ही सकते हैं मां का जहां जहां रही मां के साथ में जो जगह सबसे ज्यादा संलग्न है एक तो है जयराम बाटी ऑफकोर्स कामर पुकुर में मां आती थी ठाकुर के साथ में रहती थी और फिर कुछ दिनों के लिए और ठाकुर की महासमाधि के बाद में मां ने कामर पुकुर कुछ समय रहा रही थी मां उसके बाद में दक्षिणेश्वर है फिर बेलूरमठ में वहां पर नीलंबर मुखोपाध्याय का मकान है जहां पर मां रही थी कुछ समय के लिए और ऑफकोर्स उद्बोधन मायरवार्ड्स करके दूसरा अध्याय गंभीरानंद जी महाराज का अध्याय का नाम है आविर्भाव महाराज जी लिखते हैं श्री मायर आमने जे मुख कुल जगत वरणीय होया छ तरा ठीक कोबे जयराम बाटी बसती स्थापन करिया ले तहा अतो मां के आगमन से जो मुख्य कुल जो मुख्य परिवार वंश जगत प्रसिद्ध हुआ है जिनका नाम इतिहास के पन्नों में हम हमेशा के लिए सुनहरे अक्षरों से लिखा गया है वह मुख्य वंश जयराम बाटी में ठीक कौन से समय आकर के वस वाट करना शुरू किया है वह हमको ठीक से पता नहीं है प्राचीन द्विनी दलील दृष्ट जाना जाए ज दोष सोलो सोनेर 12 बैशाख तारीखे विष्णुपुर जोने को राजा श्री चैतन्य सिंह देव जयराम बाटी ग्रामस्वराज मुखोपाध्याय के 11 बाय फोर काठा ब्रह्मोत्सवम करर भूमि दान करें दलील अर्थात की जो जमीन का जो कागजात होते हैं उसको देख कर के ऐसा पता चलता है कि 1600 1669 1669 साल में एक चैतन्य सिंह देव बोलकर राजा थे उन्होंने कुछ विघा जमीन खेला खेलाराम मुखोपाध्याय को दान की थी माफीनामा के रूप में उपहार दी थी देवोत्त दलीले खेलाराम के धर्म ठाकुरर परिचालक बोलिया उल्लेख कोराई स्पष्ट प्रतीत होय जहारा तोखोनो होई तेही धर्म ठाकुरे सेवाय तो छले जिस धर्म धर्म ठाकुर की वहां पर पूजा होती है उसी धर्म ठाकुर के सेवायत के रूप में खेलाराम का नाम होने से हमको पता चलता है कि तभी से खेलाराम उस धर्म ठाकुर के पुजारी थे या तो पूजक थे वर्तमान मुख जेरा खेलाराम रही बंशो दर रूपे सेही शकल संपत्ति भोग दखल और धर्म ठाकुरे सेवा परिचालना कोरीते छ आज के जो मुख्य वंश है मां के पिता जी का मुख्य वंश वो वही लाराम के उनकी जमीन और उनके धर्म ठाकुर की सेवा करते आ रहे हैं और उन्हीं के वंश दर के रूप में हमको प्रतीत होता है मातृ मंदिर जे स्थाने निर्मित होया छ इ हाई मुख जे देर आदिम वास्तु भीटा बोलिया अनुमित होय मां का मंदिर जिस स्थान के ऊपर में निर्मित हुआ है वही मुख लोग मुख लोगों का आदिम अर्थात की पूर्व समय से जो हमें पुराने समय का उनका निवास स्थान है ऐसा हमको प्रतीत होता है श्री मायर जन्म एवं विवा हो विवाह ई बाटी तेही हुए उसी जगह पर जहां पर मां का आज मंदिर है वहीं पर उसी स्थान पर मां का जन्म हुआ था और वहीं पर मां का विवाह हुआ था तहर न बर वयस प जंतो तहर जनक जननी थाई बास कोरिया लेन मां की उम्र जब तक नौ साल की थी तब तक उनके मा माताजी और पिताजी उसी स्थान पर निवास कर किए थे श्री मां बोलिया छन मां ने कहा था पुरानो बाड़ी ते बीए होए पुरानो बाड़ी अर्थात आज हम जयराम बाटी जाएंगे और पुराना घर और नया घर कहेंगे तो फिर और एक समझ में आता है क्यों क्योंकि आज का पुराना घर वह मामा लोगों का घर कि जहां पर वो बाद में ये लोग स्थानांतरित हुए थे और नया घर अर्थात की शरद महाराज ने मां के लिए एक नया घर बनाया है किंतु हमारी जितनी भी स्मृतियां है वह सब पुराने घर के साथ में संलग्न है नया घर हम लोग देखने के लिए जाते हैं वो साइड पे है आपने वो रास्ते के इस साइड में वो यदि आप जयराम बाटी गए होंगे तो आपने देखा होगा किंतु जब मां का घर ऐसा कहते हैं तो वही पुराना घर ही हमको समझ में आता है किंतु