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Ma Sarada Life by Sw Gambhirananda ·

वधू : श्रीमाँ सारदा देवी : स्वामी गम्भीरानन्द लिखित : 12 Mar 2024

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ओ स्थापक यज धर्मस्य सर्व धर्म स्वरूप अवतार वरिष्ठ राम कृष्णाय ते नम मायर मां का जीवन इसके बारे में हम पाठ कर रहे हैं लेखक है स्वामी गंभीरानंद जी महाराज और चैप्टर का नाम है वधु अभी हमको पता है कि मा यह मां का और ठाकुर का विवाह हुआ था 18590 और मां दक्षिणेश्वर आई 18720 तो उस मतलब 13 साल का यह बीच में एक गैप है और जब मां दक्षिणेश्वर आई तब उनकी उम्र थी 18 साल की तो यह मां की एज 5 साल से लेकर के 18 साल तक का यह 13 साल तक का यह जो पीरियड है वो इस वधु नामक चैप्टर में गंभीरानंद जी महाराज ने उसको लिपिबद्ध किया है तो इसके बारे में एक के बाद एक प्रसंग है हम पाठ कर रहे हैं और थोड़ा सा इसके ऊपर में चिंतन कर रहे हैं तो गंभीरानंद जी महाराज कल हमने देखा कि किस तरह से मां अपने ससुर यानी कि ठाकुर के पिताजी खुदीराम के बारे में बात कर रही थी मां ने कहा कि किस तरह से उनकी निष्ठा थी किस तरह से ईश्वर के ऊपर में उनकी भक्ति थी जिससे कि मां शीतला स्वयं उनके साथ में 9 साल की बच्ची की तरह बच्ची के रूप में उनके साथ में वो फूल तुलने के लिए उनको सहाय करती थी अर्ली मॉर्निंग फुल चुनने के लिए चले जाते थे खुदीराम और ये लाहा बाबू जो कि कामर पुकुर जहां पर ठाकुर का जन्म हुआ कामर पुकुर अर्थात कि ठाकुर का गांव और मां का गांव जयराम बाटी तो कामर पुकुर में ठाकुर के गांव में लाहा बाबू अर्थात वहां के जमींदार उनके बागान में ठाकुर के पिताजी खुदीराम फूल तुलने को जाते थे तो ये मां शीतला स्वयं 9 साल की बच्ची का स्वरूप लेकर के उनके साथ-साथ में फिरती थी फिर क्या कहती थी कि अच्छा बाबा यहां पे आइए इस डाल पे बहुत सारे फूल है अच्छा मैं डाल को झुका के पकड़ के रखती हूं आप फुल तुल लीजिए इससे कि आपको फुल चुनने में सहायता होगी सुविधा होगी तो इस तरह से ठाकुर के पिताजी थे माने जितने सरल थे ठाकुर जितने निष्ठावान थे ठाकुर इतने ही निष्ठावान इतने ही सरल इतने ही भक्ति परायण थे उनके पिताजी तो यह जो मैंने गुजराती में एक कहावत है कि मोरना इंडा ने रंगवा नो पड़े अर्थात कि यह जो पीकॉक जो होते हैं उसके अंडे को कलर नहीं करना पड़ता माने ऐसा मुझे नहीं लगता कि पीकॉक का अंडा कोई कलर होगा उसमें किंतु ये कहावत है कि पीकॉक तो बहुत सारा कलर होता है उसमें तो उसका जो अंडा होता है तो उसमें भी तो उसका जो बच्चा होगा उसको तो बाहर से की कलर करने की जरूरत नहीं है पीकॉक अर्थात की मोर अपना राष्ट्रीय पक्षी तो व उसके बच्चे में ऑटोमेटिक उसके अंडे में वो कलर आ ही जाएंगे तो वैसे ही यहां पे है कि ठाकुर के पिताजी जी और माता जी से जो जन्म गत संस्कार जो मिले थे वही ठाकुर को बहुत ही आगे उनकी साधना में ले गए ऑफकोर्स हम लोग जब ठाकुर या तो मां का जीवन हम चर्चा करते हैं उसके बारे में या तो फिर एनालिसिस करते हैं तो या तो फिर पाठ करते हैं हमारे सामने दो पैरेलल ट्रैक है जैसे कि दो पैरेलल स्ट्रीम्स ऑफ थॉट है एक स्ट्रीम या तो एक ट्रैक क्या कहता है कि वो भी हमारी ही तरह इंसान थे और उन्होंने साधना करके सिद्धि प्राप्त की इस तरह से सोचने में सुविधा यह रहती है कि उनकी स्ट्रगल हमको रियल दिखती है इतने छोटे से गांव में जन्म लेना इतने रूढ़ी चुस्त परिवार वातावरण भारत की जो परिस्थिति थी इकोनॉमिक पॉलिटिकल और यह जो वहां के गांव की परिस्थिति जो एक रूढ़ चुस्त थी इन सबके भीतर में जन्म लेकर के साधना करके सिद्धि प्राप्त करना कितनी बड़ी बात है यदि हम उनको मनुष्य के रूप में देखेंगे तो उनकी प्रत्येक स्ट्रगल हमारे लिए प्रेरणादाई हो जाती है दूसरी ओर है दूसरा तरीका है इनको ईश्वर के अंश के रूप में देखना अभी ईश्वर के अंश के रूप में देखने से शायद हमारी श्रद्धा भक्ति उनके ऊपर ज्यादा बढ़ जाएगी हो सकता है किंतु फिर इनकी स्ट्रगल हमको रियल नहीं दिखेगी हमको लगेगा अरे तो मां जगदंबा स्वयं है वोह पृथ्वी पर आई है थोड़ा बहुत कष्ट करेगी तो क्या उनको फर्क पड़ता है मैं आई एम श्यर कि मेरे जो भी पूर्वज होंगे मेरी मां की मां या तो फिर उनकी मां उन्होंने इससे भी ज्यादा संघर्ष किया होगा आज आज हम लोग इतना ही संघर्ष कर रहे हैं तो परिश्रम करना संघर्ष करना जीवन में चैलेंज होना वह तो हमारे तो हम लोग भी करते हैं ठाकुर और मां ने ऐसा तो कौन सा बड़ा काम किया यदि वह ईश्वर के अंश है तो तो इस तरह से सोचने से ईश्वरीय अंश सोचने से एक बेनिफिट यह है कि विश्व फलक पे एक वर्ल्ड स्टेज पे उनका जो मिशन है हमको बड़ा ही स्पष्ट दिखता है किंतु डिसएडवांटेज ये है कि उनकी जो स्ट्रगल्स चैलेंज संघर्ष वो हमको मिनिमाइज हो जाते हैं हमारे सामने हमको लगता है कि अरे वो तो तो ईश्वर है वो करेंगे यदि हम उनको ह्यूमन के रूप में देखें कि वह मनुष्य ही थे हमारी ही तरह तो उसका बेनिफिट यह है प्लस पॉइंट ये है कि उनकी जितनी भी स्ट्रगल्स से जितनी भी साधनाएं हैं हमारे सामने एक विराट स्वरूप धारण करती है हमको कितनी प्रेरणा देती है हमको लगेगा कि अरे ठाकुर और मां इस परिस्थिति में उन्होंने जो संघर्ष किया तो मैं क्या उससे एक सीर सी ठाकुर जैसा वो कहते हैं मैंने सी अर्थात एक एक पैसा का एक पैसे के परिमाण अर्थात कि न परने 100 रुपए का एक रुपए में 100 पैसे होते हैं तो 100 पैसे में एक रुपए का एक पैसा और उसका भी एकवा भाग इतना भी मिनिमम यदि हम स्ट्रगल यदि उनके जितना नहीं कर पाएंगे तो अपने जीवन का क्या अर्थ है किंतु साथ में ही फिर एक नेगेटिव यह है कि मनुष्य के रूप में देखने से कि उनका जो विश्व फलक पर उनका जो मिशन है