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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपने अवतार वरिष्ठ राम कृष्णा यते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन हम पाठ कर रहे हैं स्वामी गंभीरानंद जी द्वारा लिखित तो कल हमने देखा कि किस तरह से यहां पर मां पाच साल की हुई है और छठे साल में प्रवेश किया है और अपने घर में रहकर के अपने छोटे-छोटे हाथों से अपने छोटे भाइयों की केयर करती है और माताजी और पिताजी को उनके कार्य में मदद करती है और यहां पर ठाकुर है ठाकुर दक्षिणेश्वर में थे अपने बड़े भाई के साथ में कलकत्ता कामर पुकुर छोड़ करर के कलकता गए थे जिससे कि घर में जो अर्थ संकट है उससे कुछ मुक्ति पास सके थोड़ा सा दारिद्र्य दूर हो सके तो उनके बड़े भाई को रामकुमार को कालीवाड़ा की पूजक का स्थान मिला और फिर जब रामकुमार का मृत्यु हुआ तब उनकी जगह पर उनके छोटे भाई छोटू भट्टाचार जो ठाकुर को यह लोग कहते थे तो श्री रामकृष्ण ठाकुर को उनके बड़े भाई की जगह पर पूजक का स्थान मिला कालीवाड़ा की पूजा करने का किंतु साथ में ही ठाकुर के हृदय के भीतर जो साधना के प्रति झोक था ईश्वर प्राप्ति के लिए उनकी जो उत्कंठा थी जो मुमुक्षु तोव था आध्यात्मिक जीवन में एक के बाद एक उच्च से उच्चतर सोपान सर करने का वोह मुमुक्षु क्व वो ईश्वर के प्रति उत्कंठा वो ईश्वर के प्रति प्रेम उनको इस डायरेक्शन में ले गई जैसे पूजा जप पूजा वहां का जो जो कार्य है सब छूट गया और दिन रात मां मां करके पुकारते थे कभी राम-राम करके पुकारते थे कभी काली काली करके पुकारते थे और वहां पंचवटी में बैठ कर के पूरी रात ध्यान किया करते थे और उनका आचरण देख कर के कालीवाड़ा भट्टाचार्य महाशय का दिमाग थोड़ा सा गड़बड़ हो गया है दिन रात ईश्वर ईश्वर करते-करते वो शिवनाथ शास्त्री आया था ना तो ठाकुर उसको कहते हैं कथामृत में है यह वर्णन कि शिवनाथ कहता है कि ठाकुर बेहेड हो गए हैं बेहेड हेड अर्थात कि सर और जिसका बेहेड अर्थात कि बिना सर के हो गए हैं तो ठाकुर जब शिवनाथ को मिलते हैं तो ठाकुर कहते हैं कि अरे तुम लोग दिन रात विषय की चिंता करते हो और तुम्हारा माथा ठीक है और मैं दिन रात ईश्वर का नाम लेता हूं तो मैं बेहड़ हो गया यह तुम्हारी कैसी बेत की लॉजिक है तुम्हारा कैसा बेत का तर्क है किंतु संसार का यही तर्क है संसारी लोग जदी अपने परिवार के लिए पैसों के लिए ठाकुर कहते हैं ना कि लोग पति पत्नी के लिए पैसों के लिए सांसारिक सुख के लिए घड़ा भर भर करके रोते हैं किंतु ईश्वर के लिए कौन रोता है तो वैसे ही यह संसार का ऐसा ही है कि बहुत कम लोग हैं जो कि ईश्वर के प्रति प्रेम ईश्वर को प्राप्त करने की उत्कंठा या तो ईश्वर को अपने हृदय में बि यानी कि वासना उसको कुछ उसके बारे में कोई सीरियसली सोचता है देखिए धर्म धर्म तो आजकल सभी करते हैं किंतु कैसा वो ट्रांजैक्शनल रिलेशन है हम तीर्थ यात्रा पर जाएंगे या तो फिर ऐसा कोई विधि विधान पूजा पाठ वगैरह करेंगे साधु संग करेंगे वगैरह करेंगे किंतु अपने जीवन को ट्रांसफॉर्म नहीं करेंगे धर्म का अर्थ ही है लाइफ को ट्रांसफॉर्म करना यदि आप एथिक्स एंड मोरालिटी सत्य अहिंसा अस्ते अपरिग्रह ब्रह्मचर्य तप शोच संतोष स्वाध्याय और ईश्वर प्रधान यह 10 यम और नियम योग शस्त्र में बताए गए हैं यदि आपको आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि यह सब साधना के अंतरंग अंग है उनका अनुष्ठान करना है तो पहले अपना बिहेवियर अपना लाइफ अपना एटीट्यूड अपना एक्शन ठीक करना पड़ेगा तो यह किसी को बहुत कम लोग अपना लाइफ ट्रांसफॉर्म करना चाहते हैं बोलते हैं कि अरे हमारे से इतना कठिन कार्य क्या होगा तो ऐसा नहीं है कि आपने सत्य पालन करने का जिस दिन निश्चय जिस दिन निर्णय लिया उसी