Invocation
ओम स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिपिबद्ध जिस चैप्टर को हम पढ़ रहे हैं उसका नाम है प्राण टान अर्थात कि प्राणों की पुकार तो मां और ठाकुर के बीच में जो स्नेह मधुर संबंध था कभी ठाकुर मां को सिखाते थे कि किस तरह से यह जो लोक व्यवहार है वह किया जाए तो कभी मां एक जननी की तरह ठाकुर की रक्षा करती थी ठाकुर की सेवा करती थी यानी कि यह रोल रिवर्सल जिसको बोलते हैं कभी ठाकुर मां को सिखाते हैं कभी मां ठाकुर की रक्षा करती है ठाकुर की चिंता करती है ठाकुर की सेवा करती है तो ये सुमधुर प्रसंग जो पड़े अभी देखिए कि जगत में ऐसा है ठाकुर कहते हैं कि जटिला कुटिला भी होते हैं अर्थात कि यह भगवान राम और मां सीता अयोध्या में थे तो फिर वो कई कई भी थी उसका भी एक था कि यदि कई कई नहीं होती तो फिर ये लोग वनवास में नहीं जाते वनवास में नहीं जाते तो फिर यह पूरा जो रामायण है जो पूरी लीला है हमारे लिए हमारी शिक्षा के लिए वह नहीं लिखी जाती तो यहां पर भी देखिए कि मां जिस तरह से ठाकुर की सेवा करती थी उसमें भी खामी उसमें भी गलती निकालने वाले लोग थे मां के मां क्या गड़बड़ मतलब मां की गलती निकालना ऐसे लोग भी वहां पर थे और किस तरह से मां को जाकर के कटु वचन भी कहते थे मां की निंदा भी करते थे और किस तरह से मां के मन में इससे दुख भी होता था तो हमको प्रश्न होगा कि यह जो शुद्ध पवित्रता स्वरूपिणी स्वयं मां है
dakshnineshwar
उनके चरित्र में या तो उनके कार्यकलाप में या तो फिर उनकी ठाकुर के प्रति शरणागति सेवा और निष्ठा में खामी निकालने वाले गलती निकालने वाले क्रिटिसाइज करने वाले ऐसे तो कैसे लोग होंगे क्या वे लोग मां से भी ज्यादा उनकी ठाकुर के प्रति निष्ठा होगी उनका जीवन चरित्र क्या मां से भी
dakshnineshwar
ज्यादा शुद्धतम होगा शुद्धतम होगा नहीं मां ने खुद ने एनालिसिस करके देखा मां ने खुद ने देखा कि ठाकुर के प्रति उनकी जो निष्ठा है और ठाकुर का उनके प्रति जो प्रेम है वह देख कर के किसी किसी को ईर्षा होती थी और यह ईर्षा के मारे मां की निंदा करते थे वे लोग भी सोचते थे कि ठाकुर इतना ही प्रेम हमको भी करें किंतु देखिए मां का जीवन का आप निरीक्षण करेंगे थोड़ा सा भी पाठ करेंगे तो पता चलेगा कि ठाकुर और मां का मिलन कब होता था बस दिन में एक बार मां खाना लेकर के जाएगी ठाकुर के पास में ठाकुर को खाना खिलाएगी इतना ही तो बाकी का पूरा समय ठाकुर तो अपने भक्तों को देते थे तो वो जो मां ठाकुर को खाना खिलाती थी यह भी कुछ लोगों से देखा नहीं जाता था अर्थात कि देखिए कि आज हम जिनको पूजनीय गिनते हैं रामकृष्ण संघ में रामकृष्ण परिवार में हां ठाकुर थे मां थे गोलाप मा थी योग मा थी और सब लेडी डिवोटा ठाकुर के पास आते थे कितने पुरुष भक्त आते थे आज सभी हमारे लिए पूजनीय है किंतु ठाकुर और मां को इनको एक्सेप्ट करने के लिए जो तकलीफ सहन करनी पड़ी होगी इनको अपने साथ में रहने के लिए जो उनके साथ में जाकर के रहते थे उनके जो विचित्र कार्यकलाप थे उसके साथ में उनको तो यह करना है उनको तो हारमोनियसली रहना है तो इनको कितना तकलीफ होता होगा ठाकुर और मां को तो देखिए कि रामकृष्ण संघ है वह वैसे ही नहीं बना है कभी-कभी हमको लगता है कि अरे गोलाप मां
Golap Ma
तो इतनी शुद्ध पवित्रता थी उनके ठाकुर के प्रति इतनी निष्ठा थी खुद इतना जप ध्यान करती थी अपना जीवन पूरा मां को समर्पित किया था तो फिर यही गोलाप मा मां के लिए तकलीफ दे किस तरह से हो सकती है यही गोलाप मा क्या अपने खुद के स्वार्थ की वजह से मां के मां का जो कल्याण है उसको भी क्या भूल जाएगी मां जो ठाकुर के पास में जो दो घड़ी जाकर के बैठती है उसमें भी क्या वह कुछ विघ्न खड़ा करेगी अपने खुद के स्वार्थ के लिए तो देखिए कि यह लोग जब सर्वप्रथम ठाकुर के पास आए थे उनमें बहुत सारी एंगुलरिस थी उसका अर्थ है उनके स्वभाव में बहुत सारी विचित्र होता एं थी स्वार्थ भी बहुत था किंतु ठाकुर और मां एक ऐसे परस मणि है कि जिनके पास में आकर के इन लोगों के चरित्र का बहुत ही सारा परिवर्तन हुआ और इन लोगों की जो अकोमोडेशन कैपेसिटी जो होती है दूसरों के व्यू पॉइंट को अभी जैसे हमने डिस्कस किया था ना कि कंपेज या एंपैथी क्या है जब हम दूसरों का दुख दर्द या दूसरों की भावनाओं को समझ पाए तो वो है एंपैथी अभी जैसे-जैसे आप अद्वैत वेदांत की और जाते जाएंगे वैसे-वैसे ही यह जो ध्व का जगत है वह दूर होता जाएगा या तो फिर इवन भक्ति शास्त्र की व्यू पॉइंट से आप देखें तो जितना जितना आप ईश्वर के पास में जाएंगे उतना ही देखेंगे कि ईश्वर के प्रति शरणागति की वजह से आपका और ईश्वर का यह जो डिवीजन है वह मिटता जाएगा आप यानी कि मैं चला जाएगा सिर्फ ईश्वर ही रहेगा तो यह जो श्वर या आत्म तत्व में एकी भूत हो जाना इसी को कहते हैं आध्यात्मिकता में प्रगति प्राप्त करना तो इन लोगों के भीतर में भी यह जितने लेडी डिवोर्स थे कुछ जेंस डिवोर्स थे उन लोगों में जो स्वार्थ परता थी शुरू शुरू में अपने खुद के बेनिफिट के लिए वह दूसरों का जो हित है वह नहीं देख पाते थे इस तरह की घटनाएं भी है अपने संघ में बाद में देखिए कि यही डिवटी ठाकुर रूपी मां रूपी परस मणि को स्पर्श करके उनके भीतर में यह जो स्वार्थ परता थी वह जानी शुरू हो गई यानी कि देखिए आजकल हम बहुत बार कहते हैं कि कोई कोई कहता है मैं भी एक समय था कि ऐसा सोचता था कि अच्छा ठाकुर के पास जिस तरह के डिवोटा आते थे उस तरह तो आज आते नहीं है अपने आश्रम में क्यों ऐसा है उनके समय में इतने श्रद्धावन भक्त थे आज हम जितने भक्तों की बायोग्राफी पढ़ेंगे मनोम हन मित्र है नकी फिर यह वो
devotee group
उपेन था वसुमति वाला न कि फिर यह राम बाबू थे रामचंद्र दत्त कांकड़ गछ वाले न कि गिरीश घोष है फिर यह गौरी मां थी वगैरह उन
Devotee group
सबका बायोग्राफी पढ़कर लगता है कि अरे वाह ठाकुर और मां के पास में अभी जैसे बहुत बार यह लोग कहते हैं कि ब्राह्मण समाज में बहुत सारे डिवोटा आते थे किंतु फिर धीरे-धीरे देखा गया कि ये जो ब्रह्म समाज में जो केशव चंद्र सेन के जो फॉलोअर्स थे
Brahmo Samaj Group photo