जब मां यहां पर पुराना घर कहती है वो और भी पुराना घर जहां पर आज मंदिर है और जहां पर मां का जन्म हुआ था मां भूमि पर अवतरित हुई थी तो वह पुराना घर वो पुराने घर में मेरा विवाह हुआ था और जब मेरी नौ साल की समय उम्र थी तब नए घर में हम लोग स्थानांतरित हुए थे ऐसा मां ने कहा था ओई बाड़ी ते आर धोरे ना माने पुराने घर में अभी जैसे जैसे बच्चे कच्चे वो बड़े होते हैं बच्चे जन्म लेते हैं तो फिर व छोटा सा घर में अल्प परिसर जगह पर अ बड़ा परिवार नहीं रह सकता इसलिए माने कहा है ओई बाड़ी ते आर धोरे ना पुराने घर में अभी ज्यादा लोगों का समावेश नहीं हो पा रहा था बर्दा मामार बाड़ी ते वरदा मामा की बाड़ी वरदा मामा का जहां पर घर है वहां पर मालो मा माताजी और पिताजी स्थानांतरित हुए थे और वही हमारे लिए मां का घर कहा जाए तो वही हमारे लिए मां का घर है मातृ मंदिर निर्माण जन मृतिका खनन काले ई स्थाने कृष्ण पथ गौरी पटटो समेत खुद्रो ंगो पावा गिया छलो उहा होतो एक काले मुख्य परिवार भक्ति सकारे पूजित होतो मां के मंदिर के निर्माण के लिए जो फाउंडेशन बनाना है इसके लिए जब खुदाई चल रही थी वहां पर एक छोटा सा शिवलिंग प्राप्त हुआ था तो हम अनुमान करके कह सकते हैं कि माताजी और पिताजी मां के माताजी और पिताजी के वंश उनके पूर्वज शायद उसी शिवलिंग की पूजा भी करते होंगे अभी एक इंटरेस्टिंग कहानी यहां पर है वैसे तो हिस्ट्री में देखा जाए तो बहुत बाद में आता है क्रोनोलॉजिकल देखा जाए किंतु फिर भी यहां पर क्योंकि यह उल्लेख हो रहा है मां के घर का मां के जन्मस्थान का और मां के मंदिर का इसलिए मैं यहां पर बता रहा हूं जब मां का देह त्याग हुआ था मां की महासमाधि के बाद में अ मां की महासमाधि के बाद में हां उसी के बाद में शरत महाराज वगैरह ने ठीक किया कि जो जमीन है व मां का जो जन्मस्थान उसको खरीद कर लिया जाए और वहां पर मंदिर बनाया जाए अभी मंदिर बनाने के लिए किंतु ना मां उस समय जीवित थी सॉरी मां जीवित थी क्योंकि मां का भी यहां पर रोल है मां की भी एक बात है तो मां के रहते रहते ही मां के आखिरी आखिरी समय में जमीन खरीद करने की बात चल रही थी क्यों कि ये लोग तो यहां पे रहते थे जहां पे आज मां का घर है और जहां पे नया घर बनाया गया वहां पे ये लोग रहते थे पुराना जो घर था और मां का जन्म एगजैक्टली कहां पे हुआ उसके बारे में अभी लोगों को बहुत साल हो गए तो पता नहीं था इवन मां को भी उस समय एगजैक्टली याद नहीं था कि वो एग्जैक्ट जगह कौन सी है तो मां ने कहा कि वो एक बूढ़ी है वहां पे बागदी बूढ़ी वो मेरे जन्म के समय वहां पर उपस्थित थी तो उसको जाकर के पूछो कि मेरा एग्जैक्ट जन्मस्थान एग्जैक्ट लोकेशन कौन सा है तो यह लोग जब वो बूढ़ी अम्मा को खोजने के लिए गए तो उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा दो-तीन रुपया दीजिए तो मैं बताती हूं कि वह जगह कहां है तो यह जो महाराज जी व मां के सेवक वहां पर रहते थे मां के साथ में उन्होंने उनको कुछ रुपया दिया फिर वो बूढ़ी माता जी वहां पे आई और वह जगह दिखाई कि यह जो जगह है वो एग्जैक्ट जगह है जहां पर शारदा का अवतरण हुआ था शारदा का जन्म हुआ था अभी जब यह साधुओं को पता चला तो अभी तो क्या करेंगे मुश्किल यह है कि जो पहले से ही जमीन खरीदी गई थी उसके अलावा किंतु मां का जो जन्मस्थान था ना उसमें से थोड़ा वो पास में ही एक दूसरे परिवार थे भाविनी देवी करके एक दूसरा एक परिवार वहां पर रह रहा था उनके पास में वह जमीन थी जो एकदम पास में ही थी तो अभी यदि वहां पर मंदिर बनाना होगा तो वहां पर वह जो पास वाली