दिन आप 100% सत्य बोलना शुरू कर दे ऐसा संभव ही नहीं है यथा शक्ति हमको इस डायरेक्शन में आगे बढ़ना है छोटी-छोटी चीजों में हमको कभी असत्य बोलना पड़ता है वो जैसे कहते हैं ना कि सत्य वदम प्रियम वदम यदि सत्य भी बोलना है तो प्रिय रूप से ठाकुर कहते है ना कि कोई जिसका पेर अभी जो खोड़ा ठाकुर बोलते हैं खोड़ा के बोलते नहीं तु खोड़ा के तुम खोड़ा केन आचो बोलते हुए तुम्हारा पाटा एमन केनो होलो अर्थात की जो खोड़ा है खोड़ा अर्थात की जिसका लकवा है या तो पैरालिसिस हो गया है पेर को तो उसको ऐसा नहीं करते कि अरे तुम खोड़े क्यों हो अर्थात कि तुम्हारा पैर ऐसा क्यों है ऐसा कहना चाहिए कि अरे तुम्हारे पैर में ऐसा क्यों हुआ माने शब्द भी जद यूज करते हैं तो थोड़ा सा प्रिय भाष्य प्रिय वचन यूज करना है तो क्या है कि हमको समाज में भी रहना है तो सामाजिक बंधन सामाजिक व्यवहार है वोह भी मेंटेन करना है किंतु साथ-साथ में ही ये एथिक्स एंड मोरालिटी यम और नियम हमारी लाइफ में होने चाहिए तभी हमारा जीवन धीरे-धीरे करके ट्रांसफॉर्म होगा और तभी हम धर्म के रास्ते पर सही सही चलेंगे किंतु अपना जीवन ट्रांसफॉर्म नहीं करके ज्यादातर लोग एक बाह्य दिखावे में एक बाह्य विधि आचार में इतने वोह मशगूल होते हैं या तो उसी में इतना विश्वास करते हैं कि फिर आखिर में सोचते हैं कि यह विधि आचार जो फॉलो नहीं करता वह सब अधर्मी है तो ठाकुर और कालीवाड़ा ही हुआ हालांकि धर्म के पथ पर आप चलेंगे मां मां नाम लेकर के जद आप पागल होए तो ये तो हंसी की मतलब खुशी का अवसर है यह नहीं और कालीवा जो कि धर्म स्थान है जो कि धर्म पीठ है वहां के ही लोग ऐसा बोलना शुरू कर दिए कि ठाकुर मां को लेकर के पागल हो गए हैं तो चंद्रा मणि देवी के बात के पास बात पहुंची और उने उन्होंने वैसे ही अपने बड़े लड़के को गवा दिया था कलकाता गया था तो और फिर सुना कि यह जो छोटा बच्चा है उनका वह भी पागल होने को आया है तो बड़े ही शीघ्र उनको कामर पुकुर वापस बुलाया और यह औषध प्रयोग शांति स्वस्थ यन झाड़ फूंक और चं ना मानो जैसे वो गांव में होता है कि अभी क्या है कि मॉडर्न मेडिकल फैसिलिटी तो सब जगह पर अवेलेबल वो भी गुलाम भारत था कहां से होने वाला है कि कोई साइकेट्रिस्ट को दिखाए कि कोई क्वालिफाइड डॉक्टर को दिखाए गांव में जो होता है बीमारी आती है तो कोई झाड़ फूंक करने वाला कोई ओजा है कोई तांत्रिक है कोई यह सब विधि कर देता है कोई ऐसा आपको भरोसा दिलवा देता मुझे इतना रुपया दे दीजिए मैं ऐसा कहीं जाकर के ऐसा कुछ करूंगा तो आपका लड़का ठीक हो जाएगा तो गांव में तो इस तरह से ही चलता है चलता था अभी भी बहुत सारी जगह पर चलता है तो इस तरह से बेचारी चंद्रा मणि देवी भी यह सब उपाय अपने बच्चे के लिए करने लगी इसके बाद में क्या हुआ तो गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं बला बाहु जे लोको प्रचलित एई सकोल उपाय कार्ज कोर कोई नाई कहने की जरूरत नहीं है कि लोक प्रचलित यह सब उपाय इसमें से कुछ भी कार्यकर नहीं हुआ तब ई समय साधना सोहाय श्री श्री जगदंब अधिकाधिक दर्शन लाभ करते थाका ठाकुर मन जो आचरण क्रम अनेक स्वाभाविक होया आशीते लो किंतु हुआ क्या कि मां का तत दर्शन ठाकुर को प्राप्त हो रहा था तो इसकी वजह से जो प्रचंड उत्कंठा थी वह धीरे-धीरे करके शांत होने लगी जैसे कि वो ठाकुर कहते हैं ना कि वो आप भोजन समारोह में गए हैं तो सब सब तो भूखे हैं शुरू में सब ब्राह्मण लोग बैठे हैं तो पहले तो बोलेंगे अरे यह पूरी लाओ यह लाओ मिठाई लाओ यह सब और उसके बाद में जब वो पात्र में सब आने लगेगा आपके खाने के वो थाल में सब एक के बाद एक वानगी एक के बाद एक आइटम आने लगेगा तो सब शांत हो जाएगा ठाकुर कहते हैं बाद में सिर्फ सब सब आवाज होगा खाने का तो वैसे ही साधना करने की