हजारों साल तक चलने वाला उसको शायद हम थोड़ा सा इतना गंभीरता पूर्वक ना ले जितना कि हमको लेने की जरूरत है तो यानी कि यह दोनों जो ट्रैक है ये दोनों ट्रैक की अ ठाकुर और मां को हम ईश्वरीय अंश के रूप में गिने ना कि हम उनको हमारे ही तरह मनुष्य के रूप में गिने इन दोनों के प्लस भी है माइनस इस भी है तो बेस्ट वे है कि टेक द प्लस फ्रॉम बोथ एंड टेक अवे मने रिमूव द माइनस ऑफ बध अर्थात कि मनुष्य रूप में उन्होंने संघर्ष किया साधना की और सिद्धि प्राप्त की और ईश्वरीय रूप में जहां पर उनको सिद्धि प्राप्त करना साधना करना वैसा कोई प्रयोजन ही नहीं है ईश्वर तो हमेशा सर्व सिद्ध ही होते हैं सर्व सिद्धियों के स्वरूप है ईश्वर किंतु फिर ईश्वरीय रूप में देखने से जो वर्ल्ड मिशन उनका है पूरा जगत का यह परिवर्तन जगत के प्रत्येक मनुष्य को आज के एक नया संदेश देना नए रूप से उनको प्रेरित करना कि हां ईश्वर दर्शन ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य है इसका अर्थ यह नहीं कि आप अर्थ और काम के लिए प्रयास ना करें अपनी वैदिक परंपरा है धर्म अर्थ काम और मोक्ष तो मोक्ष सर्वोच्च मार्ग है किंतु धर्म के आधार पर अर्थ और काम का भी आप अनुष्ठान कर सकते हैं तो यह उपदेश देना अपनी वैदिक परंपरा को पुनर्जीवित करना अच्छा वैदिक परंपरा को पुनर्जीवित करने का यह अर्थ नहीं कि यह जो मिडल एजेस कहो ना कि डार्क एजेस कहो उस समय जितनी भी अंधश्रद्धा अपने भारत देश में प्रवेश कर गई थी उसको पुनः जागृत करना यह अर्थ नहीं है अपने जो सनातन यह जो धर्म के जो बेसिक प्रिंसिपल्स थे उनको पुनर्जीवित करना तो बेसिक प्रिंसिपल क्या है तो यह वेदांत का महावाक्य कि ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या जीवो ब्रह्म वना पर एक मनुष्य के हृदय में जो आत्मन या तो जीवात्मा विराजमान है वो सही सही ब्रह्म का ही एक अस् फूट स्वरूप है उसको जैसे-जैसे हम मेनिफेस्ट करते जाएंगे वैसे-वैसे ही हम ब्रह्मण की ओर जाते जाएंगे यह हो गया बेसिक प्रिंसिपल और फिर इस प्रिंसिपल के आधार पर उन्होंने समाज व्यवस्था एक पूरी बनाई थी आश्रम चार आश्रम चार वर्ण और चार पुरुषार्थ तो ये चारों का जो कॉमिनेशन जो था वो चारों का कॉमिनेशन पे हमारा वैदिक समाज बना था यह चार पुरुषार्थ अर्थात धर्म अर्थ काम मोक्ष चार आश्रम चार वर्ण चार आश्रम अर्थात कि ये चार वर्ण अर्थात कि ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य और शुद्र और चार आश्रम यानी कि ब्रह्मचर्य आश्रम वानप्रस्थाश्रम गृहस्थाश्रम और संन्यास आश्रम तो यह अपनी परंपरा थी और चार वेद अर्थात की नॉलेज का फाउंडेशन अपने चार वेदों में था तो यह परंपरा थी अपनी इस परंपरा को अच्छा अभी यह ब्राह्मण क्षत्रिय सुनकर करके थोड़ा सा आजकल के लोग डर जाते हैं किंतु कहने का अर्थ यही है कि प्रॉपर डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ द रिसोर्सेस यदि हमको पता है कि इसके पास में ज्यादा धन है और इसके पास में कम धन है कम समृद्धि है तो उसके लड़के को 10 टीचर दो जैसे कि ठाकुर ने स्वामी जी ने कहा कि यदि ब्राह्मण के लड़के को एक शिक्षक की आवश्यकता है तो शुद्र के बच्चे को 10 शिक्षक की आवश्यकता है यह ये आश्रमों में ये जो वर्णाश्रम में जो ये डिवीजन हुआ ये इसके लिए नहीं कि इसको एक्सप्लोइट किया जाए इसके लिए कि जो कमजोर वर्ग है समाज का उसको ज्यादा रिसोर्सेस एलोकेट की जाए तो यह जो पूरी आजकल देखिए कि सभी लोगों को ये ये बैकवर्ड कास्ट और ये अदर बैकवर्ड कास्ट का ये चाहिए हु आजकल तो ये सबको माइनॉरिटी का खिताब चाहिए हम लोग माइनॉरिटी है या तो फिर हम लोग बैकवर्ड कास्ट है ऐसा सबको करना है क्यों क्योंकि ऐसा करने से इनको ज्यादा बेनिफिट मिलते हैं आज जो गवर्नमेंट ने स्वामी जी की जो स्कीम है बेसिकली अपना ली है जो कि बैकवर्ड कास्ट है या तो फिर जो माइनॉरिटी है उनको ज्यादा बेनिफिट मिलता है अभी देखिए कि जैन लोग भी अपने को माइनॉरिटी कहलाते हैं पता नहीं किस हिसाब से किंतु सभी को माइनॉरिटी होना है सभी को बैकवर्ड कास्ट होना है जिससे कि सबको ज्यादा बेनिफिट मिले तो ये तो उल्टा हो गया ना बहुत लोग बोलते थे कि ये वर्ण ये जो व्यवस्था थी कि आप इतने लोगों को अशुद्ध शुद्र बनाते हैं इतने लोगों को वैश्य बनाते हैं और आप खुद ब्राह्मण और क्षत्रिय बनकर बैठे हैं किंतु यदि हमको पता है कि कौन क्या है तो हम इस तरह से रिसोर्स एलोकेट कर सकते हैं इसमें बुरा कुछ नहीं है बुरा यह है कि जद शुद्र या वैश्य इनके बच्चे को अपनी टैलेंट के अनुसार राज्य करने की या तो विद्या अभ्यास करने की एक अपॉर्चुनिटी ना अपॉर्चुनिटी ना मिले तो वो गलत होगा किंतु यदि सबको समान अपॉर्चुनिटी और इतना ही नहीं कांस्टीट्यूशनली सबको समान अपॉर्चुनिटी और जो वकर सेक्शन से इनको लार्जर एलोकेशन ऑफ रिसोर्स ऐसा किया जाए तो और किसी को यहां पर दिक्कत नहीं है तो यह वही वर्ण व्यवस्था आश्रम व्यवस्था यह पुरुषार्थ यह वेद इनको पुनर्जीवित करने के लिए यह अवतार का आगमन होता है और इसको पूरा पॉजिटिव लाइट में लेना है मैं खुद एक समय था कि एक कम्युनिस्ट विचारधारा से थोड़ा सा प्रभाव हो गया था और स्वामी जी को पढ़ने से पहले उन्हें ठाकुर की कृपा है कि स्वामी जी को पढ़ा और यह सब ब्रेन वाशिंग मेरा हुआ था उसका रिप्रोग्रामिंग हो गया किंतु मैं जब कॉलेज के समय में सभी लोगों के भीतर में एक रिबेलियस स्पिरिट होता है ना था कि हां मैं समाज को बदल दूंगा समाज में यह कर दूंगा रेवोल्यूशन ला दूंगा ऐसा सभी यंग लड़के में होता ही है तो मेरे में भी ऐसा थोड़ा था तो ऐसा मैं सोचता था कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुसार कि अरे जो पूंजीपति है या तो फिर य पर कास्ट है इन लोगों ने ही भारत