उन्होंने ही केशव सेन के सामने वि विरोध करके अपोजिशन करके समाज को तोड़ करके दूसरा समाज बनाया साधारण ब्राह्मण समाज शिवनाथ शास्त्री और यह विजय कृष्ण गोस्वामी ने और इतना ही नहीं केशव सेन ठाकुर को कंप्लेन करता है कि महाशय इतना ही नहीं कि मेरा समाज तोड़ कर के दूसरा समाज बनाया मेरे बहुत सारे फॉलोअर्स को ले गए सा ऊपर से मुझे गाली भी इतना ही देते हैं तो ठाकुर क्या कहते हैं कि देखो तुम जान सोच करके समझ करके टेस्ट करके तुम जो फॉलोअर्स नहीं बनाते ना जिसको तिस को ले लेते हो उसी का यह परिणाम है तो हम जब यह सोचेंगे कि अच्छा ठाकुर ने जब केशव सेन को ऐसा कहा उसका अर्थ है कि उनके पास में जो लोग आते थे उनको तो ठाकुर बड़ा जांच परख करके लेते होंगे अर्थात कि उनका चरित्र में पहले से ही यह एक दूसरों का व्यू पॉइंट समझने की कैपेसिटी होगी ही होगी क्योंकि यह आध्यात्मिक विकास का सबसे बड़ा मानदंड यही तो है किंतु देखिए बात यह नहीं कि वे लोग ठाकुर के पास जब आए उस समय वे लोग आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत थे कि नहीं थे ठाकुर ने किनको लिया कि जिनका मुमुक्षा यानी कि आज मैं ठाकुर के पास जाता हूं मान लीजिए मान लीजिए मैं बड़ा ही स्वार्थी हूं मान लीजिए मैं भोग विलास में डूबा हुआ हूं तो ठाकुर वह नहीं देखेंगे ठाकुर यह देखेंगे कि इसके मन में जो ईश्वर प्राप्ति की या तो एक उच्चतर जीवन की पिपासा कितनी प्रब बल है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है गिरीश घोष गिरीश घोष कहता है ऐसा कोई पाप नहीं है जो कि मैंने नहीं
Girish Ghosh
किया होगा किंतु फिर भी इसी गिरीश घोष को ठाकुर ने अपने श्री चरण में पनाह दी शरण दी क्यों क्योंकि गिरीश के भीतर में वह मुमुक्षु तोव था व उसका मन ऑलरेडी कुछ खोज रहा था कि इस भोग विलास के परे भी एक जीवन है इसके परे भी एक अस्तित्व है और वोह अस्तित्व क्या है वो मुझे चाहिए तो उसका मन ऑलरेडी यह सब खोज रहा था उसी के स उसी समय वह ठाकुर के पास में आया यानी कि बाद में जो हम जिस गिरीश खोश को देखते हैं गिरीश घोष अपने मक्का उसका जो घर था उसकी छत के ऊपर में वह टहल रहा था देखा कि
Girish Bhavan
बलराम बाबू के घर पास में ही है उस समय तो अभी भी बलराम मंदिर यानी कि बलराम बसु का घर तो पास में ही है देखा कि उस घर की छत
Balaram Mandir
पे मां शारदा बैठी हुई थी हो सकता है कि धूप में अपने बालों को सुखा रही हो तो जै जसे ही यह गिरीश ने देखा कि मां वहां पर है इमीडिएट वह नीचे चला आया अपने कमरे में चला आया यह कह के कि देखिए मेरी तो पाप दृष्टि है इस दृष्टि से मैं मां का दर्शन नहीं करूंगा तो यह जो बात के गिरीश घोष है और शुरू के जो गिरीश घोष थे कि ठाकुर को कितनी गाली देते थे वो जो वहां पर गिरीश घोष का जो नाटक देखने के लिए जब स्टार थिएटर में ठाकुर गए थे और
Star Theatre of Girish Ghosh
ठाकुर के साथ में उसने जो व वर्तन किया था मने बिहेव किया था लाटू महाराज उसको मारने के लिए खड़े हो गए थे तो बाद में जो पास
Latu Mj
में जो भक्त बैठे थे मनो मोहन मित्र मोस्ट प्रोबेबली उसने कहा कि अरे देखो ठाकुर कुछ नहीं बोल रहे उसको तो तुम उसको मारने के लिए उसके साथ में झगड़ा करने के लिए क्यों इतने उत्तेजित हो रहे हो ठाकुर को यदि उसको डांटना ही होता तो इमीडिएट तुमको आदेश करते तुम अकेले नहीं हो हम इतने सारे हैं हम सब लोग मिलकर उसकी पिटाई कर देते यदि ठाकुर चाहते तो गिरीश घोष की पिटाई करना किंतु ठाकुर तो यह सब चुपचाप सुन रहे हैं जो गिरीश घोष जो आबल ता बोल बक रहा है तो तुम इसमें क्यों बीच में आ रहे हो ठाकुर का ठाकुर जो कहेंगे वही तो हमको करना है राइट तो ये देखिए कि गिरीश घोष जब ठाकुर के पास आया था उस समय उसका एक वर्तन था और बाद में ठाकुर का आशीर्वाद पा करके ठाकुर की वाणी का कथामृत का श्रवण करके और जो थोड़ी बहुत साधना उसने साधना तो की नहीं बकल मा दे दिया था अर्थात कि पावर ऑफ एटर्नी दे दिया था तो पावर ऑफ एटर्नी देने के लिए भी उसको फिर जो बाद में स्ट्रगल करना पड़ा था संपूर्ण शरणागति क्या होती है वह जो उन्होंने अपने जीवन में दिखाया था यह करने के बाद में जो गिरीश घोष हमको दिखाई देते हैं वो स्वामी जी के जो छोटे भाई है महेंद्रनाथ दत्त ना दूसरे एक है दो भाई है एक का नाम है महेंद्र और एक का भूल गया तो उसमें से जो एक भाई है उन्होंने स्वामी जी के जीवन का एक सुंदर आख्यान लिखा है स्वामी
Biography on Swami VIvekananda
विवेकानंद जिबोनर घटना वली अर्थात कि स्वामी विवेकानंद के जीवन की घटना वली तीन खंड में है तो यह जो स्वामी जी का यह जो स्पेसिफिक बायोग्राफी है उसको वैसे ऑफिशियल हम लोग एक्सेप्ट नहीं करते हैं अपने ऑर्डर में किंतु मेरी दृष्टि से इसका एक मूल्य यह है कि उन दिनों की घटनाओं का इसमें वर्णन है जिस दिनों की घटनाओं का वर्णन आपको और किसी भी किताब में देखने को नहीं मिलेगा अभी देखिए जब मास्टर महाशय ठाकुर के पास आते थे तो उन्होंने ठाकुर के साथ में जो वार्तालाप हुए वह कथामृत में लिपिबद्ध किए बाद में कुछ दिनों तक वो
Kathamrita
वराह नगर मठ में जाते थे तो वराह नगर मठ की कुछ दिनों की घटनाओं का वर्णन है किंतु फिर वहां से जो नरेशन ड्रॉप होता है तो फिर सीधा यह विरजानंद जी है शुद्धाओ वहां वराह नगर मठ में जाना शुरू
Varahanagar Math
हुए स्वामी जी के प्रयाण के बाद में अर्थ अत कि स्वामी जी प्रव्रज्या के लिए निकल गए थे वराह नगर मठ से उसके बाद में जो इनका आगमन हुआ यानी कि देखिए कि ठाकुर की महासमाधि हुई
Mahasamadhi of sri Ramakrishna
18864 में और यह लड़कों का आगमन हुआ सेकंड जनरेशन ऑफ मंगस विरजानंद जी महाराज शुद्धाओ 18999 में ही निकल गए थे और फिर वह वापस आने वाले थे सीधे अमेरिका में विजय प्राप्त करके तो वह जो पाछ सालों का विवरण है 18864 साल का तकरीबन कि स्वामी जी वराह नगर मठ में थे और वराह नगर मठ में उन्होंने गुरु भाइयों को लेकर के तपस्या की थी यह जो 4 साल का 5 साल का जो विवरण
Gurubhais in Varahanagar Math
है और कहीं नहीं मिलता वो सिर्फ म इनकी यह जो स्वामी विवेकानंद जीवने घटना वलीय जो पुस्तक है उसी में मिलता है तो यह एक बड़ा ही सुंदर एक मिसिंग जो लिंक है मिसिंग पीरियड है अपने संग में वो उसका यह एक आलेखन इसमें मिलेगा तो यहां पर देखिए कि कितनी बार ऐसा विवरण है कि नरन गिरीश घोष के वहां पर बैठा हुआ है और गिरीश घोष के वहां पर बैठ कर के भूत जैसा चेहरा उस समय तो ना ही स्नान करते थे ना ही कपड़े धोते थे खाने का कब मिलेगा कैसे मिलेगा उन सब चीजों का कोई ठिकाना नहीं एक बार यह काली महाराज और नरेण उनके घर गए नरेण के घर गए