उत्कंठा जब तक ईश्वर प्राप्ति नहीं होती जब तक ईश्वर का दर्शन नहीं होता उस समय जिस तरह से जो अच्छा सही साधक है वह किस तरह से मारा मारा घूमता है कि अरे किस तरह से ईश्वर के दर्शन हो क्या करने से मैं मुझे मां का दर्शन प्राप्त होगा क्या करने से से मुझे यह अनुभूति होगी जो भी उपाय उसके सामने आता है वह अजमा लेता है जैसे यहां पर चंद्रा मणि देवी अपने बच्चे को उसको ठीक करने के लिए जो कोई भी उपाय बताता है वह सब उपाय का इस्तेमाल करती थी वैसे ही ठाकुर का कि जो किसी भी उपाय से उनके हृदय की आकुल होता उनके हृदय की आरती उनके हृदय की यह व्याकुलता समाप्त ना हो जब तक मां के सतत दर्शन ना प्राप्त हो तब तक बेचारे इतने परेशान रहते थे इतना जो कोई भी आचरण दिन भर उनका एक उन्माद वत उन्माद वत अर्थात की थोड़ा सा पागलपन पागल वत आचरण करते थे किंतु जब मां का दर्शन सतत उनको मिलने लगा तो उनकी उत्कंठा में प्रशमन हुआ उनकी व्याकुलता थोड़ी सी शांत हुई मन और आचरण थोड़ा करके धीरे-धीरे करके बहुत ही स्वाभाविक होने लगा था जननी इ हाते को तोक आश्वस्त होई लेओ दुर्भावना होई ते संपूर्ण मुक्ति पायले ना जननी अर्थात की मां चंद्रमण देवी को थोड़ी सी तो आश्वस्त हुई किंतु संपूर्ण रूप से दुर्भावना अर्थात की दुश्चिंता से मुक्त ना हो पाई और कैसे होगी कामर पुकुर में भी ठाकुर धीर बीच-बीच में ऐसा कुछ करते थे एक बार कहीं घर से चले गए व वहां पर वो भूते खाली स्मशान है वहां पर जाकर के ध्यान कर रहा है बहुत रात बीत गई है तो बिचले जो उनके जो बड़े भाई है तो वो उनको पुकारने के लिए आए कि अरे भैया चलो गदाधर शाम हो गई है रात हो गई है मां इंतजार कर रही है खाना खा लो ऐसा करके उनको पुकारने के लिए आए तो गदाधर ने क्या कहा दादा भीतर आश ब एक खाने माने भीतर में आना मत भीतर में कोई किसी देवता का वहां पर आविर्भव हुआ है मैं एग्जैक्ट भूल गया कि इनका आविर्भव हुआ किंतु ठाकुर ने कहा था कि दादा भीतर में मत आइएगा यहां पर किसी का आविर्भाव हुआ है तो आपका इस समय यहां पर आना ठीक नहीं तो अभी यह तो जब चंद्रमणि देवी यह सब सुनेगी तो नेचरली है कि फिर से बेचारी का डर बढ़ जाएगा कि अच्छा कलकाता से तो लेकर आए कलकाता में पागलपन कर रहा था उनका लड़का अभी यहां पर लेकर आए तो अभी क्या स्मशान में रात को क्या सब विधि कर रहा है क्या भूत पिशाच उन सबसे घिरा हुआ है क्या करें इसका समझ में नहीं आ रहा तो यह तो शिव स्वयं देवाधि देव महादेव स्वयं स्मशान में साधना करते हैं तो भूत पिशाच तो आने ही वाले हैं किंतु मां चंद्रमणि देवी पता होने पर भी स्वीकार नहीं करती थी पता जद स्वीकार कर लेते तो क्या होता उनकी सेवा उनके साथ में खेलना धुलना हंसना मिलना यह सब बंद हो जाएगा एक स्मृति कथा में है कि ठाकुर जब उस समय कामर पुकुर गए थे तो एक महिला ने लिखा है कि एक कि गदाधर को जैसा बचपन में देखा था बिल्कुल बालक की तरह चेहरा एकदम मुस्कान भरा उसका वर्तन भी बच्चे की तरह अपनी मां के प्रति कितना लाड़ उसका प्रेम है उसका और चंद्रा मणि देवी भी वो अपने बच्चे को किस तरह से छोटा बच्चा होता है उसके साथ में एक तरह से बिहेव करते हैं और बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब दूसरी तरफ बिहेव करते हैं तो यहां पर ठाकुर प्राय 24 साल के हो गए थे किंतु फिर भी चंद्रा मणि देवी उनके साथ में जैसे कि 4 साल का बच्चा है ऐसे ही बिहेव करती थी और ठाकुर भी उनके साथ में ऐसे ही बिहेव करते थे तो यह स्मृति कथा में यह महिला ने लिखा है कि जो वहां पर रहती थी उसने लिखा है कि मैं उनके घर के सामने से जा रही थी तो ठाकुर चंद्रा मणि देवी के साथ में ऐसे ही बैठे थे जैसे मैंने उनको इतने सालों पहले बैठा हुआ देखा था बिल्कुल बच्चे की तरह चेहरा भी इस तरह से बालक वत तो देखिए कि