का सर्वनाश किया है आज टुडे आई एम ए मच वाइजर पर्सन आज मुझे पता है कि पूंजी या तो विद्या उसके अगेंस्ट में अपना युद्ध नहीं है अपना युद्ध है ऑर्थोडॉक्सी या तो फिर एक तरह के शोषण करने का जिसका स्पिरिट होता है उसके अगेंस्ट में अपने को बोलना है नहीं कि जो कि जिसके पास में धन है ऐसा नहीं है कि धन इट सेल्फ इज समथिंग रंग देखिए कि आज अमेरिका सबके ऊपर में बैठा हुआ है सब लोगों को अमेरिका जाना है आज यदि अमेरिका की एंबेसी यह दिल्ली में है या कोलकाता में है जहां पर भी है अपने दरवाजे खोल दे और यह कहे कि अच्छा जितने लोगों को अमेरिका जाना है सबको हम इमीग्रेशन वीजा दे देंगे तो सोच लीजिए कि वहां पर कितनी लंबी लाइन लग जाएगी व भारत में कितने लोग रहेंगे उसके बाद में वह प्रश्नार्थक चिन्ह है और यदि अमेरिका में यदि अपनी इंडियन एंबेसी अपने दरवाजे खोलकर बोलेगी कि हां जितने लोगों को अमेरिका से इंडिया इमीग्रेट होना है सबको वीजा दे देंगे तो देखिएगा कि वहां कितनी लाइन होती है नो डाउट भारत में अभी बहुत सारी इकोनॉमिक डेवलपमेंट हो रहा है किंतु फिर भी हमको याद रखना है कि बहुत लंबा सफर हमको काटना है किंतु देखिए कि यहीं पर ठाकुर और मां का यह जो मिशन है हमको समझ में आता है कि धीरे-धीरे करके परिवार के लेवल पर यह विद्या अभ्यास यानी कि गुरुकुल के लेवल पर और यह सोसाइटल लेवल पर ऑर्डर बनाकर के स्वामी जी ने जिस तरह से ऑर्डर बनाया है तो मां का परिवार के लेवल पर जो उनकी प्रेरणा थी उनकी शिक्षा थी ठाकुर की गुरुकुल अर्थात की विद्या अभ्यास किस तरह से करना चाहिए उस लेवल पर जो प्रेरणा और शिक्षा थी और स्वामी जी की सोसाइटल रिसोर्सेस रेडिस्ट्रिक्टिंग उद्देश्य है तो देखिए कि यदि हम उनको ईश्वरीय अंश मानते हैं तो यह जो अपना लार्जर ऑब्जेक्टिव है उसके बारे में कुछ करने का हम प्रयास करेंगे और यदि हम उनको मनुष्य मानते हैं तो उन्होंने जिस तरह से साधना करके सिद्धि प्राप्त की जिस तरह से तपस्या की जिस तरह से त्याग किया जिस तरह से संयम किया उसको अपने जीवन में उतारने की हमको प्रेरणा मिलती है यानी कि उनका मनुष्य स्वरूप और उनका ईश्वरीय स्वरूप दोनों स्वरूप को साथ में रख कर के चलना है और फिर जैसे मास्टर महाशय ठाकुर को कहते हैं कि एक सफेद दूध कभी काला हो सकता है क्या जो कि साकार ईश्वर है वह कभी निराकार हो सकते हैं क्या निराकार कभी साकार हो सकते हैं क्या तो ठाकुर ने क्या कहा कि तुम तुम लोगों कलकत्ता के लोगों का यही है पहले तो विचार बहुत ज्यादा करो फिर दूसरों को उपदेश देना शुरू करो तो यहां पर भी कि ये साकार निराकार कैसे हो सकता है निराकार साकार कैसे हो सकता है यह सब हमको धीरे-धीरे साधना करके पता चलेगा तो यहां पर भी जो अपेरेंट पैराडॉक्स है अपेरेंट ड्युअलिटी है कि मनुष्य भी है ईश्वर भी है ये दोनों साथ में कैसे हो सकते हैं ईश्वर कभी मनुष्य हो सकता है मनुष्य कभी ईश्वर हो सकता है हां ऑफकोर्स वेदांत की दृष्टि से यदि आप देखें तो मनुष्य के भीतर में ही ईश्वर है वही ईश्वर का मेनिफेस्टेशन ही एक तरह से इवोल्यूशन है मनुष्य और इवोल्यूशन है ईश्वर किंतु हम यहां पे जब ठाकुर और मां का जीवन हम स्टडी करते हैं तो वेदांत की दृष्टि से हम इनको ईश्वर नहीं मानते हम इनको यह जो अवतार परंपरा है वैष्णव शास्त्र है उनकी दृष्टि से हम इनको ईश्वर मानते हैं जैसे कि स्वामी जी जब ठाकुर का अंतिम समय था बिछाने पे मृत्यु शैया पे ही प्राय सोए हुए थे कैंसर हो गया था ठाकुर को और नरेण पास में बैठा हुआ सोच रहा है नरेण अर्थात स्वामी विवेकानंद भविष्य के तो वही नरेण मन में मन में सोच रहा है ठाकुर यदि इस समय यह कहे कि हां मैं अवतार हूं तो मानो तो ठाकुर ने उनके मन की बात समझ ली और कहा जय राम जय कृष्ण श्री राम कृष्ण किंतु तोर वेदांत दिख दिए नाई अर्थात कि जो राम जो कृष्णा वही राम कृष्णा किंतु वेदांत के दृष्टिकोण से नहीं वेदांत कहता है सभी ब्रह्मण है सभी ईश्वर है उस दृष्टिकोण से नहीं तो अभी देखिए कि इनका मनुष्य भाव और इनका ईश्वरीय भाव दोनों को साथ में रख कर के इनके लीला का चिंतन करना है अपेरेंट पैराडॉक्स है अपेरेंट मने अपोजिट आइडियाज लगते हैं किंतु मनुष्य का जो ब्रेन है मनुष्य का जो माइंड है इट इज अ वेरी कॉम्प्लिकेटेड वेरी कॉम्प्लेक्शन है कि इस तरह के विरोधाभासी भाव को भी एक साथ में लेकर के वह आराम से रह सकता है हमको को कभी कोई टेंशन नहीं होगा यह सोचने में कि हां कभी मैं सोचता हूं कि ये मनुष्य है कभी सोचता हूं तो ईश्वर है तो इसमें कंट्रक्शन क्यों इस बात से मेरी रातों की नींद उड़ने वाली नहीं है अबना मनुष्य का दिमाग इतना तो एडवांस इतना तो सोफिस्टिकेटेड है कि इस तरह के अपोजिट आइडियाज को आराम से साथ में लेकर चल सके उसके ऊपर चिंतन कर सके और एक दिन ऐसा आएगा साधना करते-करते ठाकुर ही दिखा देंगे कि हां यह दो पैराडॉक्स एक साथ में एक पैराडॉक्स अर्थात कि अपोजिट भाव एक साथ में है इसका क्या तात्पर्य है ठाकुर ही एक दिन हमको दिखा देंगे तो अभी यह जो वधु चैप्टर है इस चैप्टर को हमको मां का मनुष्य भाव के रूप में लेना है कि किस तरह से एक ट्रेडिशनल हिंदू परिवार में कामर पुकुर के जयराम बाटी और कामर पुकुर जैसे छोटे गांव के एक ट्रेडिशनल हिंदू परिवार में मां का आगमन हुआ था एज ए अ बहू के रूप में और वहां पर उन्होंने किस तरह से अपने ससुर और सास की सेवा की और किस तरह से इन्होंने इस इस तरह के एक परिवार में समय बिताया अभी आजकल का जैसे है कि बहुत सारे फैमिलीज को जब मैरिज होता है तो जो वाइफ होती है इसको या तो अपने ससुर और साथ सास के साथ में नहीं रहना होता नहीं रहना पसंद करती है उन लोगों को सेपरेट फैमिली चाहिए अमेरिका में तो ऐसा सा होता ही है जैसे मैरेज तो क्या