Kali Maharaj
काली महाराज नरेण के साथ में अभी नरेण का घर यानी शिव का संसार तो भूख लगी है तो क्या करेंगे घर में खाने को नहीं है और आधी रात हो गई है ठंड भी बहुत लग रही है तो क्या करेंगे नहीं खाना खाया है नहीं शरीर को आवृत करने के लिए ऐसा कंबल वगैरह कुछ है तो फिर इन्होंने चा बनाई वो काली चाय मने दूध तो था नहीं चाय की पत्ती पानी में डाल करके चाय उसमें थोड़ा सा शुगर डाल कर के चाय बनाई और फिर चाय पी रहे हैं और हंसी मजाक कर रहे हैं उसका भी बड़ा सुंदर विवरण है तो यह तो थे मने महा तपस्या के दिन उस समय नरेंद्र बार-बार गिरीश खोज के वहां पर जाता है इसी तरह भूत वाला चेहरा लेकर के और वहां पर गिरीश कोष के साथ में बैठ कर के कितने गप लगाता है एक बार एक आदमी वहां पर आया अभी यह क्या है कि बड़े लोग होते हैं तो उनके आसपास में इस तरह के कुछ खास त के खुशामद खोर कहो ना कि चमचे कहो ना कि ऐसे लोग घूमते रहते हैं तो इस तरह का एक आदमी गिरीश घोष को मिलने के लिए आया तो उसने देखा ये एक फकीर वहां पर पड़ा हुआ है गंदे वस्त्र वाला काले चेहरे वाला मने बाल भी उसके पूरे उसमें ये जटा की तरह पक गए हैं मिट्टी लग करके तो ये य इसको इस भूत को क्यों गिरीश घोष अपने कम अपने घर में बिठा ता है उसको तो समझ में नहीं आया तो उसने नरेंद्र के साथ में कुछ बात फिर भी उसको लगा कि गिरीश के घर में बैठा है तो निश्चय कुछ तो होगा और नरेंद्र तो एकदम बेफिक्र की तरह बैठा था तो उसका वो जो बॉडी लैंग्वेज है देख कर के ही पता चलता है भले ही चाहे चेहरा भूत जैसा हो किंतु एटीट्यूड है पूरे राजा के जैसा तो इतना तो इसको समझ में आया इस चमचे को ये खुशामद खोर को तो वो नरेंद्र के साथ में बात करने का प्रयास किया तो नरेंद ने उसको पता ही नहीं दिया क्योंकि नरेंद्र तो उसका चरित्र एक सेकंड में समझ लेता है तो उसको पता नहीं दिया तो बड़ा ही नाराज हो गया कि ये भिखारी है फकीर है और मेरे जैसे इंपोर्टेंट लोग को यह अपमान करता है वह गिरीश के पास में कंप्लेन करने को गया तो गिरीश वैसे तो गिरीश ऐसे सब खुशामद खोर को क्या है बड़े लोगों को रखना पड़ता है अपना वो काम करवाने के लिए वगैरह किंतु इस मामले में गिरीश ने भी उसको पता नहीं दिया तब वो समझ गया कि निश्चय इसके भीतर में कुछ है तो देखिए कि यह बात का गिरीश घोष जिसका कि स्वामी जी के साथ में इतना सुंदर एक ये था क्या कहेंगे कि एक सिंक्रोनाइजेशन था एक हार्मोनी थी स्वामी जी जब अमेरिका से वापस आए थे भारत में तब ये कुछ-कुछ लोग तो होते हैं ना जटिला कुटेला कि सब समय वो पत्थर डालने वाले तो ऐसे कुछ लोगों ने स्वामी जी के चरित्र के बारे में कुछ उल्टी पुल्टी बात करना शुरू कर दिया तो गिरीश घोष यह मोस्ट प्रोबेबली उस दिन की घटना है कि जिस दिन स्वामी जी दक्षिणेश्वर गए थे और दक्षिणेश्वर में ठाकुर का जन्मतिथि महोत्सव लि ब्रेशन हो रहा था और यह शरद चंद्र चक्रवर्ती भी उस समय स्वामी जी के साथ में था फिर अब स्वामी जी तो अपने विदेशी शिष्यों को लेकर के आए थे तो उनको फिर वह पंचवटी वगैरह दिखाने के लिए लेकर गए यहां पर शरद चंद्र चक्रवर्ती सोचता है कि गिरीश घोष के साथ में आलाप करने का वार्तालाप करने का इतना सुंदर मौका मिला है तो देखते हैं कि वह स्वामी जी के बारे में क्या कहता है तो अभी यह बातें हो रही थी वह गिरीश के साथ में खड़ा था किसी ने स्वामी जी के चरित्र के बारे में ऐसा कोई स्टेटमेंट दे दिया तो गिरीश ने क्या कहा कि मेरी आंखें यदि स्वामी जी को ऐसा कुछ गलत कार्य करती हुई देखेगी तो मैं यह मानूंगा कि दोष मेरी आंखों का है नरेंद्र का नहीं और मैं अपनी आंखों को काट करके फेंक दूंगा जब गिरीश घोष यह बात करता है तो शरदचंद्र चक्रवर्ती कहता है कि वो जो स्वामी जी के ऊपर में जो आस्था स्वामी जी के ऊपर में जो विश्वास यह प्रचंड ज्वलंत विश्वास समाज के सो कॉल्ड धनी लोग पढ़े लिख पढ़ाई लिखाई किए हुए लोग प्रतिष्ठित लोग वे लोग स्वामी जी को इस तरह से रिकॉग्नाइज नहीं कर पाते हैं स्वामी जी का चरित्र का जो एक सौंदर्य है महिमा गरिमा है महत्ता है वे लोग नहीं पहचान पाते किंतु यह नाट्य का गिरीश भांड बांगला ते बोले ये एक नाट्य का गिरीश ने स्वामी जी का महता स्वामी जी की गरिमा समझ ली तो ये शरद चंद्र भी बड़ा ही उससे प्रभावित हो जाता है किंतु यह कौन सा गिरीश है यह वो गिरीश है जो कि श्री रामकृष्ण रूपी भट्ठी में तप करके परिशुद्ध हुआ यह गिरीश गिरीश ने एक बार ठाकुर को पूछा एक बार ठाकुर ने कहा गिरीश के बार मतलब गिरीश के बारे में ए सच नहीं किंतु ऐसा ही कुछ कि गिरीश को ही लक्ष्य करके कि एक कटोरी में जद लहसुन रखा जाए तो लहसुन अब कटोरी को कितना ही धो दीजिए उसमें से लहसुन की गंध कभी जाएगी नहीं तो अभी गिरीश ने यह बात सुन ली तो वो बड़ा ही चिंतित हो गया वो सोचता है कि मैंने तो इतने सारे पाप किए हैं तो अभी क्या यह पापों का कर्म क्या कभी भी धुले नहीं क्या मुझे नर्क में जाना होगा वैसा वगैरह वोह सोच रहा है फिर सभी लोग चले जा रहे हैं भक्त लोग तो अकेला जाकर के ठाकुर के पास में कहता है मास्टर महाशय है वहां पर तो मास्टर महाशय ने घटना रिकॉर्ड कर दी है गिरीश कहता है कि कि रसुन गंदो कोखोनो जावे ना अर्थात कि ये जो लहसुन की गं है वो क्या कभी नहीं जाएगी ठाकुर ने कहा क्यों नहीं जाएगी भट्ठी में तपा दो अभी चली जाएगी अर्थात कि जलती हुई भट्ठी में कटोरी को डाल दो तो ये लहसुन की गंध भी उस से चली जाएगी तो देखिए कि पहले का गिरीश घोष और यह जो राम कृष्ण भट्ठी रूपी राम कृष्ण रूपी भट्ठी में तप्त यह गिरीश घोष बात का तो यह परिवर्तन जो हमने देखा है तो ये परिवर्तन ट इज श्री राम कृष्ण येय श्री राम कृष्ण ने उसको अपनाया और उसको जो उसके पास में जो तपस्या करवाई उसको आशीर्वाद दिया क्यों क्योंकि वह समझते थे कि इसके भीतर में मुमुक्षु है इसके भीतर में कुछ सार है अभी कभी-कभी ठाकुर कहा करते थे ना कि इसके भीतर एर भीतर कलार पो और भीतर खीरे पो अर्थात कि यह जो एक खास तरह का एक मिठाई बनता है उसके भीतर में खीर का वो जो यह भरा जाता है वो फिलर या फिलिंग और