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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

बिन्दुवासिनी: श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 14 Nov 2024

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ओम स्थापक य च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणी अवतार वरिष्ठा राम कृष्णाय ते नमः मां ठाकुर और स्वामी जी इन तीनों के जीवन से हम क्या सीख सकते हैं वह तो एक बात है किंतु साथ में ही इन तीनों के जीवन की जो यह सब घटनाएं हैं छोटी-छोटी किस तरह से हमारे अंतरमन को पवित्र करती है निर्मल करती है यह भी एक साथ-साथ में हमको देखना है बहुत बार हम लोग जब कुछ पढ़ेंगे ठाकुर मा स्वामी जी के बारे में तो हम यह सोचेंगे कि अरे यह घटना का क्या कोई इंपॉर्टेंस है कि भी नहीं मैं जब शुरू शुरू में पढ़ रहा था ठाकुर म स्वामी जी की हानिया तो मुझे मेरे मन में एक प्रश्न चलता था कभी-कभी कि क्या इस सब छोटी-छोटी घटनाओं को रिपीट करने से इसको लिपिबद्ध करने से करने की क्या कोई आवश्यकता थी कथामृत में आपने शायद पढ़ा होगा कि एक जगह पर कथामृत में तो नहीं और कहीं पर लिपिबद्ध है कि हृदय ठाकुर को एक बार कहता है कि आप एक ही बात बार-बार रिपीट क्यों करते हैं अभी देखिए कि ऐसा ठाकुर कुछ-कुछ चीजें रिपीट करते हैं हमने कथामृत में देखा है तो हृदय का कहना था कि आप एक ही चीज को रिपीट क्यों करते हैं दूसरे विभिन्न विभिन्न लोगों के पास में आप तो कहते हैं कि मां राश ठेले दे अर्थात कि आप जब बोलने की शुरुआत करेंगे तो मां जगदंबा क्या करेगी जो कुछ बोलना है नई-नई बातें वह सब मां जगदंबा आपको बता देगी तो आपको फिर वोह वही बातें रिपीट करने की क्या आवश्यकता है तो ठाकुर ने उसको कहा था गाली दे कर के साला मैं क्या बोलता हूं क्या नहीं बोलता हूं उससे तुमको क्या मतलब है और कथामृत में भी देखिए कि मास्टर महाशय को एक बार पूछा गया कि आपने कुछ-कुछ ठाकुर की बातें विभिन्न जगह पर रिपीट की है यदि आप लिपिबद्ध करते ही थे तो फिर जो रिपीटेशन है उसको हटा दे सकते थे तो अभी अन्यथा बिना मतलब तो फिर वो किताब की साइज बढ़ जाती है ना अदर वाइज जद आप रिपीटेशन रखेंगे किताब में ज्यादा पेजेस लगेंगे और रिपीटेशन हटा देंगे तो फिर वह किताब की साइज कम हो जाएगी वह लोगों को पढ़ने के लिए आसान रहेगा तो मास्टर महाशय ने क्या कहा दो बात कही एक तो है कि यदि ठाकुर एक बात को टॉपिक को लेकर के उसको डेवलप कर रहे हैं उसमें उन्होंने जो विभिन्न उपमा एं दी है वह उपमा को वहां से हटा ले इस भय से कि यह रिपीटेशन हो रहा है तो फिर क्या होगा कि ठाकुर की बात का जो प्रवाह है जो एक स्टेप बाय स्टेप ठाकुर आर्गुमेंट डेवलप कर रहे हैं वह स्टेप्स टूट जाएंगे वह प्रवाह बिखर जाएगा क्योंकि पहले एक उपमा दी बाद में दूसरी उपमा जो देनी थी उसको डेवलप करने के लिए वह स्किप करके तीसरी उपमा पर आ गए तो वह आर्गुमेंट प्रॉपर डेवलप होगा नहीं तो वह तो एक रीजन है कि इस रिपीटेशन को हटाया क्यों नहीं और दूसरा रीजन यह है कि यदि ठकुर उसको रिपीट करते हैं तो उसके पीछे भी एक जगत कल्याण का हेतु है आप यह मत समझिए कि ठाकुर के पास में बातें कम हो गई है बातें खुट गई है अभी नई बातें मिल नहीं रही है बोल कर के वह रिपीट करते हैं ऐसा नहीं है ठाकुर के पास में अनंत प्रवाह है बातें बातों का बातें करने का तो ठाकुर के पास में बात कम नहीं हो जाएगी वो खुट नहीं जाएगी किंतु ठाकुर समझते हैं कि किस बात को रिपीट करने से सो सामने वाला जो श्रोता है श्रोता के मन में उसकी गहन असर पड़ेगी तो यह सब परिमाण फैक्टर्स को लेकर के मास्टर महाशय ने कहा कि जद रिपीटेशंस भी है तो उनको भी मैं कथामृत में बजाए रखता हूं बनाए रखता हूं तो यहां पर यही जो रिपीटेशन वाली जो बात है उसी को यह छोटे-छोटे प्रसंग के साथ में भी लाकर के हम सोच सकते हैं कि यह सब प्रसंग इसको स्किप कर के जो कि मेजर इवेंट्स है जैसे कि मां और ठाकुर का विवाह हुआ मां की पूजा की शोड़ी रूप में उसके बाद में सभी भक्तों का आगमन हुआ प्रारंभ उसके बाद में भक्तों को उपदेश दे रहे हैं उसके बाद में कैंसर हुआ ठाकुर को और कैंसर की जो फिलोसोफी है उसके आसपास में कि क्यों ठाकुर को कैंसर हुआ उसका उल्लेख किया और बाद में आखिरी आखिरी दिनों में ठाकुर ने किस तरह से अपने सन्यासी संघ की स्थापना की तो एक जो मेजर फिलोसॉफिकल इवेंट्स है उन्हीं को लेकर के क्या ठाकुर मां स्वामी जी की जीवनी की रचना नहीं हो सकती हो सकती है बिल्कुल हो सकती है किंतु इससे क्या होगा कि हमारे हृदय को तृप्ति नहीं मिलेगी भ वेदव्यास के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने यह जो वेद के विभाग कीए चार वेदों में बांटा ब्रह्मसूत्र की रचना की उसके बाद में यह पुराणों की की रचना की किंतु बा फिर भी उनके हृदय को शांति नहीं मिल रही थी वह शांति उनको मिली यह वृंदावन लीला की रचना करके श्रीमद् भागवत की रचना करके तो फिर अभी देखिए कि यह जो मन को तृप्त करने वाली बातें हैं वह यह सब छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से ही हमको मिलती है यदि हम फिलोसोफी पढ़ेंगे अभी जैसे कि लीला प्रसंग में