जमीन भी लेनी होगी वरना तो मंदिर ठीक से नहीं बनेगा तो यह मंदिर की जमीन खरीदने के लिए शरद महाराज ने रुपए भेजे और वहां पर वरदा महाराज वगैरह जो साधु सन्यासी संतान मां के साथ में रहते थे उनको कहा कि वह जमीन जो है भाविनी देवी के पास में है उनके सब हम लोग खरीद कर ले तो अभी यह वर्धा महाराज वगैरह प्रयत्न कर रहे हैं तो अभी ऐसा हुआ कि वह जमीन जो पास की जमीन थी वह उसमें भी फिर कुछ अलग-अलग परिवार थे जिनके जिनका उस जमीन में हिस्सा था अभी जब तक वोह जितने भी फमिली अपना हिस्सा वह हमको दे ना दे वह स्वीकृत ना हो जाए कि हां हमने मिलकर के यह तय किया है हमारी सबकी स्वीकृति है कि रामकृष्ण मिशन को यह जमीन देनी है तब तक तो यह ऑफिशियल नहीं होगा अभी ऑफकोर्स रामकृष्ण संघ के पास में तो पावर था माने ऑलरेडी हम लोग विश्व में हमारा पूरे विश्व में ख्याति फैल चुकी थी हम लोग यदि चाहते तो यह छोटा सा ग्राम्य परिवार उनको इतना कोई जरूरत नहीं है कि हमको उनको इतना जितना भी टू द लेटर लॉस फॉलो करने की हम लोग जमीन शायद वैसे ही इधर-उधर करके थोड़ा ले सकते थे किंतु ऑफकोर्स रामकृष्ण संघ में तो ऐसा होता नहीं है टू द लेटर वह जो नियम कानून है उसको फॉलो करना है तो कोलकात्ता से आदेश हुआ कि जितने भी परिवार का उस जमीन पर कब उनका ये यह है मतलब उनका अधिकारत्ती की रजिस्ट्री जहां पर हो थी लैंड रजिस्ट्रेशन ऑफिस वहां पर ले जाओ और सबका वह जो सिग्नेचर करवाओ कि हां हम स्वीकृत होते हैं कि यह जमीन हमने रामकृष्ण मिशन कलकाता को दी है बेलूरमठ को दी है तो अभी ये इतने अलग-अलग परिवार और उनमें भी इतने अलग-अलग तरह के विचित्र लोग और उनको एक बार पता चला कि हां कि रामकृष्ण मिशन इस जमीन में इंटरेस्टेड है वो इमीडिएट उन्होंने अपना प्राइस बढ़ाना शुरू कर दिया एक तो ऑफिशियल कहा कि हमको इतना इतना रुपया चाहिए फिर अनऑफिशियली कि हमको इतना एक्स्ट्रा दो फिर जितनी भी बार ये सन्यासी लोग उनके साथ में बात करने के लिए जाते थे तो और कुछ ना कुछ एक्स्ट्रा मांगते थे कोई एक महिला को जाकर के मिले तो उसने कहा कि देखो ना मेरे बच्चे सुबह से कह रहे हैं कि वो रसगुल्ला वगैरह कुछ खाना है अभी वो क्या करूं मैं ऐसा करके ऐसा तो नहीं कहेगी आप रसगुल्ला खरीद करके ले आए ऐसा करके बोलेगी कि बच्चे सुबह से बोल रहे हैं कि रसगुल्ला खाना है तो महाराज जी ने जाकर के वो मिठाई लाकर के दे दी और फिर एक बूढ़ी अम्मा थी तो ऐसा वो बार-बार ऐसा बोलती थी कि मैं जमीन दूं कि ना दूं दूं कि ना दूं तो कभी हां बोलती थी कभी ना बोलती थी तो सबने मिलकर के अभी उम्र में बड़ी है तो थोड़ा सम्मान भी करना पड़ेगा और कभी-कभी क्या होता है कि वो जानबूझ कर के वो मेमोरी लॉस हो गई है ऐसा वो बहाना करती थी हो भी सकता है कि मेमोरी लॉस हुई कि नहीं हुई है कभी बोलेगी कि अच्छा मैं हां बोलती हूं कभी बोली मैंने हां कहां बोला है तो कैसे भी करके उनको सबको कन्वींस करके एक दिन रजिस्ट्रेशन की ऑफिस में ले गए और वहां पर जाकर के देखा तो वो रजिस्ट्रार जो था व भीतर में था वो जो बूढ़ी अम्मा थी वो तो इतनी उम्र हो गई थी कि भीतर में नहीं जा पाती थी तो उन्होंने जा पाती थी कि नहीं पता नहीं उन्होंने कहा मैं भीतर नहीं जाऊंगी तो अभी ये जो सन्यासी थे बिचारे वो वो जाक के वो रजिस्ट्रार को कितना रिक्वेस्ट किए जी महाशय आप बाहर आइए वो बूढ़ी अम्मा है वो माता जी वो भीतर में नहीं आ पाएगी वो कृपा करके आप बाहर आ कर के उसकी साइन ले लीजिए तो अभी वो रजिस्ट्रा भी तो पता है ना उनके लो टेंपर कैसा होता है वो भी तो ब्रिटिश गवर्नमेंट के