किसी किसी के भीतर में जो दाल का फिलिंग होता है तो जो जिसके भीतर में खीर होती है उस बाहर से तो दोनों एक ही जैसे दिखते हैं किंतु जिसके भीतर में खीर है जिस मिठाई में वोह बड़ी टेस्टी लगती है जिसके भीतर में दाल होगी उसका टेस्ट इतना अच्छा नहीं लगेगा तो एक बार ठाकुर वहां पर बैठे हुए थे कि पूछा कि वो डिवोटा क्यों नहीं आ रहा है अभी तो किसी ने कहा कि वो डिवटी ने घमंड से ऐसा कहा कि हमारे भीतर में तो यह कलायर पोआ है अर्थात कि हमारे भीतर में तो यह दाल का फीलिंग है इसलिए हम ठाकुर के पास नहीं जाते हैं क्यों क्योंकि ठाकुर जो नरन को बार-बार फेवर कर रहे थे कुछ-कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आता था तो और ऐसा ऐसा इसने कह दिया तो ठाकुर बड़े ही आश्चर्य हो गए अच्छा पहले तो यह इस तरह की बातें नहीं करता था अभी देखिए कि अभी ये जब बात उठी ही है तो दूसरा एक डिवोटा कहता है अब ठाकुर नरेंद्र के साथ में नरेंद्र को बार-बार कहते हैं नरेंद्र तुम यहां पर बैठो नरेंद्र तुम यह खाओ नरेंद्र तुम यह करो अभी जब यह बात शुरू हो ही गई कि ठाकुर किसी ऐसा कहते हैं कि कोई कोई भक्त है जिसके भीतर में दाल का फीलिंग है और किस कोई कोई भक्त है जिसके भीतर में खीर है तो अभी इस तरह का बात चलना शुरू हुआ तो दूसरा एक भक्त था जतिन बोल कर के मोस्ट प्रोबेबली वो ठाकुर को कहता है कि आप नरेण आओ नरेण बैठो जैसे कि नरेण ही यहां पर आए हैं आमरा सालारा भेसे अर्थात कि हम लोग गंगा में यह जो सब बहता रहता है ना पड़ा कचरा वो गंगा का पानी जहां पर ले जाएगा वहां पर वो जाएगा तो वो उसको तो ये जो कचरा है उसको तो हम बुलाते नहीं है वो तो वैसे ही वो पानी में बह कर के आया है तो यह कहता है कि हम लोग भी इसी तरह से वो कूड़े कचरे की तरह यहां पर आए हैं क्या आप हमारे बारे में हम हमको इतना मान सन्मान नहीं देते हमारी इतनी पूछताछ नहीं करते जितनी आप नरेण की करते हैं तो ठाकुर एकदम हंसने लगे नरेण को कहते हैं देखो यह तुम्हारे बारे में बोल रहा है देखो देखो अभी देखिए ठाकुर को भीतर से सब पता है कि इनके हृदय में ईर्षा का उदय हुआ है किंतु ठाकुर देखिए कि बिकॉज के उसके भीतर में ईर्षा है उसकी निंदा नहीं करेंगे उसको डांट े नहीं यह जतिन जो लड़का था यह ऐसा कह रहा है कि हम लोग इसी तरह पानी में बहक कूड़े कचरे की तरह आए हैं क्या तो उसका वह जो दाढ़ी ऐसा वो गाल पकड़ करके उसको आदर करके कहते हैं यह घटना कलकाता में हुई थी तो ठाकुर उसको कहते हैं कि तुम वहां पर आना और आकर के प्रसाद लेना अर्थात कि दक्षिणेश्वर आना प्रसाद लेना फिर इस तरह से स्नेह पूर्वक उसको कहा कि उसका भी यह जो ईर्षा के मारे जो घमंड उसके मन में प्रकट हुआ था वह चला गया तो ये जो ईर्षा है ये ईर्षा बहुत सारे भक्तों में उस समय आती थी ईर्षा अभी गिरीश घोष के मन में तो मैंने सीधा सधी वो तो पापी ही था किंतु इतना ऊपर नहीं जाकर के मतलब नेगेटिव इतना नेगेटिव नहीं होकर के जो रेगुलर डिवोटा भी थे उनके भीतर में भी ये ईर्षा का उदय बीच-बीच में होता था और इसकी वजह से मां को जो सहन करना पड़ता था मां को जो सफर करना पड़ता था इसके बारे में एक टॉपिक अभी गंभीरानंद जी महाराज हमको कहते हैं तो थोड़ा सा उसका पाठ करते हैं महाराज जी क्या लिखते हैं ठाकुरे शेवा के शय जीवने एकमात्र कामो जानिया हो श्री मां किंतु अपर के उहा होते वंचित कोरीते ना ठाकुर की सेवा को अपने जीवन का एकमात्र काम्य उद्देश जान कर के भी मां कभी भी दूसरे लोगों को ठाकुर की सेवा से वंचित नहीं करती थी बरम श्री राम कृष्ण ईते तहर खण विच्छेद क्लेश प्रदो इहा जानिया हो तिनी अमलानंद ने अपर के पोथ छड़िया दते श्री राम कृष्ण से क्षणिक भर भी दूर रहना मां के लिए क्लेश प्रद था मां के लिए कष्टदायक था यह जानक के भी य अनुभव करने के बाद में भी जब दूसरा कोई भक्त आकर के कहेगा कि मां जो ठाकुर की सेवा कर रही है वो हम करेंगे तो इमीडिएट मां अपना रास्ता छोड़ देती थी उनके सामने और फिर कहती थी अच्छा ठीक है तुम्ही लोग करो यह सेवा भक्त समागम पूर्वे तीनी ठाकुरर भाते थाला लोया तहर गृहे जाई तेन यह भक्त लोग आना शुरू हुए उससे पहले माही खाना पका करके ठाकुर के लिए खाने का थाली लेकर के ठाकुर के कमरे में जाती और उनको खिलाती किंतु ठाकुर प्रति अशेष भक्ति मती श्री जुक्तो गुलाप मार आगमन पर ठाकुर एक दिन तहा के भा तेर थाना आनी ते बोलेन किंतु जब से यह गुलाप मां का आगमन हुआ और ठाकुर के प्रति उसकी अशेष भक्ति उस दिन के बाद में एक बार ठाकुर ने गोलाप मां को कहा कि तुम जाकर के खाने का थाला लेकर आओ देखिए ये जो अशेष भक्ति मती ये जो शब्द प्रयोग किया है क्यों किया है वो जो शोका तोरा ब्राह्मणी की जो कहानी है कथामृत में कि ठाकुर उसके घर जाते हैं और फिर वो इतनी मतलब अधीर हो जाती है भक्ति के आवेश में इतनी वो यह हो जाती है कि वो क्या करें क्या कहे कहां बैठे ठाकुर के साथ में क्या बात करें ठाकुर को क्या खिलाए ठाकुर का स्वागत कैसे करें जैसे कि उसको समझ में नहीं आ रहा है ठाकुर की भक्ति के मारे वो जैसे कि पागल ही नहीं हो गई है ठाकुर की भक्ति के आवेश में जैसे कि व पागली नहीं हो गई है तो उसका यह जो बिहेवियर था ठ ये जो मास्टर महाशय साथ में थे वो बड़े ही अभिभूत हो गए और उन्होंने कहा कि देखिए कि जीसस जब ये मेरी मैगडेलीन है कि वगैरह जो डिवोटा के घर जाते थे तो उनकी जो भक्ति की वजह से जो अवस्था होती थी वही अवस्था उनको यह शोका तुरा ब्राह्मणी के भीतर में दिख रही है और फिर यह मास्टर महाशय उनके चरणों की रज लेने के लिए आगे गए कहा कि आप में इतनी भक्ति है ठाकुर के प्रति और मैं हम लोग इतने दिनों से आते हैं फिर भी ठाकुर के प्रति पढ़ाई लिखाई की है तो मन के भीतर में एक तरह का स्केप्टिसिजम घर कर गया है तो ये हिडन ना आजकल के हम सभी लोगों की जो परिस्थिति है ईश्वर है बोल लेते हैं ईश्वर है स्वीकार भी कर लेते हैं किंतु भीतर से हृदय परिवर्तन नहीं होता तो मास्टर महाशय का भी ऐसा एक स्केप्टिक था एक मन उनका तो उन्होंने अभी इंटेलेक्चुअली स्वीकार कर लिया है किंतु हृदय तो परिवर्तन होना चाहिए लाइफ तो ट्रांसफॉर्म होनी चाहिए तो उन्होंने स्पष्ट देखा कि ये जो शोका तोरा ब्रह्मणी है उसका पूरा जीवन परिवर्तन जो ठाकुर के दर्शन मात्र से हो गया