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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

चिर सधवा || श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित || 25 Feb 2026

मङ्गलाचरण

ओम स्थापकाय च धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूपिणे अवतार वरिष्ठाय राम कृष्णायते नमः श्री मां शारदा देवी का जीवन चरित्र स्वामी गंभीरानंद जी महाराज द्वारा लिखित इसका हम पाठ कर रहे थे जो चैप्टर हमारा चल रहा है चीर सीमंतिनी चीर सधवा श्री रामकृष्ण देव की महासमाधि हो चुकी है और इस महासमाधि के रिलेटेड पुस्तक में तो जो लिखा है उसका तो हमने पाठ किया ही किंतु साथ में ही अ जो कुछ उनके जो डायरेक्ट श्री रामकृष्ण देव के जो अन्य शिष्य थे उन लोगों ने भी जो ठाकुर की महासमाधि के बारे में कहा है वह भी हम लोग देख रहे थे। तो इसी सिलसिले

राम दत्त के शब्दों में श्रीरामकृष्ण की महासमाधि का वर्णन

में रामचंद्र दत्त जो कि ठाकुर के गुरुही शिष्य थे उन्होंने क्या कहा था वो हमने कल थोड़ा पाठ किया। क्या कहा था रामचंद्र ने कि मृत्यु के एक दिन पहले ठाकुर ने पंजीिका अर्थात कि पंचांग उसको खोल के पढ़ने को किसी को कहा था और इसके साथ में ही यहां पर एक फुटनोट भी है जो कि एडिटर महाराज ने ऐड की है कि महासमाधि के 8 9 दिन पहले यह घटना हुई थी और योगानंद जी महाराज ने यह पंजी जी का या तो पंचांग ठाकुर को सुनाया था। इसके बाद में डॉ. नवीन पाल अपराहन के बाद में आया था। यह 15 अगस्त की बात है। 16 अगस्त को ठाकुर की महासमाधि हुई थी। 15 अगस्त की बात है। तो 15 अगस्त को नवीन पाल डॉक्टर वहां पर आया था और उसके साथ में वार्तालाप करने के समय ठाकुर ने कहा था कि आज मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है और दोनों साइड पर इतना दर्द हो रहा है कि जैसे किसी ने आग लगाई हो। और फिर साथ में ही ठाकुर ने पूछा कि क्या यह रोग दुसाध्य है क्या? इस अर्थ में कि क्या अभी यह रोग ठीक होगा कि नहीं। किंतु इसके उत्तर में डॉक्टर ने ताई तो वही तो ऐसा कह के अपना चेहरा झुका दिया। तो जब ठाकुर ने यह बात सुनी तो इसके बाद में किंतु फिर रोग के बारे में ठाकुर ने बात करना बंद कर दिया। क्यों? क्योंकि यदि इस तरह की बात फैले तो फिर मां भी है वहां पे। यह दूसरे डायरेक्ट डिसाइपल भी है, त्यागी संतान भी है। यदि उनके मन में ऐसा होगा कि ठाकुर की महासमाधि अभी निश्चित है तो यह लोग बेचारे बड़े दुखी हो जाएंगे। इसलिए ठाकुर ने अभी रोग के बारे में और कुछ कहा नहीं। परमहंस देव रोगेर कथा किंबा डॉक्टर कथा आर मुखे आनी लेना। परमहंस देव ने रोग की बात या तो फिर डॉक्टर की बात और फिर अपने मुंह से कही नहीं अतः पर तनी कोहते लागी लेन इसके बाद में ठाकुर कहने लगे देखो अमार हांडी हांडी दाल भात खते इच्छा करते छे देखो मुझे हांडी हांडी भर के दाल दाल और भात खाने की इच्छा हो रही है अभी इसका क्या तात्पर्य वह तो अभी ठाकुर ही जाने क्योंकि देखिए यह भी एक बात है बाकी जो रेमिनेशंस हमने पढ़े वहां पे ठाकुर के जो आध्यात्मिक इंसाइट्स थी स्वप्न थे या तो फिर वार्तालाप था उसके ऊपर में उन्होंने ज्यादा भार दिया है। वही एस्पेक्ट को उन्होंने नोट डाउन किया है। और यहां पे बिकॉज़ कि एक संसारी है रामचंद्र तो ठाकुर की जो इस तरह की बात जो थी वह उन्होंने लिखा है। यहां पे यह नहीं लिखा वरना तो गंभीरानंद जी की किताब में हमने ऑलरेडी पढ़ा था कि ठाकुर को स्वप्न आया था कि हाथी गया है औषध खोजने के लिए और खोज रहा माटी काट रहा है। माटी खोद रहा है किंतु कभी भी औषध नहीं मिल रहा और वहीं पर गोपाल ने आकर के ठाकुर की नींद निद्रा भंग कर दी। तो वह एक ठाकुर का सपना था। फिर ठाकुर ने मां को पूछा था कि अच्छा तुमको कोई सप्न आते हैं? तो मां ने कहा कि मैंने सपने में देखा कि मां काली अपनी गर्दन टेढ़ी करके खड़ी है। तो फिर मैंने मां को पूछा काली को कि मां ऐसा क्यों खड़ी हो? तो फिर काली ने मां काली ने ठाकुर की ओर इशारा करके कह दिया और ओटेर जो उसके उसके लिए अर्थात कि ठाकुर के गले में कैंसर हुआ है तो इसका असर मां काली के गले पर भी हुआ है। तो देखिए कि वो सब एक तरह का जो स्पिरिचुअल दर्शन या तो स्पिरिचुअल वार्तालाप उन लोगों का वो वो एक तरह का था। यहां पे देखिए कि रामचंद्र दत्त इस तरह का जो ठाकुर का सेंटेंस होगा भी यदि तो वह हाईलाइट कर रहे हैं। श रात्रि सुजी और दुग्ध अपर दिन अपेक्षा सहज गलाध करण करते पारिया छिलेन एवं सूखे प्राय रात्रि एकटा परंतो नितो छिलेन उस दिन रात को सूजी अर्थात कि रवा रवा का पायस और दूध अन्य दिनों की अपेक्षा आसानी से पी सके थे। गले में कैंसर है तो दूध पीना है। पायस यानी कि खीर खानी है तो बड़ा कष्ट होगा। किंतु उस दिन ठाकुर ने आसानी से दूध पान और खीर पान पायस दोनों खा सके थे। और रात को 1:00 बजे तक शांति से सोए थे। एक टार पूर्वे उठिया बोशी लेन एवं सूजी भखन को लेन 1:00 बजे से थोड़े आगे उठ गए और थोड़ा सा सूजी खाया सूजी अर्थात कि वही रवा का पायस पायस या उपमा जो भी होगा सूजी बखनांतर एकटा छ मिनट समय प्रकृत पक्ष एकटा दुई मिनट शहोशा समा हो या जले सूजी खाने के बाद में रामचंद्र दत्त कहते हैं 1:6 के समय और यहां पे नोट है सही में कहे तो 1:2 पे सभी का वो एक्यूरेट वो ऑब्जरवेशन नहीं रहता और कितने सालों के बाद में यह सब घटनाएं लिखी गई है इसलिए थोड़ा बहुत एरर हो ही सकता है। तो 1:00 बजे 2 मिनट में ठाकुर एकाएक सहसा समाधस्त हो पड़े और 1:00 बजे का समय अर्थात कि 16 अगस्त स्टार्ट हो ही गया है। 15 अगस्त के दिन की जो पूरी घटना कही उसके बाद में उसकी रात 12:00 बजे ही दिन क्रॉस हो जाता है। तो 16 अगस्त प्रारंभ हो गया है। 1:00 बजे दो मिनट में ठाकुर सहसा समाधस्त हो पड़े। भक्त दिखर प्राण पूर्व होते केमोन विकृत होया छिलो भक्तों का प्राण पहले से ही किस तरह से आशंकित हो गया था तार समाधिष्ट होवार शकले आतंको हो वो जब समाधिष्ट हो गए तब सभी लोग आतंकित हो गए क्योंकि भीतर में से भी तो एक पता चल ही जाता है कि जिनको हमने अपना मन प्राण सर्वस्व अर्पण किया है उनके जाने का समय आ चुका है। तो यह एक भीतर से एक अंदाज शायद सब भक्तों को हो गया है और उनके प्राण पहले से ही विवल थे। आशंका उनके मन के भीतर में पहले से ही थी। तो जैसे ही ठाकुर को एकाएक समाधि हुई, सबके मन में यह आशंका प्रबल हो गई कि हां क्या ठाकुर की यह आखिरी समाधि है? क्या यह महासमाधि है? ऐसा करके सबके मन में ऐसा हुआ। ता निश्चय महासमाधि बोलिया ज्ञान को ले उन्होंने निश्चय इसको महासमाधि समझ करके स्वीकार किया। ए विषम समाचार रजनी जोगे अधिकांश स्थानी प्रेरित करा हो या छिलो यह विषम समाचार रजनी योगेई अर्थात कि उसी रात्रि को ही ज्यादातर जगहों पे भेजा गया था एवं सेवक गण शकुले तथा उपस्थित होया छिलेन सेवक गण सभी वहां पे उपस्थित हुए थे। गिरीश घोष उस समय कहां पे था यह कहीं पर देखने को नहीं मिलता है। वह जो फोटोग्राफ है ठाकुर का सुबह को लिया गया। मुझे नहीं लगता कि गिरीश उसमें है। देखना पड़ेगा। वह होगा कि नहीं पता नहीं किंतु गिरीश का क्या ठाकुर की महासमाधि के समय आचरण था। मैंने कहीं पढ़ा नहीं है। तो इट्स अ मैटर ऑफ इंटरेस्ट कि ठाकुर को अवतार मान के सर्वप्रथम जो एक प्रचार करना ठाकुर महापुरुष है, संत है, काली के संतान है। इस तरह का प्रचार उन्होंने तो करना प्रारंभ कर दिया था केशव सेन ने और इसीलिए तो बहुत सारे जो यंग ये जो लड़के हैं ठाकुर के पास में आए थे जो कि ओरिजिनली ब्रह्म समाज से प्रभावित थे। किंतु ठाकुर अवतार स्वयं है। वैसे तो भैरवी ब्राह्मणी ने सर्वप्रथम इस तरह का प्रचार प्रारंभ किया था। किंतु क्या है कि भैरवी ब्राह्मणी का एक तो एक लिमिटेड आउटरीच था। वह खुद एक आध्यात्मिक पर्सन है और उसकी बात लोग