मैरेज तो बहुत ही दूर की बात है वहां तो लड़के यह सब 18 17 साल के होते हैं कॉलेज में आते हैं तो घर छोड़ कर के चले जाते हैं अपने से थोड़ा बहुत रोजगार वगैरह करेंगे जॉब करेंगे कहीं रेस्टोरेंट वगैरह में और फिर वह अपने से अलग से रहेंगे तो मने मैरेज करने के बाद साथ में रहने की तो बहुत दूर की है बचपन में ही वे लोग सेपरेट हो जाते हैं तो अभी भारत में भी यह सब धीरे-धीरे आ रहा है पता नहीं भविष्य क्या है कि मां हमको ऐसा कहती है कि आप ट्रेडिशनल जॉइंट फैमिली की ओर वापस चले जाइए या तो फिर आप भले ही चाहे मॉडर्न एज के अनुसार सेपरेटली रहे किंतु उस जॉइंट फैमिली के ये जो परस्पर के ऊपर में जो प्रेम था उसको बजाए रखें ये एक्चुअल फ्यूचर किस तरह से पेन आउट होगा वो तो भविष्य ही कहेगा अपना काम है कि मां की इस लीला का चिंतन करना और लीला से आनंद प्राप्त करना चिंतन करके आनंद प्राप्त करना तो गंभीरानंद जी महाराज आगे क्या लिखते हैं लिखते हैं श्रीमा स्नेहो मोई दुहिता नय तहर सस्र मातारिकी देन एवम ओई से बार सु जोगे शसुर गृहे इति बृत्तो एवं सुख दुख आदिर कथा सुनि देन एक स्नेहमयी दुहिता दुहिता अर्थात की बच्ची बिटिया लड़की डॉटर तो एक एक मां की जो एक स्नेहमयी बच्ची होती है बिटिया होती है इसी की तरह चंद्रा मणि देवी की छोटी बच्ची की तरह ही मां उनकी सेवा करती थी और सेवा करते-करते ही चंद्रा मणि देवी अर्थात कि उनकी सास इनके पास से यह खुदीराम के सब प्रसंग सुनती थी ए रूपे एक दिन तहर पृष्ठ तैल मर्दन करते करते शसुर जे अपूर्व धर्म निष्ठा देर कथा सुनिया लेन उत्तर काले ताहर उल्लेख कोरिया जन को भक्तो के सहस्य बोलिया लेन ओमन आचारी बन से जन्मो और करता होलेन स्वयं कै बते बाड़ी पुजारी एक दिन इसी तरह मां चंद्रा मणि की देवी की पीठ पर तेल मालिश करते करते माने चंद्रा मणि देवी को खुदीराम के बारे में खुदीराम की निष्ठा के बारे में कोई प्रसंग बोलते हुए सुना था तो अभी मां जब उसके बाद के समय में मां स्वयं जब वृद्धा हो रही थी मां जब जयराम बाटी या तो फिर कोलकाता में रहती थी मां के पास ठाकुर की महासमाधि के बाद की बात है जब मां के पास में बहुत सारे भक्त आते थे तो मां कभी-कभी अपने बचपन के दिनों की बातें यह ठाकुर के परिवार की बातें ठाकुर के मां और पिताजी के बारे में सब बातें किया करती थी तो एक दिन इस तरह से उन्होंने वो बात याद की कि हां चंद्रा मणि देवी की पीठ पर वह तेल मालिश कर रही थी उस समय चंद्रा मणि देवी ने खुदीराम के बारे में अर्थात कि ठाकुर के पिताजी की धर्म निष्ठा के बारे में कोई प्रसंग कहा अभी वह प्रसंग क्या था यहां पर उसका उल्लेख नहीं है किंतु हम अनुमान करके सोच सकते हैं कि जिस तरह से खुदीराम का यह नियम था कि सब किसी से कुछ भी दान ग्रहण नहीं करना क्योंकि दान ग्रहण करने से कर्म का एक अंश हमें आ ही जाता एक बात है दाता जो है उसके कर्म का एक अंश साथ-साथ में ग्रहण करना पड़ता है वह एक चीज है दूसरा कि ब्राह्मण तो गरीबी में ही रहेगा अपरिग्रह यह ब्राह्मण का व्रत है जितना चाहे इतना संग्रह करो बाकी सब तज दो यह तो ब्राह्मण का व्रत ही है बिना मतलब की चीजें संग्रह करने से क्या लाभ है तो यह निष्ठा इसी तरह का कोई प्रसंग शायद उन्होंने सुनाया होगा तो वह प्रसंग को याद करके मां हंसते हंसते क्या कह है देखिए कि इस तरह के आचारी बंश जन्मो आचारी अर्थात की धर्मनिरपेक्ष चर्यता है यहां पर आश्चर्य चिन्ह वैसे नहीं लगाया है किंतु मां हंसते हंसते ऐसा बोलती अभी इस स्टेटमेंट में आज हमको थोड़ा सा एक विरोध हो सकता है यह कहना कि क्या कै वर्त जदी काली मंदिर बनाएगा तो ब्राह्मण उसमें पूजा ना करें यह कहां की बात हो गई आज के समय की दृष्टि के अनुसार यह हमको थोड़ा सा अनुचित लगता है किंतु अगेन हमको याद रखना है कि हम यह जो कोई भी बात कर रहे हैं वो 1860 70 80 उस समय की है जब का भारत आज के भारत से बहुत ही डिफरेंट था वैदिक युग का भारत एक था यह मिडिल एजेस का भारत एक था और यह आज का मॉडर्न भारत एक है उस समय की प्रथा के अनुसार उस समय के चिंतन के अनुसार उस समय जो एक मने प्रवर्तन जो विचारधारा थी उसके अनुसार ब्राह्मण जदी कै वर्त कै वर्त अर्थात की एक थोड़ी सी ब्राह्मण से थोड़ी सी एक स्टेप दो स्टेप तरह थोड़ी जात इस तरह की जात जद इस तरह के जात में जिनका जन्म हुआ है इस तरह की रानी रामनी वह यदि मंदिर बनाएगी तो इस मंदिर में पूजा कौन करेगा ब्राह्मण कैसे करेगा यह सब लोग सोचते थे तो खैर जो भी है मां ने ऐसा कहा कि इस तरह के आचार्य वंश अर्थात कि इस तरह से धर्मनिरपेक्ष अनपेक करने जैसा है किंतु इसके बारे में हमने ऑलरेडी बहुत कुछ डिस्कस किया है कोई किस जाति में जन्म लेता है उसके उसके कोई संस्कार के ऊपर में कोई फर्क नहीं पड़ता रिसोर्स डिस्ट्रीब्यूशन के हिसाब से ही यह सब चीजें सोचनी है यह सब चीजें उसी समय जब वैदिक युग में सोची गई थी तो उसी तरह से सोची गई थी ऐसा नहीं था कि इसका यह संस्कार है पिताजी का अर्थात कि उसके लड़के का भी वही संस्कार होगा उसके भी लड़के का वही संस्कार होगा ऐसा सोचने का बिल्कुल गलत हो गया ऐसा हो सकता है कि पिताजी कैसे भी हो किंतु बच्चा उनका और भी बहुत ही डिफरेंट डायरेक्शन में जाए ऋषि मुनियों के बच्चे राक्षस हुए हैं और राक्षसों के बच्चे ऋषि मुनि हुए हैं इस तरह की कितनी ही घटनाएं हमको अपने पुराणों में देखने को मिलती है तो ऋषि मुनि का लड़का यदि ऋषि ही होगा राक्षस नहीं हो सकता ऐसा कहीं पर लिखा नहीं है तो ये संस्कार के अनुसार वर्ण व्यवस्था नहीं थी यह रिसोर्स डिस्ट्रीब्यूशन के हिसाब से था तो यह तो हुआ कि इस पार्टिकुलर बात का अर्थ इसके बाद में गंभीरानंद जी महाराज लिखते हैं आगे कामर पुकुरे थाक अवकाश श्रीमा संतरण संगीत और रंधन आदि