ही देखिए लीला प्रसंग में एक सा साधक भाव करके चैप्टर है उसमें साधना की सभी बातें ठाकुर ने जो 18 58 वहां जो कामर पुकुर गए कामर पुकुर से वापस आए और फिर उन्होंने जो साधना में डूब मारी उन्होंने जो उस गभीर उसके भीतर में प्रवेश किया साधन जगत के भीतर में तब से लेकर के ऑलमोस्ट 65 68 साधना के बारे में जो चैप्टर है उसमें लिपिबद्ध है और उसमें ठाकुर ने जितनी भी साधनाएं की है वह चाहे तंत्र साधना हो फिर चाहे वेदांत साधना हो ना कि भाव साधनाएं हो एक के बाद एक उसका बड़ा ही विषद फिलोसॉफिकल डिस्क्रिप्शन दिया गया है किंतु इस चैप्टर को पढ़कर हमको जितनी तृप्ति मिलती है इंटेलेक्चुअली जानने को बहुत कुछ मिलेगा किंतु तृप्ति उन चैप्टर्स को पढ़ने को पढ़ करके मिलेगी कि जिसमें ठाकुर के दिन प्रतिदिन की जीवन चर्या जो है उसका उल्लेख है यह हलधार के साथ में जो प्रसंग हो रहे हैं हलधार आकर के हलधार यानी कि ठाकुर का एक रिलेटिव जो कि काली मंदिर में काम करता था पुजारी के रूप में ही तो वह बीच-बीच और वह बड़ा ही पंडित समझता था अपने को और वह भागवत वगैरह पाठ भी करता था तो किंतु बीच-बीच में वह ठाकुर को आकर के कहेगा कि इस बार मैंने तुमको समझ लिया है गदाधर मुझे पता चल गया है कि तुम वही अवतार हो तो फिर ठाकुर हंस के कहते कि अच्छा ठीक है फिर देखा जाएगा क्या होता है आगे कुछ दिन गए और फिर बाद में हलधार क्या करेगा वह जो नस्य होता है ना स्नफ स्निफ जिसको बोलते हैं वो नाक में डाल कर के वो तंबाकू जैसा कुछ जो कि नाक में डाला जाता है जिससे कि ये व स्मोकिंग जैसा आनंद मिलता है तो वह नस्य लेकर के फिर वह भागवत पढ़ने की शुरुआत करेगा उस समय ठाकुर वहां पर चले जाएंगे और जाकर के कहेंगे कि देखो इस तुम्हारी यह जो किताब जो तुम पढ़ रहे हो उसमें जिसका विवरण है जिन जो जो जिन जिन भगवान का विवरण है जिन अवतार का विवरण है वो मैं ही हूं तो जैसे ही ठाकुर ऐसा कहेंगे तो वैसे ही यह हलधार बड़ा गुस्सा होकर के कहेगा अरे जाओ जाओ यहां से गंड मूर्ख गंड मूर्ख अर्थात की महा पागल महामूर्ख तुम जाओ यहां से क्या फालतू की बात कर रहे हो तो यह हलधार का ऐसा बीच-बीच में होता था कभी-कभी आध्यात्मिकता का दौरा पड़ जाता था तो ठाकुर को अवतार करके पुकारने लगता था कभी-कभी कहेगा कि तुम्हारा तुम्हारी शादी होगी नहीं या तो फिर तुम्हारे बच्चे होंगे तो बच्चों की शादी कैसे होगी ऐसा सब कुछ बोलता रहता था तब ठाकुर कहता है कि ठाकुर कहेंगे कि अरे तुम्हार भागवत पढ मुखे आगुण अर्थात कि यह जो तुम भागवत वगैरह जो पढ़ रहे हो वह सब मिथ्या है क्यों तुमने ऐसा कैसे सोच लिया कि मेरे ब बच्चे होंगे फिर व बच्चों की शादी होगी वगैरह वगैरह यह कहां की बात तुम कर रहे हो ठाकुर तो है त्यागी शवर स्वयं एक बार की बात है ठाकुर पेड़ के ऊपर में उठ गए थे हनुमान भाव की साधना करते थे ना कभी-कभी तो एक पूंछ लगा कर के घूमते थे और एक बार एक पेड़ के ऊपर में उठ गए और पेड़ के ऊपर में उठकर के एक डाली पर बैठ कर के दिगंबर होकर के पेशाब कर रहा है अभी ये दृश्य भी जद हम देखेंगे तो हमको ल को भी लगेगा कि ये क्या कर रहे है ठाकुर आदर वो सही सही में पागल हो गए हैं या तो फिर वो पता नहीं क्या हो रहा है उनके साथ में तो ये हलधार ने देख लिया तो क्या कहा कि तुम्हारे सर के ऊपर में ब्रह्म राक्षस सवार हो गया है तो देखिए कि यह कितनी ही ऐसी कहानियां है एक बार एक साधु वहां पर आया था तो साधु को देखने के लिए जाना है बोलकर के कृष्ण किशोर बोलकर एक साधक वहां दक्षिणेश्वर में आता था उन्होंने ठाकुर को कहा तो ठाकुर ने बात-बात में कहा कि ये हलदी है ना हलदी कहता है कि वो माटी खांचा के देखते की केनो जाव अर्थात कि ये मिट्टी का जो पिंजरा है अब यह देह क्या है पंचमहाभूत का बना हुआ है मिट्टी का बना हुआ है मिट्टी में मिल जाएगा और यह हलधार य वेदांत वगैरह पड़ता था तो उसको ऐसा लगता था कि यह मिट्टी का देह है मिट्टी में मिल जाएगा तो मिट्टी के बने साधु को देखने के लिए क्या जाना तो कृष्ण किशोर इतना नाराज हो गया कि वो वो कहता है कि अच्छा हलधार ऐसी बात करता है उसके बाद में जब भी वह दक्षिणेश्वर आएगा वह हलधार के सामने भी नहीं देखेगा फूल चुनने के लिए आएगा यदि हलदी वहां पर जा रहा है आ रहा है तो उसकी ओर पीठ घुमा करके जैसे कि उसका चेहरा ना देखना पड़े वह फूल चुनने की शुरुआत करेगा तो ये ऐसी कितनी ही छोटी-छोटी घटनाएं लीला प्रसंग में वर्णित है तो यह घटनाएं पढ़कर के हमको जितना आनंद आता है हमको यदि सुबह को शाम को बैठ कर के ध्यान करना है और यदि हम इस तरह की कोई घटना के बारे में सोचे कि ठाकुर वहां पर बैठे हैं वह हलदी है वहां पर वह अपना कुछ पागलपन कर रहा है या तो फिर हम ठाकुर के साथ में उसी गार्डन में घूम रहे हैं घूमते घूमते हलदी के सामने चले गए और वह भागवत पढ़ रहा है ठाकुर कह रहे हैं कि उसमें जिसके बारे में वर्णन है वह तो यहीं पर तुम्हारे सामने ही खड़ा है तो यह सब घटनाओं में हम अपने को स्थापित कर सकते हैं हम इमेजिन कर सकते हैं कि हम भी वहां पर उपस्थित है यह जो बाद बाद में यह जो सन्यासी शिष्य त्यागी संतान ठाकुर के जब आने की शुरुआत हुई उस समय तो ऐसा था कि ठाकुर के साथ में कुछ भी