क्यों सुने वह भी एक हो सकता है। गिरीश खुश है कि जिसने कि कोलकाता में इन जनरल बोलना शुरू कर दिया था सबके सामने कि ठाकुर अवतार है। तो गिरीश का क्या रिएक्शन रहा होगा उस समय मुझे याद नहीं आ रहा है कि मैंने कभी पढ़ा हो। नेपाल राज प्रतिनिधि विश्वनाथ उपाध्याय ए हृदय भेदी संवाद प्राप्त होइबा मात्र प्रातः काली तथा उपस्थित होले नेपाल के राज प्रतिनिधि विश्वनाथ उपाध्याय अर्थात कि कैप्टन वही कैप्टन जिन्होंने त्यागी संतानों को कहा था कि उनका जो करोड़ रज्जू है उनका जो स्पाइन है वह अभी भी गर्म है तो थोड़ा सा घी का मालिश किया जाए तो फिर हमने देखा कि किस तरह से शशि महाराज उनकी बगल में और उनकी पीठ पे और फिर कोई दूसरे भक्त उनके पैरों में घी की मालिश कर रहे थे। तो फिर उससे तो कुछ हुआ नहीं और फिर कुछ समय के बाद में देखा सुबह होते-होते कि उनकी जो पीठ है वह ठंडी हो गई है। उस समय थोड़ी गर्मी थी तो एक आशा थी कि शायद प्राण वायु पूरा नहीं निकल गया। तो एक जो अपने प्रियजन के लिए जो करना होता है आखिरी घड़ी तक कि एक आशा बना करके कि कैसे भी हो वापस आ जाए ठाकुर तो वह सब इन लोगों ने किया था तो वही यह विश्वनाथ उपाध्याय कैप्टन यह हृदय भेदी संवाद प्राप्त होने से ही प्रातः काले ही वहां पर उपस्थित हुए तत् देखिले जे जदियो परमहंस देव सर्वो शरीर कंटकी तो कठिन होइया छे एवं बम चू स्थिर होइया गया छ किंतु तखनो परजंतो तहार मेरुदंडो उष्ण रहया छे उन्होंने देखा कि भले ही चाहे श्री रामकृष्ण देव का सर्व शरीर कंटकित और कठिन हो गया है कंटकित अर्थात कि लोम हर्षण ये जो अपने ये जो रोंगटे हैं वह खड़े हो जाते हैं और कठिन हो गया है ये रोंगटे खड़े हो जाना ये एक तरह के उच्च आनंद या तो एक तीव्र भाव का एक यह है। अह साइन है। शशि महाराज ने कहा ही जैसे कि कि ठाकुर की महासमाधि की क्षण उनके जीवन की सर्वोच्च आनंद की क्षण थी। तो वो यहां पे ये कैप्टन ने भी नोट किया कि पूरे शरीर के ये जो रोंगटे हैं खड़े हो गए हैं और उनका देह जो है कठिन हो गया है और चक्षु है स्थिर हो गए हैं किंतु फिर भी उनका जो मेरुदंड है वह उष्ण है गर्म है त ए लक्षण द्वारा महासमाधि को ही लेना तो इस लक्षण को देख के उन्होंने कहा कि लगता है कि यह महासमाधि नहीं है डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार के आह्वान करा होइलो डॉक्टर महेंद्र लाल सरकार को पुकारा गया तनी आशिया मृत्यु स्थिर को लेन उन्होंने आकर के ठीक किया कि ठाकुर की महासमाधि हो ही चुकी है भक्तरा गंभीर शोके निमज्जित होले भक्त जो है गंभीर शोक में डूब गए तथापि तहारा अपराहन पांच घटिका परजन तो अपेक्षा कर ले इसके बावजूद उन्होंने दोपहर को 5 बजे तक राह देखी पांच घटिका समय द्वतल ग्रह होते महासमाधिष्ठो महापुरुष शरीर बारे आनयन पूर्वक एक विस्तर्ण पर्यंत को परिशयान करया आद्र वस्त्रे अंग परिष्कार करिया देवा होलो 5 बजे के समय जो फर्स्ट फ्लोर पर ठाकुर का देह था। ठाकुर का कमरा तो फर्स्ट फ्लोर पर ही था। तो वहां पर फर्स्ट फ्लोर पर से महा समाधिस्थ महापुरुष का शरीर बाहर में ले आ के एक विस्तर्ण पर्यंक अर्थात कि कोट एक कोट के ऊपर में उनको शयन कराया गया और आर्द्र वस्त्र गीले वस्त्र से उनका अंग परिष्कार अर्थात कि स्वच्छ किया गया। तदंत पीतांबर परिधान कोया श्वेत चंदन द्वारा सर्व शरीरों आत कोरा होइलो उसके बाद में उनको पीतांबर परिधान कराया गया और श्वेत चंदन के द्वारा सर्व शरीर आवृत किया गया गोलोदेश फुलेर माला मस्तके फुलेर चूड़ा परानो होइलो गले में फूलों की माला और सर के ऊपर में फूलों का ताज पहनाया गया फूलों का मुकुट जैसा पहनाया गया पालंक खानी फुलेर मालाए सुशोभित कोरिले भक्तों मंडली शो फोटोग्राफ लवा होलो पलंग अर्थात कि कोट को फूलों की माला से सुशोभित करके भक्त मंडली के साथ में फोटोग्राफ लिया गया प्रभु शदीने शोभा कतो होया छिलो ताहा जिननी देख्या छ तनी जानेन प्रभु की उस दिन उनकी शोभा कितनी सुंदर हुई थी वह तो जिन्होंने निरीक्षण किया है जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। एमोन समय भक्तवीर सुरेंद्र आशिया उपस्थित होईले इसी समय भक्तवीर सुरेंद्र आकर के उपस्थित हुए तनी बाटी हो ते पुष्प और बिलो पत्र लोया गया छलेन वह उन्होंने अपने घर से पुष्प और बिल पत्र लेके आए थे तथा उपस्थित होया तनी शरोद ने कोहिलेन वहां पे आकर के उपस्थित होकर के उन्होंने रोते-रोते गुरुदेव आज आपना के ए अवस्था देखते हो गुरुदेव आज आपको इस अवस्था में देखना पड़ा आर बलबो की और क्या कहूं शकल आशा भरोसा आपनार सहित बुझ शेष होइो सब आशा और भरोसा जैसे कि आपके साथ में ही संपूर्ण हो गई ए पापी ठर ए शेष पुष्पांजलि ग्रहण कर इस पापी की यह आखिरी पुष्पांजलि ली ग्रहण कीजिए बोलिया ताहार चरण पुष्प बिलो पत्रा आदि प्रदान कर ले ऐसा कह के उनके श्री चरणों में पुष्प बिल्व पत्र वगैरह प्रदान किया बेला छटार पर मृदंग कोरताल शहकारे हरि नाम संकीर्तन पूर्वक तहां के जावी तटे आना हो शाम को 6:00 बजे के समय मृदंग करताल के साथ में हरि नाम संकीर्तन पूर्वक ठाकुर को जानवी तट अर्थात कि गंगा के किनारे आना लाया गया संधार पूर्वे चिता प्रस्तुत होए एवं श्री रामकृष्ण देहो खानी तदुपरि संस्थापन पूर्वक अग्नि संस्कार कोरा होलो संध्या से पहले चिता प्रस्तुत हो गई है चिता तैयार हो गई है लकड़ियां सजा करके रख दी गई है और श्री रामकृष्ण के देह को उसके ऊपर में संस्थाप पन पूर्वक अग्नि संस्कार किया गया। यहां पर एक बात है कि रामचंद्र दत्त कहते हैं कि ठाकुर के देह को वहीं पे स्वच्छ किया गया था पानी से काशीपुर में ही। जबकि हमने काली महाराज की रेमिनेशंस में पढ़ा कि ठाकुर के देह को गंगा के किनारे काशीपुर श्मशान में गंगा के किनारे उनके देह को स्वच्छ किया गया था। तो जो भी है अभी अगेन सेम थिंग कि लंबे समय के बाद में आप यह सब देखते हैं, पढ़ते हैं तो मेमोरी में थोड़ा बहुत हो सकता है दोनों जगह पर किया गया हो। हमको तो पता नहीं हमारी मेमोरी किस तरह से काम करेगी बताना मुश्किल है। दो जगह भी हो सकता है। त्रैलोक्यनाथ शान्याल श्री खेत्रे तत्कालोपुयुक्त गान कोरिया छीले त्रैलोक्यनाथ सान्याल ने तत्काल माने समयोनुचित गान किया था। अह यह जो कोई देखा जाए आनंद धाम पता नहीं कि यह गान वहां पर किया गया था कि नहीं किंतु रामकृष्ण संघ में जैसे हमारी पहले भी एक बार बात हुई थी कि साधु का यदि देह त्याग होता है तो वहां पर जब चिता जलाई जाती है तो सामने चिता जल रही है और वहां पर सभी साधु ब्रह्मचारी बैठकर के गान करते हैं। तो इसमें यह जो गान है उईजे देखा जाए आनंद धाम यह गान सबसे पहले गाया जाता है। तो मैंने अभी रिसेंटली अपने ग्रुप में शेयर भी किया था। ये है ऑनलाइन है अवेलेबल YouTube पे एक घंटार मध्य रामकृष्ण मूर्ति पंजीकृत कोरिया तहार चिता वशिष्ठो अस्ति पुंजो एक्ट तामरे पात्र रखितो होइलो एक घंटे के भीतर में श्री रामकृष्ण मूर्ति पंजीकृत हो गई अर्थात कि उनका देह जो है पंचमहाभूत में विलीन हो गया और उनकी चिता के ऊपर में उनके जो अस्थि थे वह अस्थि एक ताम्र के कलश में संरक्षित किए गए। तो देखिए कि ये हमने कुछ रेमिनेशंस पढ़े खास करके जो हमारे संघ के जो जिनको कहेंगे कि सम ऑफ द वेल नोन पर्सन रामलाल दादा है, स्वामी जी है, लाटू महाराज है, शशि महाराज है, काली महाराज है और रामचंद्र दत्त है कि जिन्होंने ठाकुर की महासमाधि के बारे में यह सब विवरण किया है। तो देखिए कि जितना हम इस तरह के विवरण पढ़ते हैं उतना ही हमारा जो अंडरस्टैंडिंग है कि उस दिन क्या हुआ था वो और ज्यादा डीप होता जाता है। तो यह सब हमने ऑलरेडी देखा। अभी देखिए अ महासमाधि तो हो चुकी है ठाकुर की और अभी हम क्या करेंगे कि फिर से गंभीरानंद जी की जो किताब है उसकी ओर चलते हैं। देखते हैं कि गंभीरानंद जी क्या कहते