ते पटुता लाभ कोरिया लेन कामर पुकुर में रहने के समय माने संतरण अर्थात की स्विमिंग पानी में तैरना एक दूसरा संगीत और तीसरा रंधन अर्थात की खाना बनाना इन तीनों कार्य में पटुता लाभ कोरिया लेन अर्थात की एक्सपर्टाइज्ड हैं तो हमको थोड़ा सा एक क्या है मैंने इमेजिन करके हम देखेंगे कि मां जब गाती थी अभी देखिए कि एक बार दक्षिणेश्वर का एक प्रसंग है कि ठाकुर वहां पर शौच के लिए जा रहे थे तो पता है ना वहां पर तो खुले में शौच करना ये इंडोर प्लंबिंग वगैरह कुछ नहीं था तो जो लोग दक्षिणेश्वर गए होंगे उन्होंने देखा होगा कि य पूरा गंगा के किनारे पहले ठाकुर का कमरा है उसके बाद में आई थिंक 20 30 फुट के ऊपर में नबत है और उस से थोड़ा सा उससे अगेन 20 30 फुट ही होगा शायद पंचवटी है और उससे आगे जाएंगे तो झाऊ तला है झाऊ तला अर्थात कि वहां पर खुले में बैठ कर के आप शोच के लिए जा सकते हैं तो अर्थात कि ठाकुर को जब भी सोच के लिए जाना पड़ेगा मां के नबत जहां पर मां रहती थी वहां से ठाकुर को गुजरना पड़ेगा तो एक बार ठाकुर जा रहे थे देखा कि लक्ष्मी दीदी शाम का समय था लक्ष्मी दीदी और मां बैठक के साथ में एकदम धीरे आवाज से कोई भजन गा रहे थे गुनगुना करके कोई भजन गा रहे थे तो ये ठाकुर ने जब जाकर जाते हुए थे तो उन्होंने सुना अभी शायद मां और लक्ष्मी दीदी को पता नहीं होगा कि ठाकुर यहां पर खड़े-खड़े सुन रहे अर्थात जद उनको पता होता और ठाकुर ने जद मने मने उनके सामने आए होते तो लज्जा के मारे उन्होंने गाना बंद कर दिया होता ठाकुर को पता था इसलिए ठाकुर ऐसे थोड़े से अंधेरे में खड़े रह कर के सुना वो सुन कर के उसके बाद में वो झावतला चले गए सोच के लिए फिर दूसरे दिन वो लक्ष्मी दीदी को बोलते हैं कि क्या रे तुम और तुम्हारी काकी म खड़ी खड़ी को गुजराती में बोलेंगे काकी माने तो ये तुम और मां ये दोनों तुम दोनों का स गाना बहुत जमा था कल ना माने बहुत तुम लोग मग्न होकर के तन्मय होकर के गा रहे थे मैंने सुना था तो इस तरह से एक प्रसंग है तो मां गा सकती थी हमको पता है किंतु बहुत ही कम प्रसंग हमने देखे हैं कि जहां पे इस बात का परिचय हमको मिलता है और स्विमिंग मां को आता था यह बात तो मैंने इसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं होगा क्योंकि जब वहां इन लोगों को तो क्या था कि जब स्नान करना है या तो कपड़े धोने हैं तो कलकाता में रहने के समय में गंगा नदी में स्नान और कपड़े धोने होंगे और यदि यहां पर रहते हैं कामर पुकुर या जयराम बाटी में तो आमोद नदी है या तो फिर यह नदी वहां जो हालदार पुर बोलकर के जो तालाब है वहां पर यानी कि तालाब हो ना कि नदी हो इन लोगों का बड़ा ही गहन संपर्क था वहां पर आपको जाना ही पड़ेगा तो यदि इस परिस्थिति में तैरना ना आए तो बड़ा ही डेंजरस खास करके कोलकाता में वो नदी का प्रवाह इतना प्रचंड है कि कब आपके पैर फिसल जाए कब कहां पर आपको आगे ले जाए कुछ ठीक नहीं तो उस समय यदि हमको तैरना नहीं आता है तो प्राण संशय हो सकता है जीवन जाने की संभावना है तो तैरना तो हमको आना ही चाहिए उस समय की बात थी आज हम लोग इतने सेफ है कि यह सब आपको यदि रना सीखना है तो स्विमिंग पूल का आपको वो मेंबरशिप करवाना पड़ेगा किसी इंस्ट्रक्शन इंस्ट्रक्टर के पास में सीखना होगा उस समय तो ऐसा नहीं था करते करते देखते देखते सीख जाना था यहां पर महाराज जी ने देखिए वही लिखा है पल्ली पल्ली बाला के ई सकल के हो सिखाते आसे ना देखिया सुनिया आज तो करते अर्थात की पल्ली बाला अर्थात की गांव की बाला अर्थात की किशोरी यानी कि गांव की किशोरियों को लड़कियों को यह सब कोई सिखाने को नहीं आता आएगा देख कर के और सुख सुन कर के ही इनको सब कुछ सीख लेना है तो खन का दीने बाउल और भिखारी मुखे बहु तत्व पूर्ण सुमधुर संगीत सोना जाए तो उस समय बाउल और भिखारी इन लोग जब गांव में आएंगे तो बहुत सुंदर एक तात्विक भजन वगैरह सुन कर के वे लोग सुनाएंगे इस तरह के कुछ कुछ प्रसंग है एक बार गिरीश घोष जयराम बाटी गए थे गिरीश घोष थे और शायद शरत महाराज वगैरह भी साथ में थे तो कलकाता से मां को मां का दर्शन करने के लिए जयराम बाटी गए तो वहां पर एक भिखारी आया और मां थी फिर मेरे ख्याल से ये गोलाप मां गोलाप मां भी थी उस समय उनके साथ में तो मां और गुलाप मां जयराम बाटी वो तो झोपड़ी जदी देखी होगी मां की कुटिया तो पता होगा कि वहां पर भीतर में बैठ सकते हैं बाहर में एक बड़ा सा एक कोर्टयार्ड जैसा है और सामने पुरुष लोगों के रहने की व्यवस्था है तो जब यह भिखारी आया शाम के संध्या के समय तो सबने बोला कि चलो तुम कुछ गाओ तो उसने वो बंगाली में जिसको कि आगमन संगीत कहते हैं अभी आगमन संगीत अभी देखिए जैसे जो लोग बंगोली नहीं है वो लोग पहली बार जब ये आगमन संगीत काली काली कीर्तन सुनते हैं उन लोगों को इस तरह से एक भाव होता है भीतर से बंगोल में जो बच्चे बड़े होते हैं इन लोगों को यह आगमन संगीत है काली कीर्तन है बचपन से ही सुनते आते हैं यह बंगोल की एक स्पेशल प्रथा है यह भजन यह बंगोली ये काली कीर्तन और आगमन संगीत यह दुर्गा पूजा में मां का जब आगमन होता है तब यह सब भजन कीर्तन गाए जाते हैं मैं जब बेलर मठ में था पहली बार सुना मुझे एक ऐसी दिव्य अनुभूति हुई थी बाप रे जैसे कि माने अभी भी मुझे वो दिन याद करके मेरी प्रथम दुर्गा पूजा मैंने बेलूर मठ में अटेंड की थी वो वो याद करके मुझे अभी भी रोमांच होता है कि हां मतलब वो एक मेरे जीवन का एक विशेष पर्व था तो वो मां का जब आगमन होता है पार्वती का उस समय यह आगमन संगीत गाया जाता है तो यह भिखार ने जो भजन गाया था कि यह भगवान शिव है इनको सब लोग क्या कहते हैं कि यह तो स्मशान वासी है यह तो भभूत वगैरह भस्म वगैरह अपने शरीर पर लगा कर के रखते हैं फिर ये तो