हो रहा है कोई ना कोई विटनेस था कोई ना कोई विटनेस थे किंतु यह उन दिनों की घटनाएं हैं जबकि ठाकुर साधन भजन कर रहे थे उस समय यह हृदय कभी-कभी ठाकुर के साथ में रह जाता था वह भी बहुत सब समय नहीं जैसे कि हमको पता है कि शोड़ी पूजा की जो व रात थी जिस रात को ठाकुर ने मां की पूजा की थी उस रात को हृदय को काली मंदिर में मां काली की पूजा करनी थी तो वह पूजा का सब साम पहले की कुछ यह सब जुगाड़ करके कुछ उसकी तैयारी करके साधन सामग्री जुटा करके फिर वह चला गया था मंदिर में फिर उस कमरे में जो हुआ उसके विटनेस सिर्फ दो ही है एक है ठाकुर दूसरी है मां और ज्यादातर आज जो विवरण है अपने पास में शशी पूजा का वह सब मां के पास में से ही हमको मिलता है तो इस तरह की घटनाएं जो कि या तो जिसको कहेंगे कि बाहर के लोगों की दृष्टि से ओझल होकर के सीक्रेट ऐसी कितनी ही घटनाओं वहां पर घटी या तो फिर जहां पर मास्टर महाशय है ना कि सभी लोग कोई नाना कोई वहां पर विटनेस है ऐसी कोई कोई घटनाए जैसे कि हृदय को तो इन लोगों ने देखा नहीं था हृदय किस तरह से ठाकुर की सेवा करता था और कभी-कभी ठाकुर को परेशान भी करता था यह डायरेक्ट डिसाइल्स के आने के पहले पहले ही हृदय वहां से चला गया था या तो फिर कहेंगे कि हृदय को काली मंदिर से भगा दिया गया था किंतु एक बार हृदय काली मंदिर में आता है ठाकुर के पास में कुछ ना कुछ मांगने के लिए जैसी उसकी य थी टेंडेंसी तो मास्टर महाशय वहां पर थे तो मास्टर महाशय भी ठाकुर के साथ में वह जो काली मंदिर का जो गेट है फाटक है वहां तक जाते हैं क्यों हृदय भीतर में नहीं आ सकता उसको काली मंदिर में आने से व मना कर दिया गया है तो वहां पर फाटक के पास में जाते हैं ठाकुर उसके साथ में बात करते हैं पूछते हैं इस समय इस बार े देश में धान वगैरह कैसा हुआ है खेत में तो हृदय उत्तर देता है कि हां बहुत बुरा नहीं है एक तरह से चल जाएगा इस तरह से खेती वगैरह के बारे में बात करते हैं फिर हृदय कहता है कि मैं बड़े कष्ट में हूं ठाकुर कहता है कि क्यों किस तरह के कष्ट में हो तो हृदय कहता है कि आपका संग त्याग करना पड़ा इसके लिए तो ठाकुर पूछते हैं कि तुम तो कहते थे ना कि तुम अपने भाव में रहो मैं अपने भाव में रहता हूं अर्थात कि हृदय बाद बाद में उसका घमंड इतना बढ़ गया था कि कभी-कभी वह ठाकुर की भी मजाक करता था कहता था कि देखो मैं इतना मजे से खाता हूं पीता हूं सब हजम कर सकता हूं तुम कुछ भी खाओगे ठाकुर को कहता है हृदय तो तुम उसको पेट में रख ही नहीं पाओगे यानी ठाकुर को तो बहुत सारे डाइजेशन का तो प्रॉब्लम हमेशा से था ठाकुर को तो फिर इस तरह से कुछ ना कुछ मजाक किया करता था ठाकुर की कटु वचन भी आखिर आखिर में बहुत कहे है उसने और फिर आखिर में तो मां का अपमान जो किया उसकी वजह से उसको काली मंदिर त्याग करना पड़ा था तो यहां पर देखिए कि ठाकुर कहते हैं कि तुम तो कहते थे ना कि तुम अपने भाव में रहो और मैं अपने भाव में रहता हूं तुम यह साधन भजन लेकर रहो मैं अच्छे से खाता पीता हूं तगड़ा होता हूं रुष्ट पुष्ट होता हूं तो हृदय की आंखों में आंसू आ गए कहता है कि उस समय क्या मुझे यह सब पता था कि आपका सही स्वरूप क्या है तो अभी यह बात जब ठाकुर सुनते हैं तो ठाकुर की आंखों में भी आंसू आ गए मास्टर महाशय यह बात नोट करते हैं और फिर वह लिखते भी है कि ठाकुर का यह जो उदार हृदय है विशाल हृदय है कैसा है ठाकुर ने खुद ने कई बार कहा है कि हृदय आखिर आखिरी में इतना अत्याचार करता था उनके ऊपर कि ठाकुर को गंगा में डूब लगा कर के आत्महत्या करने को जाने का समय आ गया था जाने की बारी आ गई थी इतना हृदय ने उनको सताया है किंतु इसके बावजूद यहां पर देखिए कि ठाकुर की आंखों में हृदय के लिए आंसू है फिर वह अपने कमरे की ओर वापस आते हैं और फिर वहां पर ठाकुर कहते हैं कि अभी मैं किसको किसको बोलने को जाऊंगा कि इसके लिए कुछ कर दो हृदय के लिए कौन बाबू के बोले बेड़ा किसको मैं यह सब बोलने के लिए जाऊंगा फिर वो कमरे में आकर बैठे भक्त लोग है सब वहां पर किसी ने पूछा महाशय आप कैसे हैं तो ठाकुर ने कहा बहुत अच्छा नहीं हूं किंतु ठाकुर ने यह नहीं कहा कि उनका हृदय दुखित क्यों है हृदय के बारे में उन्होंने एक भी बात नहीं कही तो देखिए कि यह थे अपने ठाकुर और यह थी ठाकुर की लीला अभी आप सोच सकते हैं कि मास्टर महाशय ने इस घटना का उल्लेख क्यों किया कथामृत में जिस तरह से एक के बाद एक फिलोसॉफिकल डिस्कशन चलते हैं उस दिन हमने देखा था कि हमने देखा कि वो ठाकुर एक बार भाव में चले गए हैं गहन गभीर भाव में फिर भाव का थोड़ा सा उपशम होता है तब ठाकुर कहते हैं कि अच्छा आपके मन में जो प्रश्न है वह करो तो जो सामने वह जो कुछ भक्त बैठे थे वह कितने फॉर्चूनेटली है सोच लीजिए जन्म जन्मांतर के जितने भी प्रश्न है उस उनका उत्तर देने वाले येय श्री परमेश्वर स्वयं उनको पूछ रहे हैं कि तुम्हारे जो प्रश्न है मैं उत्तर दूंगा तो क्या प्रश्न करते हैं का काली क्यों है तो ठाकुर कहते हैं दूर बोले माने मां काली का वर्ण मां काली के देह का रंग काला क्यों है तो व दूर है इसके लिए मां काली काली दिखती है यदि पास में जाएंगे तो देखेंगे कोई भी रंग नहीं है जैसे कि ठाकुर