है यह किस तरह का सरल हृदय किस तरह का सरल विश्वास तो मास्टर महाशय जाकर के उनके चरणों की रज लेने के लिए जाते हैं तो यह शोका तोरा ब्राह्मणी कहती है कि नहीं नहीं मेरे चरणों की रज क्यों लेते हो ठाकुर के चरणों की रज लीजिए तो ठाकुर के ठाकुर ही तो हमारे जीवन सर्वस्व है तो वो जो शोका तोरा ब्रह्मणी का वर्णन यही अपनी गुलाप मा तो ये गुलाप मा ठाकुर समझ रहे हैं कि इसके भीतर में मेरे प्रति कितनी भक्ति है किंतु देखिए अभी यही गोलाप मा जब दक्षिणेश्वर आती है तो अभी ऐसा होता है ना कि भक्ति आप किसको कहेंगे मेरी ईश्वर के प्रति भक्ति है मुझे ईश्वर की सेवा करनी है यह तो एक बात हो गई दूसरा है कि मां की भक्ति किंतु देखिए कि मां को भी ठाकुर की सेवा करनी है किंतु साथ में मां यह देखती है कि गुलाप मां को भी ठाकुर ने कहा है खाने का थाली लेकर के जाने को तो जो एक मौका मां को मिलता था ठाकुर के साथ में बात करने का ठाकुर के सानिध्य में रहने का ठाकुर के साथ में में वार्तालाप करने का वो एक मौका भी मां ने उसको अर्पित कर दिया गुलाप मां को थाली लेकर के जाने को कह दिया देखिए किसकी भक्ति ज्यादा है शोका तोरा ब्राह्मणी का वर्णन यदि आप कथामृत में पढ़ेंगे तो आप भी अभिभूत हो जाएंगे इतना मतलब ठाकुर के प्रति निष्ठा किंतु इसके भीतर में भी तो एक स्वार्थ गंध है इसके भीतर में भी तो एक तरह का सेल्फिश स है कि हां मुझे ठाकुर की सेवा करनी है मुझे ठक की भक्ति करनी है और मां की जो भक्ति है उसमें एक निस्वार्थ मिली हुई है उसमें जैसे कि स्वार्थ का एक लेश मात्र अंश भी नहीं है यदि दूसरों को ठाकुर की सेवा करनी है तो दूसरों के रास्ते में मैं क्यों अंतराय रूप बनू मैं क्यों बाधा स्वरूप बनूं उसको करने दो सेवा मैं यहां से साइड अपने को थोड़ा सा साइड में कर लेते हूं तो देखिए कि यह जो मां का भाव था अर्थात कि भक्ति में भी देखिए बहुत बार हमको लगता है कि किसी की ईश्वर के प्रति इतनी सारी भक्ति किंतु उसमें भी यदि सेल्फिश मिली हुई है तो वह भी निम्न कक्षा की भक्ति है कंपेयर टू जो भक्ति संपूर्ण रूप से स्वार्थ गंध शून्य है तो यहां पर भी देखिए कि किस तरह से यह पूरी घटना अनफोल्ड होती है और मां की मां के जीवन की जो महत्ता है मां की भक्ति का जो मां की जो भक्ति कितनी परिशुद्ध है और यह बाकी भक्तों की भक्ति के कंपेयर में मां कितनी महत है वो हमको इस घटना से पता चलता है एक बार ठाकुर ने गुलाप मां को कह दिया कि तुम खाने का थाला लेकर के आना तो मां के पास में जो एक मौका था ठाकुर के साथ में वार्तालाप करने का वो भी जैसे कि चला गया तद बध श्री मां प्रत्य हो तहरी हस्ते थाला तुल दते उस दिन के बाद से मां ये खाने का थाला गोलाप मां को ही दे देती पूर्वे भात दते गिया श्री मां ठाकुर के दिने अंत तो एक बार देखीते पाते पहले पहले तो ऐसा होता था कि ठाकुर को खाना देने के लिए भात देने के लिए मां जब जाती तो दिन में एटलीस्ट एक बार तो ठाकुर के दर्शन होते किंतु ही नूतन व्यवस्था फले ताहा ओ बंद होया गेलो किंतु यह जो नई व्यवस्था प्रारंभ हुई कि अब गोलाप मा थाला लेकर के जाएगी तो यह एक मौका जो मां को मिलता था वह भी बंद हो गया गोलाप मा उच्च शादि का और भक्ति मती होले ओ चेर भावे चली ते जाली तेन गोलाप मा उच्च साधिका थी और बड़ी ही भक्ति मती थी किंतु फिर भी सिर्फ अपना जो भाव है उसी के अनुसार वह चलती थी परेर भाव बुझीते पारित ना दूसरों का क्या भाव है वह समझ नहीं पाती थी एमन की एक कारण अपरे हित करते जाया अनेक खेत्रे अज्ञात सारे अहित करिया बसते यहां तक कि कभी-कभी दूसरों का हित करने को वह जाती तो उसमें वह अहित कर बैठती ऐसे कुछ-कुछ उदाहरण है कि मां का आखिरी समय जब चल रहा था उस समय लाटू महाराज का देहांत हो गया काशी में मां बड़ी ही बीमार थी उस समय तो अभी मां बार-बार पूछ रही है कि लाटू का क्या हुआ लाटू को लाटू का कोई पत्र नहीं मिल रहा है लाटू का कोई समाचार नहीं आ रहा है क्या हुआ लाटू का तो अभी कोई कुछ बोल नहीं रहा है पता है कि अभी लाटू महाराज के देहांत से मां वैसे ही दुर्बल है लाटू महाराज के देहांत का समाचार मिलेगा तो पता नहीं मां के सीने प क्या बीतेगी मां के हृदय में कितना बड़ा आघात होगा तो कोई मां को कुछ बता नहीं रहा है यहां पे मां बार-बार पूछ रही है जाओ उसका समाचार लो उसका खबर लो क्या हुआ उसका तो अभी देखिए कि सब लोग ये छुपाने के लिए व्यस्त है कि लाटू महाराज नहीं रहे उसमें गुलाप माने जोर से बोल दिया एक बार रह नहीं पाई तो अरे वो तो चला गया अब उसका समाचार लेकर क्या करना है तब मां एकदम ऐसा आघात लगा चित्कार करके रोना शुरू कर दिया और मां का बुखार भी बढ़ गया तो ये थी गोलाप मां शरद महाराज को जब पता चला कि गुलाप मां ने बता दिया है मां को तो वो भी थोड़े से नाराज हो गए थे किंतु क्या किया जाए ऐसे ही मां का जो भाई था वो वो बीमार था और वो भी अंतिम सैया पे शत था उसका देहांत हो गया व समाचार भी मां को नहीं दिया गया और सेम वही घटना चक्र मां बार-बार पूछ रही है कि उसका समाचार लो संदेश वगैरह लेकर के उसके घर कोई जाओ उसका समाचार लेकर आओ कोई कुछ बोल नहीं रहा है वो मां जब बार-बार किंतु पूछती है तो गुलाब माने जोर से बोल दिया वो तो गया अभी क्या संदेश लेकर वहां पर जाना तो फिर वही अवस्था फिर मां रोना शुरू कर दी फिर मां का बुखार बढ़ गया तो अभी देखिए कि य शोका तोरा ब्राह्मणी कथामृत की और बात की अपनी गोलाप मा ये एक ही चरित्र है और उनकी जो भक्ति है ठाकुर के प्रति इवन मां के प्रति वो अतुलनीय है जया और विजया मां की संगिनी होना वह तो कोई आम बात नहीं है किंतु फिर भी यह जो निस्वार्थ जो होती है दूसरों का पॉइंट ऑफ व्यू समझना एंपैथी करुणा कंपैशन यह एक उच्चतर साधना है आपके भीतर में भगवान के प्रति भक्ति है किंतु मेरा स्वार्थ है इस भक्ति के साथ में मिला हुआ तो वह सर्वोच्च कक्षा की भक्ति नहीं होगी कंपेयर टू दैट मां को देखिए कि एक मात्र मौका मिलता था ठाकुर को आहार करवाने का वह भी माने अपने हाथ थ से अपने हाथों से वो गुलाप मां को दे दिया ठाकुर ने तो एक ही बार कहा गुलाप मां को कि जाओ तुम खाना लेकर आओ ठाकुर ने ऐसा तो नहीं कहा कि प्रतिदिन तुम लाना किंतु मां ने फिर देखा कि हां गुलाप मां को कितना अच्छा लगता है कितना सुकून