ये साप है भूत पिशाच है यह उनके संगी है और पैसा तो एक पैसा फूटी कोड़ी भी नहीं है स्मशान में रहते हैं कहां से पैसा उनके पास में होगा और इनको फिर यह गौरी इनके साथ में विवाह दे दिया मां गौरी का मां पार्वती का यह तो किस तरह का अन्याय हो गया तो जब इस तरह से भिखारी भजन गा रहा है तो वहां पर मां के साथ में यह श्यामा सुंदरी देवी भी थी श्यामा सुंदरी देवी अर्थात मां की मां तो वो उस समय यह भजन सुनक के भजन समाप्त हुआ सबके मन में ऐसा लगा जैसे कि मां और ठाकुर की ही कहानी है मैंने देखिए कि मां लक्ष्मी स्वयं और ठाकुर को देखिए कि वो बिल्कुल भिखारी की तरह वो सन्यासी की तरह दक्षिणेश्वर में रहकर के जब तब साधना तपस्या करते हैं उनकी शाद भी होगी शादी होकर के जब वधु घर पर आएगी तो उनकी खाने पीने रहने की व्यवस्था कौन करेगा कुछ ठीक नहीं तो जब मां शारदा का जब श्यामा सुंदरी देवी ने पूरा भजन सुना ना तो एक तो भजन समाप्त होने के बाद में सबके हृदय में गिरीश घोष फिर ये अपने शरत महाराज इतने अभिभूत हो गए थे ऐसे लगा जैसे कि मां और ठाकुर का ही जीवन का पूरा वृतांत सुन रहे है और श्यामा सुंदरी देवी क्या कहती है पता है कि जब शारदा का विवाह हुआ था तो सभी लोग गांव में ऐसा ही कह रहे थे कि कहां वो एक पागल को अपनी लड़की का विवाह दे दिया उसके पास में खुद को खाने को कुछ नहीं आपकी लड़की को वो क्या खिलाएगा ऐसा वोह श्यामा सुंदरी कहती है कि गांव के ऐसे कितने ही लोग हैं जो आकर के मुझे और मेरी बिटिया शारदा को आकर के इस तरह से महने टोने ये जो मेणा टोना गुजराती शब्द है ऐसा जो उन्हें कटाक्ष करके कोई बात सुनानी होती है ना दूसरों के कष्ट से ऐसे कुछ कुछ लोग होते हैं बहुत सारे लोग होते हैं एक्चुअली कि दूसरों को कष्ट देख कर के बड़ा आनंद आता है और दूसरे का कष्ट जब होता है तो जाकर के उनको ऐसी कोई कटाक्ष भरी बात सुना देते हैं तो यह शारदा का यह जो मिसफॉर्चून था देख कर के गांव के ऐसे कई लोग थे जो आकर के मां शारदा को भी मां श्यामा सुंदरी को भी इस तरह से कटाक्ष पूर्ण वचन सुना कर के जाते थे तो ये देखो कि किंतु अभी वो एक समय है और ये एक समय है कि कलकत्ता से कितने भक्त मां के पास आते हैं कितने फल कितनी मिठाई कितने वस्त्र कितने पैसे मां के सामने मां के चरणों में रख कर के मां के आशीर्वाद प्राप्त करते हैं प्रार्थना करते हैं तो वो एक समय था ये एक समय है किंतु ये जैसे समय का चक्र जैसे बीतता है तो ये सब तो यहां पे जैसे कहा है ना महाराज ने कि एक समय था कि बंगाल के गांव-गांव में बाउल और भिखारी वो जाकर के बहुत ही तात्विक तथ्य पूर्ण पौराणिक कथाओं पर आधारित भजन कीर्तन किया करते थे और इसको सुन सुन करके मां को भी बहुत सारे भजन याद रह गए थे तो खन का दिने बावलो भिखारी मुखे बहु तत्व पूर्ण सुमधुर संगीत सुना जातो एवं पौराणिक जात्रा अभिनय होले श कोले धर्मो पदेश आदी लाभ करीतो और यह पौराणिक यात्रा अर्थात नाटक यह सबका अभिनय होता था गांव गांव में और यह सब को देख कर के सुन कर के लोग बहुत सारी पौराणिक कथाएं सुनते थे मैंने पहली बार यह यात्रा देखी थी बेलर मठ में बेलूरमठ में अभी भी वह प्रथा है कि ठाकुर तिथि पूजा हो कि कोई बड़ा उत्सव हो तो वहां पर गंगा के किनारे वह जो मंच बनता है जो मंडप बनता है वहां प यह सब ट्रेडिशनल वो बाउल के कीर्तन है भजन कीर्तन फिर यह यात्रा वगैरा होता है तो यह जो किताबों में पढ़ते हैं वो वैसे लगेगा कि हमको यह सब मैंने इस सबका एक अनुभूति हमको अनुभव कहां पर होगा किंतु बेलूरमठ में अभी भी वो ट्रेडिशनल रहा है और वहां पर मैंने इस तरह की यात्रा अभी नहीं देखे हुए है देखिए आज का जो एंटरटेनमेंट का स्टैंडर्ड है या तो फिर ये जो ये मूवीज है सिनेमा है आज की स्पेशल इफेक्ट्स है आज की जो स्टोरी टेलिंग है मने आज हमारा एक इतना सोफिस्टिकेशन हो गया है मीडिया और ये इंफॉर्मेशन के क्षेत्र में किंतु इवन आज के युग में भी यदि मन को थोड़ा सा शांत करके य यात्रा अभिनय यदि हम देखें तो मन को बड़ा ही शांत ब बड़ा ही आनंद आएगा यह मेरा खुद का अनुभूति है गंगा के किनारे यहां पर गंगा है यहां पर बेलूरमठ है वहां पर स्टेज पर ऐसा ही कोई पौराणिक अभिन हो रहा था मैंने देखा है बहुत ही सुंदर लगा था बहुत ही मुझे आनंद आया था श्री मायर बालो शिखा उने कांश व भाब होया छलो मां के जीवन की बाल्य शिक्षा बाल्य अवस्था में जो उनको केड़ी प्राप्त हुई थी एजुकेशन प्राप्त हुआ था वो बहुत अंश में इस तरह ही प्राप्त हुआ था आबार जयराम बाटी और कामा पुकुरर अभाब संसार तहा के कर्मो निरो तो राखिया बहु विषय सिखाया छीलो और साथ-साथ में ही कामर पुकुर और जयराम बाटी के संसार में कर्म व्यस्तता तो होगी ही होगी तो कर्म व्यस्तता के भीतर में रहकर के उन्होंने बहुत कुछ सीख लिया था बहुत कुछ ऐसा होता है जो कि प्रैक्टिकल एजुकेशन प्राप्त करके ही हमको सीखने को मिलता है एकेडमिक या तो थियोरेटिकल एजुकेशन हमको सब कुछ नहीं सिखाता तो पहले के जमाने में जैसे हमने आगे भी पढ़ा कि मां अपने पिताजी और माताजी के साथ में खेत में जाती थी उनको सहाय करती थी अपने छोटे-छोटे भाई हैं उनकी केयर करती थी घर में खाना बनाती थी यहां तक कि खाना बनाने के बाद में वह जो हांडी है जो पात्रा है खाना बनाने का वो तो हेवी रहता होगा चूल्हे के ऊपर से उतरता नहीं होगा मां से मां के छोटे-छोटे हाथ तो पिताजी को बुलाती थी पिताजी इस इस पात्र को ये चूहे के ऊपर से उतारिए तो पिताजी उस पात्र को उतारते थे तो माने यह सब कुछ हमने देखा पढ़ा और सुना तो इसी तरह से मैंने मां का शिक्षण बचपन में हुआ था आज सेही सिखार परि समाप्ति घटि घटिया छलो श्री रामकृष्ण पद तले बसिया और इसी शिक्षण का मने अल्टीमेटली परि समाप्ति अर्थात कि यह फाइनल