जैसे-जैसे एज बढ़ती है उम्र बढ़ती है वैसे ही सांसारिक जवाबदारी सांसारिक वासना एं आकर के मनुष्य का शरीर और मन दोनों में संपूर्ण रूप से परिवर्तन ला देता है ठाकुर ने कहा था ना कि श्री हरि नाम का उनका मित्र था तो ठाकुर कहते हैं मैं जब छोटा था तब मैं उसके साथ में दिन रात खेलता रहता था और उसके साथ में इतना अच्छा मेरी मित्रता थी किंतु अभी कुछ दिनों पहले ठाकुर यह बात कालीवाड़ा शवर में कह रहे हैं तो ठाकुर कहते हैं अभी कुछ दिनों पहले श्री हरि आया था मैं उसका चेहरा भी ना देख पाया तो देखिए कि वासना का एक काला आवरण वासना का एक बादल उसके चेहरे पर छाया हुआ है सांसारिक का का तो ठाकुर कहते हैं मैं उसका चेहरा चेहरे के सामने देख भी ना पाया इतना चेहरा वह सांसारिक का से विकृत हो गया अभी हमको यह सब चीजें समझ में नहीं आती हम लोगों को तो लोग बड़े ही ठीक ठाक दिखते हैं किंतु ठाकुर तो सिर्फ चेहरा नहीं मन भी तो देखते हैं तो तो देखिए कि यह लड़का श्री हरि उसका क्या सौभाग्य है कि ठाकुर के साथ में मित्रता करने का जैसे कि वृंदावन में श्री कृष्ण गो गोपियों के साथ में खेला करते थे वो खेलते थे हंसी मजाक करते थे तो वो भी उन जो गो गोपियों का गोलो गोपाल कों का कितना बड़ा सौभाग्य होगा तो वही सौभाग्य इस लड़के का था कामर पुकुर में जब वह छोटा था किंतु जब बड़ा हो गया तो सांसारिक उसके भीतर में ऐसी प्रवेश कर गई कि माने ठाकुर उसके सामने भी ना देख पाए यानी कि देखिए कि जिसका हृदय जिसका संस्कार इतना शुद्ध हो कि महादेव के साथ में स्वयं वह बचपन में खेल कर सकता है महादेव के साथ में स्वयं मित्रता कर सकता है तो वह किस तरह से उसका बड़े होने से यह हो जाएगा किंतु जैसे यह प्रकृति का नियम है और कि मने आप जितने भी नादान कितने ही इनोसेंट कितने ही पवित्र बचपन में क्यों ना हो बड़े होने ने से यह सब चीजें सांसारिक का तो प्रवेश करेगी ही इच्छा नहीं होने पर भी सांसारिक जवाबदारी है वह तो आएगी ही आएगी तो यहां पर किंतु ठाकुर है बड़े हो गए हैं किंतु आचरण बिल्कुल बच्चे जैसा है क्यों बच्चे जैसा है बड़े लोग कहते हैं बच्चे जैसा है हम लोग तो ऐसा नहीं कहेंगे किंतु बाकी जो सब लोग हैं वह कहेंगे क्यों कहेंगे क्योंकि सांसारिक रिस्पांसिबिलिटी या तो फिर सांसारिक वासना है उनके सर पर आकर के बैठ नहीं गई है इस इसीलिए बचपन में जो इनोसेंस होता था वही इनोसेंस ठाकुर में बड़े होने के बाद में भी है ठाकुर वो जो उदाहरण देते हैं कि एक बच्चा उसको उसनी मा उसकी मां ने एक नया वस्त्र दिया तो वो वस्त्र पहन कर के घूम रहा है अभी बाकी सब जो संगी है उसके जो बाकी लोग है वो अच्छा वस्त्र देख कर के बच्चे को कहते हैं अरे यह तो बड़ा अच्छा सुंदर वस्त्र पहन रहे हो तुम हम मुझे दो यह मैं देखूं कैसा है मुझे देखने दो तो बच्चा वो वस्त्र कभी नहीं देगा और कभी उसके मन में क्या आ गया कोई भिखारी आया कि ऐसा कोई भी आया फटाक करके वस्त्र निकाल करके उसके हाथ में दे दिया तो जो मांगेगा उसको नहीं दिया जो नहीं मांगता है उसके हाथ में दे बच्चे का बचपना ही ऐसा है ठाकुर कहते हैं कि बच्चे को यह समझ में नहीं आता कि चोरी हो रही है क्यों कोई उसके नजर के सामने से उसकी कोई चीज ले भी जाएगा तो वह समझ नहीं पाएगा कि यह चोर है और चोरी हो रही है क्योंकि यह चीज मेरी है ये कांसेप्ट ही उसका नहीं है तो बचपना अभी भी ठाकुर में है किंतु किस तरह से बचपना यानी कि इरिस्पांसिबिलिटी नहीं किंतु इनोसेंस बचपन में दो चीजें होती है एक तो इरिस्पांसिबिलिटी होती है घर में क्या होता है वह दायित्व उसके सर पर नहीं होता वो समझ भी नहीं पाता और साथ में एक इनोसेंस होता है ठाकुर में इरिस्पांसिबिलिटी नहीं थी मां के प्रति मां के प्रति उनका जो धर्म है उनकी जो ड्यूटी है उसके प्रति