मिलता है ठकुर को खाना खिलाने से तब अभी अभी उसको देखते देख कर के उसकी खुशी देख कर के माने अपने हाथों से य थाला सब समय गुलाप मां को दे देती थी तो अभी देखिए कि किसकी ठाकुर के प्रति भक्ति ज्यादा है जो ठाकुर की सेवा करना चाहता है वह ना कि जो ठाकुर की सेवा का मौका अपने हाथों से गवाता है वह ये कितना इंट्रीकेट यह चक्र है यह भक्ति शास्त्र कहो ना कि आध्यात्मिकता कहो उसमें कभी-कभी जो बाहर से दिखता है जो थर्ड पर्सन ऑब्जर्व करता होगा वह कभी ऐसा भी सोच सकता है कि मां मां को फिर शायद ऐसा होगा कि यह कहां इतना कष्ट करके ठाकुर का थाला लेकर जाए तो इसलिए हो सकता है कि उन्होंने गुलाप मां को दे दिया हो ऐसा भी तो कोई सोच सकता है और गुलाप मा देखिए कितनी भक्ति होती है कष्ट करके थाला लेकर ठाकुर के पास जाती है तो एक बाह्य ऑब्जर्वेशन एक होता है एक आंतरिक ऑब्जर्वेशन होता है और जो इंटरनल इंट्रीकेसी है भक्ति शास्त्र में कितनी है एक दिन तीनी उपदेश छोले श्री मां के बोलिया छिले अभी देखिए गुलाप मां के कांड एक के बाद एक मां को जैसे कि उपदेश देते देते उन्होंने कह दिया मां मनो मोहनर मां बोले छीलो मनो मोहन बोलकर के एक भक्त था उसकी मां ने मां के बारे में क्या कहा उनी अतो बड़ो त्यागी आर मा य माकड़ी टाक य तो गई ना पोरेन य भालो देई की अर्थात की ये मनोम हन की जो मां थी अभी उसके मन में भी कुछ ना कुछ ईर्षा जैसा आया होगा तो उसने कह दिया मां के कि अभी मां के मुंह पर तो नहीं कहा पीछे से कहा कि व ठाकुर तो इतने बड़े त्यागी है और मां ये क्या सब गहना वगैरह पहन कर के रखती है नाक में नथ है हाथों में यह चूड़ियां है यह सब क्या मां पहन कर के रखती है यह क्या अच्छा दिखेगा सोने के गहने पहन के मां रहती है सांसारिक बुद्धिर निकट पराजय मान्या श्रीमा सदीने हाते द्वि काछी सोनार बाला छाड़ समस्त खुलिया फेली लेन देखिए यह संसारी लोगों की यह बातों के सामने हार मान कर के मां ने साथ-साथ ही अपने हाथों में जो चूड़ियां पहनी थी जो कि ठाकुर ने स्पेसिफिकली मां के लिए बनवा दी थी उसको छोड़ कर के बाकी जितने भी गहने वो पहनती थी सब निकाल कर के मां ने रख दिए देखिए जिसने भी ऐसा कहा होगा ये सब कैसे निष्ठुर लोग है एक तो मनोम हन की मां कि जो कि इस तरह का मंतव्य देती है दूसरी ये गुलाप मां पागल जाकर के ये मंतव्य मां के सामने रजू करती है क्या जरूरत थी यह सब करने की किंतु फिर भी ये मैं ईश्वर की मैं ठाकुर की बड़ी भक्त हूं और जब तक मां है तब तक मेरी भक्ति को लोग स्वीकार नहीं करेंगे लोग ऐसा नहीं कहेंगे कि मैं सबसे बड़ी भक्त हूं तो ऐसा देख कर के फिर ठाकुर और मां का जो सानिध्य था जो उनके बीच में जो निकटता थी स्नेह प्रेम था इन लोगों से दिखा नहीं जाता था बोलकर के स्वार्थ के मारे ईर्षा के मारे इस तरह के मंतव्य करना शुरू किया और मां ने भी देखा कि यह सांसारिक जगत तो ऐसा ही है कहां लोगों के साथ में झगड़ा करने को जाए और फिर मां ने ही एक बार कहा था मैं लोगों के यह जो महीने ये जो लोगों की ये जो सब बातें हैं मैं क्यों सुनो मैंने तो बातें सुनने वाला कोई काम किया नहीं है तो इसलिए मां जब भी ऐसा कुछ सुनती तो इमीडिएट वो जो करती थी वो छोड़ देती तो यहां पर भी जैसे ही कहा कि मां गहने क्यों पहनती है साथ-साथ में ही मां ने दो चूड़ियों को छोड़ कर के बाकी सब गहने निकाल दिए पर दिन जोगन मा आशिया अनेक बुझा ले तीनी आर दुई एक खानी गोना पलेन किंतु समस्त अलंकार आर कोनो दिन परा होलो ना दूसरे दिन जब योगेन मा आई उन्होंने देखा बड़े ही मैंने आश्चर्य चकित होकर के मां इतनी सुंदर दिखती थी गहने पहन करके और गहने निकाल दिए हैं तब उन्होंने बड़ा ही समझा करके मां को फिर से गहने पहनने के लिए सहमत किया किंतु माने फिर एक दो गहने और ज्यादा पहने सब गहने जो पहले की तरह पहनती थी वो उन्होंने कभी पहने नहीं क्यों समस्त अलंकार आर कोनो दिने परा होलो ना जो सभी गहने वापस पहनना कभी भी नहीं हुआ कारण अचरे ठाकुरर गलर के सूत्रपात ता आर शहीदी के आर मन गेलो ना क्यों क्योंकि कुछ ही दिन के बाद में ठाकुर के गले का रोग अर्थात की गले का कैंसर प्रारंभ हुआ और ठाकुर के बारे में चिंतित मां को फिर गहने पहने की ओर मन गया नहीं देखिए यह लोग यह लोग क्या हम लोग हम लोगों के मन में भक्ति के साथ में यह जो छुपे हुए जो सब दुर्गुण है ना हम लोग कभी भी समझ नहीं पाएंगे हम यह सब का चिंतन हम लोगों के लिए क्यों आवश्यक है क्योंकि यहां पर भी आश्रम में आकर के हम लोग भक्ति का अतिरेक कभी दिखाएंगे कि हां मैं बड़ा भक्त हूं दूसरे लोग मेरे जैसे नहीं है या दूसरे लोग मेरे से निम्न कक्षा के हैं या तो मैं ही सबसे बेटर हूं दूसरों की वजह यसा सब आचरण जो करते हैं एक भक्त ने आकर के मुझे बोल दिया था मेरे मुंह पर कि महाराज आपका जन्म नहीं हुआ था उस समय से हम लोग यहां पर आ रहे हैं तो मैंने कहा अच्छी बात है ठाकुर के पास में आप पहले मतलब ठाकुर का दर्शन आपको पहले होगा मेरे से उसमें क्या तो देखिए कि ऐसा साधुओं को भी उपदेश देने वाले लोग बैठे हैं किंतु इस सबके पीछे क्या होता है कहीं ना कहीं घमंड है कहीं ना कहीं ईर्षा है यह सब कार्य करता है यदि आपकी ठाकुर के प्रति सर्वोच्च भक्ति होगी तो ठाकुर के भक्तों की निंदा आपके मुंह से कभी निकलेगी नहीं ठाकुर के भक्तों के बारे में कटु वचन आप कभी भी कहेंगे नहीं यह जो सर्वोच्च भक्ति की यह निशानी है यदि आपको ऐसा पता चला कि यह भक्त है व यह कुछ कार्य करना चाहता है जिससे कि उसको ज्यादा प्रॉमिनेंस मिलेगा मेरी वजह तो फिर यह कंपटीशन नहीं करना है कि यहां पर किसको ज्यादा प्रॉमिनेंस मिलता है यह बहुत बार ऐसा भी होता है मैंने देखा है नजरों से कि ये हम लोग ज्यादा काम करते हैं हम लोग स्टेज प जाकर के वो बोलेंगे हम लोग सबके सामने रहेंगे यह जो एग्जिबिशनिस्ट माइंड सेट होता है किसी-किसी का कि मुझे सबसे आगे रहना है मुझे सबसे प्रोमिन रहना है यह जो प्रोमिन होने की यह जो यह रेस है उसमें यह लोग यह भूल जाते हैं कि उनकी भक्ति जो है वह कभी भी एक लेवल को क्रॉस करके हायर लेवल पर नहीं जाएगी यदि आप ठाकुर के प्रति सही सही भक्ति वान है तो अपने को प्रमोट करने की अपने को प्रोजेक्ट करने की अपने को यह प्रोमिन बनाने की यह जो रेस है इवन आश्रम के भीतर