डेस्टिनेशन उनको प्राप्त हुआ था श्री राम कृष्ण के पदत पर बैठ कर के पद तोले बोशिया माने श्री राम कृष्ण के चरण के पास में बैठ कर के उनको इस शिक्षा की परि समाप्ति हुई थी मने इस शिक्षा का सर्वोच्च धय जो है शिक्षा का जो सर्वोच्च अंग है वोह उन्होंने श्री रामकृष्ण से प्राप्त किया था अर्थात कि धार्मिक शिक्षा किस तरह से जप ध्यान करना चाहिए किस तरह से साधन भजन करना चाहिए किस तरह में संसार में रह कर के भी किस तरह से त्यागी का जीवन जीना चाहिए इसके बारे में एक सुंदर प्रसंग है एक बार ऐसा हुआ कि ठाकुर मां को बता रहे हैं त्याग के बारे में अभी क्या है कि यह श्यामा सुंदरी देवी बार-बार कहती थी कि देखो कि मेरी मेरी बेटिया मां शारदा को मां बोलकर के कोई बुलाने वाला नहीं है अर्थात कि एक बच्चा जब अपनी मां को मां करके बुलाता है तो मां का जीवन किस तरह से धन्य हो जाता है उसका हृदय किस तरह से हर्ष उत् फुलल हो जाता है तो यह सौभाग्य शारदा को नहीं मिलेगा ऐसा वो कहती थी और सहज मातृ भाव तो होता ही है तो मां शारदा के भीतर में भी था तो ठाकुर अभी क्या एक बार मां को क्या कहते हैं कि देखो यह जो सब स्त्रियां आती है ना यहां पर कालीवाड़ा के किनारे कपड़े धोने के लिए या तो स्नान करने के लिए वगैरह के लिए तो वह सब तुमको कहेगी कि देखो के इनको तुमको यदि संतान नहीं हो रहा है तो कोई दवाई वगैरह का इस्तेमाल करो अपने पति के ऊपर में दवाई का इस्तेमाल करोगे तो शायद तुमको संतान प्राप्त हो इस तरह से यह लड़ औरत तुमको कोई उल्टी शिक्षा देगी किंतु तुम मने मेहरबानी करना मेरे पर ऐसी कोई दवाई का प्रयोग मत करना छुपके छुपके मुझे ऐसी कोई दवाई मत खिलाना ईश्वर ने मुझे सब कुछ दिया है किंतु मैंने मेरा सब कुछ ईश्वर प्राप्ति के लिए सब कुछ दे दिया है ऐसा करके ठाकुर एक बार मां को कहते हैं और फिर साथ-साथ में ही क्या कहते हैं कि देखो ये बच्चे वगैरह इसमें क्या है बच्चा तो आएगा मर जाएगा देखो ना कितने लोगों के बच्चे बचपन में ही मर जाते हैं ये इन्फेंट मोर्टालिटी उस समय बहुत ही बड़ी एक सहज व्यापार था मने सहज था कि चार पांच बच्चे होंगे किसी मां के तो उसमें आधे तो बचपन में ही जिनका मृत्यु हो जाएगा ठाकुर ने खुद अपने भतीजे अक्षय का मृत्यु देखा था मां ने भी तो अपने छोटे भाई अभय का मृत्यु देखा था तो यह बच्चे तो आएंगे जाएंगे तो क्या है इसका बच्चा हुआ मर गया उसका बच्चा हुआ मर गया ऐसा करके ठाकुर गिना रहे तो एकदम मां तो कभी भी ठाकुर के सामने कुछ भी बोलती नहीं थी किंतु एक बार ठाकुर ऐसा मृत्यु के बारे में बोलना शुरू कर दि इसका बच्चा मर गया उसका बच्चा मर गया तो मां थोड़ी नाराज हो गई और बड़े ही हल्के शब्दों में बड़े ही मैंने धीरी आवाज में क्या बोली मां कि क्या सबके बच्चे मर जाते हैं सबके बच्चे थोड़ी ना मरेंगे ठाकुर यहां पर उपस्थित है मां यहां पर उपस्थित है अर्थात सब बच्चे थोड़ी ना मर जाएंगे तो मां ने सिर्फ इतना ही कहा बड़ी ही मृदु आवाज में क्या सभी बच्चे मर जाते हैं तो ठाकुर एकदम चौक गए अरे मैंने इतना मां को बोल रहे हैं कि बच्चे नहीं चाहिए बच्चे का का मृत्यु हो जाता है ये वो और सडन जब मां ने ऐसा कहा तो ठाकुर एकदम चौक गए और मैंने ये मने एक ह्यूमरस एस्पेक्ट है ना एक पूरे प्रसंग का तो वो जोर से बोल रहे है अरे जात साब के जात सा पर लेजे पा पड़े छे रे जात साप लेजे पा पड़े छ अर्थात कि जो जहरीला साप होता है उसकी पूंछ के ऊपर में जद पैर पड़ेगा तो क्या होगा साप एकदम आपके सामने और देख कर के वो काटने को आएगा तो आप कैसे डर के मारे भाग जाएंगे तो सा ठाकुर कहते हैं कि इस तरह की सांप की पूंछ के ऊपर में पैर पड़ गया अरे बाबा तो सांप मारने को आ रहा है ये ठाकुर और मां के भी ऐसे सब प्रसंग है ठाकुर मां को सिखाते थे और मां सब कुछ चुपचाप सुन भी लेती थी किंतु कभी-कभी मां इस तरह से रिबेलियस स्पिरिट भी था मां के भीतर में तो मां सामने सुना भी देती थी यह सब सुनकर के हमको कैसा आनंद और एक एक ह्यूमरस है ना माने इनका जीवन देखिए कि ऐसा नहीं है कि चुपचाप सीरियसली साधना कर रहे हैं स्वामी जी को एक बार अमेरिका में किसी ने कहा था कि अरे स्वामी जी आप तो धर्म उपदेशक है आप तो यहां के पृष्ठ जो है कैथोलिक जम के कैथोलिक पृष्ठ है बिशप है वो कितने गंभीर होकर के रहते हैं तो आप तो उन्हीं के जैसे धर्म उपदेशक है फिर भी आप इतना हंसते हैं इतना झोली मूड में रहते हैं तो क्यों आप ऐसा करते हैं आपका जो यह धर्म उपदेशक होने का ग्रेविटी है ना वो कम हो जाएगा तो स्वामी जी क्या कहते हैं कि जो मुझे पेट में दर्द थोड़ी ना हो रहा है कि मैं गंभीर मुंह करके बैठा रहूं जिसको पेट में दर्द होता है वही ऐसा गंभीर मुंह करके बैठते हैं मैं धर्म उपदेशक हूं हम तो ईश्वर के संतान है वी आर द चिल्ड्रन ऑफ इम्मोर्टालिटी हमको तो हंसना है खेलना है अपने ईश्वरीय माता-पिता के गुणगान कीर्तन करना है थोड़ी ना मुंह चढ़ा कर के बैठे रहना है जिसको पेट में दर्द होगा वो ऐसा करेगा तो वैसे ही ये ठाकुर और मां और स्वामी जी और ये डायरेक्ट डिसाइल अपने इनका जीवन का जितना चिंतन करेंगे तो एक ह्यूमरस एस्पेक्ट को हमको एक सामने रखना है इनका जीवन ऐसा नहीं था बढ़कर के ऐसा लगेगा कि अरे सब समय तपस्या कर रहे हैं सब समय त्याग कर रहे हैं सब समय ठाकुर वो खड़क हाथ में लेकर के खड़े हैं मां के सामने कि दर्शन दो वरना अभी अपने गले प मारता हूं खड़क तो ऐसा नहीं था देयर आर मेनी एस्पेक्ट पूरा रेनबो था इनके जीवन में तो सभी एस्पेक्ट का स्टडी करके च करके हमको भी अपने हृदय को भी कितना सुकून मिलता है तो आज यही तक कल फिर से मिलते हैं ओ शांति शांति शांति हरि ओम तसत श्री राम कृष्णा अर्पणम

Question Answer