उदाहरण देते हैं समुंदर को दूर से देखेंगे तो नील वर्ण दिखेगा पास में जाकर के समुंदर का पानी अपने हाथ में लेक के देखेंगे कि उसका कोई भी रंग नहीं है पानी पूरा ट्रांसपेरेंट है आकाश को दूर से देखो नील वर्ण दिखता है किंतु अपने आसपास जो आकाश फैला हुआ है उसका अपना तो कोई कलर ही नहीं है अर्थात कि मां काली का यह जो सगुण गुण जो है वह इसीलिए है कि मां काली को हम दूर से पहचानते हैं जब भी मां काली के पास में जाएंगे मां काली का साक्षात्कार करेंगे तब पता चलेगा कि मां काली तो निर्गुण है कोई गुण ही नहीं है और इसीलिए हमने एक बार यह डिस्कस किया था कि जब पहली बार ठाकुर को समाधि हुई पहली बार ठाकुर को यह चैतन्य का यह जो चैतन्य की अनुभूति हुई अ निर्विकल्प समाधि की उस समय क्या हुआ था कि वह जब भी आंख बंद करके निर्विकल्प समाधि में प्रवेश करने का प्रयास करेंगे उतनी ही बार मां काली उनकी दृष्टि के सामने आ जाती थी फिर उन्होंने परेशान होकर करके कहा तोतापुरी को कि यह नहीं हो रहा है जब भी मैं आंख बंद करके अपने मन को संपूर्ण विचार रहित करने का प्रयास करता हूं तो मां काली मेरी दृष्टि के सामने आ जाती है तो इमीडिएट तोतापुरी ने नाराज होकर के कहा अरे क्यों नहीं होगा बोलकर के उन्होंने काच का जो एक टुकड़ा पड़ा था ठाकुर की ये जो भ्रू मध्य है दोनों कपाल के दोनों आंखों के बीच में यहां पे वो कांच का वो टुकड़ा जोर से उन्होंने प्रेस किया अभी दर्द तो होगा ही फिर तोतापुरी कहते हैं उसके ऊपर में ध्यान करो तो उसके ऊपर में ध्यान करते-करते जब मां काली की मूर्ति उनकी नजर के सामने आई तो ज्ञान रूपी असी से ज्ञान रूपी खड़ग से ठाकुर ने उस मूर्ति के दो टुकड़े कर दिए अभी यह प्रश्न होता है यहां पे कि ये मूर्ति या तो महाकाली के दो टुकड़े कर दिए अर्थात कि क्या ये जो अद्वैत वेदांत है एक तरह से क्रूर है क्या कि मां और संतान का जो इतना करीबी जो संबंध है यह जो भाव साधना में हम ईश्वर के साथ में एक रिलेशन एस्टेब्लिश करते हैं क्या वह रिलेशन इससे तोड़ देना है क्या यदि हमको अद्वैत साधना में प्रवेश करना है तो क्या यह अद्वैत वेदांत एक कठोर हृदय लोगों के लिए है जैसे कि तोतापुरी थे तोतापुरी स्वयं किसी भी भाव या किसी भी तरह की सेंटीमेंटालिटी के ऊपर में वो बड़ा कटाक्ष किया करते थे ठाकुर जब ताली ब बजा बजाते हरि नाम मां का नाम करते तो वह कटाक्ष करके कहते तोतापुरी जी कि क्या रोटी ठोक रहे हो क्या यह जो नॉर्थ इंडिया में जो स्त्रियां है जो सब इस तरह से ऐसा ऐसा वह रोटी बनाएगी वोह जो बेलन से जो बेलनी होती है रोटी वो उसकी वजय मोटी मोटी जो रोटी होती है ऐसा ऐसा करके वह करके वह बनाएगी तो ये मेरा एक अनुभव मैं एक बार उज्जैन जा रहा था जा रहा था एक्चुअली में ओमकारेश्वर तो तो ओमकारेश्वर में जाते-जाते उज्जैन और इंदौर दोनों आते हैं तो मैंने सोचा था कि मैं उज्जैन में महाकाल का दर्शन करूंगा वहां पर रुक जाऊंगा फिर वो गाड़ी नेक्स्ट ट्रेन में मैं इंदौर आऊंगा इंदौर एक दो दिन रुकूंगा फिर वो मैं ओमकारेश्वर चला जाऊंगा तो अभी हुआ ऐसा कि उज्जैन में गाड़ी को रुकना था रात को 2 बजे या 3:00 बजे के आसपास में दो के आसपास में तो मैंने एलाराम रखा था व सो गया था ट्रेन में एलाराम जैसा रखा था कि अभी जब भी एलाराम बजेगा मैं उठ जाऊंगा अनफॉर्चूनेटली ऐसा हुआ कि उज्जैन स्टेशन आया और चला गया और उसके बाद के स्टेशन प मेरी नींद खुली अभी एकदम मैं तो डर के मारे कि अरे क्या होगा क्या मतलब स्टेशन तो मिस हो गया बिना सोचे समझे मैं जो सेकंड स्टेशन था उसके ऊपर में उतर गया यह सोच के कि मैं रिटर्न ट्रेन या वहां से रिक्शा वगैरह कुछ ले लूंगा नेक्स्ट ही स्टेशन तो है तो पास में ही होगा उज्जैन अभी वहां पे उतर के पता चला कि वहां पे कुछ नहीं है माने कंप्लीट वीरान है वो चारों ओर खेत है खेत के बीच में एक छोटा सा स्टेशन जैसा है स्टेशन भी नहीं बोलेंगे 1012 फुट का वो प्लेटफार्म है बस इतना ही है उसके ऊपर में एक छत जैसा है और कुछ नहीं है आसपास में ना ही कोई व्यक्ति है ना ही कोई ट्रेन आती जाती है कुछ भी मैं तो एकदम डर गया हम लोग तो शहर में रहने वाले लोग हैं आधी रात को इस तरह से एकदम वैरान जगह पर उतरना हुआ जहां पर कोई भी नहीं है तो कैसा अनुभव होगा तो अभी मैं बैठा रहा वहां पर बेंच के ऊपर मैं सोचता हूं कोई आए तो पूछूं क्या कुछ कौन सी जगह है जगह का नाम तो लिखा था किंतु अभी वह समझ में ही नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं अभी तो थोड़ी अभी सुबह हुई आई थिंक तीन चार घंटा में वहां पर वेट किया सुबह हुई फिर एक स्टेशन मास्टर वहां पर आया सुबह-सुबह मैंने कहा कि अरे भैया अभी मुझे उज्जैन जाना है ट्रेन कहां पर मिलेगी गा रिक्शा बस वह बोलता है कि यहां पर कुछ भी नहीं है आप कैसे यहां पर उतर गए यह जो ट्रेन आएगी जाएगी वह भी ज्यादातर रुकती नहीं यहां पे वो आपकी ट्रेन कैसे रुकी समझ में नहीं आ रहा तो अभी मैं तो बड़ा ही परेशान क्या करें वहां पर कुछ भी नहीं मतलब कुछ भी नहीं भूख भी लगी है तो खाने को भी कुछ नहीं नहीं मेरे पास था नहीं वहां पर कुछ मैंने कहा कि गांव कितना दूर है वो बोला कि आपको गांव को जाने के लिए बहुत लंबा