वो बड़े सजक थे हमको पता है कि जब तोतापुरी दक्षिणेश्वर में आए तो उन्होंने ठाकुर को कहा कि देखो तुम तो वेदांत साधना के लिए बड़े ही उपयुक्त साधक हो तुम चाहो तो मैं तुमको वेदांत साधना सिखा सकता हूं तो वेदांत ठाकुर ने पूछा वेदांत साधना में क्या करना होगा तो उत्तर मिला कि सन्यास लेना होगा तो ठाकुर ने कहा यदि छुप के ले सकते हैं सीक्रेट यदि संन्यास दे सकते हैं तो दीजिए क्यों क्योंकि चंद्रा मणि देवी उस समय वहां पर नबत में रह रही थी ठाकुर के साथ में जद बेचारी को पता चला कि उनका लड़का उसने सन्यास ले लिया है तो फिर और एक बड़ा पहाड़ टूट पड़ता उनके ऊपर में इस वृद्धावस्था में तो ठाकुर यह सब चीजों के प्रति अपनी मां को कोई कष्ट ना हो यह सब चीजों के प्रति बड़े सजग है किंतु साथ-साथ में वो इनोसेंस भी है यानी कि बचपना ठाकुर में में किस तरह से है बचपन की बालक की इनोसेंस है किंतु बालक की इरिस्पांसिबिलिटी नहीं है तो अभी मां उनको कामर पुकुर बुलाई है और उनके विवाह की तैयारी कर रही है हालांकि ठाकुर को सतत ईश्वर दर्शन हो रहा है किंतु संपूर्ण रूप से दुर्भावना अर्थात की दुश्चिंता से चंद्रा मणि देवी की मुक्ति नहीं हुई है क्योंकि ठाकुर आचरण ही ऐसा बीच-बीच में करते थे स्मशान में जाकर के साधना करना वगैरा तो फिर चंद्रा मणि देवी ने क्या किया अन्नो दोष चनेर सही ती नियो ई सिद्धांत उपनीत होया लेन बाकी 10 लोगों के साथ में चंद्रा मणि देवी भी यह सिद्धांत पर आकर के रुकी कि संसारे उदासीनता बसो तो श्री राम कृष्णर मन पुनरा अप प्रकृति स्थ होया पड़ते पारे संसार के प्रति उदासीनता की वजह से श्री राम कृष्ण का मन फिर से अप्रकृतिक ऊपर में पागलपन का दौरा हो सकता है यह बात उन्होंने ठीक की यहां पर लिखा है बाकी सब 10 लोगों के साथ में मिलकर के यानी कि ऐसा सब कुछ होता है तो 10 लोग सलाह देने के लिए आ जाए ऐसे 10 लोगों की कमी भारतवर्ष में नहीं है अपने हिंदू धर्म में नहीं है हमेशा ऐसे लोग आकर के मिलेंगे आपको वह आपको अच्छे-अच्छे उपदेश देंगे पूरे सांसारिक उपदेश देंगे मैंने जब घर छोड़ कर के इस तरह से साधु बनने का ठीक किया था इस तरह से मैंने सन्यास लेना या साधु बनना ऐसा तो नहीं किंतु शुरू शुरू में ठीक किया था कि मैं संसार नहीं करूंगा कैरियर नहीं बनाऊंगा और मैं कोई सेवा कार्य में अपना जीवन व्यतीत करूंगा बाद बाद में धीरे-धीरे करके ठाकुर महा स्वामी जी को पड़ा और सेवा की ओर से सन्यास की ओर मेरा मन आकर्षित हुआ किंतु उस समय मैं अपने घर में था और मेरे एक एक मित्र मुझे मिलने के लिए आया था मेरा बड़ा ही अच्छा क्लोज मित्र था हम बहुत अच्छे से साथ में खेलते थे काफी सालों से हम लोग साथ में पढ़ाई भी करते थे उसके घर पर मैं जाया करता था होमवर्क करने के लिए बाहर में गली में हम लोग स्ट्रीट में खेला करते थे तो अच्छा मित्र था मेरा तो वह आकर के मुझे बोल रहा है कि अरे यह सब क्या पागलपन तुमने पर रंभ किया है यह सेवा करना फिर यह सब तुम धार्मिक किताबें सब पढ़ रहे हो यह सब क्या पागलपन है यह सब तो रिटायर होने के बाद में करना है अभी तो तुम जुवान हो इस उम्र में थोड़ी ना यह सब करना है पहले तुम अच्छे से कैरियर बनाओ धन अर्जन करो सब कुछ अच्छे से भोग करो बाद में रिटायर होकर के धर्म धर्म करना अभी से इस उम्र में धर्म तो मुझे इतना जैसे कि इतना मैच्योर है इतना वर्ल्डली वाइज इस तरह से मुझे उपदेश दे रहा था कि और कोई भी होता तो फ ठीक उसकी बात मान लेता किंतु तो ऐसे लोगों की कमी नहीं है अपने जगत में इस भारतवर्ष में कि आकर के आपको बड़े ही अच्छे उपदेश दे प्रैक्टिकल उपदेश दे और प्रैक्टिकल उपदेश को मानना ही चाहिए ऑफकोर्स ये तो कोई 1 पर लोगों के लिए है कि जिनका जीवन बचपन से ही थोड़ा डिफरेंट टाइप का होता है तो यहां