Apostle to the Apostles माँ सारदा: रामकृष्ण के शिष्यों की भी आश्रयदाता

हैं। अभी हमको पता है कि ठाकुर की महासमाधि के बाद में ही एक्चुअली यह तो है मां का जीवन। राइट? तो मां के जीवन के बारे में ही हम सब वार्तालाप कर रहे हैं। अभी देखिए कि इसके बाद में जो घटना हुई है ठाकुर की महासमाधि के बाद में वह भी हमको अच्छे से पता है कि ठाकुर के अस्थियों को लेकर के थोड़ा सा विवाद चला था। डायरेक्ट डिसाइपल का यानी अभी त्यागी संतानों का एक ग्रुप तो हो ही चुका है और हमने गंभीरानंद जी के जो विवरण में पढ़ा कि किस तरह से श्री मां शारदा देवी ने धीरे-धीरे से यह त्यागी संतानों की आगेवानी लेना प्रारंभ कर दिया। त्यागी संतान जो कि ठाकुर की सेवा करते थे। उन्होंने किस तरह से मां का जो परामर्श है, मां की सलाह है, मां की क्या आज्ञा है, यह मां के पास में जाकर के उनसे पूछना, उनसे आज्ञा मांगना उन्होंने प्रारंभ किया था। यह जो मेन डिफरेंस है इसके बारे में हमने पहले भी काफी कुछ डिस्कस किया है कि ये रामचंद्र दत्त हो ना कि ये सुरेश मित्र हो ना कि ये जो गुरुही संतान थे ठाकुर के उन लोगों का यह एक था कि हम ही ठाकुर के मुख्य शिष्य है और यह नरेंद्र वगैरह जो है वे लोग तो बस क्या एक उटपटांग त्याग और सन्यास की बातें करते हैं। तो एक है सन्यास का आदर्श, एक तो है गृहस्थ आश्रम का आदर्श। और यह गृहस्थ लोग लेजिटमेटली कह सकते हैं कि कहां ठाकुर ने तो हमको ऐसा कहा नहीं कि तुम लोग घर त्याग करके मेरे पास में यहां पे साधु होकर के रहो। ऐसा तो उन्होंने कभी कहा नहीं। उन्होंने तो ऐसा कहा है कि आपको एक सदगृहस्थ होना है। तो फिर नरेंद्र क्यों झूठमठ का यह सब यंग लड़कों को इकट्ठा करके सन्यास वगैरह का एक नाटक कर रहा है। तो यह गृहस्थ लोगों के मन में था। तो यह तो एक स्पष्ट हमको डिवीजन दिखते हैं कि गृहस्थ लोगों का एक माइंड सेट है और त्यागी संतानों का एक माइंडसेट है। किंतु यहां पे इससे भी एक डीपर एक फैक्टर यहां पे आता है जो कि सिर्फ गृहस्थ और त्यागी नहीं यहां पे मां का रोल किस तरह से यह लोग देखते हैं। जो लोग यह कहते हैं कि हां मां का जीवन पवित्र है वगैरह सब कुछ किंतु मां को कहीं अभी ठाकुर की जगह पर स्थापित करने की कोई जरूरत नहीं है। ठाकुर को जिस तरह से हमने अवतार के रूप में स्वीकार किया जिस तरह से हमने उनको अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। मां को इस तरह से गुरु के रूप में स्वीकार करने की कोई जरूरत नहीं। उनके प्रति श्रद्धा भक्ति संपूर्ण है। किंतु हमारे जीवन का नियमन हम जो अभी ठाकुर के नाम पर जो कुछ भी करेंगे उसके बारे में मां को पूछने की कोई जरूरत नहीं। तो यह एक सेपरेट दल हो गया। और यह जो त्यागी संतान थे उन लोगों का था कि जो कुछ भी करना है अभी मां की सहमति के साथ में मां की आज्ञा के साथ में करना है। मां की परमिशन के साथ में करना है। तो यह जो डिफरेंस था उसमें सिर्फ सन्यास और गृहस्थ आश्रम का आइडियल अपोजिशन में था। वही नहीं मां का क्या रोल होगा वो भी यहां पे फंडामेंटल था। और इसीलिए आप देखिए कि बाद बात में मां की शरण में जो भक्त आ गए हैं जैसे कि बलराम बसु है जैसे कि मास्टर महाशय है जैसे कि गिरीश घोष है वो चाहे थे तो गृहस्थ किंतु इसके बावजूद हम लोग उनको अपनी जो लीनिएज है उसमें गिनते हैं और रामचंद्र खास करके एक नाम ऐसा है कि भले ही चाहे ठाकुर के इतने अंतरंग शिष्यों में आते हो मां को इस तरह से शायद उन्होंने नहीं स्वीकार किया बोलकर के एक सेपरेट उनकी भावधारा चली जाती है। तो यह एक मां का जो रोल था ठाकुर की महासमाधि के बाद में फिर जो अस्थि को ले जो कुछ भी हुआ है उसका हमने काफी विशद रूप से आलोचना वगैरह जो वराह नगर मठ का डिस्क्रिप्शन हम कर रहे थे देख रहे थे उस समय किया है। तो अभी यहां पे देखिए कि जिस तरह से गंभीरानंद जी ने ठाकुर की महासमाधि के बारे में एक पैराग्राफ में ही संपूर्ण कर दिया है वार्तालाप तो वैसे ही अस्थि के बारे में उन्होंने कहीं बहुत ज्यादा डिस्कशन नहीं किया है। हम लोग क्या करेंगे और फिर यह तो अस्थि के बारे में हुआ और फिर सबसे इंपॉर्टेंट घटना जो है महासमाधि के बाद में वो है लीला कंटिन्यूटी वह भी हमने काफी विशद रूप से डिस्कशन किया है कि किस तरह से ठाकुर का देह जो भले पंचमहाभूत का देह है वह भले ही चाहे पंचमहाभूत में विलीन हो गया हो ठाकुर भक्तों के हृदय में निवास करके के पृथ्वी पे अपना जो मिशन है रामकृष्ण मिशन उसका प्रचार करते रहेंगे। तो इस प्रचार के लिए जो सबसे इंपॉर्टेंट केंद्रवर्ती भूमिका जिनकी थी वह थी मां की। तो मां जैसे ही अपने हाथों से एक के बाद अपने श्री अंग से एक के बाद एक अलंकार निकालना प्रारंभ कर दिया। वो जिस तरह उस समय की विधवाओं की जो प्रथा थी तो ठाकुर ने आकर के कहा कि मैं क्या मर गया हूं कि यह जो सधवा स्त्री के जो आभूषण वगैरह है तुम अपने हाथों से अपने गले से निकाल दे रही हो तो ऐसा जब कहा तो फिर मां ने फिर अपने हाथों से निकाल दे रही हो ऐसा जब ठाकुर ने कहा तो फिर मां ने फिर हाथों में जो चूड़ियां पहनी थी उसको नहीं निकाला तो यह जो है वन ऑफ द मोस्ट इंपॉर्टेंट फैक्टर आप क्रिश्चियनिटी में भी देखेंगे कि जीसस को जब क्रुसिफाई किया गया तो उनके जितने भी एपोस्टल थे पुरुष जितने भी थे सेंट पीटर्स वगैरह वो लोग तो जीसस मर गए हैं। ऐसा समझ करके चले गए थे वहां से। किंतु यह जो मेरी मैकडेलिन है जो उनकी लेडी डिसाइपल उसको लगा कि नहीं जीसस को यदि उनको अवतार के रूप में या सन ऑफ गॉड के रूप में स्वीकार करते हैं तो उनका मृत्यु क्रॉस के ऊपर में कैसे हो सकता है? तो जिस कब्र में उनको दफनाया गया था उस कब्र का गुफा ना कि ऐसा कुछ था उसका दरवाजा एक बड़े से पत्थर से बंद कर दिया था। तो मेरी मैकडेलिन वहां जाकर खड़ी रहती है इस आशा में कि जीसस वापस आएंगे। एंड सही में वो जो जीसस का रिजरेक्शन हुआ तो फिर वो मेरी ने जाकर के सभी डिसाइपल को कहा कि जीसस इज रिजरेक्टेड। तो यहां पे भी एक तरह से ऐसा ही है कि सर्वप्रथम मां को ठाकुर ने आकर के दर्शन दिए थे। बोल के ये जितने भी और स्वामी जी का जो लाइफ है उसमें हमने स्पष्ट रूप से पढ़ा गंभीरानंद जी ने ही उसमें लिखा है कि जिस तरह से बाकी सब डिसाइपल डिप्रेस हो गए थे ठाकुर की महासमाधि से हतोत्साह हो गए थे उन लोगों ने जब यह समाचार सुना कि ठाकुर ने आकर के मां को दर्शन दिया है तो सबके मन में फिर से आशा का संचार हुआ और फिर उन्होंने ठीक ठीक किया कि सेवा जिस तरह से चल रही थी वैसे ही चलेगी। तो यह महावाक्य वन ऑफ द महावाक्य इन आवर ऑर्डर देखिए कि आज ठाकुर की सेवा ठाकुर की पूजा इस तरह से होती है जैसे कि ठाकुर सदैव हमारे बीच में वर्तमान है। वह एक पत्थर की मूर्ति नहीं कि आप फूलों का घा करें उनके ऊपर में यह फूल फेंक दिए। यह थोड़ा बहुत चंदन छिटक दिया और यह कुछ अगरबत्ती वगैरह लगा दी। नैवेद्य होपफर किया हो गया। नहीं ठाकुर जीवित है। इस तरह से इस श्रद्धा से उनकी पूजा करनी है। देखिए मैं जब लिमड़ी में मेरा पोस्टिंग हुआ था। ऑलमोस्ट 15 साल उस बात को हो गए। 