चलना पड़ेगा और वहां पर होटल पोटल कुछ नहीं है कि आपको वहां पर खाना मिलेगा तो मैंने कहा अच्छा ठीक है चलो तपस्या कर लेते हैं उसके बाद में आई थिंक 910 के आसपास में एक ट्रेन रुकी वहां पे वो उज्जैन जा रही थी उसमें मैं बैठ गया और फिर उज्जैन गया अभी देखिए कि भूख लगी थी और परेशान भी काफी था और वह दर्शन वगैरह भी करना है वहां पर तो भीड़भाड़ कैसी होती है पता है मैंने सोचा था कि यदि दो-तीन बजे में उज्जैन में उतर जाऊंगा तो दर्शन बड़ा अच्छे से होगा अर्ली मॉर्निंग जैसे ही दरवाजा खुलता है पहला मैं चला जाऊंगा तो ऐसा सब सोच के रखा था अभी 10 बजे कहां इतनी भीड़ आपको जाना संभव ही नहीं है तो भूख भी लगी है तो वहां पे किंतु देखा मंदिर के सामने व जो रास्ते पे वो जो छोटी-छोटी दुकान रहती है ना दुकान भी नहीं बस वो एक शेड जैसा था फुट का फुट पार्ट के ऊपर में ही एक औरत बैठ कर के उसके सामने एक बड़ा सा चूल्हा था उसके ऊपर में बड़ा सा तवा था और उसके ऊपर में वो एकदम गरमागरम वो रोटी सेक करके वो रोटी यानी वो सादी रोटी नहीं वो परोठा बोलते हैं ना परोठा उसके जैसा बना करके वह सबको खिला रही थी और एक आदमी था वहां पास में वह परोठा जब यह औरत बनाएगी तो उसको एक थाली में रखेगा थाली में दही का एक कटोरी रखेगा और साथ में एक और एक आदमी चाय बना रहा था तो मैंने कहा भैया दो कुछ खाने को मु तो बड़ा भूख लगा है तो उस समय मैं मैं उस देखिए कि उस दुकान में मैं अकेला बैठा था वो फुटपाथ के ऊपर में तो एक चेयर पे बैठ गया और वो उस आदमी ने कहा अरे मैं तो ये साधु के कपड़े पहने हैं उस समय में ब्रह्मचारी था सफेद कपड़े पहने थे तो बोला कि बाबा जी आप इस शेड के भीतर में आ जाइए बाहर में मत बैठिए तो शेड़ के भीतर में मुझे बैठने को दिया इतना ब थाली में इतना मोटा रोटी वह पराठा सेका एक दही का कटोरी और गरम-गरम चाय का एक गिलास वो जो मैंने खाया है वो इतनी तृप्ति हुई है मुझे लगा कि अरे वाह इसको बोलते हैं खाना वो बढ़िया मजे से मैं तीन मोटे-मोटे पराठे खा लिया था तो वो जो प पराठे बना रही थी वह जो औरत वहीं पर सामने बैठक ऐसे ही बना रही थी वह जो आटे को जो बेलना होता है वो बेलन से नहीं वो ऐसा ऐसा करके आटे को ठोक करके उसको वो वो पराठा बनाती थी तो यह जो देखिए तोतापुरी के भीतर में थोड़ा सा भी सेंटीमेंट नहीं था किंतु यहां पर हमको जब प्रश्न होगा कि मां काली को खड़ग या तो फिर अस से काट देना यानी कि यह द्वैत रूपी वेदांत और अद्वैत दांत इन दोनों में क्या एक ऐसी खाई है एक ऐसी एक गैप है जो कि आप कभी भी फुलफिल नहीं कर सकते किंतु यहां पर देखिए कि जब ठाकुर यह कहते हैं कि मां काली काली इसलिए है क्योंकि वह दूर से हम उनको देखते हैं जैसे ही पास में जाएंगे वैसे ही पता चलेगा कि कोई भी रंग नहीं है मां काली का अर्थात कि मां काली निर्गुण है तो यह सगुण और निर्गुण में कोई ऐसा बहुत बड़ा अंतर नहीं है जो कि आपको अपना धर्म त्याग करके ऐसा कभी-कभी होता है ना द्वैत वाले जो होते हैं उनको अद्वैत से बड़ा डर लगता है ठाकुर की ही एक बात है कि ठाकुर को एक बार दर्शन हुआ देखा कि एक और है जितने भी ठाकुर के भक्त है सब वहां पर बैठे हुए हैं और दूसरी ओर है कि जहां पर लाल रंग का प्रकाश आ रहा है और वहां पर नरेण बिल्कुल ध्यान मग्न होकर के अद्वैत वेदा में बैठा हुआ है और फिर यह केदार वगैरह वहां पर जाकर के एक बार नजर डाल के आए किंतु बड़े डर गए अद्वैत वेदांत या तो फिर यह निराकार साधना तो कमजोर हृदय लोगों के लिए नहीं है तो इमीडिएट व डर करके वहां पर चला गया जहां पे सब यह भक्त हृदय भक्त सब बैठे हुए थे यह भक्ति वाले सब भक्त बैठे हुए थे तो देखिए कि ठाकुर भी कहते हैं कभी-कभी द्वैत और अद्वैत में ऐसा लगता है अभी राजा महाराज का की उदाहरण कि राजा महाराज ने यहां पे अ ब्राह्मण समाज में फॉर्म फिल अप किया था कहेंगे कि निराकार साधना करनी है ब्राह्मण समाज वाले निराकार साधना में विश्वास करते हैं हालांकि ब्राह्मण समाज का निराकार और अपना अद्वैत वेदांत इन दोनों में आसमान जमीन का अंतर है किंतु फिर भी जब एक बार इस तरह के फॉर्म के ऊपर में हस्ताक्षर कर दिए फिर यही राजा महाराज काली मंदिर में जाते हैं तो यह देख करर के नरेंद्र ने नाराज होकर के राजा महाराज को कहा कि क्यों तुमने तो वो निराकार वाले फॉर्म पर साइन किया ब्राह्मण समाज वाले अभी तुम क्यों काली मंदिर में जा रहे हो अभी नर से थोड़ा राजा महाराज डरते थे तो वो फिर उन्होंने ठाकुर को बता दिया होगा तो ठाकुर ने फिर नरेद को कहा कि देखो अभी जब भी उसके मन में श्रद्धा भक्ति का उदय हुआ है तुम उसको टोकना मत कि क्यों वह काली मंदिर में जाता है यह सब साइन वगैरह करवा के फॉर्म भर के थोड़ी ना आध्यात्मिक लाइफ का गठन होता है तब उसके बाद में स्वामी जी ने उनको कुछ कहा नहीं तो किंतु देखिए कि बहुत सारे लोग ऐसा सोचते हैं कि यदि साकार में से निराकार में जाएंगे या तो फिर निराकार में से साकार में जाएंगे तो आपको पूरा धर्म ही जैसे कि परिवर्तित हो गया आपकी जो फंडामेंटल बिलीव्स है उसी में जैसे कि एक तरह का परिवर्तन आ गया किंतु नहीं ऐसा नहीं है बात ऐसी है कि जितना जितना ईश्वर के समीप से समीप तम जाते जाएंगे