पर उन्होंने भी चंद्रा मणि देवी ने भी दूसरे द लोगों के साथ में मिलकर के यह ठीक किया कि हां बच्चे का विवाह दे दो तो उसका सिर ठिकाने आ जाएगा अत मध्यम पुत्र रामेश्वर शहीद परामर्श क्रम ही बैराग्य पूर्ण हृदय के उद बाह बंधने आबद्ध करी बार जनन तिनी गोपने पात्री संधान लते लागले अभी मध्यम पुत्र रामेश्वर के साथ में उसके साथ में परामर्श करके इस वैराग्य पूर्ण हृदय को ठाकुर का जो वैराग्य पूर्ण हृदय है तो इस वैराग्य पूर्ण हृदय को उद्बाल्कर लगी सीक्रेट क्यों क्योंकि जद फिर ठाकुर को पता चल जाए गदाधर को पता च जाए कि अरे मेरे विवाह के बारे में यह लोग सोच रहे हैं तो फिर पता नहीं वह फिर क्या ना क्या कांड ना कर बैठे कोई ना कोई वो तमाशा ना कर बैठे ऐसा ना बोल बैठी कि अरे मेरा हृदय तो सम ठीक पूरा मां को अर्पित है मां जगदंबा को मां काली को तो मैं तो विवाह नहीं करूंगा फिर ऐसा घर छोड़ कर के भाग ना जाए यह भी तो एक डर रहता है बच्चे की इच्छा के विरुद्ध में आप कुछ करेंगे मां-बाप तो थोड़े से तो डरते हैं बच्चा क्या से क्या ना कर बैठा आजकल तो हम लोग सब न्यूज़पेपर में पढ़ते हैं ठाकुर का भी वैराग्य पूर्ण हृदय है जब ठाकुर छोटे थे और कामर पुकुर ग्राम के बाहर में वह धर्मशाला थी बांगला में कहते हैं छोटी तो वहां पर गंगासागर की यात्रा करने के लिए जो सब साधु सन्यासी आते थे तो गदाधर सब समय जाकर के उनके साथ में बातें करता था उनके साथ में गप लगाता था उनके पास में सब भजन वगैरह सीखता था तो चंद्रा मणि देवी बेचारी बड़ी ही आशंकित हो गई थी चंद्रा मणि देवी ने गदाधर को अपने छोटे गदाई को मना कर दिया गदाई तुम वहां पर जाकर के धर्मशाला में साधुओं के साथ बात मत करना तो यह देख कर के वहां पर जो साधु लोग रह रहे थे वो वैसे तो व लोग गदाधर से इतने आकर्षित हो गए थे छोटा बच्चा है इनोसेंट है धर्म की बातें सीखना चाहता है और साधु जो उनको बताते हैं फटफट करके सीख लेता है तो ऐसा बच्चा किसको पसंद नहीं आएगा इस ऐसे बच्चे के ऊपर में किसका स्नेह नहीं होगा तो जब साधु लोग देखे कि अरे वो गदाई इतने दिनों से आ नहीं रहा है तो क्या हुआ तो जाकर के उसके घर गए उनकी मां को मिलने के लिए तो चंद्रा मणि देवी ने कहा कि मैंने ही उसको मना किया है क्यों क्योंकि जदिया पास आएगा और आप जद उसको उठा के ले जाए तो ऐसा डर रहता है तो साधुओं ने मां को बड़े ही प्रेम से आश्वस्त किया कि नहीं मैया आपका बेटा राने का कोई भी संकल्प हमारे हृदय में नहीं है इस तरह की कोई भी बात हमने कभी सोची नहीं आपका बच्चा अभी के पास रहेगा तो यह सब घटनाएं तो हो चुकी है तो चंद्रा मणि देवी तो बेचारी सोचेगी कि अभी उसकी इच्छा नहीं हो करके यदि उसको विवाह किया जाए पात्री का संधान किया जाए तो वह क्या से क्या ना कर बैठे इसलिए बड़े ही गोपन रूप में बड़े ही सीक्रेट पात्री का संधान पात्री की खोज करने लगी किंतु शकोल चेष्टा व्यर्थ होलो किंतु सब चेष्टा व्यर्थ हो गई अवतार वरिष्ठ के साथ में आद्याशक्ति जगदंबा का ही विवाह हो सकता है और कोई आप प्रयत्न करें तो अदृष्टवांठा किंतु एक दिन ठाकुर को यह पूरी बात का पता चल गया समग्र वृतांत पूरी बात अवगत हो गए उससे वह जानकारी हो गई क्या कि यह लोग मेरे विवाह के लिए कन्या की खोज कर रहे हैं ता होले किंतु अवगत होकर के विरक्ति थोले बालक सुलभ आनंद और उत्साह ही प्रकाश करी लेन किंतु जब पता चला कि हां यह लोग मेरे लिए कन्या खोज रहे हैं तब नाराज होने की बजाय बच्चे की तरह बड़े ही आनंद प्रकाशित करने लगे एवं पात्री संधान दीवार जन्नो को हिलन और पात्री का कन्या की खोज करने के लिए कहा जय राम बाटी रामचंद्र मुख जेर बाड़ी ते देखोगे जयराम बाटी में रामचंद्र मुख्य की घर जाकर के देखो बियर कोने शेखाने कुटो बांधा आचे विवाह के लिए कन्या