15 साल से भी ज्यादा 18 साल हो गए आज उस बात को। उस समय मेरा ड्यूटी था मंदिर में पूजा करने का। तो उस समय मैं दो साल पूजा किया था। इसके बाद में मेरा पब्लिकेशन में पोस्टिंग हो गया और फिर मंदिर में काम करने का अर्थात कि पूजा वगैरह करने का सद्भाग्य मुझे फिर से नहीं मिला था। क्योंकि पब्लिकेशन एक ऐसा कार्य है कि जिसमें आपको अपना संपूर्ण डाल देना होता है। यदि आप उसको सिंसियरली करना चाहते हैं तो तो वो उस बात को कहां 17 18 साल हो गए। आज मैं यहां पे यहां पे हूं वाइजेक में। यहां पे फिर से अभी क्या है? यह छोटा सा आश्रम है। पब्लिकेशन जैसा तो कुछ यहां पे है नहीं। और हम लोग चार पांच ही साधु मुश्किल से यहां पे है। तो होता क्या है? कभी-कभी पुजारी महाराज को बाहर जाना है, छुट्टी ले जाना है कहीं पे तो बाकी जितने भी साधु हैं हम सबको मंदिर का कार्य जो है पूजा सेवा वगैरह शेयर करनी होती है। तो यहां पर आकर के कितना 17 18 सालों के बाद में फिर से मैंने ठाकुर की आरती की। ठाकुर को नैवेद्य ऑफर किया। ठाकुर की सेवा की। तो मैं एकदम स्पष्ट रूप से यह जो डिफरेंस है मेरे उस दिनों का और इस आज के दिन का मैं लिटरली समझ पाता हूं। मैं जब लिमड़ी में था तो मैं अकेला वहां पर साधु था। मैं था और बड़े महाराज थे। दो ही हम वहां पर पूरे आश्रम में थे और मेरा पूरा आश्रम चलाने का जिम्मा मेरे सर पर था। क्योंकि मैं तो साधु के रूप में तो मैं अकेला ही हूं। फिर तो बड़े महाराज की उम्र बापा उनका नाम एक्चुअली बड़ी उम्र में जॉइ किए थे आत्मस्थानंद जी के पास में उन्होंने राजकोट में तो आत्मस्थानंद जी उनको पहले से ही बापा करके पुकारते थे गुजराती में बापा का अर्थ होता है ग्रैंडफादर ना कि कोई वडिल व्यक्ति उम्र लायक व्यक्ति तो पहले से ही वह बापा के नाम से पहचाने जाते थे और जब मैं उनके साथ में था 80 प्लस उनका एज हो गया था वैसे काम सब कर लेते थे किंतु एक्चुअल माने रिस्पांसिबिलिटी लेना, सुपरविजन करना वह सब तो वो कर लेंगे। किंतु एक्चुअल वर्क तो मुझे करना है। किचन मुझे देखना है। अकाउंट मुझे देखना है। फिर वहां पर डिस्पेंसरी है वह मुझे देखना है। गदाधर प्रकल्प चल रहा है। स्कूल में जाकर के बच्चों को वैल्यू एजुकेशन देना। फिर यह न्यूट्रिशियस फूड देना वह भी मुझे करना है। यानी कि पूरा आश्रम मुझे चलाना है। उसके साथ में मुझे पूजा करनी है। तो क्या है? वैसे तो श्रद्धा पूर्वक पूजा करता था किंतु ठाकुर के सामने बैठकर के मन में वही चलता रहता है कि अच्छा यह जैसे खत्म होता है वैसे ही मुझे ऑफिस में जाकर अकाउंट देखना है। और मुझे मेरा तो अकाउंट का बैकग्राउंड है नहीं। तो बड़ा मुझे कष्ट होता था उस समय। अकाउंट सीखना है फिर गलती ना हो जाए। रामकृष्ण मिशन का स्टैंडर्ड तो पता ही है कि एकदम परफेक्ट स्टैंडर्ड होना चाहिए अकाउंट का। एक-एक पैसों का हिसाब होना चाहिए। तो फिर ऑफिस में जाकर अकाउंट देखना है। वगैरह-वगैरह तो ठाकुर के सामने बैठा हूं। पूजा कर रहा हूं। किंतु मन में वही सब है कि अभी इसके बाद में यह उसके बाद में यह उसके बाद में यह किंतु वो हो गया 17 18 साल पहले की बात। आज कितना साल हुए मुझे संघ में 20 साल हो गए। अभी आज मैं ठाकुर की सेवा नैवेद्य ऑफर करता हूं या तो फिर ठाकुर की आरती करता हूं तो फिर ऐसा लगता है कि बस ठाकुर ही है और मैं ही हूं। अभी इसके बाद क्या वह विचार ही नहीं आता जैसे कि तो देखिए कि जिस तरह से जीवंत ठाकुर की सेवा चल रही थी जीवंत नहीं करके कहेंगे सदैव जो वर्तमान ठाकुर की सेवा जो चल रही थी वो अभी ठाकुर हमारे हृदय में भले ही चाहे विराजित है मंदिर में हम ठाकुर की इस तरह से सेवा करते हैं जैसे कि वो प्रकट वहां पर साक्षात विराजमान है तो यह जो ट्रेडिशन है अपने संघ की वह उसी कुछ दिनों के समय में तैयार हो चुकी है। सबसे पहली घटना तो ठाकुर ने आकर के मां को दर्शन दिया और जैसे ही यह बात फैली सभी जो त्यागी संतान थे उनके प्राण में प्राण वापस आए। जान में जान वापस आई जैसे कहते हैं वो तो एक घटना हुई। दूसरा कि माने यह सब हमने वराह नगर मठ वाला जो डिस्कशन किया था उसमें सब डिटेल डिस्कशन हो ही चुका है। दूसरी इंपॉर्टेंट घटना है कि उसी दिन शाम को दूसरे ही दिन शाम को स्वामी जी वहां काशीपुर में टहल रहे थे। तो देखा कि वो जो मेन फाटक है मेन गेट है गार्डन का वहां से एक उज्जवल प्रकाशमान पुरुष वहां गार्डन के भीतर में आ रहा है तो स्वामी जी भी थे और वो पगला हरीश भी था तो जैसे ही स्वामी जी ने देखा अरे कौन पहले तो वह चुप रहे उन्होंने सोचा मेरी नजरों का भ्रम है फिर हरीश भी तो वहां पर खड़ा है स्वामी जी ने पूछा क्या तुमको कुछ दिख रहा है तो हरीश ने कहा हां कोई वहां पर आया कोई प्रकाश ित देह वाला तो इमीडिएटली स्वामी जी ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया कौन है यहां पे कौन आ रहा है किंतु बाय दैट टाइम तो जो थे प्रकाशित महापुरुष वो अदृश्य हो गए सब लोग दौड़े आए नरेंद्र के चिल्ला चिल्लाने की आवाज सुनकर के वो लटन वगैरह लेकर के वहां जो झाड़ी वगैरह थी सब छान मारा किंतु कोई दिखा नहीं अर्थात कि देखिए कि सर्वप्रथम ठाकुर ने मां को दर्शन दिया है। दूसरे दर्शन उन्होंने स्वामी जी को दिए हैं और तीसरे ही दर्शन हमने देखा था कि वह अयोध्या से जो एक रामायित साधु आया था उसको दक्षिणेश्वर काली मंदिर में दर्शन दिए थे। तो ठाकुर की महासमाधि के साथ-साथ में ही यह दर्शन परंपरा प्रारंभ हो चुकी थी और इसके पीछे क्या लॉजिक क्या था कि यदि यह लोग हतोत्साह हो जाए खास करके यह जो डायरेक्ट डिसाइपल है और मां है तो क्या है कि उन लोगों को अभी जो नेक्स्ट फेज जो है कर्म का ये रामकृष्ण मिशन का वह संभाल नहीं पाएंगे। ठाकुर की महासमाधि कहीं इस पर महासमाधि के बाद में हमको कहीं अभी जगत का त्याग करके सन्यास लेकर के एक कोने में अभी नहीं जाकर के बैठना है। हां हां आप यह कर लीजिए। जिस तरह से स्वामी जी वराह नगर मठ में तपस्या की है। जिस तरह से स्वामी जी ने अह हिमालय जाकर के तपस्या की। मां शारदा देवी को स्वयं कामारपुकुर जाकर के जो तपस्या करनी पड़ी है एक कुछ समय के लिए