जितना निकट से निकट तर जाते जाएंगे वैसे-वैसे ही ईश्वर के जो गुण है वह गुण अदृश्य होकर के निर्गुण आत्मन या तो फिर निर्गुण ब्रह्मण का ही हमको अनुभूति होने लगेगा जितना ईश्वर बाहर है उतना बाहर दिखेंगे जैसे पास में आए तो पता चला ईश्वर अपने हृदय में ही है और वह जो उपनिषद की कहानी हमने कही थी एक बार काफी बार एक्चुअली कि पंखी दो पंखी है एक पेड़ के ऊपर में बैठा है सर्वोच्च डाल के ऊपर में एक पंखी बैठा है जमीन के ऊपर में जमीन पे जो पंखी बैठा है बड़ा ही निस्तेज है जो सर्वोच्च डाल के ऊपर में जो पंखी बैठा है बड़ा ही तंदुरुस्त उसकी जो पंख वगैरह है फदर्स वगैरह सुवर्ण रंग के उसके यह जो यह पंख वगैरह है बड़ा ही सुंदर देखने में है तो नीचे वाला पंखी उसको मिलने के लिए जैसे ही एक के बाद एक डाल के ऊपर में जंप लगा कर के उस उसके नजदीक जाता है उतना ही देखता है कि वो ऊपर वाले पंखी के जितने भी गुण है उसके भीतर में छलक रहे हैं उसके भीतर में प्रकट हो र है और फिर वह जब सर्वोच्च डाल पर पहुंच जाएगा तब पता चलेगा कि वो पंखी अदृश्य हो गया है और वही था ऐसा नहीं था कि दो पंखी थे एक ही था किंतु ये डिफरेंस इसलिए लग रहा है कि दोनों के बीच में बहुत बड़ी दूरी है जब आप उसको पा लेंगे आप अभी आपको लगेगा कि मैं भक्त हूं वो भगवान है किंतु जब आप उनको पा लेंगे तब कौन भक्त कौन भगवान जैसे कि यह है वो उपनिषद की एक कहानी है कि अष्टावक्र मुनि इनके पास में गए सुखदेव राजा जनक के पास में गए अद्वैत वेदांत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए राजा जनक ने क्या कहा पहले गुरु दक्षिणा दो बाद में सब बात तो उनको पूछा गया कि क्यों तो शिक्षा देने के बाद में दक्षिणा दी जाती है तो जनक ने उत्तर दिया कि अब अद्वैत वेदांत सीख लोगे तो फिर कौन शिष्य कौन गुरु यह सब भेद मिट जाएंगे तो पहले ही दक्षिणा दे दो बाद में मैं ठग जाऊंगा फिर आप दक्षिणा नहीं देंगे तो बाना करके तो यह जो डिस्टेंस है दूरी है वह सिर्फ इसलिए है कि इन दोनों के बीच में यह व्यवधान है अज्ञानता का इग्नोर का या तो फिर अविद्या का जैसे ही अविद्या चली जाएगी हम तुम ईश्वर भक्त एकाकार हो जाएंगे तो यह सब फिलोसोफी भी अपने कथामृत में है लीला प्रसंग में है और इस तरह की यह हृदय को मिलने के लिए गए छोटी सी घटना है हृदय की आंखों में आंसू यहां ठाकुर की आंखों में आंसू तो हमको कभी-कभी प्रश्न हो सकता है कि दो तरह की घटनाओं का समावेश कथामृत में क्यों किया गया है बहुत सारे धर्म ग्रंथ पढ़ेंगे तो सब इंपॉर्टेंट घटनाएं ही आपको पढ़ने को मिलेगी दिन प्रतिदिन की घटना पढ़ कर के ऐसा लगेगा कि अरे यह लोग तो अवतार जैसे कहां है हमारे ही जैसे हमारी ही तरह बिहेव करते हैं तो फिर यह जो प्रयोजन क्या है छोटी-छोटी घटनाओं को लिपिबद्ध करने का वह यही है कि अपने चित्त को निर्मल करें जिससे कि जब ध्यान करने में हमको सुविधा हो तो अच्छा इतना थोड़ा सा पूर्व भूमिका अभी वह फिर से हम पढ़ते हैं मां शारदा देवी का बिंदु वासिनी यह चैप्टर हम पढ़ रहे थे कल हमने देखा कि ठाकुर मां का किस तरह से ध्यान रखते हैं मां के प्रति कितनी सतर्कता उनकी है मां को कुछ भी हो जाता है तो वह खुद कैसे परेशान हो जाते थे तो अभी इसी सिलसिले में और एक घटना गंभीरानंद जी महाराज वर्णन कर रहे हैं लिखते हैं ठाकुरे अंतर्धान पर श्री मायर भरण पोषण चिंताओं ठाकुरर मने उठी तो ठाकुर को लगता था कि जब मैं महासमाधि प्राप्त करूंगा मैं जब पृथ्वी पर नहीं रहूंगा तो मां का भरण पोषण कैसे चलेगा तो यह चिंता भी उनको सताती रहती थी तीनी अतो त्यागी ईलो एक दिन श्री मां के जिज्ञासा कोरी लेन ठाकुर खुद इतने त्यागी है फिर भी उन्होंने एक दिन मां को प्रश्न किया तुम्हार कोटा का होले हाथ को रच चले तुम्हारे पास में कितना रुपया रहने से तुम्हारा दिन प्रतिदिन का खर्च निकल जाएगा मां बोली ले य पाच छो टाका होले चोले मां ने कहा यह पाछ रुप होने से ही हो जाएगा अभी उस समय के 00 यानी कि मुझे लगता है आज के पाछ हजार होंगे एटलीस्ट क्योंकि उस समय जो पैसों में जितने कम पैसों में ज्यादा चीजें हम खरीद सकते थे तो इस तरह से मां ने उत्तर दिया तार पर ठाकुर प्रश्नों को लेन इसके बाद में ठाकुर ने और एक प्रश्न किया बिकेले को खाना रोटी खाओ रात को कितनी रोटी खाते हो मां लज्जा माटी ते मिश गलन खबार कोथा की कोरिया बोलेन मां लज्जा के मारे जैसे कि मिट्टी में मिल गई खाने की बात ठाकुर के सामने कैसे करेंगे ए दि के ठाकुरे रो प्रश्ने बरती नाई यहां पर ठाकुर के प्रश्नों का भी अंत नहीं है उनका विराम नहीं है तो फिर ठाकुर जैसे प्रश्न करते गए ना ना बताना ही होगा बताओ कितनी रोटी खाती हो रात को तो फिर आखिर में मां ने कहा तखन तीनी बोली लेन य पांच खाना खाई यह पाच छो रोटी खाती हो ठाकुर खोरो चर परिमाण हिसाब कोरिया बोली लैंड तो फिर यह कितनी रोटी खाती है इसके हिसाब से वह महीने में कितना रुपया लगेगा मां को इसका वह हिसाब करके बोले ता होले 500 टाका तोमार खूब चले जावे अर्थात कि 00 रुपए में तुम्हारा काम महीने का चल जाएगा परे वही परिमाण टाका तीनी बलराम बाबू निकट गच्छ तो राखे बाद में ठाकुर ने इसी तरह से कुछ रुपयों का कुछ फंड का जुगाड़ करके बलराम बाबू के पास में जमा रख दिया बलराम बाबू ओई टाका जमीदारी ते खाटा इया छई मास अंतर टा का शूद श्री मां के पाठया दते बलराम बाबू ने ठाकुर ने जो रुपए दिए थे उसको अपनी जमींदारी है वहां पर इन्वेस्ट किए और फिर छछ महीने के अंतर पर रप करके मां को वो भेजते थे देखिए कि यह छोटी सी बात है कि ठाकुर मां का इस तरह से ख्याल रखते थे वरना त्यागी त्याग शवर ईश्वर स्वयं किस तरह से पैसों के बारे में सोचेंगे टाका माटी माटी टाका बोलकर के उन्होंने पैसा मां गंगा में फेंक दिया था जबकि माका ऐसा था कि मां को जब कोई भी रुपया देगा प्रणामी वगैरह देगा तो मां उसको अपने कपाल पर स्पर्श करके अर्थात कि लक्ष्मी की तो रिस्पेक्ट करनी होती है लक्ष्मी की इस तरह से रिस्पेक्ट करके वो एक अपने पास में बॉक्स था उस में रखती थी हालांकि ठाकुर भी बड़े प्रैक्टिकल थे एक बार पैसा मि टाका माटी करके फेंक दिया फिर उन्होंने उनको डर लग गया कि मां लक्ष्मी जद खैट बंद करे दे अर्थात कि मां लक्ष्मी उनको यह जो वो पैसा जो मिलता है उनका जो भरण पोषण तो चलता है ठाकुर का भी तो वह सब यदि बंद कर देगी तो तो फिर उन्होंने कहा मां लक्ष्मी को तुम अमर हृदय थ को थाको तुम मेरे हृदय में रहना यानी ये ठाकुर और मां इतने त्यागी थे किंतु इतने प्रैक्टिकल भी थे कि वो देखिए कि जीवन निर्वाह तो करना ही करना है आप जद आपके पास में कुछ नहीं रहेंगे जैसे कि एक घटना कि कुछ साधु बेलूरमठ से मां के पास में गए जयराम बाटी में कहा कि हम लोग भिक्षा करके जाएंगे वहां काशी वृंदावन वगैरह और फिर भिक्षा करके रहेंगे तपस्या करेंगे तब मां ने क्या कहा था ठाकुर के लिए मछली का माथा और यह पायस का बाटी तो यह मथुर बाबू जुगाड़ करते थे तुम लोगों के लिए यह सब जुगाड़ कौन करने वाला है तुम लोग जाओ मठ में रहो मठ में ही भिक्षा लेना प्राप्त करना और मठ का कार्य करना और शांति से बैठ कर के साधन भजन करना तो यह जो प्रैक्टिलिटी थी यह इन दोनों में थी भाभिया अबाक होते ई ज आत्म भावे विभोर ठाकुरे दृष्टि कतो दिके ना प्रसार तो थाकी तो यह सोच कर के हमको आश्चर्य चकित होना होगा कि ठाकुर भले ही चाहे आत्म भाव में विभोर रहते थे किंतु फिर भी उनकी दृष्टि कितनी र रहती थी चारों ओर रहती थी आबार सर्वदा आज्ञा पालने तत्पर भक्त वंदे परिवृत्त था किया और फिर हमेशा आज्ञा पालन के लिए तत्पर भक्त वृंद उनको घेर कर के रहते थे उनसे परिवृत्त रहते थे फिर भी एवं स्वयं ईश्वर रूपी पूजित होया व और स्वयं व खुद ईश्वर के रूप में पूजित हो रहे हैं इसके बावजूद तीनी अपरे व्यक्तिगत सम्मान और स्वाधीनता और मर्यादा की रूपे अख राख तेन और इसके बावजूद दूसरों की स्वाधीनता और सम्मान किस तरह से वह बजाए रखते थे देखिए बहुत बार होता है कि आपको थोड़ी सी भी प्रसिद्ध मिल गई आपको थोड़ा सा भी एक सन्मान मिल गया तो लोगों को आप अपमानित करना शुरू कर देते हैं मैं उस समय राची में काम कर रहा था राची में अपना कृषि विज्ञान केंद्र है और वहां पर में था तो एक हम लोगों को बार-बार क्या है ये गवर्नमेंट के साथ में डीएल करना होता था तो एक बार क्या हुआ कि वोह जहां पर वोह गवर्नमेंट ऑफिस है वहां पर मैं जा रहा हूं अभी वह कोई वहां पर एक लोकल मिनिस्टर रांची तो वहां का कैपिटल था झारखंड का है मतलब अभी भी तो एक मिनिस्टर रास्ते से जा रहा है अभी उसने क्या सोचा मिनिस्टर को कुछ चाहिए था रास्ते से तो उसने क्या किया पता है विश्वास नहीं होगा मैंने अपनी नजरों से देखा इसलिए मैं बता रहा हूं वही रास्ते में उसने गाड़ी रोक दी यह मतलब एकदम बड़ा रास्ता है हाईवे जैसा रास्ता है जो कि व गवर्नमेंट क्वार्टर्स की ओर जाता है कितना ट्रैफिक होगा कितना सब इंपॉर्टेंट लोग काम करते हैं उस रास्ते पे आते-जाते वही रास्ते पे गाड़ी रोक दी उसके सिक्योरिटी वाले गाड़ी के आसपास खड़े हो गए पूरा ट्रैफिक रोक दिया दोनों ओर का और यह जो था भीतर में गाड़ी में बैठा हुआ मिनिस्टर वह आराम से पास में किसी दुकान में गया और वह कुछ खरीदी कर रहा है हमारी गाड़ी पीछे में ही थी अभी हमको तो रुकना ही पड़ेगा क्या करेंगे मिनिस्टर की गाड़ी रास्ता रोक के खड़ी है चारों ओर सिक्योरिटी वाले हैं वो फिर मिनिस्टर 1015 मिनट के बाद में आकर गाड़ी में बैठा फिर वह गाड़ी वहां से निकली नजरों से देखा है क्या उसमें इतनी भी अकल नहीं गाड़ी थोड़ी साइड प ले ले और पार्क करे फिर वहां पर जाए रास्ते के बीच में गाड़ी रोक दी ये देखिए कि जब यह सत्ता आती है अपने हाथ में तो यह सत्ता कैसे अपने दिमाग के ऊपर में सवार हो जाती है किंतु यहां पर देखिए ठाकुर ईश्वर के अवतार स्वय हमेशा भक्त वृंद से परिवृत्त रहते थे और यह ऐसे भक्त जो कि उनकी आज्ञा पालन के लिए हमेशा तत्पर रहते थे किंतु फिर भी यह घमंड ठाकुर के सर पर कभी नहीं चला कभी नहीं उठा और वह उनके आसपास जो लोग रहते थे उनकी स्वाधीनता और उनका सम्मान किस तरह से बनाए रखते थे किस तरह से अकब रखते थे श्री मायर प्रति तहर सौजन्य दृष्टा तो आमरा श्री मायर कथा ती पाई मां के प्रति ठाकुर के सन्मान की बात हमको मां के पास में ही सुनने को मिलती है मां क्या कहती है आमी एमन स्वामीर काछ पड़े लू जे तीनी कखन आमा के तई पर्जन तो बोलेनी मैं