में उससे भी हमको मुक्ति पानी होगी यदि मेरे भाई या जो आते हैं यहां आश्रम में मेरे ही तो भाई बहन है उनको कोई कार्य करके कोई सेवा करके शांति मिलती है अच्छा लगता है तो सेवा का भार में इमीडिएट उनको दे दूंगा मुझे नहीं होना प्रोमिन मेरी भक्ति कोई इस तरह की भक्ति नहीं कि यह सेवा मैं करूंगा मैं ही करूंगा मेरे अलावा और किसी को नहीं करने दूंगा तभी मेरी भक्ति रहेगी नहीं जाकर के मंदिर में बैठिए ठाकुर का नाम जप कीजिए ठाकुर का कथामृत पाठ कीजिए इससे भी मतलब ये सेवा का भार दूसरे को दे दे ना ट इट सेल्फ इज अ ग्रेटर इट ट रिक्वायर्स अ ग्रेटर चैलेंज फॉर यू ग्रेटर डेरिंग ग्रेटर करेज देन जस्ट टू शो योर ओन डिवोशन तो कितना इंट्रीकेट है यह सब आध्यात्मिकता वाला जीवन जहां हो भले जो भी हो आमरा अन्न परिवेश कथाई बोली ते लाम हम लोग ये जो खाना परोसने की बात ही कर रहे थे गोलाप मा सुधार परो अनेक खण ठाकुरे निकट थाकी देन गोलाप मा शाम को भी शाम होने के बाद में भी बहुत बार बहुत समय बहुत क्षण ठाकुर के पास बैठी रहती कौनो दिन हो तो रात्रि दोष नबत फिरी तेन कोई कोई दिन तो ऐसा होता कि रात को 10 बजे नबत में वापस आती य हाते श्री मायर विशेष असुविधा होई तो इससे मां को विशेष रूप से असुविधा होती कारण तहा के अनेक रात्रि पजन तो नबत बारां भात आग लाया बसिया था कीते होई तो क्यों मा इससे क्यों असुविधा होगी गुलाप मां 10 बजे के बाद में ठाकुर के कमरे में से आएगी नबत क्योंकि गुलाप मां का जो भात का थाला है उसको बचा करके रखने के लिए मां को खुद को वह वरांडा में लंबे समय तक बैठे रहना पड़ता मां जद उसकी रक्षा नहीं करती बात की तो बिल्ली है ना कुछ भी है वह आकर के उसमें मुंह लगाता तो मां को तो बैठ कर के रहना पड़ेगा ऐसा एक बड़ा ही सुंदर दृश्य जयराम बाटी का है कि मां के साथ में तो यह सब त्यागी संतान
Jayrambati
रहते थे तो कोई लड़का जद गया है कहीं पास के गांव में किसी काम करने के लिए ऐसा कुछ तो फिर मां वहां पर अपने कमरे में बैठी रहेगी उसके लिए एक दूध का एक कटोरी लेकर के या खाना ऐसा कुछ लेकर के और फिर क्या है पता है ये सुंदर चित्र का वर्णन तो बड़ा ही सुंदर करते हैं यह जो सन्यासी जो महाराज है इस चित्र का कि एक छोटा सा प्रदीप प्रज्वलित हो रहा है चारों ओर अंधेरा है मां वहां पर बैठी है यह ग्ला ये दूध की कटोरी को सामने रख कर के जिससे कि यह बिल्ली वगैरह उसमें मुंह ना डाल दें और फिर किंतु मन उ चल रहा है जैसे कि ईश्वरीय उच्च चिंतन में तो इतना सुंदर दृश्य दिखता था ये और पास में ही एक छोटी सी एक लकड़ी भी रखेगी लाठी की तरह जिससे कि यदि बिल्ली आ जाए उस दूध में मुंह डालने के लिए तो यह लाठी को जमीन पे मां पटके गी जिससे कि बिल्ली भाग जाए तो ये थी अपनी मां यदि कोई नहीं आता है तो ऐसा कि ढक कर के रख दो और अपने चले गए जब ध्यान करने के लिए या सोने के लिए मां खाना बचा करके खाने के पास में बैठी रहेगी और जब आप वापस आएंगे तब मां आपको सामने बैठ कर के आग्रह करके खिलाएगी तो ये थी मां किंतु यहां पे गुलाप मा को ये समझ में नहीं आ रहा है कि मां को इससे कितना कष्ट हो रहा है ये जो स्वार्थ है अभी ये जो मां के जो त्यागी संतान थे जयराम बाटी में वो जब भी वापस आते देखते कि मां इस तरह से बैठी हुई है सब समय प्रोटेस्ट करते मां आप इस तरह से क्यों बैठी हुई है मेरी दूध की कटोरी लेके या खाना लेके आप विश्राम कीजिए यहां पर ढक करके रख दीजिए मैं उसको ले लूंगा अपने से किंतु नहीं यह मां का जो स्वभाव है कि त्यागी संतानों को पता था कि मां का इस तरह से डिस मतलब ये बेनिफिट नहीं ले लेना है मां को जो कष्ट होता है अभी मां जिस तरह से मां के हृदय में उसके प्रति मातृभबन के हृदय में भी यह निष्ठा और श्रद्धा का भाव है कि मां को मेरी वजह से कष्ट हो रहा है बहुत बार ऐसा विवरण है कि यह शशि महाराज है महापुरुष महाराज है
Shashi Mj
जयराम बाटी गए हैं और जयराम बाटी जाकर के वहां का जो मलेरिया का जो वातावरण है उसमें वो लोग बीमार हो गए अभी मां बेचारी उनकी सेवा कर रही है वह कटोरी लेकर घर-घर
Mahapurush Mj
जा रही है दूध की भिक्षा कर रही है कि मेरे लड़के बीमार है उनके लिए खाना दूध दो तो ये देख कर के ये लोग सोच रहे हैं मां के संतान की अरे मां की वजह से हमको इतना कष्ट होता है तो चलो हम लोग चले जाते हैं भले ही बुखार को पूरे पूरा ठीक नहीं हुआ हो तो जो मां के हृदय में उनके प्रति जो भाव था वे लोग भी समझते थे कि मां को अननेसेसरी कष्ट नहीं देना है किंतु यहां पर गोलाब मा थी वह समझ नहीं पा रही है कि ठाकुर के कमरे से देरी से आती है और मां को वहां पर रामदे में बैठ कर के उनका खाना व बचा करके बैठी है तो मां को भी तो इतना कष्ट होता है गोलाप मां को यह बात समझ में नहीं आती एक दिन ठाकुर सुनी ते पायले मां बोली ते छन किंतु अभी मां की भी सहन शक्ति की एक हद होती है तो ठाकुर ने एक दिन सुना कि मां क्या कह रही है मां बोली ते छन खा बार बेडल कुकुरे खाक आमी आर गलाते पार्बोना यह जो खाने का थाली है बिल्ली आ कर के खा जाए उसमें मुंह मार दे कि कुत्ता आ करके उसमें मुंह लगा दे अभी मैं इस थाली को सामने बैठ कर के बचा करके नहीं रह पाऊंगी ठाकुर श्री मायर असुविधा बुजिया गुलाप मां के सावधान कोरिया दिले ठाकुर समझ गए कि मां को इससे कितना तकलीफ होता है उन्होंने गोलाप मा को सावधान कर दिया किंतु गोलाप मा निजे चिंता धारा अनुसरण करिया निजो चिंता धारा अनुसरण करिया ठाकुर कथा बुझ आओ बुझी लेना गुलाप मा का जो अपना एक भाव है कि बस ठाकुर के साथ में मुझे रहना है ठाकुर का सानिध्य प्राप्त करना है ठाकुर का संग चाहिए तो समझ कर के भी जैसे गुलाप मां समझती नहीं है समझ कर के भी जैसे अनजान रहती है बोली लेन ना मा आमा के खूब भालो बासन मेर म तो नाम धरे डाकन उन्होंने ठाकुर को कहा नहीं नहीं आप क्या कहते हैं मां को कहां कष्ट हो रहा है मां तो मुझे बहुत स्नेह करती है मुझे अपनी बच्ची की तरह अपनी लड़की की तरह पुकारती है नाम करके पुकारती है काज त द्रु स्वभावा गोलाब मार पखे श्री मायर मनः कष्ट बुझीते एवं तदनुसार शे बार भार तहर श्री हस्ते तुल दते प्राय दई मास लागया छेलो तो ये जो गुलाप मां थी उनको मां का कष्ट समझ कर के मां के हाथ में फिर से खाने का थाला दे दे करके मां को भेजना ठाकुर के पास में ऐसा करते हुए दो दो महीने के आसपास समय लगा था ए दीर्घ काल श्रीमान निरब आपन दुख आपन हृदय गोपन राखिया दूर ईते ठाकुर के दर्शन कोरियाई आकांक्षा मिटाई अ छि लेन और यह दो महीना मां ने अपने ह अपने दुख को अपने हृदय में ही पूर करके भर करके दूर से ठाकुर का दर्शन करके अपने मन की आस प पासा बुझाई थी आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु किसकी क्या है कि यह तो लंबा रास्ता