आप तपस्या कर लीजिए किंतु इसके बाद में आपको युद्ध के मैदान में वापस आना है महाभारत में जैसे कि उद्योग पर्व है तो यहां पे भी ठाकुर की महासमाधि के बाद में शांति पर्व नहीं आने वाला है। अभी तो उद्योग पर्व प्रारंभ होने वाला है। ठाकुर का जो संदेश है पूरी पृथ्वी पर घरघर आपको जाकर फैलाना है। तो आप यदि यह मान करके बैठ जाएंगे कि ठाकुर तो गए साथ में ही सब कुछ समाप्त हो गया तो ऐसा चलने वाला नहीं है। बोलकर के मां और डायरेक्ट डिसाइपल को खास करके स्वामी जी को दर्शन देना ठाकुर ने प्रारंभ कर लिया था। वही मां वृंदावन जाती है। तीर्थ यात्रा ठाकुर की महासमाधि के बाद में जब मां करेगी वृंदावन जब जाती है तो ऑलरेडी योगिन मां वहां पर उपस्थित थी तो फिर मां और योगिन मां साथ में मिलकर के रोना शुरू कर दिए रोए रोते ही जा रहे हैं। रोते ही जा रहे हैं प्रतिदिन तो फिर आखिर में ठाकुर को आकर के मां को दर्शन देना पड़ा कि हांगा तोरा दुई जना ये तो का कांद छो केो तुम दोनों लोग इकट्ठा होकर इतना रो क्यों रही हो आ मैं गया कहां हूं बस इसी कमरे से उस कमरे में यही तो इससे ज्यादा और क्या है तो फिर क्या है कि मां को जब तीर्थ यात्रा पर ले जाया गया था उनके हृदय को शांति प्रदान करवाने के लिए तो फिर ठाकुर ने आकर के एक के बाद एक दर्शन की परंपरा प्रारंभ कर दी थी और मां के पूरे जीवन में देखेंगे कि यह दर्शन जो है ठाकुर के बराबर होते आ रहे हैं। यहां तक कि कुछ-कुछ दर्शन तो बड़े ही फेमस है कि मां ट्रेन में जा रही है। वह जो कवच है कवच वाला जो तावीज उन्होंने पहना था वो तावीज वाला हाथ जो है ट्रेन की खिड़की में रखा था। तो ठाकुर ने खिड़की के बाहर प्रकट होकर के कहा कि अरे ये हाथ में तावीज पहना है संभालना वरना तो यह कहीं निकल ना जाए खो ना बैठो तो फिर मां ने इमीडिएटली हाथ भीतर कर दिया था फिर वो जो योगेन महाराज को उस समय दर्शन दिया था योगेन महाराज बीमार थे बहुत योगेंद्र महाराज को डायरेक्ट दर्शन नहीं दिया था इनडायरेक्टली कि वो योगेन महाराज बीमार थे फिर एक काली भयानक मूर्ति आकर के योगेन महाराज को कहती है कि मैं तुमको मार ही देता तुमको देख ही लेता किंतु परमहंस देव का आदेश है बोल के तुमको छोड़ दे रहा हूं। फिर यह माने दर्शन परंपरा जो है मां जब कामार पुकुर जाती है उस समय भी एक के बाद एक दर्शन मां को लगे ही रहते हैं। यहां तक कि जीवन के आखिरी समय तक एक दिन क्वालपाड़ा की बात है। मां की महासमाधि बस पास में आ ही गई है। मां बहुत ही बीमार है। और एक दिन मां वहां पे धूप बहुत था और वहां पे वो जो वरांडा जैसा है क्वालपाड़ा जगदंबा आश्रम आप गए होंगे तो देखा होगा मां के कमरे के सामने वरांडा जैसा है तो वरांडे में मां बैठी है और एकाएक अभी देखिए जो इसके बाद में हुआ मां उस समय तो स्वीकार नहीं करती एक मां मां को जैसे ही दर्शन हुआ मां भवस्थ हो गई तो मां को भवस्थ देखकर के जो बाकी सब स्त्रियां ही उन्होंने हटोगोल प्रारंभ कर दिया। चीखना चिल्लाना वह जो जैसे वह जो स्त्रियों का नेचर होता है वह जो एक्साइटेड हो जाना यह सब प्रारंभ कर दिया। तो उस समय जब मां भाव से सहज अवस्था में आई तो उन्होंने यह बात स्वीकार नहीं की कि हां मुझे दर्शन हुआ। क्योंकि क्या है झूठमठ की यह सब बातें फैलती है जिसका कोई प्रयोजन नहीं होता। मां ने कहा कि देखिए वो जो सुई होती है सुई में धागा परोने के समय एकाएक मुझे चक्कर जैसा आ गया धूप की वजह से और मैं बेहोश हो गई। ऐसा ही मां ने उस समय कहा। किंतु वरदा महाराज जो कि मां के सेवक थे। मां के आखिरी घड़ी तक जिन्होंने मां की सेवा की थी। वो वरदा महाराज को मां कहती है कि देखो उस समय भले ही चाहे मैंने स्वीकार ना किया किंतु मैंने स्पष्ट रूप से देखा कि ठाकुर धूप में से आकर के वरांडे में बैठे उन्हें धूप में से आकर के वरांडे में बैठना बैठने को जा रहे थे। मैंने जल्दी-जल्दी मेरा आंचल उनके सामने प्रसारित कर दिया जिससे कि उनको जमीन पर ना बैठना पड़े। और फिर ठाकुर ने कहा कि मुझे खिचड़ी खाने की इच्छा हो रही है तो मुझे खिचड़ी खिलाओ। तो देखिए कि अपने जीवन की आखिरी समय तक हो सकता है आखिरी दिन तक किसको पता मां सब कुछ तो स्वीकार करती भी नहीं थी। ये जो जो कुछ हमको देखने को मिला है इनडायरेक्टली ऑब्जर्व करने को मिला है। मां ने जो अपने मुंह से जो स्वीकार किया है वही घटना पता है। वरना तो फिर गंभीरानंद जी स्पष्ट रूप से लिखते हैं मां के कामार पुकुर के दिनों के बारे में कि यह जो दर्शन की परंपरा मां के जीवन में प्रारंभ हुई थी। बोलकर के ही मां संपूर्ण रूप से डिप्रेस नहीं हो गई थी। संपूर्ण रूप से निरुत्साह नहीं हो गई थी। तो वो देखिए कि वो दर्शन परंपरा ठाकुर की महासमाधि के इमीडिएटली बाद में प्रारंभ हो जाती है। और क्यों होती है? क्यों? क्योंकि ठाकुर नहीं चाहते कि अभी यह जो उनके त्यागी संतान है या मां है वो ट्रेडिशनल तपस्या करते-करते जगत से जो कि विमुख ना हो जाए। उनको तो जगत में वापस आना है। उद्योग पर्व प्रारंभ करना है। पूरे विश्व में श्री रामकृष्ण महामंत्र का प्रचार करना है। रामकृष्ण संघ की फॉर्मल एक स्थापना करनी है। और जितने भी यह जो यंग लड़के लड़कियां हैं जिनके हृदय में वैराग्य का उद्दीपन हुआ है। उनको एक दिशा प्रदान करनी है। उनको मार्गदर्शन देना है। उनको ट्रेन करके उनके आध्यात्मिक जीवन का गठन करना है। तो यह जो महत कार्य ठाकुर हम सबके लिए रख करके गए हैं तो वो महत कार्य करने के लिए हम सब लोग प्रस्तुत हो। ठाकुर गए तो हमारा सब कुछ चला गया। यह जो रामचंद्र दत्त वगैरह जिस तरह से लिखते हैं वो यह जो विवरण हमने पढ़ा सभी विवरण में देखिए सभी लोगों को ऐसा लगा ठाकुर की महासमाधि के साथ में ही हमारी आशा हमारा भरोसा हमारे जीवन का जो उद्देश्य सब कुछ जैसे कि उस चिता की राख में विलीन हो गया। चिता के साथ में ही सब कुछ भस्मीभूत हो गया। तो यह एक मिसअंडरस्टैंडिंग कि बस अभी जीवन का और कोई उद्देश्य नहीं मिला है। लेट अस ड्रिफ्ट अराउंड। मैं जैसे भी करके अभी दिन बिता दो। आखिरी दिन अभी हमारे हैं। हमारे भी जीवन के अभी यही आखिरी दिन चल रहे हैं। ठाकुर चले गए तो हमको अभी देह धारण करने से क्या प्रयोजन है? तो यह जो पूरा वैराग्य जो है वो नेगेटिव वैराग्य में ना परिणत हो जाए। वैराग्य है काम कांचन से वैराग्य लेना है। नहीं कि सांसारिक रिस्पांसिबिलिटी से आपको वैराग्य लेना है। जगत के भीतर में रहना है कि बस जगत के जगत से आपको जुड़ नहीं जाना है। जगत के साथ में अटैचमेंट नहीं हो जाना चाहिए। संसार का दायित्व लेना है। संसारी नहीं हो जाना है। यह जो एकदम सूक्ष्म