वहां पर सुरक्षित रूप से रखी गई है कूटो बांधा इसके बारे में हमने बहुत बार चर्चा की है जब कोई पेड़ के ऊपर में फल आता है फल जद देवता को अर्पित करना है तो कोई पंखी अपनी चोंच उसके ऊपर में ना मार दे इसके लिए कहीं कागज से या और किसी चीज से उसको बांध करके रखते हैं जैसे कि फल बड़ा को और उसको देवता को अर्पित कर सके तो फल को सुरक्षित रखने के लिए उसको कुटो बांधा कहते हैं तो ठाकुर ने कहा कि पात्री को कन्या को सुरक्षित रूप से जयराम बाटी गांव में रखा गया है ई सार्थक इंगत अनुसरण फले इस आदेश ये निर्देश के अनुसार एक निर्देश को फॉलो अप करके पात्री निर्वाचन ने आर विलंब होलो ना पात्री के निर्वाचन में पात्री के सिलेक्शन में और फिर देरी नहीं हुई जैसे ही ठाकुर ने कहा यह मां के घर से चंद्रा मणि देवी के घर से वहां पर संदेश भेजा गया उस समय तो वो जैसे घटक ठाकुर होते हैं ना वो माने वो ऐसे कोई ब्राह्मण होते हैं जिनका आपको जिसके साथ में विवाह करना है तो ऐसे लोग मध्यस्थ करते हैं और जाकर के वर पक्ष को और कन्या पक्ष के बीच में जो बातें हैं वो करते हैं बहुत बार ऐसा होता है कन्या पक्ष कुछ कहना चाहता है तो वो मुंह पर नहीं कह पाता क्या है कि थोड़ा सा आशंका दर्शित करना कि अरे तुम लोगों के पास में इतना तो पैसा है नहीं तो मेरी बच्ची का क्या होगा मुंह पर बोलने से थोड़ा संकोच होता है कोई बुरा मान ले ऐसा होता है तो एक मध्यस्थ करने वाला एक घटक ठाकुर होते हैं तो बांगला में खास कर के वो बाकी सब जगहों प भी होंगे तो वहां पर ऐसे कोई मध्यस्थ करने वाले लोग होते हैं वो वर पक्ष की बात कन्या पक्ष को बताते हैं कन्या पक्ष की जो चिंता है जो उनके प्रश्न है वर पक्ष को बताते हैं उसका समाधान जाकर के तो इस तरह से थोड़ा सा यह पूरा एक सामाजिक प्रथा उस समय के गांव में थी और बड़ी ही स्टैंडर्ड प्रथा थी कभी-कभी ऐसा होता था जो इस तरह से वर पक्ष और कन्या पक्ष के बीच में मध्यस्थ करते थे वे लोग सबके ऊपर में नजर रखते थे जैसे कि चैतन्य महाप्रभु के जीवन में हमको देखने को मिलेगा कि इस तरह से मध्यस्थ करने वाले आकर के सची देवी को आकर के बोलते थे अरे आपका लड़का तो चैतन्य महाप्रभु अभी तो विवाह के लिए योग्य हो गया है और उसकी सुख याति चारों ओर फैल रही है तो उसके लिए कन्या का क्या हम लोग खोज करने की शुरुआत करें कि नहीं या तो फिर कोई कन्या पक्ष होगा वह देखेंगे कि अरे यह तो चैतन्य महाप्रभु इतने सुकुमार है सुपात्र है तो उसके लिए किसी मध्यस्थ को जाकर बोलेंग उनके साथ में जाकर बात करो तो यह बांगला के गांव में और हमेशा अपने भारत के गांव में यह सब एक स्टैंडर्ड य रिवाज यह नियम यह प्रथाएं एक सुमधुर प्रथाएं हमेशा से यह चल रही थी आजकल लोग अरेंज मैरेज को लेकर के बड़ा ही व वे लोग कुछ बोलते हैं कि अरे यह तो किस तरह की कुप्रथा थी ये किस तरह की अंधश्रद्धा थी किंतु देखिए कि आप अपने से पात्र या पात्री का सिलेक्शन करते हैं तो इससे क्या आपका मन शांत हो जाता है क्या इससे कहीं डाइवोर्स का रेट आज जितना है वो कितना बढ़ गया है अपने समाज में तो सामाजिक वह जो सब रीति रिवाज थे कि किसी मध्यस्थ के माध्यम से पात्र का पात्री का निर्वाचन करना अरेंज मैरेज माताजी पिताजी यह सब ठीक करेंगे तो यह सब रिवाज उस समय के थे और आज के थे उसमें ऐसा नहीं है कि पहले के बुरे थे आज के अ है पहले के रिवाजों में उस तरह का पहले का अच्छा ही था और कुछ बुरा ही था आज के रिवाजों में आज की कुछ अच्छाई है कुछ बुराई है ये अच्छा बुरा का 50 % हमेशा से सब समय रहता है रामराज्य था तब भी वह मां सता की निंदा करने वाले लोग थे और आज भी मां सता की निंदा करने वाले लोगों की कमी नहीं है तो अच्छा कहो ना कि बुरा कहो समाज में 50 % हमेशा रहता है ऐसा अच्छाई और बुराई