अस्तु आज तो यहां पर पूजा भी स्टार्ट हो गई आज तो पूरा दिन भजन कीर्तन होगा बड़ा ही शुभ दिन है और सभी को ठाकुर तिथि पूजा की बधाई ईश्वर के पास में ठाकुर के पास में आप सबकी मंगल कामना प्रार्थना मैंने आप लोग संसार में रह कर के भी इतना सब कुछ करते हैं वह देख कर के ही मुझे आश्चर्य होता है हम लोग साधु तो यही काम करने के लिए ठाकुर मां का नाम करने के लिए आए और हम करें तो कोई बड़ी बात नहीं है आप मां का नाम लेते हैं ठाकुर का नाम लेती है इतना बहुत बड़ी बात ये ठाकुर कहते हैं ना कि 100 साल के बाद में मैं वापस आऊंगा और फिर यह जो नॉर्थ ईस्ट की ओर इशारा करके और फिर मां कभी कहती है कि बाउल के वेश में आएंगे बाउल अर्थात की वह जो बांगला के एक तरह के वह जो भिक्षुक साधक तो उसके वेश में आएंगे तो ऐसा बहुत कुछ ठाकुर के वापस आने के बारे में अपने लिटरेचर में पाया जाता है मां की बातों में भी है इवन लीला प्रसंग में भी शारदानंद जी महाराज ने इस बात का उल्लेख किया है अभी दो मत है मां ने 100 साल कहा है लीला प्रसंग में 200 साल कहा है तो जो भी है तो अभी इंटरेस्टिंग इंसिडेंट है कि चेतनानंद जी की एक डिवोटा लेडी डिवोटा अमेरिकन और अभी क्या है कि जब आप अमेरिकन लोगों का खास करके देखा है कि जो चीज को पकड़ते हैं ना पूरा मन प्राण उसमें डाल देते हैं तो अभी ये थी अमेरिकन डिवटी किंतु अभी वेदांत को पकड़ा है तो पूरा मन प्राण उस वेदांत में डाल दिया है फिर चेतनानंद जी महाराज को एक बार जाकर क्या कहती है कि महाराज दिस इज द ईयर 1986 ये 1986 की साल की यह बात है ठाकुर का महासमाधि हुआ 18864 में जहां पर बाहु लोगों का मेला बनता है मैं वहां पर जाती हूं ठाकुर तो आएंगे 100 साल में यह बाउल का वेश धारण करके तो मैं चाहती हूं कि मैं सबसे पहले ठाकुर का दर्शन करूं ठाकुर ने तो कहा है कि मैं 100 साल के बाद में आ रहा हूं तो अभी चेतनानंद जी समझ गए कि ये बेचारी वहां पर जाएगी बड़ी आशा लेकर के और तो फिर उसको जाने को मना तो सीधा करेंगे कि मत जाओ यह सब तो ठाकुर पता नहीं क्या बोलते रहते थे ऐसा कुछ बोलने से फिर भक्ति के ऊपर में हानी होगी तो चेतनानंद जी खुद कहते हैं इस किस तरह से बात को घुमा दिया चेतनानंद जी कहते हैं देखो कि ठाकुर का मैथमेटिक्स गणित तो बड़ा कच्चा था वोह जो कहना चाहते थे वह था कि 100 100 सालों के बाद में आऊंगा अभी कितने 100 ठाकुर को पता नहीं उनका गणित तो कच्चा था माने ये 19 86 में आएंगे ना कि 2086 में आएंगे कि 2186 किसको पता तो ऐसा है कि अभी मान लीजिए कि वो लेडी डिवटी चली भी जाती और ठाकुर सामने आ भी जाते तो क्या पहचान पाएंगे हम लोगों ने हम हमारी जो ठाकुर के बारे में जो कल्पना है वोह तो 1880 उस समय के समय की है आज के जमाने के अनुसार तो ठाकुर आज के जमाने के अनुसार आएंगे तो वो क्या वही ब्राह्मण के रूप में होंगे वही वो साधक के रूप में होंगे पता नहीं क्या स्वरूप धारण करके आएंगे मैंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के रूप में आ सकते हैं किसको पता है ये तो ईश्वर है ईश्वर के बारे में सब कुछ संभव है स्वामी जी ने कहा था ना अपने गुरु भाइयों को कि तुम लोगों की ये जो लिमिटेड अंडरस्टैंडिंग है ना ईश्वर की ठाकुर की इस लिमिटेड अंडरस्टैंडिंग में से ठाकुर को बाहर निकाल कर के मैं पूरे विश्व में दे देना चाहता हूं तो कैलिफोर्निया में ठाकुर का प्रचार स्वामी जी ने किया है अभी इसी कैलिफोर्निया में आज एआई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलप हो रहा है तो किसको पता कि ठाकुर वहां पर जन्म नहीं लेंगे ठाकुर ने तो नॉर्थ ईस्ट दिखाया था तो ये नॉर्थ वेस्ट सॉरी नॉर्थ ईस्ट नहीं नॉर्थ वेस्ट नॉर्थ वेस्ट जद दिखाया था तो अमेरिका भी आ गया किसने कहा कि ये आपका हां माने हां वेस्ट में तो अमेरिका भी आ गया है तो अमेरिका के कैलिफोर्निया में भी ठाकुर आ सकते हैं एज सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में हो सकता है कि ये गोड लाइक एआई का डेवलप कर दे स ठाकुर की जो मने ये है ना मने मेनिफेस्टेशन अनंत है हमको यह सोचना कि इस तरह से राम आए थे राजा के रूप में भगवान बुद्ध आए थे राजा के रूप में तो ठाकुर क्यों एक गरीब ब्राह्मण के रूप में आए तो ऐसा हम किसी तरह का ये क्या कहेंगे ना कि चार्ट नहीं बना सकते पहले ऐसा हुआ बाद में ऐसा हुआ तो हम इस तरह से प्रोजेक्ट करते हैं ठाकुर सब प्रोजेक्ट प्रोजेक्शन से परे हैं तो मैंने सही में ऐसा होगा कि ठाकुर आएंगे और हम पहचान नहीं पाएंगे क्योंकि प्री कंसीव नोशन रहता है कि 18864 सालों से किंतु जब जीसस आए और उन्होंने कहा आई एम योर न्यू किंग डेविड किंग डेविड का ही मैं नया संस्करण हू तो ये जीव लोगों ने ही उसको दगा दे कर के जीसस को क्रूसिफिकेशन विरोध ना करे बस 2003 में रंगनाथ आनंद जी जा रहे थे वहां का बेलगांव के मंदिर के उद्घाटन के लिए तो अभी प्रॉब्लम यह हुआ कि उनकी सेहत थोड़ी सी यह हो गई खराब हो गई तो बेंगलोर से ही इनको वापस चले जाना पड़ा बेलूर मट तो मुझे जो लगता है ना कि जो आखिरी आखिरी बेलूर मठ के बाहर में उन्होंने जो दीक्षा दी होंगी उसमें से वो बेंगलोर वाली दीक्षा थी तो आई वाज वेरी री फॉर्चूनेटली नगर चेन्नई जवाइन करने के लिए गया था तो मुझे तो कुछ पता नहीं नो बैकग्राउंड तो मैंने वहां के महंत महाराज पूछ रहे हैं कि तुम्हारी दीक्षा हुई है मैंने कहा नहीं हुई मैंने मुझे पता ही नहीं दीक्षा क्या है मैं साधु ब्रह्मचारी बन गया हूं पता नहीं दीक्षा क्या है तो बोला जाओ जाओ रंगनाथ आनंद जी आए हैं तो मैं बेंगलर आया था बहुत ही सुंदर एक सप्ताह बिताया और दीक्षा का जो कमरा था मंदिर में तो सबको साथ में बिठाते हैं मैं ब्रह्मचारी के कपड़े पहन के बैठा हूं मुझे थोड़ा साइड प बिठाया बाकी ये सब गृहस्था है