त्याग का अर्थ पलायन नहीं—वासनाओं का त्याग और सेवा है!

मार्ग जो है संसार के भीतर में ही रहकर के संसार का कल्याण करने के लिए संसारियों का कल्याण करने के लिए एक के बाद एक कर्म का प्रवर्तन प्रारंभ करना, संघ होना यह इतना सूक्ष्म एक है। देखिए कि अ त्याग की जो भारत में परंपरा है इस त्याग की परंपरा में बुद्धिज्म ने हमको पता है कि बुद्धिस्ट संघ स्थापित हुआ था और भगवान बुद्ध ने अपने जो डिसाइपल थे उनको कहा था संघ होकर के कार्य करने को। तो ऐसा नहीं है कि त्याग की परंपरा के साथ में संघ होना कोई ठाकुर या स्वामी जी ले आए हैं। यह तो भगवान बुद्ध के समय से यह चल रहा है। उससे भी पहले यदि हम वैदिक युग में देखें तो वहां पर तो स्पष्ट है कि पहले गृहस्थ आश्रम, फिर वानप्रस्थ आश्रम, फिर से सन्यास आश्रम। तो सन्यास आश्रम अर्थात कि जगत से विमुख हो जाना वह कब होना है? जबकि आपने सांसारिक जवाबदारियों का निर्वाह कर लिया हो। ब्राह्मण यदि है तो ब्राह्मण का धर्म आपने पालन कर लिया हो। क्षत्रिय है तो क्षत्रिय का धर्म पालन कर लिया हो। क्षत्रिय धर्म पालन करने के बाद में अभी आप वन में जाकर के सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम व्रज। इसका अर्थ क्या है? संसार में जो जो आपको कार्य दिया गया है, जो जो धर्म आपको दिए गए हैं, वह धर्म का पालन हो चुका है। अभी बस मात्र मोक्ष धर्म ही आपकी नजर के सामने है। तो यह जो धर्म अर्थ काम वो वाला जो ब्रैकेट है उसमें से अभी बाहर आकर के श्री भगवान के श्री चरणों में अपने जीवन को सर्वस्व समर्पण कर देना है। वह कब आएगा? जबकि आपका यह जो धर्म गृहस्थ आश्रम में पालन हो चुका है। वानप्रस्थ आश्रम में आप उससे सेपरेट हो गए हैं। ऑलरेडी सेपरेट होना प्रारंभ हो गए हैं। तब कहीं जाकर के आपको सन्यास लेना है। तो यह जो सब आइडियाज है कि सन्यास और यह जो धर्म दोनों साथ में रह सकते हैं। वह कोई अपना रामकृष्ण परंपरा के साथ में प्रारंभ नहीं हुआ। रामकृष्ण परंपरा के साथ में जो एक यूनिकनेस है कि सन्यास और धर्म दोनों का इतना सुंदर कॉम्बिनेशन किया गया है फिलॉसोफिकली जो फिलॉसोफिकल कंफ्यूजन किसी के मन में यदि रहा होता कि यह है मेरा धर्म और यह है सन्यास धर्म और यह है संसार धर्म तो इन दोनों में से किस तरह से मुझे मैनेज करना यहां पे संसार धर्म का यह अर्थ नहीं कि हम संसार करें इस अर्थ में कि कामिनी कांचन में फंस जाए। किंतु यह जो संसार है वह भी सत्य है। जिस तरह से ब्रह्मा सत्य है तो संसार भी सत्य है। क्यों? क्योंकि ब्रह्मांड का ही यह संसार बना है। सेपरेटली कुछ भी नहीं है। तो वह जो नेति नेति निर्विकल्प समाधि इति इति वाला जो पाथ एक समय बीच में डेवलप हो गया था पिछले 1000 साल में वो पाथ तोड़ के या तो फिर उसके ट्रांसेंड हो के फिर से वही वैदिक युग वाला जो पाथ है फिर से वही बुद्धिज्म का जो पाथ है कि इति इति निर्विकल्प समाधि इति इति अर्थात कि आसपास में जो कोई भी है हमारे सबके प्रति करुणा सहानुभूति कंपैजन वो को रखते हुए निर्विकल्प समाधि प्राप्त करनी है और वापस आकर के वही कंपैशन, वही करुणा, वही सहानुभूति बनाए रखनी है। कंपैजन इज अ फाउंडेशन ऑफ स्पिरिचुअल लाइफ। यह जो फंडामेंटल कांसेप्ट है वो वैदिक युग में भी था, बुद्धिज्म के भीतर में भी है। कुछ समय के लिए शायद हम लोग यह बात भूल गए होंगे। खास करके सन्यास परंपरा से अद्वैत वेदांत से जो जुड़े हैं उन लोग शायद यह बात बीच में भूल गए होंगे कि द्वैत परंपरा में तो यह था ही था कि हां जो चैतन्य महाप्रभु की बात है नारायण स्वामी की बात है वो जो साउथ इंडिया में ये ज्ञाति प्रथा वगैरह जो भंग करने में नारायण स्वामी का बहुत बड़ा योगदान है। तो भक्ति मार्ग के जितने भी प्रवर्तक हैं, उनका कांसेप्ट बड़ा क्लियर था कि भक्ति हमको सिर्फ ईश्वर की ओर ले जाती है। सिर्फ इतना ही नहीं किंतु आपस में यह जो ज्ञाति प्रथा की नाथ जात की जो दीवाल बनी है उसको भी तोड़ करके अपने भाई बांधवों को भी अपना सकती है। तो ठाकुर ने खुद ने यह बात कही है। कथामृत में है। किसी ठाकुर किसी ने यह नाती प्रथा के बारे में कुछ कहा तो ठाकुर ने कहा यह जाति प्रथा एक उपाय से हम उसको उठा सकते हैं और वह उपाय है भक्ति और फिर ठाकुर ने ही कहा कि चैतन्य देव ने प्रभु का नाम लेकर के आठ चंडाल को आलिंगनबद्ध किया था। अर्थात कि भक्ति परंपरा में यह लोगों के प्रति करुणा सहानुभूति तो थी ही थी। बस एक वेदांत अभी वेदांत में सब तरह की आ जाती है ट्रेड टेक्निकली स्पीकिंग किंतु जो वेदांत शब्द का एक पॉपुलर अर्थ घटन होता है ज्ञान मार्ग या तो अद्वैत वेदांत तो इस अर्थ में यह ज्ञान मार्ग जो लोग थे उनका हृदय शायद थोड़ा सा संकुचित कुछ समय के लिए हो गया था। तो रामकृष्ण संघ का यह जो यूनिक कंट्रीब्यूशन आज के मॉडर्न युग में है कि यहां पर भक्ति परंपरा का जो सह हृदयता थी जो करुणा थी वही सह हृदयता और करुणा उन्होंने ज्ञान मार्ग के तीव्र वैराग्य के साथ में फ्यूज की है। क्योंकि फिर भक्ति मार्ग में यह एक प्रॉब्लम हो जाता है कि चलो ईश्वर के प्रति करुणा है। फिर यह जो चंडाल वगैरह जो तथाकथित निम्न जाति के हैं उनके प्रति करुणा है तो फिर आपको त्याग जो है प्रायोरिटी में हाईएस्ट नहीं आता। हाईएस्ट प्रायोरिटी में दो-तीन चीजें आ जाती है। तो फिर त्याग को इतनाेंस नहीं मिलता। जबकि ज्ञान मार्ग है, त्याग सर्वोपरि है। बिना त्याग के ज्ञान मार्ग में एक कदम भी आप नहीं रख सकते हैं। तो ज्ञान का प्राधान्य ज्ञान मार्ग में त्याग का प्राधान्य वैराग्य का प्राधान्य काम कांचन त्याग का प्राधान्य और भक्ति मार्ग में शरणागति और करुणा ये जो दो है ये तीनों को एक साथ में रामकृष्ण भावधारा में एक साथ में फ्यूज किया गया है। तो, यह जो पूरा भाव जो है ठाकुर ने जो साधना की, उसका यह जो सिविलाइज़ेशनल लेवल पे एप्लीकेशन, कम्युनिटी लेवल पर एप्लीकेशन, वो अभी तो करना प्रारंभ हुआ है। तो, यह कार्य करना है स्वामी विवेकानंद को और मां शारदा देवी को। तो, यह दोनों अपनी महासमाधि से हतोत्साह ना हो जाए। इसके लिए दोनों को दर्शन देना आवश्यक था। दोनों को उत्साह देना आवश्यक था। तो फिर इसके लिए जो पूरा बाद में जो प्रारंभ होता है ठाकुर की महासमाधि के बाद में किस तरह से मां ने कम्युनिटी लेवल पर राम श्री रामकृष्ण देव का जो जीवन और उपदेश है उसको अप्लाई किया है और किस तरह से स्वामी जी ने सिविलाइजेशनल स्केल पे ठाकुर के जीवन और उपदेश को कार्य में परिणत किया है वह अभी हम देखेंगे। देखिए ऑलरेडी हम स्वामी जी का लाइफ पढ़ रहे हैं। तो उस स्वामी जी के जीवन में हम देखेंगे कि स्वामी जी किस तरह से कार्य करते हैं और यह जो मां का जीवन अभी हम देख रहे हैं उसमें पैरेलल देखेंगे कि मां किस तरह से कार्य करती है। तो यह दोनों पैरेलल स्टडी हमको देखने को मिलेगा भविष्य के क्लासेस में। तो आज यहीं तक अभी नेक्स्ट क्लास में मिलते हैं। ओम शांति शांति शांति हरि ओम तत्सत श्री राम कृष्णपणमस्तु