ब्रिटिश लोग जितना अहंकार घमंड जिनका था उतना ही ज्यादा अपने ये जो देशी साहब जितने थे उनका घमंड और 10 गुना ज्यादा था तो कितना ही मतलब वो मतलब रिक्वेस्ट करने के बाद में मुंह बिगाड़ करके मैंने कुछ गाली देते देते बाहर में आए ठीक है चलो तुम्हारे पर उपकार करके मैं आता हूं बाहर में बाहर आकर के वो बूढ़ी माता जी थी उनको पूछा कि क्या आप सहमत होती है अपनी जमीन रामकृष्ण मिशन को दे देने के लिए तो माता जी बोलती है कहां मैंने तो ऐसा कुछ कहा नहीं है यह लड़के लोग मेरे नाम पर क्या-क्या उल्टा पुल्टा कह रहा है अभी वो जो ऑफिसर था ऑलरेडी उसका तो मिजाज गया था टेंपर गया था कि मुझे वो ऑफिस से बाहर ले आते हैं पता नहीं है मैं कितना बड़ा आदमी हूं और जैसे उसने ऐसा सुना कि ये तो माता जी हां कहा ही नहीं है बिना उनकी मर्जी के उनको जबरदस्ती करके उनके ऊपर में प्रेशर डाल के साइन लेने के लिए साधु यहां पे आए तो वो तो फिर वो जो महाराज के ऊपर में जो बिगड़ा है कहता है कि आपको शर्म नहीं आती गरुआ पहन कर के ऐसा दो नंबरी काम करते हैं बूढ़ी माता जी को उनके ऊपर में आप दबाव डाल कर के जोर जबरदस्ती करके उनकी जमीन खींच ले हड़प कर रहे हैं चले जाओ यहां से भाग जाओ ऐसा ऐसा अभी ये महाराज भी बेचारे इतने परेशान हो गए कितना मेहनत करके ये सब परिवार को यहां पे इकट्ठा करके लाए हैं और य अभी जद ये वापस गए तो वे लोग तो वापस कभी आने वाले नहीं है और मामला है कि मां की जन्मस्थान पे जहां पे मां का जन्म हुआ एगजैक्टली वहीं पर मंदिर बनना है यह तो ठीक हो गया था तो कैसे भी करके फिर महाराज ने वोह माता जी को फिर से समझाया और कुछ एक्स्ट्रा रुपया दिया ऐसा वगैरह किया तो माता जी फिर से स्वीकार किया वहीं पे कि अच्छा ठीक है मैं फिर से साइन करने को तैयार हूं किंतु फिर से कहती है अभी मैं अंदर नहीं जाऊंगी उसको फिर से बाहर बुलाओ अभी क्या करें वो महाराज जी फिर से ऑफिस में गए वो ऑफिसर को फिर से रिक्वेस्ट किया कि देखिए वो माता जी का तो उम्र की वजह से उनका मेमोरी लेस हो जाता है तो बीच-बीच में ऐसा उनका वो कंफ्यूजन हो जाता है वो फिर से तैयार हुई है आप कृपा करके वो फिर से उसका साइन लेने के लिए बाहर आइए अभी इतना रिक्वेस्ट किया तब वो फिर से वो ऑफिसर है ना ऐसा वो सुनाते सुनाते आप लोगों को पता नहीं मेरा टाइम कितना इंपोर्टेंट है वगैरह वगैरह ऐसा करके बाहर आया और फिर से माता जी को पूछा कि क्या आप अपनी जमीन रामकृष्ण मिशन को देने के लिए तैयार है तो इस बार ठाकुर की कृपा से मां की कृपा से माता जी ने कहा हां मैं जमीन देने को तैयार हूं अब वो ऑफिस सर है उनके ऊपर में बिगड़ गया अरे आप अब बिना मतलब मुझे इधर-उधर धक्का वो खिलाती है मेरा टाइम इतना इंपोर्टेंट है चलो चलो फटाफट करके साइन कर लो ऐसा करके उसने वो कागजात जो थे वह माता जी का वह साइन तो नहीं होता है वो अंगूठा ले लिया और वहीं पे वह जैसे ही वह काम कार्य समाप्त हुआ वो जन्मस्थान की पूरी जमीन संलग्न जितनी जमीन है मंदिर ठीक से बनाने के लिए चाहिए वो पूरी जमीन हमको रामकृष्ण मिशन को मिली तो मैंने उस सम ये जमीन को लेकर के और यह जमीन के लिए इस तरह से हमको परेशान करने वाले सिर्फ वो लोग नहीं थे पड़ोसी उनको एक बार पता है कि हां रामकृष्णा मिशन को चाहिए जमीन तो अभी तो उसका प्राइस बढ़ा ही दो क्योंकि इन लोगों के पास में बहुत रुपया है तो हम हम जो कि मार्केट रेट है उससे भी क्योंकि उनको जरूरत होती है सबको पता है कि कोई ऐसा पवित्र जगह है बोलकर के ही यह लोग मंदिर वगैरह बनाएंगे यानी कि ऐसा नहीं है कि मार्केट रेट प उससे