का स्वरूप चेंज होता है किंतु परसेंटेज 5050 परसेंटेज चेंज नहीं होता तो यहां पर भी जैसे ही ठाकुर ने कहा कि जयराम बाटी में इस रामचंद्र मुख्य के घर में विवाह किया कन्या सुरक्षित रूप से रखी गई है तो वैसे ही वहां पर लोगों को भेजा गया और रामचंद्र के साथ में सब बात करके यह सब ठीक हुआ ऑफकोर्स हमको पता हम लोग सोचेंगे आज कि मां की उम्र मुश्किल से 5 साल थी और ठाकुर की उम्र थी उस समय 24 साल तो इस तरह से 5 साल की कन्या का 24 साल के लड़के के साथ में वर के साथ में विवाह क्या उचित है तो यह सब सार असार विचार यह सब सामान्य जगत में सामान्य लोगों के साथ में होता है शिव और पार्वती का जब विवाह होता है तब यह सब विधि विधान नियम कानून वहां पर कार्य नहीं करते तो इसके लिए मैंने भी देखा है कि अपने लिटरेचर में इस बात को लेकर के बहुत ज्यादा डिस्कशन कहीं पर नहीं किया गया कोई भी साधु इस बात का समर्थन नहीं करेगा कि बाल विवाह हो किंतु ठाकुर और मां की बात ही अलग शिव और पार्वती का विवाह हो रहा है भगवान राम मां सीता का विवाह हो रहा है यहां पर कोई भी विधि विधान नियम कानून कार्य नहीं करेंगे विहर शुभ दिन स्थिर होया गेलो विवाह का शुभ दिन ठीक हो गया तार पर 1266 बंगा देर वैशा खेर शेष भागे उसके बाद में 1266 बंगा यह बंगोली ईयर है अपना इंग्लिश ईयर के अनुसार यह दिन को श्री जुक्तो रामेश्वर कनिष्ठ भ्राता श्री रामकृष्ण के लैया निर्धारित दिन को रामेश्वर अपने छोटे भाई रामकृष्ण को लेकर के जयराम बाटी ते श्री जुक्तो राम कृष्ण मुख रामचंद्र मुखोपाध्याय घरे उपस्थित होईल अपने छोटे भाई को लेकर के रामेश्वर रामचंद्र मुखोपाध्याय के घर उपस्थित हुए शुभ लग्न श्रीमती शारदा मणि देवीर सहित श्री रामकृष्ण परिणय समाप्त होलो शुभ लग्न शुभ मुहूर्त में श्रीमती शारदा मणि देवी के साथ में श्री रामकृष्ण का विवाह संपन्न हुआ विवाह बोरो पख कन्या पख के तीन सतो मुद्रा प दिलने विवाह में वर पक्ष ने कन्या पक्ष को 00 रुपया पण दिया अर्थात की दहेज दिया आजकल दहेज के बारे में क्या है कि कन्या पक्ष वर पक्ष को दहेज देते हैं किंतु यहां पर बांगला के ग्राम की जो व्यवस्था है जो रीति है उसके अनुसार वर पक्ष ने कन्या पक्ष को 00 दिए और यह देखिए कि यह उचित भी है माने आध्या शक्ति जगदंबा की सहाय के बिना ठाकुर यह जो युग धर्म प्रवर्तन करना चाहते थे वो कभी संभव ही नहीं होगा मां को ठाकुर की इतनी जरूरत नहीं है जितनी जरूरत ठाकुर को मां की ज्यादा है तो कन्या पक्ष को पाण दे कन्या पक्ष को दहेज दे वर पक्ष व यहां पर ठीक ठीक वो मने उचित है अदर वाइज दहेज की प्रथा यह पैसा लेने की देने की प्रथा यह तो ठीक नहीं किंतु ठाकुर के किससे में ठाकुर के केस में मां को दहेज देना मां के घर में वो बिल्कुल उचित है क्योंकि मां की सहायता से ही आखिर में उन्होंने जगत में नए धर्म का प्रचलन आरंभ किया हम लोग यह बात कहने के समय सब समय सोचते हैं कि ठाकुर ने क्या नया धर्म प्रवर्तन किया ऐसा कहने से बुद्धिज्म की तरह ना हो जाए कि राम कृष्ण देव के शिष्य लोग एक नया धर्म खड़ा कर दे एक्चुअली ऐसा है नहीं हिंदू धर्म के भीतर में ही पुनः प्राण फूके हिंदू धर्म के भीतर में ही पुनः देह का जीव का संचार किया ऐसा हम कहते हैं किंतु ये जो प्राण फूके हैं ठाकुर ने वो अवतार वरिष्ठ ने फूके हैं तो इसकी वजह से यह जो पुनर्जीवन जो हिंदू धर्म को मिला है यह रामकृष्ण हिंदुइज्म है ये क्लासिकल हिंदुइज्म नहीं है यह बात हमको थोड़ा सा ख्याल में रखना है यानी कि वही हिंदुइज्म है किंतु भगवान राम कृष्ण की स्पष्ट छाप इसके ऊपर है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं अच्छा कल सैटरडे है आई थिंक अभी मंडे को मिलेंगे ओ शांति शांति शांति हरि ओम तस्त श्री राम कृष्णर्पण मस्तु