ठाकुर किस प्रकार ज्ञान और भक्ति का समन्वय करते हैं—वे किस तरह संन्यास मार्ग और संसार में दायित्व-निर्वाह के मार्ग के बीच सामंजस्य स्थापित करते हैं।

भक्ति मार्ग में संसार मार्ग में नहीं भक्ति मार्ग में भक्ति मार्ग जो है वहां पे शरणागति और दया या तो फिर कंपैशन इसका प्राधान्य है और जो ज्ञान मार्ग है उसमें त्याग का प्राधान्य है। तो रामकृष्ण सन्यास परंपरा है। उसमें दोनों का हार्मोनी है। उनको यही आदेश है। बस माइल्डर फॉर्म में पाथ एक ही है। सन्यासियों के लिए थोड़ा स्ट्रंगर फॉर्म में है। संसारियों के लिए थोड़ा माइल्डर फॉर्म में है। किंतु आईडिया अलग नहीं है। आईडिया इज सेम कि भक्ति मार्ग में ट्रेडिशनल जो भक्ति मार्ग कहा गया है उसमें जिस तरह से जीवे दया और वो वैष्णव सेवा और ईश्वर का नाम गुण कीर्तन। तो यह जो है वो भी ले लिया गया है और यहां पर जो त्याग का जो सर्वोच्च प्राधान्य है ज्ञान मार्ग में उसको भी ले लिया गया है। ये दोनों को ब्लेंड किया गया है। सो दैट इज द ओनली आइडियल ओनली थिंग इज के संसारियों को थोड़ा माइल्डर फॉर्म में लेना है। यथाशक्ति त्याग करना है। यथाशक्ति सेवा करनी है। जबकि सन्यासियों को और ज्यादा उसमें ताकत लगानी है। यस। वो मैं कहूंगा कि श्री रामकृष्ण साधन पद्धति रेदर देन सेइंग कि ज्ञान मिश्रा भक्ति ऐसा लगता है कि आपने ये वर्ण शंकर एक प्राणी खड़ा किया है। एक म्यूटेंट खड़ा किया है। आई ऑलवेज प्रेफर टू से रामकृष्ण साधन मार्ग हां और और ये जो आर्टिफिशियल डिवीजन था वो सब उड़ा दिया गया है। आप डिवीजन था रहे जब है और आप कहे कि ज्ञान और भक्ति को मिश्रित करना है तब यह सब ठीक है। जब डिवीजन उड़ा ही दिए गए हैं तो ज्ञान और भक्ति को मिश्रित करना ये सब प्रश्न ही नहीं आता है ना। वो बाय डिफॉल्ट वो मिश्रित ही है। किंतु जब से ठाकुर आए हैं तब से तो हमको मतलब इफ यू आर फॉलोविंग ठाकुर आपके माइंड में तो कोई मतलब मतलब जो फॉलोअ है उनके माइंड में कोई ये कंफ्यूजन नहीं होना चाहिए कि डिवीजन आर्टिफिशियल थे। सो क्यों हम ऐसा कहे कि हम दोनों को मिश्रित कर रहा है। ऑफ कोर्स ऐसा कहते हैं क्योंकि जब हम किताबें लिखते हैं, आर्टिकल लिखते हैं, ज्ञान मिश्रा भक्ति इज अ स्टैंडर्ड फ्रेज़। किंतु जब वो क्या है ना कि हाथी के दिखाने के दूसरे चबाने के दूसरे तो जब हम पब्लिक में बोलते हैं तो कहेंगे कि ज्ञान मिश्रा भक्ति। जब हम आपस में बात करते हैं तो वी हैव ऑलरेडी ट्रांसेंडेड ऑल दिस आर्टिफिशियल बैरियर्स। सो व्हाई वुड वी से दैट ज्ञान मिश्रा भक्ति। हम कहेंगे श्री राम कृष्ण साधन पद्धति। हां यस यस यस इंटेंसिटी का वो डिफरेंस है। आपको कोई डिफरेंट पाथ नहीं बताया है।

प्रश्न: हमारे संघ में दर्शन परंपरा कभी रुकी नहीं - हमेशा से चली आ रही है.

है वो अब जैसे कामर पुकुर में ही मां को दर्शन हुआ था कि वो ठाकुर आ रहे हैं। पीछे में गंगा उनके पैरों में से निकल रही है और स्वामी जी फिर अंजली अंजलि गंगा का पानी सब पर डाल रहे हैं। तो है ऑफ़ कोर्स है किंतु आपने जैसे कहा कि वह डॉक्यूमेंटेशन जो है फिर धीरे-धीरे करके मां भी तो छुपाती थी ना। मां भी तो फट करके स्वीकार नहीं करती थी। यह जो आखिरी दिन वाला जो वर्णन था वो तो मां ने वर्दा महाराज को कहा। अदरवाइज उस समय तो मां ने स्पष्ट मना कर दिया। वो धूप की वजह चक्कर आ गया। ऐसा बोल के किंतु बाद बात बाद में उनकी मृत्यु शैया पे मां लेटी हुई है। मृत्यु महासमाधि के दो-तीन दिन आगे मां ने ये स्वीकार किया है वर्धा महाराज के सामने। सो म ये लोग ठाकुर म स्वामी जी है मां है। दर्शन को बहुत छुपा करके रखते थे। ईजीली बताते नहीं स्वामी जी का वो फेमस एक है ना कि वो बैक स्टेज पे एक कम अपने रूम में अकेले हैं। अभी लेक्चर देना है। तो कोई डिवोटी उन्हका कोई एक फ्रेंड जाकर के कमरे के बाहर में खड़ा रहा। सुना कि स्वामी जी किसी के साथ में बातें कर रहे हैं। फिर जब स्वामी जी ने कमरा खोला टाइम हो गया लेक्चर का। अकेले हैं तो पूछा स्वामी जी आप किसके साथ बात कर रहे हैं? तो कहा कि मैं ठाकुर के साथ बात कर रहा था। म जिस जो भी है एक हायर पावर के साथ में ठाकुर व्हाटएवर आज क्या बोलना है वो मुझे बताते म बताते थे सो राज डे दे