भी ज्यादा पैसा देने को ये लोग रेडी हो जाएंगे ऐसी एक दूसरी घटना है माने ये लोग ऐसा पैसों के लिए मां को रामकृष्ण मिशन को परेशान करने वाले जयराम बाटी में सिर्फ वे लोग नहीं थे मां के भाई भी ऐसे कम नहीं थे जब वहां पे कुआ खोदने की बात आई ना कुआ नहीं वो जो जमीन देने की बात आई जहां पर ये वरदा मामा वगैरह रहते थे वो जमीन देने की जब बात आई तो माने कहा कि देखो यहां पर तो मेरा मैं यहां पर रह रही हूं यहां पे ये लोग मंदिर वगैरह बनाएंगे माने एक तो कैंपस होगा ना तो तो कैंपस में उस एग्जैक्ट लोकेशन पर मंदिर है और यहां पर तो आश्रम के भीतर में ही आ जाएगा मां जहां पर वरदा महाराज वरदा मामा के जिस घर में रह रही है तो मां ने कहा कि देखो यह घर जो है तुम लोग रामकृष्ण मिशन को दे दो यदि तुम लोग अभी दोगे तो तुमको यह पैसा भी मिलेगा मेरे रहते रहते यह कार्य समाप्त भी हो जाएगा और यदि मेरे जाने के बाद में किंतु क्या होगा कि तुम भी चले जाओगे मैं भी चली जाऊंगी तो मेरे संतान जो है वैसे ही ये जमीन ले लेंगे हड़प कर लेंगे तुम लोगों को कुछ नहीं मिलेगा मां ने तो ऐसा सीधा धमकी दिया था वो तो जगदंबा है वो नियम कानून के वो परे है वो लेटर्स लो कायदा कानून नियम कानून हमको फॉलो करना है मां को नहीं करना है वने सीधा धमकी दे दिया अपने भाई को ही कि मेरे रहते रहते तुम जमीन दे दोगे रामकृष्ण मिशन को तो तुमको इसका वह जमीन का जितना वह मार्केट रेट के अनुसार रुपया मिलेगा वो तुमको मिलेगा मैं जाऊंगी तो मेरे लड़के वैसे ही ले लेंगे तुम्हारे पास से कुछ नहीं मिलेगा या रखना तो फिर यह लोग राजी हो गए काली मामा वरदा मामा प्रसन्न मामा तीन लोग थे मां के भाई तो अभी कलकाता में उद्बोधन में शरत महाराज को लेटर लिखा गया कि मेरे भाई मां ने लेटर लिखवाया कि ये काली वरदा और प्रसन्न अभी रेडी हुए हैं तो जल्दी जल्दी से जमीन खरीद लो तो जिसकी पूरे आश्रम के भीतर में मां का वो जो निवास स्थान है वह भी आ जाए तो शरद महाराज तो बड़े खुश हो गए कि अरे वाह तो मां के भाई रेडी हो गए हैं सामने से तो तो तो ये तो बड़ी अच्छी बात है तो शरत महाराज ने कहा कि वो किसी को भेजा कि असेसमेंट करके बताओ कि एक्चुअली कितना वो माने वो होना चाहिए मार्केट रेट के अनुसार इसका कितना वो होना चाहिए रुपया तो वो असेसमेंट करके निकाला गया कि तीनों भाइयों को इतना इतना देना चाहिए तो वो कि फेर है माने उसके इतने रुपए लेकर के वे लोग दूसरी जगह पर बड़े सुख शांति से नया घर बना कर के रह सकते हो कोई दिक्कत नहीं होगी तो उस समय बहुत बड़ी रकम तो कितना 00 400 में एगजैक्टली भूल गया सभी मामा को इतना इतना देना था अभी ऑफिशियल तो यह सब ठीक हुआ कलकत्ता से जो लोग आए थे वो लोग चले भी गए फिर काली मामा जाकर के मां को क्या कहते हैं कि मां देखो दीदी देखो मैं तो तुमको तो पता है मेरे घर परिवार में इतनो खाने पीने को कुछ नहीं है बच्चे मेरे भूखे मर रहे हैं मने झुट मुट का वो क्या माके रहते रहते क्या काली मामा के बच्चे थोड़ी ना भूखे रहने वाले हैं काली मामा थोड़ी ना भूखे रहने वाले लक्ष्मी स्वयं जिनके घर में में निवास कर रही है तो मतलब नाटक कर रहा है कि देखो मेरे तो आर्थिक इतना तंगी है पैसा नहीं है क्या करूं मैं तो इतना कष्ट से ये जो जमीन है उसमें कुछ निकलता भी नहीं है पूरी अपनी राम कहानी दुख कहानी कह दी और फिर कहा मैं तो जमीन देने को तैयार हूं मुझे ₹1 एक्स्ट्रा दो तो ही मैं जमीन दूंगा तो मां सोचती है कि अरे यह काली अभी आखिरी घड़ी में क्या कर रहा है फिर काली मामा ही नहीं वरदा मामा प्रसन्न मामा