हम दिखाते तो हैं कि हम बहुत भक्तिमय हैं लेकिन भीतर से छिछोरे है
है ना आध्यात्मिक जर्नी क्या है कि पहले तो एक आत्म निरीक्षण करना एक इंट्रोस्पेक्शन करना यह बहुत इंपोर्टेंट हम लोगों के लिए कि हम लोग कहते तो है कि वी प्रोफेस वी प्रीच आल्सो वी प्रीच बट वी डू नॉट प्रैक्टिस यह जो है कि जब तक मैं आत्म निरीक्षण नहीं करूंगा जब तक मैं अपने हृदय में क्या हो रहा है नहीं समझूंगा तब तक क्या है ना कि हमारी भक्ति या तो अपनी साधना जो है वह एक लेवल से ऊपर नहीं जाएगी वह जैसे मैंने कहा ना कि मैंने यह बहुत बार देखा है एक दो बार नहीं काफी बार देखा है कि कोई कोई को प्रोजेक्ट करने का प्रयास करता है किंतु क्या है कि यह समझ नहीं पाता कि ऐसा करके फिर वह उसी एक विष चक्र में फस जाता है कि जिस चक्र से निकलने के लिए वह यहां पर आया है सो दिस लाइफ इज वेरी इंट्रीकेट मने कब कहीं जाकर के आप उस उसके वो जो गुजरात में पता है ना वो जो बीच में व रास्ते में वह जो एक तांत्रिक लोग होते हैं वो कुंडल वो सर्कल बना के रखते हैं फिर उस सर्कल में जद पैर पड़ गया तो फिर कुछ ना कुछ गड़बड़ होगा तो गुजराती कुंडा पक पड़ चलते चलते कब कहां पर पैर पड़
जड़-भरत इतने त्यागी होने के बावजूद एक हिरण की माया में फँस गए
जाएगा गहना कर्मण गति व गीता में इसलिए कहते हैं ना कि ववन पंडित लोग भी समझ नहीं पाते किय कर्मा की गति किस तरह की है आपको लगता है आप अच्छा कुछ कर रहे हैं यहां पर गोलाप मा देखिए कि गोलाप मा चाहती है अच्छा करना उसमें भी गड़बड़ कर देती है
कभी-कभी हम चाहकर भी सही काम नहीं कर पाते. ऐसा क्यों होता है?
किंतु देखिए कि ठाकुर की हमारे प्रति जो यह है ना आशीर्वाद उससे कभी कम नहीं होगा क्योंकि ठाकुर यह नहीं देखते कि हम में परफेक्शन है कि नहीं ठाकुर यह देखते हैं कि हम परफेक्शन की ओर जाना चाहते हैं कि नहीं अभी ठाकुर तो नजरों से सब कुछ देख रहे हैं कि ये गुलाप मां खाना लेकर आती है तो मां को कष्ट होता है ठाकुर को क्या यह समझ में नहीं आता ठाकुर क्या इतने अंधे है सब समझता है किंतु फिर भी ये गुलाब मां की जो आंतरिक यह होगी ठाकुर के प्रति जो टान जो आकर्षण तो ठाकुर ने भी अलाव किया कि अच्छा ठीक है मां को थोड़ा सा कष्ट होता है किंतु गुलाप मां को इसकी आवश्यकता है अल्टीमेटली जो उनको मुक्ति की ओर का जो उनकी जो है यात्रा तो इस यात्रा में ठाकुर को आहार करवाने से दो महीने के लिए उनको बहुत सारा उनको सहाय मिलेगा तो मां को कष्ट हो रहा है समझ करके भी ठाकुर ने गोलाप मा को ये करने दिया तो ठाकुर तो इमीडिएट ना कर देते तुमको तो एक दिन बोला है खाना लाने के लिए प्रतिदिन थोड़ी ना बोला है मां देती है तो क्या तुम्हारे में अकल नहीं है बोल कर के देखिए कि अभी इस तरह की एक घटना दूसरी भी है ठाकुर उस समय श्याम पुकुर में थे तो किसी ने आकर के योगेन माना कि किसी ने गुलाप माने मैं एगजैक्टली भूल गया जाकर के मां को ऐसा कहा कि भक्त लोग कहते हैं कि आपकी आपसे नाराज होकर के ठाकुर कलकाता चले गए तो मां तो बड़ी दुखित हो गई तो मां जाकर के पैदल चल कर के वहां पर गई कलकत्ता ठाकुर को मिली रोते रो कहती है कि क्या मेरे से नाराज होकर के आप यहां पर आ गए हैं क्या तो ठाकुर तो बड़े ही विस्मित हो गए बोला कि किसको कहा तुमने यह बात तो उसने कहा कि गुलाप माने कि योगेन माने कहा तो अच्छा ठाकुर का फिर जो क्रोध है वो आशु आने दो उसको फिर जो उसको उसके आने के बाद में ठाकुर ने उसको जो डांटा है वो रोती रोती आई मां के पास में मां मेरी तो ऐसा कहने का कोई ये नहीं था आशय मैं क्षमा कर दीजिए मैंने आपको कष्ट पहुंचाया तो फिर मां फिर हंसते हंसते कहती है अरे उसमें क्या है तो देखिए ठाकुर को नहीं पता है कि मां को कष्ट होता है ऐसा नहीं है किंतु फिर भी ठाकुर अलाव करते हैं दैट मींस व्ट ठाकुर हमें परफेक्शन नहीं देखते परफेक्शन होता तो ठाकुर को आने की जरूरत क्या पड़ती ठाकुर यह देखते हैं कि इस यात्रा करने के लिए हमारी इच्छा है कि नहीं इच्छा है तो ठाकुर हमको सहाय करेंगे खुद को कष्ट होता है मां को कष्ट होता है मां को कष्ट दिलवा करके भी ठाकुर हमको सहाय करेंगे दैट इज ठाकुर्स प्रॉमिस टू अस
ठाकुर खुद तो चले गए लेकिन माँ को इन पागल लोगों से निपटने के लिए यहीं छोड़ गए
ये जो श्यामा सुंदरी देवी कहती है ना कि मेरी शारदा मां नाम का पुकार भी नहीं सुन पाई तो ठाकुर ने कहना कि जो इतने लोग आकर के मामा करेंगे मां परेशान हो जाएगी किंतु देखिए यह जो विरजानंद जी जब जयराम बाटी गए जगत धात्री पूजा के लिए तो योगेन मां गुलाप मां फिर सानियाल महाशय शरद महाराज और विरजानंद जी महाराज तो काली कृष्ण महाराज यह सब गए वहां पर और जब वो श्यामा सुंदरी देवी को दीदी मा करके पुकारते थे दीदीमा अर्था की मां की मां तो कहते हैं लिखते हैं अलादे नार हृदय ता आठ का ना होए ज तो अर्थात की वो अलाद अर्थात की खुशी के मारे उनका सीना मने हृदय भर जाता था तो ये मने दीदी मा ने भी श्यामा सुंदरी देवी को भी यह मौका मिला दीदी मां पुकार सुनने का ठाकुर के साथ में यही प्रॉब्लम है जो मांगते छप्पर फाड़ के दे देते हैं फिर आप [हंसी] संभालिए सोच समझ करके मांगिए अच्छा ये एक इंटरेस्टिंग बात मैंने सुनी है वैसे मुझे पक्का नहीं पता कितना सही है सुना है कि वह गुजरात में ऐसा होता है ना कि वोह एक पार्टनर बनाते हैं बिजनेस में किसी भगवान को तो जैसे कि क्या है कि बिजनेस में कुछ हो फिर वो उनके उनका जो परसेंटेज होता है उनका जितना परसेंटेज पार्टनर बनाया है उतना प्रॉफिट वह सेवा में दे देंगे तो कुछ-कुछ लोग ऐसा कहते हैं ठाकुर को पार्टनर बनाते तो कोई लाभ नहीं होता किंतु मां को पार्टनर बनाने से बहुत प्रॉफिट होता [हंसी] है अभी इसका सही गलत कितना है पता नहीं है तो हवाहवा में एक बार सुना है मैंने