प्रश्न: किन्तु हमने कभी दर्शन या चमत्कार को प्राधान्य नहीं दिया

क्योंकि क्या है लोग शॉर्टकट खोजना शुरू कर देते हैं ना अब दूसरा कि अभी देखिए ये डेंजर शायद इन्होंने देखा होगा कि नहीं देखा सोशल मीडिया के युग में ये सब चीजें वायरल हो जाती है तो क्या आपका एक स्टेडी साइलेंट स्पिरिचुअल लाइफ और कहां एक दो दर्शन हुए फिर उसी में आप उलझ गए रामलाल दादा का तो हमने देखा दर्शन हुआ है पहली जनवरी को दर्शन हुआ है और ठाकुर ने दर्शन करवा दिया है और अगस्त सितंबर तक मां का पेंशन रुकवा दिया। सो क्या फर्क पड़ा दर्शन का? और दूसरी और है कि जो एक स्टेडी स्पिरिचुअल लाइफ लीड करनी है। आपका जो बिहेवियर को रीइजीनियर करना है, वह पूरा डीएमफेसाइज हो जाएगा। सो हमें बेलून मठ में गया ट्रेनिंग सेंटर में। तो यह बात मुझे सब समय हमने उड़कर के आंखों के सामने आ रही है कि किस तरह से ट्रेनिंग सेंटर या बेलूर मठ में इस बात पे ज्यादा प्राधान्य दिया जाता है कि आपका लाइफ किस तरह का है। रेदर देन के व्हाट यू प्रैक्टिस रेदर देन व्हाट यू प्रीच? अब जैसे कि अ खाना खाने के बाद में आप थाली आपको धोना है। तो अभी तो थोड़ा सा सिस्टम काफी इंप्रूव हो गया है। पहले तो सीनियर साधु भी अपने से थाली धोते थे। तो आपने थाली धोया तो किस तरह से धोया? उसमें थोड़ा सा भी वह रह गया है कि एकदम क्लीन करके धोया है। फिर आप अपने कमरे में जाते हैं तो फिर कमरे का साफ सफाई ठीक से होता है कि नहीं। आपका एक जो ऑब्लिगेशन है कि आपके कमरे के सामने आप क्लीन करते हैं कि नहीं जिससे कि आने जाने वाले को कहीं तकलीफ हो ना हो। यह जो छोटी-छोटी चीजें ऑफ योर बिहेवियर सुानंद जी एक बहुत सुंदर बात करते थे। वो उस समय गीतानंद जी ट्रस्टी थे और सभी लोग उनको प्रेशर कर रहे थे कि आपको वाइस प्रेसिडेंट होना होगा। तो वो मना कर रहे थे। नहीं मुझे वाइस प्रेसिडेंट नहीं होना। उस समय की ही बात है। आई थिंक सुहितानंद जी उस समय ट्रस्टी हो चुके थे। तो गीतानंद जी को मिलने के लिए उनके कमरे में गए। अभी बेलूरम गए होंगे तो देखा होगा वहां पर मोस क्वार्टर है किचन के पीछे में डाइनिंग हॉल के पीछे तो वहां पे कमरे में उनको मिलने के लिए दर्शन करने के लिए गए। मतलब बात हुई होगी जो भी एडमिनिस्ट्रेटिव बात है कि महाराज आपको वाइस प्रेसिडेंट होना होगा वगैरह-वगैरह जो भी है। फिर गीतानंद जी ने उनको चाय पीने को दिया। तो ठीक है चाय पी लिया। फिर अभी तो ऐसा थोड़ी ना है वो गीतानंद जी का पर्सनल जो कप वगैरह होगा उनके पास में गेस्ट को देने के लिए तो सुहितानंद जी कहते हैं हम लोग कप धोने को गए तो गीतानंद जी ने धोने नहीं दिया बोला मुझे दे दो तुम लोग धो नहीं पाओगे ठीक से ठीक ठीक कैसे धोना मैं ही धो पाऊंगा इसको तो तो वो चाय का कप भी धोना उसमें भी परफेक्शन वही जो राजा महाराज की बात फेमस कि वो कुछ लड़के वो आलू छिल रहे हैं उसमें से एक आलू लेकर के कहा ये जो है वो वो आगे बढ़ेगा शुद्धानंद जी राइट तो इन एव्री मोमेंट ऑफ योर लाइफ इन एव्री एक्शन ऑफ योर लाइफ हाउ यू आर डूइंग इट एथिकली दैट एथिक्स इन डे टू डे लाइफ मोमेंट टू मोमेंट दैट इज व्हाट मैटर्स हियर अबव एवरीथिंग एल्स अभी आप दर्शन वगैरह एक बार जो चालू होता है ना तो ये एथिक्स फेथिक्स कहां उड़ जाएगा उसका कोई ठिकाना नहीं रहेगा

प्रश्न: हमें ठाकुर के कुछ शिष्यों के बारे में कोई भी पुस्तक नहीं मिलती। ऐसा क्यों?

सुबोधनांद जी का जो है किताब है चेतनानंद जी ने पब्लिश किया है सुबुद्धानंद जी के कुछ-कुछ रेमिनेशंस भी है बहुत अच्छे रेमिनेशंस सो वो है किंतु जैसे आपने कहा बिल्कुल जीरो मटेरियल एक तो अद्वैतानंद जी है दूसरे निरंजनंद जी है इवन लाटू महाराज के बारे में बहुत सुंदर किताब है श्रीमद् स्वामी लाटू महाराज जी म लाटू महाराज की स्मृति कथा ऐसा बोल के एक है बहुत ही सुंदर किताब है आई थिंक उसका हिंदी में ट्रांसलेशन भी हुआ है 300 प्लस पेजेस हां 350 प्लस पेजेस है वो तो उनका तो सॉलिड मटेरियल है तो वो तो है किंतु आपने ठीक ही कहा कि देखिए एक के बाद एक सबको यदि गिनेंगे ना शशि महाराज के बारे में सॉलिड मटेरियल है अखंडानंद जी के बारे में सॉलिड है स्वामी जी का तो प्रश्न ही नहीं है फिर आप त्रिगुणातीनंद जी के बारे में वो जो मेरी लुईस की किताब है त्रिगुणातीत अह वेरी गुड बुक माने इतनी मोटी किताब है इतनी मोटी किताब हां हां हां हां वो प्योर इंग्लिश और वही वही मेरी लुईस जिसने ये न्यू डिस्कवरीज लिखा वही मेरी लुईस इसको भी लिखती है। सो इट्स अ वेरी ब्यूटीफुली वेरी वेल रिटन बुक है। तो वो त्रिगुणातीता हरि महाराज की तो ऑफ कोर्स वो स्पिरिचुअल ट्रेजर वगैरह काफी कुछ है। इसके बाद में महापुरुष महाराज की तो बहुत ही सुंदर-सुंदर मोटी-मोटी किताबें हैं। वो देवलोक के भी है और शिवंद स्मृति संग्रह इतना बड़ा वो भी एक है और लाटू महाराज का तो हो गया। मेरे पास में पूरा लिस्ट है सभी किताबों का। मैंने ये जो सिस्टमेटिक स्टडी प्रारंभ किया ना उस समय मैंने एक लिस्ट बनाया था। लिस्ट में मैंने कैटेगरीज बना दी थी। एक तो है कि सोर्स बुक्स। सोर्स बुक क्या है कि पहले तो ठाकुर मां और 16 डायरेक्ट डिसाइपल यानी यह 18 लोग हो गए। 18 लोगों के बारे में सोर्स बुक क्या है? तो उन्होंने खुद ने जो लिखा है बोला है और उनको पहचानने वालों ने उनके बारे में जो लिखा और बोला है दैट इज एब्सोल्यूट सोर्स मटेरियल। दैट इज एब्सोलुटली ऑथेंटिक मटेरियल। अब जैसे ठाकुर ने खुद ने जो बोला वो मास्टर महाशय ने सुनकर के लिखा। सो दैट इज अ सोर्स मटेरियल। शरद महाराज ने जो लिखा इज़ अ सोर्स मटेरियल। स्वामी जी के रेमिनेशन सोर्स मटेरियल, लेक्चर सोर्स मटेरियल, लेटर सोर्स मटेरियल। यानी कि उन्होंने खुद लिखा या बोला या तो उनको पहचानने वाले लोगों ने उनके बारे में जो लिखा या बोला दैट इज़ एब्सोलुटली सोर्स मटेरियल। फिर सेकंड जनरेशन में सेकंड लेवल पे आता है कि ऑथेंटिक वर्क अपॉन देम। जैसे मेरी लुईस का न्यू डिस्कवरी है पूरा सीरीज स्वामी जी के ऊपर में गंभीरानंद जी का स्वामी जी का और मां का बायोग्राफी है। सो दिस इज़ ये गंभीरानंद जी या मेरी लुईस ने स्वामी जी या ठाकुर या मां का दर्शन नहीं किया था। बट दिस आर कंसीडर्ड टू बी वेरी ऑथेंटिक बुक्स। सो एक सेकंड लेवल पर आ जाता है। इसमें ये जो शंकरी प्रसाद बसु का स्वामी विवेकानंद समकालीन भारतवर्ष से कहा जाता है तो ये वो सेकंड लेवल पर आता है और थर्ड लेवल पे है कि फिर उनके बारे में बाद में जो कुछ लिखा गया है या तो फिर उनके बारे में जो भी थिंकिंग किया गया है। मैं जब बेलूर मठ में था, मैंने प्रयास किया कि ये फर्स्ट लेवल यानी कि एब्सोल्यूट सोर्स मटेरियल और ये सेकंड लेवल कि जो कि ऑथेंटिक माना जाता है, यह पूरा कलेक्शन मैं अपने पास में करूं। तो मेरा पर्सनल लाइब्रेरी है। तो इस लाइब्रेरी में ये सभी किताबें हैं। ये फर्स्ट लेवल और सेकंड लेवल की। मैंने लिस्ट भी बनाया है। लिस्ट मैं आपके साथ में शेयर करूंगा। उसमें नाम के साथ में स्वामी जी का ये सोर्स बुक है। अखंडानंद जी का ये सोर्स बुक है। मां का ये सोर्स बुक है। ऐसा करके 18 लोगों के नाम और उनके जो एब्सोल्यूट सोर्स बुक या तो फिर सेकंड कैटेगरी में जो है ऑथेंटिक बुक्स ये पूरा लिस्ट है मेरे पास। वही है कि ज्यादातर किताबें बेंग है। सो दैट इज दैट ज्यादातर किताबें बेंगली है। स्वामी जी के बारे में जो है वो दैट इज के सोर्स बुक आपको इंग्लिश में मिलेगी। न्यू डिस्कवरीज या तो कंप्लीट वर्क्स। बट अदर देन दैट ऑल आर इन बंगाली। सो दैट इज दैट। ओम