तीनों भाई मां के पास में अलग-अलग जाकर के बोल रहे हैं कि मां हमने तो ऐसा ऑफिशियल बोल दिया है किंतु हमारे परिवार में जो अभाव है अछत है उससे तो आप अविद नहीं है हमको ₹1 एक्स्ट्रा दीजिए तो तो मां ने कहा ठीक है चलो अभी अब बोल रहे हैं तो ऐसा करके भी यदि जमीन मिल जाती है तो अच्छी बात है तो फिर शरत महाराज को बोला गया सभी भाइयों को जो कि ऑफिशियल असेसमेंट था उसके अलावा 00100 करके एक्स्ट्रा दिया गया तब कहीं जाकर के जहां पे मां रह रही है मां का निवास स्थान फिर वो जो किचन जहां पे भंडार गृह है फिर फिर जो विश्राम गृह है जहां पर शरद महाराज वगैरह रहते थे वो जो पूरा परिसर है छोटा सा परिसर है किंतु वहीं प तो मां की सभी स्मृतियां जड़ित है तो वो परिसर रामकृष्ण मिशन को मिला ऐसे ही करके काली मामा उनका लोभ ऐसा था कि काली मामा के वो कुआ खोदने की बात आई थी एक वो नारायण वो आयंगर करके एक था मैं फर्स्ट नाम भूल गया शायद नारायण है ना कि जो भी लास्ट नेम था आयंगर मां के बड़े भक्त थे कोलकात्ता चेन्नई के थे और बीच-बीच में मां के पास में आकर के रहते थे तो आकर के उन्होंने मां को कहा कि मां ये आपको पानी पीने के पानी का अक्षत है तो मैं यहां पे कुआ खोदने के लिए तैयार हूं तो माने गए काली वरदा उनको कहा कि आपकी जमीन में से थोड़ा सा दो तो वहां प कुआ खो देंगे कुआ का पानी तो सभी को मिलेगा ऐसा थोड़ी ना मां सिर्फ पिएगोन भी करते हैं और वही पानी पीते हैं और वही पानी पी पी करके बार-बार वो बीमार होते हैं तो यदि कुआ खुद दिया जाए तो सभी को फायदा हो जाएगा तो ऐसा नहीं करके काली मामा क्या कहते हैं कि कुआ खोद खोदने के लिए जितनी जमीन चाहिए उतनी जमीन पर पैसा बिछा दो माने पूरी जितनी भी वो 5 फुट ना न फुट जितनी भी वो डायमीटर जो चाहिए कुवा खोदने के लिए उतनी जमीन पर पैसा बिछा दो जमीन को पैसों से भर दो तब कहीं जाकर मैं वो कुआ खोदने के लिए जमीन दूंगा तो ये लोगों का जो पैसों का जो मोह है कि मां के पास में बहुत पैसा हो गया है कैसे भी करके व भी के पास से वो पैसा निकालना है वहां के आसपास के सभी लोगों का ऐसा था और मैंने एक फनी स्टोरी है हृदय का तो पता है सबको कि ठाकुर के साथ में रहता था और ठाकुर की जितनी सेवा करता था बाद बाद में ठाकुर को इतना कष्ट भी दिया है ठाकुर ने खुद एक बार कहा है कि मैं इतना परेशान हो गया था मैं गंगा में जंप लगाने के लिए गया था गंगा में डूब आत्महत्या करने के लिए गया था तो ऐसा ठाकुर ने खुद कहा है उसने ठाकुर की सेवा भी बहुत की किंतु जो धनी व्यक्ति आ जाएगा ठाकुर के पास से तो उसके पास से पैसा निकालने का उसका एक दृष्टि था तो ऐसे तो हमने हृदय के बारे में पढ़ा है तो हम लोग उस समय बेलूरमठ में थे ट्रेनिंग सेंटर में तो हम हमको वहां पर ले जाते हैं जयराम बाटी कमार पुकुर सि होड़ सब जितने भी कोवाल पाड़ा वो ये जो मां के जन्म स्मृति विजड़ी जो धर्म तीर्थ स्थान है वहां पर तो हम लोग गए थे एक बस में हमारे हम लोग 30 40 ब्रम अचारी थे तो हमारे साथ में आचार्य महाराज भी थे तो जयराम बाटी कामर पुकुर करके सिहोड़े थे तो सिहोड़े उतर रहे थे तो सामने एक युवक खड़ा था 253 साल की उम्र होगी 20 2 साल की होगी वो युवक खड़ा था तो हमारे आचार्य महाराज पास में ही खड़े थे तो ज हम उतर रहे थे तो आचार्य महाराज बता रहे थे कि यह हृदय का वंश दर है माने उसका ये है उसके परिवार से ही ये है तो अभी तो तो हमने गाड़ी बस में से उतरना शुरू किया है और वह लड़का क्या बोल रहा है कि मैंने सुना कि आप लोगों में एक डेंटिस्ट है तो मेरी मां को थोड़ा दांत