मुझे ऐसा एक स्वामी प्राप्त हुआ था जो मुझे तुम छोड़ कर के तई कभी नहीं कहे थे अभी देखिए कि जिनको बंगाली नहीं आती है हम लोग हिंदी में जैसे आप और तुम ऐसा करके किसी को बुलाते हैं जो सम्माननीय होता है उनको हम आप कहते हैं जो हमारे से छोटा या तो फिर हमारे से जो हमारा जो एक निकट का कोई व्यक्ति होता है उसको हम तुम करके बुलाते हैं किंतु बंगाली में उससे भी नीचे का एक है तुई जिसको कि आपको असमान देकर के या उसको उसको बेइज्जत करके बुलाना है तो उसको आप तुई करके बुलाएंगे तो और बहुत बार यह जो पति होता है अपनी पत्नी को तई करके बुलाएगा जैसे कि पत्नी की कोई सम्मान ही नहीं है उसके सामने में तो यहां पर मां कहती है कि ठाकुर ने मुझे तुम छोड़ कर के तई करके कभी नहीं बुलाया है अर्थात कि असम मान जनक शब्दों का प्रयोग ठाकुर ने मां के प्रति कभी नहीं किया है ठाकुर आमा के कखन फूटी दियो घा देनी ठाकुर ने कभी मुझे फूल से भी मारा नहीं वरना तो आजकल जिस तरह से चलता है स्त्री और पति और पत्नी के बीच में यहां पर ठाकुर उनको अपमानजनक शब्द नहीं कहे हैं मां के ऊपर में कभी हाथ नहीं उठाया है कखन तुम छड़ा तुई बोलेनी कभी भी तुम तई छोड़कर मने कभी भी तई करके नहीं बुलाया तुम कर तुम करके ही बुलाया है तो देखिए कि किस तरह से ठाकुर मां को सम्मान देते हैं श्री मां एक दिन दक्षि श्व शरू चाक और सुजीर पायस प्रस्तुत करिया ठाकुरर घोरे दते गले एक बार मां सरू चकली अर्थात पैनकेक जैसा होता है यह जो डोसा होता है ना उसके शेप का थोड़ा सा स्वीट जैसा होता है पैनकेक की तरह और सजी का पायस अर्थात की यह सूजी अर्थात रवा जैसा होता है उसका पायस तैयार पायस अर्थात खीर तो यह दोनों तैयार करके मां ठाकुर को खिलाने के लिए उनके घर की ओर गई खाद्य गुली जथा स्थाने राखिया तिनी चलिया आशीते छन एमन समय लखी दीदी खाब दिया गलन मने करिया ठाकुर बोली लेन दोर जाटा भेज दिए जास अभी ठाकुर वहां पर बैठे थे कि किंतु उनकी नजर नहीं थी कि कौन आक के खाना रख जा रहा है तो उन्होंने सोचा कि लक्ष्मी दीदी आई होगी अभी लक्ष्मी दीदी क्या है ठाकुर की वह तो भतीजी थी उनसे उम्र में छोटी थी और प्रिय पात्र थी तो अब जब जाने के समय मां दरवा जा रही है तो ठाकुर ने आवाज सुनकर के यह सोच कर के कि लक्ष्मी दीदी आई है उन्होंने कहा कि दोरजा भेजिए दिए जास अभी यह भेजिए दिए जास दरवाजा बंद करके जाना यह तुई जो शब्द है वह यहां पर व्यवहार होता है तुई जब तुम ही होता है तो दोरजा भेज दिए जान जाबेन ऐसा करके आप कहेंगे किंतु जो तई है तो भेजिए दिए जश बंद करके जाना अब यह हिंदी ट्रांसलेट करना मुश्किल है तो जो भी है तो लक्ष्मी दीदी है ऐसा समझ करके जो जिस तरह से तुई शब्द का प्रयोग करके कहा कि दरवाजा बंद करके जाना तो जैसे ही मां ने सुना उन्होंने कहा कि अच्छा ठीक है मैं दरवाजा बंद करके जाऊंगी श्री मां बोली लेन हां दरजा भेजिए रखलो मां ने कहा अच्छा ठीक है मैं दरवाजा बंद कर रहे हू ठाकुर श्री मायर गलर शवर बुझीते प्याई संकुचित होया बोली लेन ठाकुर को जैसे ही पता चला अरे ये लक्ष्मी नहीं है मां स्वयं है तोत बड़े ही संकुचित हो गए और कहा आहा तुही अरे क्या तुम हो आमी भेबे लूम लोखी किछु मने कोरोना मुझे लगा किय लक्ष्मी है तुम कुछ ये मत करना तुम कुछ बुरा मत मानना कि मैंने तुमको तही कहा है अज्ञात सारे दिए जास बोलिया तहा रे तो संकोच उनको पता नहीं था बोलकर के तही कहा उसी से उनको इतना संकोच हो गया है पर दिन पजन तो नह बते सामने गिया तीनी श्री मां के बोली लेन और ठाकुर इतने संकोच हो गए थे इतने भीतर में से उनको यह हुआ था कि विमर्श विमर्श हुआ था कि दूसरे दिन जाकर के उन्होंने मां को कहा वहां नबत के सामने में जाकर के मां को कहा देखो गो अरे सुनो सारा रात हमार घूम होई नहीं पूरी रात मुझे नींद नहीं हुई भेबे भेबे केमन एमन रोड बाग को बले फेर लू ये सोचते सोचते कि मैंने क्यों तुमको इतना कठोर बात कह दी कठोर यानी क्या तुम की बजाय तूही कहा है इतना ही बहुत सारे पति अपनी पत्नी को तू ही कहते हैं ठाकुर उस तरह के नहीं थे कि कि तो फिर भी तही कह दिया तो इतना पश्चाताप कि वह पूरी रात उनको नींद नहीं हुई है ऐसा कह के कि मां को तई क्यों कह दिया तो ये थे अपने ठाकुर अच्छा यहां प जो ठाकुर की जो ये बात करने की स्टाइल है ना ओगो देखो गो की कोगो तो अभी यहां पर तो मुझे क्या है कि मंदिर में ये अभी ये डायरेक्ट डिसाइल की तिथि पूजा आती है तो मुझे कुछ बोलना पड़ता है जैसे कल सुबोधनंद जी महाराज की तिथि पूजा थी तो महाराज के बारे में कुछ बोलना पड़ा तो मैं ये जो चेतनानंद जी द्वारा उसका जो किताब है देली विद गॉड उसमें से कुछ कुछ प्रसंग में ठीक करके रखा था कि इसको पढ़ूंगा और कुछ व्याख्या करूंगा तो यह जो ठाकुर के जो हम बोलते हैं ना बंगाली में बोलते हुए इंग्लिश पढ़ते हैं तो बड़ा ही विचित्र लगता है तो देखो गो ओगो ऐसा करके जो ठाकुर पुकारते हैं लोगों को तो उसमें ट्रांसलेट किया है हेलो हेलो व्हाट आर यू डूइंग हियर वो बड़ा ही फनी लगता है और ठाकुर इस तरह से इंग्लिश में बोलेंगे तो जो भी है तो फिर आज यही तक अभी कल फिर से मिलते हैं ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णर्पण मस्तु