में दर्द हो रहा है उसका ठीक कर दीजिए ना तो मैंने देखो कि अभी हम बस में से उतर ही रहे हैं वो हम लोग बैठे कुछ जल पान करर है कु मैंने यहां पे हृदय का ये था यहां पर ऐसा मतलब कुछ दिखाए कुछ नहीं बस में से उतरने से पहले ही बोल रहा है आप में से डेंटिस्ट है वो थोड़ा मेरी मां का दांत देख लीजिए माने वो मिशन के पास में से ये जो लाभ लेने की वृत्ति व मैंने कहा ठीक ठीक हरद का वो वंशज है हमारे पास से किस तरह से बेनिफिट निकाल दिया जाए तो खैर अभी देखिए गरीबी भी एक ऐसी चीज है कि क्या करें किंतु देखिए कि मां के वंशज है या तो फिर जैसे कि राम रामलाल जो वंशज ठाकुर के भतीजे के वंश स ऐसा कोई कठिनाई उनको नहीं होनी चाहिए क्योंकि हम लोग जब जयराम बाटी गए थे जयराम बाटी में ही वो माके वंशज की वो जो लड़कियां और लड़के अपनी तो बड़ी-बड़ी स्कूल वगैरह है वहां पे तो अपनी ही स्कूल में पढ़ते हैं और अपने हॉस्पिटल वगैरह सब कुछ है तो वो ट्रीटमेंट वगैरह सब उनको वहां पर मिलता है ये पल्ली मंगल की जो एक्टिविटीज है तो वो सब बेनिफिट यदि हम आम जनता को देते हैं तो उसके ऊपर सबसे पहला अधिकार तो मां के वंशज का ठाकुर के वंश जो का ही है उसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं है तो ऐसा कोई आर्थिक कठिनाई नहीं होनी चाहिए किंतु क्या है ना माइंड सेट एक है कि एक महापुरुषों के जो परिवार जन है वह पता नहीं किस तरह का उनका होता है कि तपस्या करें उनसे कुछ सीखे श्रद्धा भक्ति वो डिवोशन उनके मन में प्रकट हो ऐसा नहीं करके इनके पास में बहुत पैसा हो गया है अभी देखो कि कैसे हमको क्या बेनिफिट होता है ऐसा माइंडसेट होने से कैसे आपका डेवलपमेंट होगा जो भी है सभी इस तरह के नहीं होते हैं परिवार भी बहुत बड़ा है अच्छे-अच्छे उनके वंशज भी थे अभी जैसे वो ठाकुर के वहां पे शीतला और उनका जो मंदिर है तो ठाकुर के ही वंशज उनकी पूजा भी करते हैं वो बढ़िया उनका मैं मैंने उनके साथ बात किया है एक दो बार बड़ा अच्छा उनका स्वभाव लगा वो ठाकुर की तरह ही धोती पहन के ठाकुर की तरह दाढ़ी रख कर के वो पूजा करते हैं तो अच्छा लगा मुझे उनका नेचर तो सभी का ऐसा नहीं होता है किंतु एक दो घटना ऐसी होती है ना तो हमारे मन में वही रह जाता है ये सभी लोग ऐसे ही है जो भी है मुख ज देर जयराम बाटी ते मुख ज देर जयराम बाटी आगमन सहित पश्चिम बंगे एक धर्म विप्लव इतिहास संश्लिष्ट छलो बोलिया मने होए मुख ज लोगों का जयराम बाटी ग्राम में जो आगमन हुआ था उसके साथ में बंगोल में में एक धर्म एक धर्म परिवर्तन एक युग परिवर्तन धर्म राज्य में हुआ था वह युग परिवर्तन इसी आगमन के साथ में संश्लिष्ट था ऐसा महाराज कह रहे हैं कि मुझे अनुमान होता है प्रतीत होता है बौद्ध प्राधान्य विमुक्त हिंदू समाज तखन होय अनमनी स्वभाव बौद्ध दिग के समाजे अंते कोरीते छे ना होय उदार भावा पन्न बौद्ध दिग के तहादेर देवता सहो निजो अंगे ग्रहण कोरीते छ बौद्ध प्राधान्य विमुक्त हिंदू समाज उस समय जैसे हमको पता है कि एक हमारी वैदिक सिविलाइजेशन थी वेद धर्म था और वैदिक धर्म में धीरे-धीरे करके जो डिटर आना शुरू हुआ उसमें एक जो क्षत्रिय लोगों का वेद धर्म ब्राह्मण प्रधान था और क्षत्रिय लोगों का एक रिबेलियंस चना शुरू शु किया कि विधि नियम ये होम याग यज्ञ यह सब जो पूजा ये जो सब पूजा उस समय नहीं थी याग यज्ञ थे तो यह जो सब विधि विधान जो है विधि विधान ही क्या धर्म है कि उससे भी परे कुछ है तो यह जो क्षत्रिय लोगों का रिबेलियस से यह हाईएस्ट ब्रह्मज्ञान महावाक्य उपनिषद यह वेदांत ये जो प्योर ब्रह्मज्ञान प्योर स्पिरिचुअलिटी यह क्षत्रिय लोगों का अवदान है और इसी क्षत्रिय कुल में से भगवान राम भगवान कृष्ण और भगवान बौद्ध भी इसी क्षत्रिय कुल से आए थे तो क्षत्रिय लोगों का यह रिबेलियस वजह से यह विधि वादी य हिंदू धर्म उसका एक प्राधान्य जो था उस समय वो थोड़ा सा कम हुआ था और बाद में जब बौद्ध धर्म का प्रभाव विस्तृत होता गया वैसे-वैसे ही यह अपना वैदिक हिंदू धर्म है उसकी जो जो विधि वाद निषेध वगैरह जो है उसका परिमाण भी समाज में से धीरे-धीरे कम होता गया आखिर में एक समय ऐसा आया कि फिर भक्ति स्कूल स्टार्ट हुई क्योंकि यह भागवत है भगवान कृष्ण के जो उपदेश है वो धीरे-धीरे करके समाज में प्रसारित हो रहे थे और जिस तरह से यहां पर उपनिषद और प्योर ज्ञान यह जो ज्ञान मार्ग है वह जिस तरह से उसका प्रभाव बढ़ रहा था तो यहां पर भक्ति मार्ग का भी प्रभाव बढ़ रहा था किंतु वह धीरे-धीरे बढ़ रहा था साइलेंटली बढ़ रहा था बहुत सारे लोगों को समझ में नहीं आ रहा था ऑलमोस्ट 000 यर 2000 ईयर हुआ इसके बाद में भक्ति वाद अपना भक्ति मार्ग इतना प्रभावित हुआ धीरे-धीरे करके कि हमारा हिंदू समाज विधि निषेध में से भक्ति मार्ग के प्रभाव में और साथ-साथ में कुछ अंश तक ज्ञान मार्ग के प्रभाव में आया उस समय बौद्ध धर्म धीरे-धीरे करके भारत में से अपसारी होने लगा लगा था ज्ञान मार्ग दो तरह के थे एक बौद्ध मार्ग भी था एक वेदांत मार्ग भी था अभी बौद्ध मार्ग का एक यह था कि वे लोग वेद को स्वीकार नहीं करते थे जबकि वेदांत वेदांतिका ज्ञान मार्ग था वो वेद को स्वीकार करते थे किंतु कहते थे कि वेद के ये जो विधि निषेध वाला जो भाग है उससे भी ज्यादा वोह जो उपनिषद वाला जो भाग है जो कि प्योर स्पिरिचुअलिटी है उसी को ग्रहण करना चाहिए आपको थोड़ा सा विवेक वापर है थोड़ा सा विवेक यूज करना है और क्या ग्रहण करना है क्या नहीं करना है वह आपको थोड़ा सा देखना है जबकि बौद्ध लोग मानते थे कि वह ज्ञान वेद वेद के जो आरण्य कहो ना कि ये जो संहिता संहिता भाग क हो दोनों शत पठ ब्राह्मण वगैरह उस दोनों को ही तज दो भगवान बुद्ध का अपना एक धर्म मार्ग हम स्टार्ट करते हैं तो ज्ञान मार्ग इस तरह से दो शाखाओं में प्रवर्तित विस्तृत हो रहा था आखिर में किंतु वेदांत त वादी ज्ञान मार्ग और वेदांत वादी भक्ति मार्ग यह दोनों मिलकर के भारत में अपना संपूर्ण प्रभाव स्थापित किए और भारत में से बौद्ध धर्म धीरे-धीरे प्रसारित होने लगा तो यह जो युग परिवर्तन था भारत में उसी समय शंकराचार्य आए थे और उस समय भारतीय समाज में जो कुछ कुछ विकृत मार्ग कुछ विकृत विचारधाराएं प्रसारित हो रही थी कापालिक वगैरह तो उनका उन्होंने खंडन किया था और धांत वादी य धर्म मार्ग का उन्होंने पुनः स्थापना की थी तो यह जो पूरा युग परिवर्तन हो रहा था वैसे तो एथ सेंचुरी में हुआ था यहां 16th सेंचुरी की बात है तो पूरे भारत में बौद्ध धर्म ऑलमोस्ट विलुप्त हो चुका था किंतु बंगोल में बौद्ध धर्म का थोड़ा प्रभाव कुछ लंबे समय तक रहा था किंतु ये 16th 15th सेंचुरी तक वो प्रभाव भी धीरे-धीरे कम होने लगा था अदृश्य होने लगा था तो बंगोल में बौद्ध धर्म का बौद्ध मार्ग का प्रभाव प्रसारित हो और यह न्याय वगैरह जो वेदांतिका प्रभाव प्रसारित हो उस युग परिवर्तन के समय मुख्य परिवार जयराम बाटी में प्रवेश किए थे जयराम बाटी में उनका आगमन हुआ था महाराज ऐसा अनुमान करके कह रहे हैं अनुमित होए महाराज ऐसा नहीं कर रहे कि ऐसा था महाराज कह रहे ऐसा अनुमित हो ऐसा